Monday, September 29, 2025

स्वास्थ्य पखवाड़ा और मरीजों की जमीनी हकीकत

स्वास्थ्य पखवाड़ा और मरीजों की जमीनी हकीकत

स्वास्थ्य पखवाड़ा हर साल बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. अस्पतालों और समाज में शिविर लगते हैं, लोग रक्तदान करते हैं और सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें साझा होती हैं. लेकिन इस धूमधाम के पीछे की हकीकत अक्सर है, प्लेटलेट्स की कमी और व्यवस्थागत कमियां मरीजों और उनके परिजनों की रातों की नींद उड़ा रही हैं. 

पखवाड़े का उत्सव और मरीजों की चुनौतियां

इन दिनों देश के कई हिस्सों में स्वास्थ्य पखवाड़ा बड़े पैमाने पर मनाया जा रहा है. देशभर में कई जगह रक्तदान शिविर लग रहे हैं, लेकिन इस उत्सव के बीच मरीजों की मुश्किलें कम नही हुई हैं. डेंगू, मलेरिया और कैंसर जैसे रोगों से जूझ रहे लोगों को प्लेटलेट्स की कमी का सामना करना पड़ रहा है. अस्पतालों में भर्ती मरीज और उनके परिजन ब्लड बैंकों के चक्कर काटते हुए परेशान हैं.

देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज में भर्ती 45 वर्षीय कैंसर पीड़ित राधा (बदला हुआ नाम) के परिजनों को कल आधी रात में मरीज के लिए प्लेटलेट्स जुटाने के लिए 120 किलोमीटर दूर हरिद्वार जाना पड़ा. अस्पताल ने 'अर्जेंट' लिखे आवेदन फॉर्म के बावजूद सिर्फ उसी ब्लड ग्रुप की प्लेटलेट्स लेने की शर्त रखी. यह घटना स्पष्ट करती है कि पखवाड़े का उत्सव असली समस्या को ढक नहीं सकता.

प्लेटलेट्स की कमी के असली कारण

प्लेटलेट्स का जीवनकाल केवल 5-7 दिन होता है, इसलिए उनकी आपूर्ति हमेशा चुनौतीपूर्ण रहती है. समस्या तब और बढ़ जाती है, जब प्रशासनिक नियम और लचर व्यवस्था इस कमी को और गहरा देते हैं.

जबकि 2025 की AABB (American Association of Blood Banks) और ICTMG (International Collaboration for Transfusion Medicine Guidelines) गाइडलाइंस कहती हैं कि आपात स्थिति में मिलती-जुलती प्लेटलेट्स का उपयोग सुरक्षित और प्रभावी हो सकता है. इसके बावजूद मरीज के परिजनों को अनावश्यक दौड़भाग करनी पड़ती है. AABB और ICTMG दोनों ने मिलकर यह दिशानिर्देश तैयार किए हैं ताकि प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन में एकरूपता, सुरक्षा और मरीज की वास्तविक जरूरत के आधार पर निर्णय सुनिश्चित किया जा सके. 

यह स्थिति सिर्फ देहरादून में नहीं है, छोटे शहरों और कस्बों में स्थिति और भी गंभीर है. ब्लड बैंकों में स्टॉक की कमी, डिजिटल नेटवर्क का अभाव और जागरूकता की कमी इस समस्या को और जटिल बनाती हैं.

देहरादून के मोहित सेठी का अनुभव

ऐसे संकट के समय मोहित सेठी जैसे वॉलंटियर्स उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं. कोविड काल में उन्होंने रक्त और प्लेटलेट्स की व्यवस्था कर सैकड़ों लोगों की जान बचाई. देहरादून के अंदर उनका नेटवर्क इतना मजबूत है कि एक फोन कॉल पर डोनर तैयार हो जाते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या एक व्यक्ति या कुछ वॉलंटियर्स पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी छोड़ना उचित है. सिस्टम की खामियों का बोझ इन निस्वार्थ वॉलंटियर्स पर पड़ रहा है.

मोहित कहते हैं लोग रक्तदान से कतराते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर इन्हीं वॉलंटियर्स से तुरंत मदद की उम्मीद करते हैं. कई बार इन निस्वार्थ रक्तदाताओं को स्वार्थी कहकर तंज किया जाता है और उनके सामने रुपयों का प्रस्ताव रखा जाता है.

मोहित सेठी का सुझाव है कि प्लेटलेट्स संकट को कम करने के लिए भारत में गाइडलाइंस पारदर्शी हों और आपात स्थिति में मिलती-जुलती प्लेटलेट्स का इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाए. उन्होंने इस विषय पर स्वास्थ्य अधिकारियों और उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर धन सिंह रावत के साथ पत्राचार भी किया है.

उन्होंने आगे कहा कि डिजिटल ब्लड बैंक नेटवर्क से सभी ब्लड बैंकों को जोड़ा जाए ताकि स्टॉक की वास्तविक जानकारी तुरंत उपलब्ध हो. रक्तदान को केवल पखवाड़े तक सीमित न रखकर सालभर की आदत बनानी होगी और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी, ताकि मरीजों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े.

Monday, September 22, 2025

महासीर के मुलुक से : किताब के जरिए पहाड़ और नदी की गवाही

*महासीर के मुलुक से : किताब के जरिए पहाड़ और नदी की गवाही*

अपनी किताब 'पलायन से पहले' के लिए मशहूर कवि और लेखक अनिल कार्की की किताब 'महासीर के मुलुक से' देहरादून के 'समय साक्ष्य' प्रकाशन से प्रकाशित हुई है. धर्मेन्द्र सिंह का तैयार किया हुआ आवरण चित्र शानदार है और किताब पढ़ने के लिए पाठक की जिज्ञासा पैदा करने में कामयाब रहा है. यह किताब जीवन अनुभवों, सामाजिक सरोकारों और पर्यावरणीय संकटों को सामने लाती है. जिसमें पहाड़, नदियां, कलाकार और शिक्षा व्यवस्था तक की तस्वीर दर्ज है.

*पहाड़ की बोली और मोतीराम का दर्द*

 किताब में उत्तराखंड से जुड़े कई रोचक किस्से हैं, जिन्हें लेखक ने संदर्भ सहित प्रस्तुत किया है. पहाड़ के रहन-सहन का विवरण भी सहजता से शामिल है 'पहाड़ों में गैर अभिजातीय परिवारों में मेहमान के आने पर मांस बनाना मेहमान का सम्मान माना जाता है.' मोतीराम की कहानी के जरिए लेखक ने पहाड़ के कलाकारों को हाशिए पर रखे जाने की सच्चाई प्रस्तुत की है. उनका 'छलिया' (लोक नृत्य) को सांस्कृतिक मजदूरी कहना इसका उदाहरण है: 'मोतीराम गाँव-गाँव भटका और कहीं किसी ठौर-ठिकाना नहीं दिया.'

*स्कूलों की हकीकत और अंधविश्वास*

किताब में पहाड़ के स्कूलों की दयनीय स्थिति और सामाजिक चिंतन भी स्पष्ट है 'सरकारी स्कूल में केवल दलित बच्चे पढ़ते हैं, ऐसा मुझे बड़ों ने बताया था. मैंने जब बच्चों से पूछा कि…' लेखक प्राइवेट स्कूल और उसके बगल के प्राइमरी स्कूल की तुलना भी करते हैं. सामाजिक मान्यताओं पर सवाल उठाते हुए लेखक लिखते हैं 'मुहल्ले में कुछ लोगों की प्रबल धारणा थी कि सुबह-सुबह काले बिल्ले को देखने से उनका दिन खराब जाता है.' इस तरह लेखक पहाड़ के अंधविश्वास और सामाजिक असमानताओं को उजागर करते हैं.

*भेड़-बकरी: हाशिए के जानवरों की कहानी*

भेड़ और कमजोर जानवरों को लेकर लेखक कई गम्भीर सवाल उठाते हैं, जो हिंदी साहित्य के लिए महत्वपूर्ण हैं 'मुख्य धारा का लेखन देखते हैं तो बकरी के बच्चों या भेड़ों के लिए हास्यास्पद और क्रूर रूपक मिलते हैं.' कहानी 'बड़े भैया' के माध्यम से पाठक जानवरों के प्रति संवेदनशील होते हैं और लेखक की किस्सागोई से प्रभावित भी होते हैं. लेखक ने पाठकों को सोचने पर मजबूर किया है कि हमारी संवेदनाएँ अक्सर इंसानों तक तो पहुँचती हैं, लेकिन कमजोर पशुओं के प्रति नहीं.

*महासीर और नदियों के नाम लिखे खत*

किताब के शीर्षक वाला किस्सा पर्यावरण से जुड़ा और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. संरक्षित 'महासीर' मछली के घटते जाने पर लेखक लिखते हैं 'डायनामाइट, ब्लीचिंग पाउडर, दीमकों को मारने वाले जहरीले रसायन, दो अंगुल से पतली नायलॉन की जाल, करेंट आदि तरीकों से हिमालय की सभी नदियाँ और उनके जीव त्रस्त हैं.' लेखक नदी को अपनी दादी मानते हैं और पत्र लिखते हैं 'प्रिय आमा,

पूर्वी राम गंगा!'

 इसमें नदियों के खत्म होने के लगभग सभी कारणों का उल्लेख है. लेखक ने इस पत्र के माध्यम से सिस्टम पर भी सवाल खड़े किए 'क्या डाइनामाइट से ठेकेदार मच्छी नही मारते या कि क्या रेता खनन से मछली के जीरे नही मरते?' इस तरह पाठक नदियों पर सोचने का नया नजरिया प्राप्त करते हैं.

*शिक्षक की छाया और पहाड़ के आंदोलन*

लेखक ने शिक्षक के छात्र के जीवन में प्रभाव पर भी लिखा 'जिनकी क्रूरता की छाया ताउम्र मेरा पीछा करते रही. बाद के वर्षों में कुछ बेहतरीन शिक्षक नही मिलते तो शायद मैं उसी अंधकार में खो जाता, जिस अंधकार में उनके अन्य शिष्य खो गए.' 

हाल ही में हुए उत्तराखंड के आंदोलन और नदियों पर मंडराते खतरे का विवरण भी प्रस्तुत है. लेखक ने इन घटनाओं को पर्यावरणीय संकट और सामाजिक असमानता से जोड़ा है, जिससे किताब समय की सच्ची गवाही बन जाती है.

*बेढब रास्तों का सफर और लेखक की जिद*

किताब पढ़ना एक आम हिंदी पाठक के लिए शुरू में थोड़ा मुश्किल हो सकता है, क्योंकि लेखक की जीवन संबंधी यथार्थवादी बातें समझने में समय लगेगा. जैसे लेखक लिखते हैं 'जीवन भी ऐसा ही बेढप रास्ता है. जिस रास्ते में खूब बातें करने वाले साथी होने ही चाहिए. अगर न हों तो यात्राएं और जीवन भी बड़ा नीरस हो जाता है.' 

इसी कड़ी में उनके निजी अनुभव कभी-कभी पाठकों को बोझिल भी लगने लगते हैं, जैसे 'मैं बहुत सारे रिश्तों और रास्तों में फिर कभी नही लौटा क्योंकि मैं उन्हें विदा कह चुका था.' वहीं एक तरफ लेखक के निजी अनुभव लेखकीय आजादी पर भी गहरा विमर्श रखते हैं 'इसलिए अपने स्टैण्ड से किसी हाल में समझौता करना मेरे लिए मुमकिन नही.' किताब में एक-दो जगह मात्राओं की त्रुटि भी दिखती हैं, जैसे पृष्ठ 88 में 'वजह' को 'वहज' लिख दिया गया है, जो अगले संस्करण में सुधारी जा सकती हैं.

पर्यावरण संरक्षण और उत्तराखंड की जानकारी बढ़ाने के इच्छुक लोग इसे अवश्य पढ़ सकते हैं.


Saturday, September 20, 2025

डी.एस.बी के गलियारों से: नैनीताल की स्मृतियों और संवेदनाओं की यात्रा

डी.एस.बी के गलियारों से: नैनीताल की स्मृतियों और संवेदनाओं की यात्रा

डी.एस.बी के गलियारों से किताब स्मिता कर्नाटक की स्मृतियों और नैनीताल की बदलती तस्वीर का संवेदनशील लेखा-जोखा है.

