Wednesday, June 29, 2022

'जिंदगी में जो करिए खुद की मर्जी से' यही कहती है शेरदिल

शेरदिल की कहानी एक ऐसे इंसान की कहानी है जो अपने समाज को जीवित रखने के लिए खुद को कुर्बान करने का निर्णय लेता है। उसके इस निर्णय के बाद की घटनाओं में निर्देशक ने फ़िल्म के ज़रिए समाज का दोहरा चरित्र बेनकाब किया है।
इस फ़िल्म में आप किसी घटना पर आजकल की मीडिया द्वारा किए जाते कवरेज को करीब से देख सकते हैं और डिजिटल इंडिया का सच भी आपको समय-समय पर झकझोरते जाता है।

भारत में गरीबों को शिक्षा से दूर कर उन्हें किताबों का तो नही, फ्री इंटरनेट का लती बना दिया गया है।
जहां ज्ञान न हो वहां अन्याय तो होगा ही। इस इंटरनेट की वजह से किताब के लाखों शब्दों की जगह सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ पंक्तियों के मैसेज पढ़ना और चंद मिनटों के झूठ पर आधारित वीडियो देखना लोगों को आसान लगने लगा। राजनीतिक फायदा उठाते लोगों द्वारा लिखी कुछ ऐसी ही पंक्तियों में प्यार कम और नफरत अधिक थी।

उदयपुर की घटना भी इसी तरह की पंक्तियों और वीडियो का नतीजा मानी जा सकती है। 
असत्य पर सत्य की और नफरत पर प्रेम की जीत सदियों से होती जा रही है। हम प्यार फैलाने वाले मैसेज और वीडियो से इस नफरत को खत्म कर सकते हैं। इसी प्रेम के सन्देश को फैलाने का जिम्मा फ़िल्म 'शेरदिल द पीलीभीत सागा' के निर्देशक ने भी उठाया है।


फ़िल्म के निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी को सिनेमा का बारह सालों का अनुभव है और उसी अनुभव के दम पर उन्होंने वर्ष 2014 से अब तक चार बार नेशनल फिल्म अवार्ड जीते हैं।
श्रीजीत ने इस फ़िल्म में घने जंगल के बीच बैठे दो लोगों के बीच स्थापित तारतम्य से जंगल की अहमियत के साथ-साथ धार्मिक आडम्बर पर भी दर्शकों का ध्यान खींचा है।

गंगाराम नाम के ग्राम प्रधान बने पंकज त्रिपाठी और जिम अहमद नाम के शिकारी बने नीरज काबी ही इस कहानी के मुख्य पात्र हैं और इनकी जगह कोई अन्य पात्र आपके दिल में नही बसता।

फ़िल्म के अभिनेता पंकज त्रिपाठी गैंग ऑफ वासेपुर, बच्चन पांडे, 83, क्रिमिनल जस्टिस और मिर्जापुर में काम कर चुके हैं और उन्होंने इस फ़िल्म से खुद को मनोरंजन उद्योग के बड़े नामों में शामिल कर लिया है। नीरज काबी ने निश्चित तौर पर हाफ टाइम के बाद फ़िल्म का मजा दोगुना किया, वह जब कोई संवाद बोलते हैं तो दर्शक उन्हें सुनते हुए कहीं खो से जाते हैं। नीरज काबी में जिस तरह की काबिलियत है शायद मनोरंजन जगत में  उनको अभी तक उस तरह का सम्मान नहीं मिला है।

पंकज त्रिपाठी की पत्नी बनी सयानी गुप्ता की आंखें ही काफी कुछ कह जाती है लेकिन निर्देशक ने हाफ टाइम के बाद सयानी गुप्ता को कैमरे के सामने कम जगह दी है।

फ़िल्म का छायांकन पश्चिम बंगाल के जंगल की खूबसूरती हूबहू हमारे सामने रखने में कामयाब हुआ है। जंगल में जाला बुनती मकड़ी को देखते और जंगली जानवरों को खतरनाक आवाज़ सुनते आप जंगल से खौफ तो खाने ही लगेंगे। 
फ़िल्म का गीत-संगीत बड़ा ही कर्णप्रिय है और फ़िल्म के गाने जिस तरह लिखे गए हैं, आप उन्हें ध्यान से सुनेंगे। इसके गीतों में क्षेत्रीय शब्दों की भरमार है।
'आदमी भूतिया है' गीत इंसान की फितरत बयान करने के लिए काफी है तो 'मोको कहां' गीत दर्शकों की खुद से मुलाकात कराता है।

फ़िल्म में दिखाए गए गांव में बिजली नही होती और वहां घरों में बत्ती जली हुई दिखती है, आज भी भारत में ऐसे बहुत से गांव हैं। कुछ ऐसे दृश्य दिखाए जाने पर ही यह फ़िल्म खुद में अलग है।

फ़िल्म के संवाद कुछ इस तरह बन पड़े हैं कि वो इसके निर्देशक को मिलने वाले अवार्डों के क्रम को नही टूटने देंगे। 'भूखे गरीब को कानून कहां याद रहता है' संवाद गरीबों की व्यथा पर प्रकाश डालता है।
जंगल की अहमियत पर संवाद 'हम सबसे पहले जानवर, कीड़ों, मकोड़ों से पहले, इस धरती पर जिंदगी की शुरुआत से भी पहले। ये जंगल ही था' वास्तविकता है।

गंगाराम और जिम अहमद के मध्य जंगल में हुआ एक संवाद हमारे देश की वर्तमान स्थिति के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण है। इसे देख आप फ़िल्म के पटकथा लेखक और निर्देशक के प्रशंसक बन जाएंगे।
दृश्य की शुरुआत में जंगल के बीचों बीच एक पेड़ के नीचे बैठे गंगाराम, जिम अहमद से कहते हैं अरे महाराज आप क्यों धर्म भ्रष्ट करने पर तुले हो। हम शाकाहारी आदमी हैं, सब खिला कर हमें पाप का भागीदार बनाओगे! पूजा पाठ करना पड़ जाएगा गरीबी में आटा गीला।
इसे सुन जिम बड़ी सहजता से कहते हैं 'अरे इतना मत सोचिए। ये असली गाय नही, नीलगाय है। एक किस्म का हिरन, अगले कुछ दिन इसी से काम चलाना पड़ेगा। देखिए भोजन का अपमान बहुत बड़ा पाप है।'

गंगाराम कहते हैं ' अरे महाराज हमें सुनिए, कहां बलिदान देकर स्वर्ग में जाना चाहते हैं। आप नर्क में क्यों धकेल रहे हो।'
ये सुन जिम इस महत्वपूर्ण संवाद को आगे बढ़ाते बोलते हैं देखिए स्वर्ग और नरक ,जन्नत और जहन्नुम, ये सब इंसानों के बनाए फलसफे हैं जनाब। ये नंगी भूखी दुनिया किसी जहन्नुम से कम है क्या! भूखे के लिए रोटी से बड़ा जहन्नुम कुछ नहीं है, लीजिए शुरू कीजिए।
जिम की ये बात सुन गंगाराम बड़े प्रभावित होते हैं और कहते हैं जब तक मर नहीं जाते तब तक तो जिंदा रहना ही पड़ेगा। (फिर वो उस टुकड़े को खाने लगते हैं)

जिम अब गंगाराम से सवाल करते हैं गाय होती तो भूखे पेट सो जाते क्या!
गंगाराम- बिल्कुल गाय हमारी माता है हम गौ पालक हैं, नहीं खाते।
जिम इस पर कहते हैं हम भी एक बार भूख के मारे जंगली सूअर खा गए थे और खाने के बाद आपकी तरह डर गए थे कि हां यार तुम अल्लाह की नजर में गिरे हो, लेकिन जान बची तो लाखों पाए।
गंगाराम इसे गौर से सुनने के बाद कहते हैं डर नहीं लगता आपको मुल्लाजी लोगों का।
इस पर जिम बने नीरज काबी फिर से अपनी काबिलेतारीफ संवाद अदाएगी से कहते हैं हमारे एक एक गुनाह का रिकॉर्ड अल्लाह के पास है। तो यह हमारा पर्सनल मैटर है, जब हम उनके पास जाएंगे तब तय कर लेंगे। ये चार दिन की जिंदगी में क्या करना है क्या नही, ये कोई मौलाना या पंडित तय क्यों करे भाई।
गंगाराम बने पंकज त्रिपाठी इस पर मुस्कुरा भर देते हैं।

फ़िल्म में एक कमी यह जरूर लगी कि इसके एक दृश्य में यह दिखाया गया है कि पंकज 'महफूज' नही समझते पर 'सेफ' समझ लेते हैं, यह दृश्य निर्देशक द्वारा दर्शकों को जबर्दस्ती हंसाने की कोशिश लगती है।

निर्देशक- श्रीजीत मुखर्जी
अभिनय- पंकज त्रिपाठी, सयानी गुप्ता, नीरज काबी
छायांकन- तियाश सेन
समीक्षक- हिमांशु जोशी 
@himanshu28may


Tuesday, June 28, 2022

एवरेसट पर कितने लोग डाटा
मकाऊ मुश्किल
फिलिंग क्या थी, दूसरे का निर्णय
आगे का भविष्य
दूर भारत की लड़कियों के लिए सन्देश और फंडिंग की कमी

Thursday, June 23, 2022

पारम्परिक रेडियो का नया अवतार है पॉडकास्ट.

पॉडकास्ट पारम्परिक रेडियो का नया अवतार है, रेडियो प्लेबैक इंडिया जैसे पॉडकास्ट वर्षों से इस क्षेत्र में हैं. ये ऐसे लोगों के लिए एक अवसर है जो बड़े शहरों में जाकर खुद की कला को निखार नही सकते, पॉडकास्ट के जरिए कलात्मक लोगों के लिए अपने क्षेत्र के बड़े नामों से जुड़कर कुछ नया सीखने का अवसर भी है.

एक समय था जब भारत में रेडियो का बोलबाला था, विविध भारती, रेडियो एफएम गोल्ड जैसे चैनल रेडियो श्रोताओं के बीच लोकप्रिय थे. टीवी के दाम अधिक होने की वजह से रेडियो पर क्रिकेट मैच का आंखों देखा हाल सुनने वालों की भी कमी न थी. मुझे 2003 क्रिकेट वर्ल्ड कप के ऐसे मैच भी याद हैं जब लाइट चले जाने पर मैंने रेडियो का सहारा लिया था.

भारत में आर्थिक स्थिति और मनोरंजन की स्थिति साथ-साथ ही बहुत तेजी से बदलने की वजह से टेलीविजन के दाम कम हुए और केबल की पहुंच भी घर-घर तक हो गई. इन्वर्टर ने लाइट जाने पर भी टीवी से जुड़े रहने के रास्ते खोले. एंड्राइड मोबाइल और सस्ते इंटरनेट ने भारतीयों का टीवी से भी मोह भंग कर दिया, इस बीच भारतीय मनोरंजन जगत में मानो रेडियो को तो जैसे भुला ही दिया गया.

पर इंटरनेट और मोबाइल पर उपलब्ध रेडियो की वजह से रेडियो अब भी जिंदा था.
प्रसार भारती के न्यूज ऑन एयर एप को अब तक दस लाख लोगों द्वारा अपने फोन पर डाउनलोड किया गया है, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार इस एप पर ऑल इंडिया रेडियो की 240 रेडियो सेवाएं मौजूद हैं.
30 सितंबर से 11 अक्टूबर 2021 के आंकड़ों में नजर डालें तो पता चलता है इस बीच दिल्ली में लगभग सात लाख श्रोताओं द्वारा न्यूज़ ऑन एयर एप को सुना गया था.

पॉडकास्ट की लोकप्रियता

पारम्परिक रेडियो की जगह भारत में अब पॉडकास्ट लोकप्रिय हो रहा है. जिस प्रकार हम आर्टिकल लिखते हैं और लोगों के साथ शेयर करते है, ठीक उसी प्रकार पॉडकास्ट भी होता है. पॉडकास्ट एक मोबाइल ऐप की तरह होता है, जिसमें हम किसी भी प्रकार की जानकारी ऑडियो के रूप में स्टोर करते हैं और यह सभी जानकारी को लोगों के साथ शेयर करते हैं. पॉडकास्ट में हम अपनी आवाज को ऑडियो के रूप में डाल सकते हैं. जिस प्रकार हम कोई भी वीडियो को अपने मोबाइल या कैमरा में रिकॉर्ड करते हैं, ठीक उसी प्रकार पॉडकास्टिंग के अंदर सिर्फ हमारी आवाज ही रिकॉर्ड होती है, फिर हम उसे बाकी लोगों के साथ शेयर कर सकते हैं.

