Friday, May 29, 2020

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष

आज 30 मई में हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया जा रहा है। आज ही के दिन पण्डित युगुल किशोर शुक्ल ने 1826 में प्रथम हिन्दी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन आरम्भ किया था।

इसके बाद से सैंकड़ो हिंदी समाचार पत्र- पत्रिकाएं आयी उनमें से कुछ अब भी हैं और कुछ भारतीय जनमानस के मन में अपनी अमिट छाप छोड़कर चली गयी। 

देश को स्वतंत्रता दिलाने में हिंदी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। हिंदी पत्रकारिता गुलाम भारत में अंग्रेजी शासन के विरोध की आवाज़ बन गयी थी।
 सती प्रथा , विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह, छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ चेतना लाने में हिंदी पत्रकारिता ने समाज को एकजुट किया।आपातकाल के दौरान जनता के हितों की सुरक्षा करने में भी हिंदी पत्रकारिता पीछे नही थी।

स्वतन्त्रता के बाद भारतीय पत्रकारिता आज़ादी के विषय से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर केंद्रित हो गयी।

नई मीडिया आने के बाद हिंदी पत्रकारिता का स्वरूप बदला है और पारम्परिक हिंदी पत्रकारिता के समक्ष अनेक चुनोतियाँ सामने आने लगी हैं और अच्छी हिंदी का प्रयोग करने वाले पत्रकार अब कम ही हैं।
वाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर में ऐसे लोग भी पत्रकारिता कर रहे हैं जिन्हें ना हिंदी का ज्ञान है और ना ही उनका पत्रकारिता से कुछ लेना देना है ।

हिंदी पत्रकारिता में साहित्यिक और देशज भाषा का स्तर गिरा है।
डिजिटल युग आने के बाद से प्रिंट मीडिया में हिंदी पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों के समक्ष समय के अनुसार खुद को ढालने की चुनौती है ।

 अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, पंजाब केसरी, नवभारत टाइम्स, उत्तर उजाला जैसे हिंदी समाचार पत्र हिंदी पत्रकारिता को बचाए हुए हैं तो वहीं द वायर, सत्याग्रह, न्युज़ क्लिक जैसे हिंदी वेब पोर्टल डिजिटल मीडिया में हिंदी पत्रकारिता का सिक्का चला रहे हैं।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हिंदी के साथ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी किया जाता है। अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से हिंदी पत्रकारिता की आत्मा ही मर जाती है।

राष्ट्रभाषा होने के कारण भारत में ज्यादातर लोग हिंदी को समझ कर पढ़ और लिख सकते हैं इसलिए हिंदी पत्रकारिता आसानी से लोगों के बीच में स्थान बना कर पत्रकारिता के मुख्य उद्देश्य पूरे कर सकती है।
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा गया है और इस स्तम्भ को सुरक्षित रखने के लिए हिंदी पत्रकारिता के ज्यादा विकास की आवश्यकता है।



Thursday, May 28, 2020

हम अपना जन्मदिन क्यों मनाते हैं!!!!

लो जी कोरोना काल में वह दिन भी फिर से आ गया जो मैं पिछले कई सालों से नौकरी पाने के लिये अलग-अलग फॉर्मों में बिना नक़ल किये पहली बार में ही सही भर रहा था। 
भाजपा शासन के डिजिटल युग में आधार कार्ड, पेन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस के साथ मेरा पाला इस तिथि से कहीं ना कहीं रोज़ ही पड़ जाता है। जी हाँ वो मेरी जन्मतिथि ही है जो आज फिर से आ गयी है।

इस तिथि के साथ भी मेरा गहरा नाता है इसको सोच सोच कर मेरा मन विचलित हो उठता है, ये ह्रदय पत्थर का हो जाता है जब मैं यह सोचता कि मेरे उन सपनों को पूरा करने का समय निकला जा रहा है जो मैंने इस जीवन में खुली आंखों के साथ ही देख लिये थे।
जीवन अब भी पथरीली राहों पर ही चला जा रहा है और यह रास्ता कब खत्म होगा इसका दूर दूर तक कुछ पता नही चलता।
अपनी उम्र से छोटे लोगों को देखकर ये ह्रदय जल उठता है और खुद से कहता है कि देख बुड़बक ये तुझसे ज्यादा ज्ञानी हो गया और तू यही रह गया। वैसा ही जैसा शेखचिल्ली के बारे में सुना था।
बड़े भाइयों को देखकर यह सागर रूपी अठखेलियां लेने वाला ह्रदय उमंग से भर उठता है और मेरे चंचल मन से कहता है देख तेरी किस्मत अभी तो तू जवान है बहुत समय है तेरे पास इन मूर्खों से आगे निकलने के लिये।
यही सोचते सोचते साल का वह दिन आ ही जाता है जब आप इस धरती पर पधारे।

12 बजे से पहले नींद नही आती। स्मार्टफोन के इस युग में मित्रों की शुभकामनाएं घड़ी की दोनों सुइयाँ गुरुत्वाकर्षण की वजह से एक साथ ऊपर अटकते ही वाट्सएप पर प्राप्त होने लगती हैं, कुछ मित्रों के स्टेट्स पर आपका अधिकार बन जाता है। फेसबुक पर उन मित्रों से भी सन्देश प्राप्त होने लगते हैं जिनसे पूरे साल बात नही होती, उनके जीवित होने का प्रमाण यही सन्देश होते हैं।
हम भी खुश हो जाते हैं और सारी इन्द्रियाँ बस इन्हीं बधाई सन्देशों का जवाब देने के लिये जागृत हो जाती हैं। खुद को इस धरती का सबसे नायाब हीरा समझ कर हम भी पूरे साल की हीन भावना भूल अपना जन्मदिन मनाने में मशगूल हो जाते हैं।

एक ही तिथि में लाखों लोगों का जन्मदिन होता है पर जन्मदिन भी किसी अंजान व्यक्ति का नही मनाया जाता, जन्मदिन उनका मनाया जाता है जो हमारे जीवन में खास होता है, जिसकी वजह से हमारे जीवन में ढेरों खुशियां आयी हैं।

