इस साल साहित्य, मीडिया और समाज को समझने की मेरी रुचि ने मुझे चार अलग-अलग लेकिन महत्वपूर्ण पुस्तकों से रूबरू करवाया. इनमें कहीं जीवन के अनुभवों से निकली सीख है, कहीं डिजिटल युग में बदलते मीडिया की पड़ताल, कहीं दलित चेतना और प्रतिरोध की कविताएं हैं, तो कहीं उत्तराखंड के सामाजिक सरोकारों और जनपक्षधर पत्रकारिता की स्मृतियां दर्ज हैं. इन पुस्तकों को पढ़ते हुए महसूस हुआ कि किताबें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे अपने समय, समाज और मनुष्य की संवेदनाओं का दस्तावेज भी बन जाती हैं. यही कारण है कि ये चारों कृतियां अपने-अपने क्षेत्र में पाठकों को सोचने, सवाल करने और नए दृष्टिकोण विकसित करने का अवसर प्रदान करती हैं.
*जीवन के अनुभवों से निकली सीखों की किताब ‘अंतस’*
‘अंतस’ जीवन के अनुभवों, सामाजिक सरोकारों और नैतिक मूल्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने वाली पुस्तक है. लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से पाठकों को संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और आत्मचिंतन का संदेश देते हैं. कुछ संपादकीय और वर्तनी संबंधी त्रुटियों के बावजूद यह पुस्तक पाठकों को सोचने के लिए प्रेरित करती है और विशेष रूप से युवाओं के लिए उपयोगी पाठ सिद्ध होती है.
*अनुभवों से उपजी जीवन दृष्टि*
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी निवासी लवकुश कुमार ने भौतिकी में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक तथा आईआईटी दिल्ली से परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है. अपने जीवन के अनुभवों को उन्होंने लेखों के माध्यम से ‘अंतस’ नामक पुस्तक में संकलित किया है, जिसे नोशन प्रेस प्लेटफॉर्म से प्रकाशित किया गया है.
अपने जीवन के एक कटु अनुभव के माध्यम से किताब के पहले लेख में लेखक पाठकों को एक महत्वपूर्ण सीख देते हैं, “संवेदनशीलता इंसान को जिम्मेदार बनाती है.” लेखक इस विचार को किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि अपने अनुभव के जरिए प्रस्तुत करते हैं, जिससे बात सहज रूप से पाठकों तक पहुंचती है. जीवन दर्शन से जुड़ा यह लेख शुरुआत से ही पाठकों पर प्रभाव छोड़ने में सफल रहता है और उन्हें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है.
किताब की एक विशेषता यह है कि लेखक अपने अनुभवों को केवल व्यक्तिगत घटनाओं तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उनसे व्यापक सामाजिक और मानवीय निष्कर्ष निकालने की कोशिश करते हैं. यही कारण है कि पुस्तक के कई लेख पाठकों को अपने जीवन और व्यवहार पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं.
*सरल भाषा और कुछ संपादकीय कमियां*
किताब में कुछ वर्तनी संबंधी त्रुटियां भी दिखाई देती हैं. उदाहरण के तौर पर पृष्ठ संख्या 7 पर “मायने” शब्द की वर्तनी त्रुटिपूर्ण रूप में छपी है. हालांकि ऐसी त्रुटियां पुस्तक की विषयवस्तु को प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन अगले संस्करण में इन्हें सुधारा जा सकता है.
लेखक ने कई लेखों के आरंभ या अंत में विषय से जुड़े महापुरुषों के कथनों को शामिल कर किताब को और प्रभावी बनाने का प्रयास किया है. उदाहरण के तौर पर अभिव्यक्ति से जुड़े लेख के अंत में महात्मा गांधी का एक कथन दिया गया है. ऐसे उद्धरण लेखों के संदेश को और स्पष्ट करते हैं तथा पाठकों को विषय पर गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं.
*युवाओं और बच्चों के लिए उपयोगी विचार*
‘हमारे आदर्श और युवा’ शीर्षक लेख आज के दौर के बच्चों और युवाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. इस लेख में लेखक लिखते हैं, “हमारे युवा और बच्चे उन लोगों की तरफ ही बढ़ेंगे जिनके बारे में बातें सुनेंगे.” यह पंक्ति बताती है कि समाज में जिन व्यक्तियों और मूल्यों को प्रमुखता दी जाती है, उनका सीधा प्रभाव नई पीढ़ी पर पड़ता है.