घरेलू प्रबंधन परामर्श फर्म रेडसीर के अनुसार भारत में पॉडकास्ट बहुत  तेज़ी से बढ़ रहा है. अक्टूबर 2021 में ऑनलाइन मनोरंजन करते हुए भारतीयों द्वारा 2290 बिलियन मिनट गुजारे गए थे. जिसमें 885 मिनट सोशल मीडिया पर , पॉडकास्ट पर 2.5 बिलियन मिनट और बाकी समय ओटीटी आदि पर था.  रेडसीर की रिपोर्ट के अनुसार भारत की मात्र 12 प्रतिशत आबादी ने ही अभी पॉडकास्ट के बारे में सुना है, तो आने वाले समय में भारत के अंदर इसका बहुत बड़ा बाजार है.

पॉडकास्ट की लोकप्रियता का उदाहरण हम कुछ पॉडकास्ट एप के बारे में जानकर ले सकते हैं. पॉडकास्ट एप 'क्लब हाउस' के गूगल प्लेस्टोर में एक करोड़ से भी ज्यादा डाउनलोड हैं.

ठीक यही कहानी 'मेन्टजा एप' की भी है. एक साल से भी कम समय में इस एप के गूगल प्लेस्टोर पर डेढ़ लाख डाउनलोड हो चुके हैं.
मेन्टजा एक कार्यक्रम में एक समय में पांच वक्ताओं को बीस से तीस मिनट के अंदर बोलने का मौका देता है, इस बीच बाकी लोग श्रोताओं के तौर पर कार्यक्रम से जुड़ सकते हैं और अपने कमेंट कर सकते हैं. किसी वक्ता की बात पसंद आने पर श्रोताओं के पास उसकी बात रिकॉर्ड करने की सुविधा भी होती है, जिसे बाइट बनाना कहा जाता है.

रेडियो प्लेबैक इंडिया का कमाल

साल 2007 के दौरान भारत में जब लोग पॉडकास्ट को जानते भी नही थे, तब कला जगत के कुछ महत्वपूर्ण लोगों द्वारा रेडियो प्लेबैक इंडिया की शुरुआत की गई.
 इस प्लेटफॉर्म पर साहित्य, संगीत और सिनेमा, इन तीनों पक्षों पर काम करने का लक्ष्य निश्चित किया गया.

आरपीआई ने पिछले साल अक्टूबर में क्लबहाउस एप में अपने कुछ कार्यक्रमों को शुरु किया था और इस साल मार्च में रेडियो प्लेबैक इंडिया की टीम मेन्टजा एप पर आई.
मेन्टजा एप पर आरपीआई के हफ्ते भर में पचास कार्यक्रम आते हैं और लगभग 1500 से 2000 श्रोताओं द्वारा इन्हें हफ्ते भर में सुना जाता है.


आरपीआई से जुड़े पत्रकारिता शोध छात्र मौसम बताते हैं कि मेन्टजा पर आरपीआई के आने के बाद उन्हें दोहरा फायदा हुआ है, पहला ये की उनकी बातें लाखों लोगों तक पहुंच रही है और दूसरा ये कि उनको कला के क्षेत्र में अरुण कालरा, सरिता चड्ढा, सजीव सारथी जैसे बड़े नामों से जुड़ते हुए कुछ नया सीखने का मौका भी मिल रहा है.

पॉडकास्ट का ये फायदा है कि इसमें बच्चे, युवा, बुजुर्ग हर आयुवर्ग के लोग खुद को निखार सकते हैं.
रेडियो प्लेबैक इंडिया द्वारा मेन्टज़ा में होने वाले कार्यक्रमों में छात्र व नौकरीपेशा लोग शामिल रहते हैं.

20 जून को विश्व गायन दिवस पर रेडियो प्लेबैक इंडिया मेन्टजा पर कुछ बेहतरीन कार्यक्रम लेकर आया था. शाम आठ बजे से लेकर रात बारह बजे तक इसमें लगातार श्रोताओं के लिए गीतों की बौछार हुई थी. देश-विदेश में रह रहे आरपीआई के सदस्यों द्वारा सुनाए गए सूफी संगीत, गजलों और देश के अलग-अलग हिस्सों के लोक गीतों से श्रोताओं को भारतीय संगीत विविधता का बेहतरीन अनुभव हुआ. बॉलीवुड के गानों और बच्चों की लोरियां भी अपना अलग कमाल कर रही थी.
रेडियो प्लेबैक इंडिया 20 जून को हुए अपने कार्यक्रमों की सफलता को देखते अब 27 जून को महान संगीतकार पंचम दा के जन्मदिन पर कई सारे प्रोग्राम करने की तैयारी में है.

क्लबहाउस, आरपीआई और मेन्टजा एप की तरह पॉडकास्ट के अन्य महारथियों का भविष्य भी सुनहरा है, उम्मीद है युवाओं के लिए ये पॉडकास्ट की दुनिया कैरियर के नए अवसर भी खोलेगी.

हिमांशु जोशी।
@himanshu28may

मन परिंदा जाने कहाँ ले जाए।।

स्कूल से आते ही सुरेश ने अपना बैग घर के कोने में पड़े पुराने लोहे के बक्से के ऊपर रख दिया, जिसके नीचे मट्टी से जंग लग गया था।

जमनपुर में मिट्टी की लिपाई वाले दो कमरे ही तो अब उसके परिवार का ठिकाना थे।

पापा के फौज से रिटायर आने के बाद सुरेश मेरठ जैसे शहर से सीधे हिमालय की गोद में बसे छोटे से कस्बे जमनपुर पहुंच गया था। सुबह सुबह हिमालय की गोद से निकल हरे भरे खेतों से होती ठंडी हवा उसके मन को शांत कर देती थी, इसी शांति में सुरेश अपने भविष्य के कई सपने बुन लेता था। वो अभी सातवीं कक्षा में ही तो था लेकिन बड़े होकर घर, कार सब कुछ लेने का मन अभी से था और वो अपने मम्मी-पापा को दुनिया जहां की खुशियां दे देना चाहता था।

जमनपुर में अच्छी खासी जमीन होने से सुरेश के घर में खाने की तो कोई कमी न थी पर पापा की कम पेंशन से तब घर मुश्किल से ही चलता था।

इस बीच रिटायमेंट के पैसों से सुरेश के पापा ने पुश्तैनी घर के पास ही नया घर बनाना शुरू कर दिया था, सुरेश उस अधबने घर जाता और अपने मन के परिंदों को खूब दौड़ाता था। इस कमरे में मैं रहूंगा, यहां से मैं स्कूल से आकर अपना बैग फैंक कर झट खाना खाऊंगा।

नए घर में आने के बाद सुरेश अपने कमरे में अकेला बैठता और कॉपी के पिछले पन्नों पर अपने आने वाले कल की योजनाएं लिखता। मन परिंदा आखिर चुप कहां रहता है।

स्कूल में उसके लिखे के सब दीवाने थे, वो स्टेज पर बोलता और नाटक में भी हिस्सा लेता था। शायद जमनपुर की भौगोलिक स्थिति का उसपर बहुत असर था, नदी पहाड़ सब कुछ तो थे वहां। ऐसी जगह मन परिंदा खूब दौड़ता था, अनन्त तक।

कभी कभी घर में पैसों की कमी को भी सुरेश ने खूब देखा था इसलिए वो मन के परिंदे दौड़ा सोचते रहता कि मैं जल्द से अपने घर का सब कुछ अच्छा कर दूं। बारहवीं कक्षा के दौरान फ्रैंकफिन द्वारा लिए एक साक्षात्कार में उसका धाराप्रवाह अंग्रेज़ी की वजह से चयन हो गया था और घर आ वो सामने दिख रहे दो किलोमीटर दूर के हिमालय की तरफ साइकिल चलाते खुद को ऐसा महसूस कर रहा था जैसे वो हवा में उड़ रहा हो।

मन तो परिंदा होता है इसलिए फिर उड़ गया, इंजीनियरिंग की परीक्षा दे सुरेश अब मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए हिमालय में स्थित मोनहाट कॉलेज पहुंच गया। छटा पे कमीशन लगते ही सुरेश के पापा की पेंशन बढ़ी और सुरेश भी अपने सपनों से भटक गया।

शराब, चरस, व्हाइटनर अब उसके साथी थे, इंजीनियरिंग में पढ़ाई तो एक रात पहले ही होती है। फाइनल साल आते आते सुरेश का मन परिंदा फिर उड़ने लगा और वो अब पुलिस की भर्ती दे आया था।

एक रात वो सोया था तभी खुद से सवाल पूछा 'सिपाही का फार्म तो तूने भर दिया बेटे, क्या किसी अधिकारी का गेट खोल पाएगा' ।
जवाब हां था, जब मन तैयार तो कौन रोक सकता, आज तक अपने मन परिंदे की ही सुनने वाला सुरेश पुलिस की ट्रेनिंग के लिए फिर हिमालय की गोद में रामनगर था।

नौ महीने की ट्रेनिंग और घर जैसा माहौल, घर जैसा इसलिए क्योंकि सुबह सुबह दौड़ते सुरेश अपने सामने हिमालय को ही पाता। उसके मन परिंदे को वही शांति मिलती थी, जो वो बचपन से महसूस करते आया था।

कुछ साल तो सब ठीक रहा पर अब आस पास के माहौल , दुनिया की समझ ने सुरेश के मन परिंदे को फिर उड़ा दिया। बचपन का सोया लेखक अब फिर जग उठा था, हर तरह का नशा छोड़ चुके सुरेश ने नौकरी के पांच साल बाद पत्राचार से पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू की और फिर कोरोना काल में वो लिखने लगा।

उसके परिवार की उपभोक्तावाद की सारी जरूरतें बिना सुरेश के ही पूरी हो रही थी। एसी, घर, कार, मोटरसाइकिल, स्कूटी सब होते सुरेश का मन इन सब से खुद दूर रहा और वो समाज, पर्यावरण के विषय पर ही ध्यान देकर लिखने लगा।

देश के बड़े बड़े पत्रकार, लेखक उसे अब इन दो सालों में जानने लगे थे।

एक जीवनी लिखने के लिए उसे कुछ दिनों पहले मुंबई के उद्योगपति का फोन आया था। पहली बार हवाई जहाज में दूसरे के पैसों पर बैठना, एयरपोर्ट के बाहर रिसीव करने के लिए मर्सिडीज।

आज सुरेश का मन परिंदा वही सफर याद कर रहा था जो फ्रैंकफिन में सिलेक्शन वाले दिन उसने महसूस किया था। एक उड़ान, मन परिंदे की ऊंची उड़ान, जो अब भी जारी है।

Saturday, June 18, 2022

इस मुश्किल दौर के बीच 'मुक्ति' के लिए रास्ता बनाती एक किताब.