कालदर्शक की शुरुआत के बाद से इस तरह के आयोजन शुरू हो पाए क्योंकि उससे पहले सुर्य और चंद्रमा के अनुमान से समय की सम्भावना व्यक्त की जाती थी और तब तिथि का चलन तो था ही नही।
भारतीयों से जन्मदिवस मनाने की शुरुआत नही हुई इतिहासकारों के अनुसार मिस्र की सभ्यता से जन्मदिन मनाने का रिवाज़ शुरू हुआ और प्राचीन रोम में यह लोकप्रिय हुआ। शुरुआत में पचास वर्ष से ऊपर ले लोगों का जन्मदिन ज्यादा धूमधाम से मनाया जाता था और पुरुषों के जन्मदिन को ही महत्व दिया जाता था।

जन्मदिन के दिन केक का खासा महत्व होता है। किसी बच्चे का जन्मदिन हो या किसी वयस्क का केक से हर किसी का भावनात्मक लगाव होता है। केक की खुशबू की बिना कोई भी जन्मोत्सव अधूरा लगता है। केक का नरम स्पर्श ह्रदय को पुलकित कर देता है।
प्रियजनों का महत्व जन्मदिन में सबसे अधिक होता है। किसी के भी जन्मोत्सव का आयोजन उसके प्रियजनों के बिना सम्भव नही है। प्रियजनों के साथ व्यतीत किया गया हर समय अविस्मरणीय हो जाता है।
चमकीली पन्नियों के अंदर बन्द उपहारों को छूते ही जिस अनुभूति का अहसास हम करते हैं उसको परिभाषित कर पाना असंभव है। वह उपहार वर्षों तक प्रियजनों की यादों को खुद में समेटे हमारे पास रहते हैं।
समय के साथ अपनी महत्वता खोते जन्मदिन कार्डों का हर शब्द आपको रोमांचित कर सकता है। फेसबुक , वाट्सएप के सन्देश आपको वह अनुभव कभी नही दे सकते जो हाथों से लिखे उपहार सन्देश से प्राप्त होता है।

बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था और बुढ़ापे में जन्मदिन मनाने के तरीके अलग अलग होते हैं।
 दस साल तक के बच्चे के जन्मदिन में जहां कोतुहल बना रहता है सभी का ध्यान बच्चे की ओर ना होकर अपने ऊपर ज्यादा होता है। 
किशोरावस्था में जन्मदिन बच्चें की ओर केन्द्रित होने लगता है। उसके द्वारा किये गए हर कार्य पर सबकी नज़र होती है। मटका अब आकार लेने लगता है।
जवानों का जन्मदिवस सबसे ज्यादा चुनोतियों से भरा होता है। उनके जीवन पर चर्चा अधिक होने लगती है। जवानों को खुद के बढ़ते पेट को सही आकार में रखने की चिंता, वैवाहिक जीवन की चिंता, बैंक बैलेंस बढ़ाते रहने की चिंता खाये जाते रहती है। जन्मदिन मनाने से मोहभंग का यही समय सबसे अधिक होता है।
बुढ़ापे के जन्मोत्सव अपने प्रियजनों से दूर ही मनते हैं, वह सौभाग्यशाली ही होते हैं जिनके प्रियजन इस उम्र में भी साथ देते हैं। जीवन में देखे सुख दुख को सोचकर बची ज़िन्दगी भी उसी सम्मान के साथ जिए जाने का प्रण लेकर यह जन्मदिन मनाया जाता है।

हर जन्मदिन खास होते हैं पर यह खुशी उस दिन नही मनायी जाती है जिस दिन आप पैदा हुए होते हैं।
एक माँ प्रसूति के दर्द के बाद आपको इस दुनिया में लाती है। माता पिता के असंख्य त्याग की वजह से आप साल दर साल अपना जन्मदिन मनाते हैं।

यह जन्मदिन और यह जीवन सिर्फ तभी सफल हो सकता है जब आप निस्वार्थ भाव से खुद को बड़ा करने वाले माता पिता को उनकी निःस्वार्थता का बेहतरीन उपहार देने योग्य बन सकें।

Friday, May 22, 2020

कोरोना और डिजिटल युग : वक्त बुरा है मैं नही मैं अखबार हूँ, मैं ही पत्रकारिता हूँ।

कुछ दिनों से अखबार के पन्नों की कम संख्या पर कितने पाठकों का ध्यान गया होगा और अगर गया भी होगा तो कितनों ने ये जानने की कोशिश करी होगी कि पिछले 240 सालों से देश की स्वतंत्रता में अहम भूमिका निभाने वाले, समाज में चेतना में लाने वाले और आपातकाल के दौरान जनता की हितों की सुरक्षा करने वाले समाचार पत्रों को ये क्या हो गया है !!!
वैसे कोरोना जैसी महामारी से एकमात्र बचाव सामाजिक दूरी पर भी सरकारी आदेशों का इंतजार करने वाली जनता से यह उम्मीद कम ही की जा सकती है।

 आज आंख खुली तो हाथ खुद ही सिरहाने में दबे मोबाइल को ढूंढने लगे। टम्बलर, वाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर पूरी दुनिया घूम लेने के बाद न्यूज़ एप्लिकेशनस और न्यूज़ वेब पोर्टल्स से ई पेपर और लाइव न्यूज़ भी पढ़ ली। शाम होने तक टीवी , मोबाइल, लेपटॉप से सभी ब्रेकिंग न्यूज़ भी मिलती रही।

 मुझे वो दिन भी याद आते हैं जब तेज़ बारिश में भी घर के बाहर एक सुरक्षित जगह रबर बैंड से लिपटा अखबार शहर, दुनिया की खबर से रूबरू करवाता था।
बोर्ड परीक्षा का परिणाम हो या सुडोकु हल करने का मज़ा हर सुबह अखबार का बेसब्री से रहता था। राशिफल, शेयर बाजार, खेल जगत की खबरों का अखबार ही एकमात्र सहारा था।

रेडियो से मिल रही चुनौती के बाद वर्ष 1990 के बाद से केबल टीवी के आगमन के बाद प्रिंट मीडिया को चुनौती मिलने लगी। वर्ष 2000 की शुरुआत के साथ इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते बाज़ार से प्रिंट मीडिया की इलेक्ट्रॉनिक और नई मीडिया से प्रतिस्पर्धा और भी बढ़ गयी।
जब तक अखबार में खबर आती है तब तक वह वायरल हो चुकी होती है और ई पेपर आने के बाद शायद ही उन पन्नों की क़ीमत कुछ रह जाती है।

