Sunday, July 31, 2022

जवाब खाकी हो जाने का।

जब पहली बार तुझे पहना था,
घूम घूम के आइने में खुद को देखा था।

आइने पर लिखा था 'क्या मेरी वर्दी ठीक है'
पर दिल में सवाल था क्या इस जिस्म में ये वर्दी ठीक है!

सवाल था खुद को भूल कर खाकी हो जाने का।
अब खुद को इस खाकी पर समर्पित कर देने का।

दोस्त बन रहे थे मेरे इंजीनियर और डॉक्टर,
लेकिन ठुल्ला कहलाया जाने लगा अब मैं अपने ही घर।

गर्मी में चुभता तो बरसात में भीगने लगा ये खाकी रंग,
पूस की रात में चौराहे पर कभी कड़कड़ा जाता हर अंग।

फिर आया कोरोना, मानव जाति पर मुसीबत बनकर
खड़ा था मैं सबकी रक्षा के लिए ढाल बनकर।

इसके बावजूद लोग मुझे भूलने लगे हैं,
चौराहे पर फिर मुझपर गाड़ी चढ़ाने लगे हैं।
उनके लिए हर मुसीबत का जिम्मेदार खाकी है,
तो हर समस्या का समाधान भी खाकी है।

कल ही की तो बात है,
एक इमारत भरभरा कर गिर चुकी है।
हर मजदूर को ये खाकी ही बाहर निकाल रही है।

सब ठीक थे, नाते रिश्तेदार अपनों को पाकर खुश थे।
हर कोई घर जाने की जल्दी में था और मैं एक शुक्रिया पाने की उम्मीद में था।

शायद वो जिंदा मजदूर मुझसे कल फिर जरूर मिलेगा,
किसी भीड़ में मुझपर ही अपना दम आजमाएगा।

फिर भी मैं घूम घूम कर कर खुद को आईने में देखूंगा
और बस हल्के से मुस्कुराउंगा।।

हिमांशु जोशी।।

Sunday, July 24, 2022

कहानी और संवाद से दिल छूती 'सास बहू अचार प्राइवेट लिमिटेड'

'जीती है हमने ये सांसे, मांगी नही हैं हवा से'
'सास बहू अचार प्राइवेट लिमिटेड' वेब सीरीज के एक गीत के बोल इस तरह के हैं और कुछ इस तरह ही एक महिला की साइकिल से स्कूटी तक पहुंचने के सफर वाली इसकी कहानी भी है.

'एस्पिरेन्ट्स' से ख्याति प्राप्त कर चुके निर्देशक अपूर्व सिंह कार्की ने ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर आई इस वेब सीरीज को कुछ इस तरह बुना है कि आप इसे लगातार देखते बिल्कुल भी बोर नही होंगे. कहानी में आपको कभी खुशी भरा कोई दृश्य दिखेगा तो अगले ही पल आप दुखी भी हो जाएंगे.

वेब सीरीज की सबसे खास बात यह है कि इसमें सिर्फ एक या दो कलाकारों को ही महत्व न देकर सभी को बराबर मौका मिला है. 

अपने कलाकारों के कैरियर को पंख लगाएगी ये वेब सीरीज

अमृता सुभाष के इर्द गिर्द पूरी वेब सीरीज की कहानी चलती रहती है. अमृता लगभग दो दशक से मनोरंजन जगत में हैं और गली ब्वॉय जैसी फिल्म में भी काम कर चुकी हैं लेकिन इस वेब सीरीज में उनका काम याद किया जाएगा. कई दृश्यों में वह दर्शकों को भावुक करने में कामयाब रही हैं.
अंजना सुखानी के कैरियर की कहानी भी कुछ कुछ अमृता से ही मेल खाती है पर यहां एक सौतेली मां के सकारात्मक किरदार में वह खूब जमी हैं. मनु बिष्ट के साथ उनकी कैमेस्ट्री जमी है, मनु को देख कर आपको दंगल जायरा वसीम की याद आते रहेगी. 
लोकप्रिय गायक चंदन दास की पत्नी और अभिनेता नमित दास की मां यामिनी दास ने अभिनय में देर से एंट्री मारी है पर उन्हें देख लगता है कि वो इसके लिए सालों से तैयार थी, दमदार दादी के किरदार में वह छा गई हैं.
टीवीएफ के महत्वपूर्ण सदस्य आनंदेश्वर द्विवेदी ने शुक्ला बन कर बड़ा प्रभावित किया है, उनके मुंह से छूटे संवाद वेब सीरीज की जान हैं.
तीन दशक से टेलीविजन पर छाए हुए अनूप सोनी तो बड़े ही सहज तरीके से अपना किरदार निभा गए हैं.

पटकथा में लीकेज

 सीरीज की पटकथा में ज्यादा चूक नही दिखती. कमरे के बाहर खड़े आनंदेश्वर द्विवेदी और अंदर बैठी अमृता सुभाष को खिड़की, दरवाजे की दूरी से बांट देने वाला दृश्य अच्छा है. 
दिल्ली जैसे शहर में किसी के घर में कोई रात के समय बेरोकटोक घुस जाए, यह पचता नही है.

स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म टीवीएफ अपनी कहानी के साथ साथ संवादों के लिए भी जाना जाता है.

'गरीबी में भी बच्चे पल जाते हैं पर बिना प्यार दुलार के नही पलते' जैसे संवाद दिल को छू लेते हैं और समाज का हर वर्ग इससे खुद को जोड़ने लगता है.
'हम सबको पता है सवेरा होने वाला है, बस इंतजार नही करना चाहते' संवाद जीवन से हारे हुए लोगों में जान भरने के लिए काफी है.
वेब सीरीज में एक संवाद बार-बार आता है जो किसी नए व्यापार को शुरू करने के इच्छुक लोगों के लिए एक सीख है 'बिजनेस ऐसे ही होता है, पहले साल लगाई, दुसरे साल जमाई, फिर कहीं जाके तीसरे साल कमाई'.

कॉस्ट्यूम का चयन बिल्कुल परफेक्ट है, एक मध्यमवर्गीय परिवार की तरह स्वेटर पहने कलाकार कहानी के साथ बिल्कुल जमते हैं.

छायांकन ऐसा की मुंह में पानी आ जाए

वेब सीरीज का छायांकन बड़ा ही लुभावना है, एक घर  को अलग-अलग एंगल से इस तरह दिखाया गया है कि आप उसमें रहने वालों को अपना पड़ोसी मानने लगेंगे.
दिल्ली की खूबसूरती को देख ऐसा लगता है मानो उसे कैमरे में कैद कर लिया गया है. तंग गलियां, डीटीसी बस, खाने के होटल, ये सब देख आपको दिलवालों की दिल्ली घूम आने को मन करेगा.
अचार बनते देख तो आपके मुंह में पानी ही आ जाएगा.

वेब सीरीज के गीत संगीत पर लिखा जाए तो इसके गीतों के बोल कमाल के हैं और आप शुरुआत में उसका उदाहरण पढ़ भी चुके हैं. संगीत इस तरह का है कि नारी शक्ति का प्रतिबिंब सा जान पड़ता है. 
 ट्रेन का हॉर्न, बाइक चलने की आवाज भी वेब सीरीज देखने के अनुभव को शानदार बनाते हैं.

बच्चों में नशे की लत, जरूरी बना दी गई कोचिंग जैसे विषय उठाती वेब सीरीज.

वेब सीरीज के जरिए बहुत से महत्वपूर्ण विषयों को भी उठाने की कोशिश करी गई है. घरेलू हिंसा के बीच दुनिया जीतती अकेली महिला पर इसकी कहानी केंद्रित तो है ही साथ में आप इसमें आजकल के बच्चों में नशे की आदत के साथ उनकी पढ़ाई में मोबाइल का प्रभाव देखते हैं. 

किसी महत्वपूर्ण परीक्षा में अब कोचिंग कितनी जरूरी बना दी गई है, यह भी आप समझते जाते हैं. 
बस में सामान बेचने वालों के जीवन को इतनी नजदीक से शायद ही अब तक किसी फिल्म या वेब सीरीज में दिखाया गया हो. 

@himanshu28may
हिमांशु जोशी



उफ्फ ये बारिश

सबके लिए एक सी नही ये पहली बारिश

 बारिश, बारिश में निकलते इंद्रधनुष जैसे ही इंसान के जीवन में भी कई रंग होते हैं।
 जैसे मौसम होते हैं न उतार चढ़ाव भरे, कभी फूल खिलाता बसंत, कभी सड़ी गर्मी, कभी कड़कड़ाती सर्दी।
ऐसे ही इंसान के जीवन में भी हर समय एक सा नही रहता।

बारिश की बात ही कर लें में कोई इसमें घर बैठ कर चाय पकौड़ी खा रहा होता है,कोई सड़क पर अपनी प्रेमिका के साथ बाहों में बाहें डाल घूम रहा होता है तो कोई भारी बारिश की वजह से आई बाढ़ में उफ्फ ये बारिश कहता अपने घर का सामान बचाने की जद्दोजहद में लगा रहता है।

 बारिश का मौसम आते ही उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपने कल की चिंता होने लग जाती है। उफ्फ ये बारिश करते लोग अपना जीवन सुरक्षित रखने की कोशिश में लगे रहते हैं, उन्हें पता नही होता कि पहाड़ के किस कोने में कब जलजला आ जाए और सब कुछ खत्म कर दे।

ये कहानी भी उत्तराखंड की ही है जहां एक परिवार के लिए बारिश अभिशाप बन गई।

उत्तराखंड के चम्पावत जिले में कैड़ागांव का रहने वाला दिनेश साल 2021 में हुई बारिश से बहुत खुश था क्योंकि दसवीं में पढ़ने वाले दिनेश को अब बाढ़ की वजह से स्कूल नही जाना पड़ेगा। ये तो वो बचपन से ही देखता आ रहा था, बाढ़ में घर के अंदर कैद रहना। उसके स्कूल जाने वाले रास्ते में आने वाली नदी बरसात के दिनों में उफान पर रहती थी और आम दिनों की तरह उसे पार नही किया जा सकता था।

दिनेश अपने भाई बिट्टू के साथ बारिश आने पर खूब मजे करता था ,गांव के सारे बच्चे बारिश में पहाड़ के सीढ़ीनुमा खेतों में फिसलते हुए जाते। 

दिनेश, बिट्टू उसके पापा रमेश और मां सविता अपनी छोटी सी जिंदगी में बहुत खुश थे। रमेश उत्तराखंड रोडवेज में ड्राइवर थे।
मनहूस दिसम्बर मानों इस परिवार की खुशियों को निगलने के लिए तैयार था, एक रात रमेश को हार्टअटैक आया और वो चल बसे।
गांव के कुछ रिश्तेदार सविता को तीन चार दिन तक तो ढांढस बंधाते रहे लेकिन फिर कोई उनके घर झांकने तक नही आया।
 रोडवेज में मृतक आश्रित की भर्ती बंद थी और रोडवेज की सात सौ रुपए पेंशन।
सविता अपने छोटे छोटे बच्चों का भविष्य अंधकार में देख बहुत परेशान थी और इसी टेंशन में वो भी 2022 की बरसात से पहले एक दिन जहर खाकर इस दुनिया के पचड़ों से मुक्त हो गई।

