Tuesday, May 27, 2025

आज भी प्रासंगिक है नेहरू का 'अखबारों की आजादी'

सत्साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक 'हिंदुस्तान की समस्याएं' किताब का आठवां संस्करण साल 1955 में आया था। इस किताब में प्रेस की आजादी पर जवाहरलाल नेहरू ने 'अखबारों की आजादी' आलेख लिखा है।
 साल 2025 में, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर है, जो "बहुत गंभीर" श्रेणी में आता है। यह गिरावट मीडिया स्वामित्व के केंद्रीकरण, पत्रकारों पर हमलों, और सरकारी दबाव के कारण हुई है। भारत पाकिस्तान तनाव के बीच भी स्वतंत्र मीडिया पोर्टल 'द वायर' और 'द कश्मीरियत' जैसी वेबसाइटों को सेंसर किया गया था, जिससे जवाहरलाल नेहरू के इस आलेख की अहमियत और भी बढ़ जाती है।

कमजोर से कमजोर अखबारों को सरकारी दबाव का शिकार होने देना खतरे की बात है।

प्रेस की आजादी पर जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं, मैं अखबारों की आजादी का बहुत ज्यादा कायल हूं। मेरे ख्याल से अखबारों को अपनी राय जाहिर करने और नीति की आलोचना करने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। हां, इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि अखबार या इंसान द्वेष भरे हमले किसी दूसरे पर करें या गंदी तरह की अखबार नवीसी में पड़े, जैसे कि हमारे आजकल के कुछ सांप्रदायिक पत्रों की विशेषता है। लेकिन मेरा पक्का यकीन है कि सार्वजनिक जीवन का निर्माण आजाद अखबारों की नींव पर होना चाहिए। 

मशहूर राष्ट्रवादी अखबार, जिन्होंने अपनी स्थिति बना ली है, बड़ी हद तक खुद अपना ख्याल रख सकते हैं। उन पर कोई मुसीबत आती है तो जनता का ध्यान उनकी तरफ जाता है। मदद भी उन्हें मिलती है। पर छोटे और ऐसे अखबार हैं जिनका नाम थोड़ा ही है, उनमें सरकार अक्सर दखल देती है, क्योंकि उनकी प्रसिद्धि उतनी नहीं है। फिर भी हमारे छोटे छोटे और कमजोर से कमजोर अखबारों को सरकारी दबाव का शिकार होने देना खतरे की बात है, क्योंकि ज्यों ज्यों दबाव पड़ता है, त्यों त्यों दबाव डालने की आदत बढ़ती जाती है और उससे धीरे-धीरे जनता का मन सरकार द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किए जाने का आदी हो जाता है। 

इसलिए पत्रकारों की एसोसिएशन तथा सब अखबारों के लिए यह जरूरी है कि कम मशहूर अखबारों तक के मामलों को यों ही न जाने दें। अगर वे प्रेस की आजादी बनाए रखने के ख्वाहिश मन्द हैं तो उन्हें सजग रह कर इस आजादी की रक्षा करनी चाहिए और हर प्रकार के अतिक्रमण को, फिर वह कहीं से भी हो, रोकना चाहिए। यह राजनैतिक विचारों या मतों का ही मामला नहीं है। जिस घड़ी हम उस अखबार पर हमला होने में अपनी रजामंदी दे देते हैं, जिससे हमारा मतभेद है तभी उसूलन हम अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं और जब हमारे ऊपर हमला होता है तो उसका मुकाबला करने में शक्ति हमेमें बाकी नहीं रहती।

हम उन चीजों को भी छपने दें, जिन्हें हम पसंद नहीं करते।

इसी आलेख में आगे लिखा है, प्रेस की आजादी इसमें नहीं है कि जो चीज हम चाहें, वही छप जाए। एक अत्याचारी भी इस तरह की आजादी को मंजूर करता है। प्रेस की आजादी इसमें है कि हम उन चीजों को भी छपने दें, जिन्हें हम पसंद नहीं करते। हमारी अपनी भी जो आलोचनाएं हुई हैं, उन्हें भी हम बर्दाश्त कर रहे हैं और जनता को अपने विचारों को जाहिर कर लेने दें जो हमारे पक्ष के लिए नुकसानदेह ही क्यों ना हो, क्योंकि बड़े लाभ या अंतिम ध्येय की कीमत पर क्षणिक लाभ पाने की कोशिश करना हमेशा एक खतरे की बात है। अगर गलत माप कायम करते हैं और गलत तरीके अख्तियार करते हैं, चाहे इस यकीन से भी कि हम एक ठीक पक्ष को समर्थन दे रहे हैं, तो भी उन मापों और तरीकों का प्रभाव उस ठीक पक्ष पर भी पड़ेगा और उसमें दुराग्रह भर जाएगा। जो ध्येय हमारे सामने हैं, वह कुछ अंश में उन्हीं मापों और साधनों द्वारा नियंत्रित होगा और शायद उसका अंतिम परिणाम भी सर्वथा भिन्न हो, जिसकी कि हमने कल्पना भी न की थी।

हिमांशु जोशी।
@himanshu28may

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