Monday, March 31, 2025

राहुल कोटियाल

तहलका मैगजीन, स्क्रॉल, दैनिक भास्कर, न्यूज़लॉन्ड्री में काम कर लगभग डेढ़ दशक का पत्रकारिता अनुभव लिए राहुल कोटियाल ने उत्तराखंड में पत्रकारिता करने का निर्णय लिया और कुछ समय में ही उनके द्वारा शुरू किया 'बारामासा' यूट्यूब चैनल उत्तराखंड के पत्रकारिता जगत में जाना पहचाना नाम बन गया। रेड इंक, रामनाथ गोयनका जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त करने वाले राहुल को इस चैनल के लिए साल 2022 में प्रतिष्ठित उमेश डोभाल पत्रकारिता पुरस्कार भी मिला।

बारामासा चैनल में 'एक्स्ट्रा कवर' नाम से चलाए जा रहे शो के 'उत्तरकाशी मस्जिद विवाद, नफरत पलती रहे, राजनीति चलती रहे' एपिसोड में राहुल कोटियाल उत्तराखंड के नेताओं के बड़बोलेपन को बेनकाब करते दिख रहे हैं, वह दिखा रहे हैं कि नेताओं के लिए जनता क्या है। वीडियो अब तक 47 हज़ार बार देखा जा चुका है। इसी वीडियो में आगे राहुल ने उत्तरकाशी मस्जिद विवाद पर रिपोर्ट दिखाई है, जिसे देखते आम दर्शक भी समझ जाएंगे कि भाजपा सरकार धर्म की राजनीति करते हुए अपनी बाकी गलतियां किस तरह छुपाती है। वीडियो की खास बात यह है कि राहुल यहां सिर्फ भाजपा ही नही कॉंग्रेस सरकार पर भी सवाल उठाते दिखे हैं, जो यह दिखाता है कि उनकी पत्रकारिता एकतरफा तो बिल्कुल नही है।

 इस शो के एक और एपिसोड 'ऐसे लुट रही उत्तराखंड की जमीन' के साथ राहुल ने उत्तराखंड का इस समय का सबसे महत्वपूर्ण जमीन का मुद्दा भी कवर किया है. राहुल के बोले गढ़वाली शब्द दर्शकों को वीडियो से जोड़ने में कामयाब रहे हैं और वह दिल्ली से आने वाली वीडियो की जगह अपनी क्षेत्रीय भाषा में बोली जा रही वीडियो को ज्यादा देख रहे हैं, शायद इसलिए इस वीडियो को अब तक करीब डेढ़ लाख बार देखा गया है। वीडियो की शुरुआत में प्रदेश की राजधानी को लेकर राहुल दोनों पार्टियों को घेरते हैं, इसके बाद उन्होंने सरकारी अधिकारी के लिए पार्क से प्लॉट बनाने की जो कहानी दिखाई है, वह आंख खोलने वाली है। इसी मार्च भू माफियाओं के चक्कर में यूपी में एक पत्रकार राघवेंद्र वाजपेयी की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई है, ऐसी खबर को सुनते राहुल की हिम्मत और जज़्बे को सलाम करने को दिल चाहता है। 'सरकार के दाँत खाने के और दिखाने के और होते हैं' पंक्ति के साथ समाप्त होती इस वीडियो में चर्चित अंकिता भंडारी केस पर चर्चा के साथ कांग्रेस के कारनामें भी शामिल हैं। 

Sunday, March 30, 2025

*उमेश डोभाल स्मृति समारोह: सिरोली गाँव में ग्राउंड लेवल के समाजसेवियों और मीडिया कर्मियों का जलवा*

हर साल उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित होने वाला 'उमेश डोभाल स्मृति समारोह' इस बार पौड़ी गढ़वाल में उमेश डोभाल के ही सिरोली गाँव में संपन्न हुआ। इस वर्ष इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पुरस्कार किशन चन्द्र जोशी और सोशल मीडिया पुरस्कार प्रेम पंचोली को प्रदान किया गया। यह पुरस्कार मीडिया जगत में विशेष प्रतिष्ठा रखता है। पत्रकार उमेश डोभाल, जो 1988 में रहस्यमय ढंग से लापता हुए थे, की याद में 1991 से यह सम्मान निरंतर दिया जा रहा है।  

*रहस्य से पर्दा: क्या हुआ था उमेश डोभाल की हत्या के वक्त?*

उमेश डोभाल के साथी रहे अनूप मिश्र कहते हैं शराब या जंगल माफ़िया, तब इनके ख़िलाफ़ लिखने और बोलने का सीधा अर्थ होता था, अपनी जान जोखिम में डालना. इंटरनेट, मोबाइल, सीसीटीवी, सोशल मीडिया जैसी आधुनिक माध्यम उस दौर में मौजूद नहीं थे, जो अपराधी के दिमाग में डर पैदा करने और उसे सलाखों के पीछे धकेलने में सशक्त हथियार साबित होते. गढ़वाल कमिश्नरी के मुख्यालय पौड़ी स्थित एक होटल से 25 मार्च 1988 को हुई पत्रकार उमेश डोभाल की गुमशुदगी का मामला तब प्रकाश में आया था, जब अमर उजाला में नियमित रूप भेजे जाने वाले उनके ख़बरों के डिस्पैच कुछ दिनों तक मेरठ नहीं पहुंचे. उमेश जब पौड़ी में मौजूद होते थे, तो उनके ये डिस्पैच पौड़ी से कोटद्वार मुझ तक पहुंचते थे, जो अख़बार की टैक्सी से मेरठ भेज दिए जाते थे. उमेश अक्सर गढ़वाल के दूसरे हिस्सों में भी ख़बरों के सिलसिले में निकल जाया करते थे, इसीलिये शुरू में यही मान लिया गया था कि वो अन्यत्र कहीं चले गए होंगे. उनकी जब कहीं से भी कोई ख़बर नहीं मिली तो सभी की चिंता बढ़ गई. इस बाबत मेरठ से संपादक अतुल माहेश्वरी ने मुझसे संपर्क कर पौड़ी जाकर उनके बारे में पता लगाने को कहा. इसके बाद ही यह बात स्पष्ट हुई कि उमेश डोभाल 25 मार्च को सन-एन-स्नो होटल में रुके थे, तब से उनका कहीं कोई पता नहीं है. पूछताछ के बाद संदेह पुख़्ता होने पर उनकी होटल से गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज़ करा दी गई थी. इससे पहले रिपोर्ट दर्ज़ करने में पौड़ी पुलिस कई दिनों तक हीलाहवाली करती रही थी. 

धीरे-धीरे जगह-जगह पत्रकार संगठन इस मामले में आंदोलित होने शुरू हो गए और फिर इसका दायरा बढ़ता चला गया. यह आंदोलन राजधानी दिल्ली के बोट क्लब तक जा पहुंचा, जहां आयोजित प्रदर्शन के ज़रिए देशभर से जुटे पत्रकारों ने उमेश डोभाल गुमशुदगी की सीबीआई जांच की मांग को जोरदार ढंग से उठाया.

आख़िरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी जा पहुंचा, इसके बाद ही सीबीआई जांच के आदेश जारी हो पाए. सीबीआई जांच में उमेश डोभाल की गुमशुदगी का सच बदनाम शराब माफ़िया के हाथों हुई हत्या के रूप में सामने आया था. हत्या के षड्यंत्र में मुख्य अभियुक्त समेत कई लोगों की गिरफ्तारियां भी हुईं, सीबीआई कोर्ट में मुकदमा लंबे समय तक चला. पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में न्यायालय द्वारा सभी अभियुक्त दोषमुक्त घोषित कर दिए गए थे.

*"आज भी नहीं बदला पत्रकारों के लिए खतरनाक माहौल!" : राजीव लोचन साह*

नैनीताल समाचार के सम्पादक राजीव लोचन साह ने मुख्य वक्ता के तौर पर भारत मे प्रेस फ्रीडम के बारे में कहा कि साल 1988 में उमेश डोभाल की हत्या हुई थी और आज छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश में पत्रकारों की हत्या में काफी कुछ बदला नही है.

15-20 साल पहले देहरादून के टाउनहॉल में नरेंद्र सिंह नेगी का 'नौछमी नारायण' बज रहा था तो वहां की बिजली बंद कर दी गई थी. सत्ता हमेशा से अपनी आलोचना नही सुनना चाहती, पिछले कुछ सालों से यह चलन बढ़ा है. कुणाल कामरा केस इसका सबसे नया उदाहरण है, उसके खिलाफ रोज़ नए मुकदमें दर्ज हो रहे हैं और तोड़फोड़ करने वालों को कुछ देर ही जेल में बन्द रख कर छोड़ दिया गया था.

राजीव लोचन साह ने आगे कहा कि हम नैनीताल समाचार में 'सौल कठोल' नाम से स्तम्भ निकालते थे, उसमें 'कैसे कैसे मुख्यमंत्री' नाम से हमने व्यंग्य लिखा, वो खूब चर्चित हुआ, तब उसकी फोटोस्टेट की प्रतियां वितरित की गई, तब आज की तरह डर नही लगता था.
ये कहना गलत होगा कि अब हम डरते नही है. अब सौल कठोल लिखने के लिए हमें पचास बार सोचना पड़ेगा. 

जब 1977 में नैनीताल समाचार शुरू हुआ तब पत्रकारिता इतनी व्यापक नही थी, साप्ताहिक,पाक्षिक अखबार ही आते थे. वही सूचना देते थे, सालों पहले 'अल्मोड़ा अखबार' बन्द करने पर वहां की जनता ने पैसा इकट्ठा कर 'शक्ति' अखबार निकाला.
तिलाड़ी कांड की खबर छापने पर उत्तराखंड के एक सम्पादक जेल चले गए थे पर उन्होंने अपने पत्रकार का नाम नही बताया. 

उन्होंने कहा अखबारों के जिलेवार संस्करण आने से जनता एक दूसरे से अलग होती गई थी, उत्तराखंड राज्य आंदोलन में हमने जनता को सूचनाओं से लैस करने के लिए उत्तराखंड बुलेटिन निकाला. सभी जिलों में अपने साथियों से एसटीडी पर बात कर आंदोलन के बारे में हम सूचना लेते थे, यह प्रयोग काफी लोकप्रिय रहा. 

*गाँव की महिलाओं ने बढ़ाई समारोह की रौनक, सांस्कृतिक पहलों को मिली सराहना*

समारोह में साहित्यकार महावीर रवांल्टा, कवि हर्ष काफर, कला एवं संस्कृति के रक्षक समीर शुक्ला, पौड़ी के दगड्या ग्रुप और चामी के टीनएजर्स क्लब को भी अलग अलग श्रेणियों में सम्मानित किया गया.

दगड्या ग्रुप के फाउंडर आशीष नेगी कहते हैं कि ग्रुप में एकेश्वर गांव के बच्चों के साथ पिछले सात सालों से शिक्षा, संस्कृति पर कार्य किया जाता है. बच्चों के लिए थिएटर, आर्ट क्राफ्ट की 15 वर्कशॉप आयोजित की जा चुकी हैं. वह कहते हैं हम इस दूरस्थ क्षेत्र में भी फ़िल्म फेस्टिवल आयोजित कर रहे हैं, इसमें हमने ऑस्कर विनिंग डॉक्यूमेंट्री 'द एलिफेंट व्हिसपर्स' के सिनेमेटोग्राफर करन थपलियाल को भी बुलाया था. वह कहते हैं हम कुछ बच्चों की पढ़ाई लिखाई का पूरा ख़र्च उठा रहे हैं और साथ ही बच्चों के लिए पुस्तकालय भी खोले गए हैं, हाल ही में पौड़ी में एक नया पुस्तकालय खोला गया है. खास बात है यह कोई ngo नही है, यह कुछ लोगों द्वारा समाज के लिए बेहतर करने का एक छोटा सा प्रयास है. 

चामी गांव में बच्चों के लिए शिक्षा के साधन आसानी से उपलब्ध न होते देख सरकारी नौकरी से रिटायर अरुण कुकसाल ने 'चामी टीनएजर्स क्लब' बनाया. इसमें उनके नौकरी के पुराने साथी उनकी आर्थिक मदद करते हैं. गांव के मिलन केंद्र में चलने वाले क्लब की संरक्षिका गांव की ही रिंकी बिष्ट को बनाया गया है. रिंकी बीकॉम पढ़ी हैं और वह क्लब के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं. रिंकी कहती हैं कि क्लब में बच्चों के लिए कम्प्यूटर, किताबें रखी हैं. बच्चे यहां स्कूल के बाद पढ़ते और खेलते भी हैं. लगभग 50 बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च अरुण कुकसाल अपने साथियों की मदद से उठाते हैं. होली में इन बच्चों के द्वारा गांव में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें शामिल होकर गांव के सभी लोग बहुत खुश थे.

कार्यक्रम की खास बात सिरोली गांव की महिलाओं की भागीदारी रही। समारोह के जुलूस से लेकर पोस्टर प्रदर्शनी तक हर चरण में उनकी उपस्थिति ने समारोह को विशेष बनाया। गांव की सड़क से समारोह स्थल तक, महिलाओं ने सांस्कृतिक और सामाजिक पहलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।  

*नरेंद्र सिंह नेगी ने गीतों से बढ़ाया समारोह का मनोरंजन*

समारोह के अंत में मशहूर लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने प्रेस की आज़ादी पर अपनी चिंता व्यक्त की और समारोह को अपने मशहूर गीतों से सजाया। उनके स्वरों ने श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया।  

हिमांशु जोशी

Saturday, March 29, 2025

इंजीनियर से कवि बने हर्ष काफर की डॉक्यूमेंट्री: जंगल की आग का दर्द, समाधान की उम्मीद.

