Saturday, May 31, 2025

हरियाणा की भारती ने गांव की लड़कियों को दी नई उड़ान: ड्रॉपआउट छात्राओं के लिए खोला शिक्षा केंद्र, अब कई कर रहीं नौकरी

पिता की मौत के बाद पढ़ाई का सपना अधूरा लग रहा था, लेकिन हरियाणा के सोनीपत जिले के राजापुर गांव की भारती ने न सिर्फ अपनी शिक्षा पूरी की, बल्कि दर्जनों ड्रॉपआउट लड़कियों की जिंदगी बदल दी. एक एनजीओ से जुड़कर खुद आगे बढ़ीं और फिर ‘बदलाव की किरण’ नाम से मुहिम शुरू की, जिससे आज गांव की लगभग 50 लड़कियां दोबारा स्कूल और कॉलेज में लौट चुकी हैं.

पिता की मौत के बाद भाइयों के हाथ में थे फैसले, पर भारती ने खुद के लिए चुना पढ़ाई का रास्ता

हरियाणा के सोनीपत जिले में राजापुर गांव की रहने वाली भारती कहती हैं कि साल 2008 में पिता की मृत्यु के बाद हमारे परिवार में भाइयों का ही निर्णय माना जाता था. 

2018 में जब भारती ने बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण की तो वह आगे भी पढ़ाई जारी रखना चाहती थीं पर उन्हें घर से इसके लिए कोई सपोर्ट नहीं मिला. इसी बीच गांव की आशा वर्कर्स के जरिए उन्हें 'ब्रेकथ्रू' एनजीओ के बारे में पता चला. ये लोग हमारे यहां जेंडर भेदभाव के मुद्दे पर कार्य कर रहे थे. भारती ने बताया कि ब्रेकथ्रू वालों ने जब उनके परिवार को लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई का महत्व समझाया तो वे राजी हो गए. इसके बाद भारती ने बैचलर ऑफ सोशल वर्क (BSW) में एडमिशन लिया.

‘बदलाव की किरण’ गांव की ड्रॉप आउट लड़कियों को फिर से पढ़ाई से जोड़ा

भारती आगे कहती हैं कि इसके बाद मैंने 'बदलाव की किरण' नाम से ग्रुप बनाया और गांव में अपनी जैसी ड्रॉप आउट लड़कियों को फिर से पढ़ाई-लिखाई से जोड़ने का प्रयास शुरू किया. उन्होंने गांव में सर्वे किया कि कितनी लड़कियां स्कूल से ड्रॉप आउट हैं. इस दौरान उन्हें यह भी पता चला कि माता-पिता को ये ही पता नहीं होता था कि उनकी लड़कियां कौन सी क्लास में पढ़ रही हैं. सर्वे के दौरान उन्हें अपनी जाति की वजह से काफी दिक्कत आई. लोग उन्हें अपने घर के अंदर नहीं आने देते थे और अच्छी तरह से बात नहीं करते थे.

सामुदायिक केंद्र बना शिक्षा की नई राह, गांव के पुरुषों का भी करना पड़ा विरोध का सामना

लड़कियों को पढ़ाने के लिए भारती ने गांव की सरपंच से बात की और उनसे इसके लिए जगह मांगी. भारती कहती हैं, सरपंच ने उन्हें गांव का सामुदायिक केंद्र इस काम के लिए दे दिया. वहां गांव के पुरुष पहले ताश खेलते रहते थे और उन्होंने भारती को सामुदायिक केंद्र दिए जाने का विरोध भी किया. बारह ड्रॉप आउट लड़कियों से शुरू हुए इस अभियान में अब लगभग गांव की पचास ड्रॉप आउट लड़कियां शामिल हो गई हैं.

इनमें जो बारहवीं के बाद पढ़ाई छोड़ी हुई लड़कियां थी, उन्हें भारती ने कॉलेज भेजा. दसवीं के बाद ड्रॉप आउट लड़कियों को फिर से स्कूल भेजा और छोटी क्लास में ही स्कूल से ड्रॉप आउट लड़कियों को उन्होंने सामुदायिक केंद्र में ही पढ़ाया. जब उनका बेसिक क्लियर किया जाता था तब उन्हें स्कूल भेजा जाता था. यही काम वह अब भी कर रही हैं, इनमें कुछ लड़कियां अब बाहर जाकर नौकरी भी करने लगी हैं.

मेंस्ट्रुअल हाइजीन की जानकारी से बदली सोच, घर की महिलाएं भी आने लगीं सामुदायिक केंद्र

भारती कहती हैं सामुदायिक केंद्र में वह लड़कियों को उनकी पर्सनल हाइजीन के बारे में भी जानकारी देती हैं. लड़कियों को नहीं पता होता कि मेंस्ट्रुअल पैड कैसे इस्तेमाल किया जाता है. वह यह बातें जब घर में बताती हैं तो उनके घर की महिलाएं भी जानकारी लेने सामुदायिक केंद्र आती हैं.

मां कृष्णा को है बेटी पर गर्व, सोनिया और सरला की जिंदगी भी बदली

भारती की मां का नाम कृष्णा है. वह कहती हैं कि गांव वाले कहते थे कि ये अपनी लड़की को कहां-कहां भेजते रहती है. मैं कभी स्कूल ही नहीं गई इसलिए मुझे पता था कि मेरी लड़की गांव की लड़कियों को पढ़ाकर सही काम कर रही है.

सोनिया और सरला बारहवीं के बाद स्कूल ड्रॉप आउट थीं और घर में ही बैठी रहती थीं. वह कहती हैं जब भारती ने हमारे परिवार से हमारी पढ़ाई के बारे में बात की, हम लोग आईटीआई जाने लगे.

सरपंच कलजिंदर कौर ‘लड़कियां पढ़ेंगी तो गांव का नाम रोशन होगा’

कलजिंदर कौर उस समय गांव की सरपंच थीं, जब भारती ने गांव की ड्रॉप आउट लड़कियों को फिर से स्कूल भेजने की शुरुआत करने की ठानी. उन्होंने बताया कि जब भारती ने मुझे बताया कि वह गांव की ड्रॉपआउट लड़कियों के लिए शिक्षा केंद्र खोलना चाहती हैं, तो उसकी बात सुनकर मैंने सोचा कि इससे तो हमारे गांव की ड्रॉप आउट लड़कियां अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकेंगी और फिर वे किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकती हैं.

उन्होंने कहा कि इस पहल की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि लड़कियों के लिए एक सेफ स्पेस तैयार किया जाए. इसके लिए गांव का सामुदायिक केंद्र सबसे बेहतर विकल्प लगा. उन्हें पंचायती स्तर पर भी लोगों को समझाना पड़ा कि यह शिक्षा केंद्र लड़कियों की पढ़ाई को व्यवस्थित रूप देगा.

कलजिंदर कौर गर्व से कहती हैं कि ड्रॉप आउट लड़कियों के लिए शिक्षा केंद्र खुलने से गांव की लड़कियों में काफी बदलाव आया है. पचास के आसपास लड़कियां इसमें पढ़ने के लिए जाती हैं और उनके साथ गांव की आंगनवाड़ी वर्कर व अन्य कामकाजी महिलाएं भी केंद्र में जाती हैं. लड़कियां अब अपने घर के बड़ों से बातचीत करते हुए अपने सपनों के बारे में बात रखने की हिम्मत कर पाई हैं. कई लड़कियां अब उच्च शिक्षा लेते हुए अपने सपने पूरे कर रही हैं. कुछ नौकरी भी कर रही हैं. खुद भारती भी अब ब्रेकथ्रू एनजीओ में नौकरी कर रही हैं.

पंचायत समिति के सदस्य बोले- गांव की सोच बदलने में भारती का बड़ा योगदान

कर्मवीर सिंह और राजेंद्र कुमार, राजापुर में वर्तमान पंचायत समिति के सदस्य हैं. दोनों कहते हैं कि भारती के इस काम से गांव में लड़कियों की स्थिति में सुधार आया है. कर्मवीर कहते हैं कि हमारे गांव के लोग भी समझदार हैं और शिक्षा के महत्व को समझते हैं. इसलिए भारती की इस पहल का सभी ने स्वागत किया और ड्रॉपआउट लड़कियों को भारती के पास फिर से पढ़ाई-लिखाई के लिए भेजा.

Thursday, May 29, 2025

हिंदी पत्रकारिता दिवस : उत्तराखंड की वो पत्रकारिता जिसने बदले समाज के रंग

_उत्तराखंड के तीन पत्रकारों ने पहाड़ की चुनौतियों को कलम से जीता.
बद्रीदत्त कसनियाल की रिपोर्टिंग ने पिथौरागढ़ में आग के बाद वाटर टैंक खड़े कराए.
राजीव लोचन साह ने 'नैनीताल समाचार' से जंगल बचाने से लेकर राज्य आंदोलन तक को आवाज़ दी और नवीन जोशी ने पहाड़ छोड़ने की पीड़ा को कहानियों में अमर कर दिया।

इनकी कलम साबित करती है किज़मीनी पत्रकारिता ही समाज बदलती है._

*बद्रीदत्त कसनियाल : पहाड़ का वह गुमनाम हीरो जो दिल्ली होता तो पत्रकारिता की दुनिया का बड़ा नाम होता.*

सुंदर चंद ठाकुर का 'काफल ट्री' में बद्रीदत्त कसनियाल पर लिखा आलेख पढ़ें तो उसमें एक जगह लिखा है 'मैं यहां यह भी स्वीकार करना चाहता हूं कि आज भले ही मैं एक बड़े ब्रैंड के अखबार के एडिशन का संपादक हूं. लेकिन जहां तक पत्रकारिता के बुनियादी हुनर और उसके प्रतिमानों पर खरा उतरने की बात है. तो मैं आज भी कसनियाल जी के चेले से ज्यादा कुछ नहीं हूं.' वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह कहते हैं कि बद्रीदत्त कसनियाल के सिखाए न जाने कितने पत्रकार आगे चलकर बड़े संस्थानों के सम्पादक बने. अगर बद्रीदत्त ने पत्रकारिता के लिए पहाड़ छोड़कर दिल्ली को चुना होता तो दिल्ली की चमक धमक के बीच, आज उनका नाम देश के बड़े पत्रकारों के साथ लिया जाता. पहाड़ के लोगों की सेवा के लिए बद्रीदत्त ने अपना पूरा जीवन लगा दिया.

*कविता से बना पत्रकारिता का रास्ता*

पिथौरागढ़ के रहने वाले बद्रीदत्त कसनियाल ने साल 1972 में बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण की थी तब हरियाणा की एक सरकारी पत्रिका में बसंत ऋतु पर उनकी एक कविता प्रकाशित हुई, जिसके उन्हें तीस रुपए मिले.

इसके बाद ही उन्हें लिखने का शौक चढ़ा. ग्रेजुएशन करने जब वह पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज गए तो 'उत्तराखंड ज्योति' अखबार के लिए उन्होंने एक आर्टिकल लिखा, जिसकी लोगों ने खूब प्रशंसा की. अखबार के मालिक कैलाश चन्द्र जोशी ने बद्रीदत्त को बोला कि आप अखबार को लिखे लोगों के पत्रों को समाचार का रूप दें. यह पत्र चंपावत, धारचूला से आते थे, जिनमें बिजली, पानी की समस्याओं के साथ बाघ के आतंक की शिकायत होती थी. इसमें पटवारियों की शिकायत भी होती थी. इन अंकों को भी लोगों की प्रशंसा मिली, ढाई सौ रुपए वेतन में बद्रीदत्त वहां काम करने लगे.
साल 1974-75 में वह मान्यता प्राप्त पत्रकार भी बन गए थे, साथ में  उस दौर की धर्मयुग, कादम्बिनी जैसी पत्रिकाओं को पढ़ते रहा करते थे.

*खबर का असर*

अपनी लिखी एक खबर के बारे में बात करते बद्रीदत्त कहते हैं कि साल 1976 में एक दिन पिथौरागढ़ में आग लगी तो एक छोटे टैंकर से वहां आग बुझाने की कोशिश की गई पर तब तक वहां सब जल कर खाक हो गया था. तब मैंने खबर लिखी कि पिथौरागढ़ में आग बुझाने के लिए वाटर टैंक न होने की वजह से नुकसान हुआ. इस खबर के एक हफ्ते के अंदर ही पिथौरागढ़ में 25000 लीटर का एक वाटर टैंक आ गया था. 

ऐसे ही साल 1977 में हुए तवाघाट लैंडस्लाइड पर बद्रीदत्त ने एक्टिविस्ट शमशेर सिंह बिष्ट और एक सरकारी भूवैज्ञानिक के साथ मौके पर जाकर 'दिन प्रतिदिन' अखबार के लिए रिपोर्टिंग की थी. इससे बाहरी दुनिया का ध्यान पहली बार उत्तराखंड के लैंडस्लाइड पर गया और उस पूरे इलाके को संवेदनशील क्षेत्र भी घोषित किया गया. उन दिनों नैनीताल समाचार, लघु भारत के लिए भी वह लगातार लिख रहे थे.

साल 1982 में अमर उजाला के लिए बद्रीदत्त ने धारचूला और मुनस्यारी में रहने वाली भोटिया जनजाति के द्वारा बनाए जाने वाले ऊनी उत्पाद जैसे थुलमा और दन पर विशेष श्रृंखला लिखी. इसकी वजह से लोगों को यह पता चला कि यह उत्पाद शिमला, पानीपत में बनाए जाने वाले ऊनी उत्पादों से क्वॉलिटी में बेहतर हैं और इनकी बिक्री बढ़ गई. उत्साहित भोटिया जनजाति के लोगों ने बढ़ी बिक्री को देखते नए तरह के ऊनी उत्पाद बनाने भी शुरू किए.

*लोगों के बीच जाकर ही होती है असली पत्रकारिता*

एडमंड हिलेरी के पुत्र पीटर हिलेरी भारत में आए तो बद्रीदत्त की उनसे मुलाकात हुई. 27-28 साल के पीटर उन दिनों अपने साथियों के साथ नेपाल से भारत तक हिमालय पैदल चल रहे थे. पीटर का साक्षात्कार करते बद्रीदत्त को महसूस हुआ कि पैदल चलकर हम भी उत्तराखंड के समाज के बारे में गहराई से जान सकते हैं. साल 1977 में 'उत्तर उजाला' अख़बार की शुरुआत भी हुई और बद्रीदत्त इस अखबार से सात सौ रुपए तनख्वाह में जुड़ गए.
इसी बाद वह साल 1980 में अमर उजाला से भी जुड़े. बद्रीदत्त कसनियाल छोटा सा बैग टांगकर कस्बों, गांवों में घूमते हुए चिपको आन्दोलन कर रहे सुंदर लाल बहुगुणा का पिथौरागढ़ आने पर लगातार साक्षात्कार लेते रहे. यह साक्षात्कार अमर उजाला में प्रकाशित होते थे.

*एक ऐसा पत्रकार जिसने एक्टिविस्ट न होकर भी एक्टिविज़्म किया*

साल 1985 में बद्रीदत्त ने अपना अखबार 'आज का पहाड़' निकाला. वह कहते हैं अमर उजाला में मेरा तबादला मेरठ हुआ पर तब घर के हालात ऐसे बन गए कि मुझे अमर उजाला छोड़ना पड़ा. आज का पहाड़ नाम उन्होंने इंडिया टुडे से लिया.
बद्रीदत्त कहते हैं कि वह शमशेर सिंह बिष्ट, पी सी तिवारी, प्रदीप टम्टा जैसे एक्टिविस्टों की खबरें लगातार छापते रहे. वह कभी एक्टिविस्ट नही बने पर उन्होंने इन एक्टिविस्टों की खबरें प्रायिकता के साथ छापी. किसी आंदोलन को कवर करने पर गांव वाले यह कहते बड़े खुश होते थे कि उनकी आवाज भी कोई उठा रहा है. उन दिनों पत्रकारिता वाकई जनता की आवाज होती थी.

उन्होंने आगे बताया कि उन दिनों एक डीएम ने नगर पालिका की जमीन पर घर बनाने को लेकर एक व्यक्ति को नोटिस दिया. हमने इस विषय पर लिखा तो डीएम को वह नोटिस वापस लेना पड़ा और इसके बाद उस डीएम ने हमारे अखबार का रजिस्ट्रेशन कैंसल करवा दिया. अखबार सस्पेंड हो गया तो वह प्रेस काउंसिल गए तो उसके हस्तक्षेप से अखबार फिर शुरू हुआ.

*पब्लिक की रीयल सेवा पत्रकारिता*

साल 1998 में बद्रीदत्त 'पीटीआई' से जुड़ गए और अमर उजाला के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता करते रहे. साल 2006 से 2009 तक 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से जुड़े रहे. वहां उन्होंने सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अभियान चलाया. बद्रीदत्त बताते हैं कि कबूतरी देवी जैसे कलाकारों को हम दुनिया के सामने लाए, इन कलाकारों की हमने पूरी सीरीज चलाई. पद्मश्री शेखर पाठक ने भी इस काम की तारीफ करी. बद्रीदत्त कसनियाल के इस काम पर 'बारामासा' की वेबसाइट में कबूतरी देवी पर बने एक एपिसोड में लिखा भी है 'साल 1995. सीमांत क्षेत्र पिथौरागढ़ में ‘आज का पहाड़’ अख़बार के संपादक बद्रीदत्त कसनियाल, स्थानीय लोक कलाकारों पर आधारित लेखों की एक सीरीज़ प्रकाशित कर रहे थे. इस दौरान वो ऐसे कलाकारों की भी खोज कर रहे थे जिन्होंने एक दौर में प्रसिद्धि तो खूब पाई, मगर अब गुमनामी की ज़िंदगी जीने को मजबूर थे. उनके साथी नरेश जोशी ने तब उन्हें एक ऐसा नाम सुझाया जिन्हें उत्तराखंड की पहली लोक गायिका भी कहा जाता था. बद्रीदत्त कसनियाल और नरेश जोशी इस गायिका की खोज में निकल पड़े. वे जब क्वीतड़ गांव पहुंचे तो देखा कि उस गायिका की आर्थिक स्थिति दयनीय थी और वो दिहाड़ी-मज़दूरी करने को मजबूर हो गई थीं. कसनियाल ने उनसे लम्बी बातचीत की और ‘आज का पहाड़’ में उनके बारे में एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया. इस लेख ने गुमनामी के अंधेरों में खो चुकी लोक गायिका को जैसे एक नया जीवन दे दिया और पहाड़ की जनता के बीच उन्हें पुनर्स्थापित कर दिया.'

साल 2006 में बद्रीदत्त कसनियाल ने कम्प्यूटर सीखा और 2009 में वह 'ट्रिब्यून' से जुड़ गए. ट्रिब्यून से वह 'हिंदुस्तान टाइम्स' में आने से पहले साल 2017 तक जुड़े रहे. अभी वह पीटीआई, हिंदुस्तान टाइम्स, नॉर्थन गजेट के लिए अंग्रेज़ी में लिखते हैं और 'आज का पहाड़' हिंदी में लिख रहे हैं.

वह कहते हैं पत्रकार ही जनता का प्रतिनिधि होता है, पब्लिक की रीयल सेवा पत्रकारिता से ही की जा सकती है और इसलिए ही वह अब तक लिख रहे हैं.

*राजीव लोचन साह : असली पत्रकारिता को सहयोग और सरोकारों की जरूरत है.*

राजीव लोचन साह को पत्रकारिता में उनके योगदान के लिए साल 2024 में भैरव दत्त धूलिया पत्रकारिता पुरस्कार दिया गया.

*कहानियों से लेकर अपने अखबार तक*

नैनीताल के राजीव लोचन साह बचपन से ही लिखने पढ़ने के शौकीन थे, कॉलेज जाते ही उनका यह शौक परवान चढ़ा और उस समय की लोकप्रिय पत्रिका 'नई कहानियां' में उनकी दो कहानियां प्रकाशित भी हो गई.

