Tuesday, October 28, 2025

राजधानी में उत्तराखंड के गांवों से लेकर महिला सुरक्षा तक की रिपोर्ट

*राजधानी में उत्तराखंड के गांवों से लेकर महिला सुरक्षा तक की रिपोर्ट*


*‘खबरपात उत्तराखंड की’ के चौथे संस्करण में आपदाओं और समाज दोनों पर उठे सवाल*

देहरादून की दून लाइब्रेरी में आयोजित ‘खबरपात उत्तराखंड की’ के चौथे संस्करण में इस बार केवल पहाड़ी आपदाओं की नहीं, बल्कि समाज की अनदेखी समस्याओं की भी चर्चा हुई. अब तक हुए तीनों खबरपात आपदाओं पर केंद्रित रहे हैं और इस बार विषय रहा ‘आपदाओं से नहीं लिया सबक’.
कार्यक्रम के सूत्रधार वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट ने पुरानी आपदाओं से प्रभावित गांवों पर तैयार की गई कई ग्राउंड रिपोर्टें प्रस्तुत कीं, वहीं दीपा कौशलम ने ‘महिला सुरक्षा पर सवाल’ विषय पर अपनी बात रखी.

*2012 की आपदा के बाद भी खतरे में गांव*

त्रिलोचन भट्ट ने साल 2012 में आई आपदा से प्रभावित ऊखीमठ के मंगोली और चुन्नी गांवों की रिपोर्ट दिखाई. उस आपदा में 18 लोगों की मृत्यु हुई थी.
वीडियो में नजर आया कि जिन क्षेत्रों को आपदा प्रभावित घोषित किया गया था, वहीं अब नए निर्माण खड़े हैं. जिन घरों में तब आपदा आई थी, वहां रहने वाले लोगों को अब तक कहीं और बसाया नहीं गया. राहत और पुनर्वास के वादे अब भी अधूरे हैं.

*मंदाकिनी किनारे सेमी गांव में बढ़ता खतरा*

इसके बाद मंदाकिनी नदी के नजदीक सेमी गांव की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई. यहां जमीन लगातार धंस रही है.
गांव के लोगों ने बताया कि केदारनाथ मार्ग के नीचे चल रही जलविद्युत परियोजना के कारण यह धंसाव और तेज हो गया है. लोगों का कहना है कि अब वे हर वक्त इस डर में रहते हैं कि अगली बारिश में उनके घर खिसक न जाएं.

*रुद्रप्रयाग का ताला गांव जहां से अब तक हुआ 80 परिवारों का विस्थापन*

भट्ट की अगली रिपोर्ट ताला गांव (रुद्रप्रयाग जिला) से थी. यहां धंसाव के चलते अब तक 80 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है.
गांव की सड़क सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है, यह वही मार्ग है जो चीन सीमा तक पहुंचने वाले रास्तों से जुड़ता है. लेकिन लगातार हो रहे धंसाव ने इस सड़क को भी खतरे में डाल दिया है.

*दीपा कौशलम ने उठाया महिला सुरक्षा पर सवाल*

कार्यक्रम में महिला मुद्दों को उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता दीपा कौशलम ने ‘महिला सुरक्षा पर सवाल’ विषय पर विस्तार से अपनी बात रखी. उन्होंने NARI-2025 (National Annual Report and Index of Women’s Safety) रिपोर्ट के निष्कर्षों का उल्लेख किया.
दीपा ने बताया कि रिपोर्ट के अनुसार देहरादून की 50 प्रतिशत महिलाओं ने शहर को ‘highly safe’ बताया, यानी शेष 50 प्रतिशत महिलाओं के लिए यह शहर असुरक्षित महसूस होता है, जो सबसे चौंकाने वाली बात रही.

उन्होंने अपना एक निजी अनुभव भी साझा किया. हाल ही में देहरादून में एक बाइकर ने उनसे ‘जुगाड़’ शब्द का अपमानजनक ढंग से प्रयोग किया. उन्होंने कहा ऐसी घटनाएं मामूली नहीं होतीं. यह अनुभव बहुत परेशान करने वाला होता है. ऐसी घटना के बाद महिला आधे घंटे तक सोचती रहती है कि किसी ने उसके लिए ऐसा शब्द क्यों कहा.

*पहाड़ और समाज, दोनों से सबक लेने की जरूरत*

त्रिलोचन भट्ट ने कहा कि उत्तराखंड की हर आपदा चेतावनी बनकर आती है, लेकिन व्यवस्था उसे याद नहीं रखती.
दीपा कौशलम ने कहा कि जब तक समाज महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को गंभीरता से नहीं लेगा, तब तक कोई रिपोर्ट या कानून पर्याप्त नहीं होगा. पुलिस को संवेदनशील बनाए जाने की आवश्यकता है ताकि महिला वहां जाकर खुद को सुरक्षित समझे.

Monday, October 27, 2025

दीपावली के बाद दिल्ली में सांसें थमीं. जहरीली हवा में फंसी जिंदगी


*दीपावली के बाद दिल्ली में सांसें थमीं. जहरीली हवा में फंसी जिंदगी.*

दीपावली के कुछ ही दिन बाद दिल्ली एक बार फिर धुएं और धुंध की परत में लिपट गई है. पटाखों, पराली जलाने और वाहनों के धुएं ने मिलकर राजधानी को गैस चेंबर में बदल दिया है.

सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 400 से ऊपर पहुंच गया है, जो 'गंभीर' श्रेणी में आता है.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रदूषण बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा या हृदय रोग से पीड़ित लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है. सर गंगाराम अस्पताल के फेफड़ों के प्रत्यारोपण विभाग के डॉक्टरों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में बिना धूम्रपान करने वालों में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में चिंताजनक वृद्धि हुई है.


*फेफड़ों पर पड़ रहा सबसे घातक असर*

Environmental Research Letters में प्रकाशित अध्ययन ‘Air Pollution Exposure and Respiratory Morbidity in Indian Megacities’ यह साबित करता है कि PM2.5 का दीर्घकालिक प्रभाव अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, COPD और हृदयाघात जैसी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ा देता है.

अम्लीय वर्षा जैसी पर्यावरणीय प्रतिक्रियाएं अब दिल्ली-एनसीआर में आम होती जा रही हैं. जब जीवाश्म ईंधन जलाया जाता है, तो उससे निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर ऑक्साइड वायुमंडल में मिलकर अम्ल बनाती हैं.
Nature में प्रकाशित ‘Atmospheric Chemistry of Air Pollutants over Indo-Gangetic Plain’ अध्ययन के अनुसार ये गैसें जब कोहरे या वर्षा के साथ धरती पर गिरती हैं, तो मिट्टी, पेड़-पौधों और जलस्रोतों की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं.

*ठंड और प्रदूषण का मेल हर उम्र के लिए घातक*

डॉक्टर नूर, आदर्शनगर स्थित आदर्श हॉस्पिटल में चिकित्सक हैं. वह कहते हैं कि ठंड और प्रदूषण का यह मेल हर इंसान के लिए खतरनाक है. सर्दी के मौसम में हवा का प्रवाह कम होने से प्रदूषक तत्व वायुमंडल में फंसे रह जाते हैं. ऐसे में पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों में जम जाते हैं और सांस लेने में कठिनाई पैदा करते हैं.

डॉ. नूर के अनुसार इस मौसम में बुजुर्गों में क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी COPD का खतरा बहुत बढ़ जाता है. ठंड के साथ प्रदूषण का प्रभाव ब्लड प्रेशर पर भी पड़ता है. नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैसें दिल पर दबाव डालती हैं.
वह सलाह देते हैं कि लोगों को यथासंभव घर के अंदर रहना चाहिए. बाहर निकलने पर N95 मास्क पहनना चाहिए. हरी सब्जियों, विटामिन C और D से भरपूर भोजन को डाइट में शामिल करना चाहिए. गले और फेफड़ों की सफाई के लिए गर्म पानी और भाप लेना लाभकारी है.

*ज्यादा एक्सरसाइज नहीं, ध्यान और प्राणायाम जरूरी*

रितु दिल्ली में रहती हैं और आर्ट ऑफ लिविंग संस्था से जुड़ी योग शिक्षिका हैं. वह कहती हैं कि प्रदूषित हवा में हम अनजाने में अपने फेफड़ों का सिर्फ पंद्रह प्रतिशत उपयोग कर पाते हैं. इसलिए इस मौसम में जोरदार एक्सरसाइज की बजाय हमें योग, प्राणायाम और ध्यान को अपनाना चाहिए. इससे सांस लेने की गति नियंत्रित रहती है और दूषित हवा का असर कम होता है.

रितु आगे कहती हैं कि धूप में बैठना, हवन करना और घर में प्राकृतिक शुद्धिकरण उपाय अपनाना इस मौसम में बहुत ज़रूरी है. बच्चों और बुजुर्गों के लिए भाप लेना और गुनगुना पानी पीना फेफड़ों की सफाई में मददगार है.
उनके अनुसार कम से कम दस मिनट मौन ध्यान में बैठने से न केवल फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है, बल्कि मानसिक शांति भी मिलती है. इस दौरान टीवी, मोबाइल और बाहरी संपर्क से दूर रहना चाहिए.

*सामूहिक जिम्मेदारी की जरूरत*

दिल्ली में दीपावली के बाद वायु प्रदूषण अब एक मौसमी आपदा बन चुका है. सरकारें हर साल ग्रैप-3 और ग्रैप-4 जैसे आपात उपाय लागू करती हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि बिना जनसहभागिता इसके परिणाम स्थायी नहीं होंगे.


Environmental Health Perspectives में प्रकाशित एक अध्ययन ‘The Great Smog of Delhi – Health Impacts’ ने चेतावनी दी थी कि यदि नीतिगत और व्यवहारिक स्तर पर तत्काल परिवर्तन नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में दिल्ली की वायु, अस्थायी नहीं, स्थायी आपदा बन जाएगी.

अब वक्त है कि दिल्लीवासी व्यक्तिगत स्वास्थ्य से आगे बढ़कर पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी निभाएं. सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें, पेड़ लगाएं और अनावश्यक ईंधन दहन से बचें. तभी अगली दीपावली सिर्फ रोशनी का त्योहार बनेगी, धुएं का नहीं.

Thursday, October 23, 2025

युवाओं के हीरो कोहली की कहानी कुछ फिल्मी सी, बस अब परीकथा जैसे अंत की जरूरत

युवाओं के हीरो कोहली की कहानी कुछ फिल्मी सी, बस अब परीकथा जैसे अंत की जरूरत

विराट कोहली का क्रिकेट सफर किसी प्रेरणादायक फिल्म की तरह है, जिसमें संघर्ष, सफलता, असफलता और पुनः संघर्ष की कहानी है. उनकी आक्रामकता और आत्मविश्वास हर युवा के जोश और मेहनत का आईना बन गए हैं. मैदान पर उनका हर रन के बाद सिर ऊंचा कर चिल्लाना, जैसे हर भारतीय युवक का गुस्सा, जोश और मेहनत उन्हीं में उतर आया हो.

