Friday, November 26, 2021

करोड़ों खर्च कर भी ख़त्म होते नौलों पर बसावट का विस्तार भारी.

विश्व भर में जलवायु परिवर्तन का हो हल्ला मचा हुआ है, जहां पहले नदियां बहती थी वहां सूखा पड़ा हुआ है. बर्फ़ से लदे रह चांदनी रात में चमकने वाले पहाड़ अब काले पड़ गए हैं पर विश्व अभी भी प्रदूषण फैलाने के आरोप-प्रत्यारोप में लगा हुआ है. पर्यावरण के नाम पर करोड़ों रुपए स्वीकृत तो किए जा रहे हैं पर वह ख़र्च कहां होते हैं किसी को नही पता, हममें से बहुतों को यही पता नही है कि प्रदूषण के कारण क्या-क्या हैं और उसके परिणाम क्या मिल रहे हैं. 
ऐसे ही एक कारण की पड़ताल करती यह रिपोर्ट.

सर से ऊपर निकलती मिलियन वाली गणना

वर्ष 2019 की एक खबर थी कि उत्तराखंड राज्य जल नीति-2019 के मसौदे को मंजूरी दी गई है. राज्य में शुरू होने वाली यह जल नीति प्रदेश में उपलब्ध सतही और भूमिगत जल के अलावा हर वर्ष बारिश के रूप में राज्य में गिरने वाले 79,957 मिलियन किलो लीटर पानी को संरक्षित करने की कवायद है.
जल नीति में राज्य के 3,550 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले 917 हिमनदों के साथ ही नदियों और प्रवाह तंत्र को प्रदूषण मुक्त करने और लोगों को शुद्ध पेयजल और सीवरेज निकासी सुविधा उपलब्ध कराने का भी प्रावधान किया गया है.

शायद इस नीति से एक साल में थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ना शुरू हुआ होगा जिससे प्रभावित हो वर्ष 2020 में पीआईबी द्वारा दी गई एक सूचना के अनुसार केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को लिखे पत्र में आश्वस्त किया कि केंद्र सरकार  उत्तराखंड को 2023 तक ‘हर घर जल राज्य’ बनाने में पूरा सहयोग देगी.
जल शक्ति मंत्री ने पत्र में बताया था कि उत्तराखंड को हर घर में नल से जल पहुंचाने की इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए इस वित्त वर्ष में केंद्र की ओर से 362॰57 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है. यह राशि वर्ष 2019-20 में इस कार्य के लिए दी गई 170॰53 करोड़ के दोगुने से भी अधिक है. पत्र में बताया गया कि इस अभियान के लिए राज्य सरकार के पास इस समय इस अभियान के लिए 480.44 करोड़ की बड़ी राशि उपलब्ध है जिसमें राज्य सरकार का अंशदान और पिछले वर्ष उपयोग न लाई जा सकी राशि शामिल है. 

इंडिया वाटर पोर्टल के अनुसार इसी मुहिम को आगे बढ़ाते हुए उत्तराखंड सरकार ने बजट 2020-21 में 1165 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है.
1165 करोड़ रुपये की लागत से प्रदेश के लोगों को पीने का साफ पानी मिल सकेगा.

पानी को लेकर एक ग्राउंड रिपोर्ट

करोड़ो रुपयों लगा साफ पानी उपलब्ध कराने वाली बात का अगर आपको एक बार के लिए भरोसा हो भी जाए तो आज आप पहाड़ों में जाकर वास्तविक स्थिति देख अपना विचार पलट सकते हैं.

नैनीताल जिले में उत्तराखंड के नौलों को पुनर्जीवित करने के लिए पीपुल्स साइंस इंस्टिट्यूट देहरादून की टीम 'जल स्वराज़ अभियान' के तहत 'जीवन मांगल्य ट्रस्ट उत्तराखंड, गुजरात' के साथ काम कर रही है. पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट के रिसर्च टीम मेम्बर इकबाल एहमद बताते हैं कि यहां के नौलों में पीएच और टीडीएस ठीक है पर हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों की तरह ही यहां नौलों के पानी में जो मुख्य समस्या दिख रही हर वह फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया के पाए जाने की है.

फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया कुल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का एक उप-समूह है. वे लोगों और जानवरों की आंतों और मल में बड़ी मात्रा में दिखाई देते हैं.

फेकल कोलीफॉर्म के बारे में गूगल सर्च करने पर पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए चिंतित दिखते और करोड़ों खर्च करने वाले भारत से जुड़ी ज़्यादा खबरें नही दिखती, जितने भी सर्च रिज़ल्ट आते हैं उनमें ज्यादा अमरीका के हैं. उसमें ही एक जगह यह सवाल मिला कि अगर मेरे पानी में फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया या ई. कोलाई की पुष्टि हो जाए तो क्या होगा? 

जिसका जवाब था पानी की व्यवस्था में फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया या ई. कोलाई की पुष्टि हाल ही में मल संदूषण का संकेत देती है, जो पानी का सेवन करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए तत्काल स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है. स्वास्थ्य आपात स्थिति का जवाब देना राज्य के स्वास्थ्य विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकता है. सभी जल उपयोगकर्ताओं को सचेत करने के लिए 24 घंटे के भीतर एक "स्वास्थ्य परामर्श" जारी किया जाएगा कि पानी की आपूर्ति से जुड़ा स्वास्थ्य जोखिम है. ज्यादातर मामलों में, पीने और खाना पकाने के लिए उबला हुआ या बोतलबंद पानी के उपयोग की सिफारिश की जाएगी. एक नोटिस ग्राहकों को समस्या ठीक करने के लिए की जा रही कार्रवाइयों के बारे में सूचित करेगा और यह भी बताएगा कि कब तक समस्या का समाधान होने की संभावना होगी. विभाग जल्द से जल्द व्यवस्था का निरीक्षण कर पेयजल व्यवस्था की समस्या के समाधान में सहयोग करेगा. संभावित संदूषण स्रोतों को खोजने और खत्म करने के लिए और अधिक पानी के नमूने लिए जाएंगे, स्वास्थ्य परामर्श तब तक प्रभावी रहेगा जब तक स्थिति का समाधान नहीं हो जाता और पानी पीने के लिए सुरक्षित नहीं हो जाता.

यह सवाल जवाब पढ़ने के बाद मुझे भारत की वह तस्वीर याद आती है जिसमें बिना वस्त्र गरीब बच्चे होते हैं और पश्चिमी लोग अपने भारत भ्रमण के दौरान उसे 'poor india' कैप्शन के साथ साझा करते हैं. दूषित पानी पीने की वज़ह से बीमार बच्चों को पहले तो उसकी सही वज़ह मालूम नही रहती होगी और अगर चल भी जाए तो हमारी स्वास्थ्य सेवा उसे कितनी जल्दी ठीक करती होंगी.

फेकल कोलीफॉर्म प्रसार को रोकने के उपायों पर इकबाल एहमद कहते हैं कि सबसे जरूरी है कि वाटर रिचार्ज वाली जगहों पर शौंच न करी जाए और जानवरों को भी वहां से दूर ही रखा जाए. सेप्टिक टैंक के साथ बनने वाले सोख्ता गड्ढ़ों को भी वाटर रिचार्ज वाली जगह नही बनाना चाहिए.

अपने काम मे लगा है समाज

जल प्रदूषण जैसी जानकारियों को जन के साथ साझा करते पीएसआई और जीवन मांगल्य ट्रस्ट जैसी संस्थाए अपना काम कर रही हैं और जल बचाने का अभियान जारी रखे हुए हैं.

पानी के प्रदूषण को जांचने के साथ ही उन्होंने पहाड़ों में  चाल-खाल बनाने का कार्य भी शुरू किया है. उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से पानी रोकने के लिए बनाए जाने वाले तालाबों को चाल व खाल कहते हैं, इनकी वजह से जमीन में नमी बनी रहती है.

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड.

Monday, November 22, 2021

लंबी दूरी वाले रिश्तों की कहानी बन बड़े काम कर गई 'मीनाक्षी सुंदरेश्वर'.


लीक से हटकर लिए गए डिजिटल इंडिया के long distance relationship विषय पर बनी इस  हल्की-फुल्की कॉमेडी फ़िल्म में महफ़िल लूट ले गई हैं सान्या मल्होत्रा.

बहुत कम फिल्में शुरुआत या अंत में आने वाली इंट्रो लाइनों के माध्यम से कुछ कह पाती हैं पर मीनाक्षी सुंदरेश्वर यह कमाल करती है. 
एक अरेंज मैरिज के पूरे सेटअप को फ़िल्म की कहानी हल्के-फुल्के अंदाज़ में दिखाती है जिससे दर्शक गुदगुदाते भी हैं. मीनाक्षी और सुंदरेश्वर की पहली मुलाकात एक गलती की वज़ह से होती है, सुंदरेश्वर का कोट पहन मीनाक्षी द्वारा उसका ही इंटरव्यू लेने वाला दृश्य फ़िल्म के कुछ बेहतरीन दृश्यों में पहला है. 
सुंदरेश्वर की शर्ट के साथ मीनाक्षी का आलिंगन वाला दृश्य भी खूबसूरत हैं.
 दम्पत्ति की पहली किस बनावटी नही लगती और शायद आप 'थ्री इडियट्स' का एक ऐसा ही दृश्य भूल जाएं.

शादी के तमिल रीति रिवाज़ उत्तर भारतीय दर्शकों को अच्छे लगेंगे.
फ़िल्म अपने पहले घण्टे में ही दर्शकों को खुद से बांध देती है और अंत तक नज़रें नही हटाने देती.

फ़िल्म में कोई बड़ा कलाकार नही है पर फ़िर भी सभी कलाकारों ने अपने-अपने चरित्र के साथ न्याय किया है. सान्या मल्होत्रा अपने दमदार अभिनय से महफ़िल लूट ले गई हैं, रजनीकांत के गानों में थिरकना हो या संजीदा अभिनय वह बहुत प्रभावित करती हैं.
उनके चेहरे में एक नयापन है जो दर्शकों को उनका दीवाना बना सकता है. भाग्यश्री के बेटे अभिमन्यु की बात की जाए तो इतना तो कहा ही जा सकता है कि अब वह भाग्यश्री के बेटे नही अभिमन्यु के नाम से पहचाने जाने लगेंगे.

फ़िल्म का संगीत मधुर होने के साथ फ़िल्म की जान भी है और इसके एक किरदार की तरह ही जान पड़ा है. फ़िल्म के गाने सुन ऐसा लगा है कि लोग इन्हें जितना सुनेंगे उतना पसन्द करते जाएंगे.

 मदुरई की सुंदरता दिखाता और दम्पत्ति के दूर रहते हुए लैपटॉप, मोबाइल के ज़रिए सम्पर्क में रहने वाले दृश्य स्क्रीन में हूबहू उतारता फ़िल्म का छायांकन बेहतरीन है.

फ़िल्म लंबी दूरी वाले रिश्तों के मुद्दे उठाने के साथ अन्य कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को भी उठाती है पर उन पर खुलकर बात नही कर पाती जैसे मीनाक्षी को जॉब के लिए मना कर देना महिलाओं की स्वतंत्रता के विषय को उठाता है, लैपटॉप वाला दृश्य और उस पर परिवार का जानकर अनजान बनना रूढ़िवादिता तोड़ने वाला है जैसे स्वरा भास्कर का वाइब्रेटर वाला दृश्य आज भी याद किया जाता है.

फ़िल्म के संवादों की बात की जाए तो वह बहुत गहरे अर्थ वाले हैं, उन्हें सुनने के लिए आपको फ़िल्म देखनी होगी.
 फ़िल्म को लेकर एक छोटा सा विवाद सामने आ रहा है कि उसके तमिल बैकग्राउंड के होने पर भी कोई कलाकार फ़िल्म को तमिल टच देने में कामयाब नही रहा है, तो इस पर बस इतना ही कि यह फ़िल्म मुख्य रूप से अक्सर ध्यान न दिए जाने वाले एक विषय पर बनाई गई है जो अपने लिहाज़ से महत्वपूर्ण है और उस पर चर्चा हो गई वही फ़िल्म की कामयाबी है इसलिए फ़िल्म की यह गलती माफ़.