दसवीं में पढ़ने वाले दिनेश को समय से पहले समझदार होना पड़ा। घर बनाने के लिए 15 लाख का बैंक लोन उसके सामने किसी दानव की तरह मुंह फैलाए खड़ा था।

दिनेश अपने सगे रिश्तेदारों के यहां मदद मांगने गया पर वो मदद दस हजार भी नही पहुंची।
बिजली का बिल, गैस का खर्चा, छोटे भाई बिट्टू जरूरत। अकेला मनोज क्या-क्या करता, वो तो अभी दुनिया को समझ ही रहा था वहीं सातवीं में पढ़ने वाला बिट्टू तो अभी दुनिया को समझा भी नही था।

बारिश आ गई, उफ्फ ये बारिश।
घर की नई नई छत टप टप कर टपकने लगी थी। दिनेश के जीवन की तरह उसमें भी कहीं दरार पड़ने लगी थी। एक दिन बिट्टू को उसके पड़ोस में रहने वाले शेरा दुकानदार ने बाहर रखा नमक चोरी करने पर बहुत मारा पर दिनेश ने घर में बिट्टू से कुछ नही कहा।

भारी बारिश की वजह से गांव के नीचे बहने वाली नदी उफान पर थी, लेकिन दिनेश निर्णय ले चुका था कि घर से निकल रोडवेज के अधिकारियों और प्रदेश के नेताओं से कुछ मदद मांगेगा। शायद उसे दो तीन साल बाद रोडवेज में बंद पड़ी मृतक आश्रित की नौकरी ही मिल जाए।

मौसम की पहली बारिश से ही उधड़ चुकी खतरनाक पहाड़ी सड़क में अपनी स्वर्गीय मां के बचाए कुछ पैसे लिए दिनेश 80 किलोमीटर दूर टनकपुर पहुंचा ,जहां रोडवेज के किसी भी अधिकारी ने उसकी मदद करने से हाथ खड़े कर दिए। वो मृतक आश्रित बन करने के सरकारी आदेश का हवाला देते। 
बारिश तेज़ थी दिनेश को अपने और अपने भाई के सुरक्षित भविष्य के लिए कुछ करना ही था, वो तो इतनी तेज बारिश को देख उफ्फ भी नही कह सकता था। दिनेश ने रोडवेज के देहरादून स्थित मुख्य कार्यालय जाने की ठानी और उसने यह भी सोचा कि शायद चुनाव में घर आने वाले मंत्रीजी उसका काम करवा दें।

 टनकपुर से 360 किलोमीटर दूर देहरादून में भी दिनेश किसी मंत्री या रोडवेज के अधिकारी से नही मिल पाया। इतने छोटे बच्चे को देख गेट का संतरी ही उसे लौटा रहा था।

दिनेश वापस फिर अपने गांव में था। वो इस बारिश से तंग आ चुका था और उफ्फ ये बारिश कहते उसे इस बारिश के रुकने का इंतजार था ताकि वो कहीं मजदूरी कर घर चला सके।

एक साल बाद फिर बारिश होने को थी, पहाड़ की ककड़ी, सेब, आड़ू बेच दिनेश ने साल भर घर चला लिया था, बिट्टू के लिए घर में खूब राशन भी जमा था।

बारिश से आज घर की छत फिर टपक रही थी, गेट पर लोन न जमा करने पर घर नीलाम करने का आदेश लिए बैंक अधिकारी खड़े थे। भारी बारिश से वो पूरे भीगे हुए थे, 'उफ्फ इतनी तेज बारिश है जल्दी उसे बुलाओ' उनमें से कोई बैंक अधिकारी ये कह रहा था।

बिट्टू बहुत देर से अपने भाई को बुलाने दरवाजे पर धप धप कर मार रहा था।

सूराराई पोत्रु को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार लेकिन एक सवाल भी है..

तमिल फिल्म सूराराई पोत्रु इस साल के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में छाई रही. यह सर्वश्रेष्ठ फिल्म, पटकथा लेखन, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (संयुक्त), सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और बैकग्राउंड स्कोर का पुरस्कार जीती है.


1 जनवरी 2020 से 31 दिसम्बर 2020 तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा प्रमाणित फिल्मों में से इन पुरस्कारों का चयन किया गया.

 सूराराई पोत्रु फिल्म 'सिंपल फ्लाई' नाम की किताब पर आधारित है. इसकी हिंदी डब 'उड़ान' नाम से अमेजन प्राइम पर उपलब्ध है और फिल्म की रीमेक की घोषणा पहले ही हो चुकी है.


कैसी है फिल्म की कहानी

सूराराई पोत्रु की कहानी जीआर गोपीनाथ की है जो हर आम भारतीय की तरह एक बड़ा सपना देखते हैं और उसे पूरा भी करते हैं. गोपीनाथ को अपना ये सपना पूरा करने के लिए तंत्र के साथ लड़ना पड़ता है पर जहां कुछ बुरे लोग होते हैं वहां अच्छे लोग भी हैं, इन्हीं लोगों की मदद से गोपीनाथ अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं.


जीआर गोपीनाथ के इस सपने के सच होने की कहानी को बड़े पर्दे पर तमिल फिल्म स्टार 'जय भीम' फेम 'सूर्या' ने निभाया है. 

निर्देशन, कोरियोग्राफी और अभिनय हैं कमाल 

सुधा कोंगरा ने फिल्म के निर्देशन और कहानी लिखने का काम किया है, सुधा तमिल और तेलुगु सिनेमा का जाना माना नाम हैं. हिंदी भाषी उनसे साला खड़ूस फिल्म की वजह से परिचित हैं, जहां उन्होंने निर्देशन का काम किया है.
सूराराई पोत्रु में स्क्रीन पर कभी कभी वह कहानी का समय और दिन दिखाने भर से ही दृश्यों में रंग भर देती हैं.

फिल्म के शुरुआती दृश्य में एक प्लेन इमरजेंसी लैंडिंग करता है और फिर इसकी कहानी कुछ समय पीछे चले जाती है. दर्शक फिल्म की शुरुआत से ही गोपीनाथ बने सूर्या से जुड़ जाते हैं और अंत तक उसकी जीत चाहते हैं. 
फिल्म में बेहतरीन कोरियोग्राफी की वजह से खुलकर नाचना हो या अपने बीमार पिता से जल्दी मिलने के लिए लोगों के सामने हवाई जहाज के टिकट के पैसे मांगने के लिए गिड़गिड़ाना, सूर्या ने गोपीनाथ की कहानी को पूरी शिद्दत के साथ निभाया है. 
सूराराई पोत्रु में सूर्या की पत्नी बनी युवा अभिनेत्री अपर्णा बालमुरली टैलेंट से भरी हुई हैं, वह एक सफल अभिनेत्री होने के साथ-साथ बेहतरीन सिंगर भी हैं. फिल्म में जितने भी दृश्यों में वह सूर्या के सामने हैं, कहीं भी वह उनसे कम नही लगी हैं और इसलिए उन्हें भी सूर्या के साथ इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला है. इस फिल्म में गीतों के दौरान नृत्य करते हुए अपर्णा की अभिव्यक्ति कमाल की है.
नकारात्मक और कॉमेडी दोनों ही किरदारों को बखूबी निभाने के लिए मशहूर परेश रावल इस फिल्म में नकारात्मक किरदार में हैं और वह दर्शकों की नफरत बटोरने में सफल भी हुए हैं.

सुधा का पटकथा लेखन और  जी वी का बैकग्राउंड स्कोर

फिल्म ने पटकथा लेखन और बैकग्राउंड स्कोर के लिए भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता है इसलिए इन पर भी चर्चा करना जरूरी बन जाता है. 
सुधा कोंगरा के पटकथा लेखन में पारंगत होने की वजह से फिल्म के कुछ महत्वपूर्ण दृश्य ठीक से बनने में कामयाब हुए, सूर्या का राष्ट्रपति तक पहुंचना और बाइक से चलते सूर्या का ऑटो में बैठी अपर्णा को शादी के लिए प्रपोज करने वाले दृश्य याद रखने लायक हैं.
इंटरनेट के शुरुआती समय और चिठ्ठी के दिनों को दिखाने में भी कोई गलती नही हुई है. 

सूराराई पोत्रु का बैकग्राउंड स्कोर जी वी प्रकाश कुमार द्वारा तैयार किया गया है. जी वी प्रकाश संगीतकार ए आर रहमान के भांजे हैं और उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. परेश रावल और सूर्या की पहली मुलाकात को बैकग्राउंड स्कोर के जरिए रोचक बना दिया गया है, बैकग्राउंड स्कोर की वजह से फिल्म के लगभग हर दृश्य को सीधे दर्शकों से कनेक्ट करवाने की सफल कोशिश करी गई है.

फिल्म की शूटिंग मदुरई, चैन्नई, चंडीगढ़ और दिल्ली में पूरी हुई है. पहाड़, तालाब, इंडिया गेट, फिल्म का छायांकन इन सब की खूबसूरती दर्शकों को सही से दिखाने में कामयाब रहा है.

फिल्म में हम सूर्या के घर आए अतिथियों को जमीन पर बैठ कर खाते देखते हैं और हिंदी सिनेमा में हम शायद ही यह दृश्य देखते हों. इस तरह दक्षिण का सिनेमा सीधे दर्शकों के दिल से जुड़ता है और यही उसकी सफलता का एक बड़ा कारण भी है. 

हैल्मेट न पुरस्कार लेने वालों का दिखा न देने वालों को

सूर्या इस फिल्म में कई बार बाइक चलाते हैं पर एक बार भी उन्हें हम हैल्मेट पहने नही देखते, इन दिनों जब नए यातायात नियमों की वजह से आम जनता से अधिक जुर्माना वसूला जा रहा है तब इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार देते इस विषय पर चर्चा हुई होगी या नही ये सोचने वाली बात है.

देर से आए फिर भी दुरस्त नही आए

 2020 की फिल्मों को 2022 में पुरस्कार देना थोड़ा अखरता है. लॉकडाउन खुल जाने के बाद इन पुरस्कारों की घोषणा कर दी जानी चाहिए थी. इतनी देर से पुरस्कार मिलने पर पुरस्कारों की अहमियत में कहीं न कहीं कमी तो आ ही जाती है.
इतनी देर से पुरस्कार दिए जाने के बाद एक और बात है जो अखरती है, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार बड़ी ही सादगी से दिए जाते हैं. हम कई फिल्म पुरस्कारों के इवेंट को बड़ी ही चकाचौंध से होते देखते हैं, इसे भी एक पर्व की तरह मनाया जा सकता है.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Wednesday, July 20, 2022

जादूगर.. क्या खेला रे शाबाश!!

