जमनपुर में मिट्टी की लिपाई वाले दो कमरे ही तो अब उसके परिवार का ठिकाना थे।
पापा के फौज से रिटायर आने के बाद सुरेश मेरठ जैसे शहर से सीधे हिमालय की गोद में बसे छोटे से कस्बे जमनपुर पहुंच गया था। सुबह सुबह हिमालय की गोद से निकल हरे भरे खेतों से होती ठंडी हवा उसके मन को शांत कर देती थी, इसी शांति में सुरेश अपने भविष्य के कई सपने बुन लेता था। वो अभी सातवीं कक्षा में ही तो था लेकिन बड़े होकर घर, कार सब कुछ लेने का मन अभी से था और वो अपने मम्मी-पापा को दुनिया जहां की खुशियां दे देना चाहता था।
जमनपुर में अच्छी खासी जमीन होने से सुरेश के घर में खाने की तो कोई कमी न थी पर पापा की कम पेंशन से तब घर मुश्किल से ही चलता था।
इस बीच रिटायमेंट के पैसों से सुरेश के पापा ने पुश्तैनी घर के पास ही नया घर बनाना शुरू कर दिया था, सुरेश उस अधबने घर जाता और अपने मन के परिंदों को खूब दौड़ाता था। इस कमरे में मैं रहूंगा, यहां से मैं स्कूल से आकर अपना बैग फैंक कर झट खाना खाऊंगा।
नए घर में आने के बाद सुरेश अपने कमरे में अकेला बैठता और कॉपी के पिछले पन्नों पर अपने आने वाले कल की योजनाएं लिखता। मन परिंदा आखिर चुप कहां रहता है।
स्कूल में उसके लिखे के सब दीवाने थे, वो स्टेज पर बोलता और नाटक में भी हिस्सा लेता था। शायद जमनपुर की भौगोलिक स्थिति का उसपर बहुत असर था, नदी पहाड़ सब कुछ तो थे वहां। ऐसी जगह मन परिंदा खूब दौड़ता था, अनन्त तक।
कभी कभी घर में पैसों की कमी को भी सुरेश ने खूब देखा था इसलिए वो मन के परिंदे दौड़ा सोचते रहता कि मैं जल्द से अपने घर का सब कुछ अच्छा कर दूं। बारहवीं कक्षा के दौरान फ्रैंकफिन द्वारा लिए एक साक्षात्कार में उसका धाराप्रवाह अंग्रेज़ी की वजह से चयन हो गया था और घर आ वो सामने दिख रहे दो किलोमीटर दूर के हिमालय की तरफ साइकिल चलाते खुद को ऐसा महसूस कर रहा था जैसे वो हवा में उड़ रहा हो।
मन तो परिंदा होता है इसलिए फिर उड़ गया, इंजीनियरिंग की परीक्षा दे सुरेश अब मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए हिमालय में स्थित मोनहाट कॉलेज पहुंच गया। छटा पे कमीशन लगते ही सुरेश के पापा की पेंशन बढ़ी और सुरेश भी अपने सपनों से भटक गया।
शराब, चरस, व्हाइटनर अब उसके साथी थे, इंजीनियरिंग में पढ़ाई तो एक रात पहले ही होती है। फाइनल साल आते आते सुरेश का मन परिंदा फिर उड़ने लगा और वो अब पुलिस की भर्ती दे आया था।
एक रात वो सोया था तभी खुद से सवाल पूछा 'सिपाही का फार्म तो तूने भर दिया बेटे, क्या किसी अधिकारी का गेट खोल पाएगा' ।
जवाब हां था, जब मन तैयार तो कौन रोक सकता, आज तक अपने मन परिंदे की ही सुनने वाला सुरेश पुलिस की ट्रेनिंग के लिए फिर हिमालय की गोद में रामनगर था।
नौ महीने की ट्रेनिंग और घर जैसा माहौल, घर जैसा इसलिए क्योंकि सुबह सुबह दौड़ते सुरेश अपने सामने हिमालय को ही पाता। उसके मन परिंदे को वही शांति मिलती थी, जो वो बचपन से महसूस करते आया था।
कुछ साल तो सब ठीक रहा पर अब आस पास के माहौल , दुनिया की समझ ने सुरेश के मन परिंदे को फिर उड़ा दिया। बचपन का सोया लेखक अब फिर जग उठा था, हर तरह का नशा छोड़ चुके सुरेश ने नौकरी के पांच साल बाद पत्राचार से पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू की और फिर कोरोना काल में वो लिखने लगा।
उसके परिवार की उपभोक्तावाद की सारी जरूरतें बिना सुरेश के ही पूरी हो रही थी। एसी, घर, कार, मोटरसाइकिल, स्कूटी सब होते सुरेश का मन इन सब से खुद दूर रहा और वो समाज, पर्यावरण के विषय पर ही ध्यान देकर लिखने लगा।
देश के बड़े बड़े पत्रकार, लेखक उसे अब इन दो सालों में जानने लगे थे।
एक जीवनी लिखने के लिए उसे कुछ दिनों पहले मुंबई के उद्योगपति का फोन आया था। पहली बार हवाई जहाज में दूसरे के पैसों पर बैठना, एयरपोर्ट के बाहर रिसीव करने के लिए मर्सिडीज।
आज सुरेश का मन परिंदा वही सफर याद कर रहा था जो फ्रैंकफिन में सिलेक्शन वाले दिन उसने महसूस किया था। एक उड़ान, मन परिंदे की ऊंची उड़ान, जो अब भी जारी है।
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