निर्देशक- विवेक सोनी
लेखक- विवेक सोनी, अर्श वोरा
निर्माता- करण जौहर, अपूर्व मेहता, सोमेन मिश्रा
अभिनय- सान्या मल्होत्रा, अभिमन्यु दासानी
छायांकन- देबाजीत रे
सम्पादक- प्रशांत रामचंद्रन
संगीत- जस्टिन प्रभाकरन
वितरक- नेटफ्लिक्स
समीक्षक- हिमांशु जोशी, @Himanshu28may
रेटिंग- 4/5 (कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठा उनपर कम बात करने के लिए एक नम्बर कट)

Thursday, November 18, 2021

इतिहास में झांक वर्तमान की वास्तविकता से रूबरू करवाती एक किताब..

देश में चल रहे इस मुश्किल दौर के बीच मुखजात्रा को पढ़ा जाना आवश्यक है, क्या पता इसे पढ़ आज़ाद भारत के पिछड़ते नागरिकों की उम्मीद बन कोई नागेंद्र सकलानी की तरह फिर सामने आ जाए।

किताब स्नेहलता रेड्डी को याद करते शुरू होती है।
अगला नाम प्रसिद्ध इतिहासकार शेखर पाठक का है, फिर लेखक के कुछ विचार और सीन।
 किताब का नाम और आवरण चित्र समझने के लिए पूरी किताब पढ़ना जरूरी है।

'शहादतों की ऊर्जा और ऊष्मा' में शेखर पाठक की पंक्तियां 'मनुष्य की विकासयात्रा गुफावास से भूमंडलीकरण के दौर तक पहुंच गई हैं' समझाने में कामयाब रही हैं कि भूमंडलीकरण ही हर बवाल की जड़ है।  यही पर आगे लिखते शेखर पाठक शहादतों से सीख लेने की बात भी कह जाते हैं।

क़िताब शुरुआत में आपको वह नही बताती जो उसे बता देना चाहिए था पर धुंध के पार की सुंदरता दिखाने के लिए यह आवश्यक भी था, नागेंद्र सकलानी के बारे में कुछ अधिक भी लिखा जा सकता था।
 
किताब  पढ़ आप शायद नागेंद्र सकलानी के बारे में और अधिक सामग्री खोजने लगें। क्या पता 'सरदार उधम' की तरह कल कोई नागेंद्र पर अधिक शोध कर 'गुमनाम नागेंद्र' बना दे।

 'जिन्हें खत्म मान लिया गया था, वो राजे महाराजे अपनी पूरी सामंती ठसक के साथ अब भी संसद में कब्ज़ा जमाए बैठे हैं' जैसी पंक्ति कमाल करती हैं तो 'जेल की सीलन भरी कोठरियों में कोड़ों की मार के बाद भी यदि कोई कोयले से जेल की दीवारों पर गीत उकेरने लगे तो उसके आगे सत्ता के सारे हथियार बौने हो जाते हैं' पंक्ति किसी देशभक्ति फ़िल्म का संवाद बन सकती हैं।



'जो मैं समझा'

'जो मैं समझा' में लेखक सुनील कैंथोला बताते हैं कि कैसे एक शवयात्रा 'टिहरी जन क्रांति बन गई'।
लेखक के लिखने का तरीका और भाषा बिल्कुल आसानी से समझ में आ जाता है। लेखक भारतीय इतिहास से राजा-प्रजा के सम्बन्धों को हमारे सामने लाते हैं, यहां आप जागृत होती प्रजा के बारे में पढ़ते हैं।

सच, पाश की 'घास' कविता की तरह है, पंक्ति का इस्तेमाल कर लेखक ने किताब को इतिहास के साथ- साथ हिंदी के विद्यार्थियों के लिए भी अध्ययनार्थ बना दिया है।

लेखक के दादाजी का गांव छोड़ने वाला किस्सा आपको बदलाव के दौर से गुज़र रहे भारत के दर्शन कराता है।

लेखक 12 जनवरी 1948 को कीर्तिनगर से नागेंद्र सकलानी की मुखजात्रा के साथ चले सैलाब को उत्तराखंड के वर्तमान आंदोलनों से जोड़, उत्तराखंड की वर्तमान दशा-दिशा पर विचार करवा देते हैं।

'जो मैं समझा' का अंत आते-आते आपको पता चल जाता है कि 'मुखजात्रा' क्या है और यह भी कि जो राक्षस उस दिन नागेंद्र की अंत्येष्टि के साथ समाप्त हुआ था वह फिर दबे पांव लोकतंत्र के मंच पर प्रवेश कर चुका है।

'जैसा मैंने देखा'

'जैसा मैंने देखा' में लेखक भारत के गुलाम होने की दास्तां इतिहास के पन्नों से खोज-खोज कर हम तक पहुंचाते हैं।
वर्तमान हालातों पर उनकी पंक्ति 'जिन्हें खत्म मान लिया गया था, वो राजे महाराजे अपनी पूरी सामंती ठसक के साथ अब भी संसद में कब्ज़ा जमाए बैठे हैं' हथोड़े की चोट मार जाती है।

आगे पढ़ते किताब एक करोड़ हिंदुस्तानियों के भूख से मारे जाने और चंद गिनती के अंग्रेज़ों ने भारत में कैसे राज कर लिया , इनके कारण हमारे सामने लाती है। जिसे जानने के लिए किताब खरीदना जरूरी हो जाता है।
 दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन वजहों से वो मृत्यु हुई और अंग्रेज़ों ने भारत पर राज किया, वही सारे कारण आज भी जस के तस बने हुए हैं।

लेखक अब धीरे-धीरे किताब को उसके मूल मुद्दे की ओर ले जाते हैं। अब आप यहां पर ब्रिटिश शासन के दौरान गढ़वाल का इतिहास समझते, वहां के शासन में चल रही उथल-पुथल के बारे में पढ़ते हैं।
 किताब की मुख्य विशेषता यह है कि सब कुछ सन्दर्भ सहित कहा गया है।

हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों पर तब शासन की जिन नज़रों का उल्लेख किताब में किया गया है, उन्हें आप आज से जोड़कर देखेंगे तो किताब में लिखा हर शब्द आपको सत्य लगेगा।

किताब के मध्य भाग में नाटक के 39 सीन की शुरुआत होती है, अंत में नागेंद्र सकलानी के पत्र चस्पा हैं जो आपको आज़ादी के आसपास चल रहे घटनाक्रमों से परिचित कराते हैं। 
नाटक के मंच का आंखों देखा हाल बता महात्मा गांधी से शुरुआत की जाती है। उन्हें नागेंद्र सकलानी और भोलूराम जरदारी की तीन दिन चली शवयात्रा, टिहरी रियासत की आज़ादी और हिंसा न होने की बात बताई जाती है। इसे पढ़ नाटक के प्रति आपकी जिज्ञासा बढ़ना स्वाभाविक है।

सीन 6 तक पहुंचते आपको समझ आ जाएगा कि किताब इतिहास में झांक वर्तमान को समझाने का प्रयास करने के लिए लिखी गई है।

अंग्रेज़ों की जेलें राजा की जेलों की तुलना फ़ाइव स्टार हुआ करती थी लिख लेखक ने जेलों का अंतर भी बताया है और किताब पढ़ते-पढ़ते आपको श्रीदेव सुमन, रामचन्द्र उनियाल जैसे भुला दिए गए नायकों के बारे में जानने को भी मिलता है।

गिंदाडू और नागेंद्र संवाद किताब की जान है। 
सीन 18 को हम किसान आंदोलन से जोड़ सकते हैं, सीन 22 में नागेंद्र और साथियों के भाषण अविस्मरणीय हैं। लेखक ने इन्हें बड़ी सरल भाषा में गहरे अर्थों के साथ लिख डाला है।

सीन 25-26 में नागेंद्र सकलानी और भोलू राम की मृत्यु का मंचन किया गया है, जिसे पढ़ते आप घटनाक्रमों को अपनी आंखों के सामने चलता महसूस करेंगे और भावुक भी हो जाएंगे।
सीन 27 ही वह पड़ाव है जहां चन्द्र सिंह गढ़वाली का जनता से संवाद पढ़ कोई नागेंद्र सकलानी पर फ़िल्म बनाने का निर्णय ले सकता है।
                          सुनील कैंथोला

अंत के सीनों को पढ़ते आप कल्पना के सागर में डूब यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि एक मुखजात्रा से जुड़ते सैलाब को साक्षात देखना कैसा अनुभव रहा होगा और इस अनुभव की हल्की सी अनुभूति तो आपको किताब पढ़ते हो ही जाएगी।

पुस्तक- मुखजात्रा
लेखक- सुनील कैंथोला
प्रकाशक- हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट देहरादून
पुस्तक मूल्य- 210 ₹
समीक्षक- हिमांशु जोशी @himanshu28may

Tuesday, November 16, 2021

उत्तराखंड की आपदाओं का डीएनए.

पहाड़ों पर हो रहे विकास कार्यों और मानव द्वारा प्रकृति के साथ कि गई छेड़छाड़ का नतीजा अब हमारे सामने है, पहाड़ों में आपदाओं का दौर तेज़ हुआ है. बाढ़ से होने वाले नुकसान को कैसे कम किया जाए इसके लिए ठोस योजना बनाने की जरूरत है.



स्थिति बिगड़ेगी नही बिगड़ने लगी है

बात ज्यादा पुरानी नही है जब साल 2019 में ग्रेटा थनबर्ग ने संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण के दौरान विश्व नेताओं को पर्यावरण बिगाड़ने पर कटघरे में खड़ा कर दिया था, एक बच्ची संयुक्त राष्ट्र में हमारे हक के लिए लड़ रही थी और हम चैन की नींद सोए थे. 
सोए इसलिए क्योंकि तब खुद पर ज्यादा नही बीत रही थी, वैसे भी दुनिया का उसूल है कि जब खुद पर बीतती है तब सच्चाई महसूस होती है.

डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट में लिखा है कि पॉट्सडैम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार हिमालय क्षेत्र की हजारों प्राकृतिक झीलों पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है. इसके लिए उन्होंने बढ़ते तापमान को जिम्मेदार माना है. वैज्ञानिकों के अनुसार इसके चलते घाटियों में बहने वाली नदियों पर भी बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, रिपोर्ट में कहा गया है कि खतरा बढ़ गया है पर पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड के साथ-साथ भारत के कुछ अन्य हिस्सों जैसे उड़ीसा, असम पर नज़र डालें तो पता चलेगा खतरा बढ़ा नही बल्कि हम अब उस खतरे से गुज़रने लगे हैं.

उत्तराखंड में आपदा पर आपदा

उत्तराखंड में साल 2013 की भीषण आपदा के बाद इसी साल 7 फरवरी को चमोली में ग्लेशियर टूटने से आपदा आई और अब अक्टूबर में फिर प्रदेश बाढ़ का कहर झेल रहा है, स्थिति यह है कि बाढ़ आए चार-पांच दिन बाद भी उससे हुए नुकसान का आकलन करना भी अभी तक सम्भव नही हुआ है.

उत्तराखंड के मुक्तेश्वर में 1 मई 1897 से बारिश के आंकड़े दर्ज किये जा रहे हैं. यहां अब तक 24 घंटे के दौरान सबसे ज्यादा बारिश 18 सितम्बर 1914 को 254.5 मिमी दर्ज की गई थी, जबकि इस बार यहां 24 घंटे के दौरान 340.8 मिमी बारिश हुई है.

हिमालयी और मैदानी क्षेत्र होने के कारण उत्तराखंडवासी इस बार एक ही रात में एक साथ अलग-अलग परिस्थितियों से जूझे.