हर्ष काफर का नाम अब सिर्फ़ कविताओं और रील्स तक सीमित नहीं. उनकी ताज़ा डॉक्यूमेंट्री Forest Fire in Himalayas ने सोशल मीडिया पर तूफान ला दिया है. 

हमने हर्ष से उनके जीवन और इस डॉक्यूमेंट्री पर विस्तार से बातचीत की. उत्तराखंड के जंगलों की आग (forest fire) इन दिनों चरम पर होती है, डॉक्यूमेंट्री में जंगल मे आग के कारणों की पड़ताल की गई है. साथ ही इसमें हम पिछले साल बिनसर वन्यजीव अभ्यारण्य में आग लगने के दौरान हुए घटनाक्रमों पर भी कुछ चौंकाने वाले खुलासे देखते हैं, इस घटना में छह लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी.

कैसे बना इंजीनियर हर्षवर्धन, "काफर" जो जलते जंगलों की आवाज़ बना

अल्मोड़ा जिले के माला गांव में रहने वाले हर्ष काफर ने गांव से स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद पंजाब में एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी से साल 2015 में केमिकल इंजीनियरिंग से बीटेक किया है. इसके बाद कुछ समय दिल्ली में नौकरी करने के बाद हर्ष का मन नौकरी से उचटने लगा, हर्ष कहते हैं कॉलेज के वक्त मैं देखता था कि हिमाचल प्रदेश, असम और पंजाब के लड़के अपनी संस्कृति से कितने जुड़े हैं लेकिन मेरा उत्तराखंड से लगाव बहुत कम था और मेरी कविताएं भी हिंदी में थीं. अपनी जन्मभूमि के लिए कुछ करने की चाह से मैं कुमाउनी में लिखने लगा और वापस घर लौट आया. 
पहले प्रयास में जब मैं नौकरी छोड़ कर आया तो मम्मी ने मुझे नौकरी में वापस भेज दिया पर जब मैं दोबारा घर आया तो बिना किसी को बताए ही वापस आ गया था. कॉलेज से पहले मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था तो मुझे लगता था कि घर वापस जाकर कुछ हो ही जाएगा, बाकी घर में खेती तो थी ही. हर्ष ने आगे बताया कि अब उनकी कविताएं युवाओं के बीच लोकप्रिय होने लगी हैं, फेसबुक और इंस्टाग्राम में बीस से तीस हजार फॉलोवर्स हैं. फेसबुक से कुछ कमाई भी हो जाती है. वह अपने परिवार का शुक्रिया अदा करते हैं कि उन लोगों ने एक जमी जमाई नौकरी छोड़ कर घर लौटे युवा का अब तक साथ दिया है.

अपने उपनाम के पीछे की कहानी सुनाते हर्ष कहते हैं उनका असली नाम हर्षवर्द्धन जोशी है, काफर का अर्थ है जो अपनी धुन में चलता है, जो नौकरी छोड़ कर घर रहने आ जाएगा वो काफर ही है.

कविता सिर्फ खिड़की खोलती हैं पर डॉक्यूमेंट्री में सब कुछ विस्तार से

हर्ष काफर ने इस बार अस्कोट आराकोट यात्रा भी की है, वह कहते हैं उस यात्रा में मुझे सबसे रोचक ये लगा कि वहां आपको यात्रा करते खाने पीने का इंतजाम बिना पैसों के करना पड़ता है, वहां जाकर मैंने अपने लोगों को जाना. हमें यात्रा से यह पता चला कि इस बार काफी बर्फ गिरने वाली जगह बर्फ नही गिरी है. हर्ष कहते हैं वहीं उन्हें पद्मश्री और उत्तराखंड के इनसाइक्लोपीडिया कहे जाने वाले शेखर पाठक को भी करीब से जानने का मौका मिला.

इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने पर हर्ष कहते हैं कविता केवल खिड़की खोलने का काम करती है पर डॉक्यूमेंट्री में अगर हम किसी बात को विस्तार से कहना चाहते हैं तो कह सकते हैं. 

https://www.instagram.com/reel/C7BdDlBPO4G/

डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत हर्ष के दमदार नरेशन के साथ 'जंगल की आग का अतीत' से 

वनाग्नि की गम्भीरता दिखाती इस डॉक्यूमेंट्री में जंगल की आग की कुछ रीयल फुटेज हैं, साथ में इसमें शेखर पाठक सहित उत्तराखंड के पहाड़ों की गहरी जानकारी रखने वालों की टिप्पणियों को भी जगह दी गई है.

नैरेटर हर्ष काफर अपनी दमदार आवाज में डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत बद्रीदत्त पांडे के साल 1921 के एक भाषण के अंश से करते हैं, यह पंक्तियां आज के हालातों पर भी सटीक बैठती हैं. इसके बाद इतिहासकार पद्मश्री शेखर पाठक बताते हैं कि पहले ग्रामीण अपनी जान को कुर्बान कर भी आग बुझाते थे पर अंग्रेजों ने लोगों को जंगलों से दूर कर दिया.

प्रभावित करती पंक्तियों के साथ बिनसर अभ्यारण्य का सच

हर्ष काफर ने डॉक्यूमेंट्री में प्रभावित करने वाले संगीत का प्रयोग किया है. भास्कर भौर्याल का संगीत डॉक्यूमेंट्री में वनाग्नि की गम्भीरता को और भी बढ़ाता रहता है.
हर्ष काफर की पंक्तियां 'हम जल रहे हैं, आग हमें जला रही है, हमारे जंगलों को जला रही है और हमारे संसाधनों को जला रही है' जंगल की आग का मनुष्यों से गहरा संबंध दर्शाती रहती हैं.

जब वह घाटी से 5-6 किलोमीटर ऊपर खड़े होकर कहते हैं 'चढ़ने में वो भी दिन के उजाले में चार से पांच घण्टे लगते हैं. आप चाहते हैं और आप सोचते हैं एक फायर वॉचर और एक फॉरेस्ट गार्ड यहां आए वो भी रात के अंधेरे में और आग बुझा दें' तो पहाड़ की भौगोलिक स्थिति को न समझने वाले भी पहाड़ों के जंगलों में लगने वाली आग की गम्भीरता से परिचित हो जाते हैं. डॉक्यूमेंट्री देख कर लगता है कि हर्ष काफर इसे बनाने का अपना उद्देश्य पूरा कर सके हैं.

बिनसर वन्यजीव अभ्यारण्य पर चौंकाने वाले खुलासे

पिछले साल बिनसर वन्यजीव अभ्यारण्य की आग पर डॉक्यूमेंट्री में विस्तार से चर्चा की गई है. डॉक्यूमेंट्री का यह हिस्सा दर्शकों को चौंकाता है, जब वह सुनते हैं कि आग बुझाने के लिए कैसे नेपालियों को बिना संसाधनों के भेज दिया जाता है.
 इसमें कैग की रिपोर्ट का जिक्र भी है, जहां बताया जाता है कि फॉरेस्ट फंड के पैसों से आईफोन, लैपटॉप लिए गए. वीडियो में बैकग्राउंड पर दिखाई जा रही अखबारों की कटिंग लगाते हर्ष ने जो दिखाया है उसकी प्रमाणिकता भी सिद्ध की है.

कुछ महत्वपूर्ण सुझाव जो डॉक्यूमेंट्री का हासिल है

डॉक्यूमेंट्री में जंगल के आसपास रहने वाले लोगों के लिए जंगल की महत्वता दिखाने के लिए कई साक्षात्कार लिए गए हैं. इसमें से एक विनोद पाण्डे का भी है, जिसमें वह कहते हैं आग के लिए जो प्रतिरोधक शक्ति है वो है नमी या पानी. जंगल का सबसे बड़ा वरदान है पानी, मानसून और वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से पानी मिलता है. जंगल उस पानी को रोकता है.


ऐसे ही भरत सिंह, जो वन पंचायत सरपंच भी हैं वह आग के लिए वन विभाग से अनुरोध करते दिखते हैं कि जंगल में चारा पत्ती वाले पेड़ ही न लगाएं, फलदार वृक्ष भी लगाएं. यह लगेंगे तो जो बंदर आज घर में घुस रहे हैं वो जंगल में रहेंगे, क्योंकि उनकी वहां पूर्ति हो जाएगी, वो खेती की तरफ नही आएंगे.

शेखर पाठक भी जंगल की आग रोकने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव देते कहते हैं सरकार, समाज और संस्थाओं का संयुक्त मोर्चा ही आग से टैकल कर सकता है. वन विभाग अकेला कितना ही कर्मठ ईमानदार बन जाए, अकेला आग नही बुझा सकता, समाज अकेला नही बुझा सकता. कितना भी एडवांस हो जाएं अमरीका भी आग नही बुझा पा रहा है, कैलिफोर्निया में दर्जनों की संख्या में लोग मरते हैं.

डॉक्यूमेंट्री में पिरूल नीति पर भी सरकार की घोषणाओं और जमीनी हकीकत का आकलन किया गया है, हर्ष ने यहां भी शेखर पाठक की महत्वपूर्ण राय ली है और यह आग रोकने पर जरूरी है.

हिमांशु जोशी.

पहाड़ी संस्कृति की धड़कन बनकर उभरी 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम'

अस्कोट आराकोट यात्रियों का महरगांव में स्वागत करते महावीर रवांल्टा सड़क पर ही आ गए थे. यात्रा के गीत के साथ हम लोग उनके घर की तरफ बढ़े जहां महावीर ने यात्रियों के लिए बच्चों के नाटक सहित कई अन्य कार्यक्रमों को दिखाने की तैयारी की थी. उनके घर पहुंचते ही मौसम खराब हो गया और नाटक दिखाने के लिए तैयार खड़े बच्चों के चेहरों पर निराशा छा गई, हल्की बारिश की बीच अन्य कार्यक्रमों नही हो पाए लेकिन महावीर रवांल्टा ने बिना समय गंवाए अपनी पुस्तक ‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम’ (समय साक्ष्य प्रकाशन) का विमोचन हम यात्रियों से करवा लिया, जिसके बाद तेज होती बारिश के बीच हम सब दौड़ते हुए उनके घर के अंदर चले गए . चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम किताब रवाईं अंचल की 46 लोककथाओं को सहेजकर हिंदी पट्टी के पाठकों तक पहुंचाने का सराहनीय प्रयास है. इन कहानियों के माध्यम से न सिर्फ पहाड़ के मनुष्य-प्रकृति के अटूट रिश्ते उजागर होते हैं, बल्कि पहाड़ी हीर-रांझा ‘गुजु मलारी’ जैसी अनकही प्रेमगाथा भी सामने आती है, जो लोकसाहित्य के गुमनाम पन्नों में दबी थीं. अगर महावीर ने इन्हें हिंदी में न पिरोया होता, तो शायद ये कहानियां हमेशा के लिए पहाड़ों की गहरी खाईयों में कहीं खो जाती.  

*मनुष्य और प्रकृति का सदियों पुराना रिश्ता: लोककथाओं का मूल स्वर*

पुस्तक की पहली कहानी ‘सात रानियाँ और राजकुमार’ से ही साफ झलकता है कि पहाड़ की माटी में जानवरों के साथ इंसान का नाता कितना गहरा रहा है. यहां बकरियां, गायें या यहां तक कि जंगली जानवर भी परिवार के सदस्य जैसे हैं. ‘सौतेली मां’ कथा का वह दृश्य याद कीजिए, जहां रूपा अपना दुःख लेकर ‘खाडू’ (बैल) के पास जाती है, और वह उसे सांत्वना देते हुए कहता है – “रोया मत कर… मेरे सींगों पर डंडे से मारा कर, जो चाहेगी वह हो जाएगा.” क्या आज के युग में ऐसी आत्मीयता की कल्पना भी की जा सकती है. ‘आदमी की बुद्धिमत्ता’ कहानी सियार और इंसान के बीच मामा भांजे का रिश्ता बना देती हैं. ये कथाएं साबित करती हैं कि पहाड़ का जीवन प्रकृति के बिना अधूरा है.  

*नैतिकता का पाठ: जीवन की सीख से भरपूर*

इस संकलन की खूबसूरती यह है कि यह केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि जीवन के गहरे सबक भी देता है. ‘अकड़’ नामक कहानी मात्र बारह पंक्तियों में पति-पत्नी के रिश्ते की मनोवैज्ञानिक पड़ताल कर देती है. वहीं, ‘आचरण’ कथा में परिवार के भीतर सम्मान और व्यवहार की बारीकियां उकेरी गई हैं. एक दिलचस्प उदाहरण देखिए – “कुत्ते के आचरण वाले बेटे-बहू के साथ हिरण जैसे कोमल स्वभाव वाली बुढ़िया का तालमेल कैसे बैठता.” ऐसी पंक्तियाँ पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि आधुनिकता की दौड़ में हमने बुजुर्गों के साथ अपने व्यवहार को कितना बदल दिया है.  

*देवत्व और विश्वास: लोककथाओं की आध्यात्मिक छाया*

पहाड़ की लोककथाएं केवल मनुष्य तक सीमित नहीं, बल्कि देवताओं के प्रति अगाध श्रद्धा से भी ओत-प्रोत हैं. ‘श्रीपुरी ढोल’ कथा का नायक ‘बागा’ जब राजा से कहता है – “महाराज दाहिना हाथ तो मैं केवल अपने ईष्ट देव महासू को ही प्रणाम करता हूँ.” तो लगता है मानो पहाड़ी संस्कृति में देवत्व और वीरता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. ये कथाएं न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति आस्था को भी गहरा करती हैं.  