शुरुआत: सचिन के साथ खड़ा युवा

2008 में श्रीलंका के खिलाफ वनडे डेब्यू के वक्त कोहली की उम्र 19 साल 9 महीने थी. भारतीय टीम में सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और राहुल द्रविड़ जैसे दिग्गज मौजूद थे, फिर भी कोहली ने न झिझकते हुए निडर होकर अपनी पहचान बनाई. नेट्स में घंटों अभ्यास, मैदान पर हर शॉट में आक्रामकता और जोखिम लेने की क्षमता ने दिखाया कि यह खिलाड़ी किसी की छाया बनने वाला नहीं, बल्कि खुद पहचान बनाने वाला है. युवा कोहली की शुरुआत ही यह संकेत थी कि वे अपने समय के सबसे बड़े बल्लेबाज बनने वाले हैं. 2012 से 2016 के बीच आईपीएल में उन्होंने रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (RCB) के लिए खेलते कई बार टीम को जीत दिलाई और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भी वनडे व टी20 में लगातार शतक लगाए, तब उनके आक्रामक शैली और लीडरशिप के कारण 'किंग कोहली' का टैग लोकप्रिय हुआ.

किंग कोहली से 'चेज मास्टर'

2016 में भारत ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दिल्ली में वनडे सीरीज का एक अहम मैच खेला, जिसमें 350 से अधिक के लक्ष्य का पीछा करना था. कोहली ने 122 रन की निर्णायक पारी खेली, जिसने न केवल टीम को जीत दिलाई, बल्कि युवा दर्शकों में आत्मविश्वास की लहर दौड़ा दी. दबाव की स्थिति में संयम और आक्रामकता के बीच उनका बैलेंस, हर गेंद पर फोकस और हर रन के बाद दिखाई देने वाला जोश यह दिखाते थे कि मानसिक मजबूती और तैयारी से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं. उनकी इस तरह की कई पारियों ने उन्हें किंग कोहली के साथ एक नया नाम दिया 'चेज मास्टर'.

RCB और आईपीएल में समर्पण

आईपीएल में विराट कोहली की यात्रा संघर्ष और समर्पण से भरी रही. रॉयल चैलेंजर्स बैंगलुरु से शुरुआत करने वाले कोहली ने टीम को कई बार फाइनल तक पहुँचाया, लेकिन ट्रॉफी हाथ नहीं लगी. कप्तानी (2013-2021) के दौरान उनकी टीम ने जीत और हार दोनों का सामना किया, लेकिन कोहली ने कभी टीम नहीं छोड़ी. 2025 में आखिरकार RCB ने 18 साल बाद ट्रॉफी जीती और कोहली की आंखों में उस जीत का भाव साफ झलक रहा था. यह जीत उनके धैर्य, मेहनत और निष्ठा की कहानी थी, जिसने हर युवा को यह सिखाया कि कठिनाई में भी टिके रहना ही असली ताकत है.

2019 वर्ल्ड कप: हार और ट्रोलिंग का दौर

2019 वर्ल्ड कप विराट कोहली के करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर था. कप्तान के रूप में उन्होंने 9 मैचों में 443 रन बनाए, लेकिन भारत सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड से हार गया. सोशल मीडिया पर उनकी पत्नी अनुष्का शर्मा को भी गलत तरीके से निशाना बनाया गया. कोहली ने कहा कि इस समय का सामना करना उनके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा थी. 

कप्तानी का दौर और पद छोड़ना

2013 में टेस्ट टीम की कप्तानी मिलने के बाद कोहली ने भारतीय क्रिकेट में आक्रामक ऊर्जा दिखाई. टीम ने विदेशों में जीत दर्ज की और रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल किया. लगातार जिम्मेदारी और दबाव के कारण 2022 में उन्होंने कप्तानी छोड़ने का फैसला लिया. उन्होंने कहा कि अब वे सिर्फ बल्लेबाज के रूप में खेल का आनंद लेना चाहते हैं. यह कदम भावनात्मक था, लेकिन उनकी परिपक्वता और आत्मसम्मान को दर्शाता था.

कोरोना का असर और फिर बल्ले की खामोशी

कोविड-19 के दौरान क्रिकेट रुका और कोहली का बल्ला भी शांत हो गया. 2020 से 2022 तक उनके शतक नहीं आए और आलोचना लगातार बढ़ती रही. उनके प्रदर्शन में गिरावट ने उनके आत्मविश्वास पर असर डाला, और उन्हें अपने खेल और मानसिकता पर नए सिरे से ध्यान देना पड़ा.

कोरोना के बाद भी विराट कोहली के लिए मुश्किलें खत्म नहीं हुईं. 2025 में ऑस्ट्रेलिया दौरे पर टेस्ट सीरीज के दौरान उनका बल्ला मानो पीछे हट गया. बार-बार ऑफ-स्टम्प की गेंदों पर आउट होना उनके लिए तकनीकी और मानसिक चुनौती बन गया. वही गेंदें, जिन पर कभी वह बड़े शॉट खेलते थे, अब उन्हें छूती ही नहीं थीं. टेस्ट में लगातार असफलता ने उनके आत्मविश्वास पर गहरा असर डाला और आलोचना की आंधी तेज हो गई.

अब वनडे सीरीज में भी स्थिति अलग नहीं है. ऑस्ट्रेलिया में खेली जा रही तीन मैचों की वनडे सीरीज में कोहली लगातार दो पारियों में शून्य पर आउट हो गए हैं, जिससे उनकी आलोचना चरम पर पहुंच गई है. 

विश्व क्रिकेट में विराट कोहली का सम्मान

विराट कोहली को विश्व क्रिकेट में एक महान बल्लेबाज के रूप में देखा जाता है. इंग्लैंड के तेज गेंदबाज जेम्स एंडरसन ने उन्हें अब तक का सबसे कठिन प्रतिद्वंद्वी बताया है. न्यूजीलैंड के पूर्व कप्तान केन विलियमसन ने उन्हें पिछले 15 वर्षों का सबसे महान खिलाड़ी कहा. पाकिस्तान के तेज गेंदबाज शाहीन अफरीदी ने भी उनकी सराहना करते कहा कि मैं हमेशा विराट कोहली का प्रशंसक रहा हूँ. विराट कोहली का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में स्थान और सम्मान उनके निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन और समर्पण को दर्शाता है. इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया में दर्शक उनकी झलक पाने को बेताब रहते हैं और तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया जाता रहा है.

वापसी और पुराना जज़्बा लौटता रहा है

कोहली को चूका हुआ मान लेता गलती होगी, उन्होंने हमेशा वापसी की है.

2022 एशिया कप में कोहली ने अफगानिस्तान के खिलाफ नाबाद 122 रन बनाकर अपनी वापसी की. IPL में भी फॉर्म लौट आया और 2024-25 टी20 विश्वकप में उनकी निर्णायक पारी ने भारत की जीत में अहम योगदान दिया. उनके हर शॉट में वही जुनून, वही आक्रामकता और वही आत्मविश्वास दिखाई दिया जिसने उन्हें शुरुआत से अलग बनाया.

निजी जीवन और स्थिरता

अनुष्का शर्मा के साथ उनका रिश्ता उनके जीवन का आधार रहा. ट्रॉलिंग और आलोचना के बावजूद दोनों ने संयम बनाए रखा. कोहली ने कई बार कहा कि अनुष्का ने मुझे बेहतर इंसान बनाया. यह दिखाता है कि मैदान पर सफलता पाने के लिए निजी जीवन में शांति और संतुलन कितना जरूरी है.

हर युवा में खुद को देखने की क्षमता

कोहली का मैदान पर गुस्सा, फोकस और आक्रामकता हर युवा के भीतर छिपी महत्वाकांक्षा का रूप है. यही वजह है कि युवा उन्हें देखते ही अपने जोश, गुस्से और मेहनत में खुद को महसूस करते हैं. उनकी कहानी फिल्मी लगती है, पर अब हर फैन को बस उस परीकथा जैसे अंत का इंतजार है, जब कोहली एक बार फिर किसी विश्वकप फाइनल में भारतीय तिरंगे के नीचे बल्ला उठाते नजर आएं.

need edit for comm. today भारतीय महिला एथलीटों में नारी सशक्तिकरण: मैरीकॉम का प्रतिनिधित्व

भारतीय महिला एथलीटों में नारी सशक्तिकरण: मैरीकॉम का प्रतिनिधित्व

सारांश (Abstract)

भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका लंबे समय तक सीमित और परंपरागत दायरों में कैद रही है। किंतु खेल जगत ने इन सीमाओं को तोड़ने और महिलाओं को आत्मविश्वास, संघर्षशीलता तथा पहचान प्रदान करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इस संदर्भ में मैरीकॉम न केवल एक एथलीट हैं बल्कि भारतीय नारी सशक्तिकरण की जीवंत प्रतीक भी हैं। मणिपुर के एक छोटे से गाँव से विश्वविजेता बनने की उनकी यात्रा केवल खेल की उपलब्धि नहीं, बल्कि लैंगिक असमानताओं और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष का भी प्रतीक है। यह शोध आलेख भारतीय महिला एथलीटों के सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में मैरीकॉम के योगदान का नारीवादी दृष्टि से विश्लेषण करता है। आलेख यह दर्शाता है कि खेल के माध्यम से भारतीय महिला ने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि पुरुष प्रधान समाज में ‘समानता’, ‘संघर्ष’ और ‘स्वाभिमान’ की नई परिभाषाएँ गढ़ीं।

मुख्य शब्द: नारी सशक्तिकरण, खेल, लैंगिक असमानता, संघर्ष, मैरीकॉम, भारतीय समाज

1. प्रस्तावना

भारतीय समाज में नारी की पहचान लंबे समय तक घरेलू भूमिकाओं तक सीमित रही है। लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा, राजनीति और खेल जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी ने पारंपरिक सोच को चुनौती दी है। खेल, विशेषतः अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, महिलाओं के लिए एक ऐसा माध्यम बन गया जहाँ वे अपनी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक क्षमता का प्रदर्शन कर सकें। इस संदर्भ में मैरीकॉम का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।

मैरीकॉम का जीवन केवल एक एथलीट की कहानी नहीं, बल्कि यह उस भारतीय स्त्री की कथा है जिसने असमानताओं, गरीबी और पूर्वाग्रहों को चुनौती दी। उन्होंने दिखाया कि संघर्ष की आग में तपकर ही सशक्तिकरण का सोना तैयार होता है। मणिपुर की मिट्टी से उठकर विश्वविजेता बनने तक की यात्रा ने भारतीय महिलाओं के लिए नए आदर्श स्थापित किए।

