Wednesday, September 29, 2021

गांधी का नाम मिटाने के पीछे का मानुष

        

समीक्षा
             किंडल एडिशन मूल्य- ₹144.55 

जेएनयू समेत विश्व के कई नामी विश्वविद्यालयों से जुड़े तीन प्रोफेसरों की लिखी किताब की शुरुआत इसके हिंदी संस्करण हेतु अभिस्वीकृति से होती है।
किताब पढ़ने की शुरआत में आपको इसके शब्द बड़े भारी-भरकम लगेंगे पर वास्तविकता पढ़ते-पढ़ते आपके कान खड़े होते जाएंगे और आप किताब पूरी खत्म होने तक बहुत सी सच्चाई को समझने के काबिल बन जाएंगे।

किताब के लेखकों का कहना है कि इस किताब को आए दस साल हो गए हैं पर किताब जिन मुद्दों पर लिखी गई उन मुद्दों की प्रासंगिकता घटने के बजाए बढ़ती ही जा रही है।
'किताब पढ़ते आप समझ जाएंगे कि लेखकों ने किताब लिखते कौन सा भविष्य देख लिया था जो आज घटित हो रहा है।'

किताब का उद्देशय अपने समाज और राजनीतिक माहौल को समझने के लिए आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा देना है।

विपिन चन्द्र की प्रस्तावना अप्रैल 2007 में उत्तर प्रदेश विधनसभा चुनाव प्रचार अभियान में चल रहे सीडीज़ के खेल से शुरू होती है।
वह कहते हैं कि किताब पढ़ आप साम्प्रदायिकता के प्रचंड संकट से रूबरू हो जाएंगे।

आभार में यह पता चलता है कि यह किताब शिक्षा के साम्प्रदायिकरण के खिलाफ वर्ष 2001 में दिल्ली हिस्टेरियन ग्रुप के तहत शुरू हुए एक अभियान का हिस्सा है।

किताब का पहला हिस्सा आरएसएस और स्कूली शिक्षा है।
यह हमें बताता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में संघ गठजोड़ की समझ बहुत साफ रही है कि साम्प्रदायिकता को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि साम्प्रदायिक विचारधारा को प्रभावी ढंग से फैलाया जाए। यही वज़ह है कि संघ ने सबसे ज्यादा गम्भीर प्रयास विचारधारा के क्षेत्र में ही किए हैं। दूसरे समुदाय के प्रति घृणा और अविश्वास को भरने के लिए आरएसएस ने इस काम के लिए हजारों सरस्वती शिशु मंदिरों, विद्याभारती के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों और अपनी शाखाओं को माध्यम के रूप में चुना है।

'मेरा यह मानना है कि धर्म की कट्टरता देश का विनाश ही करती है, इसके लिए हमें बस एक बार अफगानिस्तान की खबरों को गूगल पर सर्च करने की जरूरत है।'

किताब में लेखक ने इस मामले में नागरिक स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले अथक योद्धा गांधी जी के विचार दिए हैं कि सम्प्रदायिकता, धर्मांधता और घृणा फैलाने वाले सभी तरह के साहित्य पर राज्य की ताकत का इस्तेमाल कर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
ऐसा न किए जाने पर वह गोधरा कांड का उदाहरण देते हैं।

किताब में आरएसएस द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिर प्रकाशन और विद्या भारती प्रकाशन से प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों के मूल्यांकन के लिए बनाई गई समिति की रिपोर्ट और उसकी सिफारिश का जिक्र है।
दिल्ली के कुतुबमीनार और उसको बनवाने का श्रेय समुद्रगुप्त को देना जैसे अस्पष्ट तथ्यों को स्कूली शिक्षा में शामिल करना सिफारिश की अहमियत भी प्रमाणित करता है।

'एनसीआरटी के निदेशक ने वर्ष 2000 में नए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा तैयार की, किताब में उसके परिणाम पढ़ फिर से गढ़े मुर्दे उखाड़ने जरूरी हैं।'

किताब में लिखा गया है कि जो लोग हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतों के एजेंडे से सहमत नही थे, उन पर हमले होने शुरू हो गए।
'यह बात आज हम खुद भी अपने चारों और घटित होते देख रहे हैं।'

शिक्षा और समाज में फैलाई जा रही नफरत पर चर्चा करती किताब में आगे लिखा है कि राजा राम मोहन राय, ज्योतिबा फुले और यहां तक कि बीआर अंबेडकर जैसे समाज सुधारकों पर या तो बहुत कम अथवा कुछ भी नही लिखा गया है। जाहिर है कि परम्परागत हिन्दू समाज में किसी भी तरह के सुधार की जरूरत नही समझी गई है।

'किताब का यह हिस्सा पढ़ समझ आता है कि क्यों हम अब भी हम अपने समाज में  धार्मिक और जातिगत भेदभाव की गहरी खाई देखते हैं और क्यों अब भी विधवा पुनर्विवाह जैसे गम्भीर मुद्दों पर समाज में चर्चा नही होती।'

किताब का दूसरा भाग 'गांधी की हत्या की प्रेतछाया' शुरू होने से पहले आपको यह भी पता चलेगा कि महात्मा गांधी की भूमिका को भी एनसीआरटी की इन पाठ्यपुस्तकों में कम कर दिखाया गया है।
दूसरा भाग गांधी नाम को हटाने के डर की वजह और उनकी हत्या की साजिश से पर्दा न उठाने की वजह ढूंढते शुरू होता है।

गोडसे, सावरकर, आरएसएस और हिन्दू महासभा के सम्बन्धों में प्रकाश डाला गया है।
नाथूराम के भाई और हत्या की साजिश में सहभियुक्त गोपाल गोडसे के अदालत में बयान और नाथूराम ने फांसी पर चढ़ने से पहले जो प्रार्थना पढ़ी उनके बारे में जानने के लिए किताब पढ़नी जरूरी है।
किताब में 'न्यू स्टेट्समैन' के सम्पादक किंग्सले मार्टिन के द्वारा 1948 में अपने अखबार को भेजे तार के बारे में जो जिक्र किया गया है, वह बात आज सत्य साबित हो रही है।