लेख केवल आदर्शों की चर्चा नहीं करता, बल्कि यह भी संकेत देता है कि बच्चों और युवाओं के सामने किस तरह के उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं. इसी तरह के विचारोत्तेजक लेख इस किताब को हर उम्र के पाठकों के लिए प्रासंगिक बना देते हैं.
*लघुकथाओं में सामाजिक सरोकार*
किताब में कुछ लघुकथाएं भी शामिल हैं, जो इसकी विषयवस्तु को और विविध बनाती हैं. ये लघुकथाएं भ्रष्टाचार, वाहनों को तेज गति से चलाने जैसी सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित हैं. संक्षिप्त होने के बावजूद इनमें एक स्पष्ट संदेश मौजूद है और ये पाठकों का ध्यान रोजमर्रा की उन समस्याओं की ओर आकर्षित करती हैं, जिन्हें अक्सर सामान्य मान लिया जाता है.
इन रचनाओं के माध्यम से लेखक सामाजिक जिम्मेदारी और जागरूकता का संदेश देते हैं तथा इन मुद्दों के खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास करते हैं.
*पढ़ने और देखने की नई राहें*
किताब के अंत में लेखक ने पाठकों की समझ का दायरा बढ़ाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण किताबों और फिल्मों के नाम भी सुझाए हैं. यह प्रयास पुस्तक को केवल अनुभवों और विचारों के संकलन तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि आगे पढ़ने और सीखने की दिशा भी दिखाता है.
फिल्मों के महत्व को रेखांकित करते हुए लेखक ने ‘सिनेमा जीवन की पाठशाला’ के लेखक का उल्लेख किया है. इससे यह संदेश मिलता है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन, समाज और मानवीय व्यवहार को समझने का एक महत्वपूर्ण साधन भी हो सकता है.
*न्यू मीडिया के बदलते परिदृश्य को समझने की एक सार्थक कोशिश*
'न्यू मीडिया के विविध आयाम' दिखाती है कि कैसे डिजिटल दौर ने लोगों की आदतों और समाज को किस तरह बदल दिया है. यह किताब बदलती पत्रकारिता और न्यू मीडिया की चुनौतियों को समझने का अच्छा अवसर देती है.
*न्यू मीडिया के बदलते दौर की पड़ताल*
मीडिया से जुड़ी एक महत्वपूर्ण किताब ‘न्यू मीडिया के विविध आयाम’ समय साक्ष्य प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है. मीडिया से जुड़े 23 लेखों से मिलकर बनी इस किताब का संपादन डॉ. सुशील उपाध्याय ने किया है. भाषा, मीडिया और साहित्य पर कई किताबें लिख चुके सुशील उपाध्याय इस पुस्तक में न्यू मीडिया के बदलते परिदृश्य को अलग-अलग दृष्टियों से सामने लाते हैं.
किताब का कवर पेज पहली नजर में ही ध्यान खींचता है. इसमें इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और लिंक्डइन जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े लोगो दिखाई देते हैं. कवर यह संकेत देता है कि यह किताब सोशल मीडिया के दौर में बदलते मीडिया के नए स्वरूप को समझने की कोशिश करती है.
*एआई और मीडिया की नई चुनौतियां*
किताब की भूमिका में कुछ वर्तनी संबंधी त्रुटियां भी दिखाई देती हैं. उदाहरण के तौर पर कई जगह “डिजिटल” की जगह “डिजीटल” लिखा गया है. हालांकि ये त्रुटियां पुस्तक की विषयवस्तु के महत्व को बहुत प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन संपादन के स्तर पर थोड़ी और सावधानी बरती जाती तो किताब और अधिक प्रभावी बन सकती थी.
संपादक डॉ. सुशील उपाध्याय के लिखे पहले लेख में एआई के मीडिया में बढ़ते प्रयोगों और उससे जुड़ी वर्तमान व भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई है. लेख केवल तकनीक की संभावनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके खतरों और दुरुपयोग की ओर भी ध्यान दिलाता है. “रजत शर्मा वियाग्रा का प्रचार करते दिखाई दे रहे हैं” जैसे उदाहरण के जरिए सुशील उपाध्याय यह दिखाते हैं कि एआई की मदद से किस तरह भ्रामक और कृत्रिम सामग्री तैयार की जा सकती है, जो मीडिया की विश्वसनीयता के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है.