2020 में कोरोना इस शताब्दी की सबसे बड़ी खबर है पर शायद इस ख़बर को छापने से पहले कई अखबार अस्तित्व में ही ना रह पायें।

बड़ो को घर से निकला नही जाता उनकी नसीहतें भी काम आती हैं।

पत्रकारिता आत्मा है तो अखबार शरीर है।
समाचार पत्र मेनस्ट्रीम मीडिया का तबका खो रहा है। कोरोना के कारण प्रिंट मीडिया से जुड़े 20-30 लाख लोग घर से काम करने पर मजबूर हैं और उनके समक्ष वेतन कटौती, नौकरी से निकाले जाने का भय है।
अख़बार के कोरोना संक्रमण से मुक्त होने के बाद भी हॉकरों से अख़बार लेने में बहुत से लोग कतरा रहे हैं और उन्होंने अखबार लेना बंद कर दिया है। 
सरकार के ऊपर मीडिया में विज्ञापनों का करोड़ो रुपये बकाया है जिसकी जल्द मिलने की उम्मीद भी नही है। प्रिंट मीडिया 1200-1500 करोड़ रुपये तक घाटे में चल रही है।
अखबारों में सबसे ज्यादा विज्ञापन ई कॉमर्स, शिक्षण संस्थानों से जुड़े होते हैं जो इस कोरोना काल में अखबारों से दूरी बनाये हुए हैं जिसके कारण अखबारों के राजस्व और वितरण में बेहद ही नकारात्मक असर पड़ा है। बहुत से समाचार पत्र बन्द हो गये हैं।

छोटे समाचार पत्र किसी भी जगह की संस्कृति, समाज को परिभाषित करते हैं, वोट पर इनका गहरा असर रहता है। उनके द्वारा ही हम यह जान सकते हैं कि आज हमारे ग्राम प्रधान ने ग्रामीणों के साथ बैठक में क्या फैसला लिया, उनसे ही हमें पता चलता है कि डिग्री कॉलेज में प्राचार्य ने छात्र नेताओं की किन बातों को माना। आजकल इनका संचालन केवल वेब पॉर्टलों पर हो रहा है और वह भी स्थिति जल्द से जल्द सुधरने की उम्मीद लगाये बैठे हैं। 

पत्रकारिता के क्षेत्र में शोध की ही कमी है जो इससे जुड़ी समस्याएं सामने नही आ पाती हैं ना उनका समाधान हो पाता है। इंजीनियरिंग, मेडिकल कालेजों की तुलना मीडिया संस्थानों की संख्या बहुत कम है।

वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए समाचार पत्रों को अपना स्वरूप बदलने की जरूरत है । उन्हें पहले से ही पाठकों तक पहुंच चुकी अलग-अलग क्षेत्रों की खबर एकत्रित करने के बजाए खुद को एक ही विषय पर केंद्रित करना सीखना होगा। 
पाठकों की रूचि के अनुसार भी खबरों का चुनाव करना जरूरी है, यदि पाठकवर्ग में 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या अधिक है तो उन्हीं से सम्बंधित खबरों को ज्यादा जगह देनी चाहिए।

अखबार रोज़ आता है पर उसमें अपनों की खबर नही आती।
 समाचार पत्र जनता की आँख कान होते हैं। उसमें ऐसी खबरों को जगह मिलनी चाहिए जिनका सीधा-सीधा सम्बन्ध उस क्षेत्र के पाठकों से हो।
लोकल पत्रकारों को ज्यादा अधिकार दिये जाने की आवश्यकता है क्योंकि क्षेत्र की समस्या को सैंकड़ों मील दूर बैठे लोगों से ज्यादा क्षेत्रीय व्यक्ति ज्यादा अच्छी तरह समझता है।
नई प्रतिभाओं को मौक़ा देकर युवाओं को समाचार पत्रों की तरफ आकर्षित किये जाने के प्रयत्न किये जाने चाहिए।
समाचार पत्रों में विज्ञापन सम्बन्धी शर्तों को भी आसान बनाये जाने की जरुरत है। 
आसानी से उपलब्ध इंटरनेट, मोबाइल के कारण हर  स्मार्टफोन वाला पत्रकार बन गया है और सस्ती लोकप्रियता पाने के लिये, समाज में नफ़रत फैलाने के लिए या अपने किसी निजी फ़ायदे के लिये वह फ़ेक न्यूज़ फैलाता है। फेक न्यूज़ पर लगाम तभी लग सकती है जब समाचार पत्रों की विश्वसनीयता बनी रहे।

 कनाडाई मूल के प्रोफेसर रॉबिन जेफ्री ने कहा था मोबाइल जूते के बाद सबसे हानिकारक उपकरण है। जूतों ने लोगों को काम करने की वह शक्ति दी है जो वह बिना जूते के नही कर सकते अगर आपकों उन्हें नियंत्रित करना है तो उनके जूते छीन लो।
 समाचार पत्र वर्षों से अपनी जगह और नाम पत्रकारिता के क्षेत्र में बनाये हुए हैं । उन्हें अपने नाम का प्रयोग समझदारी के साथ करना चाहिए। वेब पोर्टल, एप्स में सीमित खबर ही अपडेट करनी चाहिए और समाचार पत्रों के लिये रोमांच को बनाए रखते हुए पाठकों को अपनी ओर आकर्षित रखना चाहिए।

अब प्रिंट मीडिया को यह स्वीकार करना होगा कि उसका स्वर्णिम समय पीछे छूट गया है और नयी चुनोतियों के अनुसार उसे खुद को तैयार करना होगा।

हिमांशु जोशी, शोध छात्र पत्रकारिता, इंवर्टिस यूनिवर्सिटी, बरेली।

Wednesday, May 20, 2020

हाथ में पकड़ी चप्पल और अधूरा ज्ञान : भारतीयों का मोबाइल व इंटरनेट ज्ञान

आरोग्य सेतु एप इन दिनों चर्चा में है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश के नाम अपने सम्बोधन में कोरोना से लड़ाई में इस एप को डाउनलोड करने के लिए भी कहा पर क्या वास्तव में यह एप इस जंग में भारत को जीत दिलाने में सक्षम है? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिये हमें समय में थोड़ा पीछे जाना होगा। 