वर्ष 1971 में 'पहल' के सम्पादक ज्ञानरंजन का नैनीताल आना हुआ तो राजीव की उनके साथ जम कर घुमक्कड़ी हुई, हिंदी को लेकर अपने अंदर उथल-पुथल मचा रहे विभिन्न प्रश्नों के बारे में राजीव ने ज्ञानरंजन से बातचीत करी. ज्ञानरंजन से मिले प्रेस खोल प्रकाशन के क्षेत्र में जाने के सुझाव को दिल से लगा राजीव अपने परिवार से बातचीत करने के बाद 'प्रेस' की एबीसीडी सीखने इलाहाबाद चले गए. वहां अपने रिश्तेदार मनोहर लाल जगाती के घर रहते हुए उनका सम्पर्क रामाप्रसाद घिडियाल से हुआ और उनसे राजीव को प्रेस के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला. इलाहाबाद से वापस आ उन्होंने वर्ष 1973 में राजहंस प्रेस खोला पर जब तक वह जमा तब तक देश में इमरजेंसी का साइरन बज गया और समाचार पत्र शुरू करने में देरी हुई.
वर्ष 1977 में इमरजेंसी समाप्त होने के बाद 'नवनीत' पत्रिका से प्रभावित राजीव लोचन साह ने अपने साथ नैनीताल के दो युवाओं हरीश पन्त और पवन राकेश को भी जोड़ा और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को मजबूत करने के लिए वर्ष 1977 के स्वतंत्रता दिवस को 'नैनीताल समाचार' की शुरुआत करने के लिए चुना.
'नैनीताल समाचार' नाम राजीव के द्वारा समाचार पत्र स्वीकृत कराने के लिए भेजे गए नामों में तीसरे नम्बर पर था, राजीव कहते हैं कि वह समाचार पत्र का नाम 'देवदार' रखना चाहते थे.

*गांधीवादी चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा का मिला मार्गदर्शन*

नैनीताल समाचार एक पाक्षिक अखबार के रुप में शुरू हुआ जिसको अपनी शुरुआत से ही गांधीवादी चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा का मार्गदर्शन मिला. दिल्ली से छप रहे अखबारों के उत्तराखंड में देर से पहुंचने की वज़ह से यहां खबरों का सूखा बना रहता था, नैनीताल समाचार के आगमन ने उसे दूर किया और देखते ही देखते अख़बार अपने पहले अंक से ही उत्तराखंडवासियों के बीच लोकप्रिय हो गया.
लेखकों, पत्रकारों की बात की जाए तो वर्तमान समय के प्रसिद्ध इतिहासकार पद्मश्री शेखर पाठक के साथ नवीन जोशी, गोविंद पन्त राजू जैसे भविष्य के नामी पत्रकारों के साथ इस अखबार की शुरुआत हुई.

उत्तराखंड के लिए हमेशा से ही मुख्य समस्या रहे प्रवास पर इस अख़बार के दूसरे अंक से ही 'प्रवास की डायरी' छपी जो अगले सात साल तक जारी रही और तीसरे अंक में तवाघाट दुर्घटना पर एक रपट प्रकाशित हुई जिसमें पत्रकार के नाम की जगह लिखा तो 'विशेष प्रतिनिधि' गया था पर वह ख़बर सुंदर लाल बहुगुणा ने लिखी थी.

*एक पत्रकार जो आंदोलनकारी बन गया*

6 अगस्त 1977 को नैनीताल में वनों की नीलामी पर ख़बर करने राजीव अपने मित्र विनोद पांडे के साथ गए थे पर वहां स्थिति ऐसी बनी कि उसको लेकर राजीव लोचन साह कहते हैं कि मैं वहां गया तो एक पत्रकार के तौर पर था पर जब बाहर आया तो एक आंदोलनकारी बन चुका था.

उसी साल नवंबर में वनों की नीलामी के विरोध में हुए प्रदर्शनों में गिरीश तिवारी 'गिर्दा' भी आंदोलनकारी बन गए और नैनीताल समाचार के साथ उनका अटूट सम्बन्ध शुरू हुआ. नैनीताल में पढ़ते हुए बाद में 'जनसत्ता' से जुड़ने वाले पलाश विश्वास और कपिलेश भोज भी नैनीताल समाचार के साथ जुड़ गए.

*अखबार बन्द करने के विचार से नए सदस्यों के जुड़ने की कहानी*

मई 1982 में समाचार पत्र का कार्य पूरा समझकर इसके कर्ताधर्ताओं ने इसे बंद करने की ठानी और इसको लेकर अख़बार में एक छोटा सा सन्देश भी लिख दिया पर उसके बाद पत्रों से पाठकों के इसे बंद न करने की गुज़ारिश पर अख़बार चलता रहा. वर्ष 1983 में 'उत्तराखंड की बाढ़, भूस्खलन और तबाही' शीर्षक से छपा आलेख उत्तराखंड के इतिहास में हुई प्राकृतिक आपदाओं को दिखाता है और उन पर शोध करने का बेहतरीन माध्यम है. इतिहास पर नित्यानन्द मिश्रा की लिखी श्रृंखला पर तो 'कुर्मांचल गौरव गाथा' नाम से पुस्तक भी छप गई है.

शेखर पाठक बताते हैं कि साल 1974 की अस्कोट - आराकोट यात्रा में उन्हें इम्तिहान की वज़ह से जल्दी वापस लौटना पड़ा था पर जब वह 1984 में इस यात्रा पर वापस गए तो नैनीताल समाचार के बहुत से नए सदस्य बने. गोविंद पन्त राजू नैनीताल समाचार की रसीद यात्रा के दौरान अपने हाथों में ही पकड़े रहते थे.

*जनांदोलनों का प्रतिबिंब रहा अखबार*

उत्तराखंड से उत्तरांचल और फिर उत्तराखंड बनने का पूरा सफ़र हम नैनीताल समाचार में पढ़ सकते हैं, यह यात्रा भी नैनीताल समाचार के साथ ही चलती प्रतीत होती है. प्रदेश में होने वाले हर प्रकार के जनांदोलनों की यह आवाज़ बनते गया. नन्द किशोर भगत समाचार से जुड़ उसमें नयापन लाने का प्रयास करते रहते थे तो देवेंद्र नैलवाल और लक्ष्मण बिष्ट 'बटरोही' जैसे साहित्यिक लोग भी इसके लिए लिखते रहे.

वर्ष 1984 में प्रदेश के अंदर शराब विरोध में चल रहे आंदोलन की ख़बर को समाचार पत्र ने 'नशा नही रोज़गार दो' शीर्षक से छापा और उसकी वज़ह से जन इस आंदोलन से जुड़ता चला गया. 'अल्मोड़ा मैग्नेसाइट लिमिटेड' को लेकर यह कहा जाता था कि उसकी वज़ह से स्थानीय लोगों को नुक़सान और उद्योगपतियों को फ़ायदा हो रहा है तो वर्ष 1988 में अख़बार ने जनता की आवाज़ बन एक आलेख छापा जिसका शीर्षक था 'ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तराखंड में उग गई है.'

गोविंद पन्त राजू के लखनऊ चले जाने के बाद महेश जोशी ने नैनीताल समाचार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली, उन्होंने अकेले ही समाचार के लिए सदस्यता अभियान चलाया. विजय मोहन सिंह खाती, राजीव नयन बहुगुणा, प्रदीप टम्टा, चंद्रशेखर तिवारी, ताराचन्द्र त्रिपाठी, यशोधर मठपाल, राजशेखर पन्त, दिनेश उपाध्याय भी समय के साथ नैनीताल समाचार से जुड़ते चले गए और ख़बरों का सिलसिला आगे बढ़ता रहा. वर्ष 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बीच हुए मसूरी हत्याकांड पर अख़बार ने ख़बर छापी 'मसूरी : लाशों को बो कर उत्तराखंड के फूल उगाओ.'
नया राज्य बनने के बाद भी नैनीताल समाचार ने जन की ख़बरों को छापना नही छोड़ा और अपना पत्रकारिता धर्म निभाते हुए समाचार पत्र जन की आवाज़ बना रहा. अगस्त 2011 में प्रदेश में बन रहे बांधों से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान पर 'बांध के लिए वन कानून आड़े नही आते' नाम से ख़बर छपी. अख़बार सिर्फ़ उत्तराखंड ही नही राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी अपनी राय मज़बूती के साथ रखता रहा.

शेखर पाठक के अनुसार नैनीताल समाचार की यह विशेषता रही है कि उसके सदस्यों में अधिकतर सदस्यों के आंदोलनकारी होने बावजूद उसने दूसरा पक्ष भी अपने पाठकों के सामने अच्छे तरीके से रखा.

*नैनीताल समाचार में विशेष, प्रयोगों का अखबार*

आज जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान है तब भी बहुत से क्षेत्रीय व राष्ट्रीय समाचार पत्र, वेब पोर्टल्स वहां घटित कोई घटना पर किसी अन्य की ली तस्वीरों, वीडियो के माध्यम से अपनी ख़बर देते हैं पर आज से चार दशक पहले जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान नही था तब वहां घटित किसी आपदा में नैनीताल समाचार के संवाददाता पहुंच जाते थे और अपने पाठकों तक ग्राउंड रिपोर्ट पहुंचाते थे.

नैनीताल समाचार अपने पाठकों के साथ जुड़ने के लिए नए-नए प्रयोग करता रहा है. 1990 में चल रहे आरक्षण आंदोलन के दौरान दो पृष्ठ के परिशिष्ट छाप सड़कों पर बेचे गए थे. वर्ष 1993 में राकेश लाम्बा द्वारा शुरू गई निबंध प्रतियोगिता का नैनीताल के छात्रों को अब भी इंतज़ार रहता है.

साल 1994 के राज्य आन्दोलन के दौरान नैनीताल समाचार का 'सांध्यकालीन उत्तराखंड बुलेटिन' बेहद लोकप्रिय हुआ. 3 सितंबर से 25 अक्टूबर तक नैनीताल के दो स्थानों पर रेडियो बुलेटिन की तर्ज़ पर बुलेटिन पढ़ा गया. जिसका प्रयोग बाद में देश के अन्य हिस्सों दिल्ली के जंतरमंतर, उत्तराखंड के गोपेश्वर और उत्तरकाशी में भी किया गया. अंटार्कटिक की धरती पर पहली बार गए पत्रकार गोविंद पन्त राजू की डायरी भी बहुत लोकप्रिय हुई.

समाचार पत्र में चिट्ठी पत्र, सौल कठौल और आशल कुशल भाग अपने आप में अनोखे हैं. 'आशल कुशल' उत्तराखंड की जिलावार ख़बरों से एकसाथ रूबरू करवाता है.
साहित्य अंक, पर्यावरण अंक, होली अंक, हरेला अंक एक नया प्रयोग थे. होली अंक में होली के गीत रंगीन पृष्ठों पर प्रकाशित होने के बाद उत्तराखंड की होली का अहसास कराते अलग ही आनन्द देते हैं. उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला के लिए हर साल एक विशेष हरेला अंक आता है, अंक के साथ पाठकों के लिए हरेले का तिनका भी भेजा जाता है. होली अंक और हरेला अंक के यह प्रयोग भारत या विश्व के किसी समाचार पत्र में शायद ही देखने को मिले.

इतिहासकार शेखर पाठक बताते हैं कि सौल कठौल स्तम्भ को देख नैनीताल समाचार की रचनात्मकता की तारीफ़ तब के वरिष्ठ पत्रकार कैलाश साह ने भी की थी.

नैनीताल समाचार को लेकर दो भावनात्मक किस्सों को याद करते हुए शेखर पाठक कहते हैं कि लखनऊ में उन्होंने किसी के घर में हरेले अंक को फ्रेम किया हुआ देखा था और ऐसे ही किसी ने वहां अपने घर के ड्राइंग रूम की टेबल में उसका होली अंक फिक्स किया था.

शेखर पाठक ने कहा नैनीताल समाचार में फ़ैज़ की कविताओं के पोस्टर अपने आप में अनोखे होते थे. तवाघाट घटना पर लेटर प्रेस में मेटल को टेढ़ा कर नक्शा बनाया गया था, तकनीक के अभाव में भी समय से आगे की सोच वाले ऐसे बहुत से प्रयोग नैनीताल स्थित नैनीताल समाचार के कार्यालय में देखे जा सकते हैं.

*डिजिटल पत्रकारिता में नैनीताल समाचार और चुनौती*

नैनीताल समाचार की वेबसाइट है और इसके पुराने अंकों को अशोका यूनिवर्सिटी ने अपनी वेबसाइट में संरक्षित किया है.

समय के साथ बहुत से नए साथी भी नैनीताल समाचार के साथ जुड़ते रहे पर नैनीताल समाचार अपने साथ किसी अन्य की आर्थिक जरूरत कभी पूरी नही कर पाया इसलिए कोई भी इससे लंबे समय तक नही जुड़े रहा.

 नैनीताल समाचार का डिजिटल कार्य देखने वाली विनीता यशस्वी कहती हैं कि वाट्सएप ग्रुप 'समाचार की टीम' में समाचार के भविष्य को लेकर समय-समय पर रणनीति बनाई जाती है.
नैनीताल समाचार में 17 सितंबर 2020 को प्रकाशित आलेख '18 सितंबर नैनीताल क्लीनअप डे : क्या देश कुछ अनोखा देखेगा' पढ़ने के बाद नैनीताल में स्वच्छता अभियान से जुड़ी संस्था 'ग्रीन आर्मी' के जय जोशी कहते हैं कि यह आलेख पढ़ने के बाद उनमें कुछ करने का जोश भर गया. वर्ष 2021 के अप्रैल अंक की ख़बर 'ये आग तो बुझ जाएगी, मगर सवाल तो सुलगते रहेंगे' के साथ उत्तराखंड की वनाग्नि पर सवाल उठाते नैनीताल समाचार भारतीय हिंदी पत्रकारिता में अपना काम करते जा रहा है.

शेखर पाठक कहते हैं कि समाचार से नए लोग अधिक संख्या में जुड़ने चाहिए, जिससे युवाओं के बीच भी यह लोकप्रिय हो. फेक न्यूज़ के सहारे कोई अधिक समय तक नही टिक सकता. समाचार की दुनिया में वही टिके रहेगा जो रचनात्मकता के साथ सही खबरें दिखाएगा. इन सब के लिए नैनीताल समाचार को आर्थिक रूप से मज़बूत करने की योजना भी बनानी होगी.

*नवीन जोशी: पहाड़ की पीड़ा से साहित्य तक और लेखकीय संघर्ष*

नवीन जोशी की यात्रा हिंदी पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक सरोकारों के प्रति एक प्रेरक उदाहरण है. यह पहाड़ के विस्थापन की पीड़ा, साहित्यिक साधना और पत्रकारीय समर्पण को एक साथ जोड़ती है.

*पढ़ाई और रोज़गार के लिए घर से दूर चले जाने पर बना एक लेखक.*

हिंदी साहित्य जगत में परिचित नाम लेखक नवीन जोशी की कहानी भी शेखर जोशी से बहुत हद तक मिलती-जुलती है. दिवंगत शेखर जोशी पलायन कर कई साल पहले उत्तर प्रदेश के पहाड़ों (जो अब उत्तराखंड के पहाड़ हैं) से मैदानी राज्य राजस्थान पहुंचे और लेखक बने थे. वैसे ही नवीन जोशी भी पहाड़ों से लखनऊ पहुंचे थे. नवीन जोशी में अपने गांव के छूटने का दर्द हमेशा जिंदा रहा और उसी दर्द ने उन्हें लेखक बना दिया.

अखबारों में लिखते हुए साहित्य रचना शुरू करने वाले नवीन जोशी आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान, राजेश्वर प्रसाद सिंह कथा सम्मान, गिर्दा स्मृति सम्मान समेत कई अन्य सम्मानों से सम्मानित हैं.

उत्तराखंड के गणाई-गंगोली क्षेत्र के रैंतोली गांव के मूल निवासी नवीन जोशी से जब उनके अंदर के लेखक की कहानी पूछी जाती है, तो वे अपने बचपन को याद करते हैं. वह कहते हैं उनके गांव से प्राथमिक विद्यालय दूर था, जिस कारण उन्हें विद्यालय नहीं भेजा गया. लखनऊ में काम करने वाले उनके पिता उन्हें छह-सात साल की उम्र में पढ़ाने के लिए अपने साथ ले गए. उनकी मां गांव में ही रहती थीं. नवीन जोशी बताते हैं कि उस समय ऐसा ही होता था, घर के पुरुष पढ़ाई और रोजगार के लिए घर से दूर चले जाते थे और महिलाएं गांव व घर संभालती थीं.

*गांव की याद से लिखना शुरू हुआ.*

नवीन जोशी ने कक्षा तीन से लखनऊ में अपनी पढ़ाई शुरू की, जहां उन्हें अपने गांव की बहुत याद आती थी. पिता दिन में अपनी नौकरी पर चले जाते थे, तो वे घर में अकेले रह जाते थे. नवीन बताते हैं कि तब मैं रोते हुए अपनी मां और गांव के बिछड़े दोस्तों को चिट्ठी लिखता था. उन्होंने एक डायरी में पहाड़ की यादों को लिखना शुरू किया और इसी से उनका लेखन का सिलसिला शुरू हुआ. लखनऊ के जिस इलाके में नवीन रहते थे, वहां पहाड़ी लोग बहुत थे. उत्तराखंड के गांवों से आए ये लोग अपने बेटों, भाइयों और भतीजों को शिक्षा या नौकरी के लिए गांव से लाकर अपने साथ रखते थे. लखनऊ के कई लोग वहां अपने घरों के लिए पहाड़ी नौकर, ड्राइवर आदि ढूंढने भी आया करते थे. नवीन को धीरे-धीरे अखबार पढ़ने का शौक लग गया.

वे कहते हैं कि मैंने आठवीं कक्षा में पहाड़ पर एक लेख लिखकर 'स्वतंत्र भारत' अखबार के लिए भेजा था. उस लेख में उन्होंने पाठकों को संबोधित करते हुए लिखा था, 'तुम गर्मियों की छुट्टी में पहाड़ जा रहे हो. तुम्हें पहाड़ बुला रहे हैं, लेकिन तुम वहां की सुंदरता के साथ-साथ वहां का दर्द भी देखना. तुम यह देखना कि वहां औरतें कैसे घर का काम करती हैं और खतरनाक पहाड़ियों से घास काटती हैं. तुम यह भी देखकर आना कि वहां के लड़के शहरों में जाकर होटलों में झाड़ू लगाते हैं और बर्तन मांजते हैं.'

उनका यह लेख 'स्वतंत्र भारत' में छप गया, जिससे उन्हें आगे लिखने का हौसला मिला.

*शेखर पाठक का प्रभाव.*

धीरे-धीरे नवीन जोशी की सामाजिक समझ बढ़ी और हाईस्कूल में प्रथम श्रेणी आने पर मोहल्ले में उनका बड़ा नाम हुआ. इसी बीच, भविष्य में बड़ा नाम बनने वाले शेखर पाठक भी अल्मोड़ा से बीए करने के बाद नौकरी की तलाश में लखनऊ पहुंचे थे. शेखर पाठक पीडब्ल्यूडी में नौकरी करने लगे और संयोग से नवीन जोशी के मोहल्ले में ही रहने आ गए. नवीन जोशी कहते हैं जब मैं शेखर पाठक से मिला, तो वे 'दिनमान' और अन्य पत्रिकाएं पढ़ते थे और कहानियां लिखते थे. मैं भी उनके साथ सुबह-शाम बैठने लगा, 'दिनमान' पढ़ने लगा और कहानियां लिखकर उन्हें दिखाने लगा. शेखर पाठक की संगत से नवीन जोशी को समाज के बारे में नई समझ बनी और उनका दायरा बढ़ा. कुछ समय बाद शेखर पाठक उच्च शिक्षा के लिए वापस अल्मोड़ा चले गए. लेकिन तब तक शेखर पाठक के माध्यम से नवीन जोशी आकाशवाणी लखनऊ से जुड़ गए थे. वहां बंसीधर पाठक 'जिज्ञासु' की संगत में रहने से नवीन की कुमाऊंनी बोली की कविताएं और कहानियां आकाशवाणी से प्रसारित होने लगीं. आकाशवाणी में उन्हें अपने जैसे कई जोशीले पहाड़ी युवा और वरिष्ठ रचनाकार मिले. अपनी किताब 'ये चिराग जल रहे हैं' में उन्होंने इन्हीं रचनाकारों और कलाकारों के संस्मरण लिखे हैं.