किताब का परिचय और नया अंदाज

डी.एस.बी के गलियारों से किताब स्मिता कर्नाटक की संवेदनशील लेखनी का नमूना है, जो नैनीताल की बदलती तस्वीर और व्यक्तिगत स्मृतियों को बखूबी समेटती है. देहरादून के 'समय साक्ष्य' प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब की शुरुआत में लेखक ने 'अतीत के गलियारों' को काव्यात्मक अंदाज में पिरोया है, जो कॉलेज और नैनीताल से जुड़ी उनकी यादों को जीवंत करता है. 'पसीना एक ही जैसा है, उसके भाव अलग हैं' जैसी पंक्तियां पाठकों को किताब से जोड़ने की अद्भुत क्षमता रखती हैं. लेखक की शैली में अशोक पाण्डे जैसे समकालीन लेखकों का नयापन झलकता है, जो हिंदी और अंग्रेजी के मिश्रण से पुराने किस्सों को नए अंदाज में प्रस्तुत करती है. किताब का कवर पेज भी आकर्षक है, जो चित्रों के माध्यम से कहानी को बोलता-सा प्रतीत होता है.

नैनीताल की स्मृतियां और बदलता स्वरूप

स्मिता कर्नाटक ने नैनीताल को एक सपने की तरह चित्रित किया है, जहां 'सफेद पन्ने पर काली स्याही से बना चित्र हकीकत बन गया' जैसी पंक्ति शहर के प्रति उनके गहरे लगाव को दर्शाती हैं. किताब में नैनीताल के इतिहास और वर्तमान का बारीकी से वर्णन है, जो बदलते वक्त को दर्शाता है. लेखक ने शेरवानी लॉज के होटल बनने और जहाँगीराबाद के बंगले के तोड़कर आरिफ कैसल बनने जैसे बदलावों को संवेदनशीलता से लिखा है. नैनीताल का टूरिस्ट प्लेस बनने से स्थानीय लोगों पर पड़े प्रभाव, जैसे फ्लैट्स का ऑंगन से पार्किंग में बदलना और रिक्शों की जगह ई-रिक्शा का आना, इनको लेखक ने दर्द के साथ उकेरा है. यह किताब कई बार नैनीताल की आत्मकथा-सी लगती है, जो शहर के पुराने वैभव के मटियामेट होने की कहानी कहती है.

स्मिता के लेखन की खासियत

किताब में मानवीय रिश्तों और संवेदनाओं का चित्रण दिल को छू लेता है. 'मेरे लिए वे हमेशा बालों में सफेदी लिए माँ थीं जो अपने बच्चों की जरूरत से ज्यादा चिंता करती थी' और 'जिंदगी के मुश्किल सवाल अब भी हल न हुए. जरा-जरा सी बात पर 'शाबाश' कहने वाले वो पिता जो नहीं रहे' जैसी पंक्तियाँ माता-पिता और बच्चों के रिश्तों को गहराई से उजागर करती हैं. स्मिता की लेखनी गद्य से पद्य में सहजता से प्रवाहित होती है, जो उनकी खासियत है. किताब के किस्से, जैसे 'वार्षिकोत्सव', नॉस्टेल्जिया जगाते हैं और पाठकों को अपनी स्मृतियों में ले जाते हैं. हर किस्से का शीर्षक प्रभावी है और कहानियां अपने आप में पूर्ण हैं.

सामाजिक चित्रण और लैंगिक भेदभाव

किताब एक युवा लड़की की नजर से समाज में लड़कियों के प्रति व्यवहार और भेदभाव को दर्शाती है. लेखक ने लड़कों की पीछा करती नजरों से डरती लड़की और अनजान व्यक्ति से शादी जैसे सामाजिक बंधनों को संवेदनशीलता से उकेरा है. 'भाई वहां कॉलेज में पढ़ रहा था और लड़का था तो माँ का वहां रहना जरूरी था, अकेला रहकर बेटा खाना कैसे बनाता?' जैसी पंक्तियां पुरुषप्रधान समाज पर सवाल उठाती हैं. इसके साथ ही, ट्रांज़िस्टर से पिक्चर हॉल तक की स्मृतियां और बच्चों में वयस्कता की उथल-पुथल को लेखक ने रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया है, जो पाठकों को कहानी से जोड़ता है.

भाषा, शैली और किताब की कमियां

स्मिता कर्नाटक की लेखन शैली में हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रण उन्हें पारंपरिक हिंदी लेखकों से अलग करता है, जो पाठकों को आकर्षित करता है. 'मुझे उम्मीद है कि उनके बीच प्रेम बचा रहा होगा और उन्हें येन केन प्रकारेण उसे अरेंज नहीं करना पड़ रहा होगा' जैसी पंक्ति इस शैली की मिसाल हैं. हालांकि, कुछ जगहों पर फिल्मी संवादों जैसी शैली और हिंदी-अंग्रेजी का अत्यधिक मिश्रण कुछ पाठकों को असहज कर सकता है. लेखक ने अपने कॉलेज मित्र अशोक पाण्डे के बारे में विस्तार से लिखा है, लेकिन ऋता वर्मा के बारे में अधूरी जानकारी खटकती है. यह किताब पहाड़ों, स्मृतियों और मानवीय रिश्तों से प्रेम करने वालों के लिए विशेष रूप से आकर्षक है. 

Wednesday, September 17, 2025

लज्जा पेपर need edit

**पितृसत्ता पर लज्जा: लज्जा फिल्म का सैद्धांतिक विश्लेषण**  


**सारांश**  
इस शोध का उद्देश्य पितृसत्तात्मक व्यवस्था की गहराई और इसके परंपरागत समाज पर प्रभाव का विश्लेषण करना है, जिसमें हिंदी फिल्म *लज्जा* के कुछ स्वरों को उजागर किया गया है। यह लेख *लज्जा* फिल्म पर चर्चा करता है, जो परंपरागत समाजों में महिलाओं के दुख, पीड़ा और उत्पीड़न को दर्शाती है, और इसे रेडिकल फेमिनिस्ट दृष्टिकोण से विश्लेषित करता है। यह अध्ययन पुरुषवादी व्यवस्था की दमनकारी प्रकृति और कुछ हानिकारक परंपराओं की आलोचना करता है, जो महिलाओं को अवांछित समझौतों और यौन संबंधों में बाध्य करती हैं। मैं तर्क देता हूँ कि कोई व्यक्ति जन्म से स्त्री नहीं हो सकता। फिल्म की नायिका जानकी (माधुरी), जो पुरुषवादी अहंकार और भौतिक शोषण की शिकार है, फिल्म के तीसरे थीम में रेडिकल फेमिनिज्म की हकदार है। यह सैद्धांतिक अध्ययन परंपरागत समाज में सदियों से चली आ रही पाखंडी, शर्मनाक और आपराधिक पितृसत्ता को उजागर करने का प्रयास करता है।  

**कीवर्ड्स:** हिंदी फिल्म लज्जा, पाखंडी परंपरा, पौराणिक कथाएँ, पितृसत्ता, रेडिकल फेमिनिज्म, रामायण  

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**परिचय**  
*लज्जा* एक हिंदी फिल्म है, जो भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों में पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष को दर्शाती है। यह फिल्म कुछ महिला मुद्दों को उजागर करती है, जो निष्पक्ष दृष्टिकोण से देखने पर सभी को झकझोर देते हैं। फिल्म में, विद्रोही चरित्र जानकी (माधुरी) बिना विवाह के गर्भवती हो जाती है और समाज की बदनामी और तिरस्कार का सामना करती है। परंपरागत समाज में पितृसत्ता महिलाओं को केवल यौन सुख और प्रजनन की मशीन के रूप में देखती है, जो परंपरा, संस्कृति, सामाजिक मानदंडों और मूल्यों के नाम पर उनका दमन करती है। जानकी प्रत्येक पुरुष से पितृसत्ता पर शर्मिंदगी महसूस करने की मांग करती है।  

पिछले शोधों में *लज्जा* फिल्म पर मुक्ति और मार्क्सवादी/समाजवादी फेमिनिज्म पर प्रकाश डाला गया है। हालांकि, मेरा ध्यान फिल्म के तीसरे थीम पर है, जो जानकी (माधुरी) से संबंधित है, क्योंकि मुझे कोई ऐसा शोध नहीं मिला, जिसने इसे रेडिकल फेमिनिस्ट दृष्टिकोण से विश्लेषित किया हो।  

**अध्ययन का उद्देश्य**  
इस अध्ययन का उद्देश्य *लज्जा* हिंदी फिल्म के तीसरे थीम, जो जानकी (माधुरी) से संबंधित है, का रेडिकल फेमिनिज्म के दृष्टिकोण से आलोचनात्मक विश्लेषण करना है और परंपरागत समाज में सदियों से चली आ रही पाखंडी और आपराधिक पितृसत्ता को उजागर करना है।  

**लज्जा और रेडिकल फेमिनिज्म का परिचय**  
*लज्जा* 2001 में रिलीज हुई एक हिंदी फीचर फिल्म है, जिसका निर्देशन राजकुमार संतोषी ने किया। यह बहु-कलाकार, बड़े बजट की फिल्म रामायण पर आधारित है और इसमें सीता के चरित्र के इर्द-गिर्द कहानी बुनी गई है। यह चार अलग-अलग महिलाओं (वैदेही, मैथिली, जानकी, और रामदुलारी) की कहानी बयान करती है, जिन्हें पाखंडी पुरुषों ने अपने स्वार्थ के लिए शोषित किया। ये चारों मुख्य पात्र सीता के विभिन्न रूप हैं और फिल्म में एक शक्तिशाली उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यह फिल्म भारत में कम सफल रही, क्योंकि नई दिल्ली के उच्च न्यायालय ने 8 फरवरी 2002 तक केबल ऑपरेटरों को इसे प्रदर्शित करने से रोक दिया था। यह मामला इसलिए दर्ज किया गया था, क्योंकि जानकी (माधुरी), जो सीता का किरदार निभाती है, ने रामायण की हिंदू पौराणिक कथाओं के खिलाफ विद्रोह किया (टाइम्स, 2001)। जानकी अपने बनाए अपरंपरागत नियमों से जीने की हिम्मत करती है।  

निर्देशक राजकुमार संतोषी ने सीता के प्रति हुए अन्याय के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया है। फिल्म में संतोषी (2001) ने पितृसत्तात्मक पुरुषों को शर्मसार किया है। फिल्म में चार थीम हैं, जो तीन फेमिनिस्ट दृष्टिकोणों—उदारवादी फेमिनिज्म, मार्क्सवादी/समाजवादी फेमिनिज्म, और रेडिकल फेमिनिज्म—के लिए उपयुक्त हैं। जानकी (माधुरी) का तीसरा थीम रामायण के मंच नाटक से सीधे जुड़ा है। यह थीम 42 मिनट की है, जो फिल्म के 1 घंटे 39 मिनट से 2 घंटे 21 मिनट तक चलती है।  

फेमिनिस्ट विचारधारा लिंग और जेंडर को अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में देखती है: लिंग को जैविक वास्तविकता और जेंडर को सामाजिक रूप से निर्मित रूप के रूप में। विटिग (1997) का दावा है कि शरीर के आधार पर महिलाओं के प्राकृतिक समूह की अवधारणा सामाजिक और यौन उत्पीड़न का परिणाम है। फेमिनिज्म को सामान्यतः विभिन्न आयामों में देखा जाता है: उदारवादी फेमिनिज्म (जो मौजूदा प्रणालियों, जैसे कानूनी सुधारों का उपयोग करके असमानता को संबोधित करता है), रेडिकल फेमिनिज्म (जो पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर को स्वीकार करता है और मानता है कि महिलाओं को स्वयं लैंगिक भेदभाव के खिलाफ लड़ना चाहिए), और मार्क्सवादी/समाजवादी फेमिनिज्म (जो मानता है कि महिलाओं का शोषण पूंजीवाद और पुरुषों दोनों द्वारा होता है)।  

रेडिकल फेमिनिज्म को 1960 के दशक में उदारवादी और मार्क्सवादी फेमिनिज्म के जवाब में पेश किया गया था, और यह सेक्सिज्म की अवधारणा पर विकसित हुआ, जो सभी प्रकार के उत्पीड़न का केंद्रीय रूप है (बकडौड और टैप, 2014)। रेडिकल फेमिनिज्म और अन्य फेमिनिस्ट शाखाओं के बीच प्रमुख अंतर यह है कि रेडिकल फेमिनिस्ट शक्ति के समान वितरण पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। इसके बजाय, वे समाज की संपूर्ण संरचना को बदलकर पितृसत्ता को समाप्त करने पर ध्यान देते हैं। वे पारंपरिक जेंडर भूमिकाओं को खत्म करना चाहते हैं।  