सोचें पहाड़ों में आप एक रात चैन से सोए हुए हैं और खूब सारा कीचड़ लिए तेज़ बहाव के साथ पानी आपके घर में घुस आपका दम घोंट आपकी जान ले शांत हो जाए या आप इस डर से रात भर अपने बच्चों को गले लगाए बैठे रहें कि कहीं कोई सैलाब आपके घर न घुस जाए.
 वहीं मैदानी क्षेत्र में आप रात भर अपने घर के कीमती सामानों को बाढ़ में बहने से रोकने का प्रबंध करते रहें.
अक्टूबर बेमौसम आई बरसात ने उत्तराखंड वालों का बिल्कुल यही हश्र किया है, इसके शिकार वह पर्यटक भी हुए हैं जो सुकून की तलाश में उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में घूमने आए थे.

सोशल मीडिया पर बहुत सी पोस्ट छाई हुई हैं जहां पुलिस और सेना के जवान बाढ़ प्रभावित लोगों को बचाने में जुटे हुए हैं, इनमें कुछ तस्वीरों में पुलिस के जवान पहाड़ों में भारी बारिश से किसी के घर में घुसे मलबे के बीच उस घर में रहने वालों की दबी लाशों को खोज रहे हैं तो कुछ तस्वीरों में पुलिस-सेना के जवान खतरे में फंसे लोगों को तेज बहाव से निकाल रहे हैं.
नदी किनारे बने घर उसमें समा जा रहे हैं तो मैदानी जगह बाढ़ में बाइक, कारों की तैरती तस्वीर भी वायरल हो रही हैं.

बाढ़ पर राजनीति और आपदा के लिए जिम्मेदार सड़क

लोग मुसीबत में फंसे हैं तो बाढ़ पर राजनीति भी कम नही हो रही, सोशल मीडिया पर प्रदेश के मुख्यमंत्री का बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर से किया दौरा विवाद का विषय बना है तो कहीं सड़क मार्ग से आपदा ग्रस्त इलाकों में पहुंचने पर उनकी वाहवाही हो रही है.

वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए ऑल वेदर रोड पर कार्य शुरू हुआ, इस सड़क से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान को देखते सुप्रीम कोर्ट ने एक हाई पॉवर कमेटी गठित की, जिसके अध्यक्ष रवि चोपड़ा ने अपनी रिपोर्ट में सड़क की चौड़ाई 12 मीटर रखना ठीक नही बताया था और इसको सिर्फ 5.5 मीटर तक ही रखने की सिफारिश की थी पर प्रकृति की चिंता किसे थी और वैसे भी इससे होने वाले नुकसान को उन पहाड़ों में रहने वाले लोग ही झेल रहे हैं.

पहाड़ में सड़क बनाते समय उसके मलबे को नदियों में फेंका जा रहा है, इससे होने वाले नुकसान पर पर्यावरण के मुद्दों पर सालों से लिख रहे वरिष्ठ पत्रकार विनोद पांडे से बात की गई. उन्होंने बताया कि पहले पहाड़ों में सड़क 'कट एंड फिल' तकनीक से बनती थी. सड़क बनाने के लिए पहाड़ काट सड़क के लिए आधा हिस्सा छोड़ा जाता था और आधे में उसी के मलबे की दीवार दी जाती थी. जेसीबी आने के बाद से इस ओर ज्यादा ध्यान नही दिया गया, पहाड़ काट उसका मलबा सड़क पर कहीं भी बेतरतीब तरीके से फेंक दिया जाता है.
वो मलबा नीचे बह रही नदियों पर गिरता है और इससे जल प्रवाह में विघ्न आता है. 
सड़क बनाते समय पानी की निकासी का ध्यान भी नही दिया जाता, जिस वजह से पानी अपना रास्ता खुद बना लेता है. पानी के बहाव की गम्भीरता को कम आंका गया है.

इंडिया वॉटरपोर्टल वेबसाइट में सड़क काटने और उससे बने खड्डों को पुन: भरने के लिए विभिन्न एजेंसीयों द्वारा किए गए सभी कार्यों से सम्बंधित सूचनाएं उपलब्ध कराने हेतु मांगे गए सूचना के अधिकार का प्रारूप मिला. शायद ही पहाड़वासियों ने कभी अपने इस अधिकार का प्रयोग पहाड़ों को बेतरतीब चीरने की स्थिति जानने के लिए किया हो.
अब भारी बारिश की वज़ह से सड़के जगह-जगह टूट गई हैं, गम्भीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए अस्पताल तक पहुंचने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं या अस्पताल तक पहुंचने में ही उनकी जेब कुतर जा रही है.

         सड़क का मलबा नदी में (फ़ोटो साभार                      @MallikaBG ट्विटर अकाउंट)


                फोटो- सोनाली मिश्रा
इस तस्वीर में पहाड़ पर बंद रास्ते को जेसीबी द्वारा खोलते देखा जा सकता है, एक रास्ता तो खुल रहा है पर नीचे मलबा गिरा जो रास्ता बंद हो रहा है उसके परिणाम ज्यादा भयावह होंगे. किसी को तो इसे रोकने की जिम्मेदारी उठानी होगी.

जो हुआ सो हुआ

बाढ़ और प्रकृति का तांडव फ़िलहाल थमा हुआ है पर अब जिस अंतराल पर यह आपदाएं आने लगी है उन्हें देख भविष्य में इस तरह की आपदाओं से कम से कम नुकसान हो इसके लिए हमें अभी से कार्य शुरू करने होंगे.

वर्ल्ड मीटरोलॉजिकल आर्गेनाइजेशन और ग्लोबल वाटर पार्टनरशिप ने मिलकर बाढ़ प्रबंधन प्रोग्राम पर कार्य किया, अमरीकी कम्पनी ने सुनामी जैसी आपदा के वक्त सुरक्षित बचने के किए सुनामी बॉल बनाई तो चीन में स्पंज सिटी की अवधारणा बनी.

वर्ल्ड मीटरोलॉजिकल आर्गेनाइजेशन और ग्लोबल वाटर पार्टनरशिप की रिपार्ट के अनुसार पहाड़ों में बाढ़ से होने वाले नुकसान के मुख्य कारणों में पहाड़ों की ढलान पर वनों की अत्यधिक कटाई पहले नम्बर पर आता है. आज आप पूरे हिमालयी क्षेत्र घूम आइए, सड़क की सनक ने रास्ते के सभी पेड़ों को खत्म कर दिया है. सड़क पर आधे लटके वह पेड़ अपना बदला लेने के लिए हमेशा सड़क पर लटक किसी के ऊपर गिरने का मौका देखते हैं.
स्थानांतरित कृषि जिसमें वृक्षों और वनस्पतियों को जला दिया जाता है फिर उसमें नए बीज बोए जाते हैं इस वज़ह से भी पहाड़ कमज़ोर हुए हैं और तेज़ बहाव में टूट जाते हैं.
अद्रभूमि की कमी और इसके साथ पहाड़ों में जानवरों की अत्यधिक चराई की वजह से भी पहाड़ कमज़ोर होते जाते हैं.

बाढ़ के बारे में थोड़ा अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि बाढ़ मुख्यतः चार तरीकों से आती हैं.
फ्लुवियल में अत्यधिक बारिश से या बर्फ गलने से नदी का जलस्तर बढ़ जाता है, उत्तराखंड में इसी तरह की बाढ़ कोहराम मचाती है. अभी आई बाढ़ में नैनीताल की झील का स्तर इतना बढ़ गया था सड़क और झील में अंतर करना मुश्किल हो रहा था.
प्लूवियल बाढ़ में बारिश का पानी निकासी सुविधा अच्छी न होने की वजह से शहर की गलियों में भर जाता है, मुंबई- दिल्ली हो या उत्तराखंड का रुद्रपुर सबमें इसी तरह की बाढ़ आती है.
फ्लैश बाढ़ में बांधों से तेज़ी से पानी आता है और इस तरह की बाढ़ खतरनाक होती है, कोस्टल बाढ़ का उदाहरण सुनामी है.

रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ प्रबंधन के लिए प्रशासन, नेताओं, गैर सरकारी संगठनों और भवनों का निर्माण करने वालों को मिलकर साथ काम करना होगा.
बाढ़ हमेशा एक सी नही होती और उसकी तैयारी भी पहली जैसी नही होनी चाहिए, नगरीकरण से यह समस्या बढ़ती ही जाएगी क्योंकि नदी, नालों को अपना रास्ता नही मिलेगा और वह बार-बार लौटकर अपने रास्ते पर आएंगे ही.
रिपोर्ट में कहा गया है कि बाढ़ के समय सही रास्ता बताने के लिए सड़क पर निशान लगाने चाहिए क्योंकि ऐसी स्थिति में लोग गड्ढों पर भी गिर सकते हैं, साथ ही हमें घर भी ऐसे बनाने होंगे जिन पर बाढ़ का असर कम से कम हो.
बाढ़ के असर को कम करने के लिए तीन तरह के घर बनाने का सुझाव दिया गया जिसमें ऐसा घर शामिल है जो उठा हुआ बनाया जाए, दरवाजों-खिड़कियों को बंद कर पानी रोकने वाला घर भी बनाया जा सकता है जिसे ड्राई फ्लड प्रूफिंग कहा गया है.
वेट फ्लड प्रूफिंग नाम के घरों को ऐसा बनाया जाता है जिसमें घर के अंदर पानी आने के बाद भी उसका असर कम से कम हो.
अगर ऐसे ही घर पहाड़ी क्षेत्रों में बनाए जाएं तो कई जानें बचाई जा सकती हैं.
बाढ़ से बचने के लिए घरों के डिज़ाइन

सुनामी बॉल और स्पंज सिटी
सुनामी जैसी आपदाओं को झेलने के लिए एक अमरीकी कम्पनी ने सुनामी बॉल का निर्माण किया और भारत के असम जैसे बाढ़ग्रस्त इलाकों में यह सुनामी बॉल वरदान साबित हो सकती है, सुनामी बॉल का प्रयोग किया जाना आवश्यक है.

'द हिन्दू' में पिछले साल आई एक रिपोर्ट में स्पंज सिटी का जिक्र करते हुए लिखा है कि कोच्चि भारत की पहली स्पंज सिटी बन सकती है.

चीन ने जिस तरह से प्राकृतिक ऊर्जा का प्रयोग किया है वह काबिलेतारीफ है और चीन में ही साल 2013 में एक और दुनिया बदलने वाली योजना पर काम शुरू हुआ।
चीनी शोधकर्ता प्रोफेसर कोंगजियान यू ने स्पंज सिटी के बारे में सुझाव दिया था.

स्पंज सिटी

इस योजना में खर्चा अधिक है पर इसके लाभ उससे ज्यादा हैं, चीन अपने 16 जिलों में इस जल अवशोषक परियोजना का निर्माण कर रहा है.
इन शहरों में कंक्रीट की जगह बॉयोस्वेल्स का प्रयोग कर जल संरक्षण किया जाएगा.
यह ऐसे शहर होंगे जो वर्षा के पानी को अवशोषित कर पर्यावरणीय रूप से अनुकूल तरीके से उसके पुनः उपयोग को बढ़ावा देंगे और बहता हुआ पानी भी कम हो जाएगा। पानी की कमी को दूर करने के लिए वर्षा जल का सही प्रयोग किया जाएगा.

खर्चा तो बराबर है

समाज को यह समझना होगा कि अगर मनुष्य जाति के अस्तित्व को बचाए रखना है तो प्रकृति के साथ ज्यादा छेड़छाड़ करना ठीक नही है, प्रकृति को सुरक्षित रखते विकास कार्य करने होंगे.
वहीं हमारी सरकार को यह समझना होगा कि आपदा के बाद जितना पैसा मुआवजे और पुनर्निर्माण में लगाया जाता है उतना अगर आपदा प्रबंधन में समय रहते खर्च कर लिया जाए तो जानमाल की होने वाली हानि से बचा जा सकता है.

सोनाली मिश्रा.