फिल्म जादूगर की कहानी का थोड़ा सा खुलासा करना जरूरी बन जाता है। मीनू जादूगर का किरदार निभा रहे अभिनेता जितेंद्र कुमार इस फिल्म में जितनी आसानी से तलाकशुदा महिला बनी आरुषि शर्मा से शादी के लिए तैयार हो जाते हैं, इतनी आसानी से हमारे समाज में तलाकशुदा महिलाओं से शादी के लिए कोई तैयार नही होता। शायद फिल्म के बाद तलाकशुदा महिलाओं से शादी के लिए पुरुषों की सोच में बदलाव आए।



फिल्म के निर्देशक, अभिनेता और लेखक मनोरंजन जगत के दिग्गज कंटेंट मेकर 'द वाइरल फीवर' से जुड़े हैं।
तीन घण्टे की फिल्म आजकल कम ही दिखती है लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर आई फिल्म 'जादूगर' के निर्देशक समीर सक्सेना ने ये रिस्क लिया है।

आज के युवा का प्रतिनिधित्व करते जितेंद्र कुमार की दर्शकों को गुदगुदाती हल्की फुल्की कॉमेडी से यह फिल्म शुरु होती है और जल्द ही दर्शक इसके सभी पात्रों से एक रिश्ता कायम करता महसूस करते हैं। टीवीएफ के सदस्य फिल्म लेखक बिस्वपति सरकार ने जादूगर की कहानी लिखते हुए दर्शकों के लिए बोर होने की जगह कहीं नही छोड़ी है।
 फिल्म के अंत का लगभग एक घण्टा सिर्फ फुटबॉल मैच पर ही केंद्रित है लेकिन मैच से पहले दुकानों के शटर बंद होने से लेकर कमेंट्री में जुमलेबाजी तक और फिर कहानी के यू टर्न की वजह से दर्शकों के लिए यह समय फिल्म में खोने वाला ही रहता है।

फिल्म की टीम ने मीनू, इच्छा, दोशी जैसे पात्रों के नाम रखने में भी खासा वक्त दिया होगा।

जादूगर का एक दृश्य इसकी टीम की रचनात्मकता की वजह से दर्शकों के मन में लंबे समय तक जगह लेगा या बहुत से नए प्रेमियों को प्रेम की नई राह दिखाएगा।
यह दृश्य संवाद में सिर्फ हिंदी के प्रयोग से ज्यादा प्रभावी बन पड़ा है। दृश्य में जितेंद्र कुमार ,आरुषि शर्मा को उसके घर का रास्ता भूलने पर मदद करते कहते हैं 'घण्टी की धुन पे आप गलत रास्ता पकड़ोगी तो वो बस एक संयोग होगा'।

आरुषि शर्मा को उसके घर की बालकनी में बुला कर जितेंद्र कुमार द्वारा जादू दिखाने वाला दृश्य भी बड़ा ही बेहतरीन बन पड़ा है।

जितेंद्र कुमार के स्क्रीन पर बेहतर लगने का मुख्य कारण उनके चेहरे का दर्शकों के आम चेहरे जैसा होना ही है। उन्हें देख आपके मन में किसी चॉकलेटी अभिनेता का चेहरा नही आएगा। इस चेहरे के साथ शुद्ध हिंदी में संवाद अदायगी उन्हें और बेहतर बना देती है। यह बात फिल्म निर्देशक भी अच्छी तरह से समझते हैं इसलिए फिल्म में जितेंद्र आपको 'इंटरवल' की जगह 'अंतराल' बोलते दिखते हैं।

जितेंद्र कुमार के लिए फिल्म जादूगर के संवादों को भी जुमलेबाजी के तौर पर लिखा गया है और यही इसको खास बनाती है। 'नाम दिशा है, है दिशाहीन' , 'मैं मीनू रातों की नीदें छीनूं', 'जिसने दलदल में फेंका है, उससे रस्सी फेंकने की उम्मीद तो कर ही सकता हूं' इसके उदाहरण हैं।

निर्देशक इम्तियाज अली की खोज आरुषि शर्मा को इस फिल्म से नई पहचान मिलेगी। वह स्क्रीन पर अच्छी तो दिखती ही हैं, उनके अभिनय में भी सादगी है।
 एक फुटबॉल कोच और चाचा की भूमिका में जावेद जाफरी ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। मनोज जोशी और पूरनेंदु भट्टाचार्य जैसे काबिल अभिनेताओं को स्क्रीन पर जितना समय भी मिला उन्होंने बेहतर किया।
जितेंद्र के करीबी दोस्त बने राज कुशल भी फिल्म में अपने अच्छे अभिनय से लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचने में कामयाब रहे हैं।

आरुषि शर्मा और मनोज जोशी के बीच पिता-पुत्री का रिश्ता ऐसे बुना गया है कि दर्शक उसके लिए अपना दिल निकाल कर रख देंगे।

फिल्म के सम्पादन में कहीं कोई कमी नही लगती और पटकथा भी कहानी के साथ न्याय करती है। जावेद जाफरी के पात्र को थोड़ा और गहराई से दिखाया जाता तो बेहतर रहता।

जादूगर का छायांकन बड़ा ही आकर्षक है। अमृतसर और भोपाल की गलियों को कैमरे में बड़ी ही खूबसूरती के साथ उतारा गया है। जितेंद्र कुमार की जादूगरी देखने में दर्शक अपनी आंखों के सामने ही जादू होता महसूस करेंगे, फुटबॉल मैच को भी बड़े रोचक तरीके से स्क्रीन पर दिखाया गया है।

'जादूगरी' गीत के बोल दर्शकों के दिमाग में कुछ दिन अपना जादू जरूर बरकरार रखने में कामयाब होंगे, फिल्म के बाकी गीत उसकी कहानी के ही हिस्से जान पड़ते हैं। जादू के दौरान बैकग्राउंड में बजता पार्श्व संगीत दर्शकों के दिल की धड़कनें बढाने में कामयाब रहा है और फुटबॉल मैच के दौरान भी यह संगीत कमाल दिखाता है।

निर्देशक-समीर सक्सेना
लेखक-बिस्वपति सरकार
अभिनय- जितेंद्र कुमार, आरुषि शर्मा



Saturday, July 16, 2022

विराट पर्वम ''बंदूक की नोक पर शांति नही है''

एक जुलाई को नेटफ्लिक्स पर दक्षिण की फिल्म विराट पर्वम की एंट्री हुई और उसके कुछ दिनों बाद ही फिल्म के निर्देशक उडुगुल वेणु ने ट्वीट किया कि उनकी फिल्म नेटफ्लिक्स में पहले नम्बर पर ट्रेंड कर रही है।

आईएमडीबी पर अभी विराट पर्वम की रेटिंग 7.9/10 है।

विराट पर्वम आपको बहुत कुछ समझाने में सफल होगी, इसे देख आप समझ सकेंगे कि देश में नक्सलवाद के जन्म लेने का क्या कारण था। विराट पर्वम की कहानी वर्ष 1990 के आसपास की है और फिल्म उस दौरान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस की भूमिका पर भी प्रकाश डालती है।
इसे देख आपको यह सन्देश जरूर मिलेगा कि बंदूक की नोक पर कभी शांति नही मिलती।


नेशनल फिल्म अवार्ड प्राप्त फिल्म निर्माता डी सुरेश बाबू विराट पर्वम फिल्म के भी निर्माता हैं और इस फिल्म में अभिनेता के तौर पर उनके बेटे राणा दग्गुबाती ने काम किया है। फिल्म देखने से पहले आप राणा दग्गुबाती को बाहुबली के भल्लालदेव के रूप में ही जानते होंगे पर विराट पर्वम देखने के बाद आप रवन्ना से भी परिचित हो जाएंगे।

फिल्म की शूटिंग कोरोना से प्रभावित होने के बावजूद युवा निर्देशक उडुगुल वेणु ने निर्देशक के तौर अपनी दूसरी ही फिल्म में बेहतरीन काम किया है, उनकी पहली फिल्म शिक्षा व्यवस्था के ऊपर थी और काफी चर्चा में रही थी।
निर्देशक ने विराट पर्वम में पोस्टर के जरिए भी फिल्म की कहानी कहने की कोशिश करी है, एक जगह 'you were destined for me perhaps as a punishment' ( तुम मेरे लिए किस्मत में थे शायद सजा के तौर पर ) पोस्टर पर कैमरा जा टिकता है।

फिल्म अपने शुरुआती दृश्य से दर्शकों को खुद से जोड़ देती है। प्रेम की वजह से बंदूक का गिरना जैसे दृश्य सुंदर बन पड़े हैं।

विराट पर्वम में साई पल्लवी का निभाया वेनिला ही मुख्य किरदार है। साई पल्लवी भी मधुबाला, नरगिस, मीना कुमारी की तरह प्राकृतिक सुंदरता की धनी हैं और फिल्मों में बिना मेकअप के ही दिखती हैं। इस तरह उनका खुद पर विश्वास ही उन्हें इतनी सफल अभिनेत्री बनाता है। साई पल्लवी साल 2019 में एक फेयरनेस क्रीम की तरफ से मिले दो करोड़ के विज्ञापन को ठुकरा चुकी हैं और एक नृत्यांगना के तौर पर उन्हें भारत की नई सनसनी कहा जा रहा है।
राणा दग्गुबाती के पीछे पीछे चलना हो या फिल्म के कई अन्य दृश्य, वो दर्शकों का ध्यान बस खुद में रखवाने में सफल रही हैं।

छोटे मगर महत्वपूर्ण किरदार में दिखी नन्दिता दास ने भी अपने अभिनय से प्रभावित किया है।

फिल्म में साई पल्लवी और उनके पिता बने साई चंद के जरिए यह दिखाया गया है कि एक पुत्री के जीवन में उसके पिता की क्या अहमियत होती है। अपने पिता के द्वारा दी गई शिक्षा की वजह से ही साई पल्लवी घर से बाहर निकलती है।
फिल्म के जरिए भारत में लड़कियों पर शादी को लेकर बनाए जाते दबाव को भी दिखाने की कोशिश करी गई है।

आजकल जब युवाओं, बच्चों ने किताबों से दूरी बना मोबाइल से दोस्ती गांठ ली है, तब फिल्म में नदी किनारे एक बड़े ही सुंदर दृश्य में लड़कियां साइकिल पकड़े किताबों के बारे में बात करती हैं। वह कविताओं से किसी के भी जीवन में प्रभाव पर बात करती हैं, ऐसे दृश्य हर फिल्म में जरूरी हैं ताकी लोग किताबों की तरफ वापस लौटें।
विराट पर्वम की लोकेशन जैसे झरने, कुएं, इमारतें और उस पर लाजवाब छायांकन, विराट पर्व को दर्शकों के लिए एक शानदार अनुभव बना देता है। इसकी शूटिंग तेलंगाना और केरल में पूरी हुई है। 

फिल्म के सम्पादन और पटकथा पर कमाल का काम किया गया है। शुरुआत में कन्या वेनिला शीशे में खुद को निहारती है और अगले ही दृश्य में दर्शक शीशे में खुद को निहारती युवा वेनिला को देखते हैं। फिल्म के अंत में फूलों के गिरने की टाइमिंग भी एकदम सही है।

