Sunday, May 21, 2023

एक प्रेम कहानी जो याद दिलाती है कि आतंकवाद और दंगों का कोई धर्म नही होता.

अंग्रेज़ी में एक कहावत है ' डोंट जज ए बुक बाय इट्स कवर ' यह कहावत शायद 'सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी' के लिए लिखी गई होगी. बाहर से देखने पर यह किताब कभी इतनी गम्भीर नही लगी पर जब इसे पढ़ना शुरू किया, देश के आज के हालात मेरी नज़रों के सामने घूमने लगे. लेखक सारंग उपाध्याय ने वास्तविक घटनाओं के इर्दगिर्द ऐसी काल्पनिक दुनिया रची है जो काल्पनिक होते हुए भी वास्तविक रही होंगी. साम्प्रदायिकता और आतंकवाद से प्रभावित 'वह समुंदर के किनारे समुंदर की तरह ही हो गई थी, दुनिया के शोर से अलग अपने अंदर थमी और ठहरी हुई' जैसी पंक्तियां लिए इस प्रेम कहानी को आप हमेशा याद रखेंगे.


राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई प्रिंट मीडिया से जुड़े पत्रकार सारंग उपाध्याय की किताब 'सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी' का आवरण शुऐब शाहिद ने तैयार किया है. आवरण से पाठकों को मुंबई की भागादौड़ी भरे जीवन की झलकी दिखती है.

किताब की शुरुआत में गीत चतुर्वेदी ने किताब का जो परिचय दिया है, उससे पाठकों को यह जान पड़ता है कि यह किताब एक प्रयोग है. मुंबई की स्थानीय भाषा को आम हिंदीभाषी के सामने परोसने का प्रयोग फिल्मों में तो सफल रहा है पर हिंदी साहित्य में यह प्रयोग क्या गुल खिलाता है यह इसके पाठक ही बताएंगे.

चित्रकार या लेखक.

ग्यारह किस्सों में लिखी गई इस किताब में हर किस्से से पहले एक कविता शामिल की गई है, वह कविता हर आने वाले किस्से का ख्वाब बुनने में पाठकों की मदद करती है.
किताब के शुरुआती तीन पन्ने ही पाठकों की रुचि किताब में बनाने में कामयाब हो जाते हैं.

लेखक ने एक चित्रकार की तरह अपनी इस रचना को रचा है. पहले किस्से की यह पंक्ति 'कोई चेहरे बैचेनी में तर थे और असंख्य माथे उमस में लाल-पीले हुए जा रहे थे' पाठकों के सामने एक चित्र सा बना जाती है.
पात्रों का परिचय भी कुछ इसी तरह दिया गया है. सायरा के रंग और चूड़ियों के बारे में पढ़कर कोई भी सायरा की खूबसूरती का कायल हो जाएगा.
'किसी पर सायरा की निगाह पड़ जाए तो उसकी आंखों में स्वप्न परियां डेरा डाल देती और फिर तो उसे सायरा के नाम का मोतियाबिंद ही हो जाता' पंक्ति तो पाठकों की कल्पना को और ऊंचाई दे देती है.

पत्रकारों को लेखक के तौर पर हल्के में लेने की भूल अब और नही.

लेखक पत्रकार हैं तो किताब पढ़ने से पहले यही उम्मीद थी कि कहानी वैसी ही होगी जैसी एक पत्रकार लिख सकता है, मतलब जैसा देखा वैसा लिखा. पर यह कहानी सारंग उपाध्याय की कल्पनाओं से निकली है, वह कल्पना जो उन्होंने मुंबई, वहां के मछुआरों को करीब से जानते बुनी होंगी. किताब की पंक्ति 'नाव की देखभाल किसी बच्चे की तरह करनी होती है' और 'चाय और वड़ा पाव के दस से पन्द्रह रुपए तो लग ही जाते थे और ये भी बचाएं तो भूखे पेट चक्कर आ जाना आम बात थी' इसका प्रमाण हैं.