Saturday, November 13, 2021

ग्लासगो में COP26 बैठक तो भारत में हिमालय का कलेजा ठंडा रखने की तैयारी.

जलवायु  परिवर्तन के मुद्दे पर बीते दो हफ़्तों से स्कॉटलैंड के ग्लासगो में चल रहा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन COP26 अब ख़त्म होने की तैयारी में है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सम्मेलन में पहुंच भारत की तरफ़ से इस चुनौती से निपटने के लिए पांच अमृत तत्व रखे.


भारत के लिए हिमालय.

जमीनी स्तर पर बात की जाए तो हिमालयी क्षेत्र पूरे देश के पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है. हिमालयी नदियां तो करोड़ों भारतीयों की जीवनरेखा है पर पहाड़ों में लगती आग पिछले कुछ सालों से हिमालय को लील रही है.
हिमालय के जंगलों में लग रही आग से उत्तर भारत का तापमान 0.2 डिग्री सेल्सियस तो बड़ा ही है साथ ही उससे निकल रहे स्मॉग से ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा भी बना हुआ है. 

वहीं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन COP26 का मुख्य मुद्दा भी वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का है.

चाल-खाल.

ऐसे समय में उत्तराखंड में विश्वविख्यात पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा का सानिध्य पाए अनिरुद्ध जडेजा, पीएसआई psi देहरादून और जीवन मांगल्य ट्रस्ट उत्तराखंड के साथ उत्तराखंड के नैनीताल जिले में चाल-खाल बनाने में लगे हुए हैं. इसी के साथ वह और उनकी टीम जन भागीदारी से नौले-धारों का नवसृजन भी कर रही है.

उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से पानी रोकने के लिए बनाए जाने वाले तालाबों को चाल व खाल कहते हैं, इनकी वजह से जमीन में नमी बनी रहती है और आग कम फैलती है.

जब पूरे विश्व में पर्यावरण को लेकर इतनी बात हो रही है तब अनिरुद्ध जडेजा जैसों का उदाहरण उस बात को सिर्फ़ चर्चाओं तक ही सीमित नही रखता बल्कि लोगों को पर्यावरण के प्रति सभी की कुछ जिम्मेदारियों की याद दिलाने का काम भी करता है.

वीडियो में अनिरुद्ध को ग्राउंड पर काम करते देखा और समझा जा सकता है.



हिमांशु जोशी.
@himanshu28may 

Friday, November 12, 2021

आज़ादी.

हमको चाहिए आज़ादी, आज़ादी.
क्यों हम मुंह मोड़ देते हैं जब सर पर बैठे कोई कहता है आज़ादी आज़ादी

कान ,आंख बंद हैं हमारे या सी दिया है मुंह जब मांग रहा है कोई आज़ादी.


क्या तब खून कम बहा था जो अब एक पद्मश्री कहती है कि अब मिली है आज़ादी. (Kangana)
क्या हिन्दू-मुस्लिम के बीच बनी नफ़रत की दीवार ही है आज़ादी.
एक खून जब दूसरे खून को , बिना धर्म का लिबास ओढ़ अपना खून देता है, क्या वो नही है आज़ादी!!

चमकता गहना था दिल्ली , पर क्या वहां खून बहा कर मिली है ये नकली आज़ादी.
तब तो नाले में सनी हुई मिली थी हमारी आज़ादी!!!
या अब बर्फ़ से ठंडे पड़े जवानों को श्रद्धांजलि दे मिली है आज़ादी.

क्या है ये आज़ादी, बोलने की पाबंदी या जेल में ठूस देने को कहते हो तुम आज़ादी.
नफ़रत ऐसी कि लिखते हो फ़ोन पर बलात्कारी हूं मैं या किसी को पेड़ से बांध नंगे बदन को ज़ख्म देना है आज़ादी.

भाषा पर लड़ना है आज़ादी!
नही ,तो सोचो फ़िर आखिर क्या है आज़ादी, क्या है आज़ादी.

आज़ाद..

Monday, November 8, 2021

जिस देख हम मुंह फेर रहे हैं वही दिखाती है 'जय भीम'.

राजस्थान के भीलवाड़ा के एक गांव में बकरी चोरी करने के आरोप में दलित युवक को पेड़ से बांधकर पीटने के मामला सामने आया है. 

सोशल मीडिया पर एक दलित युवक की पिटाई का वीडियो वायरल हो रहा है. वीडियो कानपुर के अकबरपुर का बताया जा रहा है. खबरों के मुताबिक, प्रेम प्रसंग के शक में दलित युवक को पेड़ से बांधकर घंटों तक पीटा गया. यहां तक कि उसके प्राइवेट पार्ट में डंडा डालने की कोशिश की गई. 

गांव घांगा खुर्द में एक दलित परिवार को बांध कर मारपीट और अश्लील हरकतें करने का मामला सामने आया है. आरोपियों ने इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल किया है.

ये सारी खबरें 1995 की नही साल 2021 की ही हैं पर हम आज यह मानने को तैयार नही हैं कि हमारे साथ एक ऐसा भारत भी चल रहा है जहां जातिवाद का बोलबाला है, ऐसी खबरों से हम मुंह फेर लेते हैं. 'जय भीम' के निर्देशक और लेखक को शायद इन्हीं खबरों की वज़ह से फ़िल्म बनाने की प्रेरणा मिली हो.
 प्रोफेसर शेखर पाठक और उमा भट्ट की समाज के दबाए हुए तबके के लिए आवाज़ उठाने के लिए दी प्रेरणा से मुझे फ़िल्म देख यह समीक्षा लिखने की प्रेरणा मिली.

पुलिस की कार्यप्रणाली, न्यायपालिका पर आम नागरिक का भरोसा, आदिवासियों के अधिकारों और आंदोलनों की शक्ति के इर्द गिर्द सिमटी यह फ़िल्म दिल झकझोरने वाले दृश्यों से भरी पड़ी है.

'गलती क्या है इनकी! यही कि ये पैदा हुए' 
1994-95 में हुई सच्ची घटनाओं पर बनी यह फ़िल्म जाति पूछ एक जेल से छूटने पर दूसरी जेल में भेजे जा रहे कैदियों के लिए इन शब्दों के साथ शुरू होती है.
 भारतीय फिल्मों के इतिहास में सबसे ज्यादा चर्चा पा रही यह फ़िल्म शुरुआत से ही कसी हुई लगती है.

राजाकन्नू बने के० मणिकंदन को बाइक में पीछे बैठा उसका हाथ झटका दूरी बनाने वाले दृश्य और 'दीया जलाने के समय दहलीज पर खड़ी क्यों हो रही है' जैसे संवादों के साथ फ़िल्म छुआछूत पर प्रहार करते रहती है.

आगे चलकर फ़िल्म में राजाकन्नू और साथी की आंखों में मिर्च पाउडर डालने और जेल में महिला के कपड़े उतारने जैसे दृश्य दर्शकों को पुलिस बर्बरता की कहानी दिखाते हैं, जो आपके पूरे शरीर में सिहरन दौड़ाने पर कामयाब जरूर होंगे.

वकील चंद्रु बने सूर्या की एक मोर्चे में मुट्ठी बांधे फ़िल्म में एंट्री हुई है, वहीं से कोर्टरूम में उनके द्वारा किए गए बेहतरीन अभिनय की शुरूआत है.
बिना किसी सबूत के लड़ने वाले केस के लिए सबूत जुटाते सूर्या के साथ फ़िल्म रोमांच से भरपूर है और केस की हर सुनवाई जबरदस्त है.

प्रकाश राज एक ईमानदार पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं. सूर्या और प्रकाश राज के आपसी संवाद गज़ब के हैं और पुलिस की समाज में भूमिका पर भी स्पष्टता देते हैं.

 संगिनी बनी लिजोमोल जोस साधारण तो दिखती हैं पर सिस्टम से लड़ती एक गर्भवती के रूप में उन्होंने अपने बेहतरीन अभिनय से अपने किरदार संगिनी को दर्शकों की यादों में अमर कर दिया. डीजीपी के साथ वाला दृश्य हो या डीजीपी के आदेश पर जेल बुलाई संगिनी को गांव वालों के सामने पुलिस जीप सहित घर छोड़ने वाला दृश्य ऐसा अभिनय कम ही देखने को मिलता है.

संगिनी को न्याय दिलाने में सहायता करने वाली शिक्षिका बनी राजिशा विजयन भी अपने बेहतरीन अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब हुई हैं, पुलिसिया ज़ुल्म ढहाने वाले सब इंस्पेक्टर बने तामीज़ एक बेहतरीन नकारात्मक चरित्र की भूमिका निभाने के लिए याद किए जाएंगे.

तमिलनाडु के हिल स्टेशन कोडईकनाल की खूबसूरत वादियों में फिल्माई गई फ़िल्म का छायांकन इतना बेहतरीन है कि कोडईकनाल को न जानने वाले लोग भी अब वहां तक पहुंचने का रास्ता गूगल पर सर्च करेंगे. खेतों में चूहे पकड़ने का दृश्य भी आपको फ़िल्म के बेहतरीन छायांकन का आनंद देगा.

'पढ़िए सब कुछ मिल जाएगा' जैसे गहरे डूबे हुए संवादों से फ़िल्म भरी पड़ी है. एक नही फ़िल्म के पचासों संवाद ऐसे हैं जो लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाएं.

फ़िल्म का संगीत कभी प्रकृति के साथ मिला हुआ ही लगता है तो कभी वह फ़िल्म के महत्वपूर्ण दृश्यों का रोमांच दोगुना कर देता है.

फ़िल्म में बाबा अम्बेडकर की सीखें भी समांतर चलती रहती हैं, जैसे फ़िल्म में सूर्या की पहली झलक के दौरान न्याय पर सभी के समान अधिकार पर बात की जाती है और अंतिम दृश्य में सूर्या के साथ बच्ची द्वारा अखबार पढ़ने का दृश्य शिक्षा की सब तक पहुंच को लेकर काफ़ी कुछ कह जाता है.
संगिनी का मुझे लिखना नही आता साहब कहना आपको आज भी बैंकों में अंगूठा लगाने वाले बहुत से चेहरे याद दिला देगा.

फ़िल्म में कोई कमी नही, कमी खुद में लगी है जो मुझे तमिल नही आती, नही तो फ़िल्म के हर संवाद की वास्तविकता के रोमांच से परिचित होता.

उम्मीद है फ़िल्म देख सूर्या द्वारा निभाया किरदार चंद्रु देश के हर राज्य में पैदा होगा.
जय हिंद.

कलाकार- सूर्या, लीजोमोल जोस, राजिशा , के॰ मणिकंदन, प्रकाश राज
निर्माता- सूर्या, ज्योतिका
छायाकार- एस०आर० कथीर
संपादक- फिलोमिन राज
संगीतकार- शॉन रोल्डन
रेटिंग- 5/5
समीक्षक- हिमांशु जोशी
https://mobile.twitter.com/Himanshu28may

रंग बिरंगे कागज़ थे.

कमरतोड़ दिहाड़ी करके आज शाम ज़ेब में मेरे कुछ रंग बिरंगे कागज़ थे.

कल तक अनमोल थे पर अब वो सब बग़ैर किसी मोल के थे, जेब में मेरे कुछ रंग बिरंगे कागज़ थे.

अब मेहनत कर चूल्हा जलाऊं या मेहनत से मिले इन नोटों को चलाऊं,
बन चुके बोझ अब जेब में मेरे कुछ रंग बिरंगे कागज़ थे.

भूखे प्यासे खूब लगा उन बैंकों की लाइनों में,
क्या करूँ पाई-पाई कर जोड़े हुए जेब में मेरे कुछ रंग बिरंगे कागज़ थे.

कहां जुटा पाता मुझ जैसा निर्धन कालाधन,
बड़ी मुश्किलों से जुटा जेब में मेरे कुछ रंग बिरंगे कागज़ थे.

बेटी के ब्याह की आस लगाए, स्थिर पड़ी थी अब उसकी मां क्योंकि जेब में उसके कुछ रंग बिरेंगे कागज़ थे.