वर्ष 2010 के बाद भारतीय जनता बेसिक फ़ोन्स से स्मार्ट फ़ोन्स की ओर जाने लगी। नोकिया के बाद सैमसंग के एंड्रोइड मोबाइल लोकप्रिय होने लगे। यह नोकिया की भारतीय मोबाइल बाज़ार से विदाई की शुरुआत थी तो ओप्पो, वीवो, रेडमी, रीयलमी की भारतीय मोबाइल बाज़ार में आगमन की रूपरेखा तैयार हो रही थी।

भारत के युवाओं को एक साथ कई कार्य करने वाले स्मार्टफोन भा रहे थे। अब वो कॉल्स और मैसेज से आगे बढ़कर मोबाइल का इस्तेमाल नेट सर्फिंग, फ़िल्म देखने, संगीत सुनने में करने लगे। आभासी दुनिया में युवाओं को अपनी स्वप्निल दुनिया महसूस होने लगी। 

युवा तो अपनी इस दुनिया में मस्त था पर युवा अवस्था पार कर चुके लोगों को इस स्मार्टफोन को समझने में मुश्किल हो रही थी । नए एप, कीबोर्ड से टचस्क्रीन उन्हें अलग दुनिया के लग रहे थे। जेब में रखें हुए मोबाइल से अनजाने में कहीं कॉल लग जाना आम बात होने लगी।

भारत की आबादी और उसमें युवाओं की अधिकता ने मोबाइल कंपनियों को भारत में एक बड़ा बाज़ार दिखाया। समय के साथ मोबाइल का साइज़ और दाम भी बढ़ने लगे। मोबाइल अब समाज में किसी के स्टेट्स का सिम्बल बन चुके थे।

भारत में मोबाइल नेटवर्क प्रदान करने वाली कम्पनियां भी इस खेल में कहां पीछे रहने वाली थी। डाटा और कॉल्स के नाम पर जनता के जेब खाली करने का खेल शुरू हुआ । 999 तक के रिचार्ज जनता की जेब पर भारी पड़े तो इस खेल से आज के धन्नासेठों की जेबें भरी।
इस खेल के नए खिलाड़ी जियो ने पुराने खिलाड़ियों की नींव तक हिला के रख दी। 

डाटा सस्ता होते ही सुबह से शाम तक गलियों में क्रिकेट की गेंद से घरों के शीशे फूटने की जगह मोबाइल गेम्स में दुश्मनों से जंग में हमारे बच्चों का समय व्यतीत होने लगा है। चौराहों, चलती कार में वीडियो बनाकर पोस्ट करने का रुतबा ही अलग है। जहाँ स्वरोजगार, उच्च शिक्षा पर युवाओं का ध्यान अधिक होना था वही उनका ध्यान इन एपों से जल्दी सी जल्दी जितना हो सके उतना धन कमाने पर है।
इन सब के बीच सरकार का ध्यान सिर्फ़ इस उद्योग से अपना राजस्व बढ़ाने पर रहा है। निजी कंपनियों के लिये भी अपना प्रचार प्रसार करने के लिये इंटरनेट अच्छा साधन है और उन्होंने भी अनदेखे भविष्य पर अपना पैसा जम कर लगाया है।

इंटरनेट में बहुत ही शिक्षित  और पत्रकारिता की डिग्री लिये हुए लोग स्वयं ही कैमरामैन और लेखक की भूमिका निभा कर जो मन चाहे वह लिख रहे हैं और उनसे प्रभावित हो कर उनसे भी ज़्यादा शिक्षित लोग बिना उस खबर को जांचे परखें आगे बढ़ा रहे हैं।

आतंकवादियों के लोकप्रिय एप हों या अफवाहों के जनक कोई विदेशी एप इन्होंने देश को कितना खोखला किया इसकी सुध किसी को नही थी। दंगा भड़काना हो या किसी आतंकवादी हमले की पृष्ठभूमि तैयार करनी हो स्मार्टफोन इन सब में सबसे बड़ा साथी है और शायद ही कभी हाथ में पकड़ी इस चप्पल पर मुकदमा दर्ज किया गया हो।

इंटरनेट का जो वास्तविक प्रयोग करना था वह हम सब भूल गये हैं। तकनीक का प्रयोग से शायद ही एक पूरी पीढ़ी सहज है। 

एटीएम में अपना पैसा निकालने के लिये दूसरे का मुँह ताकते लोग आसानी से दिख जाते हैं।बैंक ग्राहकों में इंटरनेट बैंकिंग का उपयोग करने वाले ग्राहकों की संख्या बहुत कम है और जो लोग उसे इस्तेमाल कर भी रहे हैं तो उन्हें बेवकूफ बना कर ऑनलाइन ठगी करने वाले अपराधियों की संख्या अधिक है।
 
रेलवे ने uts एप लॉन्च किया था जिससे रेलवे स्टेशनों में भीड़ कम हो पर अब भी टिकटघर के सामने बड़ी स्क्रीन वाले मोबाइल हाथ में लिए लोगों की संख्या जस की तस है। 
दुरस्थ शिक्षा में इंटरनेट का जो प्रयोग होना था वह अब भी नही होता। साइबर कैफों में एक फॉर्म भराने के लिये खुद के पास स्मार्टफोन होते हुये लगी युवाओं की भीड़ इसका प्रमाण है।  लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन क्लास से बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, शायद कुछ अभिवावक ऐसे भी होंगे जिन्हें ऑनलाइन क्लास की परिभाषा तक नही पता होगी। इससे हम यह अनुमान लगा सकते हैं छात्रों को अपने पहले शिक्षक से पढ़ाई में कितनी मदद मिल रही होगी।


उमंग, सारथी, डिजिलॉकर जैसे एप कितने लोग चलाते हैं यह हम गूगल प्लेस्टोर के अंदर टिकटोक और इन एप्लिकेशन के डाउनलोड संख्या में अंतर से जान सकते हैं।

आज कोरोना से लड़ाई में सरकार आरोग्य एप लायी है यह कोरोना संक्रमण के फैलाव रोकने में बहुत प्रभावी भी है और शायद इसके सही उपयोग से कोरोना से जंग जीती भी जा सकती है ।