*पत्रकारिता से मिला दुनिया का अनुभव.*

अब नवीन जोशी का अखबारों में लिखना भी बढ़ता जा रहा था. उनकी कहानियां अखबारों द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुकी थीं.

ग्रेजुएशन करते समय नवीन को 'स्वतंत्र भारत' अखबार से नौकरी का प्रस्ताव मिला. पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका पहाड़ वापस लौटने का इरादा था, पर वे पत्रकारिता में रम गए. उन्हें लगने लगा था कि पत्रकारिता से समाज में बदलाव लाया जा सकता है. इस कारण उन्होंने पहाड़ लौटने का अपना इरादा त्याग दिया और पूरी तरह पत्रकारिता में डूब गए. अखबार में नौकरी करते हुए नवीन ने काफी यात्राएं कीं और देश-दुनिया के अखबार पढ़े. इन सब से उनका सोचने-समझने का दायरा और भी बढ़ता गया.

*उत्तराखंड से संपर्क नहीं टूटा.*

नवीन जोशी पहाड़ लौट तो नहीं पाए, लेकिन पहाड़ के लोगों से उनका लगातार संपर्क बना रहा. शेखर पाठक की वजह से वे राजीव लोचन साह, शमशेर सिंह बिष्ट, गिर्दा आदि से जुड़े. 
साल 1977 में 'नैनीताल समाचार' की शुरुआत से ही उनका कॉलम 'एक प्रवासी पहाड़ी की डायरी' प्रकाशित होने लगा. साल 1984 में उन्होंने देवेन मेवाड़ी के साथ करीब पंद्रह दिन 'अस्कोट आराकोट यात्रा' के एक उप मार्ग में हिस्सा लिया. इसमें वे गढ़वाल व कुमाऊं के कई गांवों तक पैदल गए और पहाड़ को करीब से देखा. उन दिनों को याद करते हुए नवीन जोशी कहते हैं आंदोलनों में शामिल होने के लिए मैं लखनऊ से पहाड़ों में पहुंच जाता था.

वे 'नशा नहीं, रोजगार दो' आंदोलन में भी शामिल रहे. पहाड़ के हालात पर उनके मन में साल 1990 में पहली बार 'दावानल' उपन्यास लिखने का विचार आया, पर उस विचार को कलम का साथ मिलने का वक्त अभी नहीं आया था.

*पत्रकारिता से बढ़ी रचनात्मकता.*

वे राजेंद्र माथुर के संपादन वाले 'नवभारत टाइम्स' अखबार में काम करने लगे. इस दौरान नवीन जोशी का कहानियों और कविताओं को लिखने का सिलसिला बढ़ता गया. वे कहते हैं कोई ठंड या भूख से मर गया या कोई मजदूर दिन भर की मजदूरी के बाद अपने घर लौटते समय सब्जी ले जाते ट्रक से दबकर मर गया, तो ये खबरें पीड़ा से भरी और यातनादायक होती थीं.

मुझे लगता था कि ये खबरें यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए. अखबारों में ऐसी घटनाएं छोटी-सी खबर बनकर खत्म हो जाती थीं, लेकिन वहीं से उनकी कोई कहानी या लेख शुरू होता था. इस तरह उनकी रचनात्मकता को पत्रकारिता ने बढ़ावा ही दिया.

 नवीन जोशी का कहानी संग्रह 'अपने मोर्चे पर' साल 1992 में प्रकाशित हो गया था. साल 2002 में वे 'हिन्दुस्तान' अखबार में संपादक बनकर पटना पहुंचे. उस समय बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे. नवीन जोशी कहते हैं बिहार के हालात बहुत खराब थे. वहां ये पता नहीं चलता था कि सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क. साठ किलोमीटर की दूरी चार घंटे में पूरी होती थी. एक बार मैंने किसी से कहा था कि जहां गरीब मुसहर लोग रहते हैं, जो चूहे पकड़कर खाते हैं, मुझे उनके गांव ले चलो. मुझे जवाब मिला कि वहां सड़क नहीं है. जब बाढ़ आएगी, तब वहां नाव चलेगी, तभी उस गांव तक पहुंच पाएंगे.

इन अनुभवों से नवीन जोशी के अंदर का लेखक और पैना होने लगा. नवीन जोशी के अनुसार, पहाड़ और बिहार का दर्द एक-सा है, बस भूगोल का फर्क है. दोनों प्रदेशों में गरीबी एक जैसी है और दोनों जगह के लोग बड़े शहरों में जाकर छोटी-मोटी नौकरियां करने को मजबूर हैं. प्रतिभाएं भी इन दोनों जगहों पर भरपूर हैं.

*उपन्यासों की शुरुआत.*

पटना में रहते हुए ही उन्हें अपना पहला उपन्यास 'दावानल' पूरा करने का विचार आया. उन्होंने साल 2002 में 'दावानल' लिखना शुरू किया, दिन में वे नौकरी करते थे और रात में उपन्यास लिखते थे. दो साल बाद उनका लखनऊ तबादला हो गया और फिर उन्होंने इस उपन्यास को संपादित किया. प्रकाशक को यह अच्छा लगा और इसे छपने में कोई दिक्कत नहीं हुई. 'दावानल' उपन्यास साल 1972-73 से 1984 तक चले चिपको आंदोलन के भटकाव पर आधारित है. यह बताता है कि कैसे यह आंदोलन पर्यावरणविदों की वजह से सिर्फ पेड़ बचाने तक सिमट गया, जबकि यह मुख्य रूप से जंगलों पर स्थानीय लोगों के अधिकारों के लिए था. पहाड़ के प्रवासियों की पीड़ा भी इसका प्रमुख हिस्सा है.

उनका दूसरा उपन्यास 'टिकटशुदा रुक्का' है. नवीन कहते हैं बचपन में मैंने अपने गांव में शिल्पकारों के साथ छुआछूत और भेदभाव देखा था. उनका शोषण किया जाता था. साल 1980 में कफल्टा कांड हुआ, तो मैंने इसी विषय पर लिखने की ठान ली थी. इस उपन्यास का भी साहित्य जगत में स्वागत हुआ.

नवीन जोशी का तीसरा उपन्यास 'देवभूमि डेवलपर्स' है, इसमें 'दावानल' के आगे की कहानी है. नवीन जोशी कहते हैं जब चिपको आंदोलन ठंडा पड़ने लगा था, तब 'नशा नहीं, रोजगार दो' आंदोलन शुरू हुआ था. इस उपन्यास में तब से आज तक के उत्तराखंड की कहानी है. 'देवभूमि डेवलपर्स' में उत्तराखंड के जन आंदोलनकारी संगठनों में टूट, राजनीतिक दलों की चालबाजियां और संसाधनों की लूट पर लिखा गया है. इसे पढ़ने से पता चलता है कि उत्तराखंड के गांवों से पलायन क्यों होता है और कैसे ठेकेदारों, दलालों और नेताओं ने उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन पर कब्जा जमा लिया है. हाल ही में राजकमल प्रकाशन से उनका उपन्यास 'भूतगांव' प्रकाशित हुआ है, यह उजड़ते पहाड़ों की पीड़ा की कथा है.

*पहाड़ पर केंद्रित लेखन.*

नवीन जोशी बताते हैं कि पहाड़ मेरे लेखन के केंद्र में है. मेरे सभी उपन्यासों का विषय उत्तराखंड पर केंद्रित है. मेरी कई कहानियां भी पहाड़ पर आधारित हैं. मैं सामाजिक स्थितियों के बारे में लिखता हूं. जैसे, मैंने एक कहानी में लिखा है कि समाज में सांप्रदायिकता कैसे बढ़ रही है.

कुछ कहानियों का विषय पर्यावरण भी है. उनमें लिखा है कि शहरों से गौरैया कैसे गायब हो रही हैं या आकाश से तारे कैसे खो गए. एक कहानी का मुख्य पात्र तारे देखने के लिए पहाड़ की याद करता है.

'अपने मोर्चे पर', 'राजधानी की शिकार कथा', 'मीडिया और मुद्दे', 'बाघैन' और 'लखनऊ का उत्तराखंड' नवीन जोशी की अन्य रचनाएं हैं.

*लेखन से आजीविका बड़ी मुश्किल, फिर भी लिखना तो है ही.*

हिंदी में लेखन से आजीविका पर नवीन जोशी कहते हैं हिंदी में स्वतंत्र लेखक अपनी आजीविका नहीं चला सकते. पारिश्रमिक की स्थितियां बेहद खराब हैं. मैं भी अगर पत्रकारिता नहीं करता, तो परिवार नहीं पाल सकता था. मेरी पत्नी भी नौकरी करती थी, इसलिए घर चलाने में कभी दिक्कत नहीं हुई.

इसका कारण पूछने पर वे कहते हैं, हिंदी किताबें अधिक नहीं बिकतीं. पांच सौ से एक हजार प्रतियों के संस्करण बिकने पर हिंदी लेखक खुश हो जाते हैं. प्रकाशक लेखकों से सच छुपाते हैं और उन्हें किताबों की बिक्री व आवृत्तियों के बारे में सही विवरण नहीं देते. लेखकों को समय पर रॉयल्टी भी नहीं मिलती. इसके लिए लेखकों को प्रकाशकों को बार-बार चिट्ठी लिखनी पड़ती है.

नवीन जोशी आगे कहते हैं, कुछ नए प्रकाशक पारदर्शिता बरत रहे हैं. अंग्रेजी किताबों में ऐसी स्थिति नहीं है. वहां लेखकों को प्रकाशन के अनुबंध के पैसे मिलते हैं, रॉयल्टी से अलग. लेखन में पैसा न होने पर भी लिखते रहना चाहिए या नहीं, इस पर नवीन जोशी कहते हैं कि लिखना जरूरी है. यदि हम सामाजिक और राजनीतिक रूप से सचेत हैं, तो हमें लिखना चाहिए.

*प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है.*

नवीन जोशी आगे कहते हैं आजीविका नहीं चलती, तो भी लिखना बंद नहीं किया जा सकता. लोगों को पढ़ना चाहिए. समाज की सामूहिक राय साहित्य और पत्रकारिता से बनती है. पत्रकारिता की प्रतिक्रिया तत्काल होती है, लेकिन साहित्य का असर दीर्घकालिक होता है. 

साहित्य समाज का आईना होता है और धैर्य मांगता है. कहानी लिखकर समाज रातोंरात नहीं बदलता, लेकिन छपे हुए का असर दशकों और शताब्दियों तक रहता है. जैसे भारतेंदु को पढ़कर हम तत्कालीन भारतीय समाज को समझ सकते हैं, वैसे ही ओ हेनरी को पढ़कर हम अमेरिकी समाज को समझ सकते हैं.

*माध्यम बदलेंगे, पर शब्द तो वही रहेंगे.*

ई-बुक के बढ़ते चलन पर नवीन जोशी कहते हैं, पहले टेलीफोन डायरी होती थी, अब उसे कोई नहीं रखता. फोन में ही सबके नंबर मिल जाते हैं. वैसे ही माध्यम बदलते रहेंगे, पर शब्द वही रहेंगे.

शब्द रहेंगे तो साहित्य रहेगा और साहित्य रहेगा तो समाज सचेत रहेगा.

हिमांशु जोशी

पहाड़ से जुड़े हर विषय को अपनी यात्रा से समेटते शेखर पाठक

पहाड़ों से जुड़े हर गंभीर प्रश्न इस किताब में पढ़ने को मिलते हैं, मनुष्यों द्वारा वहां छोड़ी गई गंदगी, पहाड़ों में हो रहे अतिक्रमण, बेतरतीब निर्माण को जानना इस यात्रा की देन है.

पहाड़ों की तरफ पड़ता पहला कदम ही रोमांचित करता है

प्रदीप पांडे की खींची तस्वीरों के साथ पहाड़ों की दुनिया में ले जाती 'हिमांक और क्वथनांक के बीच' किताब 'बब्बन कार्बोनेट' जैसी लोकप्रिय किताब प्रकाशित करने वाले नवारुण प्रकाशन से छप कर आई है. उत्तराखंड के इनसाइक्लोपीडिया कहे जाने वाले इतिहासकार पद्मश्री शेखर पाठक इस किताब के लेखक हैं.

गंगोत्री-कालिंदीखाल-बद्रीनाथ में की गई यात्रा के बारे में पढ़ने की उत्सुकता किताब के कवर पेज से ही होने लगती है, लेखक ने इसको 13 हिस्सों में बांटा है. लेखक ने अपनी अस्कोट आराकोट यात्राओं का लाभ इस यात्रा में पूरी तरह से लिया है. यात्रा में वह उस यात्रा के साथियों को याद करते रहते हैं.

इतिहास की परतों के साथ प्रकृति का जीवंत दस्तावेज

यात्रा करते लेखक प्रकृति का स्वरूप ठीक वैसे ही लिखते हैं, जैसा वह देख रहे हैं, उनकी लिखी यह पंक्ति भागीरथी का प्रवाह पाठकों के मन में करवा देती है 'उत्तरकाशी में भागीरथी जरा सा उत्तर पश्चिम दिशा में वरुणावत पर्वत की जड़ पर आधा वृत बनाकर बहती है.'

लेखक इतिहास के प्रोफेसर रहे हैं और यात्राओं से उत्तराखंड को लेकर उनकी गहरी समझ किताब में जगह-जगह पढ़ने को मिलती है. '1960 में जिला मुख्यालय बनने से पहले यह छोटी बस्ती बाड़ाहाट कहलाती थी और मुख्यतः विश्वनाथ मंदिर, बुद्ध प्रतिमा और धातु त्रिशूल स्तंभ के लिए प्रख्यात थी.'

पेड़ के साथ संवाद से झलकती है पर्यावरण की चिंता

लेखक का प्रकृति से जुड़ाव कितना गहरा है यह हम पृष्ठ संख्या 42 में देख सकते हैं 'जड़ से दो और ऊपर चार शाखाओं में फैला यह पेड़ शायद हमसे अपनी दास्तान कहना चाहता था कि हमारा भी ख्याल करो. हमें चूल्हे में जलने से बचाओ. हम इंधन में जलने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम यहां रह कर करते हैं.' लिखकर वह उस रास्ते में आने वाले वृक्षों, नदियों की आवाज बने हैं, जो अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में किसी को बता नहीं सकते.

लेखक ने अपनी इस यात्रा के दौरान पहाड़ों की साफ-सफाई की महत्ता पर भी विचार किया और किताब में इसके बारे में जगह-जगह पढ़ने को मिलता है. हमारी शिक्षा व्यवस्था में पर्यावरण के संरक्षण को लेकर पढ़ाई-लिखाई न्यूनतम है और किताब के जरिए लेखक ने इस मुद्दे को उठाया है, वह लिखते हैं 'प्रकृति अपनी मरम्मत भी करती रहती है. आधुनिक अभियंता यह सब काम जानते हैं और हमारे संस्थान उन्हें यह सब सिखाते भी नहीं.'

पहाड़ों के लोगों और व्यक्तित्वों का जीवंत चित्रण


नागार्जुन, राहुल सांकृत्यायन, स्वामी सुंदरानंद जैसी शख्सियतों के बारे में बताते हुए लेखक ने पहाड़ों को लेकर उनके काम पर प्रकाश डाला है, जिसके बारे में जानना महत्वपूर्ण है. इसके साथ 'सेवन ईयर्स इन तिब्बत' जैसी किताब पर भी वह बात करते रहते हैं.
'अब हम शुद्ध प्रकृति में आ गए, एक बड़ी बड़ी आंखों वाले चूहे ने प्रकट होकर हमारा स्वागत किया. यह भय और गुस्सा प्रकट करना भी हो सकता था.' इस तरह की पंक्तियां लिखते हुए लेखक ने पाठकों को अपना सहयात्री बना लिया है.

'शाम को चांद वाला आसमान भी तो देखना था और भागीरथी शिखरों से चांद का प्रकट होना और उनके ऊपर से गुजरना भी.' यह लिखते हमें लेखक की वह लालसा समझ आती है, जिससे वह खतरा होने के बावजूद इस तरह की यात्रा करते हैं और यह लिखकर वह अपने साथ पाठकों को भी पहाड़ की तरफ खींचते प्रतीत होते हैं.

विकास के नाम पर विनाश की पड़ताल और मानवीय पहलू का मिश्रण


पहाड़ों से जुड़े हर गंभीर प्रश्न इस किताब में पढ़ने को मिलते हैं, मनुष्यों द्वारा वहां छोड़ी गई गंदगी, पहाड़ों में हो रहे अतिक्रमण, बेतरतीब निर्माण (टिहरी झील पर विस्तार से लिखना) को जानना इस यात्रा को देन है. हिमालय में काम करने वाले नेपाली श्रमिकों की समस्या पर बहुत कम बातचीत की जाती है, लेखक ने अपनी यात्रा के दौरान इन्हें करीब से देखा है और पृष्ठ संख्या 198-199 में इस विषय पर विस्तार से लिखा है.
इन सब के बीच पृष्ठ संख्या 191 में पदम् सिंह का किस्सा पाठकों को हंसने का मौका देता है और उन्हें ऊबने से भी बचाता है. पहाड़ की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासतों का वर्णन भी किताब में बड़ी रोचकता के साथ किया है, तस्वीरों ने भी अपनी तरफ ध्यान खींचा है.

शिक्षा, सौंदर्य और साहसिकता का समन्वय है यह यात्रा


किताब की भाषा ऐसी लगती है जैसे हम किसी पाठ्यपुस्तक को पढ़ रहे हैं और उसका पूरा कोर्स शिक्षक हमें पास ही बैठकर समझा रहा है, इसे पढ़ते पाठक पहाड़ की सुंदरता पर मोहित भी होते हैं और पहाड़ का मौसम उन्हें डराता भी है.
'बहुत कम यात्रियों को यह ध्यान रहता है कि गंगोत्री एक प्रयाग (संगम स्थल) भी है.' पहाड़ पर ज्ञान बढ़ाता है तो 'ऊंचाई और अंधकार मिलकर हमारा भ्रम बढ़ा रहे थे. इन दोनों का संयुक्त मोर्चा किसी को भी ध्वस्त कर सकता था. कोई भी निर्णय लेने में देर लगती थी.' इस यात्रा की कठिनाइयों से परिचित करवा देता है.

यात्रा में अपने खोए हुए साथियों के परिवार को तो लेखक याद कर ही रहे हैं, साथ ही वह खुद की मनोदशा को भी पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. यह किताब उन पाठकों के लिए हैं जो हमेशा पहाड़ की किसी साहसिक यात्रा का सपना देखते हैं, यह किताब उनके लिए भी है जो कभी पहाड़ नहीं जा पाए.

पहाड़ पर लिखे साहित्य को पढ़ने से लेखक ने इस यात्रा का पूरा आनंद लिया है और उनकी इस किताब को पढ़कर भविष्य में पहाड़ को समझने, उनमें उतरने वाले लोग पहाड़ की यात्रा पर निकलने का अपना उद्देश्य पूरा कर सकते हैं.

किताब कुछ पाठकों के लिए बोझिल हो सकती है, विशेषतः उन लोगों के लिए जो सरल यात्रा-वृत्तांत पढ़ने के आदी हैं. कई बार ऐतिहासिक संदर्भ और विस्तृत विवरण विषय से थोड़ा भटका देते हैं.