परिणाम पूछता मैं उनसे पर चुप हूं क्योंकि आज भी जेब में मेरे कुछ रंग बिरंगे कागज़ थे.

हिमांशु आम नागरिक.

Friday, November 5, 2021

ए स्युटेबल गर्ल , क्यों इतना उलझा है हमारा समाज.

समीक्षा

उधम सिंह, रश्मि रॉकेट की गम्भीरता के बाद मैं फिर कुछ ऐसा ही गम्भीर विषय देखना चाहता था तो मुझे 'ए स्युटेबल गर्ल' के रूप में डाक्यूमेंट्री सुझाई गई, डॉक्यूमेंट्री देख जान पड़ता है कितना उलझा हुआ है हमारा भारतीय समाज. 
कट्टरतावाद तो यहां भी है जिसमें हर युवा खुद उलझता जाता है, उसे तोड़ना जरूरी है.
डॉक्यूमेंट्री सवाल उठाती है कि क्या लड़कियां पैदा ही दूसरों के लिए होती हैं, कौन तोड़ेगा ये मिथक.
2017 में आई इस डॉक्यूमेंट्री पर इससे पहले मैंने कहीं पढ़ा भी नही था इसलिए निर्णय लिया कि मैं इस पर लिखूं और फिर लोग इसे पढ़ें, डॉक्यूमेंट्री देखें इसका उद्देश्य समझें.

डॉक्यूमेंट्री शुरू ही इस बात से होती है कि लड़की के पैदा होते ही यह सोचना शुरू कर दिया जाता है कि इसकी कल शादी होगी, ये अपने माता-पिता का घर छोड़ेगी. सब तय है,यही हमारी भारतीय संस्कृति है.

मतलब चल क्या रहा है! 
स्वयंवर, डिवोर्सी, बैचलर क्या शादी के लिए ये सब शर्तें होनी चाहिए?
डॉक्यूमेंट्री देख कर सोचने लगा कि लव जिहाद जैसे शब्द भी किसने गढ़े होंगे. धर्म और शादी तो निजी मामला होना चाहिए, हमने उसे बाजार में बेच-बेच कर अखबारों में इश्तेहार निकाल लिए.

डॉक्यूमेंट्री आम भारतीयों के सपनों के शहर दिल्ली और मुंबई और मुंबई के आसपास रह रही तीन लड़कियों की ज़िंदगी दिखाती है जो एक तरह से पूरे भारत की लड़कियों के जीवन का आईना बन जाती है.
डॉक्यूमेंट्री बताती है कि कैसे शहरों में बस जाने के बाद भी भारत में शादियां अब भी उन्हीं शर्तों में होती हैं जिनसे वो सालों से हो रही हैं, वही धर्म, जाति, रंग, वज़न.
लड़कों का पैसा देखा जाता है तो लड़कियों की काया पर ध्यान ध्यान दिया जाता है.

डॉक्यूमेंट्री कम देखी जाती हैं पर एक बार इसे देखना शुरू किया जाए तो 'ए स्युटेबल गर्ल' अपनी सी लगती है, ऐसा लगता है जैसे आप वीडियो में अपनी ही कहानी देख रहे हैं. न कोई मन बहलाने वाला संगीत न आंखों को रिझाने वाले दृश्य .बस अपने घर की ही कहानी, अपना संगीत, अपने जाने पहचाने दृश्य.

फ़िल्म शादी के लिए जूझती दीप्ति, बुझे मन से खुद को शादी के लिए सौंपती रितु और मर्जी से शादी कर उसे निभाती अमृता की कहानी है. 
ये पूरे भारत की लड़कियों की कहानी है, जहां वो खुद से जूझती, शादी निभाती और जबरदस्ती शादी के लिए खुद को सौंपती आई हैं.

मुंबई के पास के 'भायंदर' की दीप्ति स्वयंवर में मोटापे की वजह से रिजेक्ट होने के बाद दूसरे देखने आने वाले लड़के के लिए तैयार हो रही है. यहां लड़की के सपने हैं, अपने पति को लेकर उसके सवाल हैं और फिर लड़के वालों के सवाल भी. 
बिल्कुल बेहतरीन तरीके से सब कुछ दर्शाया गया है. लड़का कम बोलता है उसके परिवार वाले ज्यादा, लड़की कम उसके परिवार वाले ज्यादा.
अरेंज मैरिज के हर कदम पर प्रकाश डाला गया है.
दीप्ति का जन्मदिन आना और उसकी तीस की उम्र होने पर सब शादी की बात करते हैं. यह सीन लड़कियों की बढ़ती उम्र पर भारतीय समाज में जड़ जमा चुकी छोटी सोच पर तमाचा है. 
फेसबुक पर लड़का देख उससे शादी भारत में फेसबुक कल्चर को भी दिखाता है, इसके अच्छे-बुरे परिणाम दोनों मिल सकते हैं पर दीप्ति यहां खुशनसीब है.
 दीप्ति का शादी तय होने पर घर से अपना सामान समेटना जैसे दृश्य और उसके 'अपने शहर को, अपने पेरेंट्स को, अपने लोगों को छोड़कर जाना' जैसे संवाद लड़की के दर्द को हम तक पहुंचाते हैं.

वहीं मुंबई में ही रितु की मां दूसरों के लिए तो लड़का देख रही है पर खुद की लड़की के लिए परेशान है और रितु न चाहते हुए भी खुद को शादी के लिए तैयार कर रही है.

लड़के के लिए ज्योतिष का सहारा, शादी बारातों में लड़की को देखने का रिवाज़, भारतीय लड़की को जॉब के साथ डांस भी आना चहिए. यह सब साबित करते हैं कि हर जगह लड़की को बस एक उत्पाद की तरह पेश किया जाता है.

रिश्तेदारों की बातों पर गौर किए जाने वाली संस्कृति पर भी प्रकाश डाला गया है,  लोगों की वजह से सीमा और उसके पति रितु की शादी कराना चाहते हैं. 
रितु को जॉब , अपना घर खोने का डर सता रहा है. शायद मेरी तरह एक लड़का कभी कल्पना भी न कर पाए कि जिस घर में हम पले-बढ़े उस घर को हमेशा के लिए छोड़ना एक लड़की के लिए क्या होता है पर डाक्यूमेंट्री देख ये समझ आता है. 
डॉक्यूमेंट्री में रितु के पति के ज़रिए भारतीय लड़कों की बात भी कही गई है कि पता नही हम क्यों शादी करते हैं भारत में हमें करनी पड़ती है, मैं अगले जन्म में यूरोप में पैदा होना चाहूंगा जहां चालीस साल के बाद शादी करते हैं.

 दिल्ली में नौकरी करने वाली लड़की अमृता 'नोखा' गांव राजस्थान पहुंच गई, अब लड़की के जीवनशैली में बदलाव के संघर्ष को दिखाया जाता है कि कैसे वो शादी निभाने के लिए अपना भविष्य खत्म कर देती हैं.
 बैकग्राउंड में राजस्थानी संगीत जहां शादी के नौ महीने बाद वो साड़ी से एडजस्ट कर रही होती है. वेस्टर्न ड्रेस नही पहन सकती, साड़ी का रंग भी अपनी सास के कहे पर चुना जाता है और उसे काम करने के लिए मना कर दिया जाता है.
जब अमृता किचन में कुकर का ढक्कन खोलती है तो उस दृश्य से लगता है कि कितनी लाखों काम करने वाली महिलाएं अब शादी के बाद समझौता कर किचन तक सीमित हो गई होंगी.
 
डॉक्यूमेंट्री में अंग्रेज़ी की जगह हिंदी बोली जा सकती थी लेकिन वो कहानी की जरूरत है, भारतीय समाज ऐसा ही तो है. अंग्रेज़ी बोलता है पर जीता देशी जीवन ही है.

डॉक्यूमेंट्री का संगीत ऐसा है जिसे हम सुबह शाम सुनते हैं.जिसमें चिड़ियों की आवाज़ हो, शादी में बजने वाला संगीत हो या दृश्य की गम्भीरता के अनुसार बजता संगीत.

डॉक्यूमेंट्री के अंत में रोटी बनाती अमृता कहती है कि शादी के बाद आप अपनी पहचान खो देते हैं, मैं यही नही चाहती थी. घर में आने वाले 80 प्रतिशत लोग मुझे मेरे नाम से नही केशव की पत्नी के रूप में जानते हैं.

डॉक्यूमेंट्री का छायांकन बेहतरीन है, जिस एंगल से दृश्य दिखाए गए हैं वह खुद ही प्रभावित करते जाते हैं. अभिनय की बात की जाए तो इसके कलाकार खुद की ही कहानी कह रहे हैं और मंझे हुए नही हैं फिर भी अमृता झंवर और रितु की मां सीमा टापरिया भविष्य में बड़े पर्दे पर कैरियर तलाश सकते हैं.

डॉक्यूमेंट्री में महिलाओं की शादी से जुड़ी परेशानियों को दिखाने की जो कोशिश की गई है उसके लिए जितने लोग इसमें शामिल हुए उनकी हिम्मत काबिलेतारीफ है कि वो समाज के इस कट्टरतावाद के खिलाफ खड़े हुए, एक ऐसा जाल जिसमें वो भी फंसे हुए हैं.

डॉक्यूमेंट्री एक और महत्वपूर्ण सवाल यह छोड़ जाती है कि क्यों भूमि पेडनेकर को अपने बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन की जरूरत पड़ी ,क्या हम दीप्ति को वैसे ही नही अपना सकते थे जैसी वो है! कमी उनके शरीर में है या हमारे विचारों में!


निर्देशक- सरिता खुराना, स्मृति मुंद्रा
लेखक- सरिता खुराना, स्मृति मुंद्रा, जेनिफर टिएक्सिएरा
छायांकन- नैती गामेज़ू, शिवानी खट्टरी, आंद्रे डी अलेंकर ल्यों
संपादित- जेनिफर टिएक्सिएरा
संगीत- शाऊल साइमन मैकविलियम्स, अदरक शंकर
ओटीटी- अमेज़न प्राइम , नेटफ्लिक्स
रेटिंग- कुछ डॉक्यूमेंट्री इससे परे हैं

समीक्षक- हिमांशु जोशी, उत्तराखंड.

Thursday, November 4, 2021

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव विशेष : एक बड़े चुनावी मुद्दे 'भूकानून' की जड़ खोदती ये रिपोर्ट..