*न्यू मीडिया और सामाजिक बदलाव*
किताब में न्यू मीडिया से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर भी विस्तार से लिखा गया है और यही इसकी एक बड़ी खासियत बनकर सामने आती है. ‘न्यू मीडिया और महिलाएं’ शीर्षक लेख में बताया गया है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन या सूचना का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक बदलाव में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है. लेख में यह बात सामने आती है कि घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर बनाए गए वीडियो और अभियानों का लोगों पर असर पड़ता है. कई लोग ऐसे वीडियो देखकर प्रभावित होते हैं और बाद में इस तरह की घटनाओं को रोकने या उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश भी करते हैं.
हालांकि कई लेखों में मुख्य विषय पर आने से पहले लंबी भूमिका दी गई है, जो कुछ जगहों पर पढ़ने में थोड़ी बोझिल महसूस हो सकती है. कई बार पाठक को शीर्षक से जुड़े मूल मुद्दे तक पहुंचने में अपेक्षा से अधिक समय लगता है. फिर भी अकादमिक किताबों में संदर्भ और पृष्ठभूमि को विस्तार से रखना एक जरूरी हिस्सा माना जाता है, इसलिए इसे पूरी तरह कमजोरी भी नहीं कहा जा सकता.
*न्यूज अवॉइडेंस और बदलती मीडिया संस्कृति*
‘न्यू मीडिया की चुनौती : न्यूज अवॉइडेंस’ शीर्षक लेख पाठकों को सीधे संबोधित करता है और यही बात इसे दिलचस्प बनाती है. यह लेख किताब को पूरी तरह अकादमिक और बोझिल होने से बचाता है. लेख की शुरुआत ही इस पंक्ति से होती है, “आप यह किताब पढ़ रहे हैं, तब भी संभव है कि आपने आज का अखबार नहीं पढ़ा होगा.” यह शैली पाठक को सीधे चर्चा का हिस्सा बना देती है.
लेखों की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए कई जगह आंकड़ों और रिपोर्टों का भी सहारा लिया गया है. उदाहरण के तौर पर रॉयटर्स की डिजिटल न्यूज रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2017 के सर्वे में 29 प्रतिशत लोग अक्सर या कभी-कभार चुनिंदा खबरों से परहेज करते थे, जबकि 2022 तक यह आंकड़ा बढ़कर 38 प्रतिशत हो गया. इस तरह के संदर्भ लेखों को केवल विचार आधारित नहीं रहने देते, बल्कि उन्हें तथ्यात्मक आधार भी प्रदान करते हैं.
साथ ही लेख में मीडिया की बदलती दुनिया और नए ट्रेंड को भी सामने रखा गया है. “पत्रकारों का यूट्यूबर बनना आम हो गया है. शिक्षक भी ऑनलाइन है, डॉक्टर भी ऑनलाइन...” जैसी पंक्तियां दिखाती हैं कि डिजिटल दौर ने केवल मीडिया ही नहीं, बल्कि पेशों और संवाद के तरीकों को भी बदल दिया है. यही वजह है कि यह लेख सिर्फ सूचना नहीं देता, बल्कि बदलती मीडिया संस्कृति पर सोचने के लिए भी मजबूर करता है.
*प्रिंट मीडिया के भविष्य पर सवाल*
किताब में ‘प्रिंट इज डेड!’ जैसा गंभीर विषय भी शामिल किया गया है. इस लेख में प्रिंट मीडिया के बदलते भविष्य और उसके सामने खड़ी चुनौतियों पर चर्चा की गई है. लेख में लिखा गया है, “प्रिंट के भविष्य पर बात करते समय दुनिया भर में हो रहे घटनाक्रमों पर भी नजर रखनी होगी. पिछले अस्सी वर्षों से प्रिंट मीडिया में एक दिग्गज की पहचान रखने वाले प्रमुख अमेरिकी समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट की बिक्री से स्पष्ट है कि अब अखबारों के परंपरागत शैली में काम करने का जमाना तेजी से खत्म हो रहा है.”