किताब एक महत्वपूर्ण तथ्य से भी पर्दा उठती है, जिसके बारे में अक्सर सवाल उठते हैं।
हिन्दू साम्प्रदायिक समूहों के दुष्प्रचार के मुताबिक भारत सरकार धोखे का आखिरी सबूत पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए का भुगतान करना था। उसके लिए उन्होंने गांधी के उपवास को दोषी ठहराया।
गोडसे ने भी यही कहा कि उपवास के बाद ही मैं बेकाबू हो गया।
जबकि यह उपवास आंशिक तौर पर भारत सरकार को अपने वायदे का सम्मान करने और हिन्दू और मुसलमानों को शर्मिंदगी का एहसास कराने का संदेश देने के लिए था।
किताब में एक शीर्षक 'गांधी जी की हत्या का कोई अफसोस नही' में हमें पता चलता है कि आरएसएस ने गांधी जी की हत्या की निंदा करते हुए कभी एक वक्तव्य तक जारी नही किया।

भाजपा सरकार द्वारा बहुत से मौकों पर सावरकर को फिर से जिंदा किए जाने का वर्णन किताब में मिलता है, 2003 में भाजपा सरकार ने संसद भवन में सावरकर की तस्वीर को ठीक महात्मा गांधी की तस्वीर के सामने लगाया।
किताब यह स्पष्ट करती है कि राष्ट्रवादी का दावा करने वाली पार्टी के पास दिखाने के लिए थोड़े से स्वतंत्रता सेनानी होना थोड़ा शर्मनाक भी है इसलिए अपने राष्ट्रवादी प्रतीक खोजने की कवायद में सावरकर को सामने किया गया हो जबकि ये वही सावरकर थे जिन्होंने अंग्रेजों से माफ़ी मांगकर क्रांतिकारियों का सिर शर्म से नीचा कर दिया था। हमारे इतिहास के उन पहलुओं को पुनर्जीवित, पुननिर्मित और विकृत किया जा रहा है जो कि साम्प्रदायिक विचारधारा और आचरण से मेल खाते हों।

'इसे पढ़ते ही मुझे हाल ही में सम्राट मिहिरभोज के वंशज होने का दावा करने वाले राजपूतों और गुर्जरों में बना गतिरोध याद आ जाता है और यह भी कि यह गतिरोध शुरू कैसे हुआ।'

किताब का तीसरा भाग ' हिन्दू साम्प्रदायिकता की विचारधारात्मक निर्मितियां' है।
यह भाग बताता है कि हिंदुत्व के विचारकों के लेखन में हिंदुत्व की जो धारणा पेश की गई है उसके अनुसार भारत सिर्फ हिंदुओं का देश है, मुसलमान हमारे दुश्मन हैं, वे राष्ट्रद्रोही और गद्दार हैं। इस धारणा के अंतर्गत भारतीय राष्ट्रवाद को हिन्दू राष्ट्रवाद तक सीमित कर दिया गया है।

'यही वह बात है जिसके दिमाग में भर जाने से महात्मा गांधी की हत्या की गई।'

'आमतौर पर हिंदुस्तान में 'स्तान' की जगह साम्प्रदायिक धारणा वाले शब्द 'स्थान' का इस्तेमाल किए जाने जैसे तथ्य लेखक इतिहास से खोज लाए हैं और साथ में वह कई चेहरों को बेनकाब करते हैं।

किताब खत्म होने से पहले एक और सच सामने लाती है कि 1937 में ही सावरकर ने हिन्दू महासभा में दो राष्ट्रों के बारे में बात की थी और मुस्लिम लीग में यह मांग 1938 में उठी, जिसकी प्रतिक्रिया में सावरकर द्वारा अपने बयान बदल दिए गए थे।

'मुसलमान विरोधी पूर्वाग्रह' और 'कांग्रेस विरोधी और गांधी विरोधी रवैया' शीर्षकों में आज़ादी के पहले से ही मुसलमानों को लेकर बनाई गई क्रूर छवि पर प्रकाश डाला गया है, इसमें यह भी लिखा है कि अपने धर्म के लोग जो साम्प्रदायिक नही हैं और उदारवादी हैं, वे भी दूसरे धर्म के लोगों की तरह ही साम्प्रदायिक शक्तियों के दुश्मन बन जाते हैं और कभी-कभी उनसे भी ज्यादा। यही कारण है कि हिन्दू साम्प्रदायिक शक्तियों के अंदर कांग्रेस और गांधी के खिलाफ ज़हर भरा है।

किताब के अंतिम हिस्से में पता चलता है कि हिन्दू साम्प्रदायिक विचारक भौगोलिक आधार पर बने राष्ट्रवाद की अवधारणा की कमजोरियां गिनाते हैं और कहते हैं कि यूरोप में यह असफल हो चुका है।

'बांटने के इस खेल में भी कैसे हार मिलती रही है उसका सटीक उदाहरण हमें किताब में इसे पढ़ने के साथ मिलता है'- हिन्दू महासभा से जुड़े लोगों की अंग्रेज़ों से वफादारी और उसके बाद भी हिन्दू समेत तमाम भारतीयों से ख़ारिज हो चुनावों में हार की हताशा ने गांधी हत्या की नींव तैयार करी।

'क़िताब के अंत तक पहुंचते-पहुंचते आप खुद को किताब लिखे जाने का उद्देशय पूरा कर सकने की स्थिति में पा सकते हैं।
इसे पढ़ सालों से एक ही विचारधारा से जुड़े लोग भी अपने समाज और राजनीतिक माहौल को समझते हुए स्वयं में एक आलोचनात्मक चिंतन कर सकते हैं, क्योंकि वह जनता ही है जिसे यह फैसला लेना है कि वह आज के भारत को किस स्थिति में कल की पीढ़ी को सौंपेगी। 
ऐसा भारत जो धर्म , जाति के नाम पर लड़ता रहे या ऐसा भारत जो विकास की पटरी पर दौड़ता रहे। हमारा एक फैसला ही कल का एक बेहतर लोकतंत्र स्थापित करने में मदद करेगा।'