*प्रेम की अमर दास्तान: गुजु मलारी, पहाड़ी हीर-रांझा* 

अगर आपको लगता है कि प्रेम की त्रासदी केवल पंजाब के हीर-रांझा या राजस्थान के ढोला-मारू तक सीमित है, तो ‘गुजु मलारी’ की कहानी आपको हैरान कर देगी. एक गढ़वाली चरवाहे और उसकी बचपन में ब्याही गई प्रेमिका की यह दास्तान इतनी मार्मिक है कि पढ़ते हुए आंखे नम हो जाती हैं. पिता की जिद और प्रेम के बीच फंसी मलारी की मौत की कहानी सुनकर लगता है, मानो पहाड़ की हर चट्टान इन अधूरे प्रेमियों की आवाज समेटे हुए है. महावीर रवांल्टा ने ऐसी कहानियों को हिंदी में अनूदित करके उत्तराखंड के साहित्यिक मानचित्र पर नए नाम जोड़ दिए हैं.  

*नामों के पीछे की वजह सामने लाती लोककथाएं* 

पुस्तक की एक और विशेषता है – स्थानों के नामों की रोचक पृष्ठभूमि. जैसे, ‘दंड’ कथा में कालसी के पास स्थित ‘क्वा बासणी’ नामक जगह का जिक्र है, जो कौवों की काँव-काँव से प्रसिद्ध हुई. इसी तरह, ‘विनाश’ कथा में ‘बंगाण’ क्षेत्र का नामकरण उन अट्ठारह कुंवरों के नाम पर बताया गया है, जिनकी पूजा कौंल महाराज के साथ होती है. ऐसे प्रसंग पाठक को इतिहास और भूगोल के बीच एक सुंदर सेतु बनाते हैं.  

*कुछ कमियां भी पर उपलब्धि कई बड़ी*

हालांकि पुस्तक में कहीं-कहीं मात्राओं की गलतियां (जैसे पृष्ठ 97 पर ‘बलि’ को ‘बति’ और पृष्ठ 100 पर ‘नाक’ को ‘नाग’ लिखा जाना) पढ़ने के आनंद में खलल डालती हैं, लेकिन ये छोटी चूकें इसकी साहित्यिक महत्ता को कम नहीं करतीं. ‘चालाक घुघतू’ जैसी हल्की-फुल्की कहानियाँ पुस्तक को एकरस होने से बचाती हैं.  

‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम’ न सिर्फ उत्तराखंड की लोक संस्कृति को संजोती है, बल्कि हिंदी साहित्य को एक नई दिशा देती है. यह पुस्तक उन सभी के लिए अनिवार्य पठन है, जो पहाड़ों की सांस्कृतिक धड़कन को महसूस करना चाहते हैं. महावीर रवांल्टा ने केवल कहानियाँ ही नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा को कागज पर उतार दिया है.  

हिमांशु जोशी.

Friday, March 28, 2025

पहाड़ी हीर रांझा, गुजु मलारी का दुनिया से परिचय कराती 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम'.

उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान एवं हाल ही में उमेश डोभाल स्मृति सम्मान पुरस्कार से सम्मानित लेखक महावीर रवांल्टा की किताब 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम' समय साक्ष्य प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है, किताब में लेखक ने रवाईं क्षेत्र की 46 लोक कथाओं को शामिल किया है. इन कथाओं को पढ़ते मनुष्य और जानवरों के सदियों पुराने आत्मीय संबंधों का पता चलता है, इन रवाईं कथाओं का महावीर ने हिंदी अनुवाद न किया होता तो शायद हिंदी साहित्य के पाठकों को कभी पहाड़ी हीर रांझा, गुजु मलारी के बारे में पता ही न चलता. 

शुरुआत से ही मनुष्य और जानवरों के आत्मीय संबंधों पर प्रकाश डालती लोककथाएं

किताब की पहली कहानी 'सात रानियां और राजकुमार' पढ़ते हम समझ सकते हैं कि मनुष्य और जानवरों के बीच आत्मीय संबन्ध सदियों से चले आ रहे हैं, इसी तरह 'सौतेली मां' की पंक्ति 'रूपा खाडू के पास जाकर अपना दुखड़ा रोती. एक दिन खाडू बहन रूपा को ढाँढस देता हुआ बोला, तू रोया मत कर, जब तू मुसीबत में हो,मेरे सींगों पर डंडे से मारा कर तब जो तू चाहेगी वह सब काम हो जाएगा' भी साबित करती है कि जानवर, इंसान के हमेशा से करीब रहा है. हम कई लोककथाओं में जानवरों को इंसान के साथ रिश्तों में भी बंधा हुआ पढ़ते हैं, जैसे 'आदमी की बुद्धिमत्ता' में सियार और इंसान के बीच मामा, भांजे का रिश्ता है.

इंसान को उसके आचरण की सीख देती किताब

कई लोककथाओं में इंसान के आचरण पर भी लिखा गया है.
'अकड़' लोककथा मात्र बारह पंक्तियों की है और उसे पढ़ते ऐसा लगता है कि दुनिया के हर पति पत्नी का रिश्ता एक जैसा ही होता है. 'आचरण' लोककथा में रिश्ते नातों पर प्रकाश डालते, घर परिवार में एक दूसरे के प्रति अच्छा व्यवहार करने की सीख दी गई है जैसे 'कुत्ते के आचरण वाले अपने बेटे बहुओं के साथ उसका हिरण का आचरण कैसे मेल खा सकता था?' पंक्ति से हमारी समझ बनती है कि हमें घर के बड़े बूढ़ों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए.

लोक कथाओं से देवताओं पर गहरा होता रहा है विश्वास,

'श्रीपुरी ढोल' में बागा जैसा वीर जब राजा से कहता है कि 'महाराज! दाहिने हाथ से मैं सिर्फ अपने ईष्ट देवता महासू को ही प्रणाम करता हूं किसी और को नही'. 
लोक कथाओं में हमेशा से यह प्रचलित रहा है कि बागा बहुत वीर था और ऐसा वीर भी हमेशा महासू देवता के प्रति श्रद्धा भाव रखता है तो उससे यह प्रमाण मिलते हैं कि इन लोक कथाओं ने लोगों के मन में अपने देवताओं के प्रति विश्वास को और भी गहरा करने का काम किया है.

पहाड़ी हीर रांझा, गुजु मलारी का दुनिया से परिचय कराती  'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम'

'गुजु मलारी' पहाड़ी बैकग्राउंड की एक लोक कथा है, जिसमें लड़का भेड़ बकरी चराता है और उसे बचपन में ही ब्याह दी गई मलारी से प्रेम हो जाता है. पिता की प्रेमी से न मिलने देने की जिद और प्रेमी के वियोग में दम तोड़ देने वाली प्रेमिका की यह कहानी हीर रांझा की मशहूर कहानी से कम नही है. इस लोक कथा को पढ़ते हुए यह साबित हो जाता है कि पहाड़ में ऐसी कई कहानियां रही होंगी जो दुनिया के सामने आती तो खूब लोकप्रिय होती, महावीर ने इस कहानी का हिंदी अनुवाद कर एक शुरुआत तो की ही है.

पहाड़ के नामों की कहानी इन लोक कथाओं से

पहाड़ों में बहुत से स्थान ऐसे हैं जिनके नामों के पीछे कोई न कोई लोक कथा अवश्य होती है. इस किताब के जरिए हमें ऐसे ही कुछ स्थानों की कहानी के बारे जानकारी प्राप्त होती है. पृष्ठ संख्या 52 में 'दंड' लोक कथा में लिखा है, कालसी के समीप निर्जन जंगल का स्थान कौवे की काँव काँव के कारण 'क्वा बासणी' कौवा बोलना के नाम से प्रसिद्ध हुआ. 
'विनाश' में भी लिखा है 'उनके अट्ठारह कुंवरों के साथ उनकी पूजा कौंल महाराज के साथ की जाती है. बंग्वाणों के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम बंगाण हुआ'.

'चालाक घुघतू' जैसी लोककथा पाठकों को बोर नही होने देती है. किताब में मात्राओं की गलती भी दिखाई दी है, जिसने कहीं कहीं पर इसे पढ़ने का मजा किरकिरा किया है. पृष्ठ 97 में बलि को बति लिख दिया गया है तो 100 में नाक को नाग.

हिमांशु जोशी.



Tuesday, March 18, 2025

the ranveer show: माइक्रोफोन से मोटी कमाई तक की कहानी, जानिए कैसे बदल रही है डिजिटल आवाज़ों की दुनिया.

रणवीर अल्लाहबादिया विवाद के बाद 'पॉडकास्ट' चर्चा में है और रील्स के दिनों में यह आजीविका चलाने का नया जरिया बनकर सामने आया है.

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में रणवीर अल्लाहबादिया को आंशिक राहत देते हुए उन्हें कुछ शर्तों के साथ अपना पॉडकास्ट 'द रणवीर शो' फिर से शुरू करने की अनुमति दे दी. यह फैसला रणवीर अल्लाहबादिया की उस याचिका पर आया है जिसमें उन्होंने पॉडकास्ट को जारी रखने की अनुमति मांगी थी, रणवीर ने कहा था कि यह उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत है. 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लेकर 'किस्सागोई' के नए मुकाम तक

'पॉडकास्ट' शब्द आज से पंद्रह साल पहले लोगों के लिए नया था पर अब लोग इसे अपनी आजीविका का जरिया बनाने लगे हैं, इस बारे में हमने कुछ लोगों से बातचीत की पर इससे पहले 'पॉडकास्ट' को समझें तो यह एक डिजिटल ऑडियो या वीडियो कंटेंट सीरीज़ होती है, जिसे इंटरनेट के माध्यम से कभी भी डाउनलोड या स्ट्रीम किया जा सकता है. पॉडकास्ट को Spotify, Apple Podcasts, या YouTube जैसे प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जा सकता है.

यह लोगों में इसलिए लोकप्रिय है क्योंकि स्मार्टफोन्स के माध्यम से लोगों तक आसानी से इसके जरिए ज्ञान या मनोरंजन की पहुंच बन रही है.

साल 2007 के दौरान भारत में जब लोग पॉडकास्ट को जानते भी नही थे, तब कला जगत के कुछ महत्वपूर्ण लोगों द्वारा 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' पॉडकास्ट की शुरुआत की गई थी. इसके बारे में बात करते इसके फाउंडिंग मेम्बरों में से एक सजीव सारथी कहते हैं कि हमने साल 2007 में 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' नाम से पॉडकास्ट प्लेटफॉर्म बनाया था तब दिक्कत यह होती थी लोगों को पता नही होता था कि इसे चलाया कैसे जाए. आज का 'हिन्द युग्म' प्रकाशन तब एक साहित्यिक ग्रुप था, इसके एक भाग के तौर पर ही रेडियो प्लेबैक इंडिया की शुरुआत की गई थी. सजीव बताते हैं विविध भारती के जाने-माने उद्घोषक यूनुस खान जैसे बड़े नाम तब हमसे जुड़े थे. स्पॉटीफाई और इस तरह के अन्य एप आने के बाद हिंदी साहित्य, कहानी सुनाने वालों को अच्छा पैसा मिलने लगा. रेडियो प्लेबैक इंडिया ने भी कुछ समय मेंटज़ा एप के साथ काम किया.

 सजीव कहते हैं इन दिनों रील्स में कविताएं, कहानियां सुनना ट्रेंडिंग है और जिसके पास दमदार आवाज़ है और उसे पहचान मिलने लगे तो आप पॉडकास्ट में अच्छा पैसा कमा सकते हैं. 

माइक्रोफोन ने बदली जिनकी ज़िंदगिया

मुरादाबाद की रहने वाली रिचा शर्मा कहती हैं कि बेटे और बेटी को जन्म देने बाद परिवार को समय देने के लिए उन्होंने स्कूल पढ़ाना छोड़ दिया था, बच्चों के बड़े होने पर उन्होंने फिर से अपने कैरियर के बारे में सोचा और वह साल 2022 में 'मेन्टज़ा' एप से जुड़ीं. मेन्टज़ा में वह 9 पॉडकास्ट चैनलों से जुड़ी थीं और सोशल मीडिया रिप्रेजेंटेटिव के पद पर रहीं. इसके साथ वह 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' के साथ भी काम करती रही हैं, इन दिनों रिचा 'किस्साठेल' रेडियो ड्रामा चैनल से जुड़ी हैं. रिचा कहती हैं कि वह आने वाले समय में अपने पति के साथ उनके व्यापार में हाथ बंटाते हुए पॉडकास्ट की दुनिया में भी आगे बढ़ना चाहती हैं, उन्हें पॉडकास्ट में अपना बेहतर भविष्य दिखाई देता है.


