कोरोना से सब कुछ थम सा गया है। ना सड़कों पर वाहनों का शोर न फैक्ट्रियों का धुंआ ना ट्रेनों का हॉर्न ना हवाई जहाजों की उड़ान और ना ही पानी के जहाज़ों का सफर।
आर्थिक, सामाजिक सभी प्रकार की गतिविधियों पर विराम लग गया है। मनुष्य खुद से ही डरने लगा है और मानव जाति को अपने अस्तित्व पर खतरा मंडराता दिख रहा है।
मानव गतिविधियों से बुरी तरह प्रभावित प्रकृति आज खुद को स्वयं ठीक कर रही है। आसमान साफ है, नदियाँ साफ है, हवा साफ है।
कोरोना ने रोज़गार के कई अवसरों को समाप्त कर दिया है बहुत से उद्योग पूरी तरह समाप्त हो गए हैं, बेरोजगारी और गरीबी अपने चरम पर है। अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये सरकार द्वारा आर्थिक पैकेजों की घोषणा की जा रही है। बदले हालातों में रोज़गार के कुछ नए अवसर भी बने हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी भारत निर्मित को बढ़ावा देने के बात कही है।
दिल्ली , मुम्बई जैसे बड़े शहरों से वापस आ रहे मजदूरों से सड़क मार्ग भरे पड़े हैं।
औरंगाबाद ट्रेन हादसे और अन्य जगह सड़क दुर्घटनाओं में मज़दूरों की हो रही मौतों ने हम सब का ध्यान मजदूरों की व्यथा की ओर खींचा है।
आजादी के बाद ग्रामीणों का शहरों की ओर पलायन तेजी से बढ़ा। ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी व्यवस्थाओं जैसे अच्छे विद्यालय, अस्पतालों के अभाव में अच्छी जीवन शैली का सपना लिये ग्रामीण भारत शहर की ओर चल पड़ा था।
कंक्रीट के मकानों से दूर बसी झुग्गियों में रह रहे लोगों को हम दूसरी ही दुनिया का समझने लगे। भारत दो हिस्सों में बंट गया एक अमीरों का भारत एक गरीबों का भारत जहाँ गरीब औऱ गरीब हो रहा था , अमीर और भी अमीर।
गांव छोड़कर शहरों में बसे लोगों को आज अपने ही लोग अप्रवासी के तौर पर जान रहे हैं और उनके घर आने पर कोई खुश नही है, संक्रमण का डर हर किसी के मस्तिष्क में है।
गाँव पिछले कई वर्षों से खाली हो रहे थे। इस समस्या के समाधान पर बात तो हुई पर कभी सरकार या स्वयं समाज द्वारा कोई ठोस कदम नही उठाया गया।
आज शहर में रहकर तीन महीने भी अपने और अपने परिवार का पेट पालने की हिम्मत ना जुटा पाने वाले कामगारों की इस दशा का समाधान निकालना आवश्यक है।
कोरोना हमारे समाज की व्यवस्था को लेकर गम्भीर प्रश्न खड़े कर रहा है कि क्यों अपना गांव छोड़कर शहर बस गयी गरीब जनता आज़ाद भारत की इस पहली गम्भीर परीक्षा में असफल हो गयी। क्यों कोई सरकार आज तक गरीब तबके के लिये रोटी, कपड़ा और मकान की स्थायी व्यवस्था नही कर पायी।
तूफान के बाद शांति जरूर आएगी फिर से हम उद्योगों को चलता हुआ देखेंगे। मज़दूर फिर से साईकिलों की शृंखला में जाते हुए कारों का रास्ता रोकेंगे। रुके निर्माण कार्य शुरू होने पर यह मज़दूर सुबह चौराहों पर काम के लिए चुने जाएंगे। ऊंची ऊंची इमारतों पर रस्सा बाँधे ये उस पर ईंट दर ईंट रखेंगे। कोई ट्रकों से सामान उठायेगा तो उनकी पत्नियां फ़टे टाट के नीचे चूल्हा फूकेंगी।
प्रश्न यह है कि इसके बाद हम इस महामारी से उपजे हालातों से क्या सीख लेंगे। क्या फिर से सैंकड़ो मील पैदल चल कर गांव शहरों में वापस लौटेगा!
मनरेगा के द्वारा गांव में काम उपलब्ध कराने की सरकारी योजना को बिना शर्म के स्वीकार करना होगा। शहर में बर्तन साफ करने से अच्छा अपने गांवों में काम करना ही है क्योंकि ऐसे समय में गांव धोखा नही देते हैं।
शहरों और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में इससे कई परिवार आसानी से अपनी रोज़ी रोटी का प्रबंध कर सकते हैं व अच्छी आमदनी होने पर अन्य परिवारों को भी रोज़गार दे सकते हैं। खादी और ग्रामोद्योग को बढ़ावा देकर भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
भारत एक कृषि प्रधान देश है पर नया भारत खेती को भूल गया और अब कोरोना काल में रोटी के लिये ही गाँवों की और दौड़ रहा है। देश को फिर से एक हरित क्रांति की आवश्यकता है। कृषि में आधुनिक तकनीक का प्रयोग, कृषि सम्बन्धित शोधकर्ताओं को बढ़ावा देकर यह कार्य किया जा सकता है।
पिछले कुछ समय से पशुपालन में भी कमी आयी है, जिसका सीधा प्रभाव दूध के दाम पर भी पड़ा है। यदि ग्रामीण पशुपालन से श्वेत क्रांति लाने में सफल हुए तो शायद ही उन्हें शहर लौटना पड़े।
बड़े बड़े शहरों की दौड़ से दूर ग्रामीण इलाकों में मनुष्य सुकून महसूस करता है। सरकार को इन गांवों, कस्बों को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करना चाहिए। होटल, ढाबों को खोलकर ग्रामीण भारत अपनी आजीविका आराम से चला सकता है।
ऊर्जा के गैर परम्परागत स्त्रोतों का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा के अधिक प्रयोग से हम परम्परागत ऊर्जा के स्त्रोतों पर आत्मनिर्भरता कम कर सकते हैं जो ऐसे विपदा के समय में हमारा साथ छोड़ सकते हैं।
गोबर गैस प्लांट को बढ़ावा देकर भी ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की आमदनी बढ़ायी जा सकती है।
अब देखना यह है कि हमेशा से कभी हार ना मानने वाला भारत इस कोरोना से जंग का बिगुल फूंकेगा या हार कर कोरोना का कहर देखेगा।
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