यह लेख केवल प्रिंट मीडिया के संकट की बात नहीं करता, बल्कि यह भी दिखाता है कि डिजिटल दौर ने समाचारों के उपभोग और प्रस्तुति के तरीके को किस तेजी से बदल दिया है. यही वजह है कि किताब मीडिया के वर्तमान के साथ-साथ उसके भविष्य को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है.
*करुणा और आक्रोश के बीच चक्रव्यूह टूटेगा*
किताब की एक कविता में लिखा है, 'कच्ची पगडंडी पर नापा था रास्ता'. इससे यह पता चलता है कि यह कविताएं उन अनुभवों से निकली हैं, जिन्हें कवि ने खुद जिया है. कवि ने गांव से शहर तक का रास्ता किसी पक्की सड़क से नहीं, बल्कि कच्ची पगडंडी पर चलकर तय किया था और वह अपने जैसे लाखों लोगों की कहानी इन कविताओं के जरिए लिखते हैं.
*चक्रव्यूह तोड़ती कविताओं की रचना*
समय साक्ष्य प्रकाशन से आई नई किताब 'चक्रव्यूह टूटेगा' ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताओं का संकलन है और इसका संपादन डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि ने किया है. कथाक्रम सम्मान, डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार सहित कई पुरस्कार प्राप्त ओमप्रकाश वाल्मीकि का नाम हिंदी साहित्य में दलित विमर्श के अग्रणी हस्ताक्षरों में प्रमुखता से लिया जाता है. देहरादून में रहने वाले शिक्षाविद प्रोफेसर राजेश पाल ने किताब की भूमिका लिखी है. उन्होंने किताब में शामिल लगभग हर कविता का विश्लेषण किया है और इससे किताब को पढ़ने की इच्छा और भी बढ़ जाती है. किताब के शीर्षक 'चक्रव्यूह टूटेगा' कविता पर वह लिखते हैं 'यहां कवि और उसकी भाषा उस परंपरा को छद्म घोषित करती है, जो सदियों से उत्पीड़न को धर्म, मर्यादा और...'
संपादकीय में डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि लिखते हैं कि यह किताब ओमप्रकाश वाल्मीकि की बाईस असंकलित कविताओं का संग्रह है. ये रचनाएं उनके अब तक प्रकाशित चार काव्य संग्रहों में संकलित नहीं हुई हैं. संपादक का यह लिखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यही इस किताब के महत्व को बढ़ाता है.
*शब्दों की चोट और समाज का सच*
'शब्द बोध' कविता ओमप्रकाश वाल्मीकि की इस किताब में पहले नंबर पर आती है. इसमें करुणा के साथ आक्रोश भी दिखाई देता है. “पीठ पीछे दिए गए विशेषण” और “फुसफुसाहटों” को कवि ने बिंब की तरह इस्तेमाल किया है. “शब्द बेधी बाणों की तरह” वाला बिंब दिखाता है कि शब्द भी चोट पहुंचाते हैं. हंसों की शक्ल में गिद्धों का बिंब उन लोगों की ओर इशारा करता है जो बाहर से साफ दिखते हैं लेकिन भीतर से हिंसा और शोषण में शामिल हैं. “बारूद” का बिंब कविता को और तीखा बना देता है, यह दबा हुआ गुस्सा कभी भी विस्फोट में बदल सकता है.
*भूख का अनुभव और यथार्थ*
इसके बाद किताब में 'भूख' कविता भी आती है, जिसमें करुण रस प्रमुख है. कविता भूख को बताती नहीं, दिखाती है. “पेड़ की तरह हिलता है” और “हवा की तरह चलता है” जैसे बिंब आदमी की कमजोरी को सामने लाते हैं. “पेट की आग में झुलसकर राख की तरह ठंडा हो जाता है” कविता का सबसे मजबूत बिंब है, यह भूख को पूरी तरह तोड़ देने वाली स्थिति बना देता है.
*संवेदना का दिखावा और यथार्थ*
'मेरे किस काम के' कविता में कवि उन लोगों पर तंज कसते हैं, जिन्हें दूर की चीजों की चिंता तो है लेकिन अपने आसपास के इंसान के दर्द से उनका कोई संबंध नहीं बन पाता.
