Wednesday, August 14, 2024

बहनों को रक्षा बंधन का तोहफा, समाख्या कार्यक्रम 2.0



शतदल रेडियो का संचालन करने वाली प्रज्ञा मिश्र स्पष्ट शब्दों में कहती हैं कि पोर्न एडिक्शन के कारण हिंसा बढ़ती है और इस घटना में भी जिस निर्ममता के साथ बलात्कार के बाद हत्या की गई है, उसमें पोर्न का प्रभाव दिखता है।



महिला समाख्या कार्यक्रम बन्द होना महिलाओं का दुर्भाग्य था।

देहरादून की प्रीति थपलियाल लगभग दो दशक तक महिला समाख्या कार्यक्रम के साथ जुड़ी रही थी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत महिला सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में साल 1989 में शुरू किए गए महिला समाख्या कार्यक्रम में काम करते हुए उन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति को गौर से समझा था। 

कोलकाता में महिला डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार पर वह कहती हैं कि हमारा भारतीय समाज अभी भी एक पुरुष प्रधान समाज है, जिसमें महिलाओं को बस उपभोग की वस्तु के तौर पर ही देखा जाता है। हमारे यहां के लगभग सभी परिवारों में महिलाएं निर्णायक की भूमिका में नही हैं, उन्हें घर के किसी भी फैसले में शामिल नही किया जाता है और उन्हें घर के अंदर, बाहर हिंसा का शिकार होना पड़ता है।

इन बढ़ती हिंसाओं को रोकने के लिए घर में नई पीढ़ी के साथ शुरुआत से ही लिंग भेदभाव पर काम किया जाना जरूरी है। लड़कों को बचपन से ही लड़कियों का सम्मान करना सिखाना होगा। भाई- बहनों के बीच शिक्षा, पहनावे, घर की साफ- सफाई, खेलकूद में कोई भेदभाव नही किया जाना चाहिए और माता- पिता को भी बच्चों के सामने एक दूसरे सम्मान देना चाहिए। यदि पिता का व्यवहार माता के साथ ठीक नही रहता है, वह घर के कार्यों में अपनी पत्नी का सहयोग नही करता, परिवार के भले के लिए जाने वाले महत्वपूर्ण निर्णयों में महिलाओं की नही सुनी जाती है तो इसका बच्चों के मन में विपरीत असर पड़ता है। घर के लड़के विपरीत लिंग के सामने खुद को श्रेष्ठ समझने लगते हैं और लड़कियां पहले ही यह समझ लेती हैं कि वह लड़कों से कमतर हैं और लड़के हर क्षेत्र में उनसे आगे हैं।

प्रीति कहती हैं पोर्न वीडियो, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म में दिखाई जा रही अश्लीलता, हिंसा को देखकर लोगों में विकृत मानसिकता पैदा होती है और इन सब तक डिजिटल इंडिया में लोगों की पहुंच भी बहुत आसान है। वह कहती हैं कि इन पोर्न वेबसाइटों और अश्लील सामग्रियों पर सख्ती के साथ प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

महिलाओं की घटती स्वतंत्रता और उनके खिलाफ बढ़ रहे अपराधों पर अपनी बात खत्म करते हुए प्रीति थपलियाल कहती हैं कि हम महिलाओं का यह दुर्भाग्य ही था कि 'महिला समाख्या कार्यक्रम' को सरकार ने साल 2015 में बन्द कर दिया। भारत में कई जगह महिलाओं के खिलाफ होने वाले अधिकतर अपराधों का तो किसी को पता भी नही चलता, यह अपराध हर जगह होते हैं और इसमें उनका अपना घर भी शामिल होता है।।
महिला समाख्या कार्यक्रम से हम उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में भी महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के बारे में पता करते थे, हम वहां पहुंचकर उन महिलाओं को न्याय दिलाने में सहायता करते थे और इसके साथ ही हम महिलाओं का सम्मान करने के लिए लोगों को जागरूक भी करते थे।

भंडारी।

पितृसत्तात्मक सोच के बदलने के लिए इसे शुरू किया गया। कल्याणी मेनन सेन, आभा भैया, कमला भसीन इन सब की मेहनत।

शिक्षा विभाग के अंतर्गत इसे शुरू किया गया क्योंकि सेक्रेटरी उसी के थे।
1989 में इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चार जिलों में शुरू किया गया। बांदा, बनारस, टिहरी और सहरानपुर में शुरू हुआ। महिलाओं को संगठित कर शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण पर काम शुरू हुआ। गांव के स्तर से इसकी शुरूआत हुई, एक जगह जागरूक कर दूसरी जगह जाने का विचार हुआ। सहयोगिनी दस गांव की कॉर्डिनेटर होती थी, तीन



हिमांशु जोशी।


आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...