इस किताब के हर विषय पर लेखक के साथ बैठ घण्टों चर्चा करने का मन है कि कैसे वर्तमान समय में मुक्ति के रास्ते पर चला जाए, लेकिन अफसोस आज प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने जिस समाज की कल्पना की थी उस पर उनके बिना चलना बहुत मुश्किल होगा।
आइंस्टीन, धर्मवीर भारती, बहुत सी किताबों, ग्रंथों का हवाला देते हुए प्रोफेसर की यह किताब मुक्ति का मार्ग खोजती है।

पुस्तक- आजादी का मतलब क्या
प्रकाशन- राजपाल प्रकाशन
लेखक- लाल बहादुर वर्मा
संपादन- अशोक कुमार पाण्डेय
पुस्तक मूल्य- 265 रुपए
समीक्षक- हिमांशु जोशी @Himanshu28may

किताब का आवरण चित्र बहुत बेहतरीन डिजाइन किया गया है, उसे देखकर आप महसूस कर सकते हैं कि हमें आजादी किस कीमत पर मिलती है। यहां पर आपको आजादी की परिभाषा भी पढ़ने के लिए मिल जाएगी। पिछले आवरण का लिखा पढ़ कोरोना काल में खोए महत्वपूर्ण लोग याद आते हैं, जिनमें से एक किताब के लेखक प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा भी थे।

'क्रम' से किताब के बारे में यह जानकारी मिलती है कि इसे भूमिका सहित बीस हिस्सों में बांटा गया है।

एक पुत्री के द्वारा अपने पिता को याद करते पढ़ना पाठकों को किताब से भावनात्मक रूप से जोड़ देता है।

 किताब की भूमिका 'कश्मीरनामा', 'उसने गांधी को क्यों मारा' के लेखक अशोक कुमार पाण्डेय द्वारा लिखी गई है। भूमिका में अशोक स्पष्ट कर देते हैं किताब में ऐसा क्या है जो आजादी को लेकर नई समझ बनाने के लिए हमें पढ़ना चाहिए, किताब बनने की भावुक कर देने वाली कहानी भी वह पाठकों के साथ साझा करते हैं।

किताब का पहला अध्याय 'आजादी का मतलब है'। इसे पढ़ते हुए शुरुआत से ही पाठकों को किताब की भाषा बेहद ही आसान लगेगी और अंत तक किताब की भाषा ऐसी ही है।
पहले अध्याय की शुरुआत में पाठकों को दो ऐसी पंक्तियां पढ़ने को मिलती हैं जिन्होंने दो राष्ट्रों की तस्वीर बदल दी, ' मनुष्य प्रकृतया स्वतंत्र है पर हर कहीं बंधनों में जकड़ा हुआ है' फ्रांस।
' स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे' भारत।

इसी अध्याय की पंक्ति 'आज का मनुष्य जितना मुक्तिकामी है उतना पहले कभी नही था पर यथार्थ यह है कि मनुष्य आज जितना दास है उतना पहले कभी नही था' पाठकों को भीतर तक झकझोर देती है।

दूसरा अध्याय 'दासता यानी गुलामी' इस बात से शुरू होता है की दासता आज भी एक सूक्ष्म और व्यापक समस्या है , जैसे मजदूर अपनी पत्नी को दास समझता है।
लेखक ने विश्व भर से दासता का इतिहास बताने के लिए बहुत सी कविताओं और उपन्यासों का उदाहरण दिया है।

'मजदूरों की अपेक्षा दास महंगे पड़ते हैं' पंक्ति मजदूरों के जन्म का कारण स्पष्ट कर देती है। लेखक ने इसके आगे अमरीका में दासता का इतिहास तो भारत में दासता का वर्तमान लिखा है।
इस अध्याय से आप समझ जाएंगे कि आज देश में धर्म और रोजगार के नाम पर जो कुछ भी किया जा रहा है, वह लोकतंत्र के बिल्कुल खिलाफ है।

तीसरे अध्याय 'राज्य सत्ता से मुक्ति' की शुरूआत में लेखक ने राज्य और ईश्वर के बीच अद्भुत तुलना की है। पृष्ठ 37 में फ्रांसीसी क्रांति के बारे में पढ़ते आपको भारतीय राजनीति के कई वर्तमान चेहरे याद आने लगेंगे।
'राज्य की सत्ता जिनके हाथ में होती है, उनका ही हित प्राथमिक और निर्णायक होता है' पंक्ति बड़ी महत्वपूर्ण है। कई विचारकों के विचार पढ़ने के साथ आपको यहां पर इतिहास में राज्य के खिलाफ हुए आंदोलनों के बारे में पढ़ने के लिए भी मिलेगा।

अध्याय चार 'पितृसत्ता से आजादी' की शुरुआत लेखक ने सालों से पितृसत्ता स्थापित करने के लिए हो रहे प्रयासों के उदाहरण देने से करी है।
थेरीगाथा में पितृसत्ता से मुक्ति की खोज के लिए भिक्षुणियों की लिखी कविताएं बड़ी ही प्रभावित करने वाली हैं।

किताब की खूबी यह है कि इसमें इतिहास की किसी आम किताब की तरह तिथि और नाम नही दिए गए हैं जो आपको इससे दूर भगाएं, इतिहास को वर्तमान से जिस तरह किताब में जोड़ा गया है वो इसे पढ़ते पाठकों की किताब के प्रति रुचि बनाए रखता है।

पृष्ठ 56 में लेखक ने नारी को मानव समाज की अंतिम उपनिवेश कहा है, इस पृष्ठ में नारी को लेकर लिखे गए उनके हर शब्द पढ़ नारी स्वतंत्रता को लेकर एक नई चर्चा शुरू कराने का माद्दा रखते हैं।

अध्याय पांच बड़ा रोचक बन पड़ा है, यहां लेखक ने गरीबी को जिस तरह समझाया है यह उनके जीवन भर के अनुभवों का निचोड़ लगता है। इस अध्याय से लेखक पाठकों को यह समझाने में कामयाब रहे हैं कि हमने गरीबी की जो परिभाषा समझी है वो परिभाषा ही गलत है। अध्याय छह में जिस राष्ट्रवाद के बारे में लेखक ने लिखा है ,रूस-यूक्रेन युद्ध उसी का नतीजा जान पड़ता है। अध्याय सात 'युद्ध मुक्ति का साधन है या बंधन' में युद्ध का कारण बड़ी ही सरल भाषा में लिख दिया गया है।

अध्याय आठ की पहली पंक्ति में पूंजीवाद की परिभाषा नए अंदाज से लिखी गई है। किताब में लेखक ने हर बात की वजह कुछ इस तरह से समझाई है कि आप उनसे इंकार नही कर पाएंगे। इस अध्याय में चीन और सोवियत यूनियन में पूंजीवाद की जड़ें मजबूत होने की पूरी कहानी समझाई है। अध्याय नौ किताब के बेहतरीन अध्यायों में शामिल है। फैज और गालिब के कथन और उनके सहारे इंसान में संस्कृति को परिभाषित करना, ये सब आपको लेखक का प्रशंसक बना देगा। 
सांस्कृतिक गरीबी बढ़ने पर पंक्ति 'हमारे समाज को आज तक यह नही पता है कि सर्जन और आनन्द के लिए अवकाश जरूरी होता है' सटीक बैठती हैं। 

अध्याय दस संयुक्त राष्ट्र संघ और अमरीकी पाखंड को खुलकर हमारे सामने रखता है। सम्पादक की तरफ से एक पन्ने के अंत में अपडेट जोड़ा है, जो जरूरी था। 
 
प्रदूषण की समस्या को मुक्ति से जोड़ना वर्तमान की जरूरत है और लेखक ने इस काम को पूरा किया है। 
पृष्ठ 127 में अध्याय 11 की महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं, इन्हें पढ़ आपको आजकल सोशल मीडिया में धर्म को लेकर चल रही सभी पोस्टें याद आ जाएंगी। पाठक इन्हें समझ जाएं तो धर्म का फायदा उठाने वाले लोगों की दुकानें आज ही बंद हो जाएंगी। अध्याय 12 में एक श्लोक के हर शब्द को विस्तृत रूप देकर लेखक फिर अचंभित करते हैं।

अध्याय 12 'भय से मुक्ति' में हिटलर, भारत और अमरीका के बीच जो सम्बन्ध जोड़ा गया है, उसे समझने भर के लिए ही किताब खरीदी जा सकती है। इसी भय से मुक्ति में भारत का उज्ज्वल भविष्य भी छुपा हुआ है।

जाति, बोरियत, उपभोक्तावाद, अज्ञान, मृत्यु और मुक्ति से मुक्ति जैसे महत्वपूर्ण विषयों के साथ समाज के लिए कई कल्याणकारी रास्तों को खोजती किताब समाप्ति की तरफ लिखी गई है।

उपभोक्तावाद के लिए उदाहरण 'गरीब पौष्टिक भोजन कर पाए या न, वह मंजन और शैम्पू का इस्तेमाल करने की आदत में फंसता जा रहा है' बेहतरीन है।
किताब का अंत तब विचारों में डूबा देता है जब लेखक जीवन के सदुपयोग पर लिखते हैं, पाठक इसे पढ़ खुद को सवालों के घेरे में पाते हैं।

Wednesday, June 15, 2022

मेरे पापा

दिल्ली के करावल नगर में रहने वाला रवि एक हफ्ते पहले ही मेरठ के सोफीपुर से लौटा था. कोरोना काल के मुश्किल दौर में उसे मनोज को कंधे में बैठा दिल्ली से सोफीपुर पैदल ही जाना पड़ा था. जाता भी कैसे न, अपने इकलौते बेटे को भूख से तड़पते देख कौन बाप शांत बैठ सकता है.

रवि की पत्नी सुनीता मनोज को जनते ही चल बसी थी. अधिक रक्तस्राव होने की वजह से सरकारी अस्पताल ने सुनीता की जान बचाने को लेकर हाथ खड़े कर दिए थे और प्राइवेट अस्पताल के लिए रवि के पास पैसे नही थे.

कोरोना काल के दौरान झोपड़ पट्टी में ही छूट गई साइकिल को दुरस्त कर, अब रवि धीरे-धीरे अपनी जिंदगी के पुराने ढर्रे पर लौट रहा था.

 मनोज आज अपने पापा रवि के साथ साइकल में आगे बैठा गाना गाता जा रहा था ' उड़े जेथे हवाएं पबन पबन उड़े जेथे परिंदे हो हो हो हो'. स्कूल पहुंचने पर रवि ने उसे गोद में उठा लिया और क्लास तक छोड़ आए. 

धूप चढ़ने लगी थी और रवि 'खजूरी खास' चौक पर कहीं मजूरी मिलने का इंतज़ार करते थक गया था, हमेशा की तरह जेब में रखे कल रात के भिगाए चने और पास ही हनुमान मंदिर में लगा नलका उसके साथी थे.

स्कूल में इंटरवल हो गया था, मनोज क्लास की खिड़की से बाहर एकटक नज़रों से खेलते बच्चों को देख रहा था. वो भी कुछ दिन पहले उन बच्चों के साथ खेलता था पर किसी वायरस की वजह से वो अब ठीक से चल नही सकता था.
गरीबी की वजह से रवि उसका इलाज ठीक से नही करा पाया.

स्कूल की छुट्टी होते होते रवि स्कूल के बाहर खड़ा था, 
'अले पापा आद मतन थल ने तबको तेलने का थामान दिया' घर लौटते साइकिल की आगे की डंडी में बैठा मनोज अपने पापा को स्कूल की सारी कहानी सुनाता जा रहा था.

मदन जी आज शाम भी अपनी पत्नी रूपा से झिड़काई खा रहे थे, ' क्यों मदन मास्साब दुनिया बदलने का ठेका तो आप ही लिए हो, आज अपने पैसों से स्कूल के बच्चों को फुटबॉल, बैडमिंटन रैकेट, क्रिकेट बैट, सब बांट आए, अरे अपनी औलाद न हुई तो गैरों पर तो न लुटाओ. मेरे लिए गहने तो बनवाए नही जाते'.

अगले दिन स्कूल की व्हीलचेयर में मनोज बैडमिंटन का रैकेट पकड़ अकेले ही खेल रहा था, मदन जी उसके पास आए और खिलाने लगे. मनोज में गजब की फुर्ती थी, वो एक शॉट मार अगले के लिए बिजली की तरह तैयार रहता.
शाम रवि करावल नगर में लगे बृहस्पति बाजार से मनोज के लिए जूते,एक पाव बादाम और उसकी मनपसंद सब्जी भिंडी खरीद लाए थे. रवि के खाना बनाते मनोज उनसे बोला, पापा मैं बड़ा होकल आपके लिए थुद ताना बनाऊंगा. आज मदन थल ने मुदे बैडमिन्तन तेलना तिताया. रवि मन ही मन अपने बेटे पर प्यार लुटा रहा था और अपने प्यारे बेटे के लिए उसकी आँखों में खुशी के आंसू थे.


मनोज आज मदन जी के सहयोग से जूनियर लेवल पैरा बैडमिंटन खेलने द्वारका जा रहा था. रवि दिल्ली की सड़कों को आज साइकिल से नाप रहा था, साइकिल में पीछे बैठे मनोज में उसे एक उम्मीद नज़र आने लगी थी, यही तो उसकी दुनिया थी. करावल नगर से द्वारका की लंबी दूरी भी आज रवि के लिए कुछ नही थी, वो बिना थके द्वारका पहुंच गया.

एक के बाद एक ताकतवर शॉट , मनोज आज पैरा बैडमिंटन का नेशनल चैंपियन था, जीत कर मिले पैसों को वो सीधे पापा को देता, रवि भी खुश था. 

कुछ ही सालों में मनोज ने खेल के पैसों से एक ऑटोमेटिक कार ले ली और अपने पिता के लिए करावल नगर में ही एक पक्का मकान बनवा लिया.
मनोज अपने खेल में कोई भी खामी आने पर सीधे मदन जी के घर का रुख करता.