समीक्षक- हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

Friday, September 24, 2021

छाती पर कूदता पशु नही।

लेखक हूं, वक्ता नही।
लिखता हूं, बोलता नही।
प्रमाणित हूं, बड़बोला नही।
खाता हूं, बटोरता नही।
इतिहास हूं, अपवाद नही।
निर्माण हूं, विध्वंस नही।
विज्ञान हूं, अंधविश्वास नही।
भविष्य हूं, तालिबान नही।
ईमान हूं,धर्म नही।
कविता हूं, ध्वनि नही।
कुरान हूं, फ़तवा नही।
गीता हूं, परंपरा नही।
मानव हूं, 
किसी की छाती पर कूदता पशु नही।

हिमांशु।

Wednesday, September 22, 2021

इंसान

हवा में घुल गया जाने कौन सा ज़हर है,
शैतान बन गए इंसानों का इंसानों पर कहर है।

ये नोटों की खुशबू और तख़्त का ही असर है,

जो इंसान आज इंसान पर ढहते ज़ुल्मों से बेखबर है।


 किसी को बहत्तर हूरों के पास तो किसी को स्वर्ग में जाने की फ़िक्र है,

पर अपनी इस दुनिया को नर्क बनाती चालों से सब बेख़बर हैं।

बंदूक की नोंक पर अब हर फ़ैसले लिए जाने लगे हैं,

शांति के दूत गांधी और मंडेला के देखे सपने भुलाए जाने लगे हैं।

वो दिन दूर नही जब इंसान, इंसान को ही ढूंढता नज़र आएगा।

वो अपनी चिता पर आग खुद ही लगाएगा।

अब शायद इस खश को समेटने का समय आ गया है,

खुदा के ज़मीन पर आने का नही, खुद को जगाने का वक़्त आ गया है।

हिमांशु जोशी।


Sunday, September 19, 2021

छह छक्कों की कहानी युवी की जुबानी.

युवराज सिंह ने अपने छह बॉलों में छह छक्कों के कारनामे को याद करते फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट करी है।
इस वीडियो में धोनी भी युवराज बने हैं तो ब्रॉड, कॉलिंगवुड, अंपायर भी युवराज। पढ़िए छह छक्कों की कहानी युवी की जुबानी.

साल था 2007,
टी20 क्रिकेट खेलने से दूर भागने वाला भारत, साउथ अफ्रीका में इस प्रारूप के खेले जा रहे पहले विश्व में अपना दावा भी ठोक रहा था।

सचिन, गांगुली, लक्ष्मण, द्रविड़ इस टीम से गायब थे और युवाओं पर भारतीय टीम को विश्व विजय कराने का जिम्मा था, जिसकी कप्तानी बिग हिटर महेंद्र सिंह धोनी कर रहे थे।

24 सितंबर 2007 को खेले गए फाइनल मुकाबले में भारत ने अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को हरा खिताब भी जीत लिया पर विश्व कप याद किया गया बाएं हत्था स्टाइलिश बल्लेबाज युवराज के स्टाइलिश बनने की कहानी की वजह से।

19 सितंबर 2007 को डरबन में अंग्रेजों से हुए मैच में युवराज ने स्टुअर्ट ब्रॉड की छह गेंदों पर छह छक्के जड़ने का कारनामा कर दिखाया था।
यही मैच आज के टी20 के धाकड़ बल्लेबाज रोहित शर्मा और क्रिकेट से रिटायरमेंट ले चुके जोगिंदर शर्मा का भी पहला टी20 मैच था।

उस मैच के चौदह साल पूरे होने पर युवराज ने अपने फेसबुक पेज पर एक वीडियो साझा किया है।
वीडियो के कैप्शन में युवराज ने अपने फॉलोवर्स से खुद की एक्टिंग के बारे में राय मांगी है और साथ ही स्टूअर्ट ब्रॉड के साथ फ्लिंटॉफ को भी याद किया है।

युवी-युवी के शोर के साथ शुरू हुई 8 मिनट 9 सेकेंड की इस वीडियो में युवराज बाइक का हेलमेट पहन टीम इंडिया की नीली जर्सी और जीन्स पहने नजर आते हैं।

अपनी बैटिंग का इंतज़ार करने के बाद युवराज ने मैदान में उतरते ही हेलमेट के शीशे को ऊपर नीचे किया।
पहला शॉट खेलने के बाद युवराज दूसरे छोड़ पर खड़े महेंद्र सिंह धोनी को याद करते बोलते हैं माही कैसा आ रहा है इसका बॉल !!
फिर खुद ही माही बन बोलते हैं बाउंस है।

वीडियो में फ्लिंटॉफ से बहस करते युवराज अंपायर से कहते हैं यार अंपायर तू बीच में मत बोल, इसकी गलती थी। इसने स्टार्ट किया है, मैंने कुछ नही बोला। ठीक है, तो आप इसको बोलो।

फिर ओवर कराने आए ब्रॉड की पहली गेंद पर गुस्से से तमतमाते युवराज छक्का जड़ने का अभिनय करते माही से कुछ नही बोलते।
वीडियो के बैकग्राउंड में मैच की उस दौरान अंग्रेज़ी में हो रही कमेंट्री चलती है।
दूसरी गेंद पर फिर युवराज ने छक्का जड़ा और माही बन कहते हैं हां देता रह ऐसे ही।
तीसरी गेंद पर छक्का जड़ युवराज फिर माही से कुछ नही कहते, चौथी भी बाउंड्री पार पहुंचाने के बाद अंपायर से कहते हैं अंपायर नो बॉल अंपायर। नही।

फिर धोनी से पूछते हैं माही कहां डालेगा ये, क्या लगता है।
फिर युवराज धोनी बन कहते हैं अब कहीं भी डाले, अब तो चार बॉल में चार छक्का हो गया है। अब तो लगता है दो खा के जाएगा।

इसके बाद अपनी बैटिंग क्रीज़ में लौटने पर युवराज ने कॉलिंगवुड और ब्रॉड की बातचीत को भी बोल कर दिखाया है, जिसमें कॉलिंगवुड ब्रॉड से अच्छी यॉर्कर डालने के लिए कहते हैं।
युवराज ब्रॉड की ओवर द स्टम्प्स बात सुन कर खुश होते कहते हैं ओवर द स्टम्प्स, इट्स गुड फ़ॉर मी। ये साइड छोटी है और पांचवी गेंद पर भी छक्का।

अब युवराज ने फ्लिंटॉफ की कमर पकड़ सर झुकाए एक्टिंग की है।
फिर वह कहते हैं पांच बॉल में पांच छक्के हो गए हैं, पांच खाए थे पांच मार दिए।