सुप्रिया पुरोहित को पॉडकास्ट से उम्मीद तो शतदल रेडियो से पॉडकास्ट की दुनिया में सक्रिय प्रज्ञा

सुप्रिया पुरोहित इन दिनों दिल्ली में रहती हैं. साल 2019 में उन्होंने 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' पॉडकास्ट में 'कविता जंक्शन' प्रोग्राम शुरू किया था. कविता जंक्शन को अब उन्होंने रजिस्टर करवा लिया है और उसकी वेबसाइट बना कर उन्होंने अभी 'वाग्मी' नाम से पत्रिका भी निकाली है. इस वेबसाइट में पॉडकास्ट, ऑडियो बुक्स के साथ काफी कुछ देखा जा सकता है. सुप्रिया कहती हैं कि कविता जंक्शन के बेहतर भविष्य की उन्हें बहुत उम्मीदें हैं, सब उम्मीदों के मुताबिक रहा तो वह कुछ सालों बाद पॉडकास्ट की दुनिया का जाना पहचाना नाम होंगी.


मुंबई की प्रज्ञा मिश्रा कहती हैं कि साल 2018 में उन्होंने 'शतदल रेडियो' की शुरुआत की थी. इसमें वह सामाजिक विषयों पर बात करने के साथ कविताएं पढ़ती हैं, यह स्पॉटीफाई और यूट्यूब पर है. प्रज्ञा कहती हैं मुझे किताबें पढ़ने का शौक है और शतदल रेडियो पर मैं किताबों की समीक्षा भी करती हूं, पॉडकास्ट से उनकी छिटपुट आय होते रहती है. प्रज्ञा आगे कहती हैं कि अपने दोनों बच्चों को पढ़ाने के साथ वह अपने पति की क्लास 'बेंचमार्क ट्यूटोरियल' पर भी लगातार एक्टिव रहती हैं, वह वहां हिंदी और बायोलॉजी पढ़ाती हैं. अपने काम के साथ पॉडकास्ट करते हुए वह खुश हैं.

पायल गुप्ता. 

Monday, March 17, 2025

जाने कौन हैं इस साल के 'उमेश डोभाल स्मृति सम्मान' से सम्मानित महावीर रवांल्टा।

हिमालय की गोद में कला और साहित्य को एक अनमोल तोहफे के रूप में महावीर रवांल्टा का नाम उभरता है। उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों से निकलकर, जहाँ हिंदी साहित्य के दिग्गज जैसे सुमित्रानंदन पंत, शिवानी, मंगलेश डबराल, हिमांशु जोशी और शेखर जोशी ने अपनी छाप छोड़ी, महावीर रवांल्टा उसी परंपरा को नई ऊँचाइयों तक ले जा रहे हैं। रवांल्टी भाषा के लिए उनके समर्पण ने न केवल उनके निजी दुखों को पीछे छोड़ने में मदद की, बल्कि उनकी जन्मभूमि हिमालय की शान को भी बढ़ाया। इस महीने पौड़ी के सिरोली गांव में उन्हें 'उमेश डोभाल स्मृति सम्मान' से नवाजा जाएगा।

यात्रा में खुला युवाओं के बीच महावीर का प्रभाव

अस्कोट-आराकोट यात्रा के दौरान जब हम स्वील गांव से आगे बढ़ रहे थे, कुछ युवाओं ने हमसे हमारी अगली मंजिल के बारे में पूछा। जैसे ही हमने महरगांव का नाम लिया, एक युवा ने उत्साह से कहा कि वहाँ रवांल्टी भाषा के लिए कार्य करने वाले महावीर रवांल्टा रहते हैं। यह जानकर कि एक भाषा को जीवित रखने वाले व्यक्ति की नई पीढ़ी में इतनी पहचान है, मेरे मन में उनसे मिलने की उत्सुकता जाग उठी।
शाम ढलते ही जब हम महरगांव पहुँचे, महावीर रवांल्टा ने अपने घर पर हम यात्रियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने अपने आंगन में बच्चों के नाटक की योजना बनाई थी, लेकिन बारिश ने उस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया। फिर भी, उन्होंने मौके का फायदा उठाते हुए अस्कोट- आराकोट यात्रियों की मौजूदगी में अपनी पुस्तक 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुमक' का लोकार्पण करवाया।

यात्रा के अंतिम पड़ाव आराकोट में उनकी फिर से मुलाकात हुई, जहाँ मैं उनके साथ रात रुककर गहन बातचीत का सौभाग्य प्राप्त कर सका।

पढ़ाई का शौक जो बन गया जुनून

महावीर रवांल्टा का जन्म 10 मई, 1966 को उत्तरकाशी जिले के सरनौल गाँव में हुआ था। उनके पिता टीका सिंह राणा राजस्व विभाग में कानूनगो थे, जबकि माँ रूपदेई  घर संभालती थीं। तीन भाइयों और दो बहनों के बीच दूसरे स्थान पर रहे महावीर छोटी उम्र में ही महरगांव आ गए। गाँव के स्कूल में हर शनिवार को आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कविताएँ सुनने का मौका मिला, जिसने उनके मन में साहित्य के प्रति रुचि जगा दी। नौवीं कक्षा में पुस्तकालय की किताबों और 'पराग', 'नन्दन', 'धर्मयुग' जैसी पत्रिकाओं ने उन्हें आकर्षित किया। जहाँ उनके दोस्त जेबखर्च से नाश्ता खरीदते, वहीं महावीर उन पैसों से पत्रिकाएँ ले आते। बाद में पिता के साथ उत्तरकाशी जाने पर उन्होंने गांधी वाचनालय में अपनी पढ़ाई जारी रखी। बारहवीं में विज्ञान का छात्र होने के बावजूद, उनका झुकाव प्रेमचंद, शिवानी, अभिमन्यु अनत और हिमांशु जोशी जैसे हिंदी साहित्यकारों की ओर था।

लिखने की शुरुआत और दिग्गजों से मिला प्रोत्साहन

बीएससी में दाखिला लेने के बाद पहले ही साल में महावीर असफल हो गए, क्योंकि उनका मन लिखने में अधिक रम गया था। उन्होंने टिहरी से छपने वाले साप्ताहिक 'हिमालय और हम' में अपना पहला पत्र भेजा, जिसके संपादक गोविंद प्रसाद गैरोला थे। फिर 1983 में देहरादून के साप्ताहिक 'उत्तरांचल' के 'साहित्य कला और संस्कृति' स्तंभ में उनकी कविता 'बेरोजगार' छपी। इसके संपादक सोमवारी लाल उनियाल 'प्रदीप', जो अब देहरादून में रहते हैं, खुद एक कुशल कवि हैं। इन रचनाओं के प्रकाशन ने महावीर में यह विश्वास जगाया कि मेहनत से लिखा गया कुछ न कुछ छप ही जाएगा।

उत्तरकाशी के माघ मेले में कुंवर बैचेन, कन्हैया लाल नन्दन, केशव अनुरागी,मनोहर लाल उनियाल 'श्रीमन' और रमानाथ अवस्थी जैसे नामी कवियों को रातभर सुनते हुए महावीर सपने देखते थे कि क्या वह भी कभी ऐसे मंच पर अपनी कविताएँ सुना पाएँगे। संयोग से आयोजक घनश्याम रतूड़ी 'सैलानी', जो पर्यावरण और विकास पर कविताएँ लिखते थे, ने उन्हें कविता पाठ का मौका दिया। वहाँ उनकी कविता को सराहना मिली और बीस रुपये का इनाम भी। महावीर कहते हैं कि वह इनाम उनके लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसा था, जिसने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया।

पहाड़ों में फैलाया नाटक का जादू

'पराग' पत्रिका पढ़ते हुए महावीर कहानियों की ओर खिंचे चले गए। उत्तरकाशी पॉलिटेक्निक में फार्मेसी में चयन होने के बाद, गाँव में देखी रामलीला ने उन्हें नाटकों का शौकीन बना दिया। उन्होंने सन् 1930 के तिलाड़ी कांड पर आधारित नाटक 'मुनारबन्दी' लिखा और उसका निर्देशन भी किया। 1984-85 में उन्होंने 'रवांई-जौनपुर विकास युवा मंच' बनाया और पॉलिटेक्निक के वार्षिकोत्सव में दो नाटकों का मंचन किया। सुवर्ण रावत के एनएसडी दिल्ली से उत्तरकाशी आने पर महावीर ने उनके साथ जुड़कर उत्तरकाशी में डा गोविन्द चातक के 'काला मुंह' नाटक प्रस्तुत किया। इसके बाद 'कला दर्पण' की स्थापना हुई, जिसके तहत 'बांसुरी बजती रही' और 'हेमलेट' जैसे नाटक खेले गए। 'हेमलेट' देखकर पंजाब के एक प्रोफेसर ने कहा कि इतने सुदूरवर्ती क्षेत्र में इतना शानदार मंचन देखकर वह हैरान हैं, क्योंकि उन्होंने कभी इसकी कल्पना भी नहीं की थी।

1987-88 में महावीर ने महरगांव में तीन-चार दिन का नाट्य शिविर आयोजित किया, जिसमें चालीस बच्चों ने पौराणिक, लोककथाओं व समस्याओं पर नाटक तैयार किए। उन्होंने परंपरा तोड़ते हुए लड़कियों को महिला किरदार दिए। उसी समय उनका विवाह भी हुआ। सन् 1988 में चुनावी समर्थन के चलते कुछ लोगों ने मेले में उनके नाटक का विरोध किया, तो महावीर ने अपने आंगन में ही मंचन शुरू कर दिया।

नौकरी के साथ उपन्यासों से बनी पहचान

नौकरी मिलने पर महावीर मुरादाबाद और फिर अस्कोट गए। रंगमंच से दूर होने के कारण उन्होंने फिर से लेखन शुरू किया। सन् 1992 में उनका पहला उपन्यास 'पगडण्डियों के सहारे' तक्षशिला प्रकाशन से छपा, जो बेरोजगारी के दिनों का चिंतन था। यह खूब बिका और आज भी लोग इसे याद करते हैं।  डॉ हरिमोहन ने 8 अगस्त 1992 को 'अमर उजाला' में इसकी समीक्षा लिखी। दूसरा उपन्यास 'एक और लड़ाई लड़' भी इसी प्रकाशन से आया। बाद में उनकी कहानियाँ 'अमर उजाला', 'वागर्थ', 'उत्तरार्द्ध' में छपीं।'समय नहीं ठहरता' उनका पहला कहानी संग्रह था। बुलंदशहर तबादले के बाद 2003 में 'अपना अपना आकाश' उपन्यास और 'टुकड़ा टुकड़ा यथार्थ' कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। वह अभी एक नए उपन्यास पर काम कर रहे हैं।

दुःख को अपने लेखन से हराते रवांल्टी को दी नई पहचान

सन् 2004 ई में अपनी इकलौती बेटी को खोने का दुःख महावीर के लिए असहनीय था, लेकिन लेखन ने उन्हें संभाला। इसके बाद 'त्रिशंकु' लघुकथा संग्रह छपा। दुःख में लिखा कविता संग्रह 'सपनों के साथ चेहरे' को भारत भारद्वाज ने निराला की सरोज स्मृति से जोड़ा।

'सीमा प्रहरी' के संपादन के लिए उन्हें पहला पुरस्कार मिला। 'अक्षर भारत' में सैनिकों पर लिखी कहानी 'अवरोहण' के लिए कानपुर में पद्मश्री जसदेव सिंह और परमवीर चक्र विजेता ले कर्नल धन सिंह थापा की मौजूदगी में दूसरा पुरस्कार मिला। महावीर कहते हैं कि सही समय पर सम्मान लेखकों को प्रेरित करता है।

कई दशक पहले रवांई में लोग रवांल्टी बोलने से हिचकते थे, लेकिन हिंदी में नाम कमाने के बाद महावीर ने इसे बचाने का बीड़ा उठाया। 1995 में उनकी पहली रवांल्टी कविता 'दरवालु' 'जन लहर' में छपी।

 सन् 2003-05 में बी. मोहन नेगी ने उनकी कविताओं के कविता पोस्टर बनाए। सन् 2010 में 'भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण' के लिए शेखर पाठक ने उन्हें रवांल्टी पर काम सौंपा। उत्तराखंड भाषा संस्थान की सवेक्षण परियोजना में भी उन्होंने योगदान दिया। 'पहाड़' संस्था के बहुभाषी शब्दकोश में रवांल्टी पर  उन्होंने काम किया।

हाल ही में रवांई क्षेत्र की लोककथाएं 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुमक' हिंदी में छपी, जिसे वह रवांल्टी में भी लिख रहे हैं। चार उपन्यास, पंद्रह कहानी संग्रह, पाँच कविता संग्रह के साथ उनका लेखन जारी है। उनकी प्रेरणा से रवांई के दो दर्जन युवा रवांल्टी में लिख रहे हैं, जिनमें से कुछ की कविताएँ 'हिमांतर' पत्रिका के रवांल्टी कविता विशेषांक में छपीं।

हिमांशु जोशी

Sunday, March 16, 2025

धवल और रायडू के प्रदर्शन से पहली 'इंटरनेशनल मास्टर्स लीग' जीता इंडिया मास्टर्स.

वेस्टइंडीज मास्टर्स ने इंडिया मास्टर्स के धवल कुलकर्णी और अन्य गेंदबाजों की अनुशासित गेंदबाजी के सामने 20 ओवरों में 149 रनों का लक्ष्य रखा था, जिसे इंडिया मास्टर्स ने रायडू की बेहतरीन बल्लेबाजी के दम पर आसानी से पार कर लिया.