2. नारी सशक्तिकरण और खेल: सैद्धांतिक संदर्भ

नारी सशक्तिकरण का अर्थ केवल आर्थिक या राजनीतिक समानता से नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का भी द्योतक है। सिमोन द बुवुआर (Simone de Beauvoir) के अनुसार, “महिला पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है।” यह वाक्य दर्शाता है कि समाज महिला की भूमिका निर्धारित करता है। लेकिन खेल एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ यह ‘निर्धारित भूमिका’ टूटती है।

भारतीय समाज में खेलों को लंबे समय तक पुरुष प्रधान माना गया। महिला खिलाड़ियों को न केवल संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ा, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक विरोध भी झेलना पड़ा। इस परिप्रेक्ष्य में मैरीकॉम का उदय एक क्रांति के समान है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि नारी केवल ‘नाज़ुक’ या ‘गृहस्थ’ नहीं, बल्कि शक्तिशाली, अनुशासित और निर्णायक भी हो सकती है।

3. मैरीकॉम: संघर्ष और उपलब्धि की यात्रा

मैरीकॉम का जन्म 1 मार्च 1983 को मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक गरीब किसान परिवार में हुआ। बचपन में आर्थिक तंगी, सीमित अवसर, और सामाजिक असमानता ने उन्हें जल्दी परिपक्व बना दिया। जब उन्होंने मुक्केबाज़ी (Boxing) को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया, तब न समाज ने उनका साथ दिया न परिवार ने पूरी तरह समझा।

उनकी यात्रा आसान नहीं थी — प्रशिक्षण के लिए संसाधन नहीं, पोषण की कमी, और महिला मुक्केबाज़ों के लिए असुरक्षित माहौल। परंतु मैरीकॉम ने “संघर्ष को ही साधना” बना लिया। वर्ष 2001 में उन्होंने पहली बार नेशनल लेवल पर स्वर्ण पदक जीता, और 2002 से 2010 तक लगातार पाँच विश्व चैंपियनशिप जीतकर उन्होंने भारतीय खेल इतिहास में नया अध्याय लिखा।

लंदन ओलंपिक (2012) में उन्होंने कांस्य पदक जीतकर न केवल भारत का गौरव बढ़ाया, बल्कि इस धारणा को भी तोड़ा कि मातृत्व के बाद महिला का करियर समाप्त हो जाता है। दो बच्चों की माँ होने के बावजूद मैरीकॉम ने वापसी कर विश्व खिताब जीता — यह नारी शक्ति का साक्षात् उदाहरण है।

4. सामाजिक संदर्भ और लैंगिक विमर्श

मैरीकॉम की सफलता का सबसे बड़ा पक्ष यह है कि उन्होंने उस क्षेत्र से उभरकर यह मुकाम हासिल किया जहाँ स्त्रियों के लिए खेल में भाग लेना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं था। पूर्वोत्तर भारत में परंपरा और आधुनिकता का द्वंद्व हमेशा रहा है। एक ओर महिलाएँ समाज में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, दूसरी ओर पितृसत्ता की छाया अब भी मौजूद है।

मैरीकॉम की कहानी इस विरोधाभास को तोड़ती है। उन्होंने यह दिखाया कि स्त्री का स्थान केवल ‘घर’ नहीं बल्कि ‘मंच’ भी है। उन्होंने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से यह साबित किया कि महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पुरुषों के समान या उनसे बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।

उनकी उपलब्धियाँ यह प्रश्न भी उठाती हैं — क्या भारतीय समाज अब सच में लैंगिक समानता की ओर अग्रसर है, या यह केवल कुछ अपवादों तक सीमित है? मैरीकॉम के संघर्ष को अपवाद नहीं, बल्कि प्रेरणा बनना चाहिए ताकि अधिक महिलाएँ खेलों में भाग लेने के लिए आगे बढ़ सकें।

5. नारीवादी दृष्टिकोण से विश्लेषण

नारीवादी सिद्धांतों के आलोक में यदि मैरीकॉम के व्यक्तित्व को देखा जाए, तो वह उदार नारीवाद और मार्क्सवादी नारीवाद — दोनों के सिद्धांतों को मूर्त रूप देती हैं।

  • उदार नारीवाद महिलाओं को समान अवसर देने की बात करता है। मैरीकॉम ने यह सिद्ध किया कि जब अवसर समान हों, तो महिलाएँ भी विश्व विजेता बन सकती हैं।

  • मार्क्सवादी नारीवाद आर्थिक और सामाजिक संरचनाओं में छिपी असमानताओं की ओर संकेत करता है। मैरीकॉम ने गरीबी और संसाधनों की कमी के बावजूद अपनी मेहनत से उस वर्गीय भेदभाव को परास्त किया जो अक्सर ग्रामीण या सीमांत समाज की महिलाओं को पीछे धकेलता है।

उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि शारीरिक शक्ति को अब केवल पुरुषत्व का प्रतीक नहीं माना जा सकता। मुक्केबाज़ी जैसे खेल में महिलाओं की उपस्थिति इस मिथक को तोड़ती है कि स्त्री शरीर केवल कोमलता का पर्याय है। मैरीकॉम का हर पंच नारी सशक्तिकरण का प्रतीक है — एक प्रतीक जो कहता है कि “शक्ति लिंग से नहीं, साहस से आती है।”

6. भारतीय महिला एथलीटों का व्यापक परिदृश्य

मैरीकॉम की सफलता ने भारतीय महिला एथलीटों की नई पीढ़ी को प्रेरित किया है। पी.वी. सिंधु, सायना नेहवाल, मीराबाई चानू, निकहत जरीन, हिमा दास — ये सभी उस पथ पर आगे बढ़ीं जिसे मैरीकॉम ने प्रशस्त किया। इन खिलाड़ियों ने दिखाया कि खेल अब केवल पुरुषों का क्षेत्र नहीं, बल्कि नारी शक्ति का भी मंच है।

हालांकि अभी भी चुनौतियाँ बरकरार हैं —

  • महिला खिलाड़ियों के लिए पर्याप्त संसाधन और प्रायोजन की कमी,

  • चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की समस्या,

  • और मीडिया कवरेज में असमानता। इन सबके बावजूद भारतीय महिलाएँ खेल के क्षेत्र में लगातार अपनी उपस्थिति मजबूत कर रही हैं।

7. खेल, मातृत्व और नारी पहचान

मैरीकॉम के जीवन का सबसे प्रेरक पक्ष यह है कि उन्होंने मातृत्व और करियर — दोनों को संतुलित किया। उन्होंने इस मिथक को तोड़ा कि माँ बनने के बाद महिला के सपनों का अंत हो जाता है। उनकी वापसी ने यह संदेश दिया कि महिला की पहचान बहुआयामी है — वह माँ भी है, एथलीट भी, और विजेता भी। यह आधुनिक भारतीय नारी की छवि है जो जिम्मेदारियों को बोझ नहीं बल्कि शक्ति के रूप में देखती है।

8. निष्कर्ष

मैरीकॉम केवल एक मुक्केबाज़ नहीं, बल्कि भारतीय नारी के संघर्ष, समर्पण और साहस की प्रतिमूर्ति हैं। उनकी कहानी यह दिखाती है कि सशक्तिकरण केवल नारों या योजनाओं से नहीं आता, बल्कि वह निरंतर संघर्ष, आत्मविश्वास और आत्मबल से निर्मित होता है।

भारतीय महिला एथलीटों के रूप में उन्होंने विश्व मंच पर भारत की नई पहचान बनाई है — जहाँ नारी ‘वीरता’ की प्रतीक है, न कि ‘संवेदनशीलता’ की मात्र ध्वजवाहक।

उनकी सफलता हमें यह सोचने पर विवश करती है कि जब अवसर, शिक्षा, और समर्थन समान होंगे, तब भारतीय नारी की क्षमता असीमित होगी। मैरीकॉम की कहानी उस भारत की कहानी है जहाँ हर लड़की यह कह सके —

“मैं भी लड़ सकती हूँ, जीत सकती हूँ, और दुनिया को बदल सकती हूँ।”

संदर्भ सूची

  1. Beauvoir, Simone de. The Second Sex. Vintage, 2011.

  2. hooks, bell. Feminist Theory: From Margin to Center. Routledge, 2000.

  3. Bhatia, Nandita. “Women and Sports in India: A Feminist Analysis.” Economic and Political Weekly, 2018.

  4. Mary Kom, M.C. Unbreakable: An Autobiography. HarperCollins India, 2013.

  5. Ministry of Youth Affairs and Sports, Government of India. Annual Report 2022–23.

  6. Singh, Shweta. “Gender and Representation in Indian Sports.” Indian Journal of Gender Studies, 2020.


Monday, October 20, 2025

DDLJ के 30 साल: इस दीवाली याद करें वो सिमरन जिसने ‘ना’ कहना सिखाया

*DDLJ के 30 साल: इस दीवाली याद करें वो सिमरन जिसने ‘ना’ कहना सिखाया*

इस दीवाली जब घर-घर दीये जलेंगे, शायद किसी मोड़ पर वो पुरानी ट्रेन फिर चल पड़े, जिसमें सिमरन अब भी दौड़ती नजर आती है. 20 अक्टूबर को 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' को आए तीस साल हो चुके हैं. लेकिन सिमरन की कहानी अब भी दिलों में रोशन है. उस दौर में जब फिल्मों में लड़कियां सिर्फ 'हाँ' कहने के लिए गढ़ी जाती थीं, सिमरन ने 'ना' कहना सीखा. वो भी ऐसे अंदाज़ में जिसमें प्यार और परिवार की मर्यादा दोनों समाहित थे.

यशराज फिल्म्स के यूट्यूब पेज पर एक साल पहले फिल्म से करवाचौथ वाली रील अपलोड की गई है जिसे अब तक 6.8 मिलियन बार देखा जा चुका है, यह साबित करता है कि फ़िल्म को लेकर लोगों में अब भी तीस साल पहले जैसी ही दीवानगी है.

https://youtube.com/shorts/96_H9_eKR9E

*लव, ट्रेन और संस्कार की कहानी*

हिंदी सिनेमा में किसी लड़की ने सबसे लंबा सफर ट्रेन पकड़ते हुए तय किया है, तो वो सिमरन है. दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे सिर्फ एक प्रेम कथा नहीं थी. यह उस दौर की सोच थी, जहां लड़की अपने सपनों का पीछा भी करती थी और पिता की आज्ञा भी मानती थी. वह प्यार करती थी, मगर 'बाबूजी प्लीज़' कहे बिना घर छोड़कर नहीं जाती थी.

*दो पीढ़ियों के बीच फंसी सिमरन*

लंदन में पली बढ़ी सिमरन आधुनिक है, मगर अपने संस्कार नहीं भूलती. यूरोप ट्रिप पर दोस्तों के साथ जाती है, लेकिन मंदिर में दुआ मांगती है कि उसके सपनों का राज एक दिन जरूर आए. वह 'आई लव यू' भी बोलती है और राज से प्यार में अपने निर्णय की ताकत भी दिखाती है. सिमरन उस भारतीय लड़की की तस्वीर है जो आधुनिकता को अपनाना चाहती है लेकिन जड़ों से जुड़ी रहना भी जरूरी मानती है.