Wednesday, May 28, 2025

सड़क, प्रेम और तंगहाली 'रोटी के चार हर्फ़'.

संग्रह न केवल साहित्यिक दृष्टि से बल्कि मानवीय अनुभवों के स्तर पर भी बेहद प्रभावशाली बन पड़ता है.

लेखक दिल्ली की सड़कों का जीवंत चित्रण कर देते हैं

लोकभारती पेपरबैक्स से प्रकाशित आलोक रंजन की किताब 'रोटी के चार हर्फ़' का आवरण चित्र विभा मिश्रा का तैयार किया हुआ है. किताब पढ़ लेने के बाद पाठकों को यह चित्र परिचित और अपना सा लगने लगता है.

आलोक रंजन ने पहली ही कहानी को इस तरह बुना है कि पाठक किताब से निकलकर दिल्ली की सड़कों पर उतर आता है. जैसे, ‘उस सड़क पर वह सब कुछ था, जो दिल्ली की एक सड़क होने के लिए चाहिए थे. वहां तोड़-फोड़ थी, सीवर की सफाई से निकली काली गाद के साथ खड़े समोसे-जलेबी के ठेले और सबसे बढ़कर भीड़ थी.’ 

इसके साथ किताब हमें इन सड़कों की अनकही कहानियों को जानने का मौका देती है, जिनका अपना एक अलग संसार है.

ट्रेन में बैठे लोगों की परिस्थिति का उदाहरण जंगल के जानवरों से देना थोड़ा नया है, ‘जंगल में शेर को देखते ही कव्वे और दूसरे पक्षी शोर मचाना शुरू कर देते हैं, जिससे असुरक्षित अवस्था में पड़े जानवर सचेत हो जाते हैं. वह महत्वपूर्ण आदमी लौटा तो यह झुंड चुप हो गया.’ यह दृश्य को सही तरीके से बना देता है.

मेहनतकशों की अनकही दास्तान पढ़ने को मिलती है

किताब मजदूर वर्ग पर गहराई से प्रकाश डालती है, जो साहित्य में अब लगभग गायब हो रहे हैं. उनकी मेहनत और दिशा-दशा पर लेखक ने किताब की आधी से ज्यादा कहानियों में लिखा है. ‘प्लास्टिक तह करके कैरियर में दबाने के बाद बारी थी साइकिल को घसीटने की. इतनी हिम्मत ही नहीं बची थी कि वह चढ़कर चलाने लगे!’ यह पंक्ति उनकी थकान को उजागर करती है. मेहनतकशों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार पर सब कुछ ऐसा लिखा कि उसे पढ़ते, उन सब का चेहरा याद आ जाता है. ‘बचे हुए सिक्के तेज आवाज के साथ बस में फैल गए थे. उन्हें संभालने के चक्कर में उसकी रोटियां और आलू के टुकड़े भी बस की फर्श पर गिर गए.’ यहां ‘नीचे’ की जगह ‘बस की फर्श’ का प्रयोग कहानी को वास्तविकता के और भी करीब लेकर जाता है.

‘वापस लौटते हुए’ में एक गरीब परिवार की आर्थिक स्थिति और खामोशी को दर्शाया गया है: ‘सब ज्यादातर चुप ही रहते हैं. माँ चुप, बाबूजी चुप और चुपचाप ही खाना भी पक जाता है.’ यह चित्रण पाठकों के मन में उनके चेहरे उकेर देता है.

आधुनिक प्रेम के उतार-चढ़ाव

प्रेम और रिश्तों को लेखक ने आधुनिक संदर्भ में संवेदनशीलता से चित्रित किया है. ‘इस दुनिया के किनारे’ कहानी को जिस तरह लेखक ने शब्दों के प्रवाह से जोड़ा है, वह वाकई लाजवाब है. बीपी और उमा के बारे में अधिक जानने के साथ पाठक उनकी प्रेम कहानी में हो रहे बदलावों से भी रोमांचित होते रहते हैं. ‘वह उन हँसते चेहरों को ओझल कर देना चाहता था. उन मन्द मन्द मुस्काते चेहरों को देखकर उसकी चिढ़ बढ़ती जा रही थी.’ 

आधुनिक प्रेम संबंध, जो नौकरी और सुख-सुविधाओं के मोह में बनते-बिगड़ते हैं, उसे लेखक ने ‘हम ब्रेक पर हैं’ कहानी में रिश्तों के हर उतार-चढ़ाव के साथ विस्तार दिया है. ‘झगड़े के बाद जो लोग एक हो जाते हैं, कितने खुशकिस्मत होते हैं.’ यह पंक्ति हर प्रेमी की है.

प्यार के उतार-चढ़ाव इन पंक्तियों में नज़र आते हैं ‘टैक्सी से बाहर दिल्ली में बस रोशनी दिख रही थी. रोशनी के परे जो था, सब अँधेरे में डूब हुआ.’ और फिर, ‘उस छोटे से संवाद ने ही उसके भाव बदल दिए. रोशनी में एक खुशनुमा रंग बहने लगा था.’


‘ब्राइट बातें’ में टूटते रिश्तों की तुलना ‘नारियल के जर्जर पत्तों’ से करते उस रिश्ते का हाल बिल्कुल सामने आ जाता है.

परिवार और पुरानी यादों का दर्द देते आलोक, साथ में गंभीर विषय

परिवार के रिश्तों को नॉस्टेल्जिया और दर्द के साथ पेश किया गया है. किताब का शीर्षक वाली कहानी में एक रोटी से शुरू हुए सफर को लेखक नानी तक ले जाते हैं तो पाठकों के लिए ये नॉस्टेल्जिया है. ‘नानी सुनाती भी तो कैसे, उसके शब्द भी हाथों की तरह रूखे हो चले थे.’ यह बैचेन हृदय के शब्द लगते हैं, घर की यादों में हर कोई खो सकता है. रिश्तों की दर्द भरी कहानी में मुख्य पात्र अपने ही घर जाने पर खुद को ‘घुस आया चूहा’ कहता है. कहानी से लेखक ने ‘बाहरी’ जैसा गम्भीर विषय उठाया है और इसकी पीड़ा भी पाठकों तक पहुँचती है.

लेखक इस कहानी से प्रवासियों का दर्द सामने ले आते हैं, कहानी का मुख्य पात्र सोचता है ‘क्या वह केरल का है? हां, आज जो उसका शरीर खड़ा है, उसके भीतर की मशीन केरल के खाने से ही तो चलती है.’

‘वापस लौटते हुए’ में ट्यूशन की प्रथा पर लेखक ने पाठकों को कुछ सालों पहले भेज दिया है. ‘कोचिंग थोड़े ही पढ़ता है, पढ़ता तो छात्र है. वह जानता है कि माँ ऐसा क्यूँ कहती है और क्यों वह अपने दाँतो का इलाज नही करवाती.’

एक पिता का चरित्र, पैसा न होते हुए भी जो अपने बच्चों की हर इच्छा का ख्याल रखता है, जेब में पैसा न हो फिर भी उन्हें एक बार मना करने के बाद ट्यूशन के लिए हाँ कहता है. तंगहाली के बीच बच्चों से घर के हालात छुपाने वाली माँ का किरदार परिवार के सारे दुखों को झेलते हुए भी कुछ न कहने वाली माताओं की याद दिलाता है.
इन कहानियों में नौकरीपेशा लोगों का दर्द भी है ‘माँ और पिताजी को देखे भी कितने दिन हो गए हैं. सालाना छुट्टियों में घर जाने पर उनका चेहरा बदला हुआ लगता है. वे पहले से अधिक बूढ़े और जीर्ण लगते हैं.’

समाज पर करारी चोट, भ्र्ष्टाचार और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दे

लेखक ने सामाजिक मुद्दों पर बेबाकी से लिखा है. ‘महत्वपूर्ण आदमी’ कहानी लिखते ट्रेन की सीट के लिए मारामारी में लेखक ने समाज के ऊपर भी व्यंग्य किया है ‘कमाल की बात यह है कि लोग जिस व्यवस्था को भ्रष्ट कहते हैं, जिसे भ्रष्ट बनाने में अपना योगदान देते हैं, उसी पर यकीन भी करते हैं.’
लैंगिक रूढ़ियों को चुनौती दी गई है ‘तुम बहुत बोलती हो.. औरत इतना बोलेगी?’ ‘क्यों.. औरत क्यों नही बोलेगी?’

किताब में इंटरनेट सुगम होने के बाद हिंदी लेखन में आए बदलावों को लेखक ने बखूबी आगे बढ़ाया है, युवा पाठकों के लिए यह खुद से जुड़ाव भी महसूस कराता है ‘ऑनलाइन देखने में कोई रुकावट भी नही थी. मेरी दीवार पर उसके लाल नीले रंगों की छींट अचानक बढ़ गई.’
‘ब्राइट बातें’ कहानी रिश्तों पर लिखी है और उसकी पंक्ति समाज से ही निकली हुई है ‘वे दोस्त नही कि रुककर बातें करें. रिश्तेदारी एक बोझ है, जिसे सब ही ढोते हैं.’

प्रेम कहानी, भ्र्ष्टाचार, भटकते युवाओं जैसी कहानियों के साथ लेखक ने उत्तर भारत से दक्षिण की तरफ जाते विरह पर कहानी लिखकर पाठकों की मानवीय संवेदनाओं को किताब के साथ जोड़ने का कार्य किया है.

व्यक्तिगत संघर्ष और पहचान की तलाश

कहानियाँ व्यक्तिगत आघात और पहचान पर भी केंद्रित हैं. ‘डेंसी भीगे कपड़ों में बिलखती रही. अप्पा भी जोर जोर से रोने लगे. उस दृश्य को देखकर तालाब भी रोता होगा.’ अपनी भाई की मौत का जिम्मेदार खुद को मानती डेंसी से पाठकों को सहानुभूति होती है. लेखक ने ‘तालाब’ का अंत जिस तरह प्रकृति के न्याय के साथ किया है, वह कई अनुत्तरित सवाल भी छोड़ जाता है.

‘तलईकुत्तल’ कहानी किताब का अंत है पर लेखक ने एली के बहाने तमिलनाडु की जिस प्रथा को लिखा है वह चौंकाने वाली है. एली को एक तरफ तो शाम के खाने की चिंता है दूसरी ओर उसे कमाई के लिए फूल भी बेचने हैं. भूख-प्यास से व्याकुल एक आत्मनिर्भर स्त्री के हालातों की यह कहानी शायद किसी को ‘एली’ बनने से रोक पाए.

कहानी के पात्रों से ‘वह’ के साथ परिचय करवाने के बाद लेखक उस पात्र को पाठक का अपना बना देते हैं.
‘ऐलीकुट्टी’ को बाद में ‘एली’ लिखना उनका तरीका कुछ ऐसा ही है.


क्षेत्रीयता और पाठकीय जुड़ाव- भाषा, अनुभव और संवेदना का मेल

इस कहानी-संग्रह की सबसे प्रभावशाली विशेषताओं में से एक है इसकी गहरी क्षेत्रीयता और उससे उपजी यथार्थपरक भाषा-शैली. कहानियाँ मुख्यतः उत्तर भारत की पृष्ठभूमि में घटित होती हैं और लेखक ने उसी अनुरूप भाषा, लोकेशन और अनुभवों का ऐसा चयन किया है जो पात्रों और घटनाओं को और भी जीवंत बना देता है. उदाहरण के तौर पर, कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन में कपड़े बदलने का प्रसंग या केरल में प्रवासी मजदूरों को केवल बंगाल से जोड़ने की सामाजिक मानसिकता, ये छोटे-छोटे प्रसंग पाठकों को न केवल स्थानीय परिवेश से जोड़ते हैं बल्कि क्षेत्रीय सोच और व्यवहार की परतें भी खोलते हैं.

लेखक की शैली में स्थानीय बोली-बानी, रोज़मर्रा की ज़िंदगी और सामाजिक यथार्थ का ऐसा सहज समावेश है कि पाठक इन कहानियों को पढ़ते हुए खुद को उन्हीं गलियों, परिवारों और हालातों के बीच पाता है. यह जुड़ाव केवल भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि भावनात्मक और मानसिक स्तर पर भी महसूस होता है. प्रेम संबंधों की उलझनें, नौकरी और सिस्टम से संघर्ष, शहरों में अकेलापन और घर-परिवार से दूरी, ये सब ऐसे अनुभव हैं जो आम पाठक की रोजमर्रा की ज़िंदगी से गहरे जुड़े हैं. लेखक इन विषयों को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि पाठक को लगता है मानो यह उसकी अपनी ही कहानी हो. यही वजह है कि यह संग्रह न केवल साहित्यिक दृष्टि से बल्कि मानवीय अनुभवों के स्तर पर भी बेहद प्रभावशाली बन पड़ता है.

सड़क, प्रेम और तंगहाली 'रोटी के चार हर्फ़'.

किताब व्यक्तिगत और सामाजिक संघर्षों को गहराई से पेश करती है।

लेखक दिल्ली की सड़कों का जीवंत चित्रण कर देते हैं।
आलोक रंजन ने कहानियों को इस तरह बुना है कि पाठक किताब से निकलकर दिल्ली की सड़कों पर उतर आता है। ‘उस सड़क पर वह सब कुछ था, जो दिल्ली की एक सड़क होने के लिए चाहिए थे। वहां तोड़-फोड़ थी, सीवर की सफाई से निकली काली गाद के साथ खड़े समोसे-जलेबी के ठेले और सबसे बढ़कर भीड़ थी।’ यह वर्णन इतना जीवंत है कि पढ़ते ऐसा लगता है कि पाठक दिल्ली की किसी सड़क में ही है। दृश्यों को ऐसा लिखा है, जैसे वह सामने ही हो। सड़कों से हम आगे बढ़ जाते हैं पर कितनी कहानी हम वहां छोड़ जाते हैं।  
किताब हमें इन अनकही कहानियों को जानने का मौका देती है, जिनका अपना एक अलग संसार है। 

ट्रेन में बैठे लोगों की परिस्थिति का उदाहरण जंगल के जानवरों से देना थोड़ा नया है ‘जंगल में शेर को देखते ही कव्वे और दूसरे पक्षी शोर मचाना शुरू कर देते हैं, जिससे असुरक्षित अवस्था में पड़े जानवर सचेत हो जाते हैं। वह महत्वपूर्ण आदमी लौटा तो यह झुंड चुप हो गया।’ यह दृश्य को सही तरीके से बना देता है।


 मेहनतकशों की अनकही दास्तान पढ़ने को मिलती है

किताब मजदूर वर्ग पर गहराई से प्रकाश डालती है, जो साहित्य में अब लगभग गायब हो रहे हैं। उनकी मेहनत और दिशा-दशा पर लेखक ने किताब की आधी से ज्यादा कहानियों में लिखा है। ‘प्लास्टिक तह करके कैरियर में दबाने के बाद बारी थी साइकिल को घसीटने की। इतनी हिम्मत ही नहीं बची थी कि वह चढ़कर चलाने लगे!’ यह पंक्ति उनकी थकान को उजागर करती है। मेहनतकशों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार पर सब कुछ ऐसा लिखा कि उसे पढ़ते, उन सब का चेहरा याद आ जाता है। ‘बचे हुए सिक्के तेज आवाज के साथ बस में फैल गए थे। उन्हें संभालने के चक्कर में उसकी रोटियां और आलू के टुकड़े भी बस की फर्श पर गिर गए।’ यहां ‘नीचे’ की जगह ‘बस की फर्श’ का प्रयोग कहानी को वास्तविकता के और भी करीब लेकर जाता है। 

‘वापस लौटते हुए’ में एक गरीब परिवार की आर्थिक स्थिति और खामोशी को दर्शाया गया है: ‘सब ज्यादातर चुप ही रहते हैं। माँ चुप, बाबूजी चुप और चुपचाप ही खाना भी पक जाता है।’ यह चित्रण पाठकों के मन में उनके चेहरे उकेर देता है।

आधुनिक प्रेम के उतार-चढ़ाव

प्रेम और रिश्तों को लेखक ने आधुनिक संदर्भ में संवेदनशीलता से चित्रित किया है। ‘इस दुनिया के किनारे’ कहानी को जिस तरह लेखक ने शब्दों के प्रवाह से जोड़ा है, वह वाकई लाजवाब है। बीपी और उमा के बारे में अधिक जानने के साथ पाठक उनकी प्रेम कहानी में हो रहे बदलावों से भी रोमांचित होते रहते हैं। ‘वह उन हँसते चेहरों को ओझल कर देना चाहता था। उन मन्द मन्द मुस्काते चेहरों को देखकर उसकी चिढ़ बढ़ती जा रही थी।’ आधुनिक प्रेम संबंध, जो नौकरी और सुख-सुविधाओं के मोह में बनते-बिगड़ते हैं, उसे लेखक ने ‘हम ब्रेक पर हैं’ कहानी में रिश्तों के हर उतार-चढ़ाव के साथ विस्तार दिया है। ‘झगड़े के बाद जो लोग एक हो जाते हैं, कितने खुशकिस्मत होते हैं।’ यह पंक्ति हर प्रेमी की है। 

प्यार के उतार-चढ़ाव इन पंक्तियों में नज़र आते हैं ‘टैक्सी से बाहर दिल्ली में बस रोशनी दिख रही थी। रोशनी के परे जो था, सब अँधेरे में डूब हुआ।’ और फिर, ‘उस छोटे से संवाद ने ही उसके भाव बदल दिए। रोशनी में एक खुशनुमा रंग बहने लगा था।’
 ‘ब्राइट बातें’ में टूटते रिश्तों की तुलना ‘नारियल के जर्जर पत्तों’ से करते उस रिश्ते का हाल बिल्कुल सामने आ जाता है।

परिवार और पुरानी यादों का दर्द देते आलोक

परिवार के रिश्तों को नॉस्टेल्जिया और दर्द के साथ पेश किया गया है। किताब का शीर्षक वाली कहानी में एक रोटी से शुरू हुए सफर को लेखक नानी तक ले जाते हैं तो पाठकों के लिए ये नॉस्टेल्जिया है। ‘नानी सुनाती भी तो कैसे, उसके शब्द भी हाथों की तरह रूखे हो चले थे।’ यह बैचेन हृदय के शब्द लगते हैं, घर की यादों में हर कोई खो सकता है। रिश्तों की दर्द भरी कहानी में मुख्य पात्र अपने ही घर जाने पर खुद को ‘घुस आया चूहा’ कहता है। कहानी से लेखक ने ‘बाहरी’ जैसा गम्भीर विषय उठाया है और इसकी पीड़ा भी पाठकों तक पहुँचती है। 

लेखक इस कहानी से प्रवासियों का दर्द सामने ले आते हैं, कहानी का मुख्य पात्र सोचता है ‘क्या वह केरल का है? हां, आज जो उसका शरीर खड़ा है, उसके भीतर की मशीन केरल के खाने से ही तो चलती है।’ 

‘वापस लौटते हुए’ में ट्यूशन की प्रथा पर लेखक ने पाठकों को कुछ सालों पहले भेज दिया है। ‘कोचिंग थोड़े ही पढ़ता है, पढ़ता तो छात्र है। वह जानता है कि माँ ऐसा क्यूँ कहती है और क्यों वह अपने दाँतो का इलाज नही करवाती।’

 एक पिता का चरित्र, पैसा न होते हुए भी जो अपने बच्चों की हर इच्छा का ख्याल रखता है, जेब में पैसा न हो फिर भी उन्हें एक बार मना करने के बाद ट्यूशन के लिए हाँ कहता है। तंगहाली के बीच बच्चों से घर के हालात छुपाने वाली माँ का किरदार परिवार के सारे दुखों को झेलते हुए भी कुछ न कहने वाली माताओं की याद दिलाता है।
इन कहानियों में नौकरीपेशा लोगों का दर्द भी है ‘माँ और पिताजी को देखे भी कितने दिन हो गए हैं। सालाना छुट्टियों में घर जाने पर उनका चेहरा बदला हुआ लगता है। वे पहले से अधिक बूढ़े और जीर्ण लगते हैं।’

 समाज पर करारी चोट, भ्र्ष्टाचार और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दे

लेखक ने सामाजिक मुद्दों पर बेबाकी से लिखा है। ‘महत्वपूर्ण आदमी’ कहानी लिखते ट्रेन की सीट के लिए मारामारी में लेखक ने समाज के ऊपर भी व्यंग्य किया है ‘कमाल की बात यह है कि लोग जिस व्यवस्था को भ्रष्ट कहते हैं, जिसे भ्रष्ट बनाने में अपना योगदान देते हैं, उसी पर यकीन भी करते हैं।’
 लैंगिक रूढ़ियों को चुनौती दी गई है ‘तुम बहुत बोलती हो.. औरत इतना बोलेगी?’ ‘क्यों.. औरत क्यों नही बोलेगी?’