नर्म हाथों से पोंछते हैं आंसू अपने प्रकृति विनाश पर
वे आंसू : जो कभी नहीं बहे
किसी निर्दोष की हत्या पर
इन पंक्तियों में कवि समाज की दोहरी संवेदना को सामने लाते हैं. यहां करुणा का दिखावा है लेकिन असली करुणा गायब है. प्रकृति के नाम पर बहाए जा रहे आंसू और इंसान की हत्या पर न बहने वाले आंसू के बीच का यह विरोध कविता को अधिक पठनीय बना देता है.
कविता का असर इसी विरोध में है कि संवेदना भी चयनित हो गई है, जहां कुछ दुख दिखाई देते हैं और कुछ को नजरअंदाज कर दिया जाता है.
*करुणा और आक्रोश से बनी कविताएं*
'चक्रव्यूह टूटेगा' सिर्फ कविताओं का संग्रह न होकर जीवन के उस सत्य का बयान है जिसे अक्सर दबा दिया जाता है. इन कविताओं में करुणा है, आक्रोश है और ये पाठक को असहज करने के साथ सोचने पर मजबूर कर देता है.
हालांकि कुछ जगहों पर बिंबों की समानता दिखती है लेकिन यह बात इन कविताओं के प्रभाव को बहुत कम नहीं करती.
यह संग्रह हिंदी कविता में उन आवाजों को मजबूती से सामने लाता है, जिन्हें लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया.
*स्मृति से आगे बढ़कर उत्तराखंड के मुद्दों को सामने लाती स्मारिका*
स्मारिका अपने समय और समाज दोनों को दर्ज करने की कोशिश करती है. इसमें सामग्री की विविधता और सरोकार साफ दिखाई देते हैं. हालांकि संपादन की छोटी गलतियां इसके प्रभाव को थोड़ा कम कर देती हैं.
33वां उमेश डोभाल स्मृति सम्मान समारोह इस बार अल्मोड़ा में हुआ. 1988 में शराब माफियाओं द्वारा पौड़ी में पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या कर दी गई थी और उन्हीं की याद में पत्रकारिता सहित सामाजिक कार्यों से जुड़े अन्य क्षेत्रों में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार साल 1991 से लगभग हर साल प्रदान किया जाता है. इस साल प्रिंट मीडिया के लिए यह राजू सजवाण को दिया गया. समारोह के दौरान शामिल लोगों को उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट की तरफ से प्रकाशित स्मारिका भी दी जाती है.
*उत्तराखंड को समझने के लिए आकर्षित करता कवर पेज*
स्मारिका का कवर पेज उत्तराखंड को समझने वाले हर व्यक्ति को आकर्षित करता है. आवरण चित्र में उत्तराखंड के पहाड़ों की सुंदरता दिखाई देती है और साथ ही उमेश डोभाल पर लिखा वाक्य “उमेश डोभाल एक व्यक्ति नहीं एक धारा थी..” पाठकों को उमेश डोभाल के योगदान की याद दिलाने में सफल रहा है. पिछले आवरण के पोस्टर को आशीष नेगी ने तैयार किया है, जिस पर पुस्तकालय के महत्व को सामने रखती एक कविता लिखी है और यह पत्रकारिता से जुड़ी किताब के लिए परफेक्ट आवरण बन जाता है.
*पुरस्कार की सार्थकता को सिद्ध करते लेख*
किताब में लिखे लेख उत्तराखंड की सामाजिक और बौद्धिक परंपरा को समृद्ध करने वाले कुछ लोगों के जीवन के संस्मरण हैं.
शुरुआत में उमेश डोभाल और ट्रस्ट के बारे में जानकारी देते हुए किताब पाठकों को पूर्व और वर्तमान पुरस्कार विजेताओं के बारे में जानकारी देती है. यह किसी स्मारिका को स्मारिका सा अहसास देने का महत्वपूर्ण हिस्सा है. राजेंद्र रावत राजू जनसरोकार सम्मान वर्ष 2026 किशन सिंह मलड़ा को दिया गया और उनके बारे में किताब में लिखा है कि बंजर भूमि में पौधरोपण करते हुए अब तक 'दस लाख पचहत्तर हजार' से अधिक पौधों का उत्पादन, प्रत्यारोपण और निशुल्क वितरण कार्य संपन्न किया जा चुका है. ऐसा परिचय पुरस्कार की सार्थकता को सिद्ध करने में सफल रहा है.
