सत्साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित जवाहरलाल नेहरू की किताब 'हिंदुस्तान की समस्याएं' का आठवां संस्करण 1955 में आया था. इसके 'अखबारों की आजादी', 'भारत और पाकिस्तान की समस्याएं' और 'भारत की वैदेशिक नीति' सहित अन्य आलेख आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं.
प्रेस की आजादी की बात करें तो साल 2025 में, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर है, जो "बहुत गंभीर" श्रेणी में आता है.
भारत - पाक तनाव आज भी वैसा ही बना हुआ जैसा सालों पहले था.
सार्वजनिक जीवन का निर्माण आजाद अखबारों की नींव पर होना चाहिए.
प्रेस की आजादी पर लिखे 'अखबारों की आजादी' में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है कि मैं अखबारों की आजादी का बहुत ज्यादा कायल हूं. मेरे ख्याल से अखबारों को अपनी राय जाहिर करने और नीति की आलोचना करने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए. हां, इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि अखबार या इंसान द्वेष भरे हमले किसी दूसरे पर करें या गंदी तरह की अखबार नवीसी में पड़े, जैसे कि हमारे आजकल के कुछ सांप्रदायिक पत्रों की विशेषता है. लेकिन मेरा पक्का यकीन है कि सार्वजनिक जीवन का निर्माण आजाद अखबारों की नींव पर होना चाहिए.
मशहूर राष्ट्रवादी अखबार, जिन्होंने अपनी स्थिति बना ली है, बड़ी हद तक खुद अपना ख्याल रख सकते हैं. उन पर कोई मुसीबत आती है तो जनता का ध्यान उनकी तरफ जाता है. मदद भी उन्हें मिलती है. पर छोटे और ऐसे अखबार हैं जिनका नाम थोड़ा ही है, उनमें सरकार अक्सर दखल देती है, क्योंकि उनकी प्रसिद्धि उतनी नहीं है. फिर भी हमारे छोटे छोटे और कमजोर से कमजोर अखबारों को सरकारी दबाव का शिकार होने देना खतरे की बात है, क्योंकि ज्यों ज्यों दबाव पड़ता है, त्यों त्यों दबाव डालने की आदत बढ़ती जाती है और उससे धीरे-धीरे जनता का मन सरकार द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किए जाने का आदी हो जाता है.
इसलिए पत्रकारों की एसोसिएशन तथा सब अखबारों के लिए यह जरूरी है कि कम मशहूर अखबारों तक के मामलों को यों ही न जाने दें. अगर वे प्रेस की आजादी बनाए रखने के ख्वाहिश मन्द हैं तो उन्हें सजग रह कर इस आजादी की रक्षा करनी चाहिए और हर प्रकार के अतिक्रमण को, फिर वह कहीं से भी हो, रोकना चाहिए. यह राजनैतिक विचारों या मतों का ही मामला नहीं है. जिस घड़ी हम उस अखबार पर हमला होने में अपनी रजामंदी दे देते हैं, जिससे हमारा मतभेद है तभी उसूलन हम अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं और जब हमारे ऊपर हमला होता है तो उसका मुकाबला करने में शक्ति हमेमें बाकी नहीं रहती.
प्रेस की आजादी इसमें नहीं है कि जो चीज हम चाहें, वही छप जाए.
नेहरू आलेख में यह भी लिखते हैं, प्रेस की आजादी इसमें नहीं है कि जो चीज हम चाहें, वही छप जाए. एक अत्याचारी भी इस तरह की आजादी को मंजूर करता है. प्रेस की आजादी इसमें है कि हम उन चीजों को भी छपने दें, जिन्हें हम पसंद नहीं करते. हमारी अपनी भी जो आलोचनाएं हुई हैं, उन्हें भी हम बर्दाश्त कर रहे हैं और जनता को अपने विचारों को जाहिर कर लेने दें जो हमारे पक्ष के लिए नुकसानदेह ही क्यों ना हो, क्योंकि बड़े लाभ या अंतिम ध्येय की कीमत पर क्षणिक लाभ पाने की कोशिश करना हमेशा एक खतरे की बात है. अगर गलत माप कायम करते हैं और गलत तरीके अख्तियार करते हैं, चाहे इस यकीन से भी कि हम एक ठीक पक्ष को समर्थन दे रहे हैं, तो भी उन मापों और तरीकों का प्रभाव उस ठीक पक्ष पर भी पड़ेगा और उसमें दुराग्रह भर जाएगा. जो ध्येय हमारे सामने हैं, वह कुछ अंश में उन्हीं मापों और साधनों द्वारा नियंत्रित होगा और शायद उसका अंतिम परिणाम भी सर्वथा भिन्न हो, जिसकी कि हमने कल्पना भी न की थी.
काश्मीर का प्रश्न इस ट्रिब्यूनल द्वारा तय नही हो सकता है.
'भारत और पाकिस्तान की समस्याएं' में जवाहरलाल नेहरु ने लिखा, आज या भविष्य में अगर कोई झगड़ा हो तो उसके लिए युद्ध करना दोनों देश निन्दनीय समझते हैं. इसके अलावा यह भी निश्चय हुआ था कि इन दोनों देशों के बीच ऐसे झगड़ों का निपटारा माने हुए शांतिपूर्ण ढंग से किया जाए अर्थात आपस में बातचीत करके या किसी दूसरे दल को बीच में डालकर या किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा, जिसे दोनों देश मानें, आपसी झगड़ों का निपटारा करना चाहिए. इस विषय में दोनों देशों में काफी चिट्टी पत्री हो चुकी है.