 किताब में इंटरनेट सुगम होने के बाद हिंदी लेखन में आए बदलावों को लेखक ने बखूबी आगे बढ़ाया है, युवा पाठकों के लिए यह खुद से जुड़ाव भी महसूस कराता है ‘ऑनलाइन देखने में कोई रुकावट भी नही थी। मेरी दीवार पर उसके लाल नीले रंगों की छींट अचानक बढ़ गई।’ 
‘ब्राइट बातें’ कहानी रिश्तों पर लिखी है और उसकी पंक्ति समाज से ही निकली हुई है ‘वे दोस्त नही कि रुककर बातें करें। रिश्तेदारी एक बोझ है, जिसे सब ही ढोते हैं।’ 

प्रेम कहानी, भ्र्ष्टाचार, भटकते युवाओं जैसी कहानियों के साथ लेखक ने उत्तर भारत से दक्षिण की तरफ जाते विरह पर कहानी लिखकर पाठकों की मानवीय संवेदनाओं को किताब के साथ जोड़ने का कार्य किया है।

व्यक्तिगत संघर्ष और पहचान की तलाश

कहानियाँ व्यक्तिगत आघात और पहचान पर भी केंद्रित हैं। ‘डेंसी भीगे कपड़ों में बिलखती रही। अप्पा भी जोर जोर से रोने लगे। उस दृश्य को देखकर तालाब भी रोता होगा।’ अपनी भाई की मौत का जिम्मेदार खुद को मानती डेंसी से पाठकों को सहानुभूति होती है। लेखक ने ‘तालाब’ का अंत जिस तरह प्रकृति के न्याय के साथ किया है, वह कई अनुत्तरित सवाल भी छोड़ जाता है। 

‘तलईकुत्तल’ कहानी किताब का अंत है पर लेखक ने एली के बहाने तमिलनाडु की जिस प्रथा को लिखा है वह चौंकाने वाली है। एली को एक तरफ तो शाम के खाने की चिंता है दूसरी ओर उसे कमाई के लिए फूल भी बेचने हैं। भूख-प्यास से व्याकुल एक आत्मनिर्भर स्त्री के हालातों की यह कहानी शायद किसी को ‘एली’ बनने से रोक पाए। 

कहानी के पात्रों से ‘वह’ के साथ परिचय करवाने के बाद लेखक उस पात्र को पाठक का अपना बना देते हैं। 
‘ऐलीकुट्टी’ को बाद में ‘एली’ लिखना उनका तरीका कुछ ऐसा ही है।
  

Tuesday, May 27, 2025

कहानी के पात्रों से 'वह' के साथ परिचय करवाने के बाद लेखक उस पात्र को पाठक का अपना बना देते हैं। 'ऐलीकुट्टी' को बाद में 'एली' लिखना उनका तरीका कुछ ऐसा ही है।

दृश्यों को ऐसा लिखा है, जैसे वह सामने ही हो। 
'उस सड़क पर वह सब कुछ था, जो दिल्ली की एक सड़क होने के लिए चाहिए थे। वहां तोड़-फोड़ थी, सीवर की सफाई से निकली काली गाद के साथ खड़े समोसे-जलेबी के ठेले और सबसे बढ़कर भीड़ थी' पढ़ते ऐसा लगता है कि पाठक दिल्ली की किसी सड़क में ही है।

'प्लास्टिक तह करके कैरियर में दबाने के बाद बारी थी साइकिल को घसीटने की। इतनी हिम्मत ही नही बची थी कि वह चढ़कर चलाने लगे!' मजदूर वर्ग जो साहित्य में अब लगभग गायब हो रहे हैं, उनकी मेहनत, उनके दिशा दशा पर लेखक ने किताब की आधी से ज्यादा कहानियों में लिखा है।

सड़कों से हम आगे बढ़ जाते हैं पर कितनी कहानी हम वहां छोड़ जाते हैं। पहली कहानी हमें इन कहानियों को जानने का मौका देती है, जिनका अपना एक अलग संसार है।

'इस दुनिया के किनारे' कहानी को जिस तरह लेखक ने शब्दों के प्रवाह से जोड़ा है, वह वाकई लाजवाब है। बीपी और उमा के बारे में अधिक जानने के साथ पाठक उनकी प्रेम कहानी में हो रहे बदलावों से भी रोमांचित होते रहते हैं। 'वह उन हँसते चेहरों को ओझल कर देना चाहता था। उन मन्द मन्द मुस्काते चेहरों को देखकर उसकी चिढ़ बढ़ती जा रही थी।'


आधुनिक प्रेम सम्बन्ध, जो नौकरी, सुख सुविधाओं के मोह में बनते बिगड़ते हैं, उसे लेखक ने 'हम ब्रेक पर हैं' कहानी में रिश्तों के हर उतार चढ़ाव के साथ विस्तार दिया है।

इस कहानी में प्रेमसंबंधों पर लिखी यह पंक्ति हर प्रेमी की है 'झगड़े के बाद जो लोग एक हो जाते हैं, कितने खुशकिस्मत होते हैं'।

नौकरी पेशा लोगों का दर्द 'माँ और पिताजी को देखे भी कितने दिन हो गए हैं। सालाना छुट्टियों में घर जाने पर उनका चेहरा बदला हुआ लगता है। वे पहले से अधिक बूढ़े और जीर्ण लगते हैं।'

प्यार के उतार चढ़ाव इन दो पंक्तियों में नज़र आते हैं 'टैक्सी से बाहर दिल्ली में बस रोशनी दिख रही थी। रोशनी के परे जो था, सब अँधेरे में डूब हुआ'।

'उस छोटे से संवाद ने ही उसके भाव बदल दिए। रोशनी में एक खुशनुमा रंग बहने लगा था'।

ट्रेन में बैठे लोगों की परिस्थिति का उदाहरण जंगल के जानवरों से देना थोड़ा नया है, यह दृश्य को सही तरीके से बना देता है। 'जंगल मे शेर को देखते ही कव्वे और दूसरे पक्षी शोर मचाना शुरू कर देते हैं, जिससे असुरक्षित अवस्था में पड़े जानवर सचेत हो जाते हैं। वह महत्वपूर्ण आदमी लौटा तो यह झुंड चुप हो गया।'

'महत्वपूर्ण आदमी' कहानी लिखते ट्रेन की सीट के लिए मारामारी में लेखक ने समाज के ऊपर भी व्यंग्य किया है, 'कमाल की बात यह है कि लोग जिस व्यवस्था को भ्रष्ट कहते हैं, जिसे भ्रष्ट बनाने में अपना योगदान देते हैं, उसी पर यकीन भी करते हैं।'

'तुम बहुत बोलती हो.. औरत इतना बोलेगी?'

'क्यों.. औरत क्यों नही बोलेगी?'


एक गरीब परिवार, ट्यूशन की प्रथा पर लेखक ने 'वापस लौटते हुए' कहानी से पाठकों को कुछ सालों पहले भेज दिया है।

'कोचिंग थोड़े ही पढ़ता है, पढ़ता तो छात्र है। वह जानता है कि माँ ऐसा क्यूँ कहती है और क्यों वह अपने दाँतो का इलाज नही करवाती।'

घर की खामोशी और आर्थिक स्थिति को लेखक ने पाठकों के मन में उतारने में कोई कसर नही छोड़ी है। 'सब ज्यादातर चुप ही रहते हैं। माँ चुप, बाबूजी चुप और चुपचाप ही खाना भी पक जाता है।'

एक पिता का चरित्र, पैसा न होते हुए भी जो अपने बच्चों की हर इच्छा का ख्याल रखता है, जेब में पैसा न हो फिर भी उन्हें एक बार मना करने के बाद ट्यूशन के लिए हाँ कहता है। लेखक अपनी कहानी में तंगहाली के बीच बच्चों से घर के हालात छुपाने वाली माँ का किरदार लिखते परिवार के सारे दुखों को झेलते हुए भी कुछ न कहने वाली माताओं की याद दिलाई है।

प्रेम कहानी,  भ्र्ष्टाचार,  भटकते युवाओं जैसी कहानियों के साथ लेखक ने उत्तर भारत से दक्षिण की तरफ जाते विरह पर कहानी लिखकर पाठकों की मानवीय संवेदनाओं को किताब के साथ जोड़ने का कार्य किया है। 'डेंसी भीगे कपड़ों में बिलखती रही। अप्पा भी जोर जोर से रोने लगे। उस दृश्य को देखकर तालाब भी रोता होगा।'

अपनी भाई की मौत का जिम्मेदार खुद को मानती डेंसी से पाठकों को सहानुभूति होती है। लेखक ने 'तालाब' का अंत जिस तरह प्रकृति के न्याय के साथ किया है, वह कई अनुत्तरित सवाल भी छोड़ जाता है।

किताब का शीर्षक वाली कहानी में एक रोटी से शुरू हुए सफर को लेखक नानी तक ले जाते हैं तो पाठकों के लिए ये नॉस्टेल्जिया है। यह किताब की बेहतरीन कहानियों में से एक है।
'नानी सुनाती भी तो कैसे, उसके शब्द भी हाथों की तरह रूखे हो चले थे।' उस बैचेन हृदय के शब्द लगते हैं, घर की यादों में हर कोई खो सकता है।
रिश्तों की दर्द भरी कहानी जहां मुख्य पात्र अपने ही घर जाने पर खुद को घर में घुस आया चूहा कहता है।
कहानी से लेखक ने 'बाहरी' जैसा गम्भीर विषय उठाया है और इसकी पीड़ा भी पाठकों तक पहुँचती है। प्रवासियों का यह दर्द इन पंक्तियों से समझा जा सकता है, 'क्या वह केरल का है? हां, आज जो उसका शरीर खड़ा है, उसके भीतर की मशीन केरल के खाने से ही तो चलती है।'

 मेहनतकशों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार पर सब कुछ ऐसा लिखा कि उसे पढ़ते, उन सब का चेहरा याद आ जाता  है। 
'बचे हुए सिक्के तेज आवाज के साथ बस में फैल गए थे। उन्हें संभालने के चक्कर में उसकी रोटियां और आलू के टुकड़े भी बस की फर्श पर गिर गए'। यहां 'नीचे' की जगह 'बस की फर्श' का प्रयोग कहानी को वास्तविकता के और भी करीब लेकर जाता है।

किताब में इंटरनेट सुगम होने के बाद हिंदी लेखन में आए बदलावों को लेखक ने बखूबी आगे बढ़ाया है, युवा पाठकों के लिए यह खुद से जुड़ाव भी महसूस कराता है। 'ऑनलाइन देखने में कोई रुकावट भी नही थी। मेरी दीवार पर उसके लाल नीले रंगों की छींट अचानक बढ़ गई।'

'ब्राइट बातें' कहानी रिश्तों पर लिखी है और उसकी पंक्ति समाज से ही निकली हुई है 'वे दोस्त नही कि रुककर बातें करें। रिश्तेदारी एक बोझ है, जिसे सब ही ढोते हैं।'

टूटते रिश्तों की तुलना 'नारियल के जर्जर पत्तों' से करते उस रिश्ते का हाल बिल्कुल सामने आ जाता है।
एली को एक तरफ तो शाम के खाने की चिंता है दूसरी ओर उसे कमाई के लिए फूल भी बेचने हैं। 'तलईकुत्तल' कहानी किताब का अंत है पर लेखक ने एली के बहाने तमिलनाडु की जिस प्रथा को लिखा है वह चौंकाने वाली है, भूख प्यास से व्याकुल एक आत्मनिर्भर स्त्री के हालातों की यह कहानी शायद किसी को 'एली' बनने से रोक पाए।









नेहरू की 'हिंदुस्तान की समस्याएं': आज भी कई मुद्दे प्रासंगिक.

आज भी प्रासंगिक है नेहरू का 'अखबारों की आजादी'

सत्साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक 'हिंदुस्तान की समस्याएं' किताब का आठवां संस्करण साल 1955 में आया था। इस किताब में प्रेस की आजादी पर जवाहरलाल नेहरू ने 'अखबारों की आजादी' आलेख लिखा है।
 साल 2025 में, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर है, जो "बहुत गंभीर" श्रेणी में आता है। यह गिरावट मीडिया स्वामित्व के केंद्रीकरण, पत्रकारों पर हमलों, और सरकारी दबाव के कारण हुई है। भारत पाकिस्तान तनाव के बीच भी स्वतंत्र मीडिया पोर्टल 'द वायर' और 'द कश्मीरियत' जैसी वेबसाइटों को सेंसर किया गया था, जिससे जवाहरलाल नेहरू के इस आलेख की अहमियत और भी बढ़ जाती है।

कमजोर से कमजोर अखबारों को सरकारी दबाव का शिकार होने देना खतरे की बात है।

प्रेस की आजादी पर जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं, मैं अखबारों की आजादी का बहुत ज्यादा कायल हूं। मेरे ख्याल से अखबारों को अपनी राय जाहिर करने और नीति की आलोचना करने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। हां, इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि अखबार या इंसान द्वेष भरे हमले किसी दूसरे पर करें या गंदी तरह की अखबार नवीसी में पड़े, जैसे कि हमारे आजकल के कुछ सांप्रदायिक पत्रों की विशेषता है। लेकिन मेरा पक्का यकीन है कि सार्वजनिक जीवन का निर्माण आजाद अखबारों की नींव पर होना चाहिए। 

मशहूर राष्ट्रवादी अखबार, जिन्होंने अपनी स्थिति बना ली है, बड़ी हद तक खुद अपना ख्याल रख सकते हैं। उन पर कोई मुसीबत आती है तो जनता का ध्यान उनकी तरफ जाता है। मदद भी उन्हें मिलती है। पर छोटे और ऐसे अखबार हैं जिनका नाम थोड़ा ही है, उनमें सरकार अक्सर दखल देती है, क्योंकि उनकी प्रसिद्धि उतनी नहीं है। फिर भी हमारे छोटे छोटे और कमजोर से कमजोर अखबारों को सरकारी दबाव का शिकार होने देना खतरे की बात है, क्योंकि ज्यों ज्यों दबाव पड़ता है, त्यों त्यों दबाव डालने की आदत बढ़ती जाती है और उससे धीरे-धीरे जनता का मन सरकार द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किए जाने का आदी हो जाता है। 

इसलिए पत्रकारों की एसोसिएशन तथा सब अखबारों के लिए यह जरूरी है कि कम मशहूर अखबारों तक के मामलों को यों ही न जाने दें। अगर वे प्रेस की आजादी बनाए रखने के ख्वाहिश मन्द हैं तो उन्हें सजग रह कर इस आजादी की रक्षा करनी चाहिए और हर प्रकार के अतिक्रमण को, फिर वह कहीं से भी हो, रोकना चाहिए। यह राजनैतिक विचारों या मतों का ही मामला नहीं है। जिस घड़ी हम उस अखबार पर हमला होने में अपनी रजामंदी दे देते हैं, जिससे हमारा मतभेद है तभी उसूलन हम अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं और जब हमारे ऊपर हमला होता है तो उसका मुकाबला करने में शक्ति हमेमें बाकी नहीं रहती।

हम उन चीजों को भी छपने दें, जिन्हें हम पसंद नहीं करते।

इसी आलेख में आगे लिखा है, प्रेस की आजादी इसमें नहीं है कि जो चीज हम चाहें, वही छप जाए। एक अत्याचारी भी इस तरह की आजादी को मंजूर करता है। प्रेस की आजादी इसमें है कि हम उन चीजों को भी छपने दें, जिन्हें हम पसंद नहीं करते। हमारी अपनी भी जो आलोचनाएं हुई हैं, उन्हें भी हम बर्दाश्त कर रहे हैं और जनता को अपने विचारों को जाहिर कर लेने दें जो हमारे पक्ष के लिए नुकसानदेह ही क्यों ना हो, क्योंकि बड़े लाभ या अंतिम ध्येय की कीमत पर क्षणिक लाभ पाने की कोशिश करना हमेशा एक खतरे की बात है। अगर गलत माप कायम करते हैं और गलत तरीके अख्तियार करते हैं, चाहे इस यकीन से भी कि हम एक ठीक पक्ष को समर्थन दे रहे हैं, तो भी उन मापों और तरीकों का प्रभाव उस ठीक पक्ष पर भी पड़ेगा और उसमें दुराग्रह भर जाएगा। जो ध्येय हमारे सामने हैं, वह कुछ अंश में उन्हीं मापों और साधनों द्वारा नियंत्रित होगा और शायद उसका अंतिम परिणाम भी सर्वथा भिन्न हो, जिसकी कि हमने कल्पना भी न की थी।

हिमांशु जोशी।
@himanshu28may

Monday, May 26, 2025

पंडित जवाहरलाल नेहरू पुण्यतिथि: आज भी प्रासंगिक उनकी 'हिंदुस्तान की समस्याएं'

सत्साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित जवाहरलाल नेहरू की किताब 'हिंदुस्तान की समस्याएं' का आठवां संस्करण 1955 में आया था। इसके  'अखबारों की आजादी', 'भारत और पाकिस्तान की समस्याएं' और 'भारत की वैदेशिक नीति' सहित अन्य आलेख आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।

प्रेस की आजादी की बात करें तो साल 2025 में, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर है, जो "बहुत गंभीर" श्रेणी में आता है। 
भारत - पाक तनाव आज भी वैसा ही बना हुआ जैसा सालों पहले था। 


सार्वजनिक जीवन का निर्माण आजाद अखबारों की नींव पर होना चाहिए। 

प्रेस की आजादी पर लिखे 'अखबारों की आजादी' में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है कि मैं अखबारों की आजादी का बहुत ज्यादा कायल हूं। मेरे ख्याल से अखबारों को अपनी राय जाहिर करने और नीति की आलोचना करने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। हां, इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि अखबार या इंसान द्वेष भरे हमले किसी दूसरे पर करें या गंदी तरह की अखबार नवीसी में पड़े, जैसे कि हमारे आजकल के कुछ सांप्रदायिक पत्रों की विशेषता है। लेकिन मेरा पक्का यकीन है कि सार्वजनिक जीवन का निर्माण आजाद अखबारों की नींव पर होना चाहिए। 

मशहूर राष्ट्रवादी अखबार, जिन्होंने अपनी स्थिति बना ली है, बड़ी हद तक खुद अपना ख्याल रख सकते हैं। उन पर कोई मुसीबत आती है तो जनता का ध्यान उनकी तरफ जाता है। मदद भी उन्हें मिलती है। पर छोटे और ऐसे अखबार हैं जिनका नाम थोड़ा ही है, उनमें सरकार अक्सर दखल देती है, क्योंकि उनकी प्रसिद्धि उतनी नहीं है। फिर भी हमारे छोटे छोटे और कमजोर से कमजोर अखबारों को सरकारी दबाव का शिकार होने देना खतरे की बात है, क्योंकि ज्यों ज्यों दबाव पड़ता है, त्यों त्यों दबाव डालने की आदत बढ़ती जाती है और उससे धीरे-धीरे जनता का मन सरकार द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किए जाने का आदी हो जाता है। 