कुछ दिनों बाद मनोज का पैरालम्पिक के लिए जाने वाली भारतीय पैरा बैडमिंटन टीम के लिए ट्रायल होना था. रवि के कदमों में बैठा मनोज कहता है 'पापा देखना, अब आपको पूरा देश जानेगा, आप मेरे साथ विदेशों में भी साथ रहोगे. हम मिलकर पूरी दुनिया घूमेंगे. रवि कहता है ' वो सब तो ठीक है, तू ये बता बहू लाकर मुझे कब अपनी चिंता से मुक्त करेगा' 
अरे पापा पहले खेल पर तो ध्यान देने दो , ऐसा कहते रवि बात घुमा देता है.

मदन जी मनोज को लेने उसके घर ही आए थे, कोर्ट में मनोज के शाट्स का कोई जवाब नही था. वहां बैठी भारतीय बैडमिंटन कोच साइना ग्रेवाल भी मनोज से बहुत प्रभावित हुई, मनोज को भारतीय बैडमिंटन पैरालम्पिक टीम में शामिल होने के साथ उसके अगले विदेशी दौरे के लिए भी तैयार रहने के लिए कह दिया गया.
मनोज खुश था, घर जाते ही पापा को गले लगा लेगा..

दो महीने बाद नीली जर्सी में मनोज एक के बाद एक शाट्स से चीन में ही हो रहे मैच में चीनी खिलाड़ी को पस्त कर रहा था,मदन जी की आंखों में आंसू थे.
मनोज भारत का पहला पैरालम्पिक बैडमिंटन चैंपियन था, भारत पहुंच कर वो और मदन जी सीधे हरिद्वार पहुंचे. रवि आज एक छोटे से अस्थि कलश में बंद था और उसे एक अनन्त यात्रा में निकलना था.

जिस दिन मनोज का चयन इस पैरालम्पिक टीम के लिए हुआ था, उसी दिन मनोज के घर लौटने से पहले रवि का दिल उनका साथ छोड़ चुका था.

हिमांशु जोशी


पापा बस तुम ही

निशा और उसके मम्मी-पापा उत्तराखंड के रुद्रपुर में अपने छोटे से घर में बड़ी खुशी खुशी रहते थे.
निशा के पापा अतुल एक इलेक्ट्रिशियन होने के बाद भी उसकी हर जरूरतों का ख्याल रखते थे. पंखे, फ्रिज की रिपेयरिंग करने के साथ लोगों के घर में बिजली फिटिंग कर उनकी ठीक ठाक कमाई हो जाया करती थी.

निशा के पापा और उसकी मम्मी मानसी की लव मैरेज थी. पितृसत्तात्मक समाज में अतुल एक बेटी से ही संतुष्ट था क्योंकि उसे पता था कि बेटियां विषम परिस्थितियों में भी अपने पिता का साथ नही छोड़ती हैं, आजकल के लड़के तो नौकरी और अपने कैरियर के चक्कर में मां बाप को उनके बुढ़ापे में अकेला ही छोड़ देते हैं.

अतुल दिन रात मेहनत कर निशा को शहर के प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल रैनबो में पढ़ा रहा था, जहां बच्चों को पढ़ाना रुद्रपुर के सभी मध्यमवर्गीय परिवारों के मुखियाओं का सपना होता है.

आज निशा स्कूल ही थी और उसके पापा वक्त से पहले घर लौट आए थे, उन्होंने निशा की मम्मी मानसी से कहा ' मानसी आज मेरा मन था कि टीवी खरीद ही लाऊं, निशा बड़ी हो रही है, खामख्वाह ये सरिता के घर टीवी देख कर निराश होते रहती है'.
मानसी ने कहा 'पहले इसके स्कूल की फीस जमा कर लूं, बचे पैसों का आप देख लेना'.
ये बात सुनते सुनते निशा के पापा छत से कपड़े लेने चले गए, छत पर चढ़ने के लिए उन्होंने बांस की सीढ़ी लगाई थी.

आआआआआआआआ,,,, एक चीख और निशा की मम्मी दौड़ते बाहर आई, अतुल का शरीर नीला पड़ चुका था. मानसी एकटक होते घर के ऊपर से गुजरते बिजली के तार को देख रही थी.

निशा स्कूल से आई तो उसके घर भीड़ लगी थी, आज ही वो स्कूल में 'मेरे प्यारे पापा'  कविता बोल कर आई थी, घर आकर अपने पापा को भी वही कविता सुनाना चाहती थी.

'पापा मेरे प्यारे पापा, 
मेरे पापा मुझे साइकिल में छोड़ने स्कूल आते हैं,
काम पर जाते हैं, फिर देर रात आते हैं
बहुत थक जाते हैं.
बड़े होकर मैं काले कोट वाली वकील बनूंगी, पापा को काम पर न जाने दूंगी,
पापा मेरे सबसे प्यारे पापा'

मानसी ने लोगों के घर में काम करना शुरु कर दिया था, वो निशा का बहुत ख्याल रखती थी. निशा की दो चुटिया बनाना, उसे दुपट्टा पहनना सिखाना, निशा के बड़े होने पर उसे दुनियादारी की समझ देना, सब काम मानसी ने ही तो किया था.
इस वजह से वो खुद को भूल गई थी, एक बार निशा में अपनी मां से कह ही दिया 'मम्मी हम रुद्रपुर घर बेचकर क्यों न पहाड़ में अपने गांव चले जाएं.'
मानसी ने कहा तेरे पापा के साथ यहां तुझे गांव वापस ले जाने नही, तुझे नाम कमाते देखने के लिए आए थे.

निशा अब बड़ी हो गई थी और उसने एक आईटीआई में पढ़ना शुरू कर दिया था. निशा पर्स में अपने पापा की फोटो हमेशा रखती थी, वो चाहती थी कि कोई उसका ख्याल रखे जैसे उसके पापा रखते थे.

 बिन पापा की बेटी को समाज कमजोर ही समझता है और उसमें वो लोग ही अधिक होते हैं, जो परिवार को जानते हैं.
 निशा पर उसके घर के पास रहने वाले राज मेहता (जिसकी एक पीसीओ थी) ने डोरे डालने शुरु कर दिए थे. निशा न चाहते हुए भी उसकी भोली भाली बातों में आ गई और राज ने  एक दिन अपने दोस्त के होटल में बुला कर निशा का रेप किया.
मम्मी के डर से निशा ने उन्हें कुछ नही बताया, कुछ दिन बाद निशा को पता चला कि वो पेट से है।
उसने बच्चा गिराने की गोली खा ली और उसे खाने के बाद निशा को घर में ही ब्लीडिंग होने लगी, तब मानसी को उसने सब कुछ बता दिया.

मानसी ने हिम्मत से काम लेते निशा को अस्पताल पहुंचाया और उसका ध्यान रखा. मानसी ने निशा को एक शब्द न कहा, कहती भी कैसे निशा के लिए जमाने से लड़ सकने वाले उसके पापा तो काफी पहले उन दोनों को अकेला छोड़ गए थे.

निशा अपनी जिंदगी में आगे बढ़ी, वो चाहती थी पीसीओ वाले राज मेहता को उसके किए की सजा मिले. निशा ने अंग्रेज़ी की कोचिंग पढ़ाते एलएलबी के लिए दाखिला लिया और राज के खिलाफ थाने में मुकदमा भी लिखाया.

निशा अब किसी भी लड़के से बात नही करना चाहती थी और अकेले रहने लगी थी।
धीरे धीरे साथ पढ़ने वाले अनिल की मासूमियत न जाने क्यों उसे अच्छी लगने लगी थी. फिर उन दोनों की देर रात तक वाट्सएप पर ऑडियो, वीडियो कॉल में बात होने लगी। 
फोन पर एक दूसरे को देखे बिना वो सोते भी नही थे.

एक दिन कॉलेज में बैठकर निशा अपने मोबाइल पर कुछ देख रही थी, उसने मोबाइल पर पापा की पुरानी फोटो का वॉलपेपर लगाया था तो उसके पास बैठा अनिल कह बैठा 'निशा क्या तुम अपने पापा को बहुत याद करती हो, मैं उनकी जगह पूरी करने की कोशिश करूंगा. तुम्हारा हमेशा इतना ख्याल रखूंगा की तुम्हें उनकी याद भी न आए'.

निशा फिर से दोराहे पर खड़ी थी और आज उसे लगने लगा था कि वो अनिल के साथ गलत कर रही है। शायद अनिल के घरवाले निशा का अतीत जान उसे ठुकरा दें, निशा की आंखे भर आईं और वो अनिल से बिना कुछ बोले वापस घर आ गई।

घर जाते निशा की आंखों में आंसू थे। उसे अनिल और अपने पापा का चेहरा साथ याद आ रहा था, काश आज उसके पापा जिंदा होते तो उसकी इतनी छोटी सी जिंदगी में इतना सब कुछ न हुआ होता।

Sunday, June 12, 2022

रेत समाधि के बहाने किताबों की दुनिया में ताकाझांकी.

भारतीय लेखिका गीतांजलि श्री के उपन्यास 'रेत समाधि' का अंग्रेजी में अनुवादित उपन्यास 'टॉम्ब ऑफ सैंड' इस साल अंतरराष्ट्रीय बुकर प्राइज प्राप्त कर हिंदी साहित्य में उम्मीद जगा गया है। किसी भारतीय हिन्दी भाषा की अंग्रेजी में अनुवादित की गई किताब को बुकर पुरस्कार मिला है, यह पहली बार हुआ है और इस बहाने साहित्यिक समाज को चर्चा में आने का मौका भी मिला है।

भारतीय हमेशा से पढ़ने के शौकीन रहे हैं। उपभोक्ता आंकड़ों पर नजर रखने वाली वेबसाइट स्टेटिस्टा के अनुसार भारतीय पाठक प्रति सप्ताह औसतन नौ घण्टे किताब पढ़ते हैं, यह आंकड़े अन्य कई देशों के पाठकों से अधिक हैं।
अधिक किताब पढ़े जाने की वजह से भारतीय प्रकाशन उद्योग भी बहुत बड़ा है। ईवाई इंडिया के अनुसार भारत में प्रकाशन उद्योग साल 2024 तक 800 बिलियन के आसपास होगा और ये भारतीय फिल्म उद्योग के साल 2022 में 182 बिलियन से कहीं ज्यादा है।

सबसे अधिक पढ़ी जाती हिंदी

भारत में हिंदी प्रकाशकों की संख्या जानना चाहें तो pustak.org वेबसाइट में लगभग 500 प्रकाशकों की लिस्ट है।
यह तो तय है कि पिछले कुछ सालों से हिंदी किताबों का बाजार बढ़ा है, अमेजन पर साल 2015 के अक्टूबर में लगभग तीस हजार हिंदी किताबें उपलब्ध थी और आज यह संख्या पचास हजार है। हिंदी ईबुक्स की संख्याओं की बात करें तो अमेजन पर इस समय लगभग तीस हजार ईबुक्स मौजूद हैं।
कुकुएफएम जैसी बहुत सी वेबसाइटें इस समय हिंदी ऑडियोबुक का ऑप्शन भी दे रही हैं, इनमें भी लगभग एक हजार किताबें ऑडियोबुक के रुप में उपलब्ध हैं।

भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) द्वारा मार्च 2020 में भारत के मीडिया और मनोरंजन सेक्टर पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हिंदी मैगजीन और अखबार अन्य भाषाओं से अधिक पढ़े जाते हैं।
              फोटो क्रेडिट- फिक्की

किताबों को लेकर भारतीयों के रुख का पश्चिम बंगाल की राजधानी में इस साल फरवरी-मार्च में आयोजित हुए 45वें अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेले से पहचाना जा सकता है,जहां पर रोजाना औसतन एक लाख लोग आए।

रेत समाधि के बाद उत्साह में भारतीय बुक सेलर

शैलेश की 'द बुक शॉप' नाम से दिल्ली के मुखर्जीनगर पोस्ट ऑफिस के पास पंद्रह सालों से किताबों की दुकान है, वह कहते हैं रेत समाधि के बाद लोगों को लगने लगा है कि हिंदी किताबों को दुनिया में पहचान मिल रही है। मेरी शॉप की भी दस प्रतिशत बिक्री बढ़ी हैं। मुझे लगता है कि इस किताब के बाद हिंदी किताबों की स्थिति में सुधार आएगा।

1965 से पटना विश्वविद्यालय के सामने अनुपम प्रकाशन नाम से किताबों की दुकान चलाने वाले गौरव अरोड़ा कहते हैं बुकर मिलने के बाद रेत समाधि बहुत बिकी पर अब धीरे-धीरे उसकी बिक्री कम होने लगी है। बाकी बहुत सी किताबों को लेकर लोगों में उत्साह बना हुआ है।