 'उसका घर मुंबई के सबसे चमकते इलाके अंधेरी के सबसे अंधेरे इलाके में था' पंक्ति के जरिए लेखक मुंबई का सच हमारे सामने रख देते हैं. कहानी में लेखक यह भी शामिल करते हैं कि हमारा सिस्टम कैसे सिर्फ गरीबों को ही सताता है.
मछुआरों को जीवन को अपनी कहानी का आधार चुनने के बाद उनकी प्रेम कहानी को भी लेखक ने अद्भुत तरीके से बुना है. जैसे वह लिखते हैं 'राघव को अब मछलियों से घिन नहीं आती थी बल्कि उन्हीं मछलियों से सायरा की खुशबू आती और सायरा को देखते ही वह किसी सुंदर मत्स्य कन्या की कल्पना में खो जाता.'

कहानी याद दिलाती है आतंकवाद और दंगों का कोई धर्म नही होता.

किताब की कहानी साल 1992-93 के दौरान देश में हिंदू मुस्लिमों के बीच बदल रहे रिश्तों के दौरान एक मुस्लिम लड़की के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है.
कहानी को लेखक ने टाइमलाइन के जरिए बांधा है, जिसको पढ़ने के साथ देश में चल रहे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों से भी पाठक वाकिफ होते जाते हैं. लेखक ने अपनी कहानी के काल्पनिक पात्रों को वास्तविक घटनाओं के साथ जोड़ा है. जैसे इस उपन्यास की पात्र सायरा की मां अरफाना की कहानी को शाहबानो केस के साथ जोड़ा गया है.
कहानी के ज़रिए लेखक यह याद दिलाने में कामयाब रहे कि वर्ष 1992 अयोध्या विवाद हो या 1993 मुंबई बम धमाके इनका शिकार ऐसे लोग हुए, जिन्हें राजनीति से कोई मतलब नहीं था.
इन लोगों को अपने काम धंधे से फुर्सत नहीं थी तो मंदिर मस्जिद के लिए लड़ने का उनके पास समय कहां होता पर वो राजनीतिक उद्देश्य के साथ फैलाई गई नफरत का शिकार हुए. उसमें हिन्दू थे तो उसमें मुसलमान भी थे.

 'सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी' के लेखक प्यार बांटते हैं.

फिल्म 'आदिपुरुष' के संवाद लिखने वाले मनोज शुक्ला पर समाज को बांटने के आरोप लग रहे हैं, वहीं सारंग उपाध्याय अपनी इस किताब से समाज को यह दिखाने में कामयाब रहे हैं कि कोई रचनात्मक व्यक्ति अपनी रचना के जरिए समाज में घुल रहे साम्प्रदायिकता के जहर को कैसे समाप्त कर सकता है.
'मुसलमान गणपति पंडालों में गणपति प्पा मोरया पुदचा वर्ची लौकर या बोलने में हिचकिचाते नही थे और हिन्दू मोहम्मद अली रोड पर ताजियों से मन्नत मांगा करते थे' लिखकर लेखक हमारे आपसी भाईचारे की याद दिलाते हैं. लेखक ने कहानी में काफी उतार चढ़ाव के बाद भी किताब का अंत सुखद किया है. उनकी नजरों में यह प्रेम कहानी प्रेम के वास्तविक रूप में ही समाप्त होती है, जहां न धर्म की बेड़ियां हैं और न सिर्फ शरीर से प्रेम है.

एक दो कमियों को छोड़ दें तो कमाल है यह किताब.

पृष्ठ संख्या 82 में 12 मार्च 1993 मुंबई बम धमाकों का दिन है, उसे 1992 लिख दिया गया है. यह गलती अगले संस्करणों में सुधार सकते हैं.
मध्य में आकर कहानी सायरा के जीवन में अटक सी गई है, किताब का सातवां किस्सा थोड़ा कम किया जा सकता था क्योंकि इस हिस्से तक कहानी के पहुंचते हुए पाठकों की उत्सुकता फ्लेशबैक से वर्तमान को जानने के लिए बढ़ने  लगती है. लेकिन आठवां किस्सा आते ही किताब फिर तेज गति से भागने लगती है.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may

चक्र

करीब चार साल पहले की बात है उत्तराखंड के अजीतपुर में नदी किनारे बने एक झाले में रह रही महिला मुझे दिखी थी। झाले के आधे हिस्से को चाय, बीड़ी और गुटखा बेचने के लिए दुकान का रूप दिया गया था, बाकी आधे हिस्से मे जमीन पर उस महिला का बिस्तर बिछा था। 
दुकान पर अक्सर उस महिला का दिव्यांग पति दिखाई देता था, पूछने पर उसने बताया था कि महिला पहले किसी दूसरे पुरूष के साथ रहती थी अब उसके साथ रहती है। दोनों के बीच का रिश्ता पेट के लिए था।
खनन की ट्रक में आए ड्राइवरों की नजर हमेशा उस महिला पर रहती थी। आज जब साल 1981 में आई फ़िल्म 'चक्र' देखी तो स्मिता पाटिल का चेहरा देख मुझे उसी महिला की याद आ गई।