इसलिए पत्रकारों की एसोसिएशन तथा सब अखबारों के लिए यह जरूरी है कि कम मशहूर अखबारों तक के मामलों को यों ही न जाने दें। अगर वे प्रेस की आजादी बनाए रखने के ख्वाहिश मन्द हैं तो उन्हें सजग रह कर इस आजादी की रक्षा करनी चाहिए और हर प्रकार के अतिक्रमण को, फिर वह कहीं से भी हो, रोकना चाहिए। यह राजनैतिक विचारों या मतों का ही मामला नहीं है। जिस घड़ी हम उस अखबार पर हमला होने में अपनी रजामंदी दे देते हैं, जिससे हमारा मतभेद है तभी उसूलन हम अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं और जब हमारे ऊपर हमला होता है तो उसका मुकाबला करने में शक्ति हमेमें बाकी नहीं रहती।


प्रेस की आजादी इसमें नहीं है कि जो चीज हम चाहें, वही छप जाए।

नेहरू आलेख में यह भी लिखते हैं, प्रेस की आजादी इसमें नहीं है कि जो चीज हम चाहें, वही छप जाए। एक अत्याचारी भी इस तरह की आजादी को मंजूर करता है। प्रेस की आजादी इसमें है कि हम उन चीजों को भी छपने दें, जिन्हें हम पसंद नहीं करते। हमारी अपनी भी जो आलोचनाएं हुई हैं, उन्हें भी हम बर्दाश्त कर रहे हैं और जनता को अपने विचारों को जाहिर कर लेने दें जो हमारे पक्ष के लिए नुकसानदेह ही क्यों ना हो, क्योंकि बड़े लाभ या अंतिम ध्येय की कीमत पर क्षणिक लाभ पाने की कोशिश करना हमेशा एक खतरे की बात है। अगर गलत माप कायम करते हैं और गलत तरीके अख्तियार करते हैं, चाहे इस यकीन से भी कि हम एक ठीक पक्ष को समर्थन दे रहे हैं, तो भी उन मापों और तरीकों का प्रभाव उस ठीक पक्ष पर भी पड़ेगा और उसमें दुराग्रह भर जाएगा। जो ध्येय हमारे सामने हैं, वह कुछ अंश में उन्हीं मापों और साधनों द्वारा नियंत्रित होगा और शायद उसका अंतिम परिणाम भी सर्वथा भिन्न हो, जिसकी कि हमने कल्पना भी न की थी।



काश्मीर का प्रश्न इस ट्रिब्यूनल द्वारा तय नही हो सकता है।

'भारत और पाकिस्तान की समस्याएं' में जवाहरलाल नेहरु ने लिखा, आज या भविष्य में अगर कोई झगड़ा हो तो उसके लिए युद्ध करना दोनों देश निन्दनीय समझते हैं। इसके अलावा यह भी निश्चय हुआ था कि इन दोनों देशों के बीच ऐसे झगड़ों का निपटारा माने हुए शांतिपूर्ण ढंग से किया जाए अर्थात आपस में बातचीत करके या किसी दूसरे दल को बीच में डालकर या किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा, जिसे दोनों देश मानें, आपसी झगड़ों का निपटारा करना चाहिए। इस विषय में दोनों देशों में काफी चिट्टी पत्री हो चुकी है।

उन्होंने इस आलेख में आगे यह भी लिखा है कि हमने एक आम घोषणा का प्रस्ताव तो किया ही था, इसके अलावा हमने दो बड़े विवादात्मक प्रश्नों को सुलझाने के लिए विशेष प्रस्ताव किया था अर्थात निकासी जायजाद और पानी के सम्बन्ध में। हमने कहा था कि एक ट्रिब्यूनल बनाया जाए जिसमें दो जज भारत के और दो पाकिस्तान के हों और ये ऊंची श्रेणी के जज हों। ये लोग इन दो झगड़ों को तय कर दें और हम लोग उनके निर्णयों को मानने के लिए बाध्य हों।
हमने यह प्रस्ताव किया था कि यह ट्रिब्यूनल दूसरे मौजूदा या भविष्य के झगड़ों पर विचार कर सकता है जिनके बारे में समझा जाए कि समझौता हो सकता है। जाहिर है कि राजनैतिक किस्म के ऐसे झगड़े जो अदालती क्षेत्र से बाहर के हैं इस ट्रिब्यूनल के सामने पेश नही हो सकते हैं।

इस समय भारत और पाकिस्तान के बीच में चार बड़े विवादात्मक प्रश्न हैं। काश्मीर, निकासी की जायजाद, नहर का पानी और विनिमय की दर। काश्मीर का प्रश्न इस ट्रिब्यूनल द्वारा तय नही हो सकता है। यह प्रश्न इस समय सुरक्षा परिषद के सामने है। विनिमय दर का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय मानेटरी फंड के पास है और हमें आशा है कि ये लोग शीघ्र ही किसी निर्णय पर पहुंच जाएंगे। हम निकासी की जायजाद और नहर के पानी इन दो प्रश्नों को संयुक्त ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने की तजवीज कर चुके हैं, और इस ट्रिब्यूनल के सामने भविष्य के वे झगड़े भी पेश किये जा सकते हैं, जो इसी प्रकार के हों।

यह कहा गया है कि सम्भव है कि यह ट्रिब्यूनल किसी निश्चय तक न पहुंच सके, क्योंकि हो सकता है कि न्यायाधीश अपने मत के बराबर बराबर बट जाएं। पर हमें इस बात की आशा है कि उच्च श्रेणी के न्यायाधीशों के सामने जो प्रश्न रखे जाएंगे उन पर से बिलकुल निष्पक्ष भाव से विचार करेंगे और ज्यादातर सहमत होंगे। अगर इनमें एकमत नही होता तो दोनों सरकारें स्वयं मिलजुल कर कोई समझौता कर लें या कोई दूसरा तरीका इन झगड़ों को तय करने का निकालें।
मुझे नही मालूम कि किन्हीं दो स्वतंत्र राष्ट्रों ने अपने झगड़ों को तय करने के लिए इससे बेहतर कोई दूसरा तरीका निकाला हो। हमारा प्रस्ताव साफ साफ व्यवहारिक है और समझदारी का है।अगर यह मंजूर हो जाता है तो इससे भारत और पाकिस्तान के बीच इस समय जो खिंचाव पाया जाता है वह जाता रहेगा।

ऐसा करके वे पाकिस्तान की नीति को ही मदद पहुंचा रहे हैं

भारत पाकिस्तान पर अपने विचार रखते जवाहरलाल नेहरू ने 'भारत की वैदशिक नीति' आलेख में लिखा है बदकिस्मती से जिस जनून और उखाड़ पछाड़ से इस देश का बटवारा हुआ वे खत्म नही हुए और बाद की घटनाओं ने उन्हें और उभार दिया। कहा जाता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के सहकारिता सम्बन्धों के रास्ते में बुनियादी कठिनाई काश्मीर की है। यह कहना ज्यादा सही होगा कि काश्मीर की समस्या दोनों देशों के बीच बुनियादी अंदरूनी झगड़ों से उपजी है। हिंदुस्तान धर्म निरपेक्ष राज्य का समर्थक है और अपने अंगभूत हिस्सों के स्वतंत्र रहने का पक्षपाती है। लेकिन पाकिस्तान साम्प्रदायिक राज्य है, और अपने उद्देश्यों और विचारधारा के कारण अपने दृष्टिकोण में आक्रामक है। आज की दुनिया में ऐसी विचारधारा अजीब सी लगती है, और ऐसे किसी आधुनिक राज्य की कल्पना करना भी मुश्किल है जो कि अपने बहुसंख्यक नागरिकों को यह महसूस कराता हो कि वे हीन हैं और उनके साथ बराबरी का बर्ताव नही किया जा सकता।

हिंदुस्तान में कुछ ऐसे लोग हैं जो मूर्खता और विवेकहीनता के कारण उसी साम्प्रदायिक नीति को बरत रहे हैं जो पाकिस्तान में बरती जा रही है। ऐसा करके वे पाकिस्तान की नीति को ही मदद पहुंचा रहे हैं और भारतीय राज्य की बुनियादी मान्यता को कमजोर कर रहे हैं।



सत्साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित जवाहरलाल नेहरू की किताब 'हिंदुस्तान की समस्याएं' का आठवां संस्करण 1955 में आया था. इसके 'अखबारों की आजादी', 'भारत और पाकिस्तान की समस्याएं' और 'भारत की वैदेशिक नीति' सहित अन्य आलेख आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं.

प्रेस की आजादी की बात करें तो साल 2025 में, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर है, जो "बहुत गंभीर" श्रेणी में आता है.
भारत - पाक तनाव आज भी वैसा ही बना हुआ जैसा सालों पहले था.

सार्वजनिक जीवन का निर्माण आजाद अखबारों की नींव पर होना चाहिए.

प्रेस की आजादी पर लिखे 'अखबारों की आजादी' में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है कि मैं अखबारों की आजादी का बहुत ज्यादा कायल हूं. मेरे ख्याल से अखबारों को अपनी राय जाहिर करने और नीति की आलोचना करने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए. हां, इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि अखबार या इंसान द्वेष भरे हमले किसी दूसरे पर करें या गंदी तरह की अखबार नवीसी में पड़े, जैसे कि हमारे आजकल के कुछ सांप्रदायिक पत्रों की विशेषता है. लेकिन मेरा पक्का यकीन है कि सार्वजनिक जीवन का निर्माण आजाद अखबारों की नींव पर होना चाहिए.

मशहूर राष्ट्रवादी अखबार, जिन्होंने अपनी स्थिति बना ली है, बड़ी हद तक खुद अपना ख्याल रख सकते हैं. उन पर कोई मुसीबत आती है तो जनता का ध्यान उनकी तरफ जाता है. मदद भी उन्हें मिलती है. पर छोटे और ऐसे अखबार हैं जिनका नाम थोड़ा ही है, उनमें सरकार अक्सर दखल देती है, क्योंकि उनकी प्रसिद्धि उतनी नहीं है. फिर भी हमारे छोटे छोटे और कमजोर से कमजोर अखबारों को सरकारी दबाव का शिकार होने देना खतरे की बात है, क्योंकि ज्यों ज्यों दबाव पड़ता है, त्यों त्यों दबाव डालने की आदत बढ़ती जाती है और उससे धीरे-धीरे जनता का मन सरकार द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किए जाने का आदी हो जाता है.

इसलिए पत्रकारों की एसोसिएशन तथा सब अखबारों के लिए यह जरूरी है कि कम मशहूर अखबारों तक के मामलों को यों ही न जाने दें. अगर वे प्रेस की आजादी बनाए रखने के ख्वाहिश मन्द हैं तो उन्हें सजग रह कर इस आजादी की रक्षा करनी चाहिए और हर प्रकार के अतिक्रमण को, फिर वह कहीं से भी हो, रोकना चाहिए. यह राजनैतिक विचारों या मतों का ही मामला नहीं है. जिस घड़ी हम उस अखबार पर हमला होने में अपनी रजामंदी दे देते हैं, जिससे हमारा मतभेद है तभी उसूलन हम अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं और जब हमारे ऊपर हमला होता है तो उसका मुकाबला करने में शक्ति हमेमें बाकी नहीं रहती.

प्रेस की आजादी इसमें नहीं है कि जो चीज हम चाहें, वही छप जाए.

नेहरू आलेख में यह भी लिखते हैं, प्रेस की आजादी इसमें नहीं है कि जो चीज हम चाहें, वही छप जाए. एक अत्याचारी भी इस तरह की आजादी को मंजूर करता है. प्रेस की आजादी इसमें है कि हम उन चीजों को भी छपने दें, जिन्हें हम पसंद नहीं करते. हमारी अपनी भी जो आलोचनाएं हुई हैं, उन्हें भी हम बर्दाश्त कर रहे हैं और जनता को अपने विचारों को जाहिर कर लेने दें जो हमारे पक्ष के लिए नुकसानदेह ही क्यों ना हो, क्योंकि बड़े लाभ या अंतिम ध्येय की कीमत पर क्षणिक लाभ पाने की कोशिश करना हमेशा एक खतरे की बात है. अगर गलत माप कायम करते हैं और गलत तरीके अख्तियार करते हैं, चाहे इस यकीन से भी कि हम एक ठीक पक्ष को समर्थन दे रहे हैं, तो भी उन मापों और तरीकों का प्रभाव उस ठीक पक्ष पर भी पड़ेगा और उसमें दुराग्रह भर जाएगा. जो ध्येय हमारे सामने हैं, वह कुछ अंश में उन्हीं मापों और साधनों द्वारा नियंत्रित होगा और शायद उसका अंतिम परिणाम भी सर्वथा भिन्न हो, जिसकी कि हमने कल्पना भी न की थी.

काश्मीर का प्रश्न इस ट्रिब्यूनल द्वारा तय नही हो सकता है.

'भारत और पाकिस्तान की समस्याएं' में जवाहरलाल नेहरु ने लिखा, आज या भविष्य में अगर कोई झगड़ा हो तो उसके लिए युद्ध करना दोनों देश निन्दनीय समझते हैं. इसके अलावा यह भी निश्चय हुआ था कि इन दोनों देशों के बीच ऐसे झगड़ों का निपटारा माने हुए शांतिपूर्ण ढंग से किया जाए अर्थात आपस में बातचीत करके या किसी दूसरे दल को बीच में डालकर या किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा, जिसे दोनों देश मानें, आपसी झगड़ों का निपटारा करना चाहिए. इस विषय में दोनों देशों में काफी चिट्टी पत्री हो चुकी है.

उन्होंने इस आलेख में आगे यह भी लिखा है कि हमने एक आम घोषणा का प्रस्ताव तो किया ही था, इसके अलावा हमने दो बड़े विवादात्मक प्रश्नों को सुलझाने के लिए विशेष प्रस्ताव किया था अर्थात निकासी जायजाद और पानी के सम्बन्ध में. हमने कहा था कि एक ट्रिब्यूनल बनाया जाए जिसमें दो जज भारत के और दो पाकिस्तान के हों और ये ऊंची श्रेणी के जज हों. ये लोग इन दो झगड़ों को तय कर दें और हम लोग उनके निर्णयों को मानने के लिए बाध्य हों.
हमने यह प्रस्ताव किया था कि यह ट्रिब्यूनल दूसरे मौजूदा या भविष्य के झगड़ों पर विचार कर सकता है जिनके बारे में समझा जाए कि समझौता हो सकता है. जाहिर है कि राजनैतिक किस्म के ऐसे झगड़े जो अदालती क्षेत्र से बाहर के हैं इस ट्रिब्यूनल के सामने पेश नही हो सकते हैं.

इस समय भारत और पाकिस्तान के बीच में चार बड़े विवादात्मक प्रश्न हैं. काश्मीर, निकासी की जायजाद, नहर का पानी और विनिमय की दर. काश्मीर का प्रश्न इस ट्रिब्यूनल द्वारा तय नही हो सकता है. यह प्रश्न इस समय सुरक्षा परिषद के सामने है. विनिमय दर का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय मानेटरी फंड के पास है और हमें आशा है कि ये लोग शीघ्र ही किसी निर्णय पर पहुंच जाएंगे. हम निकासी की जायजाद और नहर के पानी इन दो प्रश्नों को संयुक्त ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने की तजवीज कर चुके हैं, और इस ट्रिब्यूनल के सामने भविष्य के वे झगड़े भी पेश किये जा सकते हैं, जो इसी प्रकार के हों.

यह कहा गया है कि सम्भव है कि यह ट्रिब्यूनल किसी निश्चय तक न पहुंच सके, क्योंकि हो सकता है कि न्यायाधीश अपने मत के बराबर बराबर बट जाएं. पर हमें इस बात की आशा है कि उच्च श्रेणी के न्यायाधीशों के सामने जो प्रश्न रखे जाएंगे उन पर से बिलकुल निष्पक्ष भाव से विचार करेंगे और ज्यादातर सहमत होंगे. अगर इनमें एकमत नही होता तो दोनों सरकारें स्वयं मिलजुल कर कोई समझौता कर लें या कोई दूसरा तरीका इन झगड़ों को तय करने का निकालें.
मुझे नही मालूम कि किन्हीं दो स्वतंत्र राष्ट्रों ने अपने झगड़ों को तय करने के लिए इससे बेहतर कोई दूसरा तरीका निकाला हो. हमारा प्रस्ताव साफ साफ व्यवहारिक है और समझदारी का है. अगर यह मंजूर हो जाता है तो इससे भारत और पाकिस्तान के बीच इस समय जो खिंचाव पाया जाता है वह जाता रहेगा.

ऐसा करके वे पाकिस्तान की नीति को ही मदद पहुंचा रहे हैं

भारत पाकिस्तान पर अपने विचार रखते जवाहरलाल नेहरू ने 'भारत की वैदशिक नीति' आलेख में लिखा है बदकिस्मती से जिस जनून और उखाड़ पछाड़ से इस देश का बटवारा हुआ वे खत्म नही हुए और बाद की घटनाओं ने उन्हें और उभार दिया. कहा जाता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के सहकारिता सम्बन्धों के रास्ते में बुनियादी कठिनाई काश्मीर की है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि काश्मीर की समस्या दोनों देशों के बीच बुनियादी अंदरूनी झगड़ों से उपजी है. हिंदुस्तान धर्म निरपेक्ष राज्य का समर्थक है और अपने अंगभूत हिस्सों के स्वतंत्र रहने का पक्षपाती है. लेकिन पाकिस्तान साम्प्रदायिक राज्य है, और अपने उद्देश्यों और विचारधारा के कारण अपने दृष्टिकोण में आक्रामक है. आज की दुनिया में ऐसी विचारधारा अजीब सी लगती है, और ऐसे किसी आधुनिक राज्य की कल्पना करना भी मुश्किल है जो कि अपने बहुसंख्यक नागरिकों को यह महसूस कराता हो कि वे हीन हैं और उनके साथ बराबरी का बर्ताव नही किया जा सकता.

हिंदुस्तान में कुछ ऐसे लोग हैं जो मूर्खता और विवेकहीनता के कारण उसी साम्प्रदायिक नीति को बरत रहे हैं जो पाकिस्तान में बरती जा रही है. ऐसा करके वे पाकिस्तान की नीति को ही मदद पहुंचा रहे हैं और भारतीय राज्य की बुनियादी मान्यता को कमजोर कर रहे हैं.

हिमांशु जोशी


Thursday, May 22, 2025

जातिवाद से पलायन का दंश, 'भूतगांव' को किताब में उतार गए नवीन जोशी

दो अलग अलग कहानी उपन्यास का अंत होते जब एक दूसरे से जुड़ जाती हैं तो इससे पाठकों को पहाड़ों में पलायन की समस्या से कहीं बड़ी जातिवाद की समस्या लगने लगती है.

लेखक नवीन जोशी का नया उपन्यास 'भूतगांव' राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया है और किताब के नाम जैसा डराता हुआ आवरण चित्र अनूप चंद ने तैयार किया है. किताब की शुरुआत 'लच्छु कोठारी की सन्तानों का पुनर्जन्म' से होती है,  गांव के खालीपन को दिखाने के लिए लेखक ने अपनी कहानी के मुख्य किरदार के साथ एक कुत्ते को साथी के रूप में चुना है, जो पहाड़ से होने वाले पलायन के साथ वहां की खत्म होती संस्कृति का दर्द पाठकों तक पहुंचा देता है. उन्हें समझ आ जाता है कि इंसानों के पास अब पहाड़ों में बात करने के लिए इंसान तक नही बचे हैं. जिस तरह कहानी का मुख्य पात्र ढह रहे घरों की स्थिति बयान कर रहा है वह पहाड़ के 'भूतगांव' का दृश्य हमारे सामने ले आता है.

भाषा सरल और आम बोलचाल की, 'जब पड़ता है बाघ के हाथ। तेरा बाप, तेरी महतारी, तेरे भाई-बहन कहाँ गए, कुछ पता है?'

