Sunday, September 19, 2021

हर चौक पर युवा नेता बन बैठ गया है

वो चल पड़े थे वर्दी पहन सीमा पर,
लेकिन गोली अंदर ही अपनो से लगने लगी थी।

लाखों के सपनों में रोज़ आती, डीटीसी से मेट्रो बनी मेरी दिल्ली दंगों की आग में जलने लगी थी।

हुआ एक फ़रमान नोटबन्दी का, 
सबकी दौड़ अब बैंकों की ओर लगने लगी थी।

एक दिन उसने  टीवी पर बोला तो सबसे थमने के लिए 
पर कई अंतहीन यात्रा अब शुरू हो चुकी थी।

चल रही थी सरकारी रेल बड़ी तेज़ी से पर चलते-चलते बात उसके बिकने की होने लगी।

चायवाले का सपना जो पूरा हुआ, आज हर कोई कुछ बेचने वाला बन गया है।
रोज़गार न पा हर चौक पर युवा नेता बन बैठ गया है।

ज़ोर होता विकास का पर अब धर्म, जाति, मर्द, औरत में मामला उलझ गया है।

देश को अन्न देने वाला किसान लाठी खा-खा कर अब सड़कों पर बैठ गया है।

ऐ देशवासियों अब तो इस राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता का चश्मा तोड़, इन नंगी आंखों से देश नंगा होते देखो।

चिलम भरते नशे में डूबा युवाओं जागो और फिर से इस महान लोकतंत्र का तिरंगा ऊंचा करते सबसे आगे भागो।

हिमांशु

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