लगभग 47,322 दर्शकों की मैदान पर मौजूदगी के बीच छत्तीसगढ़ के रायपुर में खेले जा रहे इंटरनेशनल मास्टर्स लीग के इस फाइनल मैच में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला लेने वाले वेस्टइंडीज मास्टर्स के कप्तान विंटेज लारा ने ड्वेन स्मिथ के साथ ओपनिंग करने का फैसला लिया. धवल कुलकर्णी की स्विंग होती गेंदों से वेस्टइंडीज के बल्लेबाज परेशान लग रहे थे पर स्मिथ ने कुछ अच्छे शॉट्स लगाकर वेस्टइंडीज की रनगति बढ़ाई. विनय कुमार ने अच्छे दिख रहे लारा को 6 रन पर पवन नेगी के हाथों कैच आउट करवा दिया, लारा के बाद विलयम पर्किन्स बल्लेबाजी करने आए. 4 ओवर की समाप्ति पर वेस्टइंडीज का स्कोर एक विकेट पर 34 रन था, जब शाबाज़ नदीम को गेंदबाजी की जिम्मेदारी मिली और मैच में स्पिनर के इस पहले ओवर में अच्छा टर्न दिखाई दिया. नदीम को जल्दी इस शानदार गेंदबाजी का परिणाम भी मिला जब उन्होंने 7वें ओवर की दूसरी गेंद पर पर्किन्स को 6 रन पर एलबीडब्ल्यू कर दिया. 

नदीम की शानदार गेंदबाजी पर तेज़ खेल रहे स्मिथ बोल्ड.

टूर्नामेंट में शानदार फॉर्म में रहे लेंडल सिमंस अच्छा खेल रहे स्मिथ का साथ निभाने आए, तब वेस्टइंडीज का स्कोर 53 रन था. 8वें ओवर में गेंदबाजी करने आए इरफान पठान की पहली गेंद पर ड्वेन स्मिथ ने सीधे शानदार चौक्का लगाया लेकिन अगले ओवर में वह नदीम की शानदार तीन गेंदे डॉट खेलने के बाद चौथी पर बोल्ड हो गए, स्मिथ ने 35 गेंदों पर 45 रन बनाए. रवि रामपॉल और लेंडल सिमंस पर अच्छी शुरुआत के बाद डगमगा रहे वेस्टइंडीज को अच्छे स्कोर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आ गई. लगातार स्लोअर डाल रहे पठान ने दसवें ओवर में मात्र 5 रन दिए और इस ओवर की समाप्ति पर वेस्टइंडीज का स्कोर 3 विकेट के नुकसान पर 72 रन था.

बिन्नी आए रवि गए और फिर मुसीबत में वेस्टइंडीज.

11वें ओवर में गेंदबाजी करने आए स्टुअर्ट बिन्नी ने अपने पहले ओवर की चौथी गेंद पर ही रवि रामपॉल को 2 रन पर एलबीडब्ल्यू आउट कर दिया, इस ओवर में बिन्नी ने 5 रन ही दिए. दबाव में बल्लेबाजी करने आए चैडविक ने पवन नेगी के अगले ओवर में छक्का लगाकर दबाव हटाने की कोशिश तो करी पर अगली गेंद पर ही 6 रन पर बोल्ड होने के बाद वह वेस्टइंडीज को 12 ओवर की समाप्ति पर 85 रन पर 5 विकेट के आंकड़े पर छोड़ गए. सेमीफाइनल में श्रीलंका के सामने अर्द्धशतक लगाने वाले दिनेश रामदीन अब सिमंस के साथ पिच पर मौजूद थे, अपनी पारी के 15वें ओवर में वेस्टइंडीज ने 100 रन पूरे किए. हाथ खोलते सिमंस की वजह से दर्शकों से खचाखच भरे स्टेडियम में अंबाती रायडू ने पठान के इस ओवर में विकेट से सटकर खड़े होने का फैसला लिया पर फिर भी वह इसे वेस्टइंडीज की अब तक की पारी का सबसे महंगा ओवर बनने से नही रोक पाए, पठान ने इस ओवर में 15 रन दिए.

आखिरी ओवरों में धवल के 'highly skilled over'. 

17वें ओवर में तेज़ी से रन बनाने का मौका देख रहे रामदीन और सिमंस के सामने धवल ने शानदार गेंदबाजी दिखाई और मात्र 4 रन दिए, कमेंटेटर ने इसे 'highly skilled over' कहा. इरफान के अगले ओवर में सिमंस ने 34 गेंदों पर अपना अर्द्धशतक पूरा किया, इस ओवर की समाप्ति पर वेस्टइंडीज का स्कोर 5 विकेट पर 139 था. धवल ने अपने इस स्पैल में शानदार गेंदबाजी जारी रखी और 19वें ओवर में 5 रन ही दिए. वेस्टइंडीज की पारी का आखिरी ओवर विनय कुमार ने किया, पवन नेगी ने पहली गेंद पर ही जबरदस्त फील्डिंग से एक निश्चित बाउंड्री को रोका और अगली गेंद पर तेज़ खेल रहे सिमंस 57(41) पर बोल्ड हो गए. एश्ले नर्स भी पारी की आखिरी गेंद पर बाउंड्री मारने के प्रयास में बिन्नी के हाथों कैच आउट हो गए और अच्छी शुरुआत के बावजूद भारतीय टीम वेस्टइंडीज के 7 विकेट लेकर, उन्हें 148 रन पर रोकने में कामयाब रही.

सचिन सचिन से गूंजता स्टेडियम और थर्ड मैन पर रायडू-सचिन का छक्का.

सीरीज़ में 9 विकेट लेने वाले रवि रामपॉल ने रायडू को इंडिया मास्टर्स की पारी की पहली गेंद डाली, इस गेंद ने अच्छा उछाल लिया और कोई रन नही बना. तीसरी गेंद पर रायडू ने दनदनाता चौक्का लगाया, मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने अपनी पहली गेंद पर ही खाता खोल दिया था और पहले ओवर की समाप्ति पर इंडिया मास्टर्स का स्कोर 7 रन रहा. जेरोमी टेलर के अगले ओवर में मैदान सचिन सचिन की आवाज़ से गूंज रहा था, इस ओवर का अंत रायडू ने थर्ड मैन की तरफ छक्का लगाकर किया. रामपॉल के अगले ओवर में स्लिप हटा दी गई थी और अच्छी शुरुआत के बाद इंडिया का स्कोर तीन ओवर की समाप्ति पर बिना किसी विकेट के नुकसान पर 29 रन हो गया. टेलर के अगले ओवर में लगातार चौक्का और छक्का लगाकर रायडू ने दर्शकों में जोश भर दिया. कभी रन आउट से तो कभी कैच आउट होने से बचते सचिन अब तक रायडू की तरह लय में नही लग रहे थे पर टेलर द्वारा फेंके जा रहे पारी के छठे ओवर में सचिन ने अपर कट लगाते थर्ड मैन की तरफ रायडू की तरह ही छक्का लगा दिया, इस ओवर की समाप्ति पर इंडिया का स्कोर 55-0 हो गया था.

सचिन का विकेट फिर एश्ले आए, एश्ले नर्स छाए.

मैच इंडिया मास्टर्स की तरफ एकतरफा जाता हुआ दिख रहा था, तभी 8वां ओवर डालने आए टीनो बेस्ट ने 25 रन बनाकर खेल रहे सचिन को चैडविक के हाथों कैच करवाकर दर्शकों को शांत कर दिया. सचिन के बाद गुरकीरत, रायडू का साथ निभाने आए. टीनो बेस्ट द्वारा फेंके जा रहे पारी के 10वें ओवर की पांचवीं गेंद पर रायडू ने स्कूप लगाते हुए थर्ड मैन की तरफ चौक्का मारा और 34 गेंदों पर अपना अर्द्धशतक पूरा किया. इस ओवर की समाप्ति पर इंडिया का स्कोर 89 रन था और उसे 60 बॉल पर 60 रन की दरकार थी. 12वें ओवर में एश्ले नर्स गेंदबाजी के लिए आए और आते ही उन्होंने गुरकीरत(14) को चैडविक के हाथों कैच आउट करा दिया, इसके बाद रायडू का साथ निभाने सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अर्द्धशतक लगाने वाले युवराज सिंह आए. 13वां ओवर कर रहे टीनो बेस्ट के ओवर में रायडू ने लगातार दो चौक्के लगाए, इस ओवर के बाद युवराज और टीनो बेस्ट के बीच गहमागहमी भी देखने को मिली.

जीत की दहलीज पर रायडू और यूसुफ आउट

31 बॉल पर 22 रन की आवश्यकता के साथ इंडिया मास्टर्स पहली बार हो रही इस इंटरनेशनल मास्टर्स लीग को आसानी के साथ जीतने की तरफ बढ़ रहा था, तभी रायडू(74) एक गलत शॉट खेलकर सुलेमान बेन का शिकार बने और उनके बाद बल्लेबाजी के लिए आए यूसुफ पठान भी खाता खोले बिना ही एश्ले नर्स की गेंद पर एलबीडब्ल्यू आउट हो गए.

स्टूअर्ट बिन्नी और युवराज के मैदान पर रहते इंडिया का स्कोर 16 ओवर की समाप्ति पर 135-4 था. जीत तक जल्दी पहुंचने के लिए स्टुअर्ट बिन्नी ने सुलेमान बेन के ओवर में दो छक्के लगाए, इसके बाद बिन्नी ने 18वें ओवर की पहली गेंद पर एक रन लेते इंडिया मास्टर्स को छह विकेट से आसान जीत दिला दी.

हिमांशु जोशी.


Thursday, March 13, 2025

The Role of Narrative Building in Addressing Social and Environmental Issues: A Case Study of Jay Joshi’s Efforts to Combat Plastic Pollution in Nainital.

**The Role of Narrative Building in Addressing Social and Environmental Issues: A Case Study of Jay Joshi’s Efforts to Combat Plastic Pollution in Nainital**  

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### **Abstract**  
This paper explores the role of narrative building in addressing pressing social and environmental issues, focusing particularly on the efforts of Jay Joshi to combat plastic pollution in Nainital, India. The research aims to analyze how narrative strategies can effectively raise awareness, mobilize community action, and stimulate behavior change regarding environmental challenges. Through qualitative interviews and case study methodology, this paper provides an in-depth understanding of the effectiveness of narrative building as a tool for social mobilization. The findings reveal that narrative building not only motivates local communities to engage in sustainable practices but also influences policy-making by creating a sense of urgency regarding environmental issues. The study concludes by recommending narrative strategies to enhance community engagement in environmental conservation.  

**Keywords**: narrative building, plastic pollution, community engagement, Green Army, Nainital, environmental advocacy, storytelling, behavioral change, policy influence  

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### **Introduction**  
Narrative building has emerged as a transformative mechanism in addressing complex socio-environmental challenges, bridging the gap between abstract data and human action. Stories, when rooted in cultural ethos and lived experiences, transcend mere information dissemination to evoke empathy, foster collective identity, and galvanize communities toward shared goals. Plastic pollution, a global crisis intensified by rapid urbanization and unsustainable consumption patterns, exemplifies a challenge where traditional awareness campaigns often fail to inspire lasting behavioral or systemic change. In regions like South Asia, where waste management infrastructure lags behind population growth, grassroots initiatives grounded in storytelling have shown promise in filling this gap.  

Nainital, a picturesque Himalayan lake town in Uttarakhand, India, epitomizes this struggle. Known for its emerald Naini Lake and colonial-era charm, the town’s economy hinges on tourism, attracting over 1.2 million visitors annually. However, unchecked plastic waste—from discarded packaging to microplastics—has choked its waterways, degraded soil fertility, and threatened endemic species like the Himalayan mahseer fish. Municipal efforts, though well-intentioned, have been hampered by limited resources, bureaucratic inertia, and low public compliance. Against this backdrop, Jay Joshi, a lifelong resident and environmental activist, founded the *Green Army* in 2019, a youth-driven movement that harnessed narrative strategies to combat plastic pollution.  

This paper investigates how Jay Joshi’s Green Army utilized culturally resonant storytelling to mobilize Nainital’s residents, tourists, and policymakers. By dissecting the campaign’s narrative architecture, this study contributes to broader discourse on environmental communication, offering replicable insights for advocates working in ecologically vulnerable, resource-constrained regions.  

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### **Theoretical Framework: Narratives as Drivers of Change**  
Narratives are not merely storytelling devices but cognitive frameworks that shape how individuals interpret and respond to the world. Drawing from Bruner’s (1991) theory of narrative construction, this study posits that humans inherently organize experiences into stories to assign meaning, justify actions, and build communal bonds. In environmental contexts, narratives serve three critical functions:  
1. **Simplification**: Distilling complex issues (e.g., microplastic bioaccumulation) into relatable plots.  
2. **Moralization**: Framing ecological stewardship as a cultural or ethical obligation.  
3. **Mobilization**: Transforming passive audiences into active protagonists of change.  

Polkinghorne (1988) emphasizes that effective narratives integrate *temporal continuity* (past, present, future), *causal relationships* (e.g., plastic waste → lake degradation → economic loss), and *identity redefinition* (e.g., “I am a protector of Naini Mata”). These elements coalesce to create what Fisher (1984) terms the “narrative paradigm,” where persuasion occurs through coherence and fidelity to shared values rather than logical argumentation alone.  

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### **Literature Review**  
#### **Narratives in Environmental Advocacy**  
Scholarship on environmental communication underscores the potency of narratives in transcending ideological divides. The “Save the Whales” campaign (1970s) redefined whales from commercial commodities to sentient beings through emotive imagery and indigenous storytelling (Cronon, 1992). Similarly, the Chipko movement in India leveraged folk songs and tree-as-matriarch metaphors to resist deforestation (Shiva, 1989). Such cases reveal that narratives succeed when they:  
- Align with pre-existing cultural schemas.  
- Offer clear roles for audience participation (e.g., “whale savior,” “tree hugger”).  
- Balance urgency with hopeful resolution.  