 लॉकडाउन के दौरान आसानी से खोजे जा सकनी वाली पॉर्न साइट्स को देखने में तो भारतीय प्रथम हो सकते हैं पर वहीं आरोग्य सेतु एप की सफलता पूरी तरह से मोबाइल प्रयोग के सही ज्ञान पर निर्भर है और मोबाइल व इंटरनेट प्रयोग की यह शिक्षा सिर्फ युवा की या शहरी जनता की ही आवश्यकता नही है अपितु इंटरनेट शिक्षा हर उम्र के लोगों और ग्रामीण एवं शहरी हर क्षेत्र की जनता के लिये आवश्यक है।

 प्रारम्भिक शिक्षा से ही मोबाइल व इंटरनेट का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए और ऐसे लोग जो सीधे तौर पर कहीं से कोई शिक्षा प्राप्त नही कर पाते उनको मीडिया के अन्य साधनों का प्रयोग कर तकनीक के इस वरदान का सदुपयोग करना सिखाया जाना चाहिए।

हिमांशु जोशी, पत्रकारिता शोध छात्र

Monday, May 18, 2020

एक कोरोना वायरस और थमता भारत

कोरोना से सब कुछ थम सा गया है। ना सड़कों पर वाहनों का शोर न फैक्ट्रियों का धुंआ ना ट्रेनों का हॉर्न ना हवाई जहाजों की उड़ान और ना ही पानी के जहाज़ों का सफर।

आर्थिक, सामाजिक सभी प्रकार की गतिविधियों पर विराम लग गया है। मनुष्य खुद से ही डरने लगा है और मानव जाति को अपने अस्तित्व पर खतरा मंडराता दिख रहा है। 

मानव गतिविधियों से बुरी तरह प्रभावित प्रकृति आज खुद को स्वयं ठीक कर रही है। आसमान साफ है, नदियाँ साफ है, हवा साफ है।

कोरोना ने रोज़गार के कई अवसरों को समाप्त कर दिया है बहुत से उद्योग पूरी तरह समाप्त हो गए हैं, बेरोजगारी और गरीबी अपने चरम पर है। अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये सरकार द्वारा आर्थिक पैकेजों की घोषणा की जा रही है। बदले हालातों में रोज़गार के कुछ नए अवसर भी बने हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी भारत निर्मित को बढ़ावा देने के बात कही है। 

दिल्ली , मुम्बई जैसे बड़े शहरों से वापस आ रहे मजदूरों से सड़क मार्ग भरे पड़े हैं।
 औरंगाबाद ट्रेन हादसे और अन्य जगह सड़क दुर्घटनाओं में मज़दूरों की हो रही मौतों ने हम सब का ध्यान मजदूरों की व्यथा की ओर खींचा है। 
आजादी के बाद ग्रामीणों का शहरों की ओर पलायन तेजी से बढ़ा। ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी व्यवस्थाओं जैसे अच्छे विद्यालय, अस्पतालों के अभाव में अच्छी जीवन शैली का सपना लिये ग्रामीण भारत शहर की ओर चल पड़ा था। 

कंक्रीट के मकानों से दूर बसी झुग्गियों में रह रहे लोगों को हम दूसरी ही दुनिया का समझने लगे। भारत दो हिस्सों में बंट गया एक अमीरों का भारत एक गरीबों का भारत जहाँ गरीब औऱ गरीब हो रहा था , अमीर और भी अमीर।

गांव छोड़कर शहरों में बसे लोगों को आज अपने ही लोग अप्रवासी के तौर पर जान रहे हैं और उनके घर आने पर कोई खुश नही है, संक्रमण का डर हर किसी के मस्तिष्क में है।

गाँव पिछले कई वर्षों से खाली हो रहे थे। इस समस्या के समाधान पर बात तो हुई पर कभी सरकार या स्वयं समाज द्वारा कोई ठोस कदम नही उठाया गया। 
आज शहर में रहकर तीन महीने भी अपने और अपने परिवार का पेट पालने की हिम्मत ना जुटा पाने वाले कामगारों की इस दशा का समाधान निकालना आवश्यक है।

कोरोना हमारे समाज की व्यवस्था को लेकर गम्भीर प्रश्न खड़े कर रहा है कि क्यों अपना गांव छोड़कर शहर बस गयी गरीब जनता आज़ाद भारत की इस पहली गम्भीर परीक्षा में असफल हो गयी। क्यों कोई सरकार आज तक गरीब तबके के लिये रोटी, कपड़ा और मकान की स्थायी व्यवस्था नही कर पायी।
तूफान के बाद शांति जरूर आएगी फिर से हम उद्योगों को चलता हुआ देखेंगे। मज़दूर फिर से साईकिलों की शृंखला में जाते हुए कारों का रास्ता रोकेंगे। रुके निर्माण कार्य शुरू होने पर यह मज़दूर सुबह चौराहों पर काम के लिए चुने जाएंगे। ऊंची ऊंची इमारतों पर रस्सा बाँधे ये उस पर ईंट दर ईंट रखेंगे। कोई ट्रकों से सामान उठायेगा तो उनकी पत्नियां फ़टे टाट के नीचे चूल्हा फूकेंगी। 

प्रश्न यह है कि इसके बाद हम इस महामारी से उपजे हालातों से क्या सीख लेंगे। क्या फिर से सैंकड़ो मील पैदल चल कर गांव शहरों में वापस लौटेगा!
मनरेगा के द्वारा गांव में काम उपलब्ध कराने की सरकारी योजना को बिना शर्म के स्वीकार करना होगा। शहर में बर्तन साफ करने से अच्छा अपने गांवों में काम करना ही है क्योंकि ऐसे समय में गांव धोखा नही देते हैं।

शहरों और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में इससे कई परिवार आसानी से अपनी रोज़ी रोटी का प्रबंध कर सकते हैं व अच्छी आमदनी होने पर अन्य परिवारों को भी रोज़गार दे सकते हैं। खादी और ग्रामोद्योग को बढ़ावा देकर भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

भारत एक कृषि प्रधान देश है पर नया भारत खेती को भूल गया और अब कोरोना काल में रोटी के लिये ही गाँवों की और दौड़ रहा है। देश को फिर से एक हरित क्रांति की आवश्यकता है। कृषि में आधुनिक तकनीक का प्रयोग, कृषि सम्बन्धित शोधकर्ताओं को बढ़ावा देकर यह कार्य किया जा सकता है।