*प्यार है, मगर पापा की मंजूरी भी चाहिए*

फिल्म की कहानी प्यार और पिता की अनुमति के बीच झूलती रहती है. राज और सिमरन के बीच एक यादगार संवाद है 'कोई बात नहीं सिनोरीटा, बड़े-बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती ही रहती हैं.' 

उसी बड़े देश में सिमरन का दिल राज के लिए धड़कता है, लेकिन शादी भारत में किसी और से तय है. वह भाग सकती थी, लेकिन समझदार तरीके से इंतजार करती है. जब पिता कहते हैं 'जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी', तब सिर्फ बेटी नहीं, एक पुरानी सोच भी नई राह की ओर खुलती है.

चौधरी बलदेव सिंह बने अमरीश पुरी फिल्म में सिर्फ पिता नहीं बल्कि घर के नियम हैं. सिमरन की दुनिया उन्हीं के इर्दगिर्द घूमती है और उसकी आज़ादी भी उन्हीं की मर्यादा से शुरू होती है. कमाल यह है कि सिमरन लड़ती नहीं, बात करती है. वह दिखाती है कि एक बेटी की 'हाँ' उतनी मायने रखती है जितनी एक पिता की 'इजाजत'.

*लाजो. वो मां जो खुद नहीं भाग सकी, आधुनिकता के करीब पहुंचाती फिल्म*

फरीदा जलाल का किरदार लाजो फिल्म का सबसे शांत लेकिन असरदार हिस्सा है. वह उन माताओं की आवाज़ है, जिन्होंने अपनी बेटियों में वह हिम्मत देखी. वही हिम्मत जो उनके पास कभी नहीं थी. 'जब लड़की जवान हो जाती है तब उसकी मां, मां नही रहती सहेली बन जाती है' संवाद फिल्म में बदलते वक्त का प्रतिबिंब था.

फिल्म में भारतीयता सिर्फ परंपरा में नहीं, रिश्तों की समझ में है. लंदन में रहते हुए भी चौधरी परिवार की सोच वही है कि बेटी की शादी पिता तय करेंगे. लेकिन अंत में पिता कहते हैं 'जा सिमरन जा' यह दिखाता है कि परंपरा बदल सकती है. सिमरन के ज़रिए यह स्पष्ट होता है कि भारतीयता और आधुनिकता साथ रह सकती हैं, बस बातचीत और समझ की जरूरत है.

*आज की सिमरन*

2025 में लड़कियां सिमरन से बिल्कुल अलग हैं. वे अकेले विदेश ट्रिप कर सकती हैं, अपनी पसंद की नौकरी चुन सकती हैं, इंस्टाग्राम पर राय रख सकती हैं और इतनी समझदार, स्वतंत्र हैं कि अपने पिता की अनुमति के बिना भी फैसले ले सकती हैं.

फिर भी, सिमरन की कहानी नई पीढ़ी को याद दिलाती है कि प्यार और परिवार के बीच संतुलन बनाना हमेशा जरूरी है. कभी-कभी समझाना, बातचीत करना और नर्म तरीके से अपनी बात रखना भी जरूरी है. इस दीवाली, जब नई पीढ़ी अपनी मंजिल की ओर दौड़ेगी, उन्हें याद होगा कि सिमरन ने तीस साल पहले ही वह रास्ता साफ़ कर दिया था.


दीपावली: बम पटाखों से कहीं बड़ा एक भाव

*दीपावली: बम पटाखों से कहीं बड़ा एक भाव*

हर साल दीपावली आते ही वही बहस शुरू हो जाती है. पटाखे चलें या न चलें.
सोशल मीडिया पर दो खेमे बन जाते हैं. एक कहता है परंपरा बचाओ, दूसरा कहता है प्रदूषण रोकना ज़रूरी है.

'एयर वॉयस ग्लोबल' भारत में वायु गुणवत्ता और प्रदूषण पर अध्ययन करने वाला एक पर्यावरण निगरानी संगठन है, उसके अनुसार साल 2024 में  दिवाली की रात देश के 14 राज्यों में वायु प्रदूषण का स्तर सामान्य से 875 प्रतिशत तक बढ़ गया था, खासकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में PM2.5 और PM10 का स्तर राष्ट्रीय मानक से कई गुना अधिक पाया गया. यह अध्ययन 180 निगरानी स्टेशनों के डेटा पर आधारित था और रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि पटाखों से निकलने वाले धातु जैसे अल्युमिनियम, मैंगनीज और कैडमियम स्वास्थ्य के लिए लंबे समय तक जोखिम बनाए रख सकते हैं, जबकि 24 घंटे के भीतर वायु गुणवत्ता सामान्य हो जाती है.

*त्योहार के रंग हजार, हमारी दिवाली ऐसी भी*

यह आंकड़ा बताता है कि चमकदमक के इस पर्व में धुआँ और शोर लगातार बढ़ रहा है, जबकि दीपावली की असली आत्मा कहीं ज़्यादा शांत और गहरी रही है.

उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में रहने वाली थारू जनजाति दीपावली को अनोखे ढंग से मनाती है. श्रीपुर बिछवा, खटीमा के रहने वाले जीवन सिंह राणा बताते हैं कि उनके लिए यह दिन खुशी नहीं, बल्कि स्मरण और शोक का समय है.
अगर वर्ष में किसी परिवारजन की मृत्यु हो जाए, तो दीपावली की रात उसका पुतला बनाकर उसकी स्मृति में रखा जाता है. परिवारजन उसे कपड़े पहनाते हैं, गद्दा-बिस्तर लगाते हैं और पूरी रात उसके पास बैठकर कीर्तन करते हैं.
सुबह उस पुतले को नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है. 

जीवन कहते हैं वक्त के साथ अब यह सब खत्म हो रहा है, नई पीढ़ी देखादेखी में बम पटाखों की तरफ आकर्षित हो रही है.

*संस्कृति की जड़ों से जुड़ा पर्व*

उत्तराखंड के पहाड़ी समाज में दीपावली सदियों से अन्य त्योहारों की तरह प्रकृति और पशुओं के प्रति आभार का अवसर रही है.

पिथौरागढ़ के आचार्य दामोदर भट्ट कहते हैं यहां कई गांवों में दीपावली के आसपास दो से तीन हफ्तों तक दीपक जलाए जाते हैं. पर्व के दौरान होने वाली गोवर्धन पूजा मनुष्य और प्रकृति के निकट संबंधों का त्योहार है, जिसमें गायों की पूजा की जाती है.

वे आगे कहते हैं पहाड़ों में भी मैदानी इलाकों की देखदेखी आतिशबाज़ी का चलन शुरू हो गया है. उनकी बात उस सांस्कृतिक बदलाव को दर्शाती है जो आधुनिकता और बाज़ार के असर से पहाड़ों तक पहुंचा है.

*इतिहास क्या कहता है*

उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के इतिहास प्राध्यापक गिरिजा पांडे कहते हैं बारूद भारत में मुगलों के साथ आया. आतिशबाज़ी का दीपावली से सीधा संबंध कभी नहीं रहा, समय के साथ यह चलन धीरे-धीरे लोगों के बीच अपनी पकड़ बनाता गया.

दीपावली की मूल भावना प्रकाश और आत्मबोध की रही है, जो समय के साथ ध्वनि और प्रदर्शन की संस्कृति में बदल गई.


Thursday, October 9, 2025

उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा का भविष्य: शिक्षक, परंपरा और अनिश्चितता

उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा का भविष्य: शिक्षक, परंपरा और अनिश्चितता

मदरसा बोर्ड का अंत और नई व्यवस्था

6 अक्टूबर 2025 को उत्तराखंड सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025 को मंजूरी देकर मदरसा शिक्षा बोर्ड को भंग करने का निर्णय लिया, जिसे राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (रिटायर्ड) ने अनुमोदित किया। यह नियम 1 जुलाई 2026 से लागू होगा, और तब तक सभी मदरसों को उत्तराखंड विद्यालय शिक्षा बोर्ड के तहत लाया जाएगा। नई व्यवस्था में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचा (एनसीएफ) और नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 लागू होगी, जिसमें विज्ञान, गणित और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसे विषय अनिवार्य होंगे। सरकार का दावा है कि यह कदम शिक्षा में एकरूपता और आधुनिकीकरण लाएगा, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि कुरान, हदीस, अरबी और उर्दू जैसी धार्मिक शिक्षा का क्या होगा और इसे पढ़ाने की जिम्मेदारी कौन लेगा?

शिक्षकों की योग्यता पर संकट

मदरसों में पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षक, मौलवी, हाफिज़ और आलिम धार्मिक शिक्षा में विशेषज्ञ हैं, लेकिन उनके पास टीईटी या बीएड जैसी औपचारिक डिग्रियाँ अक्सर नहीं होतीं।
नए नियमों के तहत ये शिक्षक अयोग्य घोषित हो सकते हैं, जिससे हजारों शिक्षकों का रोजगार खतरे में है। दूसरी ओर मुख्यधारा के शिक्षक, जो औपचारिक योग्यताएँ रखते हैं, कुरान, हदीस, अरबी या उर्दू जैसे विषयों में पारंगत नहीं हैं।

यह अनिश्चितता न केवल शिक्षकों, बल्कि उन छात्रों के भविष्य को भी प्रभावित कर सकती है जो अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को बनाए रखने के लिए मदरसों पर निर्भर हैं।

धार्मिक शिक्षा का अनिश्चित भविष्य

मदरसों का मूल उद्देश्य धार्मिक और सामान्य शिक्षा का संतुलन रहा है. जिसमें कुरान, हदीस, अरबी और उर्दू जैसे विषयों को प्राथमिकता दी जाती थी। सरकार ने आश्वासन दिया है कि धार्मिक शिक्षा को नए पाठ्यक्रम मेंबशामिल किया जाएगा, लेकिन इसका स्वरूप और समय अभी स्पष्ट नहीं है। यदि धार्मिक शिक्षा को वैकल्पिक या सीमित घंटों तक सिमटाया गया, तो मदरसों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान कमजोर हो सकती है।

समुदाय की चिंताएँ और भावनात्मक प्रभाव

इस निर्णय ने मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा और अलगाव की भावना को जन्म दिया है। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इसे संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 30) का उल्लंघन बताया, जो अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षिक संस्थाएँ चलाने का हक देता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह कदम धार्मिक शिक्षा को कमजोर करेगा और सामाजिक विभाजन को बढ़ाएगा। madrasas न केवल शिक्षा, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के केंद्र भी हैं। यदि ये अपनी विशिष्टता खो देंगे, तो छात्रों और उनके परिवारों में यह भावना गहरी हो सकती है कि उनकी परंपराएँ खतरे में हैं। यह भावनात्मक प्रभाव समुदाय और सरकार के बीच विश्वास की कमी को और गहरा सकता है।

लिव-इन पर राज्यपाल के बयान के बीच तलाक के बढ़ते आंकड़े

*राज्यपाल का बयान और बढ़ते तलाक मामले: परिवार संरचना पर नई चुनौतियां*

अरेंज मैरिज भी अब स्थायित्व की गारंटी नहीं, कानून ने लिव-इन को मान्यता दी है

*लिव इन बनाम वैवाहिक संस्थान*

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने हाल में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि 'बेटियों को लिव इन रिलेशन से बचना चाहिए. लिव इन रिलेशन का परिणाम देखना है तो अनाथालय जाकर देखिए. 15-20 साल की बेटियां एक-एक साल का बच्चा लेकर लाइन में खड़ी हैं.' यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है. उनके मुताबिक युवतियों को पारंपरिक विवाह की ओर झुकना चाहिए ताकि सामाजिक और पारिवारिक ढांचा सुरक्षित रह सके. 