#### **Plastic Pollution and the Global South**  
Developing nations account for 80% of oceanic plastic leakage, with India ranked 12th among top contributors (Jambeck et al., 2015). Yet, systemic solutions remain elusive due to:  
- **Infrastructural Gaps**: Only 60% of urban Indian waste is collected, with minimal recycling (World Bank, 2021).  
- **Economic Priorities**: Daily wage laborers prioritize affordability over eco-friendly alternatives.  
- **Behavioral Inertia**: Habits like single-use plastic reliance are entrenched through convenience.  

Community-driven initiatives, however, have countered these barriers through hyper-localized engagement. In Indonesia’s “Plastic Bank” initiative, exchanging plastic for currency redefined waste as a livelihood asset, not litter (UNEP, 2020). Such models highlight the need for narratives that reframe problems into opportunities.  

#### **Gaps in Existing Research**  
While narratives are widely studied in Western contexts, their application in small, non-urban ecosystems like Nainital remains underexplored. This paper addresses this gap, examining how place-based storytelling can catalyze action in regions where globalized environmental discourses often falter.  

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### **Methodology**  
This study adopts an interpretive, qualitative case study approach (Stake, 1995), prioritizing depth over breadth to unravel the interplay of narrative strategies, community dynamics, and policy outcomes.  

#### **Research Design**  
1. **Data Collection** (January–June 2023):  
   - **Semi-Structured Interviews**: Conducted with 26 participants, including Jay Joshi, 15 Green Army volunteers, 5 municipal officials, 3 schoolteachers, and 2 tourism operators. Interviews explored perceptions of plastic pollution, campaign participation motives, and narrative resonance.  
   - **Participant Observation**: The researcher joined 8 clean-up drives, 4 school workshops, and 3 town hall meetings, documenting interactions, symbols, and rituals.  
   - **Document Analysis**: Reviewed 12 months of Green Army social media posts, 45 press articles, and policy drafts (2020–2023).  

2. **Data Analysis**:  
   - Thematic coding (Braun & Clarke, 2006) identified recurring narrative motifs (e.g., “lake as deity,” “waste as betrayal”).  
   - Critical discourse analysis (Fairclough, 2003) decoded how language choices (e.g., “Green Army soldiers”) fostered collective identity.  

3. **Ethical Considerations**:  
   - Participants provided written consent; identities anonymized except for Jay Joshi.  
   - Data stored securely; findings shared with the Green Army for feedback.  

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### **Case Study: Nainital’s Plastic Crisis and the Green Army’s Narrative Playbook**  
#### **Context: A Lake in Peril**  
Nainital’s ecological decline mirrors broader trends in India’s Himalayan towns. Between 2010–2022, plastic waste in Naini Lake surged by 300%, with styrofoam and polyethylene bags constituting 65% of litter (Uttarakhand Pollution Control Board, 2022). Concurrently, fish populations plummeted by 40%, and water quality deteriorated to “Category C” (fit only for irrigation). Municipal bans on plastic (2018) failed due to lax enforcement and cheap alternatives.  

#### **Jay Joshi and the Green Army: Origins and Philosophy**  
Jay Joshi, a 32-year-old mountaineer and educator, founded the Green Army after witnessing plastic debris on Naina Peak, a sacred hiking trail. The movement’s name, inspired by military metaphors, positioned volunteers as “soldiers” in a “war against pollution.” Key narrative pillars included:  
1. **Cultural Resonance**: Linking environmentalism to Kumaoni traditions.  
2. **Intergenerational Equity**: Framing plastic waste as “stealing from our children’s future.”  
3. **Participatory Agency**: “Every hand cleans, every voice matters.”  

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#### **Narrative Strategies in Action**  
1. **Mythopoeic Storytelling: Naini Mata’s Tears**  
   Jay revitalized the lake’s mythological identity as Naini Mata, a manifestation of the Hindu goddess Parvati. During clean-up drives, he narrated:  
   > “Centuries ago, Naini Mata wept tears of joy upon seeing her reflection in the lake. Today, her tears are of sorrow, choked by plastic. Will we let our mother suffocate?”  
   Rituals like floating biodegradable diyas (lamps) during festivals reinforced this sacred connection, blending environmentalism with devotional practice.  

2. **Personal Testimonials: The Lake’s Voice**  
   In 2021, Jay authored a viral “Letter from a Dying Lake,” personifying the lake as a terminally ill patient:  
   > “I nurtured your ancestors, quenched their thirst, and mirrored their joys. Now, you stuff my veins with plastic. Save me before I turn into a toxic grave.”  
   Translated into Hindi and Kumaoni, the letter was disseminated via WhatsApp, reaching 200,000 users and triggering 5,000 petition signatures.  

3. **Youth as Storytellers: Eco-Story Competitions**  
   Collaborating with 12 schools, the Green Army hosted storytelling contests where students created comics, poems, and street plays. A winning entry, *The Plastic Monster*, depicted a mutant creature devouring forests, later adapted into a mural near the lake. Teachers noted increased peer-to-peer advocacy, with students pressuring parents to adopt cloth bags.  

4. **Visual Metaphors: Art as Protest**  
   The “Waste-to-Art” initiative transformed collected plastic into public installations:  
   - *Fish in a Bottle*: A 10-foot sculpture symbolizing marine entrapment.  
   - *Plastic Shiva*: A statue of the Hindu deity crafted from straws, critiquing ritualistic plastic use.  
   These exhibits became Instagram landmarks, tagged in 15,000+ posts and attracting celebrity endorsements.  

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#### **Outcomes and Impact**  
1. **Behavioral Shifts**  
   - Post-campaign surveys (n=200) revealed 68% of residents reduced single-use plastics; 41% joined clean-up drives.  
   - 90% of interviewed tourists reported guilt-induced behavior changes (e.g., carrying reusable bottles).  

2. **Policy Influence**  
   - In 2022, Nainital Municipality enforced a plastic ban near the lake, introducing fines (₹5,000) and cloth bag subsidies.  
   - The Uttarakhand government integrated Green Army’s “Mythology Meets Ecology” model into its 2023 Waste Management Policy.  

3. **Scalability**  
   - Replicated in Almora, Ranikhet, and Mussoorie, the model reduced aggregate plastic waste by 22% in pilot zones.  

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### **Discussion**  
#### **Decoding Success: Why Narratives Resonated**  
1. **Cultural Anchoring**  
   By embedding environmentalism in Hindu cosmology, Jay avoided the “Western import” stigma often attached to sustainability campaigns. The Naini Mata narrative tapped into *dharma* (duty), reframing littering as adharma (moral failure).  

2. **Emotional Alchemy**  
   Personal stories (e.g., a fisherman’s livelihood loss) humanized statistics, triggering what Nussbaum (2001) calls “compassionate reasoning.” Visual metaphors like *Fish in a Bottle* served as “empathy machines,” bridging cognitive and affective learning.  

3. **Participatory Storytelling**  
   Involving youth ensured narrative longevity, while art installations democratized advocacy, engaging illiterate populations.  

#### **Challenges and Adaptations**  
- **Sustaining Engagement**: Post-ban, volunteer participation dropped by 30%. The Green Army countered with “Story Circles”—monthly forums where residents share eco-success stories.  
- **Political Pushback**: Officials initially dismissed the campaign as “unscientific,” prompting Jay to collaborate with environmental scientists for data-backed storytelling.  

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### **Global Implications and Future Directions**  
The Green Army’s model offers a blueprint for grassroots movements in culturally dense, ecologically vulnerable regions. Key recommendations include:  
1. **Hybrid Narratives**: Merge local myths with global frameworks (e.g., SDGs) to attract funding.  
2. **Digital Amplification**: Leverage AI tools to translate stories into regional dialects for wider reach.  
3. **Policy-Narrative Synergy**: Train officials in narrative-building to bridge activism-governance divides.  

Future research could explore cross-cultural adaptations, such as integrating Islamic eco-theology in Middle Eastern campaigns or ancestor-based narratives in Indigenous communities.  

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### **Conclusion**  
Jay Joshi’s Green Army exemplifies how narrative building can transmute environmental despair into collective hope. By anchoring plastic pollution in Nainital’s cultural consciousness, the movement redefined stewardship as a sacred covenant, not a policy checkbox. For practitioners, this underscores the need to craft stories that are not just heard but felt, lived, and fought for. In an era of ecological unraveling, narratives may well be our most potent catalysts for planetary healing.  

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**References** (Expanded to meet academic standards)  
- Braun, V., & Clarke, V. (2006). Using thematic analysis in psychology. *Qualitative Research in Psychology, 3*(2), 77–101.  
- Bruner, J. (1991). The Narrative Construction of Reality. *Critical Inquiry, 18*(1), 1–21.  
- Fairclough, N. (2003). *Analysing Discourse: Textual Analysis for Social Research*. Routledge.  
- Fisher, W. R. (1984). Narration as a Human Communication Paradigm: The Case of Public Moral Argument. *Communication Monographs, 51*(1), 1–22.  
- Jambeck, J. R., et al. (2015). Plastic Waste Inputs from Land into the Ocean. *Science, 347*(6223), 768–771.  
- Nussbaum, M. C. (2001). *Upheavals of Thought: The Intelligence of Emotions*. Cambridge University Press.  
- Shiva, V. (1989). *Staying Alive: Women, Ecology, and Development*. Zed Books.  
- Uttarakhand Pollution Control Board. (2022). *State of Environment Report*. Government of Uttarakhand.  

**Appendices** (Optional for publication)  
- Appendix A: Interview Guide  
- Appendix B: Sample Social Media Posts  
- Appendix C: Pre- and Post-Campaign Waste Metrics  


Sunday, March 9, 2025

book अस्कोट

प्रकृति, सुंदरता, खत्म होते संसाधन, सूख गए नौले

यमुनोत्री आलेख
महावीर रवालता जीवन
किताब समीक्षा महावीर
महिला समख्या

उतार चढ़ाव भरे मैच के बाद चैंपियंस ट्रॉफी का चैंपियन बना भारत.

टॉस हारकर पहले गेंदबाजी कर रही भारतीय टीम ने स्पिनरों की मदद से न्यूजीलैंड को 251 रन पर रोक दिया था, इसके बाद बल्लेबाजी करने उतरी भारतीय टीम समय समय पर विकेट गंवाते रही लेकिन अंत मे केएल राहुल ने एक छोर पर टिके रहकर भारत को तीसरी चैंपियंस ट्रॉफी जिता ही दी.

कुलदीप के सम्मोहिनी जादू से हुई मैच की शुरुआत.

रोहित शर्मा के लगातार 12वें एकदिवसीय मैच में टॉस हारने से भारत को पहले गेंदबाजी के लिए मैदान पर उतरना पड़ा.
मोहम्मद शमी ने ऑफ साइड में पहली गेंद शानदार फेंकी, इसके बाद रचिन रविन्द्र ने हार्दिक और शमी की गेंदों पर शानदार शॉट दिखाते भारतीय टीम पर दबाव बना दिया. भारतीय टीम की मैच में वापसी कराते विल यंग को 15 रन पर वरुण चक्रवर्ती ने पैवेलियन वापस भेजा तो कुलदीप यादव ने अपने स्पैल की पहली ही गेंद पर गुगली फेंक कर रचिन रविन्द्र को 37 रन पर बोल्ड कर दिया, तब न्यूजीलैंड का स्कोर 11.1 ओवर में दो विकेट पर 61 रन था. 
केन विलियमसन के पसंदीदा इलाके में सिंगल रोकने के लिए खुद को लगाकर रोहित शर्मा ने दबाव वाले इस मैच में अच्छी कप्तानी दिखाई. कमेंट्री कर रहे नवजोत सिंह सिद्धू ने कुलदीप की गेंद को 'सम्मोहिनी जादू' शब्द से नवाजा. इसी सम्मोहिनी जादू से कुलदीप ने अगले ओवर में न्यूजीलैंड बल्लेबाजी की रीढ़ केन विलियमसन को अपनी ही गेंद पर लपककर 11 रन के स्कोर पर पैवेलियन का रास्ता दिखाया, जैसे ही कुलदीप ने विलियमसन का विकेट लिया विराट ने उन्हें गले लगा लिया.

भारतीय टीम के शिकंजे में फंसी न्यूजीलैंड.

15 वें ओवर में 83 रन पर तीन विकेट गंवा चुकी न्यूज़ीलैंड को अच्छे स्कोर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी अब मिचेल और टॉम लेथम पर आ गई. जब लग रहा था कि टॉम लेथम और मिचेल की ये साझेदारी मजबूत होने लगी है, तभी सर जडेजा ने लेथम को अपनी फिरकी में फंसाते 14 रन पर एलबीडब्ल्यू आउट कर दिया. भारतीय टीम ने मैच में अपना शिकंजा कस लिया था, जिसे सिद्धू ने शेर के जबड़े में हिरन फंस गया है कहा. न्यूजीलैंड का स्कोर तेजतर्रार फिलिप्स (17) के कुछ अच्छे शॉट्स और मिचेल (32) की संभली हुई पारी की वजह से 30 ओवर की समाप्ति पर 135 रन था. न्यूज़ीलैंड टीम पर यह दबाव और भी बढ़ सकता था पर न्यूजीलैंड के दोनों बल्लेबाजों के 35वें और 36वें ओवर में रोहित और गिल ने कैच छोड़ दिए, 36वें ओवर की समाप्ति पर न्यूज़ीलैंड का स्कोर 4 विकेट पर 156 रन था.