**साहित्य समीक्षा**  
पितृसत्ता, जो सदियों से परंपरागत समाजों में प्रचलित है, पुरुषों के निहित स्वार्थों के लिए महिलाओं को नियंत्रित करती है। इस पाखंडी परंपरा को हिंदी फिल्म *लज्जा* में तार्किक रूप से प्रस्तुत किया गया है। मिश्रा (2001) ने *लज्जा* पर एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने पुरुष-प्रधान समाज की रूढ़ियों द्वारा उत्पीड़ित चार महिला पात्रों पर अधिक ध्यान दिया। इसी तरह, आदर्श (2001) ने गर्भवती जानकी (माधुरी) पर ध्यान केंद्रित किया, जो भीड़ के ताने-बाने और गुस्से का सामना करती है और सड़क पर उसका गर्भपात हो जाता है। उन्होंने जोड़ा कि जानकी अपने अपरंपरागत नियमों से जीने की हिम्मत करती है। रामकिस्सून (2009) ने *लज्जा* के चार प्रमुख पात्रों की आलोचनात्मक समीक्षा की। उन्होंने सामान्य रूप से फिल्म की आलोचना की और निष्कर्ष निकाला कि महिलाओं को केवल यौन और जैविक प्राणियों के रूप में चित्रित नहीं करना चाहिए, विशेष रूप से वैदेही के चरित्र द्वारा। उन्होंने यह भी बताया कि फिल्म ने हिंदू धर्म, पौराणिक कथाओं, परिवार और परंपरा की धारणाओं, और पितृसत्ता की विशेषताओं को कैसे दर्शाया है।  

पावेल्स और अक्लुजकर (2010) ने *लज्जा* में समानता और व्यक्तिवाद पर आधारित आधुनिक फेमिनिस्ट आदर्शों को संबोधित किया, जिसमें जानकी (माधुरी) द्वारा सीता पर हुए अन्याय पर सवाल उठाया गया। सिन्हा और चौहान (2013) ने खोजा कि *लज्जा* में संज्ञानात्मक, भावनात्मक, प्रेरक और व्यवहारिक घटक हैं, जो फिल्म को बहुस्तरीय, बहुआयामी और जटिल बनाते हैं। उन्होंने *लज्जा* को भारतीय नारीत्व के निर्माता के रूप में विखंडन करने का प्रयास किया।  

इसके अतिरिक्त, कमर (2015) ने *लज्जा* को बॉलीवुड की फेमिनिस्ट फिल्म के रूप में आलोचनात्मक रूप से जांचा, जिसमें भारतीय लोकप्रिय संस्कृति में महिलाओं की इज्जत, शर्म और संकोच की अवधारणा को दर्शाया गया। उन्होंने फिल्म का सामाजिक-सांस्कृतिक विश्लेषण प्रस्तुत किया और महिलाओं के लिए कुछ भेदभावपूर्ण सिद्धांतों, जैसे प्रजनन की इकाई के रूप में महिलाएं, दहेज प्रथा, सौंपा गया सतीत्व, और भेदभाव की हिंसा, को उजागर किया। उन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में निहित भारतीय समाज की लैंगिक समस्याओं को उजागर करने का प्रयास किया।  

साथ ही, सरकार (2016) ने संकेत दिया कि *लज्जा* में चार भारतीय महिलाएं विभिन्न सामाजिक और आर्थिक स्तरों से आने वाली कठिनाइयों और दुर्व्यवहार की शिकार हैं। चक्रवर्ती (2016) ने पूरी फिल्म को सामान्य रूप से फेमिनिस्ट दृष्टिकोण से आलोचनात्मक रूप से जांचा। उन्होंने परंपरागत समाज में महिलाओं के फेमिनिस्ट मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की और चार मजबूत महिला पात्रों के बारे में बात की, जो अपने तरीके से पितृसत्ता से लड़ रही थीं।  

*लज्जा* से संबंधित साहित्य ने सामान्य रूप से पूरी कहानी पर ध्यान दिया है। इनका विश्लेषण भारतीय संस्कृतियों के व्यापक दृष्टिकोण से किया गया है। चक्रवर्ती (2016) ने कुछ महत्वपूर्ण संवादों के माध्यम से फेमिनिज्म का गंभीर विश्लेषण किया, लेकिन उन्होंने किसी विशिष्ट फेमिनिस्ट दृष्टिकोण का उपयोग नहीं किया। सरकार (2016) ने मार्क्सवादी/समाजवादी फेमिनिज्म को कुछ हद तक संकेत दिया, जिसमें आर्थिक और सामाजिक स्तरों को उजागर किया गया, लेकिन विश्लेषण बहुत सतही रहा। रामकिस्सून (2009) ने फिल्म को उदारवादी फेमिनिज्म के दृष्टिकोण से विश्लेषित किया, लेकिन वे फिल्म की गहराई तक नहीं पहुंच सकीं। मुझे *लज्जा* पर रेडिकल फेमिनिस्ट दृष्टिकोण से कोई लेखन नहीं मिला। यहाँ, मैं जानकी (माधुरी) से संबंधित तीसरे थीम का रेडिकल फेमिनिस्ट दृष्टिकोण से गहन विश्लेषण करना चाहता हूँ।  

**विश्लेषण**  
जानकी (माधुरी), जो इस थीम की नायिका है, एक मंच अभिनेत्री है। वह अपनी दुनिया में जीने की इच्छा रखती है। वह वैदेही (मनीषा) से मिलती है, जो पुरुष-प्रधान दुनिया में पीड़ा की शिकार है। वह गर्भवती है और वैदेही को बताती है, “मेरा दूसरा महीना चल रहा है… क्या देख रही हो, मंगलसूत्र या सिन्दूर? शादी नहीं हुई है अभी तक, लेकिन अगले महीने हो जाएगी।” (संतोषी, 2001)। जानकी परंपरागत मानदंडों, मूल्यों और रीति-रिवाजों से आगे बढ़ना चाहती है। बिना विवाह के गर्भवती होना पितृसत्तात्मक समाज में किसी भी महिला के लिए एक बड़ी चुनौती है। पितृसत्तात्मक समाज में पत्नियों को अधीनस्थ और आज्ञाकारी माना जाता है। फिनले और क्लार्क (2016) ने विवाह के इर्द-गिर्द प्रेम, रोमांस और जोड़े की अवधारणाओं की आलोचना की है। उनका मानना है कि विवाह एक सामाजिक अनुबंध की तरह है, जिसमें पुरुषों द्वारा महिलाओं पर प्रभुत्व और पुरुषों का समान यौन पहुंच का अधिकार एक मुद्दा है, जबकि विवाह और महिला निष्ठा पितृसत्तात्मक समाज में विषमलैंगिक संबंधों के लिए बुनियादी आवश्यकताएँ हैं। उदाहरण के लिए, *लज्जा* फिल्म में जानकी यौनिकता के मामले में व्यावहारिक है। इसलिए, उसे परंपरागत समाज के कुछ सामाजिक वर्जनाओं का सामना करना पड़ता है।  

पुरुषोत्तम एक ऐसा चरित्र है, जो पितृसत्तात्मक समाज की प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है और महिलाओं का यौन और सामाजिक शोषण करके अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहता है। वह अपनी पत्नी को अपमानित करता है, कहता है, “लता, तुम्हें कुछ नहीं पता। मैं तुम्हें आदर्श पत्नी बनाना चाहता हूँ।” क्या शर्मनाक पितृसत्तात्मक विचार है! वह अपनी पत्नी को पूरी तरह नियंत्रित करता है, उसे घरेलू पिंजरे में रखता है। वह उसे खिड़की से बाहर देखने की भी अनुमति नहीं देता। लेकिन वह अपनी ड्रामा कंपनी में अन्य महिलाओं का यौन उद्देश्य के लिए पीछा करता है। सुल्ताना (2010) ने खोजा कि महिलाएँ पितृसत्तात्मक प्रभुत्व के तहत अधीनस्थ लिंग वर्ग हैं। रेडिकल फेमिनिस्ट मान्यताएँ इस विचार पर आधारित हैं कि महिलाओं के उत्पीड़न का मुख्य कारण पुरुष वर्चस्व और पितृसत्ता से निर्मित सामाजिक भूमिकाएँ और संस्थागत संरचनाएँ हैं। समान रूप से, पुरुषोत्तम में पितृसत्तात्मक विचारधारा है, जो महिलाओं का शारीरिक और पौराणिक रूप से शोषण करती है।  

इसके अलावा, मनीष भी एक मंच अभिनेता और जानकी का प्रेमी है, जिसने उससे विवाह करने का वादा किया था। वह उसे बच्चे का गर्भपात करने के लिए कहता है, क्योंकि उसे संदेह है कि अजन्मा बच्चा पुरुषोत्तम का है। वह उससे विवाह करने से इंकार करता है, कहता है, “देखो जानकी, इस बारे में मेरे घरवाले क्या सोचेंगे, नहीं जानता लोग क्या कहेंगे… ये बच्चा हमें नहीं चाहिए।” जानकी मनीष से शिकायत करती है, “ये घरवाले, ये लोग कहाँ से आ गए ये सब, उनसे पूछकर मुझसे प्यार किया था?” यहाँ, जानकी मनीष के रूढ़िगत विचारों के कारण अत्यधिक तनाव में आ जाती है। रेडिकल-सांस्कृतिक फेमिनिस्ट सिद्धांत देते हैं कि महिलाओं के उत्पीड़न का कारण प्रजनन संभावनाएँ नहीं, बल्कि पुरुषों की महिलाओं और उनकी प्रजनन क्षमताओं के प्रति ईर्ष्या है, जो तथाकथित पितृसत्तात्मक विचारों से विकसित होती है (सरसिनो, 2018)। मनीष उसे तभी स्वीकार करना चाहता है, जब वह बच्चे का गर्भपात करने को तैयार हो। मनीष का व्यवहार यह दर्शाता है कि पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों और महिलाओं के बीच भेदभाव करने वाली कुछ सांस्कृतिक बाधाएँ हैं।  

जानकी आत्मविश्वास के साथ वैदेही से कहती है, “बात मेरे चरित्र की नहीं है, मेरे आत्म-सम्मान की है। वह मेरे प्यार का सबूत चाहता है, मेरी परीक्षा लेना चाहता है। मैं कहाँ से लाकर दूँ?” जानकी यह कैसे साबित करे कि अजन्मा बच्चा मनीष का है? ग्राहम (1998) ने विस्तार से बताया कि प्राकृतिक प्रजनन न तो महिलाओं के हित में है और न ही उत्पन्न होने वाले बच्चों के। बच्चों का प्रजनन महिलाओं के उत्पीड़न का प्रमुख दायित्व है और इस प्रक्रिया ने महिलाओं की पूर्ण मानव बनने की क्षमता को सीमित कर दिया है। जानकी का समग्र दुख टॉन्ग के रेडिकल-लिबरेटेरियन फेमिनिज्म के इर्द-गिर्द केंद्रित है। उसका आत्म-सम्मान भी कमजोर लगता है क्योंकि वह गर्भवती है। लेकिन रेडिकल फेमिनिस्ट महिलाओं के प्रजनन न्याय के अधिकार पर स्पष्ट स्थिति लेते हैं। यहाँ, जानकी बच्चे के प्रजनन के पक्ष में एक स्पष्ट रुख अपनाती है।  

मनीष (राम के रूप में) जानकी (सीता के रूप में) पर आरोप लगाता है, “तुम लंका में परपुरुष के साथ रहकर आई हो, तुम्हारे चरित्र पर संदेह का अवसर उपस्थित होता है। इसलिए मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता।” हिंदू धार्मिक महाकाव्य ‘रामायण’ में, राम ने सीता पर संदेह किया और उसे अपनी पवित्रता साबित करने के लिए अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी। उस समय की सामाजिक वर्जनाओं ने सीता की घरेलू सुख-शांति को छीन लिया (वरियार, 2018)। दूसरी लहर की फेमिनिस्ट वुकोइसिक (2013) का कहना है कि रेडिकल फेमिनिज्म पितृसत्तात्मक आधारों पर आधारित है, और वह आगे विश्लेषण करती हैं कि लिंगों के बीच शक्ति संघर्ष पर आधारित सामाजिक व्यवस्था सभी प्रकार के उत्पीड़न, असमानता और अन्याय का मूल कारण है। यहाँ राम सामाजिक मानदंडों और पितृसत्तात्मक विचारधारा की आलोचना के आधार पर सीता पर आरोप लगाता है कि सीता और रावण के बीच यौन संबंध हो सकता है। पुरुषों और महिलाओं के बीच भेदभाव का परिणाम हमारी पारंपरिक और पाखंडी धार्मिक पुस्तकों, जैसे रामायण (सीता) और महाभारत (द्रौपदी), से हो सकता है।  