पिछले कुछ समय से पशुपालन में भी कमी आयी है, जिसका सीधा प्रभाव दूध के दाम पर भी पड़ा है। यदि ग्रामीण पशुपालन से श्वेत क्रांति लाने में सफल हुए तो शायद ही उन्हें शहर लौटना पड़े।

 बड़े बड़े शहरों की दौड़ से दूर ग्रामीण इलाकों में मनुष्य सुकून महसूस करता है। सरकार को इन गांवों, कस्बों को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करना चाहिए। होटल, ढाबों को खोलकर ग्रामीण भारत अपनी आजीविका आराम से चला सकता है।
ऊर्जा के गैर परम्परागत स्त्रोतों का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा के अधिक प्रयोग से हम परम्परागत ऊर्जा के स्त्रोतों पर आत्मनिर्भरता कम कर सकते हैं जो ऐसे विपदा के समय में हमारा साथ छोड़ सकते हैं।
गोबर गैस प्लांट को बढ़ावा देकर भी ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की आमदनी बढ़ायी जा सकती है।

 अब देखना यह है कि हमेशा से कभी हार ना मानने वाला भारत इस कोरोना से जंग का बिगुल फूंकेगा या हार कर कोरोना का कहर देखेगा।

Sunday, May 17, 2020

वो चीते सी दौड़ माही की

ज़ज़्बा कुछ कर गुजरने का, ज़ज़्बा खुद को साबित करने का। खेलों से हम बहुत कुछ सीखते हैं, खुद को खेल के मैदान में झौंक कर विपक्षी के जबड़े से जीत को छीन लाना।करोड़ों लोगों के सामने खिलाड़ी अपनी हिम्मत और समर्पण से सभी का दिल जीत लेते हैं।
आज कोरोना से पूरा विश्व लॉकडाऊन में है। मनुष्य जाति एक अनदेखे वायरस से लड़ रही है। मनुष्यों को हिम्मत, लड़ने का जज़्बा देने वाली सारी खेल गतिविधियां बन्द पड़ी हैं। टीवी खोलने पर स्पोर्ट्स चैनल या तो पुराने मैच दिखा रहे हैं या खिलाड़ियों की वीडियो चैट। 
खेलों की दुनिया में ऐसे कई महान खिलाड़ी हुए जिनसे हम कोरोना के खिलाफ जंग में बहुत कुछ सीख सकते हैं। कोरोना काल में कुछ लोगों द्वारा बेरोजगार होने पर आत्महत्या की खबरें भी आ रही हैं। इन खिलाड़ियों से हम सीख सकते हैं कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी इन्होंने अपने विपक्षी को घुटनों पर ला दिया।
 उदाहरण बहुत हैं, मिसाले बहुत हैं पर हम यहाँ बात करेंगे एक ऐसे खिलाड़ी की जिसने एक साधारण परिवार में जन्म लेकर भी खुद को एक ऐसे मुक़ाम तक पहुँचाया जहाँ पहुँचना हर खिलाड़ी का सपना होता है। उस खिलाड़ी पर उसके सन्यास लेने से पहले ही एक पुरी फीचर फिल्म बन गयी। उसने एक बहुत बड़े देश की उम्मीदों का भार अपने कंधों पर ढोया और उस उम्मीद को अपने मुकाम तक पहुँचाया भी। जी हाँ यहाँ बात हो रही है भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की। 