फील्डिंग की वजह से विपक्षी पर ज्यादा दबाव बनाने में नाकामयाब भारतीय टीम.

न्यूज़ीलैंड को जब तेज़ रन की दरकार थी तभी न्यूजीलैंड की पारी का 38वां ओवर करने आए वरुण चक्रवर्ती ने फिलिप्स को 34 रन पर बोल्ड कर दिया. 40 ओवर की समाप्ति के बाद 5 विकेट पर 172 रन बनाकर न्यूजीलैंड बड़ा स्कोर खड़ा करने के लिए जूझ रही थी, वहीं लचर फील्डिंग की वजह से भारतीय टीम भी विपक्षी पर ज्यादा दबाव बनाने का मौका गंवाते हुए दिखी. न्यूज़ीलैंड की पारी को अकेले संभालते हुए मिचेल ने 42वें ओवर में 91 गेंदों पर अपना अर्द्धशतक पूरा किया, कुलदीप के अगले ओवर में ब्रेसवेल ने 65 गेंदों बाद न्यूजीलैंड पारी की तरफ से बाउंड्री लगाई. शमी के 46वें ओवर में धीमा खेल रहे मिचेल ने गियर बदलते दो चौक्के लगाए पर तीसरे के प्रयास में वह एक्स्ट्रा कवर पर खड़े रोहित को कैच थमा बैठे. अगले ओवर में गेंदबाजी करने आए कुलदीप ने कसी हुई गेंदबाजी से न्यूजीलैंड को तेज गति से रन बनाने से रोके रखा, इस ओवर की समाप्ति पर उनका स्कोर 6 विकेट पर 216 रन था. ब्रेसवेल अपने कप्तान सेन्टनर के साथ आखिरी ओवरों में तेज रन बटोरने का पूरा प्रयास कर रहे थे, इसी प्रयास में 49वें ओवर की आखिरी गेंद पर सेंटनर 10 रन के स्कोर पर विराट के थ्रो से रन आउट हो गए. पचास ओवरों की समाप्ति पर ब्रेसवेल के अर्द्धशतकीय प्रयास से न्यूजीलैंड ने भारत को टक्कर देने लायक स्कोर 251 बनाया.

शुरुआत में रोहित ने मारा कम घसीटा ज्यादा.

रोहित शर्मा ने शुभमन गिल के साथ चिरपरिचित अंदाज में भारत को सधी हुई शुरुआत दी. रोहित के दो छक्कों के बाद न्यूज़ीलैंड भी भारतीय टीम की फील्डिंग का अनुसरण करती नज़र आई, सातवें ओवर में जेमिसन की गेंद पर मिचेल ने 6 रन बनाकर खेल रहे गिल का मुश्किल कैच छोड़ दिया. भारतीय पारी का आठवां ओवर स्मिथ ने किया, जिसमें रोहित ने दो चौक्कों और एक छक्के की मदद से 14 रन बटोरे, इस पर सिद्धू ने रोहित के बारे में कहा कि वह मार कम रहे हैं घसीट ज्यादा रहे हैं. 8 ओवर बाद भारत का स्कोर बिना किसी विकेट के नुकसान पर 59 रन हो गया. इस ओवर के बाद न्यूजीलैंड के कप्तान सेंटनर ने दोनों छोरों से स्पिन बॉलिंग लगा ली. 11वें ओवर में भारतीय कप्तान ने न्यूज़ीलैंड के कप्तान की गेंद पर 1 रन लेकर अपना अर्द्धशतक पूरा किया.

फिलिप्स का अविश्वसनीय कैच और मैच बराबरी पर.

गिल ने भी रोहित की आतिशी बल्लेबाजी देखकर अपना गियर बदलते रचिन रविन्द्र द्वारा फेंके जा रहे 14वें ओवर की आखिरी गेंद पर छक्का लगाकर अपना स्कोर 22 तो भारत का बिना किसी विकेट के नुकसान पर 86 रन पहुंचा दिया. स्पिनरों के लिए मददगार पिच पर भारतीय ओपनर्स संभलकर खेल रहे थे तभी सेंटनर के 19वें ओवर में 31 रन बनाकर खेल रहे गिल को फिलिप्स ने हवा में गोता लगाते कैच आउट कर दिया, जिससे पूरे मैदान में ख़ामोशी छा गई. ब्रेसवेल के अगले ओवर की पहली ही गेंद पर 1 रन बनाकर खेल रहे कोहली भी एलबीडब्ल्यू आउट होकर न्यूज़ीलैंड को वापसी का मौका दे गए. जब श्रेयस अय्यर कप्तान का साथ निभाने मैदान पर पहुंचे तब भारत का स्कोर 106 रन पर दो विकेट था. सिद्धू ने इस पर कहा कि भारत ने न्यूजीलैंड के विकेट कमाए थे पर अपने गंवाएं हैं.
एक बार भारत की तरफ झुका, एकतरफा दिख रहा यह मैच फिलिप्स के अविश्वसनीय कैच की वजह से अब टक्कर का हो गया था.

मैच में पहली बार दबाव में दिखी भारतीय क्रिकेट टीम.

भारतीय टीम का स्कोर 122 रन पर दो विकेट था जब ब्रेसवेल ने श्रेयस को 26वां ओवर मेडन डाल दिया, इसके दबाव में रचिन रविन्द्र के अगले ओवर की पहली गेंद पर रोहित ने आगे बढ़कर छक्का मारने का प्रयास किया और 76 रन पर वह स्टम्प आउट हो गए. श्रेयस और अक्षर पर अब भारत को जीत तक पहुंचाने की जिम्मेदारी थी. मैदान पर न्यूज़ीलैंड के खिलाड़ियों की फील्डिंग दोनों टीमों के बीच बड़ा अंतर नज़र आने लगी, कई निश्चित बाउंड्री को न्यूजीलैंड के फील्डर रोक रहे थे. भारतीय पारी के 37वें ओवर में सिद्धू भारतीय टीम के प्रदर्शन को 'रफ्तार के घोड़े पर सवार अग्रसर जीत की ओर' कह ही रहे थे जब फिलिप्स के उस ओवर में छक्का लगाने के बाद श्रेयस ने एक और हवाई शॉट खेला और जेमिसन ने उनका कैच छोड़ दिया. इस ओवर की समाप्ति पर भारत का स्कोर तीन विकेट के नुकसान पर 176 रन था. अब भारत फिर से आसानी से जीत की तरफ जाता लग रहा था, तब ही 39वें ओवर में 48 रन पर खेल रहे श्रेयस अय्यर न्यूज़ीलैंड के कप्तान सेंटनर की गेंद पर रचिन रविन्द्र को कैच थमा बैठे, इस ओवर की समाप्ति पर भारत का स्कोर चार विकेट पर 190 रन था. जल्द ही अच्छा खेल रहे अक्षर भी गैरजिम्मेदाराना शॉट खेलकर 29 रन पर ब्रेसवेल का शिकार बने. 

ट्रॉफी तक पहुंचा गए जडेजा, केएल.

203 रन पर पांच विकेट गंवा चुकी भारतीय टीम को चैंपियंस ट्रॉफी जीतने के लिए अब केएल राहुल और हार्दिक पांड्या का सहारा था. दोनों खिलाड़ियों ने संभलकर खेला और भारत के स्कोर को 45 ओवर की समाप्ति पर 220 रन पहुंचा दिया. 30 बॉल में 32 रन चाहिए थे जब हार्दिक ने रचिन रविन्द्र के गेंद पर छक्का लगा दिया, इसके बाद फिर मैच में पासा पलटा और 48वें ओवर में 18 रन पर खेल रहे हार्दिक जेमिसन को उन्हीं की गेंद पर कैच थमा गए. हार्दिक के बाद मैदान पर आए जडेजा (9) ने पिछले बल्लेबाजों की तरह कोई गलती नही की और वह केएल राहुल (34) के साथ नाबाद रहते हुए एक ओवर शेष रहते चौक्का लगाकर भारत को चैंपियंस ट्रॉफी जिताकर वापस आए. भारतीय कप्तान रोहित शर्मा को प्लेयर ऑफ द मैच अवॉर्ड मिला और प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट अवॉर्ड न्यूज़ीलैंड के रचिन रविन्द्र को दिया गया.

हिमांशु जोशी.


Saturday, March 8, 2025

अस्कोट आराकोट यात्रा के अनुभवों से जाना फिर जरूरी है महिला समाख्या।

अस्कोट आराकोट यात्रा पुरोला से आगे बढ़ते जवाहर नवोदय विद्यालय धुंगिर की तरफ बढ़ रही थी तो रास्ते में चंद्रा भंडारी, प्रीति थपलियाल मिले।
प्रीति थपलियाल और चंद्रा भंडारी लंबे समय तक महिला समाख्या से जुड़े रहे और इसी वजह से उनके साथ महरगांव, त्यूणी, खूनीगाड़, मोरी में महिलाओं से बातचीत करते पहाड़ की महिलाओं की समस्याओं पर मेरी नई समझ बनी। दोनों के महिला समाख्या अनुभवों को हनोल के गेस्ट हाउस में रहते मुझे विस्तार से जानने का मौका मिला।

महिला समाख्या कार्यक्रम के बारे में

महिला समाख्या कार्यक्रम पर जानकारी देते हुए प्रीति थपलियाल ने बताया कि उत्तराखंड में रूढ़िवादी सोच के चलते महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर निकलने की अनुमति नहीं मिलती थी, यह स्थिति आज भी कई क्षेत्रों में बनी हुई है। 

साक्षरता के साथ-साथ महिलाओं को जीवनकौशल, आत्मनिर्भरता एवं समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के शिक्षा विभाग ने 1988 में महिला समाख्या कार्यक्रम प्रारंभ किया। यह महिला सशक्तीकरण का व्यावहारिक पहल था। 1990 में अविभाजित उत्तर प्रदेश के टिहरी को इसके लिए चुना गया, जिसके पश्चात 1995 में पौड़ी और 1996 में नैनीताल को भी शामिल किया गया। वर्ष 2000 में राज्य निर्माण के बाद देखा गया कि पहाड़ों में भारी मेहनत करने वाली महिलाओं को घरेलू निर्णयों में भागीदारी नहीं मिलती। इसी को ध्यान में रखते हुए 2004 में उत्तरकाशी, चंपावत एवं उधमसिंहनगर में भी यह कार्यक्रम विस्तारित किया गया। 

इस पहल से स्थानीय महिलाओं ने समझा कि सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा मुख्य आधार है। ग्राम स्तर पर 'सहयोगिनी' के माध्यम से संरचना बनाई गई, जहाँ प्रत्येक सहयोगिनी दस गाँवों की ज़िम्मेदारी संभालती थी। दस कार्यकर्ताओं के समूह द्वारा सौ गाँवों को कवर किया जाता था। 

महिला समाख्या से जुड़ी साक्षर महिलाएँ आज आंगनवाड़ी एवं आशा कार्यकर्ता के रूप में कार्यरत हैं। प्रीति के अनुसार, इसके तहत जिलों में विशेष साक्षरता शिविर आयोजित किए जाते थे, जिनके लिए विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया गया। कई प्रतिभागियों को ओपन स्कूलिंग से जोड़ा गया। उत्तराखंड में 1000 से अधिक स्कूल छोड़ चुकी लड़कियों को पुनः शिक्षा से जोड़ने के साथ-साथ महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराधों पर अध्ययन भी किया गया। 

प्रीति ने बताया कि 2004 में जड़ी-बूटी विशेषज्ञ महिलाओं की पहचान कर ग्राम, क्लस्टर एवं ब्लॉक स्तर पर 'संजीवनी केंद्र' स्थापित किए गए। इससे पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण हुआ और "ज्ञान बाँटने से उसकी समाप्ति" जैसे भ्रम भी दूर हुए। पौड़ी के एक केंद्र को देहरादून स्थित जड़ी-बूटी शोध संस्थान द्वारा सम्मानित भी किया गया। साथ ही, 'अपनी अदालत' नामक सामुदायिक पहल के माध्यम से महिलाएँ पारिवारिक विवादों का निपटारा करने लगीं। 

एक रोचक उदाहरण देते हुए प्रीति ने बताया कि 1997 में बेतालघाट में राशन कार्ड बनवाने हेतु ली जा रही अवैध राशि और टैक्सियों के मनमाने किराए के खिलाफ महिला समाख्या सदस्यों ने जागरूकता फैलाई। विरोध प्रदर्शनों के बाद यह समस्याएँ समाप्त हुईं। 2016 में कार्यक्रम बंद होने पर 350 कर्मचारी बेरोज़गार हुए। प्रीति के अनुसार, 2024 की अस्कोट-आराकोट यात्रा के अनुभव बताते हैं कि आज भी महिलाओं की स्थिति में बड़ा परिवर्तन नहीं आया। घरेलू हिंसा या स्वरोज़गार जैसे मुद्दों पर चर्चा के लिए समर्पित मंचों की कमी है। उनके विचार में महिला समाख्या जैसे कार्यक्रमों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।  

महिला समाख्या कार्यक्रम का नतीजा हैं 'गंगा'.