किताब के अंत में ट्रस्ट द्वारा आय विवरण भी दिया गया है, जो ट्रस्ट की तरफ से खर्चे को लेकर अपनाई गई पारदर्शिता को दिखाता है.
क्रम सूची में मात्राओं की गलती से अर्थ का अनर्थ हुआ है, जैसे कॉरपोरेट घरानों के कब्जे में 'मीडिया' की जगह 'कीडिया' लिखा है. इसे सुधारा जाना चाहिए था क्योंकि स्मारिका में अगले संस्करण तक सुधार के लिए लंबा समय लग जाता है.
*स्मारिका में दर्ज याद और विचार*
कई आलेखों के मिश्रण से तैयार इस स्मारिका का पहला आलेख रमेश पहाड़ी का लिखा है, 'उमेश जिनकी मौत से एकजुट हुआ था समाज', पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या से लेकर समारोह की शुरुआत तक का पूरा घटनाक्रम इस आलेख में विस्तार से लिखा गया है.
रविन्द्र सिंह के लिखे अगले आलेख में एक पत्रकार कैसे समाज के लिए उदाहरण बन सकता है, इसे सहज भाषा में रखा गया है. 'अपने जीवन काल में उमेश डोभाल भले ही अकेले रहे थे, पर आज उनकी सोच को सैंकड़ों उमेश आगे बढ़ा रहे हैं'.
'गिर्दा और संघर्षों के वे दिन' आलेख में लेखक पी. सी. तिवारी ने उत्तराखंड के आंदोलनों की कुछ कहानियों को नई पीढ़ी के सामने रखा है. कैसे एक व्यक्ति ने वनों की नीलामी को रोक दिया था, यह किस्सा पढ़ने में बेहद रोचक है. 'लोगों पर नैनीताल की ठंड में पानी की बौछारें पड़ रही थीं, लाठी-डंडे चल रहे थे और गिर्दा गा रहे थे हमर हड़िकनै कि कुर्सी छू तुमरी'.
किताब में उत्तराखंड के जनकवि गिर्दा पर भी खूब जानकारी मिलती है, उनके निजी और सार्वजनिक जीवन पर बेहतरीन ढंग से लिखा गया है. 'यह कोठरी सब आंदोलनकारियों, रंगकर्मियों...'
'गिर्दा अब घर पर खुलेआम बीड़ी भी नहीं पी पाता था'.
*उत्तराखंड के मुद्दों को सामने लाते आलेख*
किताब के आलेखों से हमें उत्तराखंड की समस्याओं को समझने का मौका भी मिलता है, जैसे पृष्ठ संख्या 37 में लिखा है 'काश, पौड़ी अस्पताल में ऐसी गंभीर अवस्था का सामना करने के आवश्यक इंतजामात होते'.
उत्तराखंड के पच्चीस वर्षों पर लिखे आलेख भी किताब में शामिल हैं. जिनमें जय सिंह रावत के लिखे आलेख में पहाड़ की आर्थिक स्थिति पर गंभीरता से सोचने पर मजबूर करते हुए आंकड़े दिए गए हैं, 'पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि का योगदान राज्य की जीडीपी में लगातार गिरकर 2 प्रतिशत के आसपास सिमट जाना...'.
चारु तिवारी के लिखे आलेख में राज्य की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को पाठकों के सामने रखा गया है. चारु लिखते हैं, 'इन पच्चीस सालों में 22 पॉलीटेक्निक और 45 आईटीआई सरकारें बंद कर चुकी हैं या वे जर्जर हालत में हैं'.
*समस्याओं पर सीधी बात*
'मनोहर चमोली के नरभक्षी जीव को हमेशा के लिए हटाना जरूरी' आलेख में पहाड़ों में गुलदार के मानव पर हमले की महत्वपूर्ण समस्या पर विस्तार से लिखा गया है और गुलदार के शिकार के कारणों को समझने के लिए यह आलेख बेहद महत्वपूर्ण है. जैसे उन्होंने लिखा है, '80 फीसदी का भूभाग छोड़कर कोई गुलदार 20 फीसदी में आए और निरपराध को अपना भोजन बना ले तो यह किस सूरत में स्वीकार्य होगा?'.
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