Wednesday, September 29, 2021
गांधी का नाम मिटाने के पीछे का मानुष
Friday, September 24, 2021
छाती पर कूदता पशु नही।
Wednesday, September 22, 2021
इंसान
ये नोटों की खुशबू और तख़्त का ही असर है,
जो इंसान आज इंसान पर ढहते ज़ुल्मों से बेखबर है।
किसी को बहत्तर हूरों के पास तो किसी को स्वर्ग में जाने की फ़िक्र है,
पर अपनी इस दुनिया को नर्क बनाती चालों से सब बेख़बर हैं।
बंदूक की नोंक पर अब हर फ़ैसले लिए जाने लगे हैं,
शांति के दूत गांधी और मंडेला के देखे सपने भुलाए जाने लगे हैं।
वो दिन दूर नही जब इंसान, इंसान को ही ढूंढता नज़र आएगा।
वो अपनी चिता पर आग खुद ही लगाएगा।
अब शायद इस खश को समेटने का समय आ गया है,
खुदा के ज़मीन पर आने का नही, खुद को जगाने का वक़्त आ गया है।
हिमांशु जोशी।
Sunday, September 19, 2021
छह छक्कों की कहानी युवी की जुबानी.
हर चौक पर युवा नेता बन बैठ गया है
Monday, September 13, 2021
पेट भरती भी नही और भूखा मारती भी नही हिंदी
चलती नही दौड़ती है अब हिंदी, विदेशी से स्वदेशी अपनाओ
Saturday, September 11, 2021
पुस्तक समीक्षा : 'चले साथ पहाड़' , इसे राजकीय किताब घोषित कर दिल्ली दरबारियों के हाथ में पकड़ा कहिए 'असली पहाड़ देखना है तो चले साथ पहाड़'!
Wednesday, September 8, 2021
विश्व साक्षरता दिवस
पहले लॉकडाउन में तो नवल के परिवार में कोई स्मार्टफोन नही था, पर इस बार जैसे-तैसे पैसे जुटा उसकी पढ़ाई के लिए एक स्मार्टफोन खरीदा गया है। फोन में जियो सिम है और उस पर रिचार्ज नैनीताल से चाचा द्वारा या गांव में पिता द्वारा मज़दूरी के पैसों से कराया जाता है।
Friday, September 3, 2021
ऑल वेदर रोड पर एक दिन।
हिमालय के दो ढाल हैं: उत्तरी और दक्षिणी। दक्षिणी में भारत, नेपाल, भूटान हैं। उत्तराखण्ड को सामने रख हम दक्षिणी हिमालय को समझ सकते हैं। उत्तराखण्ड की पर्वत श्रृंखलाओं के तीन स्तर हैं- शिवालिक, उसके ऊपर लघु हिमाल और उसके ऊपर ग्रेट हिमालय। इन तीन स्तरों मे सबसे अधिक संवेदनशील ग्रेट हिमालय और मध्य हिमालय की मिलान पट्टी हैं।
इस संवेदनशीलता की वजह इस मिलान पट्टी में मौजूद गहरी दरारें हैं।
बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामबाड़ा, गौरीकुण्ड, गुप्तकाशी, पिंडारी नदी मार्ग, गौरी गंगा और काली नदी – ये सभी इलाके दरारयुक्त हैं।
यहां भूस्खलन का होते रहना स्वाभाविक घटना है। किंतु इसकी परवाह किए बगैर किए निर्माण को स्वाभाविक कहना नासमझी कहलायेगी। अतः यह बात समझ लेनी जरूरी है कि मलवे या सड़कों में यदि पानी रिसेगा, तो विभीषिका सुनिश्चित है।
हिमालय में निर्माण की शर्तें
दरारों से दूर रहना, हिमालयी निर्माण की पहली शर्त है। जल निकासी मार्गों की सही व्यवस्था को दूसरी शर्त मानना चाहिए। हमें चाहिए कि मिट्टी-पत्थर की संरचना कोे समझकर निर्माण स्थल का चयन करें, जल निकासी के मार्ग में निर्माण न करें। नदियों को रोकें नही, बहने दें।
जापान और ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसी दरारें हैं लेकिन सड़क मार्ग का चयन और निर्माण की उनकी तकनीक ऐसी है कि सड़कों के भीतर पानी रिसने की गुंजाइश नगण्य है इसलिए सड़कें बारिश में भी स्थिर रहती हैं।
देखा है कभी? अब भी कंधों में बैठ नदी पार कर स्कूल जाता है देश का भविष्य
चंपावत से रीठासाहिब तक सड़क ठीक है। रीठासाहिब के बारे में बात की जाए तो लोदिया और रतिया नदियों के संगम पर स्थित यह गुरुद्वारा सिखों का लोकप्रिय तीर्थस्थल है जहां वर्षभर में लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
गुरुद्वारे के आसपास चौड़ा मेहता गांव के निवासियों द्वारा बताया गया कि इतने लोकप्रिय तीर्थस्थल के क्षेत्र में होने के बावजूद भी सरकार क्षेत्र को विकसित करने में असफल रही है, बहुत से गांवों के बच्चों की पढ़ाई के लिए एकमात्र विद्यालय राजकीय इंटर कॉलेज चौड़ा मेहता है।
आसपास के गांव बिनवाल, गागर, चमोला, कैड़ागांव, परेवा के बच्चे कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं और इनमें से कुछ गांव के बच्चों को तो नदी पार कर स्कूल पहुंचना पड़ता है।
रीठासाहिब के बाद लगभग 20-25 किलोमीटर कच्ची सड़क पूरी तरह से पत्थरीली है। पक्की सड़क शुरू होने से चार-पांच किलोमीटर पहले सड़क किनारे मुझे मथियाबाज गांव के कुछ लड़के सड़क किनारे घूमते मिले, उनसे बातचीत करने पर यह पता चला कि उन्हें ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा पढ़ने के लिए 9-10 किलोमीटर दूर राजकीय इण्टर कॉलेज सुखीढांग पैदल ही जाना पड़ता है।
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