इसके आगे ब्रॉड बने युवराज कहते हैं अंपायर बॉल्स टू गो। अंपायर लास्ट बॉल।

अंतिम गेंद भी सीमा पार, उसके बाद जोश से भरे युवराज सिंह ने वीडियो का अंत मैच की असली फुटेज के साथ किया है।

हमेशा याद रहेगी छह छक्कों की कहानी

युवराज, सचिन, गांगुली, सहवाग, धौनी, कुंबले, जहीर, लक्ष्मण, हरभजन के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट छोड़ने के बाद भी भारत में क्रिकेट की दीवानगी बढ़ती ही जा रही है, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया को घर में पीटने के बाद भारतीय क्रिकेटर अब आईपीएल में मस्त हैं।

भारतीय क्रिकेट के कुछ यादगार पल ऐसे हैं जो भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में हमेशा रहेंगे और खिलाड़ी भी उन्हें हमेशा याद रखेंगे। युवराज का छह गेंदों में छह छक्के लगाने का कारनामा कुछ ऐसा ही था।
खबर लिखे जाने तक वीडियो पोस्ट हुए 11 घण्टे हो गए हैं और दस लाख से ज्यादा लोग इस वीडियो को देख चुके हैं।


हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

हर चौक पर युवा नेता बन बैठ गया है

वो चल पड़े थे वर्दी पहन सीमा पर,
लेकिन गोली अंदर ही अपनो से लगने लगी थी।

लाखों के सपनों में रोज़ आती, डीटीसी से मेट्रो बनी मेरी दिल्ली दंगों की आग में जलने लगी थी।

हुआ एक फ़रमान नोटबन्दी का, 
सबकी दौड़ अब बैंकों की ओर लगने लगी थी।

एक दिन उसने  टीवी पर बोला तो सबसे थमने के लिए 
पर कई अंतहीन यात्रा अब शुरू हो चुकी थी।

चल रही थी सरकारी रेल बड़ी तेज़ी से पर चलते-चलते बात उसके बिकने की होने लगी।

चायवाले का सपना जो पूरा हुआ, आज हर कोई कुछ बेचने वाला बन गया है।
रोज़गार न पा हर चौक पर युवा नेता बन बैठ गया है।

ज़ोर होता विकास का पर अब धर्म, जाति, मर्द, औरत में मामला उलझ गया है।

देश को अन्न देने वाला किसान लाठी खा-खा कर अब सड़कों पर बैठ गया है।

ऐ देशवासियों अब तो इस राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता का चश्मा तोड़, इन नंगी आंखों से देश नंगा होते देखो।

चिलम भरते नशे में डूबा युवाओं जागो और फिर से इस महान लोकतंत्र का तिरंगा ऊंचा करते सबसे आगे भागो।

हिमांशु

Monday, September 13, 2021

पेट भरती भी नही और भूखा मारती भी नही हिंदी

क्या तुम्हें पता है रक्त के लाल रंग से सिंचित है हिंदी,
क्रांति के दौर की अहम भाषा रही है हिंदी।

हिंदुस्तानी होने का प्रतीक है हिंदी,
उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम हर दिशा की गूंज लिए है हिंदी।

अंग्रेज़ी के इस दिखावटी दौर में पेट भरती भी नही और भूखा मारती भी नही हिंदी।

कभी अटल तो कभी मोदी का भाषण है हिंदी,
जो बिकता है उसका अहम जरिया है हिंदी।

सा रे गा मा पा में छुपा हुआ संगीत है हिंदी।

तुतली जबानों से पहला शब्द है हिंदी,
कल के भारत का भविष्य है हिंदी।

चलती नही दौड़ती है अब हिंदी, विदेशी से स्वदेशी अपनाओ

हिन्दी भाषा अब केवल चल नहीं दौड़ रही है।
कम्प्यूटर युग में टाइप करने में सरलता और बिना बिन्दी की वर्तनी से आधुनिक हिन्दी रोज़ के काम काज में दौड़ रही है।

संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया। इसी की स्मृति में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।

आधुनिक हिंदी पर महावीर प्रसाद द्विवेदी का बड़ा प्रभाव है। 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादक के रूप में वह अपने समय (1903-1920) पूरे हिंदी साहित्य पर छाए रहे।
उनकी वज़ह से ब्रज भाषा हिंदी कविता से हटती गई और खड़ी बोली ने उसका स्थान लिया। हिंदी भाषा को स्थिर, परिष्कृत एवं व्याकरण सम्मत बनाने के लिए उन्होंने बहुत परिश्रम किया। संस्कृत के तत्सम शब्द उस समय से भाषा से हटते चले गए और उनकी जगह उर्दू, फ़ारसी का प्रयोग शुरू हुआ।
आजकल भी लेख की शुरुआत परिचय कराते हुए की जाती है, इस परिचयात्मक शैली का प्रयोग उन्होंने ही शुरू किया था।

विश्व में कितनी लोकप्रिय है हिंदी

मॉरिशस में हिंदी खासी लोकप्रिय है, जापान में हिंदी की पढ़ाई वर्षों पहले शुरू कर दी गई थी।
पिछले साल अमरीका में भारत के शीर्ष राजनयिक अमित कुमार ने कहा था कि अमरीका में नौ लाख से अधिक लोग हिंदी बोलते हैं।
वर्ल्ड डाटा डॉट इंफो के अनुसार विश्वभर में 566.5 मिलियन लोग हिंदी भाषी हैं।
फिजी में 3,92,000 लोग हिंदी बोलते हैं तो न्यूज़ीलैंड में 81,000

समृद्ध होती हिंदी लेकिन व्याकरण है प्रधान भाषा में जरूरी

कोरोना काल में बहुत से नए शब्द हिंदी में शामिल हुए और आमजन के बीच लोकप्रिय भी होते गए।
मीडिया के द्वारा बार-बार प्रयोग किए जाने की वजह से सोशल डिस्टेंस, वेबिनार, इम्युनिटी पॉवर, वायरस, वॉरियर्स, पॉजिटिव, क्वारंटीन, आइसोलेशन जैसे शब्द हिंदी में ही लिखे जाने लगे।
जैसे भारत में विश्व की अलग-अलग संस्कृति से आने के बाद भी लोग भारतीय बन गए वैसे ही हिंदी में भी दूसरी भाषाओं के शब्द शामिल होने के बाद हिंदी के ही हो गए।