सोशल मीडिया के चिराग से 'उत्तराखंड मांगे भूकानून' का जिन्न पता नही कब बाहर निकल आया और सबकी ज़ुबान पर छा गया। आने वाले विधानसभा चुनाव में भी राजनीतिक पार्टियां के लिए भूकानून एक ऐसा मुद्दा है जिसपर वह वोटों का सैलाब अपनी तरफ़ मोड़ने का प्रयास करेंगे।

कोरोना काल में सालों पहले उत्तराखंड के गांवों को छोड़ देशभर में फैले हुए प्रवासी अपने गांव वापस लौटे और जीवन जीने के एकमात्र साधन कृषि पर निर्भर हो गए। जब उन्होंने यहां आकर देखा कि उत्तराखंड के अधिकतर लोगों ने उनकी अपनी ज़मीन बाहरी लोगों को औने पौने दामों में बेच दी और उन लोगों ने यहां की जमीनों में होटल बना कर पर्यटकों से कमाई शुरू कर ली तो शुरू हो गए वो भूकानून लागू कराने।

              फोटो साभार सोशल मीडिया

कृषि भूमि या अपनी भूमि की उपयोगिता हम उनसे समझ सकते हैं ,जिनके लिए गांवों में रहने के बाद अब भी उनकी ज़मीन ही रोज़ी रोटी का एकमात्र ज़रिया बनी हुई है।

अल्मोड़ा से साठ किलोमीटर दूर स्थित झालडूंगरा गांव के नवल कुमार राजकीय माध्यमिक विद्यालय झालडूंगरा में कक्षा नौ के छात्र हैं, गांव की दूरी मुख्य मार्ग से एक किमी दूर है। सुबह ग्यारह बजे वह मुझे अपने सहपाठी झालडूंगरा गांव के ही प्रकाश राम के साथ हाथ में स्मार्टफोन लिए बकरी चराते मिले।
नवल के पिता मिस्त्री हैं पर आजकल काम ठप है और
कोरोना काल के बाद से घर में खाने के लिए पैसे भी बड़ी मुश्किल से जुट पाते हैं।
पिता को मनरेगा से कभी-कभार काम मिलने पर कुछ कमाई हो जाती है या नैनीताल में काम करने वाले नवल के चाचा द्वारा भेजे पैसों से घर का चूल्हा जल जाता है।
उनकी छह बकरियां, एक भैंस और तीन बैल हैं। बकरी बड़ी होने पर उसे बेच देते हैं, जिससे 2500 रुपए प्रति बकरी तक की कमाई हो जाती है, भैंस का दूध परिवार के पीने के काम आता है।
नवल का परिवार अपनी ज़मीन पर रहते हुए अपना पेट पालने में तो सक्षम ही है, कल के दिन अगर वो लोग अपनी ज़मीन किसी को बेच देते हैं तो अभी इस गरीबी में भी कम से कम एक आशियाना होने की जो संतुष्टि नवल के परिवार में है वो खत्म हो जाएगी।
इसके बाद रोटी का जुगाड़ करने के साथ उसके परिवार को सर छुपाने का इंतज़ाम भी करना पड़ेगा।

एक नज़र कोरोना काल मे वापस लौटे प्रवासियों और उत्तराखंड की बेरोज़गारी पर

जून 2021 में आयी उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 3.5 लाख से अधिक प्रवासी सितम्बर 2020 तक अपने मूल स्थानों को लौटे इनमें सबसे अधिक जनपद पौड़ी, टिहरी और अल्मोड़ा से थे। इसके बाद लगभग 29% लोगों ने रोजगार के लिये पुनः पलायन किया। इसी प्रकार कोरोना की दूसरी लहर (अप्रैल 2021 से 5 मई 2021 तक) में 53,092 लोगों की वापसी हुई जिनमें अधिक संख्या पर्वतीय जिलों से थी, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि रोजगार के लिये पलायन पहाड़ी जिलों से अधिक होता है।

इंडिया स्पेंड वेबसाइट की एक रिपोर्ट पढ़ें तो पता चलता है कि सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के अनुसार उत्तराखंड में 2021 के मई से अगस्त के चार महीनों में बेरोजगारी की दर 5.3% थी जो कि देश में 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की बेरोज़गारी दर के आकड़ों में 17 वे नंबर पर रही और इस दौरान बेरोज़गारी दर का राष्ट्रीय औसत 8.57% रहा। हालाँकि ये आंकड़ा देश के दूसरे राज्यों की तुलना में काफी अच्छा दिखाई देता है लेकिन जब इस बेरोजगारी की दर को हम युवाओं में, यानी 20 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में देखते हैं तो पाते हैं कि यह दर इस वर्ग में काफी ज़्यादा है।

इस दौरान प्रदेश में 20 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में बेरोजगारी की दर 56.41% देखी गयी है। साल 20 से 24 के आयु वर्ग में बेरोजगारी की दर सबसे ज़्यादा 81.76% और 25 से 29 वर्ष में यह दर 24.39% है। देश में 20 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में बेरोजगारी की दर 27.63% देखी गयी है। साल 20 से 24 के आयु वर्ग में बेरोजगारी की दर सबसे ज़्यादा 41.53% और 25 से 29 वर्ष में यह दर 13.71% है।

 यह आंकड़े दर्शाते हैं कि राज्य में युवाओं की एक बड़ी संख्या है जो बेरोजग़ार है।

स्थिति साफ़ है प्रदेश के युवा बेरोज़गारी से तंग हैं और चाहते हैं कि वह स्वरोज़गार पर ध्यान केंद्रित करें पर भूमि बेचने को लेकर बने शिथिल कानून बड़े भूमाफियाओं को ज्यादा छूट दे रहे हैं, जिनसे लड़ने युवा आंदोलन चलाने पर मजबूर हैं।

कृषि ज़मीन के हालात और जमीन को लेकर समय-समय पर उत्तराखंड के बदलते कानून

आज उत्तराखंड में जमीन के हालत क्या हैं इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राज्य में हर साल औसतन पांच हजार हेक्टेयर कृषि भूमि खत्म हुई है। कुल लगभग आठ लाख हेक्टेयर भूमि में से तकरीबन एक लाख हेक्टेयर भूमि खत्म हो चुकी है। हर साल औसतन तीन हजार हेक्टेयर खेती की भूमि बंजर हो रही है। यह तो सरकारी आंकड़ा है, असलियत तो इससे अधिक भी हो सकती है, रुद्रपुर और देहरादून जैसे बड़े शहरों में कृषि की जगह अब दिखती कहां है!

प्रदेश में बड़े पैमाने पर हो रही कृषि भूमि की खरीद फ़रोख़्त, अकृषि कार्यों और मुनाफ़ाख़ोरी की शिकायतों पर वर्ष 2002 के दौरान प्रदेश में बनी प्रथम निर्वाचित कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री दिवंगत एन.डी तिवारी द्वारा संज्ञान लेते हुए वर्ष 2003 में 'उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम,1950' में कई बंदिशें लगाई गईं, जिसके बाद किसी भी गैर-कृषक बाहरी व्यक्तियों के लिए प्रदेश में भूमि खरीद की सीमा 500 वर्ग मीटर की गयी। इसके बाद वर्ष 2007 में बनी प्रदेश की दूसरी निर्वाचित भाजपा सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी.सी. खंडूरी ने अपने कार्यकाल में पूर्व में घोषित सीमा को आधा कर 250 वर्ग मीटर कर दिया। हालांकि ये सीमा नगरीय क्षेत्रों में लागू नहीं थी।

राज्य की उपजाऊ जमीन विकास और उद्योग के नाम पर बिल्डरों और संपन्न लोगों को लुटाई जाती रही। उस सरकार में बड़े पैमाने पर भूमि खरीद की इजाजत दी गयी। आश्चर्यजनक यह है कि उस सरकार में उत्तराखंड क्रांति दल भी शामिल था और उक्रांद के कोटे से मंत्री बने दिवाकर भट्ट सरकार में राजस्व मंत्री थे। उक्रांद चाहता तो तब मजबूत भू-कानून बनवा सकता था , पर उसने ऐसा कुछ किया नही।

वर्ष 2017 की बात है जब उत्तराखंड में फ़िर से भाजपा सरकार सत्ता में आई, जिसमें 57 विधायकों वाली पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत सरकार ने 04-06 दिसंबर 2018 को उत्तराखंड की विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान 'उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम,1950 में संशोधन का नया विधेयक पारित करवाया।

 इस संशोधन के तहत उक्त विधेयक में धारा 143(क) जोड़ कर यह प्रावधान कर दिया गया कि अब औद्योगिक प्रयोजन के लिए भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या फिर उससे कोई भूमि क्रय करे तो इस भूमि को अकृषि करवाने के लिए अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी पड़ेगी। औद्योगिक प्रयोजन के लिए खरीदे जाते ही उसका भू उपयोग स्वतः बादल जाएगा और वह अकृषि या गैर कृषि हो जाएगा। इसके साथ ही उक्त अधिनियम में धारा 154(2) जोड़ी गयी, जिससे कि यानी अब यानी पहाड़ों में भूमि खरीद की अधिकतम सीमा को समाप्त कर दिया गया। अब कोई भी राज्य में कहीं भी भूमि खरीद सकता है। साथ ही इसमें उत्तराखंड के मैदानी जिलों देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंहनगर में भूमि की हदबंदी (सीलिंग) खत्म कर दी गई। इन जिलों में तय सीमा से अधिक भूमि खरीदी या बेची जा सकेगी।

सदन में इस विधेयक के विरोध में सरकार द्वारा पहाड़ों की भूमि को बेचने की बुरी मंशा पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस से केदारनाथ विधानसभा विधायक मनोज रावत के जवाब में तत्कालीन दिवंगत कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत ने कहा था, "पर्वतीय क्षेत्रों में रोज़गार नहीं मिल पा रहा है, रोज़गार केवल इंडस्ट्री के माध्यम से आ सकता है, उनको लाने में हमे कुछ प्रबंध करना होगा। रोज़गार के लिए इंडस्ट्री 250 वर्ग मीटर में कैसे लगेगी? हमें प्रबंध करना होगा। रोज़गार लगाएंगे तो स्कूल खुलेंगे, हेल्थ टूरिज़्म लगेगा इसके साथ ही हमारे यहां पलायन रुकेगा। यह तभी संभव है जब हम उनको कुछ सुविधाएं देंगे।"

कांग्रेस के वरिष्ठ हरीश रावत नेता भुकानून को लेकर हाल ही में फेसबुक पर की गई अपनी पोस्ट में लिखते हैं.

#उत्तराखंड_मांगे_नया_भू_कानून, 

एक दिलचस्प बहस और मुझ जैसे लोगों के लिए यह अत्यधिक प्रसन्नता का विषय है कि ऐसे कानूनी पेजदगियों भरे विषय पर युवा चर्चा में भाग ले रहे हैं। मैंने लोगों के कमेंट्स पढ़े। मोटे तौर पर लोग जो जमीनों की बेखौफ, बिना बंदिश के खरीद-फरोख्त है, उससे चिंतित हैं। ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड इस दिशा में पहली बार चिंतित हुआ है या सचेष्ट होकर जनमत बनाने का प्रयास कर रहा है। उत्तराखंड की जो पहली निर्वाचित सरकार आई, उस सरकार की पार्टी के मेनिफेस्टो में हिमाचल की तर्ज पर भू कानून बनाने का उल्लेख था, जिसका अनुपालन करते हुये तत्कालिक सरकार ने 500 वर्गमीटर से ऊपर जमीन की खरीद के लिए सरकार की परमिशन अनिवार्य कर दी। दूसरी निर्वाचित सरकार आई, उसने 500 वर्ग मीटर के मापदंड को घटाकर के 250 वर्ग मीटर कर दिया, वो भी उत्तराखंड की कृषि योग्य भूमि को या देव तुल्य भूमि और उससे जुड़ी हुई संस्कृति को बचाने का एक प्रयास था। हमने राज्य की प्रस्तावित राजधानी गैरसैंण में भराड़ीसैंण से लगे हुए एरियाज के भूखंडों को नोटिफाइड कर दिया ताकि वहा की भूमि को कोई खरीदे न सके। 2017 के बाद आई सरकार का चिंतन इस दिशा में कुछ लीक से हटकर के रहा। उन्होंने उत्तराखंड में प्रचलित भू-कानून को इन्वेस्टमेंट के खिलाफ माना। उन्होंने उत्तर प्रदेश जमीदारी विनाश एवं भू सुधार अधिनियम में संशोधन कर विधानसभा में एक विधेयक पारित करवा लिया। इस विधेयक के माध्यम से उत्तराखंड में भूमि क्रय-विक्रय पर लगी संबंधी पाबंदियां शिथिल कर दी गई और कानून की धारा में 143 (क) और 154 (2) जोड़ते हुये पहाड़ों में भी भूमि खरीद की अधिकतम सीमा को खत्म कर दिया गया। 