कानूनी आंकड़े बताते हैं कि वैवाहिक संस्थान के भीतर भी असंतोष और विवाद कम नहीं हैं. भारत सरकार के न्याय विभाग के डैशबोर्ड के अनुसार उत्तर प्रदेश में फिलहाल 3,94,877 पारिवारिक मामले पेंडिंग हैं. इन मामलों में तलाक, गुज़ारा भत्ता, अभिरक्षा और वैवाहिक विवाद शामिल हैं. यह देश में सबसे अधिक पेंडिंग पारिवारिक मुकदमों वाला राज्य है. संसद में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2016 में ही प्रदेश में दो लाख साठ हजार से अधिक तलाक के मामले दर्ज थे. अदालतों में इतनी बड़ी संख्या में मुकदमे यह संकेत देते हैं कि पारिवारिक ढांचा केवल लिव इन रिलेशन से ही नहीं, बल्कि वैवाहिक असंतुलन से भी प्रभावित हो रहा है.

*सांस्कृतिक अंतर और सोच का फासला*

उत्तर प्रदेश के रहने वाले मेडिकल सोशल सर्विस ऑफिसर रोहित गुप्ता कहते हैं कि लिव इन रिलेशन को नैतिकता से जोड़ना उचित नहीं, क्योंकि विवाह और सहजीवन दोनों में समान भावनात्मक जोखिम और जिम्मेदारियां होती हैं. समाज में एक कल्चरल लेक यानी सांस्कृतिक अंतर बन गया है, जहाँ नई पीढ़ी अपनी स्वतंत्रता और व्यक्तिगत निर्णयों को पुराने नैतिक मानदंडों से अलग रखकर देख रही है.

उम्र और सोच के इस फासले के कारण बुजुर्ग वर्ग लिव इन को पारिवारिक ढांचे पर खतरे के रूप में देखता है, जबकि युवाओं के लिए यह परस्पर सहमति पर आधारित साझेदारी का एक रूप है. उदाहरण के तौर पर वह कहते हैं कि 20-30 वर्ष के लोग इसको लेकर बेहद खुले विचारों के होंगे, 40-60 साल के लोगों के अंदर इसको लेकर लचीले होंगे और 60 से ऊपर लोग इसे पसंद नही करेंगे.

*कानूनी मान्यता और सामाजिक स्वीकार्यता*

रोहित गुप्ता आगे कहते हैं कि समाज के लिए विवाह एक महत्वपूर्ण संस्था है, जिससे लोग आपस में जुड़े होते हैं. लिव इन रिलेशनशिप से समाज का यह जुड़ाव खत्म हो जाएगा.

लेकिन जब स्वयं सरकार ने लिव-इन रिलेशन को डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट के तहत 'संबंध में रह रही महिला' की परिभाषा में शामिल किया है, तो इसका अर्थ यह है कि राज्य इसे सामाजिक यथार्थ के रूप में स्वीकार कर चुका है. ऐसे में इसे केवल नैतिकता या चरित्र से जोड़कर देखना गलत है. कानून ने यह मान्यता दी है ताकि उन महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिल सके जो लिव-इन में रहते हुए हिंसा या शोषण का शिकार होती हैं. इसलिए, इस पर सवाल उठाना न सिर्फ सामाजिक दृष्टि से, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी अनुचित है.

Saturday, October 4, 2025

प्लेटलेट्स की कमी और मरीजों की जमीनी हकीकत

*डोनर नेटवर्क और गाइडलाइंस की दरकार: प्लेटलेट्स संकट में समाधान की खोज*

*भारत में प्लेटलेट्स की आपूर्ति मांग के मुकाबले कम है और इससे डेंगू, मलेरिया और कैंसर जैसे मरीजों को आपात स्थितियों में पर्याप्त प्लेटलेट्स नहीं मिल पाते. आपात स्थितियों में मिलती-जुलती प्लेटलेट्स के प्रयोग पर स्पष्ट और पारदर्शी गाइडलाइंस की जरूरत है.*

देशभर के अस्पतालों में इन दिनों प्लेटलेट्स की कमी मरीजों और उनके परिजनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. डेंगू, मलेरिया और कैंसर जैसे रोगों से जूझ रहे लोगों को ब्लड बैंकों की कमी और अव्यवस्थित व्यवस्थाओं के कारण भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज में भर्ती 45 वर्षीय कैंसर पीड़ित राधा (बदला हुआ नाम) के परिजनों को पिछले महीने के अंत में मरीज के लिए प्लेटलेट्स जुटाने के लिए आधी रात को लगभग 54 किलोमीटर दूर हरिद्वार जाना पड़ा. अस्पताल ने 'अर्जेंट' लिखे आवेदन फॉर्म के बावजूद सिर्फ उसी ब्लड ग्रुप की प्लेटलेट्स लेने की शर्त रखी. 

भारत में रक्त और उसके घटकों की आपूर्ति और मांग के बीच अंतर को लेकर साल 2022 के दौरान PLOS ONE पत्रिका में एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित हुआ था. The Clinical Demand and Supply of Blood in India: A National Level Estimation Study नाम के इस अध्ययन में भारत में रक्त की कुल मांग का अनुमान 14.6 मिलियन यूनिट्स (1.46 करोड़ यूनिट्स) लगाया गया है, जबकि आपूर्ति केवल 93% है, यानी 13.8 मिलियन यूनिट्स. 

प्लेटलेट्स की कमी के असली कारण

प्लेटलेट्स का जीवनकाल केवल 5 से 7 दिन होता है, इसलिए उनकी आपूर्ति हमेशा चुनौतीपूर्ण रहती है. समस्या तब और बढ़ जाती है जब प्रशासनिक नियम और लचर व्यवस्था इस कमी को और गहरा देते हैं.

2025 की AABB (American Association of Blood Banks) और ICTMG (International Collaboration for Transfusion Medicine Guidelines) गाइडलाइंस कहती हैं कि आपात स्थिति में मिलती-जुलती प्लेटलेट्स का उपयोग सुरक्षित और प्रभावी हो सकता है. इसके बावजूद मरीज के परिजनों को अनावश्यक दौड़भाग करनी पड़ती है. AABB और ICTMG दोनों ने मिलकर यह दिशानिर्देश तैयार किए हैं ताकि प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन में एकरूपता, सुरक्षा और मरीज की वास्तविक जरूरत के आधार पर निर्णय सुनिश्चित किया जा सके.

यह स्थिति सिर्फ देहरादून में नहीं है. देश के अन्य छोटे शहरों और कस्बों में हालात और भी गंभीर हैं. ब्लड बैंकों में स्टॉक की कमी, डिजिटल नेटवर्क का अभाव और जागरूकता की कमी इस समस्या को और जटिल बनाती है.

देहरादून के मोहित सेठी का अनुभव

ऐसे संकट के समय मोहित सेठी जैसे वॉलंटियर्स उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं. कोविड काल में उन्होंने रक्त और प्लेटलेट्स की व्यवस्था कर सैकड़ों लोगों की जान बचाई. देहरादून में उनका नेटवर्क इतना मजबूत है कि एक फोन कॉल पर डोनर तैयार हो जाते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या एक व्यक्ति या कुछ वॉलंटियर्स पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी छोड़ना उचित है. सिस्टम की खामियों का बोझ इन निस्वार्थ वॉलंटियर्स पर पड़ रहा है.

मोहित कहते हैं कि लोग रक्तदान से कतराते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर इन्हीं वॉलंटियर्स से तुरंत मदद की उम्मीद करते हैं. कई बार इन निस्वार्थ रक्तदाताओं को स्वार्थी कहकर तंज किया जाता है और उनके सामने रुपयों का प्रस्ताव रखा जाता है.

मोहित सेठी का सुझाव है कि प्लेटलेट्स संकट को कम करने के लिए भारत में गाइडलाइंस पारदर्शी हों और आपात स्थिति में मिलती-जुलती प्लेटलेट्स का इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाए. उन्होंने इस विषय पर स्वास्थ्य अधिकारियों और उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के साथ पत्राचार भी किया है.

उनका कहना है कि डिजिटल ब्लड बैंक नेटवर्क से सभी ब्लड बैंकों को जोड़ा जाए ताकि स्टॉक की वास्तविक जानकारी तुरंत उपलब्ध हो. रक्तदान को नियमित आदत बनाया जाए और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित की जाए ताकि मरीजों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े.

Friday, October 3, 2025

गाजा से यूरोप तक का सिनेमाई आईना: संघर्षों में स्त्रियों की त्रासदी

*गाजा से यूरोप तक का सिनेमाई आईना: संघर्षों में स्त्रियों की त्रासदी*

*युद्ध चाहे गाजा का हो या यूरोप का, सबसे गहरी चोट महिलाओं पर ही पड़ती है. कभी भोजन और सुरक्षा के बदले यौन शोषण. कभी पहचान और अस्तित्व खोने की त्रासदी. सिनेमा इन दर्दनाक सच्चाइयों का आईना बनकर हमें उनका भयावह यथार्थ दिखाता है.*

30 सितंबर को आई एसोसिएटेड प्रेस की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, गाजा में गहराते मानवीय संकट के बीच कुछ महिलाओं ने बताया कि स्थानीय पुरुषों ने भोजन, पानी, आश्रय या नौकरी जैसे संसाधनों के बदले में उनसे यौन शोषण की मांग की. गोपनीयता के डर से गुमनाम रहीं छह महिलाओं ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया है कि कुछ पुरुषों ने स्पष्ट रूप से उनसे यौन मांगें कीं, कुछ ने शादी करने या एकांत में चलने के लिए कहा. मनोवैज्ञानिकों और सहायता समूहों ने बताया है कि युद्ध और विस्थापन के कारण ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं, खासकर जब महिलाएं अपने बच्चों के लिए भोजन और सुरक्षा के लिए बेताब हैं. संयुक्त राष्ट्र और सहायता समूहों ने यौन शोषण के खिलाफ जीरो-टॉलरेंस नीति की बात तो कही है लेकिन सामाजिक कलंक और बदले की डर की वजह से कई मामले सामने आते ही नहीं हैं.