साल 1986 से चल रहे 'अल्मोड़ा किताब घर' के जयमित्र सिंह बिष्ट कहते हैं कि रेत समाधि को बुकर मिलने के बाद शॉप में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है, लोगों में सभी किताबों को लेकर रुझान बढ़ा है।

प्रकाशकों की गहरी बातें

काव्यांश प्रकाशन के प्रबोध उनियाल बताते हैं, यह तो तय है कि विश्व भर में हिंदी के पाठक अंग्रेजी के पाठकों से ज्यादा नहीं है या यह कह लें कि वह उस तरह से दिखते नहीं हैं। प्रकाशक पर भी निर्भर करता है कि वह किस लेखक को छाप रहा है, उनका लेखक के प्रचार को लेकर एक बड़ा नेटवर्क रहता है और इसका लाभ लेखक को भी मिलता है।
किताबों की बिक्री व किताब का लोकप्रिय होना, दोनों अलग बातें हैं। अंग्रेजी के प्रकाशकों का प्रचार तंत्र भी पूरी आभा के साथ रहता है लेकिन इधर हिंदी के प्रकाशकों में ये कमी दिखती है।
रेत समाधि भी इसका एक उदाहरण है।

हाल ही में 'बब्बन कार्बोनेट' और 'गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल' जैसी लोकप्रिय किताबें प्रकाशित करने वाले नवारुण प्रकाशन के संजय जोशी कहते हैं कि फ्लिपकार्ट ,अमेजन जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म वजह से प्रकाशक और पाठकों के लिए सुविधा हुई है। जब एक बड़ा नेटवर्क आपकी किताब का प्रचार करता है तो उसका फायदा तो मिलता ही है। इसका एक फायदा यह भी हुआ कि प्रकाशक वितरकों के चंगुल से मुक्त हुए हैं क्योंकि ऑनलाइन माध्यमों का हिसाब किताब पक्का रहता है।
हिंदी किताबों की नई रीडरशिप उभरी है ,जैसे हमारे प्रकाशन ने 'मैं एक कारसेवक था' किताब छापी और उसका तीन साल के अंदर चौथा संस्करण आने वाला है। उसकी डिमांड बनी हुई है यह किताब अंग्रेजी, तमिल, मलयालम ,मराठी में भी छपी। जो प्रकाशक नए विषयों को नए पाठकों तक पहुंचा रहे हैं वह पीछे नहीं है।

रॉयल्टी के सवाल पर संजय कहते हैं रॉयल्टी प्रकाशक और लेखक की प्रतिष्ठा का हिस्सा है। अगर प्रकाशक ने किसी पांडुलिपि को स्वीकृत किया है तो उसको इतना विश्वास होना चाहिए कि इसकी प्रतियां बिकेंगी। समय से
रॉयल्टी मिलने पर लेखक भी खुश होंगे ही।

रेत समाधि को बुकर मिलने के बाद हिंदी की अच्छी किताबों की खोज होगी, साथ ही दूसरी भाषा में पढ़ने वाले भी हिंदी किताब ढूंढेंगे। निश्चित तौर पर हिंदी का प्रकाशन मजबूत हुआ है और उसका आत्मविश्वास बढ़ा है।

क्या कहते हैं लेखक

 बॉलीवुड अभिनेता मनोज बाजपेयी की आजकल चर्चित होती जीवनी 'मनोज बाजपेयी: कुछ पाने की जिद' किताब लिखने वाले पीयूष पांडे कहते हैं
रेत समाधि को बुकर पुरस्कार मिलना हिन्दी समाज के लिए गर्व की बात है और मुझे लगता है कि इस अवॉर्ड से विदेशों में हिन्दी का विस्तार होगा। हिन्दी भाषा के उपन्यासों में कुछ लोगों की दिलचस्पी बढ़ेगी।

लेकिन, देश में हिन्दी पाठक अचानक बुकर पुरस्कार की वजह से हिन्दी लेखकों को गंभीरता से लेंगे या हिन्दी किताबों को खरीदकर पढ़ने में दिलचस्पी दिखाएंगे, इसमें मुझे शक है। क्योंकि, अधिकांश पाठकों और मीडिया के लिए हिन्दी साहित्य हाशिए पर है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को हिन्दी साहित्य और साहित्यकारों में टीआरपी नहीं दिखती। यही वजह है कि मन्नू भंडारी के निधन पर उनकी खबर टीवी चैनलों पर नहीं दिखती और रेत समाधि को बुकर एक हेडलाइन में सिमट जाता है।
हिन्दी पाठक भी सिर्फ उन्हीं किताबों को पढ़ना चाहते हैं, जिनकी चर्चा हो जाती है पर इस मोर्चे पर सभी किताबों को सफलता नही मिल पाती।
इसके अलावा, अंग्रेजी के लेखक अपने आप मे जिस तरह के ब्रांड बने हैं, हिन्दी में वैसा नही है। यही वजह है कि हिन्दी के ज्यादातर लेखक पार्ट टाइम लेखन करते हैं, जबकि अंग्रेजी में फुलटाइम लेखक भी हैं। 

 रेत समाधि का एक लाभ ये अवश्य मिलेगा कि कुछ हिन्दी उपन्यासों और पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद होगा। रेत समाधि जिस तरह लिखी गई है, उसमें बुकर का लाभ ये भी हो सकता है कि प्रकाशक अलग तरह से लिखी पुस्तकों को प्रकाशित करने में हिचकेंगे नहीं।

  'ये मन बंजारा रे' किताब की लेखिका गीता गैरोला कहती हैं रेत समाधि के बाद हिन्दी के लेखकों में हलचल तो है। हिंदी किताबों का अनुवाद करने वाला कोई बेहतर विदेशी साहित्यकार हो तो किताबों को बुकर मिल सकता है। अनुवाद होने बहुत जरूरी है उनसे ही साहित्य का आदान प्रदान होता है।  महिला लेखिका पहले सिर्फ महिलाओं की समस्याओं पर लिखती थी, पर अब वह हर विषय पर लिखने लगी हैं।

हिंदी साहित्य के विकास पर अड़ंगा

युवा किताबों से दूर और सोशल मीडिया, गेम्स के पास आ रहा है।
लोग सोशल मीडिया पर कहते हैं कि हम किताब खरीदेंगे पर लेते नही, साथ ही हिंदी भाषा अपने ही देश में उपेक्षा का शिकार है।
एक हिंदी किताब के अनुवाद को बुकर मिल गया पर उसी हिंदी किताब को देश के प्रतिष्ठित पुरस्कार क्यों नही मिले, यह बड़ा सवाल है।

अखबारों ने पुस्तक समीक्षाओं को ज्यादा जगह देना बंद कर दिया है और वह अपनी पसंद की विचारधारा वाली किताबों या विशेष नामों को ही बढ़ावा देते हैं।

हिंदी के लेखकों के लिए माहौल ऐसा बना दिया गया है कि उनके द्वारा अपने लिखे के पैसे मांगना, उनका लालची होना माना जाता है।

किताबों को बढ़ावा देने के लिए जगह-जगह में ऐसे मंच तैयार करने होंगे जहां किताबों पर चर्चा हो और उनके प्रचार प्रसार की योजना बनाई जाए।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may


Saturday, June 11, 2022

मोबाइल टॉवर

खड़ा हूं, निशब्द
तना हुआ,
खुद में हज़ारों की कानाफूसी लिए

पूरे शहर को ताड़ता
दिन भर
दौड़ते भागते, जूझते और खुद को झकझोरते

खड़ा हूं, निशब्द
कटते पेड़, बढ़ते घर
छांव की तलाश में 
घूमते बूढ़े

उजड़ते घोसलें
तड़पती गौरेया,
एक रेशमी गद्दे के लिए
देखता हूं
इंसान को खुद को मारते

खड़ा हूं निशब्द
रेत ही रेत
एक पिरामिड की तरह
सालों से इंसान को खोजते.

हिमांशु जोशी.

Friday, June 10, 2022

काश कि मैं लिख पाता..

काश कि मैं लिख पाता
कौन हो तुम मेरे लिए

उस हरे भरे मैदान में
तुम्हारे करीब था, तब ही कह लेता.
तुम ही स्वप्न हो, तुम ही वर्तमान
तुम ही मेरे दिल में हो, तुम ही जीवन.

काश कि मैं लिख पाता
कौन हो तुम मेरे लिए

उस दिन जब तुम दूर जाने लगे थे,
काश रोक लेता तुम्हें
कर लेता हिम्मत दुनिया से लड़ने की
पर सोचा नही था के चली ही जाओगी तुम

काश कि मैं लिख पाता
कौन हो तुम मेरे लिए

आज भी तुम याद करती हो
क्या सच में मुझे प्यार करती हो!
गोद में जब उसे अपनी खिलाती हो,
चेहरा मैं कभी तुमसे मिला लेता हूं, कभी-कभी अकेले आंसू भी बहा लेता हूं।

काश कि मैं लिख पाता
कौन हो तुम मेरे लिए

बस इंतज़ार है,
इस पार, जीवन के आखिरी छोर में भी
वही विश्वास जो कहता है
तुम सब कुछ हो मेरे लिए..


मेरी जन्मभूमि धुंआ धुंआ न होती.

मेरी जन्मभूमि धुंआ धुंआ न होती.

खाने को रोटी होती
भूखे बच्चों की मां न रोती
उनकी मदिरा से कमाई न होती
आज मेरी जन्मभूमि धुंआ धुंआ न होती.

कम न रहने की ये जगह लगती
इंसान की लालच पर लगाम होती
पेड़ काट-काट कर, सूखी न ये जमीन होती
आज मेरी जन्मभूमि धुंआ धुंआ न होती.

हाथों में पत्थर की जगह क़लम होती 
धर्म की नली सर में न फंसी होती
सब की मुहब्बत भरी जुबां होती
आज मेरी जन्मभूमि धुंआ धुंआ न होती.

सत्ता की न ये मस्ती होती
जो गिर जाए न वो हस्ती होती
जमाने भर में न थू थू होती
आज मेरी जन्मभूमि धुंआ धुंआ न होती.

हिमांशु जोशी.

रेत समाधि के साथ आजकल की वो दस हिंदी किताबें जो पढ़ी जानी चाहिए.

गीतांजलि श्री की किताब रेत समाधि को बुकर मिला तो हिंदी साहित्य विश्व भर में एक बार फिर से चर्चा का केंद्र बन गया. 
सात समंदर पार रहने वाली अमेरिकी अनुवादक डेसी रॉकवेल ने हिंदी साहित्य की एक किताब को चुन उसका अनुवाद करने की ठानी और उसे पुरस्कार दिला दिया.

रेत समाधि के साथ ही हिंदी में ऐसी बहुत सी किताबें उपलब्ध हैं, जिन्हें हिंदी पट्टी के पाठकों को जरूर पढ़ना चाहिए. वैसे भी एक कहावत है 'हम जैसे लोगों से मिलते हैं और जैसा साहित्य पढ़ते हैं, यही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करता है'. जीवन में एक दृष्टि बनाने के लिए किताबों का पढ़ा जाना बड़ा आवश्यक है.आज हम बात करेंगे आजकल आई ऐसी दस किताबों के बारे में, जो नई पीढ़ी के लेखकों और पाठकों को जरूर पढ़नी चाहिए.

दसवें नम्बर पर शिरीष खरे की लिखी किताब 'एक देश बारह दुनिया' को जगह मिलती है.

 यह किताब राजपाल सन्स प्रकाशन द्वारा साल 2021 में प्रकाशित की गई थी. अमेजन पर इसकी रेटिंग 5/4.7 और मूल्य 203 रुपए है.


'एक देश बारह दुनिया' हाशिए पर छूटे भारत की तस्वीर है, यह पुस्तक अपने आप में ग्राउंड जीरो पत्रकारिता का उत्कृष्ट उदाहरण है. एक नजर में पुस्तक की खूबियां देखें तो इसमें परदे के पीछे बसे भारत का बेहतरीन विवरण प्रस्तुत किया गया है. अक्सर जो परदे के पीछे होते हैं, उन तक न तो दर्शकों की पहुंच होती है और न ही एसी रुम में बैठे पत्रकार उनके विषय में बात करते हैं.

विकास से वंचित देश के कई समुदायों के किस्से शिरीष इस किताब के जरिए सबके सामने लाए हैं. यह पुस्तक कुल बारह दस्तावेजों पर आधारित है. लेखक द्वारा किया गया नौ वर्षों से अधिक का शोध, भटकाव और इन सब से उनके व्यथित मन की व्याकुलता को इस किताब में खूबसूरती से समेटा गया है.