संविधान में भी हिंदी की समृद्धि के लिए कुछ ऐसा ही कहा गया है।
अनुच्छेद 351 के अनुसार संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे, जिससे वह भारत के की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द भण्डार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

गहन है यह अन्धकारा के लेखक डॉ अमित श्रीवास्तव कहते हैं कि व्याकरण प्रधान भाषा में होना चाहिए, स्कूल्स की जगह स्कूलों कहने का अंतर समझ हिंदी का अधिक प्रसार किया जा सकता है
हिंदी पर लिखी उनकी एक कविता की कुछ पंक्तियां भी हिंदी के लिए कुछ ऐसा ही कहती हैं
संगीत वाद्य हिंदी
सबकी आराध्य हिंदी
बस पूर्ण हो कि इतनी
साधन और साध्य हिंदी

1965 वाली बिंदी नही रही अब हिंदी

1965 में अंग्रेज़ी के पर कटने थे और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनना था पर दक्षिणी राज्यों के विरोध के कारण हिंदी को मात्र राजभाषा तक सीमित रहते हुए अंग्रेज़ी के साथ अपनी कुर्सी बांटनी पड़ी थी।
पर अब स्थिति वह नही है हिंदी पूरे देशभर में अंग्रेज़ी की तरह ही रोज़गार देने वाली भाषा के रूप में सामने आई है।
यह अंतर वर्ष 1990 के बाद से मीडिया में हिंदी बाज़ार के आधिपत्य को वज़ह से सम्भव हुआ।

हिंदी की लोकप्रियता और इसमें रोज़गार के अवसरों का अंदाज़ा हम टेलीविजन, इंटरनेट और शिक्षा में हिंदी की अधिपत्य को देखकर लगा सकते हैं।

1959 में दूरदर्शन के रूप में हिंदी का पहला टेलीविजन चैनल आया तो 1999 में पहला हिंदी वेब पोर्टल 'वेबदुनिया'।
आज हिंदी मनोरंजन, चलचित्र, संगीत, समाचार, खेल स्वास्थ्य, धर्म से जुड़े चैनलों की संख्या 100 से अधिक है तो हजारों हिंदी वेब पोर्टल भी इंटरनेट की दुनिया में अपना अधिकार जमाए हुए हैं।

स्टेटिस्ता डॉट कॉम के अनुसार भारत में फरवरी 2021 के दौरान ट्वीटर का इस्तेमाल करने वाले यूजरों की संख्या 17.5 मिलियन, इंस्टाग्राम यूजरों की संख्या 210 मिलियन, फेसबुक के 410 मिलियन और वाट्सएप यूजरों की संख्या 530 मिलियन है।
मोबाइल में आसानी से हिंदी टाइप करने की सुविधा ने हर उम्र के लोगों तक इनकी पहुंच बना दी है। कोरोना काल में लॉकडाउन की वजह से इन सोशल मीडिया प्लेटफार्मों का उपयोग ज्यादा बढ़ गया और हिंदी के अधिक प्रचार-प्रसार में मदद मिली। आजकल लोग हिंदी में पोस्ट लिखने पर गर्व महसूस करते हैं।
ओटीटी प्लेटफार्मों को भी सिनेमा हॉल बंद रहने की वजह से फायदा हुआ और हिंदी कंटेंट बनाने, देखने वालों की भरमार हो गई।
निर्विवाद रूप से हिंदी और उसके बाज़ार को इससे फायदा हुआ।

शॉपिंग वेबसाइट अमेज़न ने वर्ष 2018 में अपनी वेबसाइट में हिंदी की सुविधा दी तो फ्लिपकार्ट ने वर्ष 2019 में यह कहते हुए हिंदी सेवा शुरू करी कि इससे उनके साथ 20 करोड़ अतिरिक्त ग्राहक जुड़ेंगे।

रोज़गार के अवसर तो हर साल बढ़ ही रहे हैं 

वर्ष 2018 और 2019 में असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए पात्र बनने वाली नेट परीक्षा में हिंदी विषय के अभ्यर्थियों की संख्या से हम हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता का पता कर सकते हैं।
दिसम्बर 2018 की नेट परीक्षा में समान्य श्रेणी से कॉमर्स में उत्तीर्ण 2991 छात्रों के बाद सबसे ज्यादा 1513 छात्र हिंदी के ही थे , 2019 परीक्षा में यह आंकड़ा बढ़ते हुए कॉमर्स- 3770 तो हिंदी में 1972 पहुंच गया था।
जानने वाली बात यह भी है कि इसमें पत्रकारिता के हिन्दीभाषी अभ्यर्थियों के आंकड़े शामिल नही हैं।


अब पहले जैसा कुछ नही रहा

'मुझे चांद चाहिए' को लेकर पहचाने जाने वाले लेखक सुरेंद्र वर्मा ने एक शोधार्थी से खुद पर शोध किए जाने के बदले 25 हज़ार रुपए मांगे, शोधार्थी ने यह सोचकर कि पैसे मांगने पर लोग लेखक के खिलाफ खड़े हो जाएंगे उनकी पैसे मांगते वीडियो वायरल कर दी। लेकिन हुआ इसके विपरीत सारे लेखक सुरेंद्र वर्मा के पक्ष में आ गए और सबको यह बता दिया कि समय अब पहले सा नही रहा, हिंदी लिखने-पढ़ने वालों की अब मांग है और उसके लिए पैसे भी देने पड़ेंगे।

नई शिक्षा नीति और सेलेब्रिटी कर सकते हैं हिंदी की मदद

नई शिक्षा नीति से भी हिंदी को फायदा मिलेगा। स्कूली शिक्षा में त्रिभाषा फॉर्मूला चलेगा, पांचवीं कक्षा तक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा पढ़ाई का माध्यम बनेगी।
अब छात्रों को हिंदी में गिनती पूछने पर सर नही खुजाना पड़ेगा।