सुरेश बोबली ने फिल्म में बेहतरीन संगीत दिया है और आप इसे कहानी के हिसाब से ही कभी तेज तो कभी सन्न कर देने वाला महसूस करेंगे।

साई पल्लवी और राणा दग्गुबाती के बीच आमने सामने हुई पहली मुलाकात में प्रेम को लेकर हुआ संवाद सुनने लायक हैं।

भारत में फिल्मों पर बात की जाए तो आधी से ज्यादा जनसंख्या सिर्फ बॉलीवुड पर ही बात करती है, लेकिन क्षेत्रीय सिनेमा भी जबरदस्त फिल्में दे रहा है। हमारी संस्कृति हमारे देश के मौसम की तरह ही अलग-अलग प्रकार की है ,तभी तो भारतीय संस्कृति में विविधता को देख विदेशी भी आहें भरते हैं।
 विराट पर्वम के एक दृश्य में साई पल्लवी को खेलते हुए पेट दर्द होता है और यह उसके पीरियड्स की शुरुआत होती है, इस अवसर पर उसके घर में खुशियां मनाई जाती हैं। उत्तर भारत के कई इलाकों में भी लड़की के पीरियड्स शुरु होने पर घरों में कुछ ऐसी ही खुशियां मनाई जाती है।
इस तरह इन फिल्मों से हमें एक दूसरे की संस्कृति भी समझ आती है और यह पता चलता है कि भारतीयों के बीच भले ही जमीनी दूरी है पर अपनी संस्कृति से वो जुड़े हुए हैं।
नेटफ्लिक्स जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म का यह फायदा हुआ है कि अब क्षेत्रीय सिनेमा जगत की बेहतरीन रचनाओं को हम सीधे अपने फोन पर देख सकते हैं। यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर तमिल, तेलुगु और मलयालम भाषा में उपलब्ध है और आप इसे अंग्रेजी उपशीर्षक के जरिए समझ सकते हैं।

विराट पर्वम अपने अंत से दर्शकों को भावुक जरूर करती है पर यह भावुकता किसी गुस्से का गुबार नही है। यह भावुकता एक ऐसी प्रेम कहानी के लिए है, जो शायद आपको किसी फिल्म में पहली बार देखने को मिले।

फिल्म- विराट पर्वम
निर्देशक- उडुगुल वेणु
ओटीटी प्लेटफॉर्म- नेटफ्लिक्स
अभिनय- साई पल्लवी, राणा दग्गुबाती

Wednesday, July 13, 2022

 8 जुलाई को अमरनाथ में बादल फटने की वजह से 16 लोगों की मौत हो गई और लगभग 40 लोग लापता हैं। आपदा के बाद 11 जुलाई से अमरनाथ यात्रा फिर से शुरू तो हो चुकी है लेकिन जो लोग इस आपदा में मारे गए वो अब कभी अपने घर वापस नही लौटेंगे और उनके रिश्तेदारों का इंतजार हमेशा लंबा ही होता रहेगा।

ये बात सही है कि अमरनाथ हो या चारधाम कोई भी तीर्थ यात्रा लंबे समय तक रोकी नही जा सकती, लेकिन यात्रियों की संख्या में नियंत्रण लगाने के साथ-साथ आपदा प्रबंधन को बेहतर बना कर जानमाल की हानि कम की जा सकती है।

एक नज़र अमरनाथ में आई आपदाओं के इतिहास पर।

वी सी स्कॉट ओ कॉनर वर्ष ने साल 1920 में लिखी किताब 'द चार्म ऑफ कश्मीर' में अपनी अमरनाथ यात्रा के बारे में लिखते हुए जून के आसपास अमरनाथ यात्रा को बड़ा मुश्किल करार दिया है। यह किताब http://pahar.in/ पर उपलब्ध है।

अमरनाथ यात्रा के दौरान अब तक का सबसे पहला बड़ा हादसा साल 1969 में हुआ था, तब जुलाई महीने में बादल फटने से करीब 100 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी।

21 अगस्त 1996 के दिन अमरनाथ यात्रा के दौरान मौसम बदलने की वजह से 243 लोगों के मारे गए थे। भविष्य में ऐसी ही घटनाओं को रोकने के लिए सरकार की तरफ से नीतीश के सेनगुप्ता कमीशन गठित किया गया था।

पिछले साल 28 जुलाई को भी इस बार की तरह गुफा के पास बादल फटा था लेकिन कोरोना वायरस के कारण यात्रा बंद होने की वजह से तब जान माल की हानि नही हुई थी।

नीतीश.के.सेनगुप्ता रिपोर्ट की सिफारिशें नज़रंदाज़ की गई

15 जुलाई 2004 को गृह मंत्रालय की तरफ से लोकसभा में कहा गया था कि नीतीश.के.सेनगुप्ता रिपोर्ट के अनुसार अमरनाथ यात्रा में प्रतिदिन 3500 यात्रियों को ही भेजा जाना चाहिए, जिसमें पहलगाम रूट से 2800 और बालटाल से 700 यात्रियों को ही यात्रा की अनुमति दी जाए।

इस साल चल रही अमरनाथ यात्रा में आपदा प्रबंधन की तैयारियों में लापरवाही साफ देखी जा सकती है। खराब मौसम की जानकारी होते हुए भी पवित्र अमरनाथ गुफा यात्रा दर्शन के दौरान नीतीश.के.सेनगुप्ता की रिपोर्ट पर कोई ध्यान नही दिया गया।

 यात्रियों की सीमित संख्या रखने और यात्रा के रास्ते में बसासत को कम करने के गम्भीर प्रयास भी नही किए गए।

 अमरनाथ गुफा के दर्शन करने वाले यात्रियों की संख्या पर नजर डालें तो 'श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड' की वेबसाइट में इस साल अमरनाथ आने वाले यात्रियों की संख्या नहीं दिख रही है लेकिन दैनिक जागरण की खबर के अनुसार अमरनाथ यात्रा के पहले सात दिन में ही एक लाख लोगों ने पवित्र गुफा के दर्शन कर लिए थे।


साल 2019 में लगभग 3,42,000 लोगों ने अमरनाथ यात्रा पूरी की थी, 20 जुलाई 2019 को एक दिन में सबसे अधिक 20,915 यात्री पवित्र गुफा गए थे।


लंगरों को बारातघर बना दिया गया

केदारनाथ आपदा में मुख्य मंदिर के आसपास हुई बेतरतीब बसासत की वजह से मरने वाले लोगों की संख्या अधिक थी और ऐसा ही कुछ अमरनाथ में भी हुआ है। अमरनाथ यात्रा में लाखों लोगों की आमद की वजह से यात्रा के रास्तों में टेंट और दुकानों की भरमार रहती है।

2017 में 'अमरनाथ यात्रा: एक सैनिक तीर्थ यात्रा' नाम से आई रिपोर्ट के अनुसार साल 2013 में अमरनाथ यात्रा में पड़ने वाले टेंट और दुकानों की संख्या 6130 थी।


इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है अमरनाथ यात्रा के रास्ते में जो लंगर भूखे और थके यात्रियों को आराम देने के लिए बनाए गए थे, अब वह किसी शादी की पार्टी सा एहसास देते हैं। उदाहरण के लिए पौषपत्री में भंडारे के दौरान 100 से अधिक व्यंजन खिलाए जाते हैं। इन लंगरों में भीड़ बहुत अधिक रहती है और इस आपदा में भी आपदा क्षेत्र के लंगर में बहुत अधिक लोगों के जमा होने की खबर सामने आई है।

https://youtu.be/DdJFCDtq6zY

तकनीक का इस्तेमाल क्यों नही!

उत्तराखंड में 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद डॉप्लर रडार लगाने की बात शुरू हुई और मुक्तेश्वर में रडार शुरू भी हो चुका है।

डॉप्लर रडार बादलों में मौजूद पानी के कणों का आकंलन कर सटीक डाटा देता है, जिससे पूर्वानुमान लगाया जाता है कि कितने मिलीमीटर तक बारिश हो सकती है। डॉप्लर रडार लगभग सौ किलोमीटर क्षेत्र में होने वाले मौसम के बदलाव की जानकारी दे सकता है। इस उपकरण के माध्यम से तेज पानी बरसने के आधे घंटे पहले ही सटीक डाटा मिल सकता है।

 अमरनाथ यात्रा के दौरान भी पवित्र गुफा के आसपास हर साल डॉप्लर रडार लगाने की बात होती है पर आपदा के दौरान यह किसी काम नही आया और न ही मौसम विभाग तेज वर्षा की सटीक जानकारी देने में कामयाब रहा।

हिमांशु जोशी।

Tuesday, July 12, 2022

बारिश का प्यार

उसे दिल्ली बहुत पसंद था, दिल्ली पसंद होता भी क्यों नही। यही शहर तो था जिसने उसके सपनों को पंख लगाए थे, उत्तर प्रदेश के सीतापुर से निकल इंदिरा  अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक का उसका सफर आसान न था। स्कूल में क्लर्क पिताजी की सीमित तनख्वाह से बीटेक फिर दिल्ली में नौकरी।
 बड़ा मकान, कार, एसी आज ऐसा कुछ नही था, जो अमित ने जोड़ न लिया हो। एक मध्यमवर्गीय परिवार की सारी इच्छाएं वो पूरी कर चुका था।

अमित को दिल्ली में अब कुछ वक्त हो चला था, 
रोज़ के अक्षरधाम मेट्रो स्टेशन से एयरपोर्ट मेट्रो स्टेशन तक के सफर में वो दिल्ली के लोगों को देखता। उनकी तरह कपड़े लेता, उनकी तरह बैठने की कोशिश करता। दिल्ली की सभी खूबसूरत जगहों को वो मेट्रो से नाप चुका था, पर अब भी उसको अपनी जिंदगी में कहीं खालीपन सा लगता था।

अपने स्कूल के दिनों में अमित निशा को मन ही मन पसंद करता था लेकिन शहर के सबसे बड़े कपड़ा व्यापारी की बेटी निशा उसे कहां देखती स्कूल छोड़ते ही निशा पढ़ने के लिए दिल्ली के किसी नामी कॉलेज में आ गई थी 
अमित ने कुछ दिनों तक तो निशा की फेसबुक प्रोफाइल को तलाशा लेकिन फिर निराश होकर अब वह निशा को भूल चुका था

उस साल मई में बहुत गर्मी थी, अमित के कमरे की दीवार भट्टे की तरह तप रही थी। अमित पसीना पसीना हो रहा था, उसके साथी फ्लैट मेट रात होते ही बियर पी के मस्त हो जाते थे लेकिन अमित अकेला रह जाता।

जून आ गया था और मानसून की आमद भी होने वाली थी। एक शाम अमित अक्षरधाम मेट्रो स्टेशन से घूमने के लिए राजीव नगर मेट्रो स्टेशन पहुंचा और कनॉट प्लेस में टहलते हुए मिंटो रोड से अमित कब जीबी रोड तक पहुंच गया उसे पता ही नहीं चला।

हल्की बूंदे गिरने लगी थी शाम का वक्त और बारिश अमित को मौसम कुछ ज्यादा ही सुहाना लग रहा था।

