Saturday, March 29, 2025

पहाड़ी संस्कृति की धड़कन बनकर उभरी 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम'

अस्कोट आराकोट यात्रियों का महरगांव में स्वागत करते महावीर रवांल्टा सड़क पर ही आ गए थे. यात्रा के गीत के साथ हम लोग उनके घर की तरफ बढ़े जहां महावीर ने यात्रियों के लिए बच्चों के नाटक सहित कई अन्य कार्यक्रमों को दिखाने की तैयारी की थी. उनके घर पहुंचते ही मौसम खराब हो गया और नाटक दिखाने के लिए तैयार खड़े बच्चों के चेहरों पर निराशा छा गई, हल्की बारिश की बीच अन्य कार्यक्रमों नही हो पाए लेकिन महावीर रवांल्टा ने बिना समय गंवाए अपनी पुस्तक ‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम’ (समय साक्ष्य प्रकाशन) का विमोचन हम यात्रियों से करवा लिया, जिसके बाद तेज होती बारिश के बीच हम सब दौड़ते हुए उनके घर के अंदर चले गए . चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम किताब रवाईं अंचल की 46 लोककथाओं को सहेजकर हिंदी पट्टी के पाठकों तक पहुंचाने का सराहनीय प्रयास है. इन कहानियों के माध्यम से न सिर्फ पहाड़ के मनुष्य-प्रकृति के अटूट रिश्ते उजागर होते हैं, बल्कि पहाड़ी हीर-रांझा ‘गुजु मलारी’ जैसी अनकही प्रेमगाथा भी सामने आती है, जो लोकसाहित्य के गुमनाम पन्नों में दबी थीं. अगर महावीर ने इन्हें हिंदी में न पिरोया होता, तो शायद ये कहानियां हमेशा के लिए पहाड़ों की गहरी खाईयों में कहीं खो जाती.  

*मनुष्य और प्रकृति का सदियों पुराना रिश्ता: लोककथाओं का मूल स्वर*

पुस्तक की पहली कहानी ‘सात रानियाँ और राजकुमार’ से ही साफ झलकता है कि पहाड़ की माटी में जानवरों के साथ इंसान का नाता कितना गहरा रहा है. यहां बकरियां, गायें या यहां तक कि जंगली जानवर भी परिवार के सदस्य जैसे हैं. ‘सौतेली मां’ कथा का वह दृश्य याद कीजिए, जहां रूपा अपना दुःख लेकर ‘खाडू’ (बैल) के पास जाती है, और वह उसे सांत्वना देते हुए कहता है – “रोया मत कर… मेरे सींगों पर डंडे से मारा कर, जो चाहेगी वह हो जाएगा.” क्या आज के युग में ऐसी आत्मीयता की कल्पना भी की जा सकती है. ‘आदमी की बुद्धिमत्ता’ कहानी सियार और इंसान के बीच मामा भांजे का रिश्ता बना देती हैं. ये कथाएं साबित करती हैं कि पहाड़ का जीवन प्रकृति के बिना अधूरा है.  

*नैतिकता का पाठ: जीवन की सीख से भरपूर*

इस संकलन की खूबसूरती यह है कि यह केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि जीवन के गहरे सबक भी देता है. ‘अकड़’ नामक कहानी मात्र बारह पंक्तियों में पति-पत्नी के रिश्ते की मनोवैज्ञानिक पड़ताल कर देती है. वहीं, ‘आचरण’ कथा में परिवार के भीतर सम्मान और व्यवहार की बारीकियां उकेरी गई हैं. एक दिलचस्प उदाहरण देखिए – “कुत्ते के आचरण वाले बेटे-बहू के साथ हिरण जैसे कोमल स्वभाव वाली बुढ़िया का तालमेल कैसे बैठता.” ऐसी पंक्तियाँ पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि आधुनिकता की दौड़ में हमने बुजुर्गों के साथ अपने व्यवहार को कितना बदल दिया है.  

*देवत्व और विश्वास: लोककथाओं की आध्यात्मिक छाया*

पहाड़ की लोककथाएं केवल मनुष्य तक सीमित नहीं, बल्कि देवताओं के प्रति अगाध श्रद्धा से भी ओत-प्रोत हैं. ‘श्रीपुरी ढोल’ कथा का नायक ‘बागा’ जब राजा से कहता है – “महाराज दाहिना हाथ तो मैं केवल अपने ईष्ट देव महासू को ही प्रणाम करता हूँ.” तो लगता है मानो पहाड़ी संस्कृति में देवत्व और वीरता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. ये कथाएं न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति आस्था को भी गहरा करती हैं.  

*प्रेम की अमर दास्तान: गुजु मलारी, पहाड़ी हीर-रांझा* 

अगर आपको लगता है कि प्रेम की त्रासदी केवल पंजाब के हीर-रांझा या राजस्थान के ढोला-मारू तक सीमित है, तो ‘गुजु मलारी’ की कहानी आपको हैरान कर देगी. एक गढ़वाली चरवाहे और उसकी बचपन में ब्याही गई प्रेमिका की यह दास्तान इतनी मार्मिक है कि पढ़ते हुए आंखे नम हो जाती हैं. पिता की जिद और प्रेम के बीच फंसी मलारी की मौत की कहानी सुनकर लगता है, मानो पहाड़ की हर चट्टान इन अधूरे प्रेमियों की आवाज समेटे हुए है. महावीर रवांल्टा ने ऐसी कहानियों को हिंदी में अनूदित करके उत्तराखंड के साहित्यिक मानचित्र पर नए नाम जोड़ दिए हैं.  

*नामों के पीछे की वजह सामने लाती लोककथाएं* 

पुस्तक की एक और विशेषता है – स्थानों के नामों की रोचक पृष्ठभूमि. जैसे, ‘दंड’ कथा में कालसी के पास स्थित ‘क्वा बासणी’ नामक जगह का जिक्र है, जो कौवों की काँव-काँव से प्रसिद्ध हुई. इसी तरह, ‘विनाश’ कथा में ‘बंगाण’ क्षेत्र का नामकरण उन अट्ठारह कुंवरों के नाम पर बताया गया है, जिनकी पूजा कौंल महाराज के साथ होती है. ऐसे प्रसंग पाठक को इतिहास और भूगोल के बीच एक सुंदर सेतु बनाते हैं.  

*कुछ कमियां भी पर उपलब्धि कई बड़ी*

हालांकि पुस्तक में कहीं-कहीं मात्राओं की गलतियां (जैसे पृष्ठ 97 पर ‘बलि’ को ‘बति’ और पृष्ठ 100 पर ‘नाक’ को ‘नाग’ लिखा जाना) पढ़ने के आनंद में खलल डालती हैं, लेकिन ये छोटी चूकें इसकी साहित्यिक महत्ता को कम नहीं करतीं. ‘चालाक घुघतू’ जैसी हल्की-फुल्की कहानियाँ पुस्तक को एकरस होने से बचाती हैं.  

‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम’ न सिर्फ उत्तराखंड की लोक संस्कृति को संजोती है, बल्कि हिंदी साहित्य को एक नई दिशा देती है. यह पुस्तक उन सभी के लिए अनिवार्य पठन है, जो पहाड़ों की सांस्कृतिक धड़कन को महसूस करना चाहते हैं. महावीर रवांल्टा ने केवल कहानियाँ ही नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा को कागज पर उतार दिया है.  

हिमांशु जोशी.

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