भारत में जनता खिलाड़ियों और अभिनेताओं को अपना आदर्श मानते हैं। क्या उत्तर क्या दक्षिण बालों का स्टाइल हो या खेल, उनके आदर्श जो करते हैं वह ट्रेंड बन जाता है।
यह आर्दश हिंदी को बढ़ावा देंगे तो निश्चित ही इसमें और अधिक अवसर बढ़ेंगे।
ओलंपिक विजेता नीरज चोपड़ा के चर्चे आजकल देशभर में हैं, ख़ासकर युवाओं के बीच वह ज्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं। उनका हिंदी के प्रति प्रेम युवाओं को हिंदी के प्रति आकर्षित करने में मदद करेगा। अपने एक पुराने साक्षात्कार में उन्होंने जतिन सपरु से हिंदी में सवाल पूछने के लिए कहा था तो एकमरा स्पोर्ट्स लिटरेरी फेस्टिवल में भी वह एक पत्रकार से हिंदी में सवाल पूछने के लिए कहते दिखे।

अमिताभ बच्चन हो या वीरेंद्र सहवाग दोनों अपने ट्वीट अधिकतर हिंदी भाषा में ही करते दिखते हैं, अमिताभ बच्चन का तो ट्विटर बायो भी हिंदी में ही है।

"तुमने हमें पूज पूज कर पत्थर कर डाला ; वे जो हमपर जुमले कसते हैं हमें ज़िंदा तो समझते हैं "~ हरिवंश राय बच्चन

हिंदुस्तान, हिंदी भाषा और हिंदी का बाजार एक दूसरे से जुड़े हैं, जो भविष्य में बढ़ते ही जाएंगे।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

Saturday, September 11, 2021

पुस्तक समीक्षा : 'चले साथ पहाड़' , इसे राजकीय किताब घोषित कर दिल्ली दरबारियों के हाथ में पकड़ा कहिए 'असली पहाड़ देखना है तो चले साथ पहाड़'!

लेखक ने अपनी किताब की 'भूमिका' लिखने के लिए वरिष्ठ लेखक देवेंद्र मेवाड़ी को चुना है। देवेंद्र भूमिका में ही यह पूरी तरह स्पष्ट करने में सफल रहे हैं कि किताब हमें पहाड़ की सुंदरता के साथ-साथ पहाड़ की समस्याओं से भी परिचित कराएगी।

जैसे भूमिका में उन्होंने पहाड़ निवासी दिनेश दानू की यह बात लिखी है "आप लोग पहाड़ों को देखते हैं और हम इनमें रहते हैं। मूलभूत सुविधाओं से अनछुए ये पहाड़ आपको दिखने में सुंदर लगेंगे ही पर जब आपको इनमें ही रहना हो तब आपका यह विचार, विचार ही रह सकता है।

'अपनी बात' में लेखक व्यक्ति के जीवन में यात्राओं के महत्व पर प्रकाश डालते हैं।

 यह किताब लेखक द्वारा उत्तराखंड में करी दस यात्राओं का संकलन है। 

लेखक के शब्दों में किताब का उद्देश्य उत्तराखंड की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक तस्वीर को सामने लाना है।

                       अरुण कुकसाल

लेखक ने किताब की शुरुआत शिव की परण्यस्थली-मध्यमहेश्वर यात्रा से की है, इसे पढ़ते पाठकों को लगता है कि वह भी लेखक के साथ पहाड़ यात्रा पर हैं। 

लेखक ने यात्रा के दौरान उनके सम्पर्क में रहे लोगों की बातों को ठीक वैसे ही लिख डाला है जैसे उन लोगों ने बोला है, जैसे लेखक को जगत नाम के खच्चर वाले ने हाथ पकड़ कर बोला "वन टू थ्री, तुम भी फ्री हम भी फ्री इसलिए बैठो'।
किताब पढ़ते आपको ब्लैक एंड वाइट तस्वीरों को देखने के साथ (जो रंगीन भी लग सकती थी) बहुत से साहित्यों के बारे में भी जानकारी मिलती रहेगी जो लेखक को किसी जगह को देख याद आते रहते हैं, कभी वह राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं को याद करते हैं तो कभी चंद्रकुंवर बर्त्वाल की कविताओं को।

बारिश की 'दणमण' जैसे पहाड़ी शब्दों का प्रयोग भी किया गया पर इनका मतलब समझने में आपको कोई परेशानी नही होगी और आप इन्हें प्रकृति की तरह ही आत्मसात कर लेंगे।

'प्रकृति ने जितनी सुंदर जगह यहां दी है उतना ही कुरूप व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदार यहां का शासन-प्रशासन है' जैसी पंक्तियां सरकारी व्यवस्थाओं पर चोट मारती है।
किताब पढ़ते यह भी महसूस होता है कि अगर उत्तराखंड यात्रा के दौरान आप यह किताब अपने साथ रखें तो आपको रास्ता पूछने के लिए भी शायद किसी की जरूरत पड़े।
कुत्ते और मुर्गे की बातचीत जबरदस्ती ठूसी हुई लगती है। 

गुजरात मॉडल सफल रहा हो या नही पर कैन्यूर गांव का मॉडल उत्तराखंड के अन्य पहाड़ी गांवों के लिए आदर्श मॉडल बन सकता है।
शराब के खिलाफ नारों के साथ ही उसकी व्यवस्था करने वाला वाक्या हमें खुद पर लज्जाने का मौका तो देता ही है।
 लेखक का रानीखेत में गोदाम बन चुके अपने कॉलेज के बारे में बात करना यह याद दिलाता है कि हमने अपने पुरातत्व भवनों का कितना ध्यान रखा है।

लेखक ने किताब में उत्तराखंड के इतिहास से भी पर्दा उठाया है जैसे तिलाड़ीसेरा कांड शायद जलियांवाला बाग कांड से भी बड़ा था पर अपने ही लोगों के द्वारा किए जाने की वज़ह से इतिहास के इस काले अध्याय के बारे में ज्यादा बात नही की जाती।

किताब को आगे पढ़ते हम पौंटी गांव के बारे में जानते हैं जहां के लोग सड़क, बिजली, जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के अभाव में भी अपने में मग्न हैं पर ऐसे गांवों में इलाज के अभाव में दम तोड़ते लोगों की कहानी और स्कूलों की दुर्दशा मन विचलित करती हैं।
हिमाचल और उत्तराखंड में 'विकास' का इतना अंतर क्यों है इसकी वजह भी किताब समझाती है।

लेखक और उनके साथियों का पुंग से मोलिखर्क तक अंधेरे में जानवरों की गुर्राहट के बीच का सफर पढ़ते ऐसा लगता है जैसे कोई डरावनी कहानी चल रही हो।

ऊनी वस्त्रों का कारोबार बहुत से गांवों में अच्छा चलता था जो रेडीमेड आने के बाद समाप्त हो गया है, पहाड़ी गांवों की यह दुर्दशा समझ आप सोच सकते हैं कि महात्मा गांधी ने स्वदेशी अपनाने पर ज़ोर क्यों दिया था पर अब इस बारे में सोचे कौन!!