       आश्चर्यजनक रूप से श्री मनोज रावत, अकेली आवाज रहे जिन्होंने उत्तराखंड की जन भावना को समझकर विरोध दर्ज किया और मुझे पता लगा तो मैंने भी अपना विरोध अपने फेसबुक पेज पर दर्ज किया। मगर जिस बहस की उम्मीद थी, जिस प्रतिक्रिया की उम्मीद थी, न विधानसभा में वह प्रतिक्रिया आई और न राज्य के अंदर कोई आवाज जबरदस्त तरीके से उठी। ऐसा लगा जैसे निवेश-निवेश, निवेश के कोरस में उत्तराखंड, भूमि के महत्व को भूल रहा है। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद प्रतिबंधों के बावजूद एक कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार 4500 हेक्टेयर भूमि प्रतिवर्ष खेती के दायरे से बाहर हो रही है। क्योंकि जितने भवन बन रहे हैं, जितनी अटालीकाएं बन रही हैं और सरकारी निर्माण भी, उनमें अधिकांश यही जमीन हैं और शेष जमीन वन विभाग की हैं, जो भारत सरकार की जमीन हैं और यदि इस लॉस को हम मृदा लॉस के साथ जोड़ें तो ये बहुत बड़ी पर्यावरणीय क्षति हर वर्ष हो रही है, जिसकी भरपाई की दिशा में कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जा रहा है। मैंने अपने कार्यकाल में तीन कदम इस प्रकार के भू-कानून के संबंध में बनाये।

1. पर्वतीय चकबंदी का कानून, जिसके रूल्स इत्यादि बना करके लागू करने का काम राज्य सरकार नहीं कर पा रही है। कुछ गांवों का चयन जरूर उन्होंने किया, जिनकी वो चकबंदी जहां से प्रारंभ करवाएंगे। मगर मामला कुछ सरकारी हल्ले-गुल्ले तक ही सीमित रहा है, आगे नहीं बढ़ा है। 

2. दूसरा हमने छोटी-छोटी जोतों व छोटे-छोटे जमीनों के टुकड़ों पर जो हमारे शिल्पकार भाइयों से लेकर के किसानों के कब्जे थे, हमने उनका नियमितीकरण कर दिया। हमने कहा जो ये उत्तराखंड की जमीनों के कई प्रकार के वर्गीकरण हैं और जिससे लिटिगेशन बहुत बढ़ता है, इस लिटिगेशन को मिनिमाइज के लिए यह कदम उठाया गया और इससे मैं एक अंदाज के आधार पर कह रहा हूँ कि नैनीताल जनपद में इंदिरा ग्राम, हरी ग्रामों आदि के जो मुकदमे हैं, वो बड़ी संख्या में हैं और वर्षों से लोग खेती में काबिज़ भी हैं, मालिक हैं भी और मालिक नहीं भी हैं, तो मैंने इस दुविधा को मंत्रिमंडलीय फैसला लेकर के समाप्त कर दिया। 

3. तीसरा कदम मैंने उठाया कि मैं चकबंदी का कैडर बनाऊं राज्य के अंदर और राजस्व के अंदर भर्तियां पैमाइशकर्ता जो लोग अमीन आदि हैं, उनकी भी भर्ती हो सके। क्योंकि इनका बिल्कुल टोटा पड़ गया है, उत्तराखंड के अंदर सरकारी कामों के लिए भी जमीन की पैमाइश के लिए अमीन मिलना मुश्किल हो जा रहे हैं और जो जमीनों के मामले में पारिवारिक उलझाव हैं और जिसके कारण छोटी-छोटी पूंजी यदि कोई कर्ज लेना चाहे, कर्ज नहीं ले पा रहा है, बहुत सारी दिक्कतें हैं, उन दिक्कतों को ध्यान में रखकर के हमने ये कैडर बनाने का फैसला किया। 

        मेरे मन में एक बड़ी कुलबुलाहट थी कि मैं, उत्तराखंड में तीसरा विकेट का बंदोबस्त और उसके बाद स्वतंत्र भारत में 1960 के करीब चला भू-बंदोबस्त और अब 2016 का बंदोबस्त करूं। लेकिन उसमें लगने वाली समय सीमा को देखकर के मुझे घबराहट हुई, क्योंकि बहुत सारे लिटिगेशन इत्यादि खड़े होते और यह निर्णय मेरे लिए समय काल परिस्थिति को देखकर के व्यवहारिक नहीं था, तो मुझे उस अव्यय को वहीं डम्प करना पड़ा। हां मैंने एक लीजिंग पॉलिसी जरूर बना दी कि ये विकास कार्यों के लिए हों, चाहे किसी भी कार्य के लिए हो। जमीन को खरीदा न जा सके, किसान और गांव के स्वामित्व को बचाए रखते हुए उनको 30 वर्ष तक लीज देने का अधिकार और उस लीज में उनके स्वामित्व को स्वीकार करते हुए मुआवजे का प्राविधान आदि किया गया जिससे ताकि पर्वतीय क्षेत्रों में हॉस्पिटल, स्कूल आदि में जो इन्वेस्टमेंट आए, उसका रास्ता ब्लॉक न हो। मगर बड़ा काम नया भू-कानून बनाना है, हमारे उत्तराखंड में लागू वर्तमान भू-कानून जिसको उत्तर प्रदेश जमीदारी उन्मूलन कानून के नाम से जाना जाता है, उस कानून को रिप्लेस कर सकें और उत्तराखंड की आवश्यकता, विकास की आवश्यकता, लोगों की आकांक्षाएं और उसके साथ-साथ उत्तराखंडी परिवेश और संस्कृति को बचाने के महति काम को कानूनी रूप देकर संरक्षित किया जा सके और हम कोई पहले राज्य नहीं हैं, जिसने इस दिशा में सोचा है। इस दिशा में सोचने वालों में कर्नाटक की देवराज अर्स गवर्नमेंट, देवराज अर्स जी के समय में जो भूमि सुधार हुए वो पढ़ने के लायक हैं और उन्होंने यहां तक की लोकल ट्रिब्यूनल्स बनाकर के लिटिगेशन का दायरा था, उसे सीमित कर दिया और उसको कोर्ट से बाहर निकाल दिया और ट्रिब्यूनल्स को कानूनी अधिकार दिलवा दिये, यह अपने आप में एक बहुत बड़ा कदम था। पूरे हमारे नॉर्थ ईस्ट जितना भी हिमालयन एरिया है और जितना जनजाति आवासित राज्य हैं, उन सबके अंदर कोई न कोई ऐसा भू कानून है, जो वहां की जमीन को किसी भी खरीद-फरोख्त से संरक्षित करता है और उनकी विकास की आकांक्षाओं को भी पूरा करता है। सिक्किम में नहीं था, तो सिक्किम ने शायद 2018-19 के आस-पास इस तरीके का कानून बना लिया, जब वहां निवेश आने लगा तो उन्होंने चेक एंड बैलेंस की नीति के लिए उस तरीके का कानून बनाया। मेघालय आदि में पहले से इस तरीके के कानून हैं, धारा 370, 371-A, B व 1,2,3, 4 कई धाराएं, वो धाराएं भूमि के अंधाधुंध खरीद-फरोख्त से इन राज्यों को और इन राज्यों के लोगों को और उनकी संस्कृति को संरक्षित करने का काम करती है। 

     21वीं सदी की अपनी अपेक्षाएं हैं और हमारी भी 21वीं सदी के युवाओं को अपने तरीके से सपने देखने और आकांक्षा रखने का अधिकार है। हमको नया भू-कानून, उनकी आकांक्षाओं को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए। उस कानून में एक ऐसी क्षमता समाहित की जानी चाहिए कि 21वीं सदी में आने वाली चुनौतियों का सामना हो सके। जैसे मैंने अभी भू-बंदोबस्त की बात कही, लीजिंग पॉलिसी की बात कही, चकबंदी कानून की बात कही, ये सब उस भू-कानून के हिस्सा होने चाहिए और कानून तब तक सफल नहीं होगा, जब तक हम भूमि का बंदोबस्त नहीं करेंगे। एक नई भू प्रबंधन नीति इस कानून से बाहर आनी चाहिए। हमारा उलझाव केेवल इस प्रश्न पर नहीं है कि हमारी जमीनें बिक रही हैं, कंक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं, परिवेश प्रदूषित हो रहा है, हमारी संस्कृति व परंपराओं के लिए खतरा पैदा हो रहा है, ये सब अपनी जगह पर सत्य हैं। मगर  इतना ही बड़ा सत्य यह भी है कि हमको भारत सरकार से भी खतरा है। हमारे गोचर पनघट जो गांव की असीसाला में गांव की संपत्ति हैं, वो आज प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट के नाम से और कई स्थानों पर रिजर्व फॉरेस्ट के नाम से गांव की संपत्ति से बाहर कर दिये गये हैं, वन विभाग उनको अपनी संपत्ति मान करके चल रहा है। गांव के विकास की आकांक्षा के लिए आवश्यक है कि हम कानून के दायरे को पुरानी भूमि व्यवस्था के आलोक में देखें और नये आलोक में यह प्रयास करें कि भारत सरकार हमारे गांव गोचर पनघट की जमीन पर हमारे गांव का स्वामित्व स्वीकार करे और उसी तरीके से जल, मैं जानता हूंँ जल विवादों के कारण बहुत सारे उलझाव खड़े होते हैं लेकिन जब हम 21वीं सदी में अपने विकास के अस्त्र के रूप में जल संग्रहण को लेकर के चलना चाहते हैं, जिसके लिए मैंने अपनी सरकार के समय में जल बोनस नीति भी बनाई थी, चाल-खाल और नदियों में जगह-जगह स्टोरेज खड़े किए थे, उसको और व्यवस्थित साइंटिफिक रूप देकर के ग्राम समाज के साथ जोड़ करके एक नया अभियान प्रारंभ करना पड़ेगा, ताकि जल, जमीन, जंगल, ये तीनों का एक समन्वित स्वरूप नये कानून के बाद स्पष्ट हो सकेगा। मैंने ये मुद्दे, कुछ चर्चा/बहस के लिए उठाए हैं और मुझे खुशी होगी कि इस बहस में यदि कुछ प्रबुद्ध लोग आगे आएं और कुछ नया मार्गदर्शन प्राप्त हो ताकि 2022 में जो राजनैतिक परिदृश्य बने, उस परिदृश्य में नया भू-कानून एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सके। 

                     "जय हिंद"

                                                      (हरीश रावत)

उत्तराखंड में हिमाचल की तरह ही भुकानून लागू कराने की बात समय समय पर की जाती रही है, पर हमें नागालैंड और सिक्किम में जमीन से जुड़े कुछ कानूनों के बारे में जानने की जरूरत भी है.

अनुच्छेद 371A - नागालैंड

संविधान के इस प्रावधान के तहत नागालैंड का नागरिक ही वहां जमीन खरीद सकता है। देश के अन्य राज्यों के व्यक्ति को नागालैंड में जमीन खरीदने का अधिकार नहीं है। इसके तहत नगालैंड के मामले में नगाओं की धार्मिक या सामाजिक परंपराओं, इसके पारंपरिक कानून और प्रक्रिया, नागा परंपरा कानून के अनुसार फैसलों से जुड़े दीवानी और फौजदारी न्याय प्रशासन और भूमि और संसाधनों के स्वामित्व और हस्तांतरण के संदर्भ में संसद की कोई भी कार्यवाही लागू नहीं होगी।

अनुच्छेद 371F - सिक्किम

इसके तहत सिक्किम के पास पूरे राज्य की जमीन का अधिकार है, चाहे वह जमीन भारत में विलय से पहले किसी की निजी जमीन ही क्यों ना हो। यहां जमीन विवाद में देश के सुप्रीम कोर्ट या संसद को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। इसी के तहत सिक्किम की विधानसभा का कार्यकाल चार साल का है।

भूमि बंदोबस्त होगा तो पर उस पर भी सोचने की जरूरत

हाल में कहा गया था कि उत्तराखंड सरकार प्रदेश में पहली बार भू बंदोबस्ती को लेकर प्रदेशवासियों को बड़ी राहत देने जा रही है। बता दें कि देश में हुई 1960 की बंदोबस्ती के बाद उत्तराखंड राज्य गठन से लेकर अब तक भू बंदोबस्ती नहीं हुई है। मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह ने बताया था कि जल्द ही भू बंदोबस्ती को लेकर कार्रवाई शुरू की जाएगी।

उत्तराखंड में भूमि का बंदोबस्त इस तरह है कि अधिकांश किसानों के पास नाप भूमि के साथ-साथ बेनाप भूमि भी है। गांव वालों के पास तो केवल बेनाप भूमि ही है, इस भूमि पर उनका मकान है तथा खेती भी होती है। नगरपालिका बन जाने के बाद बेनाप भूमि के नजूल में परिवर्तित होने की सम्भावना है। जिसे लेकर स्थानीय लोगों में डर का माहौल है। एक बात यह भी सामने आ रही है कि जंगल, पानी, वन पंचायतों का हक हकूक, जो थोडा बहुत बचे हुए हैं वे भी समाप्त हो जाएंगे। पहाड़ों में शहरों की संस्कृति व गांवों की संस्कृति में अभी भी बहुत अंतर दिखाई देता है, गांव को शहर से जोड़ने से न तो गांव शहर बन पाएंगे और न ही गांव गांव रह पाएंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि शहरों को गांवों में मिला गांवों को उजाड़ने की पूरी कोशिश की जा रही है।

जंगल ,पानी के अधिकार तो ख़त्म हैं ही अब पर्वतीय कृषि उत्पादक बनाने की जरूरत.

