दुकान पर अक्सर उस महिला का दिव्यांग पति दिखाई देता था, पूछने पर उसने बताया था कि महिला पहले किसी दूसरे पुरूष के साथ रहती थी अब उसके साथ रहती है। दोनों के बीच का रिश्ता पेट के लिए था।
खनन की ट्रक में आए ड्राइवरों की नजर हमेशा उस महिला पर रहती थी। आज जब साल 1981 में आई फ़िल्म 'चक्र' देखी तो स्मिता पाटिल का चेहरा देख मुझे उसी महिला की याद आ गई।
चक्र देख कर बहुत से लोग कहेंगे कि महिलाओं की स्थिति में फ़िल्म आने के बाइस साल बाद बहुत परिवर्तन आए हैं, उन्हें रोजगार मिले हैं, स्वतंत्रता मिली है पर यह वही लोग होंगे जो भारत के विकास पर सिर्फ शहरों की बड़ी बिल्डिंगों को देखकर दंभ भरते हैं। झुग्गी झोपड़ियों के साथ आम मध्यम वर्गीय परिवारों में आज भी महिलाओं की स्थिति में कोई खास परिर्वतन नही आए हैं, उसका जीवन खुद का पेट भरने के साथ अपने बच्चों के भविष्य के सपने देखने में ही गुजर जाता है। अधिकांश भारतीय महिलाएं आज भी एक चक्र में फंसी हुई है, जिससे बाहर निकलना उनके लिए आज भी सम्भव नही हुआ है।
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