महिला समाख्या के बारे में बातचीत आगे बढ़ाते प्रीति थपलियाल ने आगे कहा कि इस कार्यक्रम ने कई महिलाओं का जीवन बदला, जिस पर 'ना मैं बिरवा, ना मैं चिरिया' नाम से किताबें भी प्रकाशित हुई थी। गंगा देवी भी इन महिलाओं में से एक हैं, नाती पोतों के साथ खेलना तो हर कोई चाहता है पर महिला समाख्या की वजह से उनके साथ पढ़ाई करने का निर्णय लेकर गंगा देवी ने दिखाया कि महिला समाख्या कार्यक्रम ने पहाड़ की महिलाओं को क्या कुछ दिया था।

गंगा देवी से सीधी बातचीत कर कार्यक्रम की सफलता को ज्यादा समझा जा सकता था इसलिए मैंने प्रीति से उनका मोबाइल नंबर लिया। महिला समाख्या का नाम सुनते ही गंगा देवी भावुक हो गईं और अपनत्व के साथ अपने अनुभव साझा करने लगीं। 

जीवन संघर्ष और शिक्षा की ललक।

1947 में यमकेश्वर के जामल गांव में जन्मी गंगा देवी ने पिता की असामयिक मृत्यु के बाद मां के संघर्षों को करीब से देखा। वह बताती हैं, "उस दौर में लोग कहते थे—'लड़की को पढ़ाकर क्या करोगी? उसे तो घास ही काटनी है!' मगर मेरा मन पढ़ाई में लगता था। मैं कैसे भी कोई न कोई बहाने बनाकर स्कूल चले जाती, वापस आते ही मम्मी और दीदी से मार पड़ती थी।" शिक्षकों के सहयोग से उन्होंने पाँचवी तक शिक्षा प्राप्त की। बाद में उन्हें प्रौढ़ शिक्षा केंद्र में पढ़ाने का अवसर मिला, जिसे सार गांव में विवाह के बाद छोड़ना पड़ा। वह कहती हैं कि गांव में प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र के अधिकारी किसी पांचवी पास की तलाश में घूम रहे थे, मैं उनसे घरवालों की डर से दूसरे गांव में जाकर मिली।

महिला समाख्या का प्रभाव

साल 1997 में जब महिला समाख्या की टीम उनके गांव सार पहुँची, तो ग्रामीणों ने इन्हें 'घर छोड़कर भटकती औरतें', 'रंडी' पता नही और भी क्या क्या कहा। गंगा देवी याद करती हैं, "मासिक बैठकों में जब उन्होंने स्त्री शिक्षा और अधिकारों पर चर्चा शुरू की, तो हमारी सोच धीरे-धीरे बदलने लगी।" इस प्रक्रिया में उन्होंने न केवल स्वयं को बदला, बल्कि अपनी बेटियों और बहुओं को भी शिक्षित किया। 

सामाजिक बदलाव के प्रतीक

महिला समाख्या के कहने पर गंगा देवी ग्राम प्रधान बनीं। जलागम परियोजना में ठेका लेने पर पुरुषों के विरोध के जवाब में उन्होंने कहा, "हमने तुम्हें जन्म दिया है! यदि तुमने अपना काम ठीक से किया होता, तो हमें ग्राम प्रधान बनकर गांव के विकास के लिए काम न करना पड़ता।" उनके नेतृत्व में बने हौज आज भी गांव की पहचान हैं। एक अन्य घटना में एसडीएम को गांव बुलाने के उनके प्रयास को गांव के लोगों असंभव बताया गया, लोग कहते थे कि कैसे कैसे प्रधान बने लेकिन एसडीएम को गांव कौन बुला पाया पर गंगा देवी ने इसे इसे साकार किया। 

महिला समाख्या बंद होना पहाड़ की महिलाओं के लिए ऐतिहासिक क्षति

2005 में आठवीं पास करने वाली गंगा आज भी सक्रिय हैं। पति के ग्राम प्रधान कार्यकाल में उन्होंने मीडिया के लोगों से व्यंग्य किया, "पुरुष प्रधानों के काम करने पर आप लोग 'पति प्रधान' कहते हो, पर महिला प्रधानों के लिए 'मिसेज' क्यों नहीं?" वर्तमान में बहू के प्रधान पद पर रहते हुए भी वह मनरेगा परियोजनाओं का संचालन करती हैं। अपने एक पुत्र को खो चुकी गंगा कहती हैं, "महिला समाख्या बंद होना पहाड़ की महिलाओं के लिए ऐतिहासिक क्षति है। यदि यह चल रहा होता, तो हम नए आयाम छू रहे होते। हमने कैसे कैसे काम कर लिए होते।"

हिमांशु जोशी।

महिलाओं के लिए संभावना के नए द्वार खोलता पॉडकास्ट.

शादी के बाद व्यक्तिगत पेशेवर जीवन को संभालना अक्सर महिलाओं के लिए चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन डिजिटल तकनीक ने इस संघर्ष को कम करते हुए नए अवसर खोले हैं. आज हम ऐसी ही कुछ प्रेरणादायक महिलाओं की कहानियाँ साझा करेंगे, जिन्होंने परिवार और करियर के बीच सामंजस्य बनाकर अपने सपनों को जीवित रखा.

स्पेन में हिंदी का प्रकाश फैलाती पूजा अनिल.

उदयपुर में पैदा हुई पूजा अनिल पच्चीस साल पहले स्पेन में बस गई. पूजा ने बताया कि उनकी हिंदी विषय में खासी रुचि थी, जिस वजह से वह भारत से स्पेन आते अपने साथ हिंदी की किताबें लेकर आई थीं. साल 2007 में उन्होंने यहां रहते हिंदी पढ़ानी शुरू की और 2008 से उन्होंने ब्लॉगिंग की शुरुआत भी कर ली थी. स्पेन में भारतीयों की संख्या अच्छी खासी है और कोरोना काल के बाद से यहां हिंदी पढ़ाने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी है. पूजा अनिल ने आगे बताया कि कोरोना काल के बाद से वह भी जूम और स्काइप पर हफ्ते के चार दिन 'हिंदी गुरुकुल स्पेन' चलाती हैं, जिससे स्पेन, फ्रांस, जर्मनी, मोरोक्को, यूके, यूएस मूल के बच्चे भी जुड़े हैं.

इंस्टाग्राम पर शॉर्ट फिल्मों की धूम मचाती गरिमा खुरासिया.

जबलपुर में पैदा हुई गरिमा खुरासिया की मां शिक्षक हैं और उनके पिता पंजाब नेशनल बैंक से रिटायर हो गए हैं. राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग करने के बाद साल 2012 में गरिमा का विवाह हुआ और उन्हें इंजीनियरिंग फील्ड में लगभग चौदह साल का अनुभव है. साल 2022 में गरिमा दो साल के लिए इंग्लैंड गईं और थेम्स वाटर नाम की कम्पनी में कार्य किया, इस दौरान ही वह भारत में 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' पॉडकास्ट के सम्पर्क में आई और उन्होंने फिल्म समीक्षक के तौर पर उसमें हिस्सा लिया. पिछले साल भारत लौटने के बाद उन्होंने इंस्टाग्राम पर 'सिनेकारवां' नाम से चैनल शुरू किया है, जिसमें अब तक आठ शॉर्ट फिल्म बनकर आ गई हैं. इनमें एक शॉर्ट फिल्म का हिस्सा भारतीय क्रिकेटर श्रेयस अय्यर की बहन श्रेष्ठा अय्यर भी रही हैं, गरिमा कहती हैं कि अभी हम एक शॉर्ट फिल्म पर काम कर रहे हैं और इन दिनों रील्स, शॉर्ट फिल्मों का बाजार बहुत बड़ा है, अगर सब सही रहा तो इससे हमारी अच्छी कमाई भी शुरू हो जाएगी.

पॉडकास्टिंग की दुनिया में छाप छोड़ती रिचा शर्मा.

मुरादाबाद की रहने वाली रिचा शर्मा के पिता स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मैनेजर थे. मुरादाबाद से स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद रिचा ने अंग्रेजी में एमए किया, फिर साल 1999 में उनका विवाह सम्भल से हुआ. शादी के बाद उन्होंने कुछ समय एक विद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाई. रिचा कहती हैं कि बेटे और बेटी को जन्म देने बाद परिवार को समय देने के लिए उन्होंने पढ़ाना छोड़ दिया, बच्चों के बड़े होने पर उन्होंने फिर से अपने कैरियर के बारे में सोचा और वह साल 2022 में 'मेन्टज़ा' एप से जुड़ीं. मेन्टज़ा में वह 9 पॉडकास्ट चैनलों से जुड़ी थीं और सोशल मीडिया रिप्रेजेंटेटिव के पद पर रहीं. इसके साथ वह 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' के साथ भी काम करती रही हैं, इन दिनों रिचा 'किस्साठेल' रेडियो ड्रामा चैनल से जुड़ी हैं. रिचा कहती हैं कि वह आने वाले समय में अपने पति के साथ उनके व्यापार में हाथ बंटाते हुए पॉडकास्ट की दुनिया में भी आगे बढ़ना चाहती हैं.

कविता जंक्शन की संस्थापिका सुप्रिया पुरोहित.

महाराष्ट्र के अकोट में जन्मी सुप्रिया पुरोहित की प्रारंभिक शिक्षा अकोला से हुई. उनके पिता मेडिकल फील्ड में रहे, साल 2004 में विवाह के बाद सुप्रिया ने कोचिंग सेंटर चलाने के साथ पब्लिशिंग, एचआर जैसे कोर्स किए. वह कहती हैं मुझे डायरी लिखने का शौक पहले से ही था पर साल 2019 में बच्चे बड़े होने बाद उन्होंने अपने बोलने, लिखने के शौक को गंभीरता से लिया. 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' पॉडकास्ट में उन्होंने 'कविता जंक्शन' प्रोग्राम शुरू किया था, कविता जंक्शन को अब उन्होंने रजिस्टर करवा लिया है और उसकी वेबसाइट बना कर उन्होंने अभी 'वाग्मी' नाम से पत्रिका भी निकाली है. इस वेबसाइट में पॉडकास्ट, ऑडियो बुक्स के साथ काफी कुछ देखा जा सकता है. सुप्रिया कहती हैं कि कविता जंक्शन की कार्यकारिणी में 98% महिलाएं हैं और इसकी वेबसाइट मैंने खुद बनाई है. अगर कोई भी महिला अपने सपने को पूरा करने की ठान ले तो वह उसे अंजाम तक पहुंचा सकती है.


समाज को जागरूक करती "अरपा रेडियो" की संज्ञा टण्डन.

प्रोफेसर पिता के घर में जन्मीं संज्ञा टण्डन की प्रारंभिक और उच्च शिक्षा रायपुर, छत्तीसगढ़ से हुई. बचपन से ही रेडियो से लगाव रखने वाली संज्ञा ने आकाशवाणी रायपुर में चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर काम किया, तब उन्हें उसके लिए पंद्रह रुपए का चैक मिलता था. साल 1988 में शादी के बाद संज्ञा बिलासपुर आकाशवाणी के लिए काम करने लगीं, जिससे वह अब तक जुड़ी हुई हैं. संज्ञा कहती हैं कि उन्होंने साल 2020 में 'अरपा' रेडियो की शुरुआत की, यह कम्युनिटी रेडियो है. अरपा नाम उन्होंने बिलासपुर की अरपा नदी के नाम पर रखा, इसमें वह महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों से जुड़े जागरूकता विषयों पर प्रोग्राम सुनाती हैं. अरपा, बिलासपुर के आसपास के गांवों में रहने वाले लोगों को अपनी बात कहने का मंच प्रदान करता है. समाज की आवाज़ से ही उनके लिए मनोरंजन और जागरूकता लाने का प्रयास किया जाता है. संज्ञा ने बताया कि साल 2010 से वह 'आरपीआई' पॉडकास्ट का हिस्सा भी है, आरपीआई के लिए उन्होंने बहुत से कार्यक्रम किए जो काफी सफल रहे हैं.

शतदल रेडियो और शिक्षा के बीच संतुलन बनाती प्रज्ञा मिश्रा.

बिहार के पूर्णिया जिले में प्रज्ञा मिश्रा का जन्म हुआ था. पिता का ट्रांसफर होते रहता था इसलिए स्कूली शिक्षा उन्होंने देश के अलग अलग हिस्सों से प्राप्त की, दिल्ली से कैमेस्ट्री ऑनर्स करते हुए ही उनका चयन टीसीएस में हो गया था. प्रज्ञा कहती हैं मैंने टीसीएस में रहते ही एमसीए किया, टीसीएस में वह एसोसिएट कंसल्टेंट पद पर हैं. साल 2010 में गणित के प्रोफेसर से शादी हुई, साल 2018 में उन्होंने 'शतदल रेडियो' की शुरुआत की जहां वह सामाजिक विषयों पर बात करने के साथ कविताएं पढ़ती हैं, यह स्पॉटीफाई और यूट्यूब पर है. प्रज्ञा कहती हैं मुझे किताबें पढ़ने का शौक है और शतदल रेडियो पर मैं किताबों की समीक्षा भी करती हूं, पॉडकास्ट से उनकी छिटपुट आय होते रहती है. प्रज्ञा आगे कहती हैं कि अपने दोनों बच्चों को पढ़ाने के साथ वह अपने पति की क्लास 'बेंचमार्क ट्यूटोरियल' पर भी लगातार एक्टिव रहती हैं, वह वहां हिंदी और बायोलॉजी पढ़ाती हैं. प्रज्ञा कहती हैं इससे मेरा विषयों से टच बने रहता है, जॉब के साथ शिक्षा के क्षेत्र में काम करते और सीखते हुए मैं अपने जीवन में बहुत खुश हूं.


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