नवें नम्बर पर पाठकों के लिए इस लिस्ट की किताब है विनोद कापड़ी द्वारा कोरोना काल के दौरान लिखी '1232 कि.मी. कोरोना काल में एक असंभव सफर'
 
 यह किताब सार्थक प्रकाशन द्वारा साल 2021 में प्रकाशित की गई थी. अमेजन पर इसकी रेटिंग 5/4.6 बनी हुई है और मूल्य 199 रुपए है.


गुलज़ार साहब की कुछ चंद लाइनों से शुरू हुई ये किताब आपको इन लाइनों से ही किताब का सार समझा देती है. 
भूमिका में लेखक ने सीधे पाठकों से मुख़ातिब हो लॉकडाउन की कुछ ऐसी कहानियां बताई हैं जिनसे आप विचलित हो उठेंगे. यहां लेखक इस कहानी को लिखने के दौरान बनाए गए खुद के नियमों पर बात करते यह भी कहता है कि इस यात्रा को पढ़ने के बाद ‘मज़दूर’ शब्द के प्रति पाठकों का नज़रिया बदल जाएगा.
‘अशरफ’ साइकिल वाले का किस्सा हिन्दू-मुस्लिम जपने वालों को लाख बार पढ़ना चाहिए. ‘सब दिन होत न एक समान’ में लेखक इस यात्रा में अपनी बदलती भूमिका पर बात करता है जो आपको भी लेखक के साथ इस यात्रा के बहाव में बहाते लेकर चली जाती है.

आठवें नम्बर पर आती है हाल ही में बुकर प्राप्त 
गीतांजलि श्री की 'रेत समाधि'

 यह किताब राजकमल प्रकाशन ने साल 2022 में प्रकाशित की और अमेजन पर इसकी रेटिंग 5/4 है और मूल्य मात्र 295 रुपए है.

 गीतांजलि श्री का लेखन अद्भुत है और इस किताब में शिल्प के साथ अनूठा प्रयोग देखने को मिला है. ध्वनि की ऐसी शब्दों में अभिव्यक्ति अभी तक नहीं देखी गई है. इस किताब में अलग तरह के बिम्ब प्रयोग किए गए हैं और घटनाओं की वाक्यों में बुनावट बिल्कुल नायाब है. एक घटना दूसरे के लिए मार्ग प्रशस्त करते जाती है, गद्य और पद्य के बीच की सीमा रेखा अक्सर धूमिल होती प्रतीत होती है.

 सातवें नम्बर पर इस लिस्ट में पत्रकार रवीश कुमार की लिखी 'बोलना ही है' शामिल है. यह किताब राजकमल प्रकाशन द्वारा साल 2019 में प्रकाशित की गई थी. अमेजन पर इसकी रेटिंग 5/4.7 और मूल्य 250 रुपए है.


इस किताब की भूमिका ही आपको हिलाने के लिए काफी है, जिसमें रवीश लिखते हैं साम्प्रदायिक बातें अब राष्ट्रवादी बताई जाने लगी हैं.
आईटी सेल की मदद से वाट्सएप यूनिवर्सिटी का जनता के बीच प्रभाव कितना बढ़ गया है, किताब में इसका उदाहरण वह अपने ही ढंग से देते हैं. 

छठवें नम्बर पर आती है युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय हो रहे लेखक अशोक पाण्डे की 'लपूझन्ना'
हिंद युग्म प्रकाशन ने इस किताब को साल 2022 में प्रकाशित किया और किताब छपते ही लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया. अमेजन पर इसकी रेटिंग 5/4.7 और मूल्य 199 रुपए है.

यह एक उस्ताद के लिए उसके शागिर्द की तरफ से लिखी खूबसूरत कहानी है. लेखक अपने बचपन की याद अब तक नहीं भुला सके हैं और उन यादों में लेखक का खास दोस्त भी है, ये वो खास दोस्त है जो हम सब की जिंदगी में कभी न कभी तो रहा ही है और उसको हम हमेशा याद करते हैं.
लपूझन्ना हमारी अपनी ही कहानी है, इसमें लपूझन्ना हम ही हैं जिसके लिए ये दुनिया बहुत छोटी है इतनी छोटी कि हम अपने दोस्तों के साथ धमाचौकड़ी मचाते इसे पूरा नाप लेना चाहते हैं.

पांचवें नम्बर पर हम अपने पाठकों को मनोज बाजपेयी की जीवनी 'मनोज बाजपेयी: कुछ पाने की जिद' पढ़ने के लिए कहेंगे, जिसे लिखा है बहुत ही होनहार पत्रकार पीयूष पांडे ने.
यह किताब पेंगुइन प्रकाशन की तरफ से साल 2022 में प्रकाशित हुई. अमेजन पर इसकी रेटिंग 5/4.7 और मूल्य 269 रुपए है.

 पीयूष पांडे की लिखी यह किताब आपको बिहार के चंपारण जिले से निकले मनोज बाजपेयी के दिल्ली के नाटकों से होते हुए मुंबई के फिल्मी जगत तक पहुंचने की पूरी कहानी बताती है. विभिन्न समाचार पोर्टलों, मनोज बाजपेयी के ब्लॉग, यूट्यूब, लेखक द्वारा मनोज के परिचितों से साक्षात्कार, विभिन्न मैगज़ीनों की सहायता से लेखक ने बड़ी मेहनत से इस किताब को लिखा है और सबसे अच्छी बात यह है कि वह स्त्रोतों को संदर्भित भी करते गए हैं.

चौथे नम्बर पर एक ऐसी किताब है जिसे पढ़ने के बाद आपको भारतीय राजनीति के खेल समझ में आने लगेंगे. यह किताब है 'सत्ता की सूली' और इसे महेंद्र मिश्र, प्रदीप सिंह और उपेंद्र चौधरी द्वारा लिखा गया है.
 इस किताब का प्रकाशन शब्दलोक प्रकाशन द्वारा साल 2019 में किया गया था. अमेजन पर इसकी रेटिंग 5/4.9 और मूल्य 275 रुपए है.


किताब की शुरुआत में प्रशांत भूषण के लिखे आमुख में वह कहते हैं कि पुस्तक – सत्ता की सूली देश के हालातों पर जो चर्चा करती है उसे जानने के लिए सब लोगों को किताब ध्यान से पढ़नी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ एडवोकेट इंदिरा जयसिंह से ‘कानूनविद की नजर’ लिखाया गया है. इसके बाद लेखकीय में महेंद्र मिश्र किताब को लिखने का मकसद बताते हुए कहते हैं कि इसका मकसद लोया मामला और उससे जुड़ी पूरी गुत्थी को सामने लाना है.

तीसरे नम्बर पर इस लिस्ट में जो किताब है वह भारतीय शिक्षा पर गम्भीर विचार पैदा करवाती है. 'आरएसएस, स्कूली पाठ्यपुस्तकें और महात्मा गांधी की हत्या',   आदित्य मुखर्जी, मृदुला मुखर्जी और सुचेता महाजन द्वारा लिखी गई हैं.

इस किताब को सेज प्रकाशन द्वारा साल 2018 में प्रकाशित किया गया था. अमेजन पर इसकी रेटिंग 5/3.7 और मूल्य 180 रुपए है.


किताब में ‘मुसलमान विरोधी पूर्वाग्रह’ और ‘कांग्रेस विरोधी और गांधी विरोधी रवैया’ शीर्षकों से आजादी के पहले से ही मुसलमानों को लेकर बनाई गई क्रूर छवि पर प्रकाश डाला गया है, इसमें यह भी लिखा है कि अपने धर्म के लोग जो साम्प्रदायिक नही हैं और उदारवादी हैं, वे भी दूसरे धर्म के लोगों की तरह ही साम्प्रदायिक शक्तियों के दुश्मन बन जाते हैं और कभी-कभी उनसे भी ज्यादा. यही कारण है कि हिन्दू साम्प्रदायिक शक्तियों के अंदर कांग्रेस और गांधी के खिलाफ ज़हर भरा है.

किताब के अंतिम हिस्से में पता चलता है कि हिन्दू साम्प्रदायिक विचारक भौगोलिक आधार पर बने राष्ट्रवाद की अवधारणा की कमजोरियां गिनाते हैं और कहते हैं कि यूरोप में यह असफल हो चुका है.

किताब के अंत तक पहुंचते-पहुंचते आप खुद को किताब लिखे जाने का उद्देश्य पूरा कर सकने की स्थिति में पा सकते हैं. इसे पढ़कर सालों से एक ही विचारधारा से जुड़े लोग भी अपने समाज और राजनीतिक माहौल को समझते हुए स्वयं में एक आलोचनात्मक चिंतन कर सकते हैं, क्योंकि वह जनता ही है जिसे यह फैसला लेना है कि वह आज के भारत को किस स्थिति में कल की पीढ़ी को सौंपेगी. यह किताब आज के दौर में पढ़ने के लिए बड़ी महत्वपूर्ण है.

दूसरे और पहले नम्बर पर पाठकों के लिए महत्वपूर्ण इस लिस्ट में लेखक अशोक कुमार पांडेय की किताबें ही छाई हुई हैं.
'उसने गांधी क्यों मारा' दूसरे नम्बर पर है, यह किताब राजकमल प्रकाशन से साल 2020 में प्रकाशित हुई थी.
अमेजन पर इसकी रेटिंग 5/4.6 और मूल्य 248 रुपए है.


ऐसे समय में जबकि समाज का एक तबका गांधी की हत्या को सही ठहराने की भौंडी और वीभत्स कोशिश कर रहा है, उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त करार देने की कोशिशें की जा रही हैं. तब एक बार फिर गांधी की हत्या पर नये सिरे से पड़ताल की ज़रूरत थी। अब यह किताब ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ की शक्ल में सामने आयी है.
किताब की यह बात काबिले गौर है कि हर काल में नफरत की विचारधारा सभी धर्मों के अनेक उत्साही और आदर्शवादी युवाओं को हत्यारों में बदल देती है. ऐसे में इतिहास की इस विवेचना से वर्तमान परिदृश्य को समझने में मदद मिलती है और यह किताब पढ़नी जरूरी हो जाती है.

पहले नम्बर पर जगह बनाई हुई किताब 'कश्मीरनामा',  राजपाल एंड संस् प्रकाशन से छपकर 2018 में आई थी. इस किताब की अमेजन पर रेटिंग 5/4.4 और मूल्य- 410 रुपए है.


 कश्मीर पर कई किताबें लिखी गई क्योंकि कश्मीर हमेशा ही हिंदुस्तान में एक रहस्य की तरह देखा गया है. एक आम हिंदुस्तानी को सिर्फ उतना ही पता चलता है जितना उसे अखबार, रेडियो और टीवी से दिखाया और सुनाया जाता है. ये किताब कश्मीर के इतिहास और उसके प्रभावों का वर्तमान पर चिंतन है, इसमें तथ्यों और लोगों की असल बातचीत की मदद ली गई है.
कश्मीर पर जारी प्रोपेगैंडा से अलग सच्चाई जानने के लिए इस किताब को पढ़ा जाना आवश्यक है.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Tuesday, June 7, 2022

पीरियड लीव : 'एमपी ब्रेकिंग न्यूज' में स्टॉप बनने की हुई शुरुआत।

साल 2018 में श्वेता रानी भारद्वाज एक रिसर्च एसोसिएट कम कंटेंट क्रिएटर के तौर पर हाइटेक सिटी, हैदराबाद में जॉब कर रही थी। महावारी शुरू होने पर उन्होंने मेल भेज कर अवकाश मांगा तो श्वेता को मेल की भाषा में महावारी का जिक्र न करने के लिए कहा गया था, इस पर श्वेता ने कम्पनी को महिलाओं के उन दिनों की गम्भीरता से अवगत कराया।
  श्वेता को पीरियड लीव के लिए आवाज उठाने का नतीजा अपनी नौकरी छूटने के रूप में मिला।

 लैंगिक समानता की बात बोलते हुए तो अच्छी लगती है पर सच यह है कि वास्तव में अभी ये समानता दूर की कौड़ी है। महावारी के दौरान होने वाली परेशानियों को किसी से साझा न कर पाने की वजह से महिलाएं आज भी उन दिनों में घुट कर जीती हैं।
तेजी से भागते जमाने में अब उन दिनों के बीच महिलाओं को अच्छा माहौल देने के लिए विश्व के अन्य देशों के साथ-साथ भारत में भी आवाजें उठ रही हैं।
लोकसभा में महिलाओं के महावारी वाले दिनों में  अवकाश दिलाने के लिए 'The Menstruation Benefit Bill 2017' पेश हुआ था पर बात बनी नही।