जानवर का वर्णन करते उसका रूप रंग सामने ले आते हैं, 'तेरा बाप ससुरा, था बड़ा प्यारा। सफ़ेद तन पर काले बूट ऐसे, जैसे किसी ने बराबर छाप रखे हों।'

किताब के तीसरे किस्से में जब किताब का मुख्य किरदार अपने कुत्ते से बात करते अपने भरे भूरे गांव को याद करता है तो यह भावुक करता है, पलायन के दर्द को अपनी इन पंक्तियों से लेखक दुनिया को वाकिफ करवाने में पूरी तरह सफल रहे हैं 'असली सूबेदारनी सुनती तो बहुत गाली देती। मगर गांव में होती तो सुनती। कबके चले गए ठहरे गाँव छोड़कर।'
'पहले मचती थी यार, गाली गलौच, मार काट। तेरी गाय मर जाए, तूने मेरे खेत की घास काट ली..'
'देवता के लिए गोबर भी दुर्लभ हो गया ठहरा। ऐसे दिन आए यार।'

किताब सवाल उठाती है कि जब पलायन हो गया है तो अब हो रहा विकास किस काम का है 'और अब तो सड़क भी आ रही सुना, अब आने जाने वाला कोई नही बचा। क्या लेने आ रही होगी अब वो सड़क?'

मुख्य किरदार एक रिटायर्ड फौजी है और उसके जरिए लेखक पलायन से खाली हुए पहाड़ की स्थिति हमारे सामने रख रहे हैं, यह फौजी पहाड़ से अपने अगाध प्रेम में जब कहता है 'इन धुर-जंगलों को पता चलना चाहिए कि अभी हमारा गाँव जिंदा है। एक फौजी अभी हारा नही है।' तो ऐसा लगता है कि यह लेखक कि आवाज़ है, जो अभी पहाड़ की दुर्दशा से हारे नही हैं और इन खाली हो चुके पहाड़ों की आवाज़ दुनिया तक पहुंचा रहे हैं. 

'अंधे प्रेम का अजूबा किस्सा' में लेखक ने जिस तरह से 1963 के दौर में पहाड़ से हो रहे पलायन को लिखा है, वह तब की स्थिति को पाठकों के सामने साफ कर देता है. 'पहाड़ के लड़कों का भाग भागकर शहरों की तरफ जाना कोई नई बात नही थी' में हम उस दौर में भी पलायन को देखते हैं.
पहाड़ में व्याप्त जातिवाद और पहाड़ के भोलेपन से बनी यह कहानी आज शहरों में बने पहाड़ी समाज की शुरुआत कही जा सकती है.

कहानी को लिखते हुए उसमें रोचकता पूरी तरह बनाई है, आगे क्या होगा पढ़ने के लिए पाठकों में उत्सुकता बनी रही है. उपन्यास आगे बढ़ता है तो वीरेंद्र की कहानी को फ्लेशबैक में ले जाते लेखक ने पाठकों का परिचय हीरा से करवाया है. दो अलग अलग कहानी उपन्यास का अंत होते जब एक दूसरे से जुड़ जाती हैं तो इससे पाठकों को पहाड़ों में पलायन की समस्या से कहीं बड़ी जातिवाद की समस्या लगने लगती है.

हीरा को लेकर लिखी पंक्ति 'कैसा और कितना भी कायान्तरण हो गया हो, वह स्वयं जानती थी कि जन्म से ही 'शिल्पकार' का जो ठप्पा उसके अस्तित्व पर लगा हुआ है, उसे मृत्यु भी मिटा नही सकती' भारत की जाति व्यवस्था पर चोट है. पृष्ठ संख्या 71 और 72 में समाज के इस भेदभाव वाले विषय पर विस्तार से लिखा है. हीरा के पात्र से लेखक पहाड़ के एक दलित की स्थिति तो पाठकों के सामने रख ही रहे हैं, साथ में उन्होंने भारतीय महिलाओं की उस वास्तविकता को भी सामने रखा है, जिससे हम सब मुंह मोड़ते हैं. परिवार को संभालते हुए वह खुद की पहचान को भूल जाती है. यह पात्र पाठकों को हमेशा के लिए याद रह जाता है.


एक प्रवासी का दर्द भी लिखते हैं 'गर्मियों में जब धूप और लू के थपेड़ों के बीच साइकिल चलानी पड़ती थी, घमौरियों से देह लाल हो उठती थी और कोठी में चारों तरफ लगी खस की टट्टियों से आती शीतल हवा ही तनिक सकून देती थी, उसे पहाड़ बेतरह याद आने लगता था। काश, वह पहाड़ जा पाता और फिर वहां की शांत-सुंदर वादियों-जंगलों में घूमता, नदियों में नहाता और परिजनों के साथ तीज त्योहार मना पाता।

पहाड़ के कठिन जीवन को लिखते हुए लेखक ने अपने उपन्यास के मुख्य किरदार के जरिए पहाड़ में घूमने आने वालों के लिए संदेश भी छोड़ा है 'शहर के लोग दौड़ कर जाते हैं शिमला, मसूरी, नैनीताल। स्नो फॉल देखने का बड़ा शौक हुआ उनको। मगर बाबू, यहां रह के देखो स्नो फॉल में।'


पहाड़ की सुंदरता को शब्दों में कैद किया है 'देख नहाए धोए, तरोताजा, कितने खुश हो रखे पहाड़! कुहरा ऐसे लपेट लिया पश्मीना!'

पहाड़ की हिम्मती महिलाओं को लेखक अपनी कहानी में जगह देते हैं, कहानी का मुख्य किरदार चुन्नी के बारे में कहता है 'संजोग की बात, उस साल भैंस ने कटड़ा जना तो उसने पाल लिया। लोग कटड़े को मार देने वाले हुए। उसने पाल पोसकर बड़ा कर लिया। सयानों ने समझाया, अरे चुन्नी ब्वारी तू ये क्या कर रही? कोई औरतों वाला काम हुआ ये? मगर उसने किसी की परवाह नहीं की।'

पहाड़ के गांवों में हलवाहों के घरों के बारे में उपन्यास में लिखा है 'वहां हलवाहों के कुल चार घर थे। बामणों- ठाकुरों के गुलाम जैसे ठहरे वे।'

अपने अनुभवों से उन्होंने कहानी में खंडहर हो रहे पहाड़ के मकानों के हालातों को लिखा है 'मकान में सुबह शाम चूल्हा जला, धुंआ उठा तो मकान की उमर बढ़ जाती है। अब कौन जलाए यहाँ चूल्हा!'

Tuesday, May 20, 2025

नैनीताल समाचार: असली पत्रकारिता को सहयोग और सरोकारों की जरूरत है.

30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाएगा, इस बीच हम ऐसे पत्रकारों की बात कर रहे हैं जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता में अपना प्रभाव छोड़ा है.
'नैनीताल समाचार' के सम्पादक राजीव लोचन साह ऐसे ही एक पत्रकार हैं. राजीव लोचन साह को पत्रकारिता में उनके योगदान के लिए साल 2024 में भैरव दत्त धूलिया पत्रकारिता पुरस्कार दिया गया.

अपने 47 वर्षों के इस सफर में 'नैनीताल समाचार' ने साबित किया है कि पत्रकारिता व्यवसाय नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व है. सोशल मीडिया के अफवाहों के बीच यह अखबार उस मशाल की तरह है जो सच्चाई का मार्ग दिखाती है. अखबार आज की युवा पीढ़ी के लिए संदेश भी है कि असली पत्रकारिता अभी जीवित है, बस उसे सहयोग और सरोकारों की जरूरत है.  

कहानियों से लेकर अपने अखबार तक.

नैनीताल के राजीव लोचन साह बचपन से ही लिखने पढ़ने के शौकीन थे, कॉलेज जाते ही उनका यह शौक परवान चढ़ा और उस समय की लोकप्रिय पत्रिका 'नई कहानियां' में उनकी दो कहानियां प्रकाशित भी हो गई.

वर्ष 1971 में 'पहल' के सम्पादक ज्ञानरंजन का नैनीताल आना हुआ तो राजीव की उनके साथ जम कर घुमक्कड़ी हुई, हिंदी को लेकर अपने अंदर उथल-पुथल मचा रहे विभिन्न प्रश्नों के बारे में राजीव ने ज्ञानरंजन से बातचीत करी. ज्ञानरंजन से मिले प्रेस खोल प्रकाशन के क्षेत्र में जाने के सुझाव को दिल से लगा राजीव अपने परिवार से बातचीत करने के बाद 'प्रेस' की एबीसीडी सीखने इलाहाबाद चले गए. वहां अपने रिश्तेदार मनोहर लाल जगाती के घर रहते हुए उनका सम्पर्क रामाप्रसाद घिडियाल से हुआ और उनसे राजीव को प्रेस के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला. इलाहाबाद से वापस आ उन्होंने वर्ष 1973 में राजहंस प्रेस खोला पर जब तक वह जमा तब तक देश में इमरजेंसी का साइरन बज गया और समाचार पत्र शुरू करने में देरी हुई.
वर्ष 1977 में इमरजेंसी समाप्त होने के बाद 'नवनीत' पत्रिका से प्रभावित राजीव लोचन साह ने अपने साथ नैनीताल के दो युवाओं हरीश पन्त और पवन राकेश को भी जोड़ा और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को मजबूत करने के लिए वर्ष 1977 के स्वतंत्रता दिवस को 'नैनीताल समाचार' की शुरुआत करने के लिए चुना.
'नैनीताल समाचार' नाम राजीव के द्वारा समाचार पत्र स्वीकृत कराने के लिए भेजे गए नामों में तीसरे नम्बर पर था, राजीव कहते हैं कि वह समाचार पत्र का नाम 'देवदार' रखना चाहते थे.

गांधीवादी चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा का मिला मार्गदर्शन

नैनीताल समाचार एक पाक्षिक अखबार के रुप में शुरू हुआ जिसको अपनी शुरुआत से ही गांधीवादी चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा का मार्गदर्शन मिला. दिल्ली से छप रहे अखबारों के उत्तराखंड में देर से पहुंचने की वज़ह से यहां खबरों का सूखा बना रहता था, नैनीताल समाचार के आगमन ने उसे दूर किया और देखते ही देखते अख़बार अपने पहले अंक से ही उत्तराखंडवासियों के बीच लोकप्रिय हो गया.
लेखकों, पत्रकारों की बात की जाए तो वर्तमान समय के प्रसिद्ध इतिहासकार पद्मश्री शेखर पाठक के साथ नवीन जोशी, गोविंद पन्त राजू जैसे भविष्य के नामी पत्रकारों के साथ इस अखबार की शुरुआत हुई.

उत्तराखंड के लिए हमेशा से ही मुख्य समस्या रहे प्रवास पर इस अख़बार के दूसरे अंक से ही 'प्रवास की डायरी' छपी जो अगले सात साल तक जारी रही और तीसरे अंक में तवाघाट दुर्घटना पर एक रपट प्रकाशित हुई जिसमें पत्रकार के नाम की जगह लिखा तो 'विशेष प्रतिनिधि' गया था पर वह ख़बर सुंदर लाल बहुगुणा ने लिखी थी.

एक पत्रकार जो आंदोलनकारी बन गया

6 अगस्त 1977 को नैनीताल में वनों की नीलामी पर ख़बर करने राजीव अपने मित्र विनोद पांडे के साथ गए थे पर वहां स्थिति ऐसी बनी कि उसको लेकर राजीव लोचन साह कहते हैं कि मैं वहां गया तो एक पत्रकार के तौर पर था पर जब बाहर आया तो एक आंदोलनकारी बन चुका था.

उसी साल नवंबर में वनों की नीलामी के विरोध में हुए प्रदर्शनों में गिरीश तिवारी 'गिर्दा' भी आंदोलनकारी बन गए और नैनीताल समाचार के साथ उनका अटूट सम्बन्ध शुरू हुआ. नैनीताल में पढ़ते हुए पलाश विश्वास और कपिलेश भोज भी नैनीताल समाचार के साथ जुड़ गए.

अखबार बन्द करने के विचार से नए सदस्यों के जुड़ने की कहानी

मई 1982 में समाचार पत्र का कार्य पूरा समझकर इसके कर्ताधर्ताओं ने इसे बंद करने की ठानी और इसको लेकर अख़बार में एक छोटा सा सन्देश भी लिख दिया पर उसके बाद पत्रों से पाठकों के इसे बंद न करने की गुज़ारिश पर अख़बार चलता रहा. वर्ष 1983 में 'उत्तराखंड की बाढ़, भूस्खलन और तबाही' शीर्षक से छपा आलेख उत्तराखंड के इतिहास में हुई प्राकृतिक आपदाओं को दिखाता है और उन पर शोध करने का बेहतरीन माध्यम है. इतिहास पर नित्यानन्द मिश्रा की लिखी श्रृंखला पर तो 'कुर्मांचल गौरव गाथा' नाम से पुस्तक भी छप गई है.

शेखर पाठक बताते हैं कि साल 1974 की अस्कोट - आराकोट यात्रा में उन्हें इम्तिहान की वज़ह से जल्दी वापस लौटना पड़ा था पर जब वह 1984 में इस यात्रा पर वापस गए तो नैनीताल समाचार के बहुत से नए सदस्य बने. गोविंद पन्त राजू नैनीताल समाचार की रसीद यात्रा के दौरान अपने हाथों में ही पकड़े रहते थे.

जनांदोलनों का प्रतिबिंब

उत्तराखंड से उत्तरांचल और फिर उत्तराखंड बनने का पूरा सफ़र हम नैनीताल समाचार में पढ़ सकते हैं, यह यात्रा भी नैनीताल समाचार के साथ ही चलती प्रतीत होती है. प्रदेश में होने वाले हर प्रकार के जनांदोलनों की यह आवाज़ बनते गया. नन्द किशोर भगत समाचार से जुड़ उसमें नयापन लाने का प्रयास करते रहते थे तो देवेंद्र नैलवाल और लक्ष्मण बिष्ट 'बटरोही' जैसे साहित्यिक लोग भी इसके लिए लिखते रहे.

वर्ष 1984 में प्रदेश के अंदर शराब विरोध में चल रहे आंदोलन की ख़बर को समाचार पत्र ने 'नशा नही रोज़गार दो' शीर्षक से छापा और उसकी वज़ह से जन इस आंदोलन से जुड़ता चला गया. 'अल्मोड़ा मैग्नेसाइट लिमिटेड' को लेकर यह कहा जाता था कि उसकी वज़ह से स्थानीय लोगों को नुक़सान और उद्योगपतियों को फ़ायदा हो रहा है तो वर्ष 1988 में अख़बार ने जनता की आवाज़ बन एक आलेख छापा जिसका शीर्षक था 'ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तराखंड में उग गई है.'

गोविंद पन्त राजू के लखनऊ चले जाने के बाद महेश जोशी ने नैनीताल समाचार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली, उन्होंने अकेले ही समाचार के लिए सदस्यता अभियान चलाया. विजय मोहन सिंह खाती, राजीव नयन बहुगुणा, प्रदीप टम्टा, चंद्रशेखर तिवारी, ताराचन्द्र त्रिपाठी, यशोधर मठपाल, राजशेखर पन्त, दिनेश उपाध्याय भी समय के साथ नैनीताल समाचार से जुड़ते चले गए और ख़बरों का सिलसिला आगे बढ़ता रहा. वर्ष 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बीच हुए मसूरी हत्याकांड पर अख़बार ने ख़बर छापी 'मसूरी : लाशों को बो कर उत्तराखंड के फूल उगाओ.'
नया राज्य बनने के बाद भी नैनीताल समाचार ने जन की ख़बरों को छापना नही छोड़ा और अपना पत्रकारिता धर्म निभाते हुए समाचार पत्र जन की आवाज़ बना रहा. अगस्त 2011 में प्रदेश में बन रहे बांधों से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान पर 'बांध के लिए वन कानून आड़े नही आते' नाम से ख़बर छपी. अख़बार सिर्फ़ उत्तराखंड ही नही राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी अपनी राय मज़बूती के साथ रखता रहा.

शेखर पाठक के अनुसार नैनीताल समाचार की यह विशेषता रही है कि उसके सदस्यों में अधिकतर सदस्यों के आंदोलनकारी होने बावजूद उसने दूसरा पक्ष भी अपने पाठकों के सामने अच्छे तरीके से रखा.

नैनीताल समाचार में विशेष

आज जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान है तब भी बहुत से क्षेत्रीय व राष्ट्रीय समाचार पत्र, वेब पोर्टल्स वहां घटित कोई घटना पर किसी अन्य की ली तस्वीरों, वीडियो के माध्यम से अपनी ख़बर देते हैं पर आज से चार दशक पहले जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान नही था तब वहां घटित किसी आपदा में नैनीताल समाचार के संवाददाता पहुंच जाते थे और अपने पाठकों तक ग्राउंड रिपोर्ट पहुंचाते थे.

नैनीताल समाचार अपने पाठकों के साथ जुड़ने के लिए नए-नए प्रयोग करता रहा है. 1990 में चल रहे आरक्षण आंदोलन के दौरान दो पृष्ठ के परिशिष्ट छाप सड़कों पर बेचे गए थे. वर्ष 1993 में राकेश लाम्बा द्वारा शुरू गई निबंध प्रतियोगिता का नैनीताल के छात्रों को अब भी इंतज़ार रहता है.

साल 1994 के राज्य आन्दोलन के दौरान नैनीताल समाचार का 'सांध्यकालीन उत्तराखंड बुलेटिन' बेहद लोकप्रिय हुआ. 3 सितंबर से 25 अक्टूबर तक नैनीताल के दो स्थानों पर रेडियो बुलेटिन की तर्ज़ पर बुलेटिन पढ़ा गया. जिसका प्रयोग बाद में देश के अन्य हिस्सों दिल्ली के जंतरमंतर, उत्तराखंड के गोपेश्वर और उत्तरकाशी में भी किया गया. अंटार्कटिक की धरती पर पहली बार गए पत्रकार गोविंद पन्त राजू की डायरी भी बहुत लोकप्रिय हुई.

समाचार पत्र में चिट्ठी पत्र, सौल कठौल और आशल कुशल भाग अपने आप में अनोखे हैं. 'आशल कुशल' उत्तराखंड की जिलावार ख़बरों से एकसाथ रूबरू करवाता है.
साहित्य अंक, पर्यावरण अंक, होली अंक, हरेला अंक एक नया प्रयोग थे. होली अंक में होली के गीत रंगीन पृष्ठों पर प्रकाशित होने के बाद उत्तराखंड की होली का अहसास कराते अलग ही आनन्द देते हैं. उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला के लिए हर साल एक विशेष हरेला अंक आता है, अंक के साथ पाठकों के लिए हरेले का तिनका भी भेजा जाता है. होली अंक और हरेला अंक के यह प्रयोग भारत या विश्व के किसी समाचार पत्र में शायद ही देखने को मिले.

इतिहासकार शेखर पाठक बताते हैं कि सौल कठौल स्तम्भ को देख नैनीताल समाचार की रचनात्मकता की तारीफ़ तब के वरिष्ठ पत्रकार कैलाश साह ने भी की थी.

नैनीताल समाचार को लेकर दो भावनात्मक किस्सों को याद करते हुए शेखर पाठक कहते हैं कि लखनऊ में उन्होंने किसी के घर में हरेले अंक को फ्रेम किया हुआ देखा था और ऐसे ही किसी ने वहां अपने घर के ड्राइंग रूम की टेबल में उसका होली अंक फिक्स किया था.

शेखर पाठक ने कहा नैनीताल समाचार में फ़ैज़ की कविताओं के पोस्टर अपने आप में अनोखे होते थे. तवाघाट घटना पर लेटर प्रेस में मेटल को टेढ़ा कर नक्शा बनाया गया था, तकनीक के अभाव में भी समय से आगे की सोच वाले ऐसे बहुत से प्रयोग नैनीताल स्थित नैनीताल समाचार के कार्यालय में देखे जा सकते हैं.