चक्र देख कर बहुत से लोग कहेंगे कि महिलाओं की स्थिति में फ़िल्म आने के बाइस साल बाद बहुत परिवर्तन आए हैं, उन्हें रोजगार मिले हैं, स्वतंत्रता मिली है पर यह वही लोग होंगे जो भारत के विकास पर सिर्फ शहरों की बड़ी बिल्डिंगों को देखकर दंभ भरते हैं। झुग्गी झोपड़ियों के साथ आम मध्यम वर्गीय परिवारों में आज भी महिलाओं की स्थिति में कोई खास परिर्वतन नही आए हैं, उसका जीवन खुद का पेट भरने के साथ अपने बच्चों के भविष्य के सपने देखने में ही गुजर जाता है। अधिकांश भारतीय महिलाएं आज भी एक चक्र में फंसी हुई है, जिससे बाहर निकलना उनके लिए आज भी सम्भव नही हुआ है।

Tuesday, May 2, 2023

प्रेस फ्रीडम, मुद्दों को प्राथमिकता बदलेगी पत्रकारिता.

भारत में प्रेस की आजादी बहुत गम्भीर स्थिति में पहुंच गई है. अब देश के अन्य हिस्सों में दिल्ली से ही बता दिया जाता है कि क्या लिखना और बोलना है. अभी देश की राजनीति और जनता एक जैसे विचार रखती है, जब हमारे देश में धर्म जाति को छोड़ मुद्दों को प्राथमिकता मिलने लगेगी तब प्रेस भी मजबूत हो जाएगी.

पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए कार्य करने वाले अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा 180 देशों में पत्रकारिता की स्थिति का विश्लेषण कर जारी की गई रिपोर्ट 'विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2023' में भारत 161 वें पर है और भारत में प्रेस की आजादी बहुत गम्भीर स्थिति में पहुंच गई है. रिपोर्ट में बताया गया है कि 1 जनवरी 2023 से अब तक भारत में एक पत्रकार को मार दिया गया, यह हत्या महाराष्ट्र में हुई.

रिपोर्ट में कुलीन वर्गों द्वारा मीडिया अधिग्रहण को भारत में प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त होने की मुख्य वजह बताया गया है.

पिछले साल जब भारत रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स की इस सूची में 150 वें स्थान पर था, तब भारत सरकार ने कहा था कि  वह इन निष्कर्षों से सहमत नहीं है. भारत सरकार भले ही एक संगठन के निष्कर्षों से सहमत नही थी पर पिछले साल
रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स को मिलाकर विश्व के दस प्रमुख मानवाधिकार संगठनों ने भी भारत में प्रेस को दबाने की बात कही थी. इन संगठनों में कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स, फ्रीडम हाउस, पेन अमेरिका,  इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स, सिविकस, एक्सेस नाउ, इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स, एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच शामिल थे.

4 मई की सुबह पत्रकार साक्षी जोशी का ट्वीट भी भारत में प्रेस की खत्म होती स्वतंत्रता पर मुहर लगाता है. दिल्ली में पहलवानों के प्रदर्शन को कवर करने जा रही साक्षी जोशी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. साक्षी जोशी ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि मुझे हिरासत में लिया, धक्के मारे ,कपड़े फाड़े, कैमरा छीना. उनके द्वारा साझा किए वीडियो में दिख रहा है कि किस तरह एक पत्रकार को उसकी खबर कवर करने से रोका गया.


राज्य प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सबसे सम्भावित खतरा.

बी मुगन्धन और सी रेनुगा के भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर लिखे एक रिसर्च पेपर में भारतीय प्रेस के लिए सुझाव देते हुए लिखा है कि समाचार पत्र के सम्पादकों में खबर छापने को लेकर दबाव न हो इसके लिए समाचार पत्रों में उनके पूंजीपति मालिकों का दबाव कम करना होगा. साथ ही स्वतंत्र, नए और छोटे समाचार पत्रों को जमाने के लिए भी जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता बताई गई है. इन सब सुझावों पर काम करना जरूरी बताया गया है क्योंकि स्वतंत्रता के बाद से राज्य प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सबसे संभावित खतरे का स्रोत बना हुआ है.