कुछ जगह लेखक ने पहाड़ की सुंदरता का सजीव प्रसारण किया है तो प्रकाश राम के ब्रिगेडियर बनने की कहानी आपको किताब पढ़ते मुस्कुराने का मौका भी देती है।

लेखक ने यात्राओं को उनके समयानुसार क्रम से नही लगाया है पर फिर भी आपको यह अखरेगा नही।

सुंदरढुंगा इलाके में पर्यटकों ने प्रकृति को जो नुकसान पहुंचाया उसे पढ़ना जरूरी है।
देवाधिदेव केदारनाथ की 2019 में की गई यात्रा के दौरान लेखक 2013 आपदा के प्रभावों को पाठकों तक पहुंचाते हैं।

कांवड़ियों में शामिल कुछ लोगों की नशा करने की आदत पर लेखक ने व्यंग्य किए हैं तो स्कूल न पढ़ने वाले 'दिल बहादुर' से लेखक का नज़रे न मिला पाना तंत्र की नाकामी के बीच हमारी भी कुछ न कर सकने की मजबूरी पर हमें धिक्कारता है।

कोसी से रानीखेत की जमीन पूंजीपतियों के हाथों में आने की बात प्रदेश में भुकानून की आवश्यकता याद दिलाती है।
3 अक्टूबर 2020 को लिखा 'तुंगनाथ के उतुंग शिखर पर' वृतांत किताब का आखिरी हिस्सा है, लगातार दस घण्टे किताब पढ़ते रहने के बाद भी मैंने इसे पढ़ते उबाऊ महसूस नही किया।
मन करता है लेखक से मिल कर कहूं कि ऐसे ही उत्तराखंड के बचे हुए कोनों में पहुंच वहां की खूबसूरती और समस्याओं से हमें परिचित कराते जाओ।

किताब पढ़ने के बाद आप लेखक का उत्तराखंड की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक तस्वीर को सामने लाने का जो उद्देश्य है उसे पूरा समझेंगें और यह भी चाहेंगे कि इसे उत्तराखंड की राजकीय किताब घोषित कर दिल्ली में बैठे उत्तराखंड की सत्ता चला रहे केंद्र के दरबारियों के हाथों में पकड़ा देना चाहिए और कहना चाहिए कि असली पहाड़ देखना है तो 'चले साथ पहाड़'!

पुस्तक - चले साथ पहाड़
लेखक - अरुण कुकसाल
मूल्य - 240
प्रकाशक - सम्भावना प्रकाशन
लिंक

पुस्तक समीक्षक- हिमांशु जोशी

                         हिमांशु जोशी

Wednesday, September 8, 2021

विश्व साक्षरता दिवस

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र अल्मोड़ा से साठ किलोमीटर दूर स्थित झालडूंगरा गांव के नवल कुमार राजकीय माध्यमिक विद्यालय झालडूंगरा में कक्षा नौ के छात्र हैं।
पहले लॉकडाउन में तो नवल के परिवार में कोई स्मार्टफोन नही था, पर इस बार जैसे-तैसे पैसे जुटा उसकी पढ़ाई के लिए एक स्मार्टफोन खरीदा गया है। फोन में जियो सिम है और उस पर रिचार्ज नैनीताल से चाचा द्वारा या गांव में पिता द्वारा मज़दूरी के पैसों से कराया जाता है।




Friday, September 3, 2021

ऑल वेदर रोड पर एक दिन।

अपने जिले में मैंने जो पहले कभी नही देखा था वो आज देख लिया, आज की युवा पीढ़ी को भी बेरोज़गारी के इस दौर में अपने स्मार्टफोन से सोशल मीडिया अकाउंटों पर राजनीतिक पोस्ट चिपकाने से पहले एक न एक बार अपना जिला जरूर घूमना चाहिए।
पहाड़ से मैदान उतरते ऑल वेदर रोड की वजह से मुझे चंपावत जिले के अंदर एक दिन में ही विकास के दो पहलू सड़क और शिक्षा के सूरतेहाल देखने को मिले।

पर्यावरण से खेलती एक महत्वकांक्षा

वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए सारे नियम कायदों को ताक पर रख ऑल वेदर रोड पर कार्य शुरू हुआ, इसमें 150 किमी टनकपुर-पिथौरागढ़ नेशनल हाइवे भी शामिल था।

पहाड़ों न दरके इसके लिए पत्थर लगा पहाड़ों पर बाउंड्री की गई, जाल बांध फ़िर सरिया लगा भी पहाड़ों को रोकने की 'रॉक ट्रीटमेंट' स्कीम चली।
सड़क की चौड़ाई दस मीटर से अधिक ही रखी गई थी।

इस सड़क से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान को देखते सुप्रीम कोर्ट ने एक हाई पॉवर कमेटी गठित की, जिसके अध्यक्ष रवि चोपड़ा ने अपनी रिपोर्ट में सड़क की चौड़ाई 12 मीटर रखना ठीक नही बताया था और इसको सिर्फ 5.5 मीटर तक ही रखने की सिफारिश की थी पर महत्वाकांक्षी सत्ता के आगे सब फीके थे और सड़क इस बार रिकॉर्ड 7 दिनों से अधिक बंद पड़ी है।
टनकपुर से चंपावत की दूरी मात्र सत्तर किलोमीटर है पर पर सड़क बंद होने की वजह से रीठासाहिब से होता यह सफ़र 140 किलोमीटर का बन गया है, जिसमें 20-30 किलोमीटर कच्ची सड़क है।