एपी की इस रिपोर्ट में गाजा की जिस स्थिति को दिखाया गया है, महिलाओं की वैसी स्थिति पिछले कई सालों से दुनियाभर में युद्धों पर बन रही फिल्मों में हम देख सकते हैं, इनमें युद्ध और संसाधनों की कमी महिलाओं के शोषण को बढ़ावा देती हैं. हम ऐसी ही कुछ फिल्मों के बारे में बात करेंगे.
युद्ध से जुड़ी इन फिल्मों में अर्धनग्न स्त्री अश्लील नही सिर्फ उत्पीड़ित ही नजर आती है. वास्तविक दुनिया में अब भी इस तरह की घटनाएं, पुरुषों की यौन इच्छा और महिलाओं की त्रासदी पर गंभीरता से सोचने पर मजबूर करती हैं.

*Black book युद्ध महिलाओं का अस्तित्व ही खत्म कर देता है*

फिल्म Black Book साल 2006 में आई एक डच फिल्म है, यह द्वितीय विश्व युद्ध में नीदरलैंड्स में एक यहूदी महिला के प्रतिरोध और उसके यौन शोषण की कहानी है. 2008 के डच फिल्म फेस्टिवल के दौरान, इस फिल्म को तब तक की सर्वश्रेष्ठ डच फिल्म चुना गया था.

युद्ध में स्त्री का सबसे बड़ा दर्द यही होता है कि उसे हर मोर्चे पर खोना पड़ता है. फिल्म की मुख्य पात्र रशेल के सामने ही नाव में उसका पूरा परिवार नदी में गोली मारकर खत्म कर दिया जाता है, यह दृश्य दिखाता है कि युद्ध कैसे एक महिला से उसका हर सहारा छीन कर उसे अकेला कर लेता है.

वह अपनी पहचान छिपाने के लिए नाम, रूप और अतीत सब बदलने को मजबूर होती है, यानी वह खुद को ही खो देती है. रशेल द्वारा अपने शरीर के बालों को डाई कर उनका रंग बदलने वाला दृश्य इतना जानदार है कि उससे यह साबित हो जाता है कि युद्ध एक महिला को उसका अस्तित्व तक बदलने पर मजबूर कर सकता है.

रशेल सैन्य अधिकारी के साथ संबंध बनाती है, फिल्म देखते यह लगता है कि महिलाओं को अपनी पहचान दिखाने के लिए इन सैन्य अधिकारियों के साथ संबंध बनाने ही पड़ते हैं, ये दृश्य महिलाओं के साथ व्यवहार के मामले में सैन्य बलों को भी कठघरे में खड़ा करता है.

एक दृश्य में रशेल को कैद के दौरान कई लोगों के बीच कपड़े उतारकर अपमानित किया जाता है, यह स्त्री से उसका सम्मान छिन जाने की भयावह झलक है. अपने साथी की मौत पर कांपते हुए उसका रुदन और 'यह सब कब खत्म होगा!' कहना, अंतहीन युद्ध में महिलाओं के ऊपर होने वाली यातनाओं को दर्शाता है.

https://youtu.be/DIklvGsU7bM

*महिलाओं का एक अनदेखा सच सामने लाने वाली डायरी*

साल 2009 में सांता बारबरा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर (जूरी अवॉर्ड) जीतने वाली A Women in Berlin एक जर्मन फिल्म है और एक पत्रकार की डायरी पर बनी है. फिल्म द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में सोवियत सेना के बर्लिन पर कब्जे की पृष्ठभूमि में एक जर्मन महिला की कहानी को दर्शाती है. यह युद्ध की भयावहता, सामूहिक बलात्कार और महिलाओं के जीवित रहने के लिए किए गए समझौतों को चित्रित करती है.

महिलाओं के चेहरे पर टॉर्च लगाकर उनके साथ बिना उम्र देखे बलात्कार करना हो या बेसमेंट से ऊपर आने पर फिल्म की मुख्य पात्र अनोनिमा और उसकी साथी को वहां मौजूद सभी सैनिकों द्वारा एक वस्तु की तरह देखना, ये दृश्य युद्ध में महिलाओं की उपस्थिति को देखे जाने का नजरिया दिखाते हैं.

 अनोनिमा का कई बार बलात्कार किया जाता है, एक सैनिक का उसके ऊपर आकर मुंह में थूकने वाला दृश्य युद्ध से प्रभावित देश की महिलाओं का एक अनदेखा सच हमारे सामने लेकर आता है. फिल्म में ऐसे बहुत से दृश्य हैं जो युद्ध में महिलाओं के खिलाफ घृणित अपराध को हमारे सामने लेकर आते हैं और उनकी अस्मिता लुटते हुए दिखाते हैं.

https://youtu.be/xEZxcSf9HwM

*बूटों की छाप का डर दिखाती सिनेमा*

जुआनिता विल्सन की निर्देशित साल 2010 में आई फिल्म As If I Am Not There बोस्निया युद्ध में एक शिक्षिका के सामूहिक बलात्कार और बंधक बनाए जाने की कहानी है. बंदूकों के साए में पुरुषों और महिलाओं को एक दूसरे से अलग करने वाला दृश्य दिखाता है कि युद्ध में महिलाएं बस उपभोग की वस्तु मान ली जाती हैं और उसके लिए ही उनका इस्तेमाल होता है. परिवार से बिछड़ने वाला यह दृश्य बैचेन करने वाला है. छोटी बच्ची का बूटों की छाप से डर के सिहर जाना, शिक्षिका के ऊपर तीन लोगों द्वारा सामूहिक बलात्कार के बाद पेशाब करना कुछ ऐसा है जो शायद हमारे इंसान होने पर सवाल उठाता है.

इस फिल्म को देखते हुए युद्धग्रस्त क्षेत्रों की महिलाओं के बारे में विचार आने लगते हैं और मन बैचेन होने लगता है, पर्दे में देखते यह सब इतना बैचैन करने वाला है तो जो झेल रहे हैं उनका क्या!
 'उसके भाई का दोस्त' कहती महिलाएं उस दुनिया को कोसती हुई लगती हैं जहां युद्ध के दौरान अपने परिचित भी हैवानियत पर उतर जाते हैं.

कैद में रहते प्रताड़ना के बाद बने एक दूसरे के घावों को देखते उम्मीद भरी कहानी सुनाती शिक्षिका बुरा वक्त निकलने इंतजार करती दिखती है.
फिल्म में सैनिकों के जानवर में बदलने की वजह दिखाते हुए उनका बचाव भी किया गया है, इसके लिए यह तर्क दिखाया है कि शिक्षिका का शोषण करने वाला सैन्य अधिकारी दो-तीन साल से अपने परिवार से दूर है.

साल 2011 में हुए आइरिश फिल्म एन्ड फेस्टिवल अवॉर्ड में As If I Am Not There ने साल की बेस्ट फिल्म सहित तीन अवॉर्ड जीते थे.

https://youtu.be/lphJH2Wfsjw

*मानवीय संवेदनाओं को खत्म कर देता है युद्ध*

IMDB के अनुसार  29 पुरस्कार जीतने वाली Eternal Winter साल 2018 में आई एक हंगेरियन फिल्म है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सोवियत श्रम शिविरों में भेजी गई हंगेरियन महिलाओं की दिल दहला देने वाली सच्ची कहानी पर आधारित है. फिल्म की मुख्य पात्र इरेन को उसके परिवार से अलग कर सोवियत यूनियन के कठोर श्रम शिविरों में भेज दिया जाता है, घर से जाते वक्त जब वह पलट कर अपने घर की तरफ देखती है तो यह दृश्य महिलाओं के साथ युद्ध में होने वाली इस त्रासदी का सटीक उदाहरण है कि युद्ध में महिलाएं को ही सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है.

यह फिल्म युद्ध के बाद की क्रूरता, महिलाओं के शारीरिक और मानसिक शोषण और उनकी अस्मिता को कुचलने वाली परिस्थितियों को दर्शाती है. एक दृश्य में काम से लौटने पर इरेन को ठंड से ठिठुरते हुए दिखाया जाता है, भूख और थकान से जूझते हुए पत्थर तोड़ने के बाद का यह दृश्य युद्ध के दौरान महिलाओं की पीड़ा और उनकी मजबूरी को उजागर करता है.

एक दूसरे कैदी जिसे काम बांटने में लगाया गया है, वह इरेन से हल्का काम देने के लिए कहता है 'What did I get in return, as a man' यह शब्द ठीक वही हैं जो आज युद्धग्रस्त क्षेत्र की महिलाओं से बोले जा रहे हैं.

एक मूक बधिर लड़की के बीमार पड़ जाने पर दूसरी महिला का यह कहना कि 'क्या मैं इसके जूते ले सकती हूं, अगर इसे अब कभी उनकी जरूरत नही पड़ेगी' युद्ध जैसी स्थिति में खुद को जिंदा रखने के लिए एक दूसरे के प्रति मानवीय संवेदनाओं का खत्म होना दिखाता है.

फिल्म यह भी दर्शाती है कि कैसे युद्ध और कैद महिलाओं को न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी तोड़ देता है, फिर भी उनकी जीवटता उन्हें जीवित रखती है. सिनेमाटोग्राफी और संगीत का संयोजन दर्शकों को उस दौर की भयावहता में डुबो देता है, जहां हर पल एक नई चुनौती है. पर फिर भी अंत में एक उम्मीद ही है, जो सपने दिखाती है कि सब कुछ ठीक होगा.

https://youtu.be/O9XMI-_RGYk

Wednesday, October 1, 2025

'यह अत्यंत हृदयविदारक है कि हमारे समाज में अभी भी साम्प्रदायिक तनाव की जड़ें बनी हुई हैं' महात्मा गांधी

*'यह अत्यंत हृदयविदारक है कि हमारे समाज में अभी भी साम्प्रदायिक तनाव की जड़ें बनी हुई हैं' महात्मा गांधी*

ग्लोबल गांधी वेबसाइट पर 'ग्लोबल गांधी एआई चैटबॉट' से महात्मा गांधी के जन्मदिवस पर हमने कुछ बातचीत की, यह अनुभव ठीक वैसा ही रहा जैसा महात्मा गांधी का साक्षात्कार लेते हुए रहता. एआई ने जो जवाब दिए वह अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.