स्वतंत्रता से लिखना हो रहा है मुश्किल, गांव वालों को बनाने होंगे अपने पत्रकार.

इस अप्रैल उत्तराखंड के चमियाला में आयोजित 31 वें उमेश डोभाल स्मृति समारोह में प्रेस की स्वतंत्रता पर वरिष्ठ पत्रकार शंकर सिंह भाटिया ने कहा था कि जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मैंने बीस-पच्चीस साल पत्रकारिता करी है, मैंने साल 2000 से पहले और आज की पत्रकारिता भी देखी है. पहले सारी खबरें रिपोर्टर ही तय किया करते थे और आज दिल्ली से ही बता दिया जाता है कि खबर कैसे लिखनी है. आठ साल पहले मैंने अखबार की नौकरी छोड़ दी थी क्योंकि मुझे लग गया था कि अब हम इस माहौल में काम नहीं कर पाएंगे. आज मीडिया की हालत बहुत खराब है, स्वतंत्रता से लिखना सम्भव नही हो पा रहा है.

इसी समारोह में एक स्थानीय व्यक्ति का कहना था कि हमारी खबरें कोई नही दिखाता. पहाड़ों में रोजगार, पानी की कमी, लचर स्वास्थ्य व्यवस्था जैसी खबरें मीडिया में कभी नही छाती हैं. टीवी चैनलों और अखबारों में अधिकतर वह खबरें ही दिखाई जाती हैं, जिनका हमसे कोई मतलब नही होता.
इसके बाद मुझे जब मंच में अपने विचार रखने का मौका मिला तो मैंने उस स्थानीय व्यक्ति का उत्तर देते हुए कहा था कि देहरादून, दिल्ली बैठे व्यक्ति को आपकी खबरों से क्या मतलब होगा! आप ग्रामवासियों को अपने पैसे से अपने पत्रकार बनाने चाहिए, जो प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ सोशल मीडिया के इस युग में आपकी बात सही तरीके से दुनिया तक पहुंचाएं. उस पत्रकार पर किसी संस्थान का दबाव नही होगा और उसकी लिखने की स्वतंत्रता भी समाप्त नही होगी.

क्षेत्रीय पत्रकारिता हमेशा से उपेक्षित रही है.

प्रेस की स्वतंत्रता से क्षेत्रीय पत्रकारिता पर पड़ रहे असर पर नोएडा में रहने वाले प्रिंट मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार सारंग उपाध्याय कहते हैं कि क्षेत्रीय पत्रकारिता पहले से ही उपेक्षित रही है. दिल्ली को छींक आ जाए तो देश को जुकाम और बुखार हो जाता है लेकिन ग्राम, देहात और बाकी देश मीडिया में हैं ही नही. यही नही अब तो मुम्बई सहित देश के कई बड़े महानगर भी राष्ट्रीय मीडिया से बाहर होते जा रहे हैं.

जब तक मुद्दों को प्राथमिकता नही, पत्रकारिता हाशिए पर ही रहेगी.

प्रेस की स्वतंत्रता, स्थानीय पत्रकारिता और इसकी मजबूती पर 'जनज्वार' समाचार वेब पोर्टल के सम्पादक अजय प्रकाश से बात की गई तो उन्होंने बताया कि स्थानीय पत्रकारिता हमेशा से हाशिए पर ही रही है. उसकी वजह यह है कि स्थानीय समाज से ही देश चलता है.
देश की नीतियों का अमल होना या न होना, इसकी सच्चाई गांव और उसके आसपास के इलाकों से ही पता चलती है. जब दिल्ली या राज्यों की राजधानियों से सरकारें घोषणा करती हैं कि हम इतने लाख करोड़ की योजनाएं लाए हैं, तब उनका सच हर रोज़ सौ या पचास रुपए में जीने वालों के जरिए उजागर होता है.
जब भ्र्ष्टाचार थोड़ा कम था तब भी कहा जाता था कि विकास के लिए आने वाले एक रुपए में अस्सी पैसा रास्ते मे रह जाता है, अब तो कमीशनखोरी बहुत बढ़ गई है. कर्नाटक में चुनाव हो रहा है, वहां कहा जाता है चालीस फीसदी की सरकार. मतलब कोई भी काम कराना है तो चालीस फीसदी सरकार लेगी.