प्रदेश के पानी पर हमारा अधिकार पहले ही खत्म हो चुका है, बिजली परियोजनाओं से हमें कुछ नही मिलता। कई रिपोर्टों से साबित हो चुका है कि प्रदेश में आने वाली बड़ी आपदाओं के लिए ये परियोजनाएं ही जिम्मेदार हैं, भविष्य में भी प्रदेश को इनसे खतरा बना हुआ है।

जंगलों पर अधिकार पहले ही ख़त्म है, अंग्रेज़ों ने जितने अधिकार स्थानीय लोगों को प्रदान किए थे आज़ाद भारत की जनता को अपने जंगलों में उससे कम अधिकार मिले हैं। भुकानून बनने के बाद भी जनता की समस्या का समाधान होगा यह कह पाना मुश्किल है, प्रदेश में जाना माना कृषि विश्वविद्यालय है पर उसने पहाड़ी कृषि में उत्पादकता बढ़ाने के लिए कितना काम किया है यह बड़ा प्रश्न है।

जरूरत है पर्वतीय कृषि को उत्पादक बनाया जाए और पहाड़ी स्थानों में रहने वाले प्रदेशवासियों को स्वरोज़गार के नए अवसर प्रदान किए जाएं।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

@himanshu28may

मेरे हिस्से की दीवाली.

मेरे हिस्से की दीवाली.

लगे हैं चारों तरफ़ झालर और फूट रहे पटाख़े, 
कैसे फोन से कहूं अपने घर में कि मना लो तुम मेरे हिस्से की दीवाली.

शोर मचा है बच्चों का, जगमगा रहा है भारत.
तनख्वाह का हिस्सा भेज मैंने भी बोला है अपने बच्चों से फुलझड़ी जला मना लो तुम मेरे हिस्से की दीवाली.

शाम ढली है, अस्त-व्यस्त भीड़ को तरतीब से घर भेजना है मुझे.
मन ही मन सोच रहा हूं, 
सुरक्षित घर पहुँचों तुम और मना लो मेरे हिस्से की दिवाली.

कसी बेल्ट और टोपी में खड़ा हूं सड़क पर, फ़िर भी उलझते जाते हो तुम मुझसे.
चुप हूं मैं क्योंकि मन ही मन सोच रहा हूं जाओ तुम घर और मना लो परिवार संग मेरे हिस्से की दीवाली.

गुज़ारिश है मेरी तुमसे सड़क पर मिले तुम्हें कोई ख़ाकी में,
तो कोरोना में उनके साथ को याद कर एक टुकड़ा मिठाई का उन्हें दे,
तुम कह दो 'लो जी आप भी मना लो अपने हिस्से की दिवाली'

हिमांशु जोशी

Monday, November 1, 2021

गांव बदलेगा तो देश बदलेगा उदाहरण वाली एक ख़बर

उत्तराखंड के 'केबर्स' गांव का नाम सुना है? नही! 
इससे पहले मैंने भी नही सुना था. पर इस दिवाली वहां जो धमाका हुआ है उसे आपने भी देखना चाहिए, क्या पता इस प्रकाश से चारों तरफ़ फैला अज्ञानता का अंधेरा दूर भागे.

सार-
देशभर में कोरोना काल के दौरान हर लाइब्रेरी पर ताले लगा दिए गए, वाट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान बांटा गया तब पहाड़ों पर एक ग्राम प्रधान ऐसा भी आया है जिसने इसके ख़िलाफ़ लड़ने के लिए कमर कस ली है.
इसी ग्राम प्रधान ने बड़े शहरों में होने वाली परफॉर्मिंग आर्ट से भी अपने गांववासियों को रूबरू कराया है, वह कोरोना से बेरोजगार हुए गांव के युवाओं के लिए साइटसीइंग, बर्ड वॉचिंग और फॉरेस्ट वॉक के साथ ही परफॉर्मिंग आर्ट को आय के साधन के रूप में विकसित करना चाहते हैं।
पढ़िए देश बदलने का माद्दा रखने वाली यह ख़बर।

विस्तार-
बंगाल या फिर केरल के गांवों में आप घूमेंगे तो आपको वहां पब्लिक लाइब्रेरी आसानी से दिख जाएंगी। बंगाल ने उस धरोहर को पीढ़ी दर पीढ़ी न केवल आगे बढ़ाया है, बल्कि निखारा भी है। 
कोरोना काल में जब देशभर में शराब के ठेकों पर भारी भीड़ रही और लाइब्रेरी बंद रही ऐसे समय में पब्लिक लाइब्रेरी का प्रयोग उत्तराखंड में भी शुरू हो रहा है। 
सुदूर गांवों में लोग खुद की पहल से लाइब्रेरी स्थापित कर रहे हैं। अब इस कड़ी में पौड़ी के एक ग्राम प्रधान ने दो कदम आगे बढ़कर अपने साथियों की मदद से गांव के आर्थिक हालातों को विकसित करने के उद्देश्य के अंतर्गत परफॉर्मिंग आर्ट से गांव को जोड़ने की दिशा में कदम आगे बढ़ाया है। 

'पाताललोक' के कलाकार संग परफॉर्मिंग आर्ट

एक नवंबर को पौड़ी जिले के 'केबर्स' गांव में ग्राम प्रधान कैलाश सिंह रावत ने अपने साथियों की मदद से एक लाइब्रेरी की स्थापना की है। खास बात यह है कि इस लाइब्रेरी में विश्व साहित्य से जुड़ी किताबों के साथ ही हिंदी में उपलब्ध मशहूर कृतियों का संकलन बनाया गया है। बाल साहित्य को खास तौर पर लाइब्रेरी में तवज्जो दी गई है, लाइब्रेरी के उद्घाटन के मौके पर बड़ी संख्या में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। 
यह अपने किस्म का पहला आयोजन था। 'प्रगतिशील पुस्तक केंद्र' और 'मुस्कान उत्तराखंड' ने गांव की लाइब्रेरी तैयार करने के लिए अपनी टीम उपलब्ध करवाई। इस दौरान पीढ़ी दर पीढ़ी 'रामलीला' का मंचन देखते आ रहे ग्रामीणों के लिए पहली मर्तबा मशहूर रशियन कथाकार 'अन्तोन चेखव' की कहानी पर आधारित 'नील सिमोन' के नाट्य रूपांतरण के अडॉप्टेशन कॉमेडी म्यूजिकल प्ले 'ये क्या मजाक है!' का मंचन भी किया गया। 'संवाद आर्ट ग्रुप' की ओर से गांवों में परफॉर्मिंग आर्ट को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस नाटक को प्रस्तुत किया गया था।


परफॉर्मेंस को मिले लोगों के प्यार से शो के मुख्य किरदार अनूप गुंसाई भी खासे उत्साहित नजर आए। शो को लेकर उन्होंने कहा— 'ये एक प्रयोग था। प्ले को लेकर शहर की तैयार और वेल डेवलप्ड ऑडिएंस के मुकाबले हमारे सामने रॉ आडियंस थी, जो पहली मर्तबा किसी नाटक की गवाह बन रही थी, ये शानदार क्षण था। हमें दिन के उजाले में ये प्ले करना था, जिसका सीधा सा मतलब था आधा जादू जो लाइट पैदा करती है, वो विकल्प हमारे पास था ही नहीं। 
बावजूद इसके जहां बतौर एक्टर हमें ऑडिएंस का रिएक्शन चाहिए था, वहां वो खुलकर रिएक्ट कर रहे थे। खासकर बच्चे.. उनके नैसर्गिक भाव उत्साहित करने वाले थे।'
 अनूप गुंसाई इससे पहले भारत के कई शहरों में 'ये क्या मजाक है!' के अस्सी से भी ज्यादा शोज़ कर चुके हैं। अनूप मशहूर वेब सीरीज 'पाताललोक' समेत मेघना गुलजार की चर्चित फिल्म 'तलवार' और 'बेवकूफियां' में भी नजर आ चुके हैं।

अब होगा वाट्सएप यूनिवर्सिटी बनाम लाइब्रेरी

केबर्स गांव में लाइब्रेरी को 'वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पुस्तकालय' नाम दिया गया है। लाइब्रेरी खोलने के फैसले को लेकर ग्राम प्रधान कैलाश सिंह रावत दो टूक कहते हैं— 'हम व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के जरिए फैल रहे झूठ से परेशान हैं। गांव के लोग तथ्यों के साथ अपनी समझदारी विकसित कर सकें, इसके लिए जरूरी है कि वो किताबों के करीब जाएं। 

आने वाला दौर इंटलेक्ट और डेटा का है। हम अपने इतिहास से वर्तमान को जोड़कर टूरिज्म का एक सस्टेनबल मॉडल भी तैयार कर रहे हैं। इसके लिए हम लॉकडाउन के बाद खाली हुए नौजवानों के साथ मिलकर परफॉर्मिंग आर्ट को गांव से कनेक्ट कर रहे हैं, ताकि हम 'विलेज टूरिज्म' के जरिए अपनी लोकल इकॉनमी को मजबूत कर सकें।' वो कहते हैं जब प्रशासन बेरोजगारों की फौज को लेकर नहीं सोच रहा, तब हमें खुद ही आगे बढ़कर अपनी इस पीढ़ी को सपोर्ट करना होगा।

बहरहाल, गांव में हुए इस अनोखे आयोजन और किताबों की आवक से लोग उत्साहित नजर आ रहे हैं। गांव वालों के इस कदम की न केवल तारीफ हो रही है, बल्कि आसपास के गांवों में चर्चा भी शुरू हो गई है। 

ग्राम प्रधान का क्या है प्लान
— गांव के खाली पड़े हुए घरों को रहने लायक बनाकर 'विलेज टूरिज्म' की दिशा में बढ़ना.
— साइटसीइंग, बर्ड वॉचिंग और फॉरेस्ट वॉक के साथ ही परफॉर्मिंग आर्ट को आय के साधन के रूप में विकसित करना.
— लंबे प्रवास के लिए लायब्रेरी समेत दुनिया के मशहूर नाटकों का मंचन समेत अन्य लोक कलाओं का प्रदर्शन.
— पढ़ने—लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देना.
— इकॉनमी का सस्टेनेबल मॉडल तैयार करना, जिससे गांव में ही रोजगार सृजित हो सके.

क्या है गांव की मौजूदा स्थिति

कोरोना के बाद बिगड़ी भारतीय अर्थव्यवस्था के चलते गांव के 18 से 25 साल तक के करीब 55 लड़के घर पर हैं। इनमें से कई लॉकडाउन से पहले शहरों में काम करते थे, लेकिन अब वो खाली हैं। 
परफॉर्मिंग आर्ट के जरिए यदि गांव में टूरिस्ट पहुंचते हैं, तो इनमें से आधे युवाओं का रोजगार स्थानीय स्तर पर सृजन किया जा सकता है।

हिलांश टीम के साथ हिमांशु जोशी, उत्तराखंड.

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...