एक ऐसा क्रिकेटर जिसके लिये कहा गया अनहोनी को होनी कर दे वो है धोनी। 1983 के वर्ल्ड कप की यादें अब हर भारतीय क्रिकेट प्रेमी के मस्तिष्क में धुंधली पड़ चुकी थी और नयी पीढ़ी ने उस जीत को सिर्फ किस्सों में ही सुना था। सचिन तेंदुलकर भारतीय क्रिकेट को चमकती भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह ही आगे ले जा रहे थे, भारत अब क्रिकेट की दुनिया का फिस्सडी देश नही रह गया था पर फिर भी एक कमी थी खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट में प्रभुत्व समाप्त करने की।
भारत की 2001 में कोलकाता टेस्ट मैच की जीत इसका शंखनाद थी। 2003 में हम ऑस्ट्रेलिया से वर्ल्ड कप के फाइनल में हारे। 2004 के अंत में धोनी भारतीय क्रिकेट टीम में आये और जल्द ही इस टीम के कप्तान बना दिये गये। यहाँ उन्होंने पूरे देश को युवा शक्ति दिखायी और भारत को 2007 में टी-20 का पहला विश्व कप दिलाया। विकेट के आगे और पीछे धोनी की अद्भुत तेजी के साथ ही 2009 में भारतीय क्रिकेट टीम इनकी कप्तानी में टेस्ट की नम्बर एक टीम बनी। आईपीएल में धोनी चेन्नई सुपरकिंग्स का चेहरा बन गए। धोनी की कप्तानी में चेन्नई 3 बार आईपीएल का खिताब जीती।
2010 में देहरादून में उत्तराखण्ड की साक्षी सिंह रावत से महेंद्र सिंह धोनी शादी के बंधन में बंध गए।
भारत ने 2011 में एकदिवसीय क्रिकेट विश्वकप की मेजबानी की। सचिन का अंतिम वर्ल्ड कप होने के कारण शुरू से ही भारत पर वर्ल्ड कप जीतने का दबाव था। पूरी भारतीय क्रिकेट टीम और हर एक भारतीय क्रिकेट प्रेमी सचिन के लिये विश्व कप जितना चाहता था। श्रीलंका के खिलाफ धोनी द्वारा मारे गये विजयी छक्के के बाद सचिन का भारतीय खिलाड़ियों के कंधे पर बैठकर पूरे मैदान के चक्कर काटने का दृश्य हर भारतीय के जेहन में अमर हो गया।
2014 में धोनी ने एक चौंकाने वाले फैसला लिया उन्होंने टेस्ट क्रिकेट की कप्तानी छोड़ने के साथ ही टेस्ट क्रिकेट से सन्यास का फैसला लिया।
क्रिकेट के चक्रव्यूह को भेदने का ज्ञान रखने वाले धोनी का यह निर्णय क्यों लिया गया शायद ही कभी देश को यह पता चल पाये। 
कैप्टन कूल कहे जाने वाले धोनी का विवादों से भी नाता रहा। चेन्नई सुपरकिंग्स के बैन पर साधी गयी चुप्पी हो या वरिष्ठ खिलाड़ियों को टीम से बाहर निकालने को लेकर विवाद।धोनी हमेशा इन विवादों से मजबूती से बाहर आये और मैदान पर अपने प्रदर्शन से आलोचकों की बोलती बंद करते गये।
2015 में ऑस्ट्रेलिया में होने वाले 50 ओवर क्रिकेट विश्व कप के ठीक पहले धोनी एक खूबसूरत बच्ची के पिता बने पर उन्होंने बच्ची को देखने के लिये भारत वापस आने से ज्यादा जरुरी देश के लिये अपनी जिम्मेदारी को समझा और विश्व कप खत्म होने के बाद ही अपने परिवार से मिलने का फैसला लिया। भारत इस विश्व कप के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया से हार गया।
2016 में महेन्द्र सिंह धोनी पर आयी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल साबित हुई।
2017 की शुरुआत में विराट कोहली भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान बना दिये गए। धोनी की कप्तानी पर कभी सवाल नही उठाया गया पर फिर भी भविष्य को देखते हुये विराट को कप्तानी देना एक सही फैसला लगा। कोहली भी धोनी के साथ मिलकर भारतीय क्रिकेट को आगे ले जाने में लग गये। बुमराह, चहल, कुलदीप यादव जैसे खिलाड़ियों को विकेट के पीछे से धोनी ने क्रिकेट के गुर सिखाए और विपक्षी खिलाड़ियों का शिकार करना सिखाया।
दो साल के बैन के बाद 2018 में जब आईपीएल में चेन्नई सुपरकिंग्स की वापसी हुई तो धोनी ने राइजिंग पुणे  सुपरजीएंट्स के साथ अपने दो साल के निराशाजनक प्रदर्शन को भुलाकर चेन्नई को खिताब जिताकर यह साबित किया कि शेर अभी बूढ़ा नही हुआ है।
इंग्लैंड में खेले गये 2019 एकदिवसीय क्रिकेट विश्वकप
में धोनी के प्रदर्शन को आलोचकों ने धीमा कहना शुरु कर दिया था। धोनी उन सभी को जवाब देंने के करीब भी आ गए थे पर सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड के खिलाफ बेहद दबाव की स्थिति में भी जडेजा के साथ मिलकर भारत को जीत के नज़दीक पहुँचाकर धोनी रन ऑउट हो गए। उस रनऑउट के दृश्य ने करोड़ों भारतीय क्रिकेट प्रेमियों का दिल तोड़ दिया था और भारत का विश्व कप में सफर वहीं समाप्त हो गया।
विश्वकप के बाद से ही धोनी ने खुद को क्रिकट से दूर रखा है।इंग्लैंड में होने वाले 2020 टी20 वर्ल्ड कप में धोनी की वापसी की उम्मीद थी और इसके लिये उन्हें आईपीएल में बेहतरीन प्रदर्शन करना था पर कोरोना ने हर उस क्रिकेट प्रेमी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया जो धोनी को वापस नीली जर्सी में खेलता देखना चाहते हैं।

पद्मभूषण, पद्मश्री, राजीव गांधी खेल रत्न अवार्डी, टेरिटोरियल ऑर्मी के लेफ्टिनेंट कर्नल( मानद उपाधि ), आईसीसी के कई पुरस्कार जीत चुके धोनी सोशल मीडिया से अपने फैंस से जुड़े रहते हैं। झारखंड में अपने परिवार के साथ रह रहे धोनी बाईक्स, कार के शौकीन हैं। फुटबॉल के शौकीन धोनी आईएसएल के चेन्नईयिन फुटबॉल क्लब के मालिक भी हैं।
इंस्टाग्राम पर बेटी जीवा के अकाउंट पर पोस्ट की गई एक वीडियो में धोनी की दाढ़ी के बाल सफेद दिखने पर ट्रॉलर्स ने धोनी को ट्रॉल करना शुरू कर दिया पर शायद लगभग पिछले दो दशक से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का दबाव सह रहे धोनी को शायद ही इससे कोई फर्क पड़ा हो।
ये कहावत पुरानी है कि शेर कभी बूढ़ा नही होता और विकेटों के बीच चीते की तरह तेज़ दौड़ने के साथ विकेट के पीछे चीते की तरह शिकार करने वाले धोनी को देखकर यह नही लगता कि ये शेर इतनी जल्दी शिकार करना छोड़ेगा। धोनी ने अपने क्रिकेट कॅरियर के सारे फैसले अपनी मर्जी से लिये हैं और शायद उनसे अच्छी तरह और कोई यह नही जानता कि उन्हें कब तक क्रिकेट खेलना है। आज कोरोना काल में धोनी के जीवन से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं और इस जंग में विजयी हासिल कर सकते हैं।
मानव जीवन एक खेल ही है और हमें इसे जीतने के लिये ही खेलना चाहिए बाकि जीत हार क़िस्मत पर है।

Saturday, May 16, 2020

सन् 1856 से चली आ रही गुलामी

सन् 1857 की क्रांति तो सबको याद होगी पर गुलाम भारत में सन् 1856 में भी एक क्रांति हुई थी जिसे भारत का समाज शायद याद नही रखना चाहता।
श्री ईश्वरचन्द्र विद्यागर के प्रयत्नों से पास हुए सन् 1856 के हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम से विधवा विवाह को वैध घोषित कर दिया गया था पर दुख की बात यह है कि इस विषय में पूरे भारतवर्ष में ना तब बात की गई थी ना अब की जाती है। 