डिजिटल पत्रकारिता में नैनीताल समाचार और चुनौती

नैनीताल समाचार की वेबसाइट है और इसके पुराने अंकों को अशोका यूनिवर्सिटी ने अपनी वेबसाइट में संरक्षित किया है.

समय के साथ बहुत से नए साथी भी नैनीताल समाचार के साथ जुड़ते रहे पर नैनीताल समाचार अपने साथ किसी अन्य की आर्थिक जरूरत कभी पूरी नही कर पाया इसलिए कोई भी इससे लंबे समय तक नही जुड़े रहा.

 नैनीताल समाचार का डिजिटल कार्य देखने वाली विनीता यशस्वी कहती हैं कि वाट्सएप ग्रुप 'समाचार की टीम' में समाचार के भविष्य को लेकर समय-समय पर रणनीति बनाई जाती है.
नैनीताल समाचार में 17 सितंबर 2020 को प्रकाशित आलेख '18 सितंबर नैनीताल क्लीनअप डे : क्या देश कुछ अनोखा देखेगा' पढ़ने के बाद नैनीताल में स्वच्छता अभियान से जुड़ी संस्था 'ग्रीन आर्मी' के जय जोशी कहते हैं कि यह आलेख पढ़ने के बाद उनमें कुछ करने का जोश भर गया. वर्ष 2021 के अप्रैल अंक की ख़बर 'ये आग तो बुझ जाएगी, मगर सवाल तो सुलगते रहेंगे' के साथ उत्तराखंड की वनाग्नि पर सवाल उठाते नैनीताल समाचार भारतीय हिंदी पत्रकारिता में अपना काम करते जा रहा है.

शेखर पाठक कहते हैं कि समाचार से नए लोग अधिक संख्या में जुड़ने चाहिए, जिससे युवाओं के बीच भी यह लोकप्रिय हो. फेक न्यूज़ के सहारे कोई अधिक समय तक नही टिक सकता. समाचार की दुनिया में वही टिके रहेगा जो रचनात्मकता के साथ सही खबरें दिखाएगा. इन सब के लिए नैनीताल समाचार को आर्थिक रूप से मज़बूत करने की योजना भी बनानी होगी.

हिमांशु जोशी.

Monday, May 19, 2025

शब्द रहेंगे तो साहित्य रहेगा, साहित्य रहेगा तो समाज सचेत रहेगा।


पढ़ने की संस्कृति खत्म हो रही है और इस दौर में एक लेखक के बनने की यात्रा के साथ-साथ वर्तमान समय में लेखकों के सामने खड़ी नई चुनौतियों के बारे में पढ़ना और भी जरूरी हो जाता है।

पढ़ाई और रोज़गार के लिए घर से दूर चले जाने पर बना एक लेखक।

हिंदी साहित्य जगत में परिचित नाम लेखक नवीन जोशी की कहानी भी शेखर जोशी से बहुत हद तक मिलती-जुलती है। दिवंगत शेखर जोशी पलायन कर कई साल पहले उत्तर प्रदेश के पहाड़ों (जो अब उत्तराखंड के पहाड़ हैं) से मैदानी राज्य राजस्थान पहुंचे और लेखक बने थे। वैसे ही नवीन जोशी भी पहाड़ों से लखनऊ पहुंचे थे।
नवीन जोशी में अपने गांव के छूटने का दर्द हमेशा जिंदा रहा और उसी दर्द ने उन्हें लेखक बना दिया।

अखबारों में लिखते हुए साहित्य रचना शुरू करने वाले नवीन जोशी आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान, राजेश्वर प्रसाद सिंह कथा सम्मान, गिर्दा स्मृति सम्मान समेत कई अन्य सम्मानों से सम्मानित हैं।
उत्तराखंड के गणाई-गंगोली क्षेत्र के रैंतोली गांव के मूल निवासी नवीन जोशी से जब उनके अंदर के लेखक की कहानी पूछी जाती है, तो वे अपने बचपन को याद करते हैं। वह कहते हैं उनके गांव से प्राथमिक विद्यालय दूर था, जिस कारण उन्हें विद्यालय नहीं भेजा गया। लखनऊ में काम करने वाले उनके पिता उन्हें छह-सात साल की उम्र में पढ़ाने के लिए अपने साथ ले गए। उनकी मां गांव में ही रहती थीं।
नवीन जोशी बताते हैं कि उस समय ऐसा ही होता था, घर के पुरुष पढ़ाई और रोजगार के लिए घर से दूर चले जाते थे और महिलाएं गांव व घर संभालती थीं।

गांव की याद से लिखना शुरू हुआ।

नवीन जोशी ने कक्षा तीन से लखनऊ में अपनी पढ़ाई शुरू की, जहां उन्हें अपने गांव की बहुत याद आती थी।
पिता दिन में अपनी नौकरी पर चले जाते थे, तो वे घर में अकेले रह जाते थे।
नवीन बताते हैं कि तब मैं रोते हुए अपनी मां और गांव के बिछड़े दोस्तों को चिट्ठी लिखता था।
उन्होंने एक डायरी में पहाड़ की यादों को लिखना शुरू किया और इसी से उनका लेखन का सिलसिला शुरू हुआ।
लखनऊ के जिस इलाके में नवीन रहते थे, वहां पहाड़ी लोग बहुत थे।
उत्तराखंड के गांवों से आए ये लोग अपने बेटों, भाइयों और भतीजों को शिक्षा या नौकरी के लिए गांव से लाकर अपने साथ रखते थे।
लखनऊ के कई लोग वहां अपने घरों के लिए पहाड़ी नौकर, ड्राइवर आदि ढूंढने भी आया करते थे।
नवीन को धीरे-धीरे अखबार पढ़ने का शौक लग गया।
वे कहते हैं कि मैंने आठवीं कक्षा में पहाड़ पर एक लेख लिखकर 'स्वतंत्र भारत' अखबार के लिए भेजा था।
उस लेख में उन्होंने पाठकों को संबोधित करते हुए लिखा था, 'तुम गर्मियों की छुट्टी में पहाड़ जा रहे हो। तुम्हें पहाड़ बुला रहे हैं, लेकिन तुम वहां की सुंदरता के साथ-साथ वहां का दर्द भी देखना। तुम यह देखना कि वहां औरतें कैसे घर का काम करती हैं और खतरनाक पहाड़ियों से घास काटती हैं।
तुम यह भी देखकर आना कि वहां के लड़के शहरों में जाकर होटलों में झाड़ू लगाते हैं और बर्तन मांजते हैं।'

उनका यह लेख 'स्वतंत्र भारत' में छप गया, जिससे उन्हें आगे लिखने का हौसला मिला।

शेखर पाठक का प्रभाव।

धीरे-धीरे नवीन जोशी की सामाजिक समझ बढ़ी और हाईस्कूल में प्रथम श्रेणी आने पर मोहल्ले में उनका बड़ा नाम हुआ।
इसी बीच, भविष्य में बड़ा नाम बनने वाले शेखर पाठक भी अल्मोड़ा से बीए करने के बाद नौकरी की तलाश में लखनऊ पहुंचे थे।
शेखर पाठक पीडब्ल्यूडी में नौकरी करने लगे और संयोग से नवीन जोशी के मोहल्ले में ही रहने आ गए।
नवीन जोशी कहते हैं जब मैं शेखर पाठक से मिला, तो वे 'दिनमान' और अन्य पत्रिकाएं पढ़ते थे और कहानियां लिखते थे।
मैं भी उनके साथ सुबह-शाम बैठने लगा, 'दिनमान' पढ़ने लगा और कहानियां लिखकर उन्हें दिखाने लगा।
शेखर पाठक की संगत से नवीन जोशी को समाज के बारे में नई समझ बनी और उनका दायरा बढ़ा।
कुछ समय बाद शेखर पाठक उच्च शिक्षा के लिए वापस अल्मोड़ा चले गए।
लेकिन तब तक शेखर पाठक के माध्यम से नवीन जोशी आकाशवाणी लखनऊ से जुड़ गए थे।
वहां बंसीधर पाठक 'जिज्ञासु' की संगत में रहने से नवीन की कुमाऊंनी बोली की कविताएं और कहानियां आकाशवाणी से प्रसारित होने लगीं।
आकाशवाणी में उन्हें अपने जैसे कई जोशीले पहाड़ी युवा और वरिष्ठ रचनाकार मिले।
अपनी किताब 'ये चिराग जल रहे हैं' में उन्होंने इन्हीं रचनाकारों और कलाकारों के संस्मरण लिखे हैं।
पत्रकारिता से मिला दुनिया का अनुभव।
अब नवीन जोशी का अखबारों में लिखना भी बढ़ता जा रहा था।
उनकी कहानियां अखबारों द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुकी थीं।
ग्रेजुएशन करते समय नवीन को 'स्वतंत्र भारत' अखबार से नौकरी का प्रस्ताव मिला।
पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका पहाड़ वापस लौटने का इरादा था, पर वे पत्रकारिता में रम गए।
उन्हें लगने लगा था कि पत्रकारिता से समाज में बदलाव लाया जा सकता है।
इस कारण उन्होंने पहाड़ लौटने का अपना इरादा त्याग दिया और पूरी तरह पत्रकारिता में डूब गए।
अखबार में नौकरी करते हुए नवीन ने काफी यात्राएं कीं और देश-दुनिया के अखबार पढ़े।
इन सब से उनका सोचने-समझने का दायरा और भी बढ़ता गया।
उत्तराखंड से संपर्क नहीं टूटा।
वे पहाड़ लौट तो नहीं पाए, लेकिन पहाड़ के लोगों से उनका लगातार संपर्क बना रहा।
शेखर पाठक की वजह से वे राजीव लोचन साह, शमशेर सिंह बिष्ट, गिर्दा आदि से जुड़े।
साल 1977 में 'नैनीताल समाचार' की शुरुआत से ही उनका कॉलम 'एक प्रवासी पहाड़ी की डायरी' प्रकाशित होने लगा।
साल 1984 में उन्होंने देवेन मेवाड़ी के साथ करीब पंद्रह दिन 'अस्कोट आराकोट यात्रा' के एक उप मार्ग में हिस्सा लिया।
इसमें वे गढ़वाल व कुमाऊं के कई गांवों तक पैदल गए और पहाड़ को करीब से देखा।
उन दिनों को याद करते हुए नवीन जोशी कहते हैं आंदोलनों में शामिल होने के लिए मैं लखनऊ से पहाड़ों में पहुंच जाता था।

वे 'नशा नहीं, रोजगार दो' आंदोलन में भी शामिल रहे। पहाड़ के हालात पर उनके मन में साल 1990 में पहली बार 'दावानल' उपन्यास लिखने का विचार आया, पर उस विचार को कलम का साथ मिलने का वक्त अभी नहीं आया था।

पत्रकारिता से बढ़ी रचनात्मकता।

वे राजेंद्र माथुर के संपादन वाले 'नवभारत टाइम्स' अखबार में काम करने लगे।
इस दौरान नवीन जोशी का कहानियों और कविताओं को लिखने का सिलसिला बढ़ता गया।
वे कहते हैं कोई ठंड या भूख से मर गया या कोई मजदूर दिन भर की मजदूरी के बाद अपने घर लौटते समय सब्जी ले जाते ट्रक से दबकर मर गया, तो ये खबरें पीड़ा से भरी और यातनादायक होती थीं।

मुझे लगता था कि ये खबरें यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए।
अखबारों में ऐसी घटनाएं छोटी-सी खबर बनकर खत्म हो जाती थीं, लेकिन वहीं से उनकी कोई कहानी या लेख शुरू होता था।
इस तरह उनकी रचनात्मकता को पत्रकारिता ने बढ़ावा ही दिया।
नवीन जोशी का कहानी संग्रह 'अपने मोर्चे पर' साल 1992 में प्रकाशित हो गया था।
साल 2002 में वे 'हिन्दुस्तान' अखबार में संपादक बनकर पटना पहुंचे।
उस समय बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे।
नवीन जोशी कहते हैं बिहार के हालात बहुत खराब थे। वहां ये पता नहीं चलता था कि सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क। साठ किलोमीटर की दूरी चार घंटे में पूरी होती थी।
एक बार मैंने किसी से कहा था कि जहां गरीब मुसहर लोग रहते हैं, जो चूहे पकड़कर खाते हैं, मुझे उनके गांव ले चलो। मुझे जवाब मिला कि वहां सड़क नहीं है। जब बाढ़ आएगी, तब वहां नाव चलेगी, तभी उस गांव तक पहुंच पाएंगे।

इन अनुभवों से नवीन जोशी के अंदर का लेखक और पैना होने लगा।
नवीन जोशी के अनुसार, पहाड़ और बिहार का दर्द एक-सा है, बस भूगोल का फर्क है।
दोनों प्रदेशों में गरीबी एक जैसी है और दोनों जगह के लोग बड़े शहरों में जाकर छोटी-मोटी नौकरियां करने को मजबूर हैं।
प्रतिभाएं भी इन दोनों जगहों पर भरपूर हैं।
उपन्यासों की शुरुआत।
पटना में रहते हुए ही उन्हें अपना पहला उपन्यास 'दावानल' पूरा करने का विचार आया।
उन्होंने साल 2002 में 'दावानल' लिखना शुरू किया, दिन में वे नौकरी करते थे और रात में उपन्यास लिखते थे।
दो साल बाद उनका लखनऊ तबादला हो गया और फिर उन्होंने इस उपन्यास को संपादित किया।
प्रकाशक को यह अच्छा लगा और इसे छपने में कोई दिक्कत नहीं हुई।
'दावानल' उपन्यास साल 1972-73 से 1984 तक चले चिपको आंदोलन के भटकाव पर आधारित है।
यह बताता है कि कैसे यह आंदोलन पर्यावरणविदों की वजह से सिर्फ पेड़ बचाने तक सिमट गया, जबकि यह मुख्य रूप से जंगलों पर स्थानीय लोगों के अधिकारों के लिए था।
पहाड़ के प्रवासियों की पीड़ा भी इसका प्रमुख हिस्सा है।
उनका दूसरा उपन्यास 'टिकटशुदा रुक्का' है। नवीन कहते हैं बचपन में मैंने अपने गांव में शिल्पकारों के साथ छुआछूत और भेदभाव देखा था। उनका शोषण किया जाता था। साल 1980 में कफल्टा कांड हुआ, तो मैंने इसी विषय पर लिखने की ठान ली थी।

इस उपन्यास का भी साहित्य जगत में स्वागत हुआ।
नवीन जोशी का तीसरा उपन्यास 'देवभूमि डेवलपर्स' है, इसमें 'दावानल' के आगे की कहानी है।
नवीन जोशी कहते हैं जब चिपको आंदोलन ठंडा पड़ने लगा था, तब 'नशा नहीं, रोजगार दो' आंदोलन शुरू हुआ था। इस उपन्यास में तब से आज तक के उत्तराखंड की कहानी है।
'देवभूमि डेवलपर्स' में उत्तराखंड के जन आंदोलनकारी संगठनों में टूट, राजनीतिक दलों की चालबाजियां और संसाधनों की लूट पर लिखा गया है।
इसे पढ़ने से पता चलता है कि उत्तराखंड के गांवों से पलायन क्यों होता है और कैसे ठेकेदारों, दलालों और नेताओं ने उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन पर कब्जा जमा लिया है।

पहाड़ पर केंद्रित लेखन।

नवीन जोशी बताते हैं कि पहाड़ मेरे लेखन के केंद्र में है। मेरे तीनों उपन्यासों का विषय उत्तराखंड पर केंद्रित है।
मेरी कई कहानियां भी पहाड़ पर आधारित हैं। मैं सामाजिक स्थितियों के बारे में लिखता हूं। जैसे, मैंने एक कहानी में लिखा है कि समाज में सांप्रदायिकता कैसे बढ़ रही है।

कुछ कहानियों का विषय पर्यावरण भी है। उनमें लिखा है कि शहरों से गौरैया कैसे गायब हो रही हैं या आकाश से तारे कैसे खो गए। एक कहानी का मुख्य पात्र तारे देखने के लिए पहाड़ की याद करता है।
हाल ही में उनकी किताबें 'बाघैन' और 'भूतगांव', संभावना और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं।
ये दोनों किताबें आज बुरे दौर से गुजर रहे उत्तराखंड की तस्वीर और तकदीर दिखाती हैं।

'अपने मोर्चे पर', 'राजधानी की शिकार कथा', 'मीडिया और मुद्दे', और 'लखनऊ का उत्तराखंड' नवीन जोशी की अन्य रचनाएं हैं।

लेखन से आजीविका बड़ी मुश्किल, फिर भी लिखना तो है ही।

साल 2014 में 'हिंदुस्तान' से रिटायर होकर करीब एक साल 'दैनिक भास्कर' में काम करने के बाद नवीन जोशी सक्रिय पत्रकार नही रहे और स्वतंत्र पत्रकारिता के साथ रचनात्मक लेखन में लग गए।
लेखन से आजीविका पर नवीन जोशी कहते हैं हिंदी में स्वतंत्र लेखक अपनी आजीविका नहीं चला सकते। पारिश्रमिक की स्थितियां बेहद खराब हैं। मैं भी अगर पत्रकारिता नहीं करता, तो परिवार नहीं पाल सकता था। मेरी पत्नी भी नौकरी करती थी, इसलिए घर चलाने में कभी दिक्कत नहीं हुई।
इसका कारण पूछने पर वे कहते हैं, हिंदी किताबें अधिक नहीं बिकतीं। पांच सौ से एक हजार प्रतियों के संस्करण बिकने पर हिंदी लेखक खुश हो जाते हैं। प्रकाशक लेखकों से सच छुपाते हैं और उन्हें किताबों की बिक्री व आवृत्तियों के बारे में सही विवरण नहीं देते। लेखकों को समय पर रॉयल्टी भी नहीं मिलती। इसके लिए लेखकों को प्रकाशकों को बार-बार चिट्ठी लिखनी पड़ती है।
पिछले दिनों साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल ने इस बारे में अपनी दुखद कहानी बताई, तो कुछ चर्चा हुई थी।

नवीन जोशी आगे कहते हैं, कुछ नए प्रकाशक पारदर्शिता बरत रहे हैं। अंग्रेजी किताबों में ऐसी स्थिति नहीं है। वहां लेखकों को प्रकाशन के अनुबंध के पैसे मिलते हैं, रॉयल्टी से अलग।
लेखन में पैसा न होने पर भी लिखते रहना चाहिए या नहीं, इस पर नवीन जोशी कहते हैं कि लिखना जरूरी है। यदि हम सामाजिक और राजनीतिक रूप से सचेत हैं, तो हमें लिखना चाहिए।

प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। आजीविका नहीं चलती, तो भी लिखना बंद नहीं किया जा सकता। लोगों को पढ़ना चाहिए। समाज की सामूहिक राय साहित्य और पत्रकारिता से बनती है।
पत्रकारिता की प्रतिक्रिया तत्काल होती है, लेकिन साहित्य का असर दीर्घकालिक होता है। साहित्य समाज का आईना होता है और धैर्य मांगता है। कहानी लिखकर समाज रातोंरात नहीं बदलता, लेकिन छपे हुए का असर दशकों और शताब्दियों तक रहता है। जैसे भारतेंदु को पढ़कर हम तत्कालीन भारतीय समाज को समझ सकते हैं, वैसे ही ओ हेनरी को पढ़कर हम अमेरिकी समाज को समझ सकते हैं।
माध्यम बदलेंगे, पर शब्द तो वही रहेंगे।
ई-बुक के बढ़ते चलन पर नवीन जोशी कहते हैं, पहले टेलीफोन डायरी होती थी, अब उसे कोई नहीं रखता। फोन में ही सबके नंबर मिल जाते हैं। वैसे ही माध्यम बदलते रहेंगे, पर शब्द वही रहेंगे।

शब्द रहेंगे तो साहित्य रहेगा और साहित्य रहेगा तो समाज सचेत रहेगा।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may


आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

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