जानकी (सीता के रूप में) मनीष (राम के रूप में) के साथ घोषणा करती है, “हम पति-पत्नी दोनों ही अलग रहे हैं। इसलिए हम दोनों को ही अग्नि-परीक्षा देनी होगी।” जानकी पक्षपात के खिलाफ विद्रोह करने की हिम्मत करती है। वह सभी महिलाओं की गरिमा के बारे में पूछती है और पुरुषों के साथ समान हिस्सेदारी चाहती है। वह पितृसत्तात्मक समाज की उस खराब परंपरा को उजागर करती है, जिसमें केवल महिलाओं को ही परीक्षा देनी पड़ती है, और सवाल उठाती है कि पुरुषों को क्यों नहीं। हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान का दावा है कि महिलाओं को मुक्ति प्राप्त करने का एकमात्र तरीका अपने पति के प्रति कर्तव्य निभाना है। यदि वे अपने पति से दूर हैं, तो उन पर संदेह किया जा सकता है (बोरुआ, 2008)। जानकी संकेत देती है कि न केवल महिलाएँ पुरुषों के साथ जाती हैं, बल्कि पुरुष भी यौन मामलों के लिए महिलाओं के साथ जा सकते हैं। यदि ऐसा है, तो केवल महिलाओं के लिए ही अग्नि-परीक्षा क्यों? वह एक प्रमुख सवाल उठाती है। वह आपराधिक पौराणिक कथाओं द्वारा ढके कृत्रिम पर्दे को उजागर करने की कोशिश करती है।  

जानकी वैदेही के साथ सभी पितृसत्तात्मक पुरुषों पर आरोप लगाती है, “जो बात इनके कानों को अच्छी लगे, जो बात इनके मन को रिझाए, वही बोलते रहो, तो सिर पर बिठाकर पूजा करेंगे, कहेंगे देवी है। और जिस दिन अपने मन की बात कही, तो कहेंगे कुलटा है, चरित्रहीन है।” पुरुष महिलाओं को कठपुतली समझते हैं। एकल और ग्रॉसमैन (1998) ने अपने शोध में पाया कि महिलाएँ सामाजिक रूप से अधिक उन्मुख होती हैं, लेकिन पुरुष व्यक्तिगत रूप से उन्मुख होते हैं। इसी तरह, महिलाएँ अपने अज्ञात लोगों को पुरुषों की तुलना में दोगुना दान देती हैं। पितृसत्तात्मक समाज में संस्कृति, परंपरा, मानदंडों और मूल्यों का प्रभाव पुरुषों को महिलाओं के प्रति स्वार्थी बनाता है। जानकी इस दृश्य में पुरुषों की इस पुरातन श्रेष्ठता का विरोध करती है।  

पुरुषोत्तम जानकी से डरता है और कहता है कि उसने हिंदू दर्शन का अपमान किया है। (“तूने धर्म का अपमान किया है।”) उसका मतलब है कि जानकी को पाखंडी समाज द्वारा बनाए गए सभी मानदंडों और मूल्यों का पालन करना चाहिए। सुल्ताना (2010) का कहना है कि पिता के अधिकार को स्थापित करने और उनकी यौनिकता को नियंत्रित करने के लिए महिलाओं को घरेलू बनाना और सीमित करना पड़ता था। वह सीधे उस पारंपरिक दर्शन पर हमला करती है, जो आज भी हमारे समाज को नियंत्रित करता है। जानकी पुरुषोत्तम के इस फंसाने वाले बयान को हिंसक रूप से अस्वीकार करती है, कहती है कि ऐसी बकवास पाखंडी समाज से बेहतर पागलखाना है। “सिर्फ एक सवाल उठाया है मैंने जो सदियों से हर औरत के मन में आ रहा है। जवाब देते नहीं, … जान लेने पर उतर आए मर्द। धर्म के नाम पर अपना स्वार्थ पूरा करने वाले ऐसे पाखंडी, जलील, गँवार लोगों के साथ जीने से तो पागलखाना बेहतर है।” रेडिकल फेमिनिज्म महिलाओं और पुरुषों के संबंधों को नए तरीके से सैद्धांतिक रूप देने का सुझाव देता है, और पुरुषों द्वारा महिलाओं के नियंत्रण को विभिन्न तंत्रों, जैसे हिंसा, विषमलैंगिकता, और प्रजनन, के माध्यम से जोर देता है (मेनार्ड, 1995)। इसके अतिरिक्त, विभिन्न उत्पीड़ित समूहों की महिलाएँ धर्म के नाम पर सदियों से उत्पीड़न का सामना करती हैं। उन्हें पितृसत्तात्मक समाज के प्रत्येक पाखंडी मानदंड और मूल्य पर सवाल उठाना होगा और प्रत्येक लैंगिक भेदभाव के मुद्दे को चुनौती देनी होगी।  

जानकी प्रदर्शनकारियों (जनसमूह) को संबोधित करती है, “सदियों से औरत सती होती आ रही है। कभी कोई मर्द कूदा है आग में अपनी औरत के लिए। कोई करवा चौथ बनाया है इनके लिए। पाखंडी।” पौराणिक कथाएँ संकेत देती हैं कि यह व्रत (करवा चौथ) विवाहित महिलाएँ अपने पति की भलाई और लंबी उम्र के लिए सूर्योदय से चंद्रोदय तक बिना भोजन के रखती हैं। शाह (2016) करवा चौथ की शिकायत करती हैं और सुझाव देती हैं कि भारतीय महिलाओं को ऐसी पुरातन और पितृसत्तात्मक रीति-रिवाजों को पीछे छोड़ देना चाहिए। जानकी शाह के पक्ष में है। उसका कितना क्रांतिकारी बयान है। वह महिलाओं की ओर से एक बहुत शक्तिशाली बयान देती है। रेडिकल फेमिनिस्ट एक स्वायत्त महिला आंदोलन को महिलाओं की मुक्ति का मार्ग मानते हैं। यह माना जाता है कि सिद्धांत और कार्रवाई उन महिलाओं की जीवंत वास्तविकता से विकसित होती हैं, जिन्हें नारीत्व में सामाजिक रूप से ढाला गया है।  

**निष्कर्ष**  
पितृसत्ता महिलाओं की प्रगति और विकास की मुख्य जटिलता है, जो उन्हें प्रजनन की मशीन और यौन सुख का साधन बनाए रखती है। यह 21वीं सदी में विश्व के लिए शर्म का विषय है। फिल्म *लज्जा* दर्शाती है कि कैसे महिलाओं को लिंग और परंपरागतता के आधार पर, जो धर्म के समान है, वस्तु बनाया जाता है। थीम में दर्शकों का विरोध पितृसत्तात्मक विचारों को पुरुष-प्रधान समाज में दर्शाता है। पितृसत्तात्मक मानदंड महिलाओं को उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने नहीं देते। बाद में, उन्हें अपनी गहरी आंतरिक इच्छाओं को दबाना पड़ता है, जो अंततः आभासी अभाव में बदल जाता है और उनकी जीवन शैली बन जाता है।  

रेडिकल फेमिनिज्म परंपरागत समाज में यौन पक्षपात के खिलाफ एक आंदोलन है। रेडिकल फेमिनिस्ट मानते हैं कि पुरुष और महिलाएँ जैविक रूप से भिन्न हैं, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से समान हैं। उनका दावा है कि पितृसत्तात्मक समाज ने प्रत्येक प्रवचनात्मक अभ्यास में महिलाओं को पुरुषों से हीन के रूप में प्रस्तुत किया है। वे उन सभी पारंपरिक जेंडर भूमिकाओं का विरोध करते हैं, जो पितृसत्तात्मक श्रेष्ठता को उचित ठहराने और बनाए रखने में निहित स्वार्थ रखती हैं। इस प्रकार, मैं इस लेख को यह अनुरोध करते हुए समाप्त करता हूँ कि प्रत्येक महिला को शर्मनाक पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ अपनी आवाज उठानी चाहिए।  

**संदर्भ**  
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पहाड़ का वह गुमनाम हीरो जो दिल्ली होता तो पत्रकारिता की दुनिया का बड़ा नाम होता.

पहाड़ का वह गुमनाम हीरो जो दिल्ली होता तो पत्रकारिता की दुनिया का बड़ा नाम होता.

बद्रीदत्त ने धारचूला और मुनस्यारी में रहने वाली भोटिया जनजाति के द्वारा बनाए जाने वाले ऊनी उत्पाद जैसे थुलमा और दन पर विशेष श्रृंखला लिखी. इसकी वजह से लोगों को यह पता चला कि यह उत्पाद शिमला, पानीपत में बनाए जाने वाले ऊनी उत्पादों से क्वॉलिटी में बेहतर हैं और इनकी बिक्री बढ़ गई.

पूरा जीवन पहाड़ के लोगों के नाम

सुंदर चंद ठाकुर का 'काफल ट्री' में बद्रीदत्त कसनियाल पर लिखा आलेख पढ़ें तो उसमें एक जगह लिखा है 'मैं यहां यह भी स्वीकार करना चाहता हूं कि आज भले ही मैं एक बड़े ब्रैंड के अखबार के एडिशन का संपादक हूं. लेकिन जहां तक पत्रकारिता के बुनियादी हुनर और उसके प्रतिमानों पर खरा उतरने की बात है. तो मैं आज भी कसनियाल जी के चेले से ज्यादा कुछ नहीं हूं.' वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह कहते हैं कि बद्रीदत्त कसनियाल के सिखाए न जाने कितने पत्रकार आगे चलकर बड़े संस्थानों के सम्पादक बने. अगर बद्रीदत्त ने पत्रकारिता के लिए पहाड़ छोड़कर दिल्ली को चुना होता तो दिल्ली की चमक धमक के बीच, आज उनका नाम देश के बड़े पत्रकारों के साथ लिया जाता. पहाड़ के लोगों की सेवा के लिए बद्रीदत्त ने अपना पूरा जीवन लगा दिया.

कविता से बना पत्रकारिता का रास्ता

पिथौरागढ़ के रहने वाले बद्रीदत्त कसनियाल ने साल 1972 में बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण की थी तब हरियाणा की एक सरकारी पत्रिका में बसंत ऋतु पर उनकी एक कविता प्रकाशित हुई, जिसके उन्हें तीस रुपए मिले.

इसके बाद ही उन्हें लिखने का शौक चढ़ा. ग्रेजुएशन करने जब वह पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज गए तो 'उत्तराखंड ज्योति' अखबार के लिए उन्होंने एक आर्टिकल लिखा, जिसकी लोगों ने खूब प्रशंसा की. अखबार के मालिक कैलाश चन्द्र जोशी ने बद्रीदत्त को बोला कि आप अखबार को लिखे लोगों के पत्रों को समाचार का रूप दें. यह पत्र चंपावत, धारचूला से आते थे, जिनमें बिजली, पानी की समस्याओं के साथ बाघ के आतंक की शिकायत होती थी. इसमें पटवारियों की शिकायत भी होती थी. इन अंकों को भी लोगों की प्रशंसा मिली, ढाई सौ रुपए वेतन में बद्रीदत्त वहां काम करने लगे.
साल 1974-75 में वह मान्यता प्राप्त पत्रकार भी बन गए थे, साथ में उस दौर की धर्मयुग, कादम्बिनी जैसी पत्रिकाओं को पढ़ते रहा करते थे.

खबर का असर

अपनी लिखी एक खबर के बारे में बात करते बद्रीदत्त कहते हैं कि साल 1976 में एक दिन पिथौरागढ़ में आग लगी तो एक छोटे टैंकर से वहां आग बुझाने की कोशिश की गई पर तब तक वहां सब जल कर खाक हो गया था. तब मैंने खबर लिखी कि पिथौरागढ़ में आग बुझाने के लिए वाटर टैंक न होने की वजह से नुकसान हुआ. इस खबर के एक हफ्ते के अंदर ही पिथौरागढ़ में 25000 लीटर का एक वाटर टैंक आ गया था.

ऐसे ही साल 1977 में हुए तवाघाट लैंडस्लाइड पर बद्रीदत्त ने एक्टिविस्ट शमशेर सिंह बिष्ट और एक सरकारी भूवैज्ञानिक के साथ मौके पर जाकर 'दिन प्रतिदिन' अखबार के लिए रिपोर्टिंग की थी. इससे बाहरी दुनिया का ध्यान पहली बार उत्तराखंड के लैंडस्लाइड पर गया और उस पूरे इलाके को संवेदनशील क्षेत्र भी घोषित किया गया. उन दिनों नैनीताल समाचार, लघु भारत के लिए भी वह लगातार लिख रहे थे.

साल 1982 में अमर उजाला के लिए बद्रीदत्त ने धारचूला और मुनस्यारी में रहने वाली भोटिया जनजाति के द्वारा बनाए जाने वाले ऊनी उत्पाद जैसे थुलमा और दन पर विशेष श्रृंखला लिखी. इसकी वजह से लोगों को यह पता चला कि यह उत्पाद शिमला, पानीपत में बनाए जाने वाले ऊनी उत्पादों से गुणवत्ता में बेहतर हैं और इनकी बिक्री बढ़ गई. उत्साहित भोटिया जनजाति के लोगों ने बढ़ी बिक्री को देखते नए तरह के ऊनी उत्पाद बनाने भी शुरू किए.