सरकार नए श्रम कानून में जहां काम के घण्टों की संख्या 8-9 से बढ़ाकर 12 घंटे करने की सोच रही है ,वहीं ऐसे हालातों में भी मध्य प्रदेश के न्यूज पोर्टल 'एमपी ब्रेकिंग न्यूज' ने अपने यहां कार्यरत महिला कर्मचारियों को महीने में 2 दिन की पीरियड लीव देने का निर्णय लिया है।
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एमपी ब्रेकिंग न्यूज के सम्पादक गौरव शर्मा कहते हैं कि महिलाओं के पीरियड्स या महावारी में कोई ऐसी बात नही है जो छुपानी वाली हो। संस्था में इस अवकाश को लागू कराने के लिए हमारे न्यूज पोर्टल के मुख्य सम्पादक वीरेंद्र कुमार शर्मा, सीईओ श्रुति कुशवाहा और मेरे बीच मात्र पांच मिनट का डिस्कशन हुआ जिसके बाद हमने इसे लागू कर दिया।
आज के दौर में कोई भी व्यक्ति ऐसा नही होगा जो महिलाओं की इन दो-तीन दिन होने वाली असहनीय तकलीफ को नही देखता।
 इसी महीने से हमने इस अवकाश को शुरू कर दिया है और हम उम्मीद करते हैं कि ये और जगह भी लागू हो।


पोर्टल की सीईओ श्रुति कुशवाहा इस बारे में कहती हैं कि दुनियाभर में पीरियड लीव को लेकर मुहिम छिड़ी हुई है। लेकिन हम तो अब भी उसी मानसिकता से संघर्ष कर रहे हैं जहां अक्सर ये माना जाता है कि महिलाओं को नौकरी पर रखो तो वो कभी मैटरनिटी लीव पर चली जाएंगी, कभी चाइल्ड केयर लीव पर। इसे लेकर कितने जोक्स क्रेक किये जाते हैं, मज़ाक बनाया जाता है, बेहूदा कमेंट किये जाते हैं। ऐसे में पीरियड लीव की बात पर संवेदनशीलता की उम्मीद करना बेमानी ही लगता है।

                      श्रुति कुशवाहा

लेकिन आज मेरे लिए इस मामले में एक कदम आगे बढ़ना संभव हुआ है। मैं जिस संस्थान MP Breaking News में कार्यरत हूं, वहां फीमेल स्टाफ को महीने में 2 दिन की पीरियड लीव दिए जाने का निर्णय लिया गया है। संभवतः किसी मीडिया संस्थान में ये नियम लागू करने वाले हम पहले हैं। इस निर्णय में मैं भी सहभागी हूं और मेरे लिए निज खुशी भी है क्योंकि ये भी कई संघर्षों में से एक रहा है।
खास बात ये कि हमारे संस्थान में 'वर्क फ्रॉम होम' व्यवस्था लागू है और कुछ महिला सदस्य तो ऐसी हैं जिनसे मैनेजमेंट कभी आमने सामने मिला ही नहीं। केवल फोनो/ऑनलाइन इंटरव्यू हुआ और उन्होने घर से काम शुरू कर दिया।
 उम्मीद है कि इस मुद्दे पर जागरूकता बढ़ेगी तथा अधिक से अधिक कार्यस्थलों पर पीरियड लीव का नियम लागू किया जाएगा।

श्रुति कुशवाहा आगे कहती हैं कि उन्हें 'वजूद औरत का’
किताब का 'अगर पुरूष को मासिक धर्म होता' निबंध पढ़कर पूरे देशभर में महिलाओं के लिए यह पीरियड लीव शुरू करवाने की इच्छा होती है । इस किताब में ग्लोरिया स्टायनेम और एक्टिविस्ट रुचिरा गुप्ता ने साथ मिलकर ग्लोरिया के कुछ अभूतपूर्व निबन्‍धों को प्रस्तुत किया है और इस किताब का हिंदी अनुवाद भावना मिश्रा द्वारा किया गया है। 'अगर पुरुष को मासिक धर्म होता' निबंध का एक अंश इस प्रकार है।

निबंध अंश
अगर किसी जादू से अचानक पुरुषों में मासिक धर्म शुरू हो जाए और स्त्रियों में बंद हो जाए ,तो सोचो भला क्या होगा?
जाहिर है कि, मासिक धर्म एक ईर्ष्या योग्य, गौरव करने लायक और पुरुषोचित घटना हो जाएगी।
पुरुष इस बारे में शेखी बघारेंगे कि उन्हें कितने दिनों तक और कितना रक्तस्त्राव हुआ।
नौजवान लड़के ईर्ष्या योग्य मर्दानगी की शुरुआत के दिनों में इस पर चर्चा करेंगे।
तोहफे, धार्मिक संस्कार, पारिवारिक रात्रिभोज और कुँवारे लड़कों की अश्लील पार्टी का आयोजन करके इसके होने के दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाएगा।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Sunday, June 5, 2022

आखिर

देश की 'महारत्न कम्पनी' एनटीपीसी लिमिटेड के कहलगाँव सुपर थर्मल पावर स्टेशन के शिलान्यास के चार दशक और उत्पादन शुरू होने के तीन दशक बाद भी वहाँ की जनता को राख फाँकने के अलावा एनटीपीसी से कुछ नहीं मिल रहा है.

प्रबन्धन ने वहाँ  ‘पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास योजना’ (आर एंड आर) और कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत कार्यों को अनदेखा कर दिया है. जिसके खिलाफ वहाँ की जनता ने एक बार फिर से आन्दोलन का रुख अख्तियार कर लिया है. एसएसवी कॉलेज, कहलगांव के सेवानिवृत प्रोफेसर और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. पवन कुमार सिंह की अगुवाई में 'नागरिक संघर्ष मोर्चा' के बैनर तले कई प्रभावित क्षेत्रों में जागरुकता बैठकों का दौर जारी है क्योंकि जोरदार निर्णायक आन्दोलन के बिना प्रबन्धन की नींद खुलने वाली नहीं है.

बिजलीघर स्थापित किए जाने से पहले राजनेताओं, अधिकारियों और प्रबंधन के प्रतिनिधियों के द्वारा वादे किए गए थे कि बिजलीघर लगने के बाद क्षेत्र की तस्वीर बदल जाएगी. सभी विस्थापितों को अच्छे तरीके से पुनर्वासित किया जाएगा और युवाओं को बड़ी तादाद में रोजगार मिलेगा. उपभोक्ताओं को आश्वासन मिला था कि 24 घंटे निर्बाध बिजली-पानी दी जाएगी.
बच्चों की पढ़ाई के लिए फ्री स्कूल होंगे, क्षेत्रवासियों के लिए फ्री में इलाज की सुविधा होगी. रोजगार के तरह-तरह के अवसर उपलब्ध होंगे. नये उद्योगों की स्थापना की जाएगी. सड़क मार्ग और रेलमार्ग का विकास होगा आदि-आदि. कई तरह के वादे किए गए लेकिन वादों का क्या? अंतत: आफत तो जनता पर ही आई.

बिजली संयंत्र की स्थापना का प्रस्ताव 1980 में लाया गया. मई 1983 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने कहलगाँव ताप विद्युत परियोजना का शिलान्यास किया. इस बीच कई दुर्घटनाएं भी हुई, एक बार तो फरनेस्ट ब्लास्ट हुआ जिसमें तकरीबन 50 लोगों की जानें भी गयीं. अंतत: 1992 में बिजली उत्पादन की शुरुआत हुई, पहले चरण में तत्कालीन सोवियत संघ के सहयोग से 840 मेगावाट के बिजलीघर की स्थापना का जिम्मा एनटीपीसी लिमिटेड को दिया गया. पहले चरण के सफल परिचालन के बाद पुनः दूसरे चरण में 1500 मेगावाट बिजली का उत्पादन 2007 में आरम्भ हुआ. 7907.35 करोड़ की लागत से बने इस बिजलीघर के लिए कुल 3353 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया था.

 बिजली संयंत्र की स्थापना के समय जो प्रमुख वादा था, वह ये था कि जिनकी जमीनें संयंत्र में ली जा रही है, उन भू-मालिकों के परिवार में एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी. लेकिन ये वादा झुनझुना हो गया. 10 फीसदी से भी कम परिवारों को नौकरी मिली।₹, 90 फीसदी धूल फांकते रह गए. अब इन 10 फीसदी परिवारों में भी सभी वहाँ के ग्रामीण नहीं थे. जैसे ही जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई तो यहाँ एक प्रकार का गोरखधंधा शुरू हो गया. बहुत सारे बाहरी लोग इस इलाके में जमीन खरीद कर अपने नाम से म्यूटेशन करवा कर नकली भू-विस्थापित बन गए. बिहार सरकार के इंप्लॉयमेंट एक्सचेंज के अधिकारी, बीडीओ, सीओ और एनटीपीसी के लोग मिलजुल कर यहाँ घोटाला कर गए. जो वास्तव में नौकरी के हकदार थे, उन्हें नौकरी न देकर, बाहरी लोगों (जो आकर भू-विस्थापित बने थे) को नौकरी दे दी गयी. जिन्हें रोजगार मिलना चाहिए था, वे वंचित रह गए, कई गाँव लाभ से वंचित रह गए.
अधिकांश कामगार और कुछ पर्यवेक्षक मिलाकर लगभग ढाई सौ लोगों को ही यहाँ नियोजन मिल पाया. इसके बाद भी जिन डेढ़ सौ असली भू-विस्थापितों को कम्पनी में नौकरी मिली, उनके परिवार को साहस तो मिला लेकिन उनमें से बहुत कम ही अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ नाता रख पाये. भू-विस्थापित तो पूरा परिवार हुआ लेकिन नौकरी किसी एक सदस्य को मिली. अब नौकरी पाने वाले का दायित्व पूरे परिवार के लिए बनता था लेकिन अधिकांश ने अपने अन्य परिवारों को भगवान भरोसे छोड़ कर कॉलोनी में बस गए.

