Saturday, June 13, 2026

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?*

गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चारधाम यात्रा अपने चरम पर पहुंचने लगती है. हर साल लाखों श्रद्धालु बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के दर्शन के लिए हिमालय की ओर रुख करते हैं. इस यात्रा के दौरान बद्रीनाथ धाम पहुंचे श्रद्धालुओं से जब एनडीटीवी ने हिमालय में बढ़ते प्लास्टिक कचरे, पर्यावरण संरक्षण और बढ़ती भीड़ को लेकर बात की, तो कई दिलचस्प सुझाव और चिंताएं सामने आईं. श्रद्धालुओं ने सिविक सेंस, कचरा प्रबंधन, भीड़ नियंत्रण और सीवर व्यवस्था जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी. इन सुझावों के बीच एक बड़ा सवाल यह सामने आया कि क्या आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन बनाने की जरूरत है?

*क्या सिविक सेंस की कमी भी एक बड़ी वजह है?*

कर्नाटक के बेलगाम निवासी श्रीधर का मानना है कि समस्या की जड़ केवल व्यवस्थाओं में नहीं बल्कि लोगों की आदतों में भी है. उनका कहना है कि लोगों को बचपन से ही नदियों और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भाव सिखाने की जरूरत है.

श्रीधर कहते हैं कि स्कूल स्तर पर बच्चों को यह समझाना होगा कि नदियां और पहाड़ केवल पर्यटन स्थल नहीं बल्कि जीवन का आधार हैं. उनका मानना है कि यदि बच्चों में शुरुआत से पर्यावरण संरक्षण की समझ विकसित की जाए तो आने वाली पीढ़ियां अधिक जिम्मेदार नागरिक बन सकती हैं.

चारधाम यात्रा मार्गों पर अक्सर देखा जाता है कि लोग पानी की खाली बोतलें, चिप्स के पैकेट और अन्य कचरा रास्तों में छोड़ देते हैं. पर्यावरण विशेषज्ञ भी समय-समय पर नागरिक जागरूकता को इस समस्या के समाधान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते रहे हैं.

*क्या कचरा वापस लाने की व्यवस्था बन सकती है?*

मध्य प्रदेश के डबरा निवासी हर्षित गुप्ता का सुझाव है कि यात्रियों को अपने साथ लाया गया प्लास्टिक और अन्य कचरा वापस लेकर आना चाहिए.

हर्षित का कहना है कि पहाड़ों में प्लास्टिक का निस्तारण आसान नहीं होता. ऐसे में यात्रियों को स्वयं जिम्मेदारी लेते हुए अपने उपयोग के बाद बचा कचरा वापस मैदानों तक लाना चाहिए.

पहाड़ी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है. ऊंचाई वाले इलाकों में रीसाइक्लिंग और कचरा निस्तारण की सुविधाएं सीमित होती हैं. ऐसे में पर्यावरणविद लंबे समय से 'कैरी इन, कैरी आउट' यानी जो सामान साथ ले जाएं, उसका कचरा भी वापस लेकर आने की अवधारणा पर जोर देते रहे हैं.

*क्या चारधाम यात्रा में भीड़ की सीमा तय होनी चाहिए?*

कानपुर निवासी और पेशे से डॉक्टर आयुष पांडे इस मुद्दे को पहाड़ों की वहन क्षमता यानी कैरिंग कैपेसिटी से जोड़कर देखते हैं. उनका मानना है कि किसी भी संवेदनशील क्षेत्र में आने वाले लोगों की संख्या उसकी क्षमता के अनुरूप होनी चाहिए.

डॉ. आयुष कहते हैं कि अत्यधिक भीड़ और बढ़ते प्रदूषण का असर सीधे पर्यावरण पर पड़ता है. उनके अनुसार चारधाम यात्रा के दौरान प्रतिदिन आने वाले यात्रियों की संख्या को लेकर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए.

उत्तराखंड में कैरिंग कैपेसिटी को लेकर सवाल नया नहीं है. केदारनाथ, बद्रीनाथ और अन्य लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर बढ़ती भीड़ के बीच कई बार यह सवाल सामने आया है कि क्या मौजूदा ढांचा इतनी बड़ी संख्या में यात्रियों का दबाव लंबे समय तक झेल सकता है.

*सीवर और अपशिष्ट प्रबंधन पर भी उठ रहे हैं सवाल*

डॉ. आयुष पांडे की बहन मंजुला पांडे का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि प्रत्येक यात्री की भी जिम्मेदारी है.

मंजुला पांडे ने चारधाम क्षेत्रों में सीवर और अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठाए. उनका कहना है कि यदि बड़ी संख्या में लोग तीर्थस्थलों पर पहुंच रहे हैं तो यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि वहां से निकलने वाले अपशिष्ट का उचित प्रबंधन हो. ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सीवेज और ठोस कचरा प्रबंधन की प्रभावी व्यवस्था न होने पर नदियों और जल स्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है.

इन चिंताओं के बीच सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि बद्रीनाथ में सीवेज प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचा मौजूद है, हालांकि इसके रखरखाव और क्षमता को लेकर सवाल बने हुए हैं.

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) को भेजी गई जुलाई 2024 की प्रगति रिपोर्ट के अनुसार, बद्रीनाथ के बामणी गांव में 0.26 MLD (करीब 2.6 लाख लीटर प्रतिदिन) क्षमता का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) संचालित पाया गया. वहीं सस्पेंशन ब्रिज के पास 1.00 MLD (करीब 10 लाख लीटर प्रतिदिन) क्षमता का STP भी निर्धारित मानकों के अनुरूप कार्य कर रहा था. रिपोर्ट के मुताबिक, मंदिर के पास स्थित 0.01 MLD (करीब 10 हजार लीटर प्रतिदिन) क्षमता का STP मास्टर प्लान के तहत चल रहे निर्माण और ध्वस्तीकरण कार्य के कारण निरीक्षण के समय बंद पाया गया.

No comments:

Post a Comment

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...