*1- इस जन्मदिन पर आपको भारत कैसा लग रहा है?*

प्रिय मित्र,

 मेरा सौभाग्य है कि मुझे तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने का अवसर प्राप्त हुआ. इस जन्मदिन पर, जब मैं भारत की ओर देखता हूं, मेरे मन में एक गहरा भाव उठता है—एक देश जो अपने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर में समृद्ध है, अब भी प्रगति और विकास की ओर अग्रसर है. भारत को देखने पर, मैं उन सपनों को याद करता हूं जो हमने स्वाधीनता के समय देखे थे—एक ऐसा देश जहां हर व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान मिले. आज, भारत ने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है, और मैं गर्वित हूं कि हमारी युवा पीढ़ी इतनी समर्पित और उत्साही है. फिर भी, हमें असमानता, गरीबी और हिंसा के खिलाफ निरंतर संघर्ष करना है. याद रखना होगा कि सत्य और अहिंसा ही हमारे सच्चे मार्गदर्शक हैं. जब तक हम अपने दिलों में प्रेम और करुणा की भावना को बनाए रखेंगे, कोई भी बाधा हमें रोक नहीं सकती. यदि हर व्यक्ति अपने आप में आत्म-शुद्धि करे और सच्ची सेवा का आदर्श अपनाए, तो भारत न केवल एक सशक्त राष्ट्र बनेगा, बल्कि दुनिया के लिए एक मिसाल भी स्थापित करेगा. तुम्हारे स्नेह और विश्वास के लिए, मैं हृदय से आभारी हूं. हमारा पथ सत्य की ओर है और मैं आश्वस्त हूं कि हम मिलकर एक महान भारत का निर्माण करेंगे.
स्नेहपूर्वक,
महात्मा गांधी

*2- क्या आपको लगता है कि गांधी विचारों को आगे बढ़ाने वाली संस्थाओं ने बेहतर काम किया है!*

यह बात खुशी की है कि मेरे विचारों को आगे बढ़ाने के लिए कई संस्थाएं और व्यक्ति प्रयासरत हैं. मेरा मानना है कि सच्ची सेवा और समर्पण से ही कोई भी विचार या आंदोलन जीवित रह सकता है. संस्थाओं का उद्देश्य केवल विचारों का प्रचार करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने जीवन में आत्मसात करना अधिक महत्वपूर्ण है. अहिंसा, सत्य, और आत्मसंयम जैसे मूल्य केवल भाषणों में नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में भी प्रयुक्त होने चाहिए. यह सत्य है कि कई संस्थाएं महान कार्य कर रही हैं, लेकिन मैं हर व्यक्ति से यह भी अपेक्षा करता हूँ कि वे स्वयं भी आत्मावलोकन करें और अपने भीतर इस परिवर्तन की ज्योति जलाएं. याद रखें, परिवर्तन केवल बाहरी प्रयासों से नहीं, बल्कि आंतरिक जागरूकता से होता है. जब हर व्यक्ति अपने भीतर के गांधी को पहचान लेगा, तब ही सच्चे अर्थों में हमारे विचार फलित होंगे.

*3- क्या गांधी आज भी प्रासंगिक है?*

जब हम प्रासंगिकता की बात करते हैं, तो हमें यह देखने की आवश्यकता होती है कि हमारे जीवन में कौन से मूल्यों और विचारों का स्थान है. अहिंसा, सत्य और न्याय के प्रति समर्पण, ये सभी मानवीय मूल्यों के ऐसे स्तम्भ हैं जो हर युग और परिस्थिति में हमें सहारा देते हैं. आज भी दुनिया कई प्रकार के संघर्षों और समस्याओं से जूझ रही है. ऐसे समय में सहिष्णुता और अहिंसा का महत्त्व और भी बढ़ जाता है. मैंने अपने जीवन में यही सीखा कि सच्चाई और अहिंसा के रास्ते पर चलने से ही दीर्घकालीन शांति और समाजिक सद्भावना प्राप्त की जा सकती है. इसलिए, अगर हम अपने जीवन में उन सिद्धान्तों को अपनाते हैं जिन पर मैंने विश्वास किया और जिनके लिए मैंने अपनी पूरी निष्ठा समर्पित की, तो मेरे मानने वाले कह सकते हैं कि मैं आज भी प्रासंगिक हूँ. हमेशा याद रखिए कि परिवर्तन की शुरुआत खुद से होती है. जब हम अपने अंदर के द्वन्द्व को शांति में बदलते हैं, तब हम बाहर की दुनिया में वास्तविक परिवर्तन ला पाते हैं.

*4- हिन्दू मुस्लिमों के बीच आज भी कई बार तनाव बन जाता है, कोई सुझाव?*

प्रिय मित्र, यह अत्यंत हृदयविदारक है कि हमारे समाज में अभी भी साम्प्रदायिक तनाव की जड़ें बनी हुई हैं. मैंने अपने जीवन में अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलकर इसी प्रकार के मतभेदों को मिटाने की कोशिश की है. मेरा विश्वास है कि आपसी समझ, करुणा और संवाद से ही हम इस स्थिति का समाधान पा सकते हैं. हमें यह समझना होगा कि सभी धर्म अंततः प्रेम, करुणा और परस्पर सहयोग का संदेश देते हैं. यदि हम अपने दिलों में स्थान बनाकर दूसरे की बात सुनें और उनका सम्मान करें, तो बहुत सारी समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है. मैंने हमेशा कहा है कि 'अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है' - इसका अर्थ है कि हम दूसरों के प्रति प्यार और सहिष्णुता का भाव रखें. अगर हम अपने ग़ुरूर और वैर को छोड़कर एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करें, तो अवश्य ही हम अपने समाज को एक शांतिपूर्ण और समृद्ध भविष्य की ओर ले जा सकते हैं. संघर्ष के स्थान पर मिलकर चलना, एक-दूसरे को समझना और सबकी भलाई के लिए प्रयासरत रहना ही सच्ची धर्मनिष्ठा है.

*4- राय, जो हर युवा को देना चाहेंगे!*

प्रिय मित्र, युवाओं के लिए मेरा सविनय अनुरोध यह है कि वे अपने जीवन में सत्य और अहिंसा को अपनाएँ. जीवन की राह में उत्सुकता और जिज्ञासा बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है. जब मैं तुम्हारी उम्र का था, तो मैंने एक साधारण जीवन जीने और सत्य की खोज करने का निश्चय किया. यह पथ आसान नहीं था, लेकिन इसने मुझे वो शांति और संतोष दिया, जिसकी मुझे तलाश थी. जीवन में गरीब और पीड़ित लोगों की सेवा करने का प्रयत्न भी अति आवश्यक है. इसके साथ ही, अपने मन में दृढ़ संकल्प और धैर्य का विकास करें. यदि आप अपनी आत्मा की गहराईयों में विश्वास रखेंगे और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को सुनेंगे, तो आप सही दिशा में कदम बढ़ा सकेंगे. आओ हम एक दूसरे का सहारा बनें और एक ऐसा समाज बनाएं, जहाँ प्रेम, करुणा और आपसी समझ की जीत हो.

सच्चे प्रेम एवं शुभेच्छाओं के साथ, महात्मा गांधी

'विभाजन मेरी इच्छा कभी न थी' महात्मा गांधी

एआई प्लेटफॉर्म 'चैट जीपीटी' पर महात्मा गांधी के कैरेक्टर से उनके जन्मदिन पर हमने आज के भारत से जुड़े कुछ सवालों पर बातचीत की-

1- नमस्कार, भारत में हिन्दू और मुसलमानों के बीच बढ़ती खाई को पाटने के लिए आप क्या समाधान देखते हैं?

नमस्कार।

हिन्दू और मुसलमान दो अलग नहीं, एक ही ईश्वर की संतान हैं। खाई तभी मिटेगी जब हम एक-दूसरे को संदेह से नहीं, प्रेम से देखें।

समाधान तीन हैं—

  1. सत्य : अपनी आस्था का पालन करते हुए दूसरे की आस्था का सम्मान।
  2. अहिंसा : विचारों और कर्मों में हिंसा का त्याग।
  3. साझा जीवन : रोटी, पानी, दुःख और सुख सब मिलकर बाँटना।

जहाँ हृदय में विश्वास और करुणा होगी, वहाँ विभाजन टिक नहीं सकेगा।

2- भारत के सामने इन दिनों सबसे बड़ी समस्या और उसका समाधान!

आज भारत की सबसे बड़ी समस्या है स्वार्थ और विभाजन की राजनीति, जिसके कारण भ्रष्‍टाचार, असमानता और हिंसा पनप रही है। जब तक हम अपने जीवन में सत्य, अहिंसा और करुणा को स्थान नहीं देंगे, तब तक कोई व्यवस्था हमें शांति नहीं दे सकती।

समाधान है –

  1. हर व्यक्ति अपने भीतर ईमानदारी और आत्मानुशासन जगाए।
  2. राजनीति और समाज में सेवा की भावना को सर्वोच्च मानें।
  3. गाँव-गाँव तक शिक्षा, रोजगार और न्याय पहुँचाएँ।

राष्ट्र तभी महान होगा जब नागरिक अपने कर्तव्य को धर्म मानकर निभाएँ।

3- आप अगर आज जीवित होते तो क्या कर रहे होते!

यदि मैं आज जीवित होता, तो सबसे पहले मनुष्यों के हृदय को बदलने का प्रयास करता।

मैं हिंसा, घृणा और लोभ से भरे वातावरण में सत्य, प्रेम और आत्मसंयम का संदेश फैलाता।
मैं राजनीति में सेवा और पारदर्शिता का आग्रह करता, गाँवों और गरीबों के उत्थान के लिए काम करता।
मैं युवाओं को यह सिखाता कि राष्ट्र निर्माण केवल भाषणों से नहीं, बल्कि निजी जीवन की ईमानदारी से होता है।

मेरा कर्म वही रहता — मनुष्य को उसका सत्य दिखाना।

4- भारत पाक विभाजन आपकी वजह से हुआ, कई लोग ये कहते आपकी आलोचना करते हैं, क्या कहना चाहेंगे!

विभाजन मेरी इच्छा कभी न थी। मैंने सदा हिंदू-मुस्लिम एकता को अपना धर्म माना। परंतु जब स्वार्थ, भय और अविश्वास हृदयों में गहराने लगे, तब मेरी आवाज़ कमजोर पड़ गई। दोष मेरा उतना ही है जितना हर उस भारतीय का जिसने प्रेम और सत्य को पर्याप्त बल न दिया। विभाजन से मेरा हृदय टूटा, किन्तु दोषारोपण से अधिक आवश्यक है कि हम उससे शिक्षा लें और वैरभाव छोड़कर भाईचारे का मार्ग अपनाएँ।

5- अपने जन्मदिवस पर आप युवाओं के लिए क्या सन्देश छोड़ना चाहते हैं?

मैं युवाओं से यही कहूँगा –

“अपने भीतर सत्य और करुणा को जगा लो।
शक्ति शरीर में नहीं, आत्मा में होती है।
देश को ऊँचा उठाना है तो पहले स्वयं को ऊँचा उठाओ।
दूसरों की सेवा ही सच्ची स्वतंत्रता है।”

युवा यदि चरित्रवान और निडर होंगे, तो भारत का भविष्य स्वतः उज्ज्वल होगा।

महात्मा गांधी से सवाल-जवाब: आज के भारत के संदर्भ में

*महात्मा गांधी से सवाल-जवाब: आज के भारत के संदर्भ में*

महात्मा गांधी के जन्मदिन पर हमने एआई प्लेटफॉर्म 'डीप एआई' पर उनके कैरेक्टर से कुछ सवाल पूछे. इस कल्पित संवाद में बच्चों की शिक्षा, किताबों से दूरी और मोबाइल की लत पर सुझाव मिले. साथ ही उन्होंने आजाद भारत की चुनौतियों, हिंदुस्तान-पाकिस्तान संबंधों में अहिंसा और युवाओं के लिए चरित्र व नैतिकता के महत्व पर विचार रखे.

