जब पहली बार तुझे पहना था,
घूम घूम के आइने में खुद को देखा था।
आइने पर लिखा था 'क्या मेरी वर्दी ठीक है'
पर दिल में सवाल था क्या इस जिस्म में ये वर्दी ठीक है!
सवाल था खुद को भूल कर खाकी हो जाने का।
अब खुद को इस खाकी पर समर्पित कर देने का।
दोस्त बन रहे थे मेरे इंजीनियर और डॉक्टर,
लेकिन ठुल्ला कहलाया जाने लगा अब मैं अपने ही घर।
गर्मी में चुभता तो बरसात में भीगने लगा ये खाकी रंग,
पूस की रात में चौराहे पर कभी कड़कड़ा जाता हर अंग।
फिर आया कोरोना, मानव जाति पर मुसीबत बनकर
खड़ा था मैं सबकी रक्षा के लिए ढाल बनकर।
इसके बावजूद लोग मुझे भूलने लगे हैं,
चौराहे पर फिर मुझपर गाड़ी चढ़ाने लगे हैं।
उनके लिए हर मुसीबत का जिम्मेदार खाकी है,
तो हर समस्या का समाधान भी खाकी है।
कल ही की तो बात है,
एक इमारत भरभरा कर गिर चुकी है।
हर मजदूर को ये खाकी ही बाहर निकाल रही है।
सब ठीक थे, नाते रिश्तेदार अपनों को पाकर खुश थे।
हर कोई घर जाने की जल्दी में था और मैं एक शुक्रिया पाने की उम्मीद में था।
शायद वो जिंदा मजदूर मुझसे कल फिर जरूर मिलेगा,
किसी भीड़ में मुझपर ही अपना दम आजमाएगा।
फिर भी मैं घूम घूम कर कर खुद को आईने में देखूंगा
और बस हल्के से मुस्कुराउंगा।।
हिमांशु जोशी।।
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