हमको चाहिए आज़ादी, आज़ादी.
क्यों हम मुंह मोड़ देते हैं जब सर पर बैठे कोई कहता है आज़ादी आज़ादी
कान ,आंख बंद हैं हमारे या सी दिया है मुंह जब मांग रहा है कोई आज़ादी.
क्या तब खून कम बहा था जो अब एक पद्मश्री कहती है कि अब मिली है आज़ादी. (Kangana)
क्या हिन्दू-मुस्लिम के बीच बनी नफ़रत की दीवार ही है आज़ादी.
एक खून जब दूसरे खून को , बिना धर्म का लिबास ओढ़ अपना खून देता है, क्या वो नही है आज़ादी!!
चमकता गहना था दिल्ली , पर क्या वहां खून बहा कर मिली है ये नकली आज़ादी.
तब तो नाले में सनी हुई मिली थी हमारी आज़ादी!!!
या अब बर्फ़ से ठंडे पड़े जवानों को श्रद्धांजलि दे मिली है आज़ादी.
क्या है ये आज़ादी, बोलने की पाबंदी या जेल में ठूस देने को कहते हो तुम आज़ादी.
नफ़रत ऐसी कि लिखते हो फ़ोन पर बलात्कारी हूं मैं या किसी को पेड़ से बांध नंगे बदन को ज़ख्म देना है आज़ादी.
भाषा पर लड़ना है आज़ादी!
नही ,तो सोचो फ़िर आखिर क्या है आज़ादी, क्या है आज़ादी.
आज़ाद..
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