'भाई साहब यहां आपको सब कुछ मिलेगा' आवाज सुनते ही अमित के कान खड़े हो गए। उसने जीबी रोड के बारे में सुना तो बहुत था पर यहां उसके कदम पहली बार पहुंचे थे। 
दाहिनी तरफ दुकानों के शटर गिरने लगे थे और उसके ऊपरी मंजिल में हल्के उजाले वाली खिड़कियों से झांकती कुछ महिलाएं रास्ते में आने जाने वाले लोगों को बुला रही थी।

अमित के जीवन में उसके अपने नियम थे, वो ऐसी जगह नहीं जाना चाहता था। लेकिन उसे इस दूसरी दुनिया के लोगों के बारे में जानने की इच्छा थी । जिज्ञासावश वो अपनी दाहिनी तरफ दुकानों के आगे चलने लगा। बीच में अंधेरी सीढ़ियों की शुरुआत में कुछ अधेड़ महिलाएं उसे रिझा रही थी। 

तेज़ बारिश शुरू हो गई थी। अमित अब लौटना चाहता था, लगभग पचास साल की एक महिला ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहने लगी 'चल न'
तभी एक मधुर सी आवाज़ अमित के कानों में पड़ी, एक 24-25 साल की लड़की बोली ताई छोड़ो न, भला आदमी लगता है।
ताई बोली, ए कोई भला वला नही होता, सब मर्द एक से होते हैं, भला होता तो यहां क्यों आता।

अब वो लड़की सीढ़ी से ऊपर चले गई। अमित बारिश में  भीग गया था। उसके अंदर इस मौसम में उस लड़की के लिए कुछ प्यार भरे अहसास जगने लगे थे। अमित ने भी उन सीढ़ियों का रुख कर लिया।
ऊपर पहुंचा तो लाइट, उसमें चमकते कपड़े पहनी अलग अलग उम्र की महिलाएं उसे घूर रही थी। पर अमित की नजरें उसी मधुर आवाज वाली लड़की को ही खोज रही थी। ब्लू टीशर्ट, जीन्स , गोल चेहरा, खिलखिलाती हंसी अमित बस उसे देखता ही रह गया।
पर वो कुछ लोगों के साथ अंदर कमरे में चले गई और अमित उससे कोई बात नही कर पाया।

अब अमित रोज़ शाम वहां आने लगा, उसकी नज़रें उस ब्लू टीशर्ट वाली लड़की को ही खोजती।
लेकिन एक हफ्ते तक अमित को वो नही दिखी। अमित आज रविवार ऑफिस की छुट्टी होने की वजह से सुबह ही जीबी रोड पर था। भारी बारिश के बीच उसकी नज़रें उसी सीढ़ी पर टिकी थी, तभी वहां लगी एक बस के पीछे उसे किसी ने खींच लिया।

ए बाबू मैं तुझे कब से देख रहूं हूं, तू मेरी बिल्डिंग के आगे मंडराता रहता है। पता है लोग इसे क्या कहते हैं, कोठा। और मैं।।
अमित ने उसका हाथ पकड़ लिया अपने से कुछ लम्बी और भीगे बालों वाली लड़की को वो बस एकटक देखते ही जा रहा था।
मैं अमित और मुझे तुम पसंद हो, इतनी सी उम्र में तुम यहां कैसे। अमित ने कई सवाल साथ पूछ लिए।

रीमा है मेरा नाम, आओ वहां चाचा की दुकान पर चाय पीते हैं, तुम भीग गए हो।

हां हां, अमित बोला।

देखो यहां तुम जैसे बहुत लड़के आते हैं, पर अपना काम करते हैं और चले जाते हैं, तुम तो मुझे बस देखने भर आते हो। मैं तुम्हें खिड़की से रोज़ देखती थी। तुम आते रहे, तब आज मिलने आ गई। मेरे पापा बचपन में ही मुझे असम से लाकर यहां छोड़ गए थे, घरवाले अपने नही तो अब कहां जाऊं। मुझे यहीं रहना पसंद है। शरीर को अब मर्दों की आदत पड़ गई है, कुछ और काम होगा नही। मुझे पसंद मत करो। हमारी जिंदगी बस इन्हीं कोठों तक है। आप जवान हो, पढ़े लिखे दिखते हो, अपना भविष्य देखो।
चाय खत्म होते ही रीमा ने चाचा को बीस रूपए दिए और चलते बनी।

अमित तेज़ बारिश में भी आराम से जाती रीमा को देखता रहा, उसी भीगने की चिंता नही थी।

अमित उस दिन रात भर रीमा के ख्यालों में ही डूबा रहा, उसे बारिश में भीगी वो लड़की लगातार याद आ रही थी।
अगले दिन वो फिर वहां पहुंच गया, रीमा उसे देख अपने साथ एक छोटे कमरे में लेकर गई। दरवाजा बंद करते ही बोली, देखो यहां हमें ऐसे किसी से नही मिलना होता। आप यहां मत आया करिए, अमित कहता है 'ठीक है नही आऊंगा, आप अपना मोबाइल नम्बर दे दो ।

अब उन दोनों के बीच रात भर लम्बी बातें होने लगी, रीमा को अमित के बारे में सब कुछ पता चल गया था। उसका घर, परिवार, नौकरी। 
अब वो राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के आसपास मिलने लगे थे। एक दिन अमित ने रीमा से पूछा तुम्हें मुझमें सबसे ज्यादा क्या पसंद है! रीमा ने कहा सब आते थे और मेरे जिस्म को छूते उससे खेलते थे, तुम पहले थे जिसने सिर्फ मेरे मन को छुआ, मेरे स्त्री मन को।

जुलाई में अमित ने रीमा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा और  न चाहते हुए भी रीमा अमित से शादी के लिए हां कह गई।

हल्की बारिश के बीच अमित और रीमा ने एक मंदिर में शादी कर ली, अमित रोहिणी में फ्लैट किराए में ले चुका था। अमित ने अपने घरवालों को भी शादी के बारे में बता दिया था और कहा था कि रीमा यहां ब्यूटीपार्लर चलाती है, उसे जल्द घर लाऊंगा।

शादी के कुछ दिन बाद, अगस्त की शुरुआत में अमित रीमा को अपने दोस्तों से मिलाने लक्ष्मीनगर के v3s मॉल लेकर गया, वहां अमित के दोस्त रीमा को देख आपस में कुछ बाते करने लगे।

वापस आने के बाद रीमा और अमित अपने फ्लैट की बालकनी में बैठे थे, हल्की बारिश थी और हल्की हवा चल रही थी।
रीमा की गोद में सर रखकर लेटे हुए अमित ने कहा तुम ब्यूटीपार्लर का कोर्स कर लो, मैं ऑफिस रहता हूँ। तुम्हारा भी घर में मन लगे रहेगा। मथुरा जाओगी तो मम्मी को कुछ करके तो दिखाओगी।
रीमा हंसते हुए बोली, मुझे बस आपके लिए खाना बनाना है। जो इंसान मुझे नर्क से स्वर्ग में लाया है, उसका ध्यान रखना ही मेरी जिंदगी का लक्ष्य है।

तभी अमित के फोन में उसके दोस्त का एक मैसेज आया 'भाई हमारी भाभी से तो मैं कई बार मिल चुका हूं'

अमित दुखी था कि रीमा का अतीत उसके और रीमा के पीछे लगा है, पर उसने रीमा से कुछ नही कहा और निर्णय ले लिया कि अब वो सीतापुर ही रहेगा। दिल्ली हमेशा के लिए छोड़ देगा।

बरसात खत्म होने को थी अगस्त के अंत में तेज़ बारिश के बीच रीमा को ट्रेन में बैठा अमित पानी की बोतल लेने उतरा तो ट्रेन चलने लगी। भाग कर ट्रेन पकड़ने के चक्कर में अमित का पैर ट्रेन की सीढ़ी से फिसल गया और ट्रेन गुजरने के बाद अमित कई हिस्सों में ट्रेन की पटरियों में बिखरा हुआ था।

लगभग छह महीने बाद 14 फरवरी का दिन था, सीतापुर में हल्की बारिश थी।
एक ब्यूटी पॉर्लर के बाहर छोटा बच्चा अपने दादू के साथ खेल रहा था।
पापा अंदर आ जाओ, दोनों भीग जाओगे  और बीमार पड़ जाओगे। दरवाजे में दादू के पीछे अंदर आते बच्चे को रीमा गोद में उठाकर चूमते हुए, तौलिया से उसका सर पोछने लगी।

ब्यूटी पॉर्लर का नाम था, अमित ब्यूटी पॉर्लर।


Monday, July 11, 2022

वो बेहतर आपदा प्रबंधन से घर लौट सकते थे.

इस 8 जुलाई को अमरनाथ में बादल फटने की वजह से 16 लोगों की मौत हो गई और लगभग 40 लोग लापता हुए. 11 जुलाई से अमरनाथ यात्रा फिर से शुरू तो हो चुकी है लेकिन जो लोग इस आपदा में मारे गए वह अब कभी अपने घर वापस नही लौटेंगे और उनके रिश्तेदारों का इंतजार हमेशा लंबा ही होता रहेगा.

https://twitter.com/ANI/status/1545401194520379392?t=FJnj2FlZsv7__wRhVER9ig&s=19

यह बात सही है कि अमरनाथ हो या चारधाम कोई भी तीर्थ यात्रा रोकी नही जा सकती , लेकिन यात्रियों की संख्या में नियंत्रण लगाने के साथ-साथ आपदा प्रबंधन को बेहतर बना कर जानमाल की हानि कम की जा सकती है.

अमरनाथ में आपदाओं का इतिहास पुराना है

वी सी स्कॉट ओ कॉनर वर्ष ने साल 1920 में लिखी किताब 'द चार्म ऑफ कश्मीर' में अपनी अमरनाथ यात्रा के बारे में लिखते हुए जून के आसपास अमरनाथ यात्रा को बड़ा मुश्किल करार दिया है.

अमरनाथ यात्रा के दौरान सबसे पहला बड़ा हादसा साल 1969 में हुआ था, तब जुलाई महीने में बादल फटने से करीब 100 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी.

21 अगस्त 1996 के दिन अमरनाथ यात्रा के दौरान मौसम बदलने की वजह से 243 लोगों के मारे गए थे. भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार की तरफ से नीतीश के सेनगुप्ता कमीशन गठित किया गया था.

पिछले साल 28 जुलाई को भी इस बार की तरह गुफा के पास बादल फटा था लेकिन कोरोनावायरस बंद होने की वजह से तब जान माल की हानि नही हुई थी. 

https://twitter.com/AmitShah/status/1420375043448573956?t=A2zYTtK35N3SrKQfjRBXcg&s=08

नीतीश के सेनगुप्ता रिपोर्ट का लिखा शायद अब दिखता नही

15 जुलाई 2004 को गृह मंत्रालय की तरफ से लोकसभा में कहा गया था कि नीतीश.के.सेनगुप्ता रिपोर्ट के अनुसार अमरनाथ यात्रा में प्रतिदिन 3500 यात्रियों को ही भेजा जाना चाहिए, जिसमें पहलगाम रूट से 2800 और बालटाल से 700 को ही यात्रा की अनुमति दी जाए.