लोगों के बीच जाकर ही होती है असली पत्रकारिता

एडमंड हिलेरी के पुत्र पीटर हिलेरी भारत में आए तो बद्रीदत्त की उनसे मुलाकात हुई. 27-28 साल के पीटर उन दिनों अपने साथियों के साथ नेपाल से भारत तक हिमालय पैदल चल रहे थे. पीटर का साक्षात्कार करते बद्रीदत्त को महसूस हुआ कि पैदल चलकर हम भी उत्तराखंड के समाज के बारे में गहराई से जान सकते हैं. साल 1977 में 'उत्तर उजाला' अख़बार की शुरुआत भी हुई और बद्रीदत्त इस अखबार से सात सौ रुपए तनख्वाह में जुड़ गए.
इसी बाद वह साल 1980 में अमर उजाला से भी जुड़े. बद्रीदत्त कसनियाल छोटा सा बैग टांगकर कस्बों, गांवों में घूमते हुए चिपको आन्दोलन कर रहे सुंदर लाल बहुगुणा का पिथौरागढ़ आने पर लगातार साक्षात्कार लेते रहे. यह साक्षात्कार अमर उजाला में प्रकाशित होते थे.

एक ऐसा पत्रकार जिसने एक्टिविस्ट न होकर भी एक्टिविज़्म किया

साल 1985 में बद्रीदत्त ने अपना अखबार 'आज का पहाड़' निकाला. वह कहते हैं अमर उजाला में मेरा तबादला मेरठ हुआ पर तब घर के हालात ऐसे बन गए कि मुझे अमर उजाला छोड़ना पड़ा. आज का पहाड़ नाम उन्होंने इंडिया टुडे से लिया.
बद्रीदत्त कहते हैं कि वह शमशेर सिंह बिष्ट, पी सी तिवारी, प्रदीप टम्टा जैसे एक्टिविस्टों की खबरें लगातार छापते रहे. वह कभी एक्टिविस्ट नही बने पर उन्होंने इन एक्टिविस्टों की खबरें प्रायिकता के साथ छापी. किसी आंदोलन को कवर करने पर गांव वाले यह कहते बड़े खुश होते थे कि उनकी आवाज भी कोई उठा रहा है. उन दिनों पत्रकारिता वाकई जनता की आवाज होती थी.

उन्होंने आगे बताया कि उन दिनों एक डीएम ने नगर पालिका की जमीन पर घर बनाने को लेकर एक व्यक्ति को नोटिस दिया. हमने इस विषय पर लिखा तो डीएम को वह नोटिस वापस लेना पड़ा और इसके बाद उस डीएम ने हमारे अखबार का रजिस्ट्रेशन कैंसल करवा दिया. अखबार सस्पेंड हो गया तो वह प्रेस काउंसिल गए तो उसके हस्तक्षेप से अखबार फिर शुरू हुआ.

पुरस्कारों से दूर रहते हुए पब्लिक की रीयल सेवा पत्रकारिता

साल 1998 में बद्रीदत्त 'पीटीआई' से जुड़ गए और अमर उजाला के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता करते रहे. साल 2006 से 2009 तक 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से जुड़े रहे. वहां उन्होंने सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अभियान चलाया. बद्रीदत्त बताते हैं कि कबूतरी देवी जैसे कलाकारों को हम दुनिया के सामने लाए, पहाड़ के इन लाजवाब गुमनाम कलाकारों की हमने पूरी सीरीज चलाई. पद्मश्री शेखर पाठक ने भी इस काम की तारीफ की और यही तारीफ उनको पूरे जीवन में मिला एकमात्र पुरस्कार है.

बद्रीदत्त कसनियाल के इस काम पर 'बारामासा' की वेबसाइट में कबूतरी देवी पर बने एक एपिसोड में लिखा भी है "साल 1995. सीमांत क्षेत्र पिथौरागढ़ में ‘आज का पहाड़’ अख़बार के संपादक बद्रीदत्त कसनियाल, स्थानीय लोक कलाकारों पर आधारित लेखों की एक सीरीज़ प्रकाशित कर रहे थे. इस दौरान वो ऐसे कलाकारों की भी खोज कर रहे थे जिन्होंने एक दौर में प्रसिद्धि तो खूब पाई, मगर अब गुमनामी की ज़िंदगी जीने को मजबूर थे. उनके साथी नरेश जोशी ने तब उन्हें एक ऐसा नाम सुझाया जिन्हें उत्तराखंड की पहली लोक गायिका भी कहा जाता था. बद्रीदत्त कसनियाल और नरेश जोशी इस गायिका की खोज में निकल पड़े. वे जब क्वीतड़ गांव पहुंचे तो देखा कि उस गायिका की आर्थिक स्थिति दयनीय थी और वो दिहाड़ी-मज़दूरी करने को मजबूर हो गई थीं. कसनियाल ने उनसे लम्बी बातचीत की और ‘आज का पहाड़’ में उनके बारे में एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया. इस लेख ने गुमनामी के अंधेरों में खो चुकी लोक गायिका को जैसे एक नया जीवन दे दिया और पहाड़ की जनता के बीच उन्हें पुनर्स्थापित कर दिया."

साल 2006 में बद्रीदत्त कसनियाल ने कम्प्यूटर सीखा और 2009 में वह 'ट्रिब्यून' से जुड़ गए. ट्रिब्यून से वह 'हिंदुस्तान टाइम्स' में आने से पहले साल 2017 तक जुड़े रहे. अभी वह पीटीआई, हिंदुस्तान टाइम्स, नॉर्थन गजेट के लिए अंग्रेज़ी में लिखते हैं और 'आज का पहाड़' हिंदी में लिख रहे हैं.

वह कहते हैं पत्रकार ही जनता का प्रतिनिधि होता है, पब्लिक की रीयल सेवा पत्रकारिता से ही की जा सकती है और इसलिए ही वह अब तक लिख रहे हैं.

पत्रकारिता का अपना ‘कॉफी हाउस’

वरिष्ठ पत्रकार भास्कर उप्रेती बताते हैं कि बद्रीदत्त कसनियाल न केवल एक तेज-तर्रार पत्रकार हैं बल्कि वनराजियों के संरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर लगातार काम भी करते रहे. पढ़ाई में भी वे बेहद शार्प थे और याद पड़ता है कि दिल्ली जाकर उन्होंने UPSC की मुख्य परीक्षा तक का सफर तय किया. आज भी वे पिथौरागढ़ एयरपोर्ट के नजदीक अपने गाँव कासनी से रोज पैदल शहर आते हैं.

पिथौरागढ़ नगर में चिलकोटी भवन, बैंक रोड स्थित उनका छोटा सा दफ़्तर कई दशकों तक बौद्धिक केंद्र बना रहा. अपना और परिवार का खर्च निकालने के लिए वह ट्यूशन पढ़ाते थे और साथ ही पत्रकारिता में भी ऊँचे दर्जे की पेशेवराना ईमानदारी निभाते रहे. उनके मार्गदर्शन में न केवल कई पत्रकार बल्कि उच्च शिक्षा और प्रशासनिक सेवाओं की ओर जाने वाले युवाओं को भी दिशा मिली.

भास्कर ने आगे बताया कि नगर के आयोजनों में वे हमेशा केंद्र में रहते. उमेश डोभाल पत्रकारिता सम्मान जैसे कार्यक्रमों से लेकर कॉलेज की गोष्ठियों तक, हर जगह उन्हें बुलाया जाता. वह पत्रकारिता और साहित्य में बने सवर्ण वर्चस्व पर भी लगातार बोलते और उसका विश्लेषण करते.

उप्रेती याद करते हैं कि कसनियाल जी की संगति ने उनकी टोली को दृष्टि और आत्मविश्वास दिया. उनके दफ़्तर में बैठकर प्रेम पुनेठा, पूरन बिष्ट, सुंदर चंद ठाकुर, भरत ठाकुर, जहाँगीर राजू, चंद्र बहादुर जैसे पत्रकार और लेखक-शिक्षक तैयार हुए. उनका यह दफ़्तर किसी कॉफी हाउस की तरह था, जहाँ डॉ. राम सिंह, पी.डी. पंत, पूर्व विधायक बोरा, जिला कृषि अधिकारी डॉ. खान जैसे लोग भी रोज जमा होते. कॉलेज के बाद युवाओं की टोली आकर उन्हें रिप्लेस कर देती और बहसों का सिलसिला नेपाल, कोसोवो, फिलिस्तीन से लेकर लिट्टे तक के मुद्दों पर चलता.

दफ़्तर बंद होने के बाद वे छात्रों के साथ निकल पड़ते. पुनेठा न्यूज़ एजेंसी, फिर लाइब्रेरी के नीचे हवलदार की चाय की दुकान, वहां युवाओं का यह दल बद्रीदत्त कसनियाल को घेरे गरमागरम बहस करता. यही वह माहौल था जहाँ से आने वाली पीढ़ी ने पत्रकारिता और जनसरोकार दोनों का पाठ सीखा.

उन्होंने आगे कहा बद्रीदत्त कसनियाल राष्ट्रीय मीडिया के लिए सीमा, सेना और उत्तराखंड से जुड़े विषयों पर विश्वसनीय आवाज़ थे. कभी-कभी विद्यार्थी मज़ाक में उन्हें चुनौती देते 'अगर दम है तो फोन पर डीएम को हड़काओ' और वे किसी मुद्दे पर डीएम को सचमुच फटकार भी देते. मान्यता प्राप्त पत्रकार होने का असर इतना था कि कभी मज़ाक-मज़ाक में कहने पर सरकारी गाड़ी भी उनके लिए पहुँच जाया करती थी.

'आज का पहाड़' अखबार निकालने के दिनों में विज्ञापन जुटाने में 'हिमालयन ग्राम्य विकास संस्थान' के संस्थापक राजेंद्र बिष्ट, जहाँगीर राजू और राजीव पांडे जैसे साथी मदद करते. बाद में कसनियाल जी उन्हें पत्रकारिता और समाजसेवा, दोनों रास्तों पर लगा देते.

बद्रीदत्त कसनियाल के बारे में एक खास बात को याद करते भास्कर उप्रेती ने कहा कि उनकी एक आँख बचपन से ही कमजोर रही है, इसलिए वे हमेशा लेंस लेकर ही चलते और महीन अक्षर उसी से पढ़ते. निजी जीवन में वे लेनिन के प्रशंसक थे खासकर उनके पहनावे के. लेकिन पत्रकार के रूप में उन्होंने कभी वामपंथी होने की कोशिश नही की. वे मज़ाक भी खूब करते, प्रेम पुनेठा उम्र में उनसे बड़े थे, मगर कसनियाल जी अपनी उम्र का मज़ाक उड़ाते हुए कहते कि वह उनसे छोटे हैं और साथियों को हंसा देते.


Saturday, September 13, 2025

हिंदी और बॉलीवुड: फिल्मों से हिंदी की लोकप्रियता का सच

हिंदी और बॉलीवुड: फिल्मों से हिंदी की लोकप्रियता का सच

विदेशों में हिंदी के प्रसार की चर्चा में सबसे पहले बॉलीवुड का नाम आता है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि असली प्रचारक प्रवासी भारतीय ही हैं।
सिनेमा मनोरंजन का साधन और सहयात्री है, जबकि भाषा को बचाने का श्रेय मंदिरों, सांस्कृतिक आयोजनों और प्रवासी समुदाय के प्रयासों को जाता है।

प्रवासी अनुभव: स्पेन और इंग्लैंड

पिछले तीन दशकों से स्पेन में रहने वाली पूजा अनिल कहती हैं कि स्पेन में जैसा पागलपन मैंने बॉलीवुड हिंदी फ़िल्मों के लिए देखा है, उसकी कोई मिसाल नहीं है। निश्चित ही हिंदी सिनेमा का बहुत बड़ा रोल है हिंदी को दुनिया भर में पहुँचाने में। बचपन में ही बच्चे फ़िल्मों के गाने सुनने लगते हैं तो ज़ाहिर है कि उनकी अपनी हिंदी शब्दावली उन गीतों के बोल (लिरिक्स) के जरिए बनने लगती है। फिर बड़े होते-होते फ़िल्मी संवाद से शब्दकोश बढ़ता चला जाता है। 20-22 साल के होते-होते तो वे हिंदी सिनेमा द्वारा सीखे हुए मुहावरे भी बोलने लगते हैं।

बस अक्सर एक कमी रह जाती है कि वे देवनागरी लिपि में लिख नहीं पाते और पढ़ भी नहीं पाते।

पिछले तीन दशकों से इंग्लैंड के रीडिंग में रह रहे सुनील स्वरूप मैनेजमेंट कंसल्टेंट होने के साथ गायक भी हैं। वह कहते हैं हिंदी सिनेमा यहां काफी लोकप्रिय है। बहुत से बच्चे जो हिंदी नहीं भी बोलते, वे बॉलीवुड के गाने सुनते हैं और गुनगुनाते हैं, इनमें अंग्रेजों के बच्चे भी शामिल हैं।