कहा जाता है कि हम भारतीय अपनी संस्कृति, धर्म का पालन सदियों से करते आ रहे हैं और यह विरासत अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी देते आये हैं। होली, दिवाली, ईद, क्रिसमस सभी त्योहार हम सब साथ मिलकर मनाते आये हैं शायद इसलिए एक क़ानून बनने के बाद भी हम अब तक उस मानसिकता से बाहर नही आ पाये हैं जिसमें एक विधवा विवाह को सम्मानित नज़रों से देखा जाता है। 
सामाजिक नियमों के बन्धन में रहकर आचरण करने से किसी भी समाज में एक अनुशासन बना रहता है। हर देश की अलग-अलग संस्कृति व सामाजिक नियम क़ानून होते हैं और वहाँ के नागरिक उन्हीं के अनुसार अपना जीवन जीते हैं। भारत की संस्कृति में बचपन से माता-पिता के साथ रहकर शिक्षा ग्रहण करना, विवाह करना व प्रौढ़ अवस्था में अपने बुज़ुर्ग माता पिता की सेवा करने की परम्परा है। 
विवाह के बाद यदि पत्नी की मृत्यु हो जाये और दम्पति की संतान हैं तो पति को बच्चों की देखभाल के लिये समाज विवाह की अनुमति दे देता है। पुरुषों के लिये यह भी कहा जाता है कि यह अकेले कैसे जीवन यापन करेगा।
 नवविवाहित जोड़ा हो और पति की मृत्यु हो जाये तो महिला को तरह-तरह की बातें कही जाती हैं उस पर अशुभ होने का ठप्पा लगा दिया जाता है और उससे शादी के लिये कोई तैयार नही होता है। यदि किसी विधवा युवती की संतान होती है तो उसका विवाह होना और मुश्किल हो जाता है।
एक ओर जहाँ समाज में व्याप्त अन्य कुरीतियां समाप्त हो रही हैं जैसे दहेज प्रथा, बाल विवाह अब पहले की तुलना कम हो गये हैं वही आश्चर्य की बात यह है कि विधवा विवाह की समस्या वैसी ही बनी हुई है।
आज महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं। बड़ी बड़ी कम्पनियों के प्रबंधन की बात हो या राजनीति में भागीदारी महिलाओं के योगदान को कम करके नही आंका जा सकता है। महिलाएं अब पहले से अधिक आत्मनिर्भर हो गयी हैं और विधवा पुनर्विवाह समाज में स्वीकार किया जाये उसका यही सबसे उपयुक्त समय है।
युवा वर्ग किसी भी क्रांति को लाने में सक्षम है फिर वह चाहे सामाजिक हो या राजनीतिक। अपने युवा पुत्र का विवाह एक विधवा से कराने का उदाहरण देने के बाद ही श्री ईश्वरचन्द्र विद्यागर भी विधवा पुनर्विवाह पर समाज में अपनी बात मजबूती से रख पाए।
भारत में महिलाओं को देवी का दर्जा दिया गया है, एकल परिवार में जीवनसाथी अगर साथ दे तो पति-पत्नी दोनों कमा कर अपने परिवार की अर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं और अब एकल परिवारों का ही अधिक चलन है। विधवा महिला यदि समझदार, शिक्षित है तो यह कहीं नही लिखा है कि वह अच्छी जीवनसंगिनी नही बन सकती। यदि हम ऐसी विधवा महिला की बात करें जिसकी कोई संतान है तो परिवार नियोजन के इस जमाने में वह महिला विवाह के लिये सबसे उपयुक्त है।

यदि हम सिर्फ विधवा शब्द की मानसिक बाधा को दूर कर दें तब शायद किसी 20 वर्ष की बेवा को अपना बाकी बचा जीवन अकेले समाज की तिरस्कृत नज़रों के बीच ना बिताना पड़े।


Wednesday, May 6, 2020

कोरोना और हम

जमातियों ने किया बेड़ा गर्क।
जमातियों ने काम बिगाड़ा।
मौलाना साद ने कोरोना फैलाया।

अखबारों और न्यूज़ चैनलों में कुछ इस तरह के शीर्षक थे जब भारत में कोरोना अपने शुरुआती चरण में था।
लोगों ने मीडिया की इस सीख को बहुत जल्दी लिया और नफ़रत भरी फ़ेक न्यूज ने इसमें आग में घी का काम किया। देश भर में मुस्लिम समुदाय के दुकानदारों, ठेलेवालों का बहिष्कार किया जाना शुरू हुआ और मौजूदा हालात में यह कहना मुश्किल है कि मीडिया के बोए इस नफ़रत के बीज को हम कब तक काटेंगे।

आज शराब के ठेकों में लगी इस भीड़ को देख मुझे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का लॉकडाउन लगाने से पहले देश को किया सम्बोधन याद आ गया। 

किसी भी समाज, देश का अगुआ या नेता उन्हें सिर्फ सही रास्ता 
दिखा सकता है, वह उनमें किसी परिस्थिति से लड़ने के लिये ऊर्जा भर सकता है पर अंत में खेल के मैदान की तरह जहाँ कोच का सिखाया तभी काम आ सकता है जब मैदान पर सारे खिलाड़ी मिल कर कोच की बनायी रणनीति पर अमल करें और विपक्षी पर विजय प्राप्त करें जनता को भी अपने नेता, सरकार के आदेशों का पालन कर देश को मुश्किल परिस्थिति से बाहर निकालना चाहिये।
लॉकडाउन के दौरान पुलिस, डॉक्टरों व सफ़ाई कर्मचारियों पर देश भर में हमले किए गये शायद यह सब करने वालों को ये नही पता था कि वो जिन पर हमला कर रहे हैं वह लोग अपना घर परिवार छोड़ कर जनता को इस कोरोना वायरस से बचाने के लिये दिन रात जुटे हुये हैं।

अब भी समय है भारत में कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या तेजी से पचास हज़ार के आसपास पहुंच चुकी है। अपने देश की परिस्थितियों से हम अच्छी तरह वाकिफ हैं कि किस तरह हमें आज़ादी मिली किस तरह हमने अपनी मेहनत से अपने देश को आज अमेरिका, चीन जैसी महाशक्तियों के बराबर लाकर खड़ा किया।
सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करने की मूर्खता हमारे देश को वर्षों पीछे ले जा सकती है। मौतों के आंकड़े सिर्फ एक स्कोर कार्ड की तरह लाखों भी पहुंच सकते हैं और उसमें आप भी शामिल हो सकते हैं।
अब ये हमारे देश की जनता पर ही है कि वो फिर से देश के विकास में सहायक होगी या अपनो की कब्र खोदने में।

National reading day : किताबों के बहाने समाज, साहित्य और समय को समझने की कोशिश

National reading day : किताबों के बहाने समाज, साहित्य और समय को समझने की कोशिश National reading day (19 जून) केरल के साक्षरता आंदोलन के जनक ...