इस साल चल रही अमरनाथ यात्रा में आपदा प्रबंधन की तैयारियों में लापरवाही साफ देखी जा सकती है. खराब मौसम की जानकारी होते हुए भी पवित्र अमरनाथ गुफा यात्रा दर्शन के दौरान नीतीश.के.सेनगुप्ता की रिपोर्ट पर कोई ध्यान नही दिया गया. यात्रियों की सीमित संख्या रखने और यात्रा के रास्ते में बसासत को कम करने के गम्भीर प्रयास भी नही किए गए.

 अमरनाथ गुफा के दर्शन करने वाले यात्रियों की संख्या पर नजर डालें तो 'श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड' की वेबसाइट में इस साल अमरनाथ आने वाले यात्रियों की संख्या नहीं दिख रही है लेकिन दैनिक जागरण की खबर के अनुसार अमरनाथ यात्रा के पहले सात दिन में ही एक लाख लोगों ने पवित्र गुफा के दर्शन कर लिए थे


साल 2019 में लगभग 3,42,000 लोगों ने अमरनाथ यात्रा पूरी की थी, 20 जुलाई 2019 को एक दिन में सबसे अधिक 20,915 यात्री पवित्र गुफा गए थे.


लंगर जब बारातघर बन जाएंगे तो भीड़ क्यों न हो

केदारनाथ आपदा में मुख्य मंदिर के आसपास हुई बेतरतीब बसासत की वजह से मरने वाले लोगों की संख्या अधिक थी और ऐसा ही कुछ अमरनाथ में भी हुआ है. अमरनाथ यात्रा में लाखों लोगों की आमद की वजह से यात्रा के रास्तों में टेंट और दुकानों की भरमार रहती है.

2017 में 'अमरनाथ यात्रा: एक सैनिक तीर्थ यात्रा' नाम से आई रिपोर्ट के अनुसार साल 2013 में अमरनाथ यात्रा में पड़ने वाले टेंट और दुकानों की संख्या 6130 थी.


इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है अमरनाथ यात्रा के रास्ते में जो लंगर भूखे और थके यात्रियों को आराम देने के लिए बनाए गए थे, अब वह किसी शादी की पार्टी सा एहसास देते हैं. उदाहरण के लिए पौषपत्री में भंडारे के दौरान 100 से अधिक व्यंजन खिलाए जाते हैं. इन लंगरों में भीड़ बहुत अधिक रहती है और इस आपदा में भी आपदा क्षेत्र के लंगर में बहुत अधिक लोगों के जमा होने की खबर सामने आई है.

https://youtu.be/DdJFCDtq6zY

तकनीक हैं पर इस्तेमाल नही हुआ

उत्तराखंड में 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद डॉप्लर रडार लगाने की बात शुरू हुई और मुक्तेश्वर में रडार शुरू भी हो चुका है.

https://twitter.com/ANI/status/1432382783058366464?t=31FCT-cZsRlIR92jEmcevw&s=19

डॉप्लर रडार बादलों में मौजूद पानी के कणों का आकंलन कर सटीक डाटा देता है, जिससे पूर्वानुमान लगाया जाता है कि कितने मिलीमीटर तक बारिश हो सकती है. डॉप्लर रडार लगभग सौ किलोमीटर क्षेत्र में होने वाले मौसम के बदलाव की जानकारी दे सकता है. इस उपकरण के माध्यम से तेज पानी बरसने के आधे घंटे पहले ही सटीक डाटा मिल सकता है.

https://twitter.com/KNO_NEWS/status/1144611621748105216?t=h7186jjXVVtfZAL7dlWSQw&s=19

 अमरनाथ यात्रा के दौरान भी पवित्र गुफा के आसपास हर साल डॉप्लर रडार लगाने की बात होती है पर आपदा के दौरान यह किसी काम नही आया और न ही मौसम विभाग तेज वर्षा की सटीक जानकारी देने में कामयाब रहा.

https://twitter.com/KNO_NEWS/status/1144611621748105216?t=h7186jjXVVtfZAL7dlWSQw&s=19


हिमांशु जोशी

@himanshu28may


Wednesday, July 6, 2022

हैप्पी बर्थडे धोनी : थाला का सफर अब भी जारी है.

जन्मदिन मुबारक हो कप्तान। आपके अच्छे स्वास्थ्य और खुशियों की कामना करता हूँ | @msdhoni #HappyBirthdayMSDhoni 

https://twitter.com/pragyanojha/status/1544879467327135744

प्रज्ञान ओझा ने आज महेंद्र सिंह धोनी के लिए उनके 41वें जन्मदिन पर ये ट्वीट किया है.

यही हैं धोनी जो अपने समकालीन क्रिकेटरों के लिए हमेशा कप्तान थे और रहेंगे. धोनी सिर्फ भारत ही नही दुनिया भर में क्रिकेट समझने और जानने वाले लोगों के बीच सम्मान पाते हैं.

जब अंग्रेजों की जमीन पर भारतीयता की जीत हुई

साल 2011 की बात है भारत इंग्लैंड दौरे के दौरान लॉर्ड्स में खेला गया पहला मैच 196 रनों से हार गया था. नॉटिंघम में खेले जा रहे दूसरे टेस्ट में भी इंग्लैंड ने अपनी दूसरी पारी में भारत पर 184 रनों की लीड चढ़ा ली थी.

 इशांत शर्मा की गेंद पर इयान मॉर्गन ने लेग साइड पर शॉट खेला और 131 रन पर खेल रहे इयान बेल रन दौड़ने लगे, बाउंड्री पर प्रवीण कुमार ने गेंद रोकी पर खुद उन्हें भी नही पता था कि गेंद बाउंड्री से टकराई या नही. बेल गेंद को बाउंड्री पर सोचकर क्रीज छूने नही गए और अभिनव मुकुंद ने हल्के से गिल्लियां बिखेर दी थी. थर्ड अंपायर ने इयान बेल को आउट करार दिया और चायकाल का समय भी हो गया, निराश बेल पैवेलियन वापस लौट गए. चाय के बाद जब भारतीय टीम मैदान पर उतरी तो इंग्लैंड के दर्शक भारतीय टीम की हूटिंग 'बू बू' से करने लगे, लेकिन जैसे ही इयान बेल ग्राउंड पर उतरे तो ग्राउंड पर भारतीय टीम की हो रही ये हूटिंग तालियों में तब्दील हो गई. धोनी ने इयान बेल के खिलाफ की अपील वापस लेकर, उन्हें फिर से खेलने का मौका दे दिया था. भारत ये टेस्ट 319 रनों से हार गया था पर अंग्रेजों की जमीन पर ये भारतीयता की जीत थी.

बाद में इयान बेल ने इस घटना पर खुद की गलती भी मानी थी और इसी घटना के लिए धोनी को साल 2020 में आइसीसी की तरफ से इस दशक का स्पिरिट ऑफ क्रिकेट अवॉर्ड दिया गया.

https://twitter.com/ICC/status/1343509742623178753

कप्तान धोनी

 महेन्द्र सिंह धोनी एक अच्छे विकेटकीपर, बल्लेबाज ही नही एक सफलतम कप्तान भी हैं. इस खिलाड़ी के कई रूप हैं, कई पारियां हैं जो क्रिकेटप्रेमियों की कभी न भूलने वाली यादें बन चुकी हैं. जसप्रीत बुमराह, युजवेंद्र चहल, दीपक चाहर और न जाने कितने क्रिकेटर जिनका क्रिकेट धोनी ने उनके शुरुआती दिनों में सजाया और संवारा है.

भारतीयों की रगों में क्रिकेट दौड़ता है. यहां शतकों का सैकड़ा बनाने वाले सचिन को 'भगवान' का दर्जा मिला तो नायाब महेंद्र सिंह धोनी के रूप में एक 'थाला' भी मिला.

https://twitter.com/CSKFansOfficial/status/1544883391341797376

क्रिकेट पर जान छिड़कते इस देश के लोगों के बीच से जब 1983 के वर्ल्ड कप की यादें धुंधली पड़ने लगी थी. तब धोनी ने करोड़ों भारतीय क्रिकेटप्रेमियों का वो सपना पूरा किया, जिसकी आस में वो सालों से न जाने कितनी कॉपियों में भारत की टीम लिखते और मिटाते आए थे.

धोनी युग की शुरुआत

साल 2003 में हम ऑस्ट्रेलिया से वर्ल्ड कप के फाइनल में हारे और इस हार कई क्रिकेट प्रेमियों के दिलों को गहरा जख्म दे गई थी.

इन्हीं जख्मों पर मरहम लगाने की खोज में साल 2004 के अंत में धोनी को भारतीय क्रिकेट टीम में लाया गया और 2007 में वेस्टइंडीज के निराशाजनक एकदिवसीय वर्ल्डकप के बाद उन्हें भारतीय टीम का कप्तान बना दिया गया. ये वो कप्तान था जो भारतीय क्रिकेट का भविष्य बदलने आया था, धोनी ने साल 2007 में पहली बार खेले जा रहे टी-20 विश्व कप का खिताब भारत को दिलवाया. ये जीत इसलिए खास थी क्योंकि फाइनल में भारत ने पाकिस्तान को हराया था.

साल 2009 में भारतीय क्रिकेट टीम उनकी कप्तानी में टेस्ट की नम्बर वन टीम बन चुकी थी.

सचिन के लिए जब हमारा दिल डूबा जा रहा था कि कहीं साल 2011 के वर्ल्ड कप में भी उन्हें विश्व कप नसीब न हो तब वो धोनी ही थे, जो तेजी से कदम उचकाते ग्राउंड में जाते ही अपनी रणनीति से विपक्षियों को पस्त कर सचिन को वर्ल्ड कप चूमने का मौका दे गए.

पूरी सीरीज में युवराज का बेहतरीन खेल हो या श्रीलंका के खिलाफ मुंबई में खेले गए फाइनल मैच के अंत में धोनी द्वारा जड़ा गया विजयी छक्का, इस सीरीज की हर याद भारतीय क्रिकेट प्रेमियों ने हमेशा के लिए अपने दिल में बसा ली.

जून 2013 में इंग्लैंड को पांच रन से हरा धोनी ने भारत को चैंपियंस ट्रॉफी का दूसरा खिताब दिलवाया. इसके साथ ही धोनी विश्व के अकेले ऐसे कप्तान बन गए, जिन्होंने आईसीसी की तीनों ट्रॉफियां जीती हों 

मैदान के बाहर भी चौंकाते धोनी

 ऐसा नहीं है कि धोनी ने मैदान में अपने किए कारनामों से ही लोगों को चौंकाया है, धोनी ने मैदान के बाहर लिए अपने फैसलों से भी क्रिकेट को फॉलो करने वाले लोगों को चौंकाया. साल 2014 में धोनी ने ऑस्ट्रेलिया दौरे के बीच में ही टेस्ट क्रिकेट से सन्यास लेने का एलान कर दिया.

https://twitter.com/BCCI/status/549852435586752513

2015 में ऑस्ट्रेलिया में होने वाले एकदिवसीय क्रिकेट विश्व कप के ठीक पहले धोनी एक खूबसूरत बच्ची के पिता बने, लेकिन भारत को वर्ल्ड कप जिताने के मिशन पर ध्यान देने के लिए धोनी उसे देखने तक नही आए.