प्रवासी बनाम बॉलीवुड

अमेरिका में रहने वाले अनुराग शर्मा 'सेतु' पत्रिका के संपादक हैं। वह बॉलीवुड और उससे हिंदी के प्रचार-प्रसार पर विस्तार से बात करते हैं। उन्होंने कहा जब भी विदेशों में हिंदी के प्रसार की बात होती है, तो सबसे पहले बॉलीवुड का नाम लिया जाता है। यह एक सर्वमान्य धारणा बन चुकी है कि हिंदी फिल्में ही हमारी भाषा को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाने का काम कर रही हैं।

जबकि सच यह है कि दुनिया भर में फैले हिंदीभाषी भारतीय प्रवासी ही हिंदी के असली प्रचारक, प्रसारक, प्रयोगकर्ता और संरक्षक हैं। ये लोग भाषा को बचाने के सतत प्रयास करते रहे हैं। यही लोग मंदिर और सांस्कृतिक केंद्रों में संगीत और नृत्य के कार्यक्रम आयोजित करते हैं और मुशायरा व हिंदी कवि सम्मेलनों के लिए भारत से कलाकारों और कवियों को बुलाते हैं। ये आयोजन सीधे तौर पर भाषा से जुड़ने और उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का काम करते हैं। इनकी तुलना में हिंदी सिनेमा तो बस एक मनोरंजन का साधन है, जो पहले से ही हिंदी जानने वाले लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़े रखता है। बॉलीवुड हिंदी भाषा का प्रचारक नहीं, कुछ हद तक उसका सहयात्री कहा जा सकता है।

ऐतिहासिक संयोग और सिनेमा

अनुराग शर्मा आगे कहते हैं कि हिंदी फिल्मों की पुरानी लोकप्रियता का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, खासकर सोवियत संघ और मध्य पूर्व में। लेकिन यह लोकप्रियता हिंदी फिल्मों के अपने दम पर नहीं, बल्कि उस समय के भू-राजनीतिक संयोगों के कारण थी। जहाँ पश्चिमी देशों की फिल्में उपलब्ध नहीं थीं या उन्हें अश्लील या राजनैतिक-वैचारिक रूप से खतरनाक माना जाता था, वहाँ बॉलीवुड ने उस खाली जगह को एक मुलायम और विचारहीन मनोरंजन से भर दिया।

कालांतर में जैसे ही ये बाज़ार दुनिया के लिए खुले और इनमें हॉलीवुड और अन्य सिनेमा का प्रवेश हुआ, हिंदी फिल्मों का जादू फीका पड़ता गया। आज रूस जैसे देशों में, जहाँ कभी सरकारी प्रायोजन के कारण राज कपूर के गानों की धूम थी, हिंदी फिल्मों के दर्शक न के बराबर हैं। यह साबित करता है कि बॉलीवुड का प्रभाव स्थायी सांस्कृतिक शक्ति नहीं बल्कि तात्कालिक राजनैतिक आवश्यकता और एक ऐतिहासिक संयोग मात्र था, जो समय आने पर क्षर गया।

भाषा शिक्षण बनाम सिनेमा

अनुराग शर्मा के अनुसार हिंदी सिनेमा ने विदेशियों को हिंदी सिखाई है, यह तर्क भी बहुत सीमित अर्थ रखता है। किसी भी फिल्म को देखकर कुछ शब्द या गाने सीखना एक बात है, लेकिन भाषा सीखना या उसे सीखने की ललक पैदा करना बिलकुल अलग। हॉलीवुड की फिल्में देखकर भी लोग अंग्रेजी के कुछ शब्द सीख लेते हैं, लेकिन इससे कोई यह नहीं कहता कि हॉलीवुड द्वारा संसार ने अंग्रेजी सीखी है।

असल में, विदेश में हिंदी सिखाने का काम शिक्षक और भाषाई संस्थान करते हैं। सिनेमा उनके द्वारा प्रयुक्त एक साधन या उत्प्रेरक हो सकता है, लेकिन भाषा का वास्तविक शिक्षण तो कक्षाओं में ही होता है।

हिंदी दिवस: प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हिंदी का वैश्विक सफर

हिंदी दिवस: प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हिंदी का वैश्विक सफर

हिंदी दिवस पर वैश्विक महत्व

हिंदी दिवस हर साल 14 सितंबर को मनाया जाता है और यह हमारी राष्ट्रीय भाषा की आधिकारिक मान्यता का सूचक है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस साल यह अवसर हिंदी को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है.

साल 2025 में, जब भारत की भाषाई विविधता पर बहस तेज हो रही है, मोदी सरकार ने हिंदी को न केवल राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार बनाया बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय संवाद का सशक्त उपकरण भी बनाया. उनके प्रयासों से हिंदी अब संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्पष्ट रूप से सुनी जा रही है, जो इसे सांस्कृतिक गौरव और वैश्विक पहचान का उदाहरण बनाता है.

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी भाषण

प्रधानमंत्री मोदी ने हिंदी को वैश्विक मंचों पर हिंदी को सम्मान दिलाने के लिए कई महत्वपूर्ण भाषण दिए हैं. 2021 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 76वें सत्र में उन्होंने हिंदी में संबोधित करते हुए कोविड-19, आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों पर भारत की भूमिका बयान की और 'सेवा परमो धर्म' का संदेश भी साझा किया. 

साल 2023 के जी-20 शिखर सम्मेलन में उन्होंने हिंदी में उद्घाटन भाषण देकर 'सबका साथ, सबका विकास' का मंत्र विश्व पटल पर पेश किया. इसके बाद साल 2024 में यूनेस्को के कार्यक्रम में उन्होंने हिंदी कविता और लोककथाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति का परिचय दिया, जिससे हिंदी को कूटनीति और सांस्कृतिक संवाद दोनों में एक प्रभावशाली माध्यम के रूप में मान्यता मिली.

सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रचार


मोदी सरकार ने हिंदी को सरकारी कामकाज की प्रमुख भाषा बनाने पर विशेष जोर दिया है, जिससे प्रशासनिक दक्षता बढ़े और क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान भी कायम रहे. 

गृह मंत्री अमित शाह ने इस साल कहा कि मोदी सरकार ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया है, जो भाषाई विविधता को संरक्षित करता है. नई शिक्षा नीति-2020 के तहत कक्षा 5वीं और 8वीं तक मातृभाषा में शिक्षा को प्रोत्साहन मिला और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में 95% आवेदक अब मातृभाषा में परीक्षा दे रहे हैं. इसके अलावा, सरकार ने राज्यों में हिंदी प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए हैं, जहां सरकारी कर्मचारियों और छात्रों को उच्च स्तर की हिंदी शिक्षा दी जा रही है.

हिंदी शब्दसिंधु की पहल


हिंदी की शब्दावली को आधुनिक और समृद्ध बनाने के लिए मोदी सरकार ने 'हिंदी शब्दसिंधु' परियोजना शुरू की है. यह परियोजना केंद्रीय हिंदी निदेशालय और वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के सहयोग से विकसित की जा रही है. गृह मंत्री अमित शाह ने साल 2024 में 'केंद्रीय हिंदी समिति' की बैठक में घोषणा की कि अगले पांच वर्षों में यह दुनिया का सबसे समृद्ध शब्दकोष बनेगा, जिसमें तकनीकी, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और डिजिटल क्षेत्र के शब्द शामिल होंगे. इस पहल से हिंदी की वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाया जा रहा है, ताकि शोध और नवाचार में भाषा की भूमिका मजबूत हो.

भारतीय भाषा अनुभाग की स्थापना


सरकार ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को सुगम बनाने के लिए जून 2025 में 'भारतीय भाषा अनुभाग' की स्थापना की. इसका उद्घाटन गृह मंत्री अमित शाह ने किया और यह राजभाषा विभाग का हिस्सा बन गया. अनुभाग प्रौद्योगिकी के माध्यम से द्विदिश अनुवाद प्रणाली विकसित करेगा, विशेष रूप से सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कम्प्यूटिंग (C-DAC) के सहयोग से यह संभव होगा. इसका उद्देश्य अंग्रेजी पर निर्भरता कम करना और केंद्र-राज्य समन्वय को बढ़ावा देना है, ताकि सरकारी फाइलें मातृभाषा में आसानी से अनुवादित हों. इस पहल से हिंदी सरकारी और तकनीकी दस्तावेजों में भी प्रभावशाली भाषा बन गई है.

हिंदी की नई पहचान और चुनौतियां


प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों से हिंदी को न केवल भारत में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक सम्मानित और प्रभावशाली भाषा के रूप में स्थापित किया गया है. 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' कार्यक्रम के तहत काशी-तमिल संगम जैसी पहलों ने हिंदी की पहचान को और मजबूत किया है.

साल 2025 में दक्षिणी राज्यों से हिंदी थोपने की आलोचना आई, लेकिन मोदी ने स्पष्ट किया कि भाजपा सभी क्षेत्रीय भाषाओं का समान सम्मान करती है. कुल मिलाकर, हिंदी अब भारतीय संस्कृति और विविधता की पहचान बन चुकी है.

Monday, September 8, 2025

हिंदी दिवस पर बॉलीवुड के तीन खान: हिंदी की वैश्विक पहचान

हिंदी दिवस पर बॉलीवुड के तीन खान: हिंदी को दी पहचान

सलमान, शाहरुख और आमिर ने तीन दशकों में हिंदी को और भी समृद्ध किया है. सफल करियर के अंतिम पड़ाव पर उनकी हालिया फिल्मों ने भी भाषा और संस्कृति में उनकी हिस्सेदारी को और मजबूत किया है.

बॉलीवुड है हिंदी को वायरल करने का अड्डा

हिंदी दिवस के मौके पर यह याद करना जरूरी है कि बॉलीवुड ने हिंदी को सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रखा. बॉलीवुड में खानों की सुपरहिट तिकड़ी की बात करें तो सलमान खान, शाहरुख खान और आमिर खान की फिल्मों ने हिंदी को भारत के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी लोकप्रिय बनाया है, इनकी फिल्मों के लोकप्रिय संवादों ने हिंदी भाषा को गैर-हिंदी भाषी दर्शकों तक पहुँचाया.

आज ये तीनों सितारे अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर हैं, फिर भी उनकी हालिया हिट फिल्में टाइगर 3, जवान और लाल सिंह चड्ढा भाषा की पहचान को दुनिया भर में फैला रही हैं.

हालिया फिल्मों ने कैसे हिंदी को समृद्ध किया

सलमान खान की 'टाइगर 3' में संवाद 'इंश्योरेंस के लिए ही है, देनी नही लेनी है, अपने लिए' फिल्म के बाद से दर्शकों की जुबान पर इंश्योरेंस लेते आ ही जाता है. फिल्म के दृश्यों और संवादों ने हिंदी को समृद्ध करने के साथ देशभक्ति की भावना को भी जीवंत किया. यूट्यूब पर इनके शॉर्ट्स की भरमार है.

शाहरुख खान की 'जवान' ने हिंदी भाषियों की आम बोलचाल की भाषा में कई पंक्तियों को जोड़ा, फिल्म के प्रिव्यू में बोले गए इस संवाद ने ही लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे और लोगों ने 'मैं कौन हूं, कौन नहीं, पता नहीं. मां को किया वादा हूं, या अधूरा एक इरादा हूं. मैं अच्छा हूं या बुरा हूं. पुण्य हूं या पाप हूं. ये खुद से पूछना. क्योंकि मैं भी आप हूं. रेडी..' संवाद के रील्स, शॉर्ट्स बनाकर अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर खूब डाले थे, जो अब तक जारी हैं. फिल्म का यह संवाद सामान्य और नई वाली हिंदी का मिश्रण है.

आमिर खान की 'लाल सिंह चड्ढा' ने इंसानी भावनाओं, रिश्तों को सरल शब्दों में व्यक्त किया और कहा कि 'तुम जैसे कमअक्ल, बेवकूफ इंसान को मेडल दिया तुम्हारी सरकार ने' यह संवाद भ्रष्ट व्यवस्था, गलत चयन और व्यक्तिगत अपमान को उजागर करता है

खान तिकड़ी की पुरानी हिट फिल्मों का योगदान, सबसे पहले बात शाहरुख की

इक्कीसवीं सदी में शाहरुख खान की मोहब्बतें, सलमान खान की तेरे नाम और आमिर खान की थ्री इडियट्स ने इन सितारों का सफल करियर बीसवीं सदी के बाद भी जारी रखा. इन फिल्मों ने हिंदी को भावनात्मक और सांस्कृतिक धागे के रूप में दुनिया भर में फैलाया.