क्षेत्रीय समाचार पत्रों को मुख्यमंत्री के प्रस्तावित टनकपुर दौरे में अधिकारियों के सुगम मार्ग से समय पर पहुंचने की चिंता तो सता रही है लेकिन उन्हें मुसीबत में पड़े आम जन की कोई फिक्र नही है।

पानी पोस्ट पर हिमालय के ऊपर एक रिपोर्ट देखने को मिली जिससे हिमालय पर निमार्ण कार्य से होने वाले नुकसान की गम्भीरता को समझा जा सकता है।

हिमालय के दो ढाल हैं: उत्तरी और दक्षिणी। दक्षिणी में भारत, नेपाल, भूटान हैं। उत्तराखण्ड को सामने रख हम दक्षिणी हिमालय को समझ सकते हैं। उत्तराखण्ड की पर्वत श्रृंखलाओं के तीन स्तर हैं- शिवालिक, उसके ऊपर लघु हिमाल और उसके ऊपर ग्रेट हिमालय। इन तीन स्तरों मे सबसे अधिक संवेदनशील ग्रेट हिमालय और मध्य हिमालय की मिलान पट्टी हैं।

इस संवेदनशीलता की वजह इस मिलान पट्टी में मौजूद गहरी दरारें हैं। 

बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामबाड़ा, गौरीकुण्ड, गुप्तकाशी, पिंडारी नदी मार्ग, गौरी गंगा और काली नदी – ये सभी इलाके दरारयुक्त हैं। 

यहां भूस्खलन का होते रहना स्वाभाविक घटना है। किंतु इसकी परवाह किए बगैर किए निर्माण को स्वाभाविक कहना नासमझी कहलायेगी। अतः यह बात समझ लेनी जरूरी है कि मलवे या सड़कों में यदि पानी रिसेगा, तो विभीषिका सुनिश्चित है।

हिमालय में निर्माण की शर्तें

दरारों से दूर रहना, हिमालयी निर्माण की पहली शर्त है। जल निकासी मार्गों की सही व्यवस्था को दूसरी शर्त मानना चाहिए। हमें चाहिए कि मिट्टी-पत्थर की संरचना कोे समझकर निर्माण स्थल का चयन करें, जल निकासी के मार्ग में निर्माण न करें। नदियों को रोकें नही, बहने दें।

 जापान और ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसी दरारें हैं लेकिन सड़क मार्ग का चयन और निर्माण की उनकी तकनीक ऐसी है कि सड़कों के भीतर पानी रिसने की गुंजाइश नगण्य है इसलिए सड़कें बारिश में भी स्थिर रहती हैं।

देखा है कभी? अब भी कंधों में बैठ नदी पार कर स्कूल जाता है देश का भविष्य

चंपावत से रीठासाहिब तक सड़क ठीक है। रीठासाहिब के बारे में बात की जाए तो लोदिया और रतिया नदियों के संगम पर स्थित यह गुरुद्वारा सिखों का लोकप्रिय तीर्थस्थल है जहां वर्षभर में लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 

गुरुद्वारे के आसपास चौड़ा मेहता गांव के निवासियों द्वारा बताया गया कि इतने लोकप्रिय तीर्थस्थल के क्षेत्र में होने के बावजूद भी सरकार क्षेत्र को विकसित करने में असफल रही है, बहुत से गांवों के बच्चों की पढ़ाई के लिए एकमात्र विद्यालय राजकीय इंटर कॉलेज चौड़ा मेहता है।

आसपास के गांव बिनवाल, गागर, चमोला, कैड़ागांव, परेवा के बच्चे कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं और इनमें से कुछ गांव के बच्चों को तो नदी पार कर स्कूल पहुंचना पड़ता है।


रीठासाहिब के बाद लगभग 20-25 किलोमीटर कच्ची सड़क पूरी तरह से पत्थरीली है। पक्की सड़क शुरू होने से चार-पांच किलोमीटर पहले सड़क किनारे मुझे मथियाबाज गांव के कुछ लड़के सड़क किनारे घूमते मिले, उनसे बातचीत करने पर यह पता चला कि उन्हें ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा पढ़ने के लिए 9-10 किलोमीटर दूर राजकीय इण्टर कॉलेज सुखीढांग पैदल ही जाना पड़ता है।

पहाड़ के इस कष्टकारी रास्ते से नीचे उतरते ही चंपावत जिले के मैदानी क्षेत्र टनकपुर में मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए लगे बड़े-बड़े बैनर पहाड़ों में सरकार की नाकामी को ऐसे छुपा रहे थे मानो जैसे सब ठीक है और क्षेत्र की जनता बहुत ही खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही है।
राजनीतिक दलों ने यही किया है जनता के पैसे अपनी पार्टी के प्रचार-प्रसार में ही ख़र्च किए हैं और जनता को अपने हाल पर छोड़ दिया है।
पर फ़र्क किसे पड़ता है शायद हम भारतीयों के लिए अब यही लोकतंत्र है, काम न करने वाले नेता हमारे भगवान हैं और उन्हें वोट देकर हम उन्हें भेंट चढ़ाते रहते हैं।

ग्राम स्वराज्य पढ़ें, समझें और अपनाएं

ऑल वेदर रोड या ऐसी अनेक योजनाएं वह हैं जिनके चलने से भारत के अधिकतर गांव वासियों को आजतक सिर्फ़ वही भावनाएं महसूस होती आयी हैं जो ज़मीन पर खड़े ग्रामीण को आसमान में ऊंची उड़ान भरते हेलीकॉप्टर को देख या फ़टे कपड़ों में सड़क पर फॉर्च्यूनर से हाथ हिलाते नेताजी को देख कर होती है पर मिला कुछ भी नही है।

जरूरत इस बात की है कि महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज्य विचार को अपनाया जाए जहां छात्रों को अपने गांव में ही शिक्षा मिले, युवाओं को अपने गांव में ही रोज़गार के अवसर प्राप्त हों और गांव की सुरक्षा भी गांववालों के हाथों में ही हो।
ग्राम स्वराज्य में महात्मा गांधी ने केंद्र या राज्य किसी भी सरकार के साथ गांववालों के सम्बंध पर विचार नही किया था क्योंकि शायद वह जानते थे कि इनका कार्य सिर्फ़ गांव निवासियों को लूटना या इन्हें अपने वोट बैंक के तौर पर देखने तक ही सीमित होगा ।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

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