उन्होंने इस आलेख में आगे यह भी लिखा है कि हमने एक आम घोषणा का प्रस्ताव तो किया ही था, इसके अलावा हमने दो बड़े विवादात्मक प्रश्नों को सुलझाने के लिए विशेष प्रस्ताव किया था अर्थात निकासी जायजाद और पानी के सम्बन्ध में. हमने कहा था कि एक ट्रिब्यूनल बनाया जाए जिसमें दो जज भारत के और दो पाकिस्तान के हों और ये ऊंची श्रेणी के जज हों. ये लोग इन दो झगड़ों को तय कर दें और हम लोग उनके निर्णयों को मानने के लिए बाध्य हों.
हमने यह प्रस्ताव किया था कि यह ट्रिब्यूनल दूसरे मौजूदा या भविष्य के झगड़ों पर विचार कर सकता है जिनके बारे में समझा जाए कि समझौता हो सकता है. जाहिर है कि राजनैतिक किस्म के ऐसे झगड़े जो अदालती क्षेत्र से बाहर के हैं इस ट्रिब्यूनल के सामने पेश नही हो सकते हैं.
इस समय भारत और पाकिस्तान के बीच में चार बड़े विवादात्मक प्रश्न हैं. काश्मीर, निकासी की जायजाद, नहर का पानी और विनिमय की दर. काश्मीर का प्रश्न इस ट्रिब्यूनल द्वारा तय नही हो सकता है. यह प्रश्न इस समय सुरक्षा परिषद के सामने है. विनिमय दर का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय मानेटरी फंड के पास है और हमें आशा है कि ये लोग शीघ्र ही किसी निर्णय पर पहुंच जाएंगे. हम निकासी की जायजाद और नहर के पानी इन दो प्रश्नों को संयुक्त ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने की तजवीज कर चुके हैं, और इस ट्रिब्यूनल के सामने भविष्य के वे झगड़े भी पेश किये जा सकते हैं, जो इसी प्रकार के हों.
यह कहा गया है कि सम्भव है कि यह ट्रिब्यूनल किसी निश्चय तक न पहुंच सके, क्योंकि हो सकता है कि न्यायाधीश अपने मत के बराबर बराबर बट जाएं. पर हमें इस बात की आशा है कि उच्च श्रेणी के न्यायाधीशों के सामने जो प्रश्न रखे जाएंगे उन पर से बिलकुल निष्पक्ष भाव से विचार करेंगे और ज्यादातर सहमत होंगे. अगर इनमें एकमत नही होता तो दोनों सरकारें स्वयं मिलजुल कर कोई समझौता कर लें या कोई दूसरा तरीका इन झगड़ों को तय करने का निकालें.
मुझे नही मालूम कि किन्हीं दो स्वतंत्र राष्ट्रों ने अपने झगड़ों को तय करने के लिए इससे बेहतर कोई दूसरा तरीका निकाला हो. हमारा प्रस्ताव साफ साफ व्यवहारिक है और समझदारी का है. अगर यह मंजूर हो जाता है तो इससे भारत और पाकिस्तान के बीच इस समय जो खिंचाव पाया जाता है वह जाता रहेगा.
ऐसा करके वे पाकिस्तान की नीति को ही मदद पहुंचा रहे हैं
भारत पाकिस्तान पर अपने विचार रखते जवाहरलाल नेहरू ने 'भारत की वैदशिक नीति' आलेख में लिखा है बदकिस्मती से जिस जनून और उखाड़ पछाड़ से इस देश का बटवारा हुआ वे खत्म नही हुए और बाद की घटनाओं ने उन्हें और उभार दिया. कहा जाता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के सहकारिता सम्बन्धों के रास्ते में बुनियादी कठिनाई काश्मीर की है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि काश्मीर की समस्या दोनों देशों के बीच बुनियादी अंदरूनी झगड़ों से उपजी है. हिंदुस्तान धर्म निरपेक्ष राज्य का समर्थक है और अपने अंगभूत हिस्सों के स्वतंत्र रहने का पक्षपाती है. लेकिन पाकिस्तान साम्प्रदायिक राज्य है, और अपने उद्देश्यों और विचारधारा के कारण अपने दृष्टिकोण में आक्रामक है. आज की दुनिया में ऐसी विचारधारा अजीब सी लगती है, और ऐसे किसी आधुनिक राज्य की कल्पना करना भी मुश्किल है जो कि अपने बहुसंख्यक नागरिकों को यह महसूस कराता हो कि वे हीन हैं और उनके साथ बराबरी का बर्ताव नही किया जा सकता.
हिंदुस्तान में कुछ ऐसे लोग हैं जो मूर्खता और विवेकहीनता के कारण उसी साम्प्रदायिक नीति को बरत रहे हैं जो पाकिस्तान में बरती जा रही है. ऐसा करके वे पाकिस्तान की नीति को ही मदद पहुंचा रहे हैं और भारतीय राज्य की बुनियादी मान्यता को कमजोर कर रहे हैं.
हिमांशु जोशी
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