साल 2000 में आई शाहरुख खान की मोहब्बतें ने यह दिखाया कि हिंदी रोमांस की सबसे मधुर भाषा है. अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान जैसे सितारों के संवादों ने दर्शकों को यह एहसास कराया कि परंपरा और आधुनिकता दोनों को जोड़ने का काम हिंदी ही कर सकती है. 'प्रेम का मतलब केवल मिलना नहीं, बिछड़ना भी होता है' जैसे संवाद और 'हमको हमी से चुरा लो' जैसे गीत आज भी शादियों और समारोहों की शान हैं. इस फिल्म ने युवाओं को न सिर्फ प्यार का अर्थ समझाया, बल्कि हिंदी को जीवन का हिस्सा बनाए रखने की प्रेरणा भी दी.

शाहरुख का संवाद 'मैंने उससे मोहब्बत करने से पहले ये शर्त तो नही रखी थी कि वो मुझसे ज्यादा जिएगी, मोहब्बत में शर्त ही नही होती' फिल्म रिलीज होने के पच्चीस साल बाद, आज भी यूट्यूब पर अपलोड किया जा रहा है और लोग उसे देख भी रहे हैं.

तेरे नाम का कमाल

साल 2003 में रिलीज हुई सलमान खान की तेरे नाम ने हिंदी को दर्द और प्रेम की गहराई से जोड़ा. फिल्म के संवाद और गीत इतने लोकप्रिय हुए कि छोटे कस्बों और कॉलेजों में युवाओं की जुबान पर बस गए. 'तेरे नाम हमने किया है' सिर्फ एक गीत नहीं रहा, बल्कि प्रेम का पर्याय बन गया. इस फिल्म ने यह साबित किया कि हिंदी के सरल शब्द भी गहरी भावनाओं को व्यक्त करने का सामर्थ्य रखते हैं. 

'देख एक ही बार बोलूंगा ध्यान से सुनना मेरा उसका चल रहा है' सलमान खान ने रवि किशन को जब यह संवाद बोला तो न जाने कितने युवाओं ने इसका अनुसरण किया.
तेरे नाम रिलीज हुए बीस साल से ज्यादा हो गए पर अभी भी इस फिल्म से सलमान के 'क्या करता हूं यार भुलाने की कोशिश करता हूं भूला ही नही पाता' संवाद जैसे संवादों के वीडियो यूट्यूब शॉर्ट्स पर अपलोड किए जा रहे हैं और लोग उन्हें देखते ही जा रहे हैं.

आमिर खान और ‘थ्री इडियट्स’ की हिंदी

2009 में आमिर खान अभिनीत 'थ्री इडियट्स' ने शिक्षा व्यवस्था की खामियों पर चोट करते हुए हिंदी संवादों से युवाओं को नई सोच दी. 'काबिल बनो, कामयाबी झक मारकर पीछे आएगी' जैसे वाक्यांश युवाओं के लिए जीवन-मंत्र बन गए. वहीं 'आल इज वेल' जैसा सरल संवाद हौसले और उम्मीद की पहचान बन गया. इस फिल्म ने यह संदेश दिया कि हिंदी न सिर्फ मनोरंजन की भाषा है, बल्कि प्रेरणा और बदलाव की भाषा भी है.

'दोस्त फेल हो जाए तो दुख होता है लेकिन दोस्त फर्स्ट आ जाए तो ज्यादा दुख होता है' संवाद कॉलेज छात्रों के बीच में लोकप्रिय हुआ और कह सकते हैं कि इसके जरिए हिंदी भी ज्यादा समृद्ध हुई है.

'किसी महापुरुष ने कहा है कि कामयाब होने के लिए नही काबिल होने के लिए पढ़ों, सक्सेस के पीछे नही भागो, एक्सीलेंस का पीछा करो, सक्सेस झक मारकर तुम्हारे पीछे आएगी' आमिर द्वारा बोला गया यह संवाद हिंदी के लिए वो गिफ्ट रहा जिसने 'सक्सेस', 'एक्सीलेंस' जैसे अंग्रेज़ी शब्दों को भी हमेशा के लिए हिंदी का बना दिया

Friday, September 5, 2025

रवि चोपड़ा

*उत्तराखंड की बढ़ती आपदाएं और ऑल वेदर रोड: अब आगे क्या का जवाब देते रवि चोपड़ा*

*देवदार के पेड़ यदि लगाए जाते हैं, तो भूस्खलन कम होता है क्योंकि उनकी जड़ें गहरी होती हैं और बड़ी चट्टानों को रोकती हैं.*

*उत्तराखंड में आपदाओं का बढ़ता खतरा*

उत्तराखंड पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में बार-बार आ रहा है और इस साल तो लगातार आपदा के समाचारों ने हिमालयी राज्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है. उत्तराखंड देेेश के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां के हिमालय ही पूरे देेेश के मौसम की स्थिति तय करते हैं.

धराली में अचानक आई बाढ़ ने 150 से अधिक घरों, दुकानों और मंदिरों को तहस-नहस कर दिया. कई लोग अभी भी लापता हैं. रुद्रप्रयाग में छेनागाड़ गांव पूरी तरह तबाह हो गया और अब केदारनाथ के पीछे पहाड़ी से टूट रहे ग्लेशियर को सही संकेत नही बताया जा रहा है.

*ऑल वेदर रोड परियोजना पर उठते सवाल*

इन आपदाओं की एक गहन वजह के रूप में ऑल वेदर रोड परियोजना पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं. यह परियोजना उत्तराखंड के चार धामों, केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री तक वर्षभर सड़क सुगम पहुंच बनाने के लिए शुरू की गई थी. हिमालय की संवेदनशील ढलानों पर इस तरह के बड़े निर्माण कार्य से भूस्खलन और ढलान अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है. सड़क में कई जगहों पर लगातार भारी भूस्खलन हो रहा है और लगातार यह मार्ग कहीं न कहीं अवरुद्ध रहा है.

*ऑल वेदर रोड कमेटी और रवि चोपड़ा*

सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में इस परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को मॉनिटर करने के लिए 'ऑल वेदर रोड कमेटी' का गठन किया था. इस कमेटी के अध्यक्ष रवि चोपड़ा बनाए गए, वह एक प्रतिष्ठित पर्यावरणविद और हिमालयी पारिस्थितिकी विशेषज्ञ हैं और साथ में उत्तराखंड स्थित 'पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट' के निदेशक भी हैं.

रवि चोपड़ा की कमेटी ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि सड़क चौड़ीकरण से पहाड़ी ढलानों पर अस्थिरता बढ़ सकती है और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है. 

फरवरी 2022 में रवि चोपड़ा ने कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. उनका कहना था कि परियोजना की तीव्र गति के चलते उनकी सिफारिशों को नजरअंदाज किया गया.

*इस साल जो कुछ भी हुआ सो हुआ लेकिन आगे क्या!*

देहरादून की दून लाइब्रेरी में एक रवि चोपड़ा से एक कार्यक्रम के दौरान मुलाकात हुई. जब हॉल में लगभग सभी लोगों ने चाय और नमकीन के डिस्पोजलों को टेबल में ही छोड़ दिया था तो उन्हें डस्टबिन तक एक पर्यावरणविद ही पहुंचा सकता है. यह करते देख मैंने उनसे इस समय उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ा प्रश्न किया.

इस साल जो कुछ भी हुआ सो हुआ लेकिन आगे क्या? ऑल वेदर रोड को 5.5 मीटर करने की आपकी सिफारिश को दरकिनार कर उसे 10 मीटर किया गया, इससे पर्यावरण को रहे इस नुकसान को अब आगे कम कैसे किया जा सकता है!

रवि चोपड़ा कहते हैं देखिए वो हमारी राय नहीं थी कि आप साढ़े पांच मीटर चौड़ी सड़क बनाएं. सड़क परिवहन मंत्रालय की अपनी Planning Division है. उनकी Planning Division ने साल 2018 में पिछले पांच वर्षों का विश्लेषण करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि पहाड़ों में दस मीटर चौड़ी सड़क उपयुक्त नहीं है. इसके कारण बहुत नुकसान हुआ है. जंगल कटे हैं, ढलान कमजोर हुई, कई भूस्खलन हुए और लोगों की जान गई. इसलिए पहाड़ों में कम चौड़ाई वाली सड़कें बनानी चाहिए. मतलब वो तो उनके विशेषज्ञ थे और उन्होंने पांच साल के अध्ययन का विश्लेषण किया तो इसलिए अगर उसको अहमियत नहीं देंगे, तो सवाल उठता है कि क्यों? उन्होंने अपनी पूरी जानकारी और रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया, न कमेटी को बताया, न किसी को, न NGT को. अब हम देख रहे हैं कि लगातार घटनाएं हो रही हैं.

इन्हें रोकना है तो सबसे पहले, हमें अपने जंगलों को सुरक्षित करना है, उन्हें फैलाना और संरक्षित करना हमारी पहली जिम्मेदारी है. दूसरी जिम्मेदारी यह है कि हम प्रकृति के नियमों का उल्लंघन न करें. प्रकृति की सीमाएं बाध्य हैं और हमने उन्हें काफी हद तक समझा है. उदाहरण के तौर पर 'इंडियन रोड कांग्रेस' का मानना है कि तीस डिग्री ढाल से ज्यादा सड़क काटना नहीं चाहिए. अगर हम सत्तर डिग्री ढाल काट रहे हैं, तो इसका पालन करना चाहिए. 
इंडिया रोड्स कांग्रेस (Indian Roads Congress, IRC) भारत का मुख्य पेशेवर संस्थान है जो सड़क और हाइवे निर्माण, डिजाइन, रखरखाव और सड़क परिवहन से जुड़ी तकनीकी मानकों और दिशानिर्देशों को निर्धारित करता है. इसे 1934 में स्थापित किया गया था और इसका मुख्य उद्देश्य भारत में सड़क निर्माण की गुणवत्ता, सुरक्षा और दक्षता सुनिश्चित करना है.

रवि चोपड़ा ने आगे कहा कि साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट में hearing हुई थी. जस्टिस नरीमन ने आदेश दिया कि अब सभी सड़कें 5.5 मीटर होंगी और जहां 10 मीटर से ज्यादा हो गई हैं, वहाँ सुरक्षा दीवारें बनानी होंगी.
 हाल ही में भूवैज्ञानिक डॉक्टर नवीन जुयाल और डॉक्टर हेमंत ध्यानी ने पूरे भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन का अध्ययन करके हर किलोमीटर की रिपोर्ट तैयार की है और शायद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भेजी भी है. विशेषज्ञों ने रिपोर्ट दी है, उस पर काम करना या नहीं करना, आपका अधिकार है. लेकिन हम कहेंगे कि आपको करना चाहिए.

*जनता भी अब जागरूक होने लगी है*

रवि चोपड़ा कहते हैं अब पहली बार लग रहा है कि लोग अपने हिमालय को लेकर जागरूक हो रहे हैं.
धराली के पीछे देवदार का जंगल है. पहले स्थानीय लोग कहते थे कि सड़क निकल जाए तो ठीक है, लेकिन अब कई लोग चाहते हैं कि जंगल बचा रहे. देवदार के पेड़ यदि लगाए जाते हैं, तो भूस्खलन कम होता है क्योंकि उनकी जड़ें गहरी होती हैं. इससे यह पेड़ बड़ी चट्टानों को रोकते हैं. हमारे पास कई चित्र भी हैं, जहां बड़ी चट्टानें इन पेड़ों के पीछे रुकी हुई हैं.

Thursday, September 4, 2025

*शिक्षक दिवस: गांव के बच्चों को मिला डिजिटल गुरु, इंसानी शिक्षकों की भूमिका पर नई बहस*

इस Teachers Day पर एआई आधारित शिक्षा चर्चा में है. MindCraft प्लेटफार्म ने मध्य प्रदेश के छात्र रवि की पढ़ाई बदलकर उसकी राह आसान बनाई. वहीं, आईआईटी बॉम्बे का रोबोट ‘शालू’ और सीबीएसई का एआई पाठ्यक्रम भविष्य की झलक दिखाते हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि एआई शिक्षकों की जगह नहीं लेगा, बल्कि उन्हें सहारा देकर छात्रों को बराबरी का अवसर देगा.

*क्या है शिक्षक दिवस का बैकग्राउंड*

हर साल 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस मनाया जाता है. यह दिन देश के दूसरे राष्ट्रपति और शिक्षक डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती से जुड़ा है. भारत के पूर्व राष्ट्रपति से जब उनके शिष्यों और दोस्तों ने उनका जन्मदिन मनाने की बात कही तो उन्होंने सुझाव दिया कि अगर उन्हें सम्मान देना है तो इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए. तब से यह दिन शिक्षकों और शिक्षा के महत्व को हमारे सामने लाता है.