अफसोस भारत इस विश्व कप के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया से हार गया और इसके बाद ही धोनी अपनी बेटी से मिले.

विवादों से भला कौन बचता है

कैप्टन कूल कहे जाने वाले धोनी का विवादों से भी नाता रहा. चेन्नई सुपरकिंग्स के बैन पर उनकी साधी गयी चुप्पी पर काफी सवाल खड़े हुए. इसके साथ ही वरिष्ठ खिलाड़ियों को टीम से बाहर निकालने को लेकर भी धोनी पर आरोप भी लगते रहे हैं.

तभी तो धोनी हैं बाहुबली, अंतरराष्ट्रीय के बाद अब आईपीएल में कमाल

जुलाई 2015 में चेन्नई सुपरकिंग्स पर अवैध सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग के आरोपों को लेकर दो साल का बैन लगा दिया गया और धोनी आईपीएल में नई नवेली टीम पुणे सुपरजाइंट्स के साथ जुड़ गए. यहां धोनी कमाल नहीं दिखा सके और आलोचकों के निशाने पर आ गए.

पर धोनी तो धोनी हैं. दो साल के बैन के बाद साल 2018 में जब आईपीएल में चेन्नई सुपरकिंग्स की वापसी हुई, तब धोनी ने उसे खिताब जिताने के साथ ही आलोचकों के मुंह पर ताले जड़ दिए.

इसके बाद साल 2019 के आईपीएल में धोनी की टीम फाइनल में मुंबई से सिर्फ एक रन से हारी थी.

इंग्लैंड में खेले गये साल 2019 के एकदिवसीय क्रिकेट विश्वकप में धोनी के प्रदर्शन पर बीच विश्वकप में ही आलोचक कहने लगे कि धोनी तो अब धीमा हो गया है. धोनी फिर से अपने आलोचकों को चुप ही करने वाले थे कि सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड के खिलाफ बेहद दबाव भरे मैच में अच्छा खेलने के बाद रन आउट हो गए, धोनी रनआउट क्या हुए उनके साथ जबरदस्त खेल रहे जडेजा के भी कंधे झुक गए और भारत का उस विश्वकप में सफर वहीं खत्म हो गया.

धोनी फिर क्रिकेट से दूर रहे और 2020 में स्वतंत्रता दिवस की शाम करोड़ों धोनी प्रेमियों का दिल तोड़ते उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट के जरिए खुद को रिटायर घोषित कर दिया.

https://twitter.com/ICC/status/1294646852613177344

साल 2020 के आईपीएल में चेन्नई सुपरकिंग्स प्लेऑफ से बाहर होने वाली पहली टीम बनी लेकिन 2021 के आईपीएल में धोनी ने चेन्नई को उसका चौथा आईपीएल खिताब जिताया.

धोनी के साल 2022 आईपीएल में कप्तानी न करने के फैसले के बाद रविन्द्र जडेजा को कप्तानी दी गई थी, लेकिन रवींद्र जडेजा के बीच आईपीएल में कप्तानी पद छोड़ने के बाद धोनी को ये जिम्मेदारी फिर से दे दी गई.

 सनराइजर्स हैदराबाद के खिलाफ हुए मैच से पहले पीले रंग से रंगी दर्शक दीर्घा के शोर के बीच धोनी ने आईपीएल में अपने भविष्य पर भी बड़ा बयान दे दिया था, उन्होंने 2023 में आईपीएल खेलने की संभावना से इंकार नही किया.

https://twitter.com/IPL/status/1520762355483049985

साल 2022 में धोनी कप्तान पद पर वापसी के बावजूद चेन्नई को प्लेऑफ तक नही पहुंचा पाए, हालांकि अगले आईपीएल के लिए वो अभी से तैयार हैं और अपने घुटने की समस्या का आयुर्वेदिक इलाज रांची से करीब सत्तर किलोमीटर दूर लापुंग गांव में करवा रहे हैं. मीडिया में धोनी का ये इलाज भी चर्चा का विषय बना हुआ है. थाला का सफर अब भी जारी है और शायद हमेशा रहेगा.

हिमांशु जोशी

@himanshu28may

Monday, July 4, 2022

एक औरत को करीब से समझाती 'बांझ'

अमूमन कई मर्द ये मानते हैं कि औरत का सिर्फ एक ही रूप है और औरत ने वो रूप सिर्फ उसके लिए ही धारण किया है। लेकिन एक औरत के कई रूप होते हैं और सिर्फ उसका रूप रंग ही उसकी पहचान नही है। 
साठ से अधिक फिल्मों में काम कर चुकी अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी की लिखी किताब 'बांझ' एक औरत के उन्हीं ढेर सारे रंगों को हमारी आंखों के सामने लाती है।

पुस्तक- बांझ- स्त्री मन के अधखुले पन्ने
लेखिका- सुष्मिता मुखर्जी
अनुवाद- दीपक दुआ
प्रकाशन- रीडोमानिया
मूल्य- 199₹

किताब के आवरण चित्र में एक स्त्री की पेंटिंग है और इसे गौर से देखा जाए तो ऐसा लगता है मानो स्त्री में पूरी सृष्टि ही समाहित है।
पिछले आवरण में आपको किताब के अनुवादक दीपक दुआ और लेखिका सुष्मिता मुखर्जी के बारे में जानकारी मिलती है। इसमें लिखा है यह किताब 11 कहानियों का संग्रह है और यह कहानियां इस बात को स्थापित करती हैं कि एक औरत का महत्व समाज द्वारा उस पर लगाए गए ठप्पों से कहीं अधिक है।
यह बात सत्य तो है पर किताब की कहानियां इस सत्य के साथ कितना न्याय कर सकी हैं यह आप किताब पूरी पढ़ने के बाद ही बता सकेंगे।

'समर्पण' के दो शब्द 'खुरदुरी बुनाई' ही आपके दिल के तार हिला देंगे। यहां पाठकों के मन में 'शुरुआत ऐसी तो अंत कैसा' विचार आने लगेगा।  किताब के परिचय में सुष्मिता ने जिस तरह से अपनी जीवन यात्रा को समेटा है ,उसे पढ़ ऐसा लगता है मानो वह इस किताब के जरिए ऐसा कुछ कहना चाहती हैं जो वह आज तक किसी से कह न पाई हों। अनुवादक दीपक दुआ ने भी सुष्मिता के उन विचारों को भली-भांति समझ कर बड़ी खूबसूरती से हिंदी पाठकों तक पहुंचाया है। 

किताब का शीर्षक बांझ, इस किताब की पहली कहानी का नाम भी है। रुक्मिणी के चेहरे और बिछौने का वर्णन जिस तरह से किया गया है, वह उसके नीरस जीवन की तरफ इशारा कर देता है। कहानी में एक के बाद एक कई पंक्तियां आपको एक स्त्री के जीवन की सच्चाई से परिचित कराती हैं।
'शादी के बाद माता पिता ने उसे ऐसे भुला दिया जैसे कोई हिसाब पूरा हो जाने के बाद पर्चा फाड़ दिया जाता है' पंक्ति हमारे देश की बहुत सी औरतों की सच्चाई सामने रखती है। बांझ कहानी में लेखिका द्वारा हमारे समाज में पितृसत्ता के वर्चस्व और उसके खात्मे के समाधान को लिख दिया गया है, पितृसत्तात्मक समाज के अंत का जो तरीका इस कहानी में लिखा गया है शायद वो कई पाठकों को सही न लगे पर यह पाठकों पर है कि वह इसे कैसे रूप में लेते हैं।

किताब की दूसरी कहानी भारत के उन लोगों की सच्चाई है ,जो बड़ी-बड़ी इमारतों के पीछे छिपे रहते हैं और हम उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते। पेट की मजबूरी इन गरीबों से क्या कुछ कर कराती है ,लेखिका अपनी कहानी के जरिए पाठकों तक उनकी कहानी बड़े ही भावुक तरीके से पहुंचाती हैं।

'साकरी बाई' की शुरुआत में पाठक भी साकरी बाई को पुकारने लगेंगे। इस कहानी में हम पढ़ते हैं कि हमारे समाज में एक औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है। किताब में आपको बार-बार महिलाओं की पहचान उनकी सुंदरता (जिसमें रंग और कद काठी को मानक बना दिया जाता है) से किए जाने का अहसास होगा और हम अपने आसपास देखें तो यह वास्तविकता ही है।

'यादें, लाल नाक की' कहानी में 'सफेद, शोक में डूबे रंग वाली' पंक्ति में लेखिका सफेद रंग को शोक वाला रंग करार दे पाठकों को ऐसी शोक सभाओं की याद दिला देती हैं ,जहां सभी लोग सफेद वस्त्र धारण किए होते हैं।
रिश्तो की जटिल गणित पर लिखी गई यह कहानी अपने अंत से पाठकों को कुछ देर तक फिर से इस कहानी को सोचने पर मजबूर कर देगी।

हम सब अपनी जिंदगी में कुछ ना कुछ ढो ही रहे हैं और उससे मुक्ति चाहते हैं। रिश्तो से मुक्ति भी इसमें शामिल है और इसी मुक्ति से जुड़ी एक कहानी भी लेखिका ने बड़ी रोचकता के साथ लिख डाली है।

स्टारबज्ज कहानी में दुर्गा का ड्राइवर के सामने लगे शीशे में खुद को निहारना, पसंद करना, इस बात की निशानी है की अधिकांश महिलाएं खुद को एक सौंदर्य उत्पाद के रूप में स्वीकार कर चुकी हैं। वह खुद चाहती हैं कि लोग उनके रूप रंग को निहारे लेकिन वह अपनी असली ताकत को नहीं पहचानती।
कहानी में लेखिका ने दुर्गा के वर्तमान से शुरू होकर उसके अतीत की कहानी को बड़े ही बेहतर तरीके से लिखा है और इस कहानी का अंत भी किताब की अन्य कहानियों की तरह ही पाठकों की सोच से परे है।

बड़ी बिंदी और छोटी ड्रेस कहानी के कुछ शब्द कई पाठकों को अश्लील लग सकते हैं और हो भी सकता है कि वो इनको लेकर हो-हल्ला मचाएं। ऐसे देश में जहां महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे शब्द महिलाओं का सम्मान न करने वाले लोगों की सोच को आइना दिखाने के लिए बिल्कुल सही हैं।
औरतों का बड़ी बिंदी वाली औरत और छोटी ड्रेस वाली औरत के रूप में बंटवारा, भारत के घर-घर की कहानी है. महिलाओं को इस रूप में भी बांट दिया गया है।