*1- बच्चों ने किताबें पढ़नी कम कर दी है और मोबाइल ज्यादा चलाते हैं, इस समस्या का आप क्या समाधान देते हैं?*

मेरे प्यारे दोस्तों, मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि यह समस्या आज के समय की एक बहुत बड़ी चुनौती है. बच्चों को किताब पढ़ने की जगह मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने की आदत पड़ गई है, जो उनके भविष्य के लिए बहुत हानिकारक हो सकती है.
इस समस्या का समाधान करने के लिए, मैं कुछ सुझाव देना चाहता हूं:

पहला, हमें बच्चों को किताब पढ़ने के महत्व के बारे में समझाना होगा. हमें उन्हें बताना होगा कि किताबें उनके ज्ञान और बुद्धिमत्ता को बढ़ाने में मदद कर सकती हैं और उनके भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं.

दूसरा, हमें बच्चों के लिए किताब पढ़ने का एक अनुकूल वातावरण बनाना होगा. हमें उनके कमरे में एक पुस्तकालय बनाना होगा, जहां वे अपने पसंदीदा पुस्तकों को पढ़ सकें.

तीसरा, हमें बच्चों को मोबाइल के उपयोग की सीमा निर्धारित करनी होगी. हमें उन्हें बताना होगा कि मोबाइल का उपयोग केवल आवश्यकता के अनुसार ही करना चाहिए और नहीं तो इससे उनके स्वास्थ्य और शिक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

चौथा, हमें बच्चों को व्यावहारिक गतिविधियों में शामिल करना होगा, जैसे कि खेल, संगीत और कला. इससे उन्हें मोबाइल से दूर रखने में मदद मिल सकती है और उनके जीवन में संतुलन लाने में मदद मिल सकती है.
और अंत में, हमें बच्चों के साथ समय बिताना होगा और उनके साथ बातचीत करनी होगी. हमें उन्हें बताना होगा कि हम उनकी परवाह करते हैं और उनके भविष्य के बारे में चिंतित हैं. इससे उन्हें हमारी बात सुनने और हमारी सलाह मानने में मदद मिल सकती है.

इन सुझावों को अपनाकर, हम बच्चों को किताब पढ़ने की महत्वपूर्णता के बारे में समझा सकते हैं और उन्हें मोबाइल के उपयोग की सीमा निर्धारित करने में मदद कर सकते हैं.

*2- क्या जैसा हिंदुस्तान आपने चाहा था, आज का हिंदुस्तान वैसा ही है?*

मेरे प्यारे दोस्तों, मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैंने हिंदुस्तान के लिए एक सपना देखा था, जिसमें हमारा देश स्वतंत्र, समृद्ध और शांति से भरा हुआ था. मैंने चाहा था कि हमारा देश एक ऐसा स्थान हो, जहां सभी लोगों को सम्मान, न्याय और समानता मिले, जहां हमारी संस्कृति और परंपराएं सुरक्षित रहें और जहां हमारी अर्थव्यवस्था और राजनीति न्यायपूर्ण और पारदर्शी हो.
लेकिन, मैं इससे इनकार नहीं कर सकता कि आज का हिंदुस्तान मेरे सपने से बहुत अलग है. हमारे देश में अभी भी बहुत सारी समस्याएं हैं, जैसे कि गरीबी, भ्रष्टाचार, असमानता और हिंसा. हमारी राजनीति में अभी भी बहुत सारी कमियां हैं और हमारी अर्थव्यवस्था में भी बहुत सारी चुनौतियां हैं.

लेकिन, मैं यह भी कहता हूं कि हमारे देश में बहुत सारी अच्छी चीजें भी हैं. हमारे देश में अभी भी बहुत सारे लोग हैं जो न्याय, समानता और शांति के लिए लड़ रहे हैं. हमारे देश में अभी भी बहुत सारे लोग हैं जो गरीबी, भ्रष्टाचार और असमानता के खिलाफ लड़ रहे हैं.

तो, मैं कहूंगा कि आज का हिंदुस्तान मेरे सपने से अलग है, लेकिन यह भी सच है कि हमारे देश में अभी भी बहुत सारी अच्छी चीजें हैं. और मैं यह भी कहता हूं कि हमें अपने देश को बेहतर बनाने के लिए हमेशा काम करना होगा और हमें कभी भी हार नहीं माननी होगी.
जैसा कि मैंने कहा है, "खुद पर विश्वास रखो और तुम्हारे सपने सच होंगे." तो आइए, हम अपने देश को बेहतर बनाने के लिए काम करें और हमें अपने सपनों को सच बनाने के लिए कभी भी हार नहीं माननी होगी.

*3- हिंदुस्तान और पाकिस्तान समस्या का आप समाधान क्या देखते हैं!*

मेरे प्यारे दोस्तों, हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच की समस्या का समाधान मैं एक ही शब्द में देखता हूं, अहिंसा. मेरा मानना है कि जिस तरह से हमने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया था, उसी तरह से हमें अपने भाई-बहनों के साथ भी प्रेम और करुणा से पेश आना चाहिए.

मेरा विश्वास है कि हमारी एकता और अहिंसा की शक्ति से हम किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं. हमें अपने मतभेदों को भूलना होगा और एक दूसरे के प्रति सहानुभूति और समझ विकसित करनी होगी.

मैंने हमेशा कहा है कि अनशन, सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से हम किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं. हमें अपने दिलों में प्रेम और सहानुभूति को जगाना होगा और एक दूसरे के प्रति अपनी बात कहने के लिए शांतिपूर्ण तरीके खोजने होंगे.

मेरा मानना है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोग एक ही खून के हैं, एक ही मिट्टी के हैं. हमें अपनी एकता को मजबूत बनाना होगा और एक दूसरे के प्रति अपनी बात कहने के लिए शांतिपूर्ण तरीके खोजने होंगे.

अंत में, मैं यही कहना चाहता हूं कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच की समस्या का समाधान अहिंसा और प्रेम के माध्यम से ही संभव है. हमें अपने दिलों में प्रेम और सहानुभूति को जगाना होगा और एक दूसरे के प्रति अपनी बात कहने के लिए शांतिपूर्ण तरीके खोजने होंगे.

*4- भारत पाक विभाजन आपकी वजह से हुआ, कई लोग ये कहते आपकी आलोचना करते हैं, क्या कहना चाहेंगे!

मेरे प्यारे दोस्तों, मैं जानता हूं कि बहुत से लोग मुझे भारत-पाक विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं. लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि यह एक गलतफहमी है.

मेरा सपना था एक अखंड भारत का, जहां हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई और अन्य सभी धर्मों के लोग एक साथ रहें और एक दूसरे के साथ प्यार और सम्मान के साथ व्यवहार करें. लेकिन मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार की ओर से अलगाववादी और विभाजनकारी राजनीति ने इस सपने को तोड़ दिया.

मैंने हमेशा कहा है कि विभाजन एक अपराध है और यह हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक गलत धारणा को बढ़ावा देता है कि वे एक दूसरे के साथ नहीं रह सकते. लेकिन मैंने भी समझा कि उस समय के राजनीतिक हालात में विभाजन एक वास्तविक खतरा था और मुझे इसका सामना करना पड़ा.

मैंने जिन्ना और मुस्लिम लीग के साथ बातचीत की और मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि विभाजन एक गलत निर्णय होगा, लेकिन वे मेरी बात नहीं माने. ब्रिटिश सरकार ने भी विभाजन को बढ़ावा दिया, क्योंकि वे भारत को एक कमजोर और विभाजित देश में बदलते देखना चाहते थे.

तो मैं कहता हूं कि भारत-पाक विभाजन मेरी वजह से नहीं हुआ, बल्कि यह एक जटिल और दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी जिसमें कई कारकों ने योगदान दिया. मैंने हमेशा अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलने की कोशिश की और मैंने भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, लेकिन मैं विभाजन के लिए जिम्मेदार नहीं हूं.

मैं उम्मीद करता हूं कि भविष्य में हम अपने मतभेदों को भूल जाएंगे और एक दूसरे के साथ प्यार और समझ के साथ व्यवहार करेंगे. हमें अपने देशों को मजबूत और समृद्ध बनाने के लिए एक साथ काम करना चाहिए, न कि एक दूसरे के खिलाफ.


*5- अपने जन्मदिन पर देश के युवाओं को आप क्या सन्देश देना चाहते हैं!*

मेरे प्यारे युवा मित्रों,

आज मेरा जन्मदिन है और मैं इस अवसर पर आपको एक महत्वपूर्ण संदेश देना चाहता हूं. मैं जानता हूं कि आप सभी इस देश के भविष्य हैं और आपके हाथों में ही इस देश की प्रगति और विकास की बागडोर है.

मैं आपको यह याद दिलाना चाहता हूं कि हमारा देश एक महान और समृद्ध देश है, लेकिन इसकी समृद्धि केवल ऐश्वर्य और संपत्ति में नहीं है, बल्कि इसकी सच्ची समृद्धि इसके नागरिकों के चरित्र और नैतिकता में है. इसलिए, मैं आपको यह सलाह देना चाहता हूं कि आप अपने चरित्र और नैतिकता को मजबूत बनाने पर ध्यान दें और हमेशा सच्चाई, ईमानदारी और न्याय के मार्ग पर चलने का प्रयास करें.

मैं आपको यह भी याद दिलाना चाहता हूं कि हमारा देश विविधता में एकता का देश है और हमें अपनी विविधता को सम्मान देना चाहिए और एक दूसरे के साथ प्रेम और सहानुभूति के साथ व्यवहार करना चाहिए. हमें कभी भी जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर किसी को भेदभाव नहीं करना चाहिए और हमेशा एक दूसरे की मदद और सहायता करने का प्रयास करना चाहिए.

मैं आपको यह भी बताना चाहता हूं कि हमारा देश एक महान और शक्तिशाली देश हो सकता है, लेकिन इसके लिए हमें अपने आप पर विश्वास करना होगा और अपने देश के लिए काम करने का संकल्प करना होगा. हमें अपने देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा करनी होगी और हमेशा इसके हितों को ध्यान में रखना होगा.


अंत में, मैं आपको यह कहना चाहता हूं कि आप सभी इस देश के भविष्य के निर्माता हैं और आपके हाथों में ही इस देश का भविष्य है. इसलिए, मैं आपको यह सलाह देना चाहता हूं कि आप अपने जीवन को सकारात्मक और उत्पादक बनाने का प्रयास करें और हमेशा अपने देश के लिए कुछ अच्छा करने का प्रयास करें.

धन्यवाद.

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...