*MindCraft: गांवों के लिए एआई क्लासरूम*

MindCraft: Revolutionizing Education through AI Powered Personalized Learning and Mentorship for Rural India शीर्षक वाले रिसर्च पेपर में एआई को ग्रामीण शिक्षा का अहम सहारा बताया गया है. यह प्लेटफार्म छात्रों की क्षमता और कमजोरियों को पहचान कर, व्यक्तिगत रूप से उनके लिए नया सीखने का रास्ता तैयार करता है. गणित या अंग्रेजी में पिछड़ने वाले छात्र को प्लेटफार्म द्वारा उसी स्तर की सामग्री और अभ्यास उपलब्ध कराया जाता है. सामग्री कई स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध है, जिससे भाषा की बाधा कम होती है. इंटरनेट की अनुपलब्धता के बावजूद ऑफलाइन मोड में पढ़ाई जारी रह सकती है.

*रवि का उदाहरण है ai गुरु की सफलता का प्रमाण*

शोधपत्र के अनुसार मध्य प्रदेश के एक छोटे गांव में रहने वाला रवि हमारे लिए ग्रामीण शिक्षा की चुनौतियों का वास्तविक उदाहरण है. उसके स्कूल में सिर्फ दो शिक्षक थे और 150 छात्रों की संख्या में उसे व्यक्तिगत ध्यान मिलना असंभव था. अंग्रेजी में उपलब्ध अधिकांश ऑनलाइन सामग्री उसकी समझ से बाहर थी और गांव में उसके पास कोई करियर मार्गदर्शक उपलब्ध नहीं थी. MindCraft ने रवि की शिक्षा को पूरी तरह बदल दिया. प्लेटफार्म की AI powered प्रणाली ने उसके कमजोर विषयों जैसे गणित और अंग्रेजी की पहचान कर उसके लिए इन विषयों को समझना आसान बनाया. बहुभाषी सामग्री, इंटरैक्टिव क्विज के मार्गदर्शन ने उसे अपनी गति से सीखने का अवसर दिया और इससे रवि का आत्मविश्वास बढ़ा. रवि ने MindCraft से अकादमिक मदद लेने के साथ उसके मेंटरशिप प्रोग्राम के जरिए कोडिंग और करियर विकल्पों की खोज की. उसने पहली बार Python प्रोजेक्ट पूरा किया, यह दिखाता है कि कैसे AI और व्यक्तिगत मेंटरशिप ग्रामीण छात्रों को शहरी बच्चों के बराबर अवसर दे सकते हैं.
छह महीने बाद रवि में बदलाव दिखने शुरू हुए. कक्षा में सक्रिय भागीदारी बढ़ने के साथ उसके परीक्षा में अच्छे अंक आए और उसने अपने लिए सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने का लक्ष्य भी निर्धारित कर लिया है.

*भविष्य के शिक्षक की एक और झलक 'शालू', सीबीएसई भी AI के साथ*

केंद्रीय विद्यालय, आईआईटी बॉम्बे के शिक्षक दिनेश कुंवर पटेल की बनाई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ह्यूमनॉइड रोबोट टीचर 'शालू' भी भविष्य के इन एआई शिक्षकों का उदाहरण है.

शालू 9 भारतीय और 38 विदेशी भाषाएं बोल और समझ सकती है. छात्रों को अच्छी तरह पढ़ाने के अलावा, शालू उनके सवालों के जवाब भी देती है.

वहीं सीबीएसई भी चाहती है कि AI बच्चों के शिक्षण का हिस्सा बने. उनकी वेबसाइट के अनुसार, सीबीएसई का AI पाठ्यक्रम '1M1B' द्वारा प्रबंधित शिक्षक सलाहकारों और 'IBM' के समर्थन से तैयार किया गया है.
सीबीएसई और इसके सहयोगी मिलकर छात्रों को भविष्य के लिए सशक्त बनाने का लक्ष्य रखते हैं. AI को उनकी शिक्षा में शामिल करके, छात्र न केवल AI को समझने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल प्राप्त करते हैं, बल्कि अपनी शिक्षा और भविष्य की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए इसके संभावित उपयोग को भी सीखते है.

*क्या एआई ले लेगा शिक्षक की जगह?*

भविष्य के इन शिक्षकों के बारे में ज्यादा जानने के लिए हमने पेपर के सह लेखक अरिहंत बरडिया से संपर्क किया. उनका कहना है कि एआई कभी भी शिक्षक का विकल्प नहीं बन सकता. अरिहंत कहते हैं शिक्षक केवल किताबों से जुड़ा ज्ञान नहीं देते बल्कि वे बच्चों में जिज्ञासा जगाते हैं, आत्मविश्वास भरते हैं और जीवन के मूल्य सिखाते हैं. यह सब कोई मशीन नहीं कर सकती. अरिहंत ने आगे बताया कि MindCraft का अभी पब्लिक एक्सेस नही हुआ है, रवि पर उन्होंने इसको टेस्ट किया है. AI प्लेटफार्म को इस सोच के साथ बनाया गया है कि यह शिक्षकों का बोझ कम करे.  इससे छात्रों को व्यक्तिगत सामग्री और अभ्यास मिल जाता है, जिससे शिक्षकों के लिए छात्रों के मार्गदर्शन का रास्ता आसान हो जाता है. 

अरिहंत का मानना है कि असली चुनौती अब साधनों की कमी नहीं, बल्कि बराबरी के अवसरों की है. अगर तकनीक इस खाई को पाट सके, तो गांव का बच्चा भी उतनी ही ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है जितनी किसी बड़े शहर का.

Monday, September 1, 2025

हिंदी दिवस: ई-बुक्स का जादू और रॉयल्टी की हकीकत

हिंदी लेखन की दुनिया में डिजिटल क्रांति, लेकिन सवाल वही! लेखक की आमदनी कहां से आए?

हिंदी दिवस में जब हर तरफ भाषा और साहित्य की चर्चा है, तो एक अहम सवाल फिर सामने खड़ा है कि क्या हिंदी में लेखन से आजीविका संभव है? और क्या ई-बुक्स सचमुच लेखकों की आर्थिक स्थिति बदल सकती हैं? 

हिंदी दिवस का उद्देश्य हिंदी भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देना है और इसी संदर्भ में आज हिंदी लेखन की स्थिति और ई-बुक्स जैसे नए माध्यमों की चर्चा भी जरूरी हो जाती है.

प्रिंट बनाम डिजिटल, क्या है रॉयल्टी का गणित

हिंदी लेखक दशकों से इस शिकायत के साथ जी रहे हैं कि लेखन से पेट भरना मुश्किल है. पब्लिश ड्राइव वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार पारंपरिक प्रकाशन में प्रिंट किताबों पर लेखक को औसतन 5 से 15 प्रतिशत तक ही रॉयल्टी मिलती है और अगर किताब हार्डकवर में छपती है तो यह हिस्सा और भी कम हो जाता है.
इसके विपरीत ई-बुक्स में रॉयल्टी का प्रतिशत अपेक्षाकृत बेहतर है. कई प्रकाशन 20 से 25 प्रतिशत तक देने का दावा करते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि यहां भी बिक्री और प्रचार का ग्राफ लेखक की अपनी मेहनत पर ही निर्भर करता है.

Amazon KDP और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स

Amazon Kindle Direct Publishing (KDP) ने लेखकों को सीधा पाठकों तक पहुंचने का मौका दिया. KDP Select प्रोग्राम में शामिल ई-बुक्स (₹99–₹449 मूल्य वाली) पर लेखक को 70 प्रतिशत तक रॉयल्टी मिल सकती है लेकिन इसमें प्रति एमबी करीब ₹7 का डिलीवरी शुल्क कटता है.
पब्लिश ड्राइव के अनुसार यदि किताब Select प्रोग्राम में नहीं है तो रॉयल्टी सिर्फ 35 प्रतिशत तक ही सीमित रहती है. इसी तरह Apple Books, Google Play Books और Kobo जैसे प्लेटफॉर्म भी लगभग 70 प्रतिशत रॉयल्टी का दावा करते हैं, लेकिन यहाँ भी कीमत तय करने और मार्केटिंग की जिम्मेदारी लेखक की ही होती है.

अनुराग शर्मा का ई-बुक्स के प्रयोग और आधी सदी का किस्सा

प्रवासी हिंदी लेखक अनुराग शर्मा ने हिंदी ई-बुक्स का नया प्रयोग चुनते हुए अपनी किताब 'आधी सदी का किस्सा' ई बुक के रूप में पब्लिश की और यह Amazon Kindle सहित कई डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर प्रकाशित हुई.
इस किताब ने न सिर्फ़ नए पाठकों तक पहुंच बनाई, बल्कि यह भी दिखाया कि हिंदी लेखक पारंपरिक प्रकाशन की चौखट पर निर्भर रहने के बजाय डिजिटल स्पेस में अपनी जगह बना सकते हैं. अनुराग शर्मा ने इस विषय पर बात करते हुए कहा कि ऑनलाइन पब्लिशिंग किताब को तुरंत कहीं भी पहुंचा सकती है, सारी दुनिया में आपको कोई डाक/कुरियर किसी भी चक्कर में पढ़ने की जरूरत नहीं है. इधर बंदे ने इच्छा की उधर प्रकाशित हो गई. उधर बंदे ने इच्छा की और पढ़ ली. यह एक बहुत बड़ा फायदा है और किंडल वगैरा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में सबसे बड़ा फायदा ट्रांसपेरेंसी का भी है. आपकी जितनी किताबें बिकती हैं आपके सामने स्टैटिसटिक्स है, नंबर आपको दिख रहा है रिपोर्ट पर. कमीशन जो भी आपको मिलना है वह मिल जाता है हालांकि वह बहुत ही कम है. बहुत बड़ा मार्जिन वह खुद खा जाते हैं और उसके बाद कौड़ियां आपके सामने फेंक देते हैं, अगर कुछ बिका तो. लेकिन फिर भी सुविधा तो है ही न कि आपको किसी पब्लिशर के पास जाने की जरूरत नहीं है और जो सबसे बड़ा लाभ मैं देखता हूं किंडल में वह यह है कि आपकी किताब हमेशा अवेलेबल है. लोग किताबें पैसे दे दे के छपवाते हैं और उसके बाद प्रकाशक 200 कॉपियां, 500 कॉपियां ऑथर को ही बेचकर अपनी दुकान बंद करके चल देते हैं. आगे बाद में आप ढूंढते रहिए, किताब आपको कहीं मिलने वाली नहीं है. ऑथर भी बेचारा कहता है, मेरे पास ही आखिरी कॉपी बची है, यह आपको दे दूंगा तो फिर क्या बचेगा. ऑनलाइन पब्लिशिंग में आप अपने गर्व के साथ ग्रेसफुली जो करना चाहते हैं वह करते हैं.

नवीन जोशी: यथार्थ का आईना

हिंदी में लेखन से आजीविका पर जाने माने पत्रकार और हिंदी लेखक नवीन जोशी कहते हैं कि हिंदी में स्वतंत्र लेखक अपनी आजीविका नहीं चला सकते. पारिश्रमिक की स्थितियां बेहद खराब हैं. मैं भी अगर पत्रकारिता नहीं करता, तो परिवार नहीं पाल सकता था. मेरी पत्नी भी नौकरी करती थी, इसलिए घर चलाने में कभी दिक्कत नहीं हुई.
इसका कारण पूछने पर वे कहते हैं, हिंदी किताबें अधिक नहीं बिकतीं. पांच सौ से एक हजार प्रतियों के संस्करण बिकने पर हिंदी लेखक खुश हो जाते हैं. प्रकाशक लेखकों से सच छुपाते हैं और उन्हें किताबों की बिक्री व आवृत्तियों के बारे में सही विवरण नहीं देते. लेखकों को समय पर रॉयल्टी भी नहीं मिलती. इसके लिए लेखकों को प्रकाशकों को बार-बार चिट्ठी लिखनी पड़ती है.

हिंदी लेखन और ई-बुक्स पर प्रकाशकों का पक्ष

लेखकों को कम रॉयल्टी देने का मामला हर समय उठता रहता है, क्या कारण है कि हिंदी लेखन में यह स्थिति है! प्रश्न के उत्तर में कोतवाल का हुक्का, हैंडल पैंडल, शिक्षा में बदलाव की चुनौतियाँ, किनारे किनारे दरिया, इक्कीसवीं सदी की एक दिलचस्प दौड़ जैसी लोकप्रिय किताबों सहित 52 किताबें प्रकाशित करने वाले काव्यांश प्रकाशन के सम्पादक प्रबोध उनियाल कहते हैं कि दरअसल सारी बात किताब की बिक्री को लेकर है, रहा लेखकों को रॉयल्टी देने का प्रश्न तो यह तो पहले से ही तय होता है.
ईबुक्स के भविष्य पर उन्होंने कहा कि हां प्रकाशकों ने ईबुक्स पर भी प्रयास किए हैं, लेकिन यह देखना अभी बाकी है कि यह कितने सफल होंगे. दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कुल मिलाकर देखें तो हिंदी के पाठक तो कम है ही.

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...