किताब में कहानियों के शीर्षक बड़े ही सटीक हैं और नीचे दिए गए पृष्ठों की संख्या के चारों और की गई ग्रे शेड पाठकों का ध्यान खींचती हैं। लेखिका ने कभी खुद ही कहानी का एक पात्र बनकर कहानी लिखी है तो कभी दर्शक बनकर।

'मुझे लगता है इस किस्म के रचनात्मक लोगों की बीच प्यार का अंकुर नहीं फूटता, सीधे फूल ही खिलता है' पंक्ति लेखिका खुद रचनात्मक होने की वजह से ही लिख पाई हैं।

बे-पर परिंदा कहानी में एक मां बनने जा रही महिला का कबूतर के बच्चों से लगाव, इस किताब का आकर्षण है। ये कहानी सन्देश देती है कि एक औरत ही अपने परिवार को एक साथ रखती है।
 'उम्र भर के दोस्त' कहानी ऐसे लिखी गई है मानो सुष्मिता पाठकों के सामने बैठकर उन्हें यह कहानी सुना रही हों। यह किताब की एकमात्र ऐसी कहानी है जिसमें स्त्री से ज्यादा पुरुष को महत्व दिया गया है।

'शालीमार' वो कहानी है जिसे पढ़कर लगता है कि अगर किताब का नाम बांझ न होता तो शालीमार होता। पृष्ठ संख्या 76 के अंत की कुछ पंक्तियां पढ़ एक औरत की मजबूरी समझी जा सकती है। किताब की अंतिम कहानी 'अफेयर' में श्रीला ने उन महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया है जो अपना परिवार संभालने की व्यस्तता में अपना सपना भूल चुकी हैं। कहानी का अंत पढ़ आप महसूस करेंगे कि महिलाएं हमेशा से ही पुरुषों से ऊंचा उड़ सकती हैं। लेखिका भी तो यही चाहती थी कि समाज ने जो ठप्पा औरत की छवि पर लगा दिया है इस किताब को पढ़ समाज समझे कि औरत को ऐसे किसी ठप्पे की जरूरत नही है।

बहुत सी किताबों से अलग इस किताब का आभार अंत में है। लेखिका ने दीपक दुआ द्वारा किए अनुवाद में जिन रूपकों के प्रयोग की बात करी है, वास्तव में उनसे कहानियों की खूबसूरती बढ़ी है।
 आखिरी पन्नों में लेखिका और अनुवादक का परिचय पिछले आवरण में भी दिया है इसलिए उसकी कोई आवश्यकता नही लगती, हां प्रकाशक के बारे में जानकारी वाला पन्ना सही है।

समीक्षक- हिमांशु जोशी
@himanshu28may


Sunday, July 3, 2022

प्लास्टिक की लत छोड़ना समुदाय का ही काम है.

मनुष्य की प्लास्टिक पर निर्भरता बढ़ने से पर्यावरण पर गम्भीर दुष्प्रभाव पड़ा है. सरकार ने सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन तो लगाया है पर पर्यावरण बचाने के उसके इस मिशन को समुदाय का साथ चाहिए ही होगा.

पर्यावरण की दृष्टि से प्लास्टिक बहुत ही घातक है. प्लास्टिक में हानिकारक रसायन होते हैं और इससे होने वाले कचरे की सफाई पर भी बहुत खर्च आता है.
समय आगे बढ़ने के साथ, प्लास्टिक पांच मिलीमीटर से भी छोटे सूक्ष्म कणों में विखण्डित हो जाता है, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक्स कहते हैं. ये माइक्रोप्लास्टिक जल निकायों और खेतों की मिट्टी के माध्यम से हमारे भोजन और हवा में मिल जाते हैं.

प्लास्टिक पर बढ़ती निर्भरता और उसके परिणाम

अर्थ डे डॉट ऑर्ग के अनुसार साल 2021 में 583 बिलियन प्लास्टिक बोतलों का उत्पादन हुआ था, यह पांच साल पहले हुए उत्पादनों से सौ बिलियन अधिक था. साल 1950 में विश्व भर में दो मिलियन टन प्लास्टिक का उत्पादन होता था, जो साल 2015 में 381 मिलियन टन हो गया था.

साल 2015 में प्लास्टिक का सबसे ज्यादा उपयोग पैकेजिंग में किया गया था.

 रोजाना लाखों टन प्लास्टिक नदियों और समुद्र तक पहुंच रहा है. जमीन से लेकर समुद्र तक प्लास्टिक का ढेर इंसान के साथ-साथ समुद्री जीवों के लिए भी खतरा है. समुद्री प्लास्टिक मलबे के समुद्री जीवों पर दुष्प्रभाव को इस टेबल में दिखाया गया है.


            नैनीताल झील में प्लास्टिक कचरा

समुद्र ही नही जमीन पर रहने वाले जानवरों के लिए भी ये प्लास्टिक का कचरा जानलेवा है. वॉयस ऑफ अमेरिका की रिपोर्ट दिखाती है कि श्रीलंका में प्लास्टिक का कचरा खाने की वजह से हाथी मर रहे हैं. कुछ ऐसी ही खबर साल 2018 में आई थी, जब केरल में भी इस कचरे को खाने की वजह से हाथी की मौत हुई.

प्रतिबंधित हुआ सिंगल यूज प्लास्टिक पर आखिर होगा कितना प्रभावकारी!

प्लास्टिक से बनी वो चीजें जो एक बार ही उपयोग में लाई जाती है और फेंक दी जाती है, उन्हें सिंगल यूज़ प्लास्टिक कहा जाता है.  प्लास्टिक कैरी बैग, चाय की प्लास्टिक की कप, चाट गोलगप्पे वाली प्लास्टिक प्लेट, बाजार से खरीदी पानी की बोतल, स्ट्रॉ सभी सिंगल यूज प्लास्टिक के उदाहरण हैं.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा फरवरी 2022 में जारी की गई अधिसूचना के मुताबिक 1 जुलाई 2022 से सिंगल यूज प्लास्टिक से बने सामानों का उत्पादन, आयात और इस्तेमाल करना प्रतिबंधित हो जाएगा. 

इन सामानों में प्लास्टिक के स्ट्रॉ, इयरबड्स, गुब्बारों में लगने वाली प्लास्टिक की स्टिक, सजावट में इस्तेमाल होने वाला थर्माकोल, आइसक्रीम स्टिक, कैंडी स्टिक, प्लास्टिक के कप, प्लास्टिक के झंडे, प्लास्टिक की चाकू-छुरी, ट्रे, प्लास्टिक की मिठाई के डिब्बे, शादी के कार्ड पर इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक शीट, मिठाई के डिब्बे पर इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक शीट, सिगरेट के पैकेट पर लगी प्लास्टिक की पन्नी आदि जैसे सामान शामिल हैं.

जोर बाघ रोड, नई दिल्ली स्थित केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ऑफिस में आदेश तो निकाले जा सकते हैं पर वहां से दो-तीन सौ किलोमीटर दूर उन आदेशों का पालन कैसे किया जाए , यह दुकानदारों के लिए भी बड़ा मुश्किल काम होता है. नई दिल्ली से तीन सौ किलोमीटर दूर स्थित उत्तराखंड के मझोला में रहने वाले दुकानदार शफीक बताते हैं कि हम जैसे छोटे दुकानदारों के लिए पैसा बचाना बड़ा मुश्किल काम होता है. पन्नी के कैरी बैग सस्ते पड़ते हैं और कागज के महंगे. अगर 250 ग्राम वाली पन्नी के कैरी बैग खरीदे जाएं तो 45 रुपए में इसके अस्सी से नब्बे पीस मिल जाते हैं, वहीं कागज के कैरी बैग बनाने में इसका खर्चा दोगुना हो जाता है. अखबार चालीस रुपए किलो है, एक किलो अखबार में सत्तर से अस्सी कैरी बैग बनते हैं और उसको बनाने का खर्चा व समय की खपत अलग. लोग अगर खुद का कैरी बैग लाएंगे तो हम भी उन्हें पन्नी का कैरी बैग क्यों दें, दुकान में आए ग्राहक को कोई क्यों लौटाएगा!

सिंगल यूज प्लास्टिक को इस्तेमाल करना या न करना अंत में देश के नागरिकों का ही कर्तव्य है.

 प्लास्टिक से होने वाले नुकसान को समझते हुए देश के नागरिक ऐसी वस्तुओं का खरीदें ही न जो प्लास्टिक से बनी हों. खाने और पीने के लिए प्लास्टिक के बर्तनों पर निर्भर न रहते हुए कहीं भी आते जाते, अपने साथ कुछ बर्तन हमेशा रखने की आदत डालें. दुकान से सामान लेने के लिए जाते घर से ही कपड़ों का बैग साथ ले जाएं. 

प्लास्टिक से होने वाले नुकसान को बताने के लिए सरकार को युद्धस्तर पर जानकारी प्रसारित करनी होगी और जनसंचार के माध्यमों द्वारा हर नागरिक तक ये बात पहुंचनी जरूरी है. सोशल मीडिया पर पोस्टर, हैशटैग का सहारा लिया जा सकता है.

 देश के जाने-माने खिलाड़ियों, अभिनेताओं, गायकों, नेताओं द्वारा अपने सोशल मीडिया अकाउंट से अपने फॉलोवर्स तक प्लास्टिक से होने वाले नुकसान की जानकारी पहुंचाई जा सकती है. नशे से होने वाला नुकसान तो व्यक्तिगत है पर प्लास्टिक से पर्यावरण को होने वाला नुकसान सार्वजनिक, इसलिए फिल्मों की शुरुआत में भी इसके बारे में जानकारी दी जानी चाहिए.

प्लास्टिक का सामान बनाने वालों को भी प्लास्टिक के विकल्प तलाशने होंगे, शुरुआत में तो ये विकल्प महंगे होंगे लेकिन खपत बढ़ने पर खुद ही सस्ते होते जाएंगे. जैसे मट्टी और लकड़ी के बर्तन ज्यादा बनेंगे तो सस्ते भी बिकेंगे.

वेल्स के द्वीप एंगलेसी को  2019 में पहली प्लास्टिक मुक्त काउंटी का अवार्ड दिया गया था. वहां समुदाय ने एकजुट होकर प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने का निर्णय लिया, उन्होंने प्लास्टिक की जगह लकड़ी के बर्तनों का इस्तेमाल किया.

आहार आरोग्य मेला राजकोट में प्लास्टिक की प्लेट और बैग को पूरी तरह प्रतिबंधित कर समाज को प्लास्टिक के खात्मे की तरफ बढ़ने के लिए जागरूक किया जा चुका है. इस मेले की आयोजन समिति से जुड़े गांधीवादी अनिरुद्ध जडेजा बताते हैं कि हम इस मेले में लोगों को खाने के लिए घर से ही टिफिन लाने के लिए कहते हैं. मेले में ऐसी पन्नी लानी की अनुमति होती है जो थोड़ी मोटी हक और बार-बार इस्तेमाल की जा सके, साथ ही दो-तीन ऐसी स्टॉल लगाई जाती हैं जहां लोगों को बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक से बने बैगों को खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...