अब सवाल यह है कि इनका सच बताना, जाहिर तौर पर वह पत्रकार ही बताएगा. स्थानीय पत्रकार इतना कमजोर होता है कि उसको सिस्टम में जगह तब मिलेगी जब वह सत्ता में बैठे लोगों या बड़े पदों में बैठे लोगों की जी हजूरी करेगा, उनके पक्ष में खबरें छपेगा. मेरे दो दशक के पत्रकारिता अनुभव बताते हैं कि जिन भी पत्रकारों ने स्थानीय स्तर पर सही और सच मुद्दे उठाने की कोशिश की, उन्हें दबाया ही गया है.
इसीलिए ऐसा होता है कि जब स्थानीय पत्रकार बड़ा मुद्दा उठाते हैं ,उन्हें कोई नही पूछता पर दिल्ली बैठा पत्रकार जब उसी मुद्दे को उठाता है तो वह बड़ा मुद्दा बन जाता है.

 क्या हम स्थानीय स्तर पर पत्रकार बन सकते हैं, हां बन सकते हैं और ऐसी हजारों कोशिशें हुई हैं. स्थानीय और ईमानदार लोगों ने नौकरियों को छोड़कर पहले अखबार निकाले हैं और चंदे से भी निकाले हैं. अब भी समाचार वेब पोर्टल, यूट्यूब चैनल निकाले जा रहे हैं पर सत्ता संरचना इतनी बड़ी और पैसे वाली है कि ऐसे पत्रकार उसमें फिट नही बैठ पाते.

इसका उपाय क्या है इस पर भी सोचना चाहिए. देश की राजनीति जैसी चलती है, वहां की जनता वैसी होता है. जैसे राजनीति भ्रष्ट है, जनता भी भ्रष्ट है इसलिए लोग स्थानीय राजनीति में भी मुद्दों पर कभी वोट नही देते.
 मुद्दों वाली पत्रकारिता इसलिए हाशिए पर है और वह तब तक हाशिए पर रहेगी जब तक राजनीति में मुद्दों को प्राथमिकता नही दी जाएगी.

आप देखते हैं स्थानीय स्तर पर वही युट्यूबर सफल है जो राजनीति से जुड़ी खबरों को नही छूते या सत्ता या विपक्ष किसी एक से जुड़ी खबरें दिखाते हैं. वह पत्रकार नही पार्टी प्रवक्ता होते हैं और दिल्ली से देहात तक यही स्थिति है.

अगर इस देश मे राजनीति धर्म, जाति के नाम पर होगी. चाहे वह पक्ष द्वारा हो या विपक्ष के द्वारा, तो पत्रकारिता भी इसी के आसपास होगी. मेरा मानना है कि यह इस देश का बदलाव का दौर है, अभी इसमें एक दशक लगेगा. इसके बाद ही पत्रकारिता मजबूत होगी.

प्रेस की स्वतंत्रता बचाने के लिए जरूरी है कानून बनाना.

प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में पहले नम्बर पर काबिज नॉर्वे में मीडिया को कानूनी सुरक्षा प्राप्त है.
नॉर्वे के संविधान के अनुच्छेद 100 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रदान की गई है, जहां मीडिया की स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है. इस अनुच्छेद के अनुसार वहां हर कोई राज्य के प्रशासन और किसी भी अन्य विषय पर खुलकर अपने मन की बात कहने के लिए स्वतंत्र होगा, साथ ही सभी को राज्य और नगर पालिकाओं के दस्तावेजों तक पहुंच का अधिकार है.

वहीं भारत में मीडिया के लिए ऐसा कोई विशिष्ट कानून नही है, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 सभी नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है पर कई मामलों में मीडिया के लिए इस लचीले कानून के अर्थ बदल जाते हैं. कई बड़े मीडिया संस्थानों में सरकारी एजेंसियों के हालिया छापे इसका उदाहरण हैं. भारत में प्रेस की खत्म होती स्वतंत्रता को देखकर अब प्रेस की स्वतंत्रता बचाने के लिए अलग से कानून बनाया जाना जरूरी लगता है.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may


आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...