स्थापना काल में ‘पुनर्वास एवं पुनःस्थापन’ योजना के तहत प्रभावित क्षेत्रों में सड़कों और सामुदायिक भवनों का निर्माण किया गया। उत्पादन शुरू होने के बाद कल्याण कार्यों के लिए ‘नैगम सामाजिक दायित्व योजना’ की शुरुआत की गई। एनटीपीसी कर्मियों के बच्चों की शिक्षा के लिए आवासीय परिसर में केन्द्रीय विद्यालय सहित चार पब्लिक स्कूल की स्थापना की गई, जिसका लाभ स्थानीय बच्चों को भी मिला। परियोजना के आसपास कुछ नये बाजार विकसित किए गए और घरेलू जरूरतों की पूर्ति के लिए कुछ छोटे रोजगार भी पैदा हुए।
बिजलीघर बनने से कुल 62 गाँव प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए और परोक्ष रूप से तो पूरा क्षेत्र राख फाँक रहा है। संयंत्र में किसानों की अत्यंत उर्वर भूमि चली गयी, जिससे सैकड़ों किसान प्रभावित हुए। जमीन के मुआवजे की दर भी बहुत कम थी। मुआवजे की राशि व्यावसायिक प्रबन्धन के बिना कुछ ही दिनों में ख़त्म हो गयी और भूविस्थापित परिवारों के समक्ष भुखमरी का संकट उत्पन्न हो गया। कुछ युवक बिजलीघर के ठेका कार्यों के संवेदक बन गये। मेंटेनेस कार्यों में निविदा डालने में युवकों की भीड़ आने लगी इसलिए कम-से-कम दर पर निविदा डालने का काम शुरू हो गया। प्राक्कलित दर से बहुत कम दर पर संविदा कार्य करके इन नये अनुभवहीन संवेदकों ने घर से घाटा उठाया और कंगाल होते चले गये। 
बिजलीघर के साथ फरक्का सुपर थर्मल पावर स्टेशन के लिए कोयला का मुख्य लिंकेज राजमहल कोयला परियोजना के ललमटिया कोयला खदान से दिया गया था। वहीं आम जनमानस का मानना था कि ललमटिया खदान का कोयला गुणवत्ता में अत्यंत निम्न कोटि का है। इससे ताप का उत्सर्जन कम होता है और राख भी अधिक उत्सर्जित होती है। इसके साथ ही ताप की निर्धारित मात्रा हासिल करने के लिए कम्पनी को आयातित कोयले का मिश्रण करना पड़ता था। अधिक मात्रा में राख के उत्सर्जन से ऐश डाइक की भण्डारण क्षमता भी प्रभावित होने वाली थी। वहीं ऐश डाइक का पहला छोटा लैगून ट्रायल के समय ही भर गया था। अन्य लैगूनों का निर्माण कार्य चल रहा था। ऐश डाइक के लिये 1400 एकड़ जलजमाव वाली जमीन का अधिग्रहण किया गया। लेकिन इस भूमि का चुनाव सही नहीं था क्योंकि इस निर्माण से पहाड़ी नदियों के गंगा में उतरने का मार्ग ही अवरुद्ध हो गया, जिस कारण प्रभावित क्षेत्र में भयंकर पारिस्थितिक असंतुलन उत्पन्न होने की स्थिति बन गयी। 1995 और 1999 में प्रलयंकारी बाढ़ इस असंतुलन और विध्वंस के कारण ही आयी थी, जिसमें सैकड़ों लोग प्रभावित हुए थे। दर्जनों लोगों और हजारों मवेशियों की जानें गई थी। करोड़ों की फसल और सम्पत्ति का नुकसान हुआ था।
कालांतर में राख के प्रदूषण से परेशान किसानों ने एक माँग उठाई कि कम्पनी ऐश डाइक के चारों तरफ की 500 मीटर जमीन और अधिगृहीत कर ले। जबकि 100 मीटर जमीन का अधिग्रहण वृक्षारोपण के लिए था, जिससे डाइक से उड़ती राख को गाँवों तक पहुंचने से रोका जा सके। शुरुआती दिनों में कुछ पौधे लगाये गये जिसकी देख-रेख नहीं की गई। बाद में वृक्षारोपण का दुबारा कोई प्रयास नहीं किया गया। लैगूनों में रखी गई राख को हमेशा भींगा रखना चाहिए इस पर भी काम नहीं हुए और लैगून भरने के बाद इसके ऊपर मिट्टी की कोटिंग कर खर-पतवार वाली वनस्पतियों का पौधारोपण करना चाहिए, इसपर भी काम नहीं किया गया। जिससे राख के प्रदूषण की समस्या पैदा हो गई।
राख का निपटान नहीं होने के कारण एनटीपीसी को ऐश डाइक के विस्तार की जरूरत पड़ी तो 3डी लैगून बनाना तय हुआ। अपने भयानक भविष्य को आँककर ग्रामीणों ने इसका निर्माण रोक दिया। एकजुटता और आन्दोलनों के बलपर क्षेत्रवासियों ने 28 साल तक लैगून नहीं बनने दिया। कम्पनी भी यहाँ ग्रामीणों के विरोध के कारण 3डी लैगून को बना पाने में सफल नहीं हो पाई। अंततः जब सभी लैगून राख से भर गये तो प्लांट बंद करने तक की नौबत आ गई। दिल्ली से लेकर कहलगाँव तक हाहाकार मच गया और दमनचक्र चलाकर ग्रामीणों के विरोध को कुचल दिया गया। बल प्रयोग किए गए, मुकद्दमे और गिरफ्तारियों का दौर चला और अंतत: वह जानलेवा लैगून 2019 में बन गया। विडम्बना यह कि 3डी लैगून बनाने के क्रम में 70-80 टन वजनी ट्रकों से रौंदकर सरकार द्वारा बनाई गई कटोरिया व मसदाहा गाँव की सड़क को तहस-नहस कर दिया गया। वहीं नवम्बर 2020 में 3डी ऐश डाइक के टूटने से एनटीपीसी को 7 में से 4 युनिट में बिजली उत्पादन को तत्काल बंद करना पड़ा था। जिससे राख मिश्रित पानी किसानों के खेतों में चला गया और फसलों को बर्बाद दिया। किसानों का कहना है कि 3डी ऐश डाईक के निर्माण में घोर अनियमितता बरती गई है। पूरा तटबन्ध सिर्फ राख से बना दिया गया है। बालू, मिट्टी दिया ही नही गया। 
वर्तमान में क्षेत्रवासियों में कम्पनी के प्रति बहुत गुस्सा और नफरत है। ज्यादातर गाँवों में सीएसआर के तहत रत्ती भर भी पैसा खर्च नहीं किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें एनटीपीसी से राख की बारिश के सिवा कुछ नहीं मिला है। चिमनी की राख की बारिश तो होती ही है। साथ ही मानसून के अलावा पूरे साल ऐश डाइक की राख उड़कर घर-आँगन में भरी रहती है। मानव और मवेशी श्वास संबंधी बीमारियों से अस्वस्थ हो रहे हैं। विषाक्त पानी पीकर मवेशी बीमार पड़ जाते हैं। खेती-किसानी चौपट हो गयी है। साथ ही प्रत्येक घर के बरामदे और खिड़कियों में राख से बचने के लिए पॉलीथिन या त्रिपोलिन का पर्दा लगाना मजबूरी है। प्लांट के संयंत्रों की तेज आवाज से ग्रामीणों की शान्ति भंग होती है। 
ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व में मेंटेनेंस के कार्यों में स्थानीय लोगों को नियोजन मिल जाता था, किन्तु अब बाहरी एजेंसियां अपने साथ मजदूर लेकर आती हैं या अधिकारी अपने लोगों को काम दिलाते हैं। बेरोजगार बैठे युवकों में एनटीपीसी के प्रति आक्रोश है। वे सीएसआर में ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ अपना हिस्सा चाहते हैं।
इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि इस धीमे जहर के कारण आसपास के क्षेत्र में कुछ परिवार मर गए होंगे। और ऐसी संभावना भी नहीं है कि एनटीपीसी टाउनशिप इससे बिल्कुल भी प्रभावित नहीं है। लेकिन यूनिट के सदस्य होने के कारण वे शिकायत दर्ज नहीं करा सकते। वे अच्छी तरह से भुगतान और चिकित्सकीय रूप से सुसज्जित हैं और उपचारात्मक उपाय कर रहे हैं। एनटीपीसी को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए और सिस्टम की जांच करवानी चाहिए और हानिकारक कणों को अधिकतम सीमा तक खत्म करना चाहिए। इसे एनटीपीसी, राज्य और केंद्र सरकार के ऊर्जा विभाग और वैधानिक प्राधिकरण से बेहतर कौन समझ सकता है लेकिन सभी अपने कान और आंखें बंद करके सो रहे हैं।

लेखक पत्रकारिता के छात्र हैं और एक न्यूज चैनल में सहायक निर्माता हैं।
सम्पर्क- +91 8507734722, gulshanchoudhary97@gmail.com
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Thursday, June 2, 2022

'फिटनेस की डोज आधा घण्टा रोज' कंक्रीट युग में अब सेहत को अब साइकिल का ही सहारा.

3 जून 2018 में संयुक्त राष्ट्र ने साइकिल उपयोग को बढ़ावा देने के लिये पहली बार विश्व साईकिल दिवस मनाने की शुरुआत की थी। आज यह चौथी बार मनाया जा रहा है.

इस बार विश्व साइकिल दिवस ऐसे समय में आया है जब हम बॉलीवुड के मशहूर गायक कृष्णकुमार कुनाथ की असमय मृत्यु के दुख में डूबे हुए हैं. गायक के के की 53 वर्ष में हार्ट अटैक से हुई इस मृत्यु को असामान्य बताया जा रहा है पर मेरे विचार से आज के समय को देखते इस मृत्यु को असामान्य नही कहा जा सकता.

हम सबको पता है कि लोगों का खानपान और रहनसहन अब पहले जैसा नही रहा, खाने का सामान मिलावट भरा है तो युवाओं की शारीरिक गतिविधियां शून्य हो चुकी हैं. कोरोना काल के बाद से वर्क फ्रॉम होम और मोबाइल पर पढ़ाई ने लोगों को घर के अंदर ही कैद कर लिया है.

मोबाइल से लगाव और खेलने के लिए जगह की कमी की वजह से बच्चे अब गलियों में खेलते नही दिखते.
युवाओं में लिपिड लेवल बढ़ रहा है, शरीर बाहर से दिखता तो ठीक है पर हृदय बीमार हो जाता है.

28 मई को किए टेस्ट में मेरा लिपिड लेवल भी 500 से ऊपर है, जबकि सामान्यतः यह 150 पर ही होना चाहिए.
टेस्ट नही होता तो मैं इस बात से अनजान रहता और मुझे कभी भी हृदय सम्बन्धी समस्या सामने आ सकती थी.
 अब लिपिड लेवल को सामान्य लाने में मुझे एक दो महीने तक शारीरिक गतिविधियों के साथ दवाइयों पर निर्भर रहना होगा.
 मैंने तो टेस्ट करा लिया पर शायद बहुत से लोग ये नही कराते और अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठते हैं.

 लिपिड का अर्थ फैट होता है। हमारे शरीर के बाहर के पार्ट में फैट मौजूद होने के साथ खून की नली में भी फैट मौजूद होती है.
लिपिड प्रोफाइल टेस्ट के जरिए खून में मौजूद फैट की मदद से कोलेस्ट्रोल, वीएलडीएल, एलडीएल, एचडीएल, ट्राईग्लिसराइड्स और कोलेस्ट्रोल का पता लगाया जाता है। इस टेस्ट को खाली पेट करवाने की सलाह दी जाती है, ताकि रिपोर्ट में फैट की वैल्यू सही-सही मिल सके.
यदि इसकी मात्रा बढ़ जाए को खून की नली में फैट जमा होने की संभावना होती है, जिस वजह से हार्ट की नलियों में फैट जमा होने के कारण हार्ट डिजीज, हार्ट अटैक, स्ट्रोक हार्ट जैसी बीमारी होने की संभावना रहती है. इसे कंट्रोल में रखने के लिए चाहिए कि हम एक्सरसाइज करते रहें और तला भुना खाने से दूर रहें.

खेल के मैदान गायब इसलिए साइक्लिंग हो गई है जरूरी

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए एक्सरसाइज, खेलकूद जरूरी है पर नगरीकरण के इस दौर में शहरों, गांवों में कंक्रीट का जाल बिछाने पर ही जोर दिया जा रहा है. मोबाइल में कैद बच्चे, युवा या वृद्ध जन अगर कोई शारीरिक गतिविधि करना भी चाहते हैं तो इसके लिए जगह की कमी है.

अगर आप खेल के मैदान बढ़ने की उम्मीद में हैं तो ये जान लेना जरूरी है कि साल 2021 में केंद्र सरकार ने खेल बजट में 8.16% की कटौती की थी. खेलों के लिए बजटीय आवंटन 2,596.14 करोड़ रुपये था, जो पूर्व के मुकाबले 230.78 करोड़ रुपये कम है. सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में भी खेलने की जगह नही है. अखिल भारतीय स्कूल शिक्षा सर्वेक्षण के द्वारा 2016 में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार देश के 62% सरकारी स्कूलों में प्लेग्राउंड नही है.

इन सब कमियों के बाद भी आपको अपने स्वास्थ्य से समझौता नही करना चाहिए, देश में सड़कों की कमी नही है और अपना स्वास्थ्य सही रखने के लिए आप उसमें साइक्लिंग का आनन्द उठा सकते हैं.

यूरोपीय देशों में 18वीं शताब्दी के दौरान जन्म ले चुकी साईकिल का रखरखाव बहुत ही आसान है. साईकिल की चेन में समय-समय पर तेल डालते रहने, पहियों में समय से हवा भरते रहने, समय-समय पर साईकिल के नट बोल्टों को कस कर, उसके ब्रेकों का ध्यान रख, समय से साईकिल की सफाई कर उसे जंग मुक्त रख कर और पहिये का पंक्चर बनाने का ज्ञान रख साईकिल को लम्बे समय तक प्रयोग में लाया जा सकता है.

वर्ल्ड बैंक वेबसाइट के अनुसार इस समय दुनिया भर में 1 बिलियन से अधिक साइकिलें हैं और वैश्विक आबादी का 50% से अधिक हिस्सा साइकिल चलाना जानता है. वेबसाइट के अनुसार दुनिया भर में हर सेकंड चार बाइकों का उत्पादन होता है और इन्हें हर दो सेकंड में कोई न कोई खरीद ही लेता है. कोरोना के दौरान सामाजिक दूरी बनाए रखने की खूब बात हुई है, सार्वजनिक वाहनों में बेतहाशा भीड़ के इस दौर साइकिल सामाजिक दूरी बनाए रखने का सस्ता एवं सुलभ जरिया भी है.

साईकिल सवारों की सुरक्षा के लिये मुख्य सड़क से अलग लेन का निर्माण ज्यादा संख्या में सुनिश्चित किया जाए तो खेल मंत्री अनुराग ठाकुर के 'फिटनेस की डोज आधा घण्टा रोज' मंत्र को जमीनी स्तर पर पूरा किया जा सकता है.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...