*उत्तराखंड की बढ़ती आपदाएं और ऑल वेदर रोड: अब आगे क्या का जवाब देते रवि चोपड़ा*
*देवदार के पेड़ यदि लगाए जाते हैं, तो भूस्खलन कम होता है क्योंकि उनकी जड़ें गहरी होती हैं और बड़ी चट्टानों को रोकती हैं.*
*उत्तराखंड में आपदाओं का बढ़ता खतरा*
उत्तराखंड पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में बार-बार आ रहा है और इस साल तो लगातार आपदा के समाचारों ने हिमालयी राज्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है. उत्तराखंड देेेश के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां के हिमालय ही पूरे देेेश के मौसम की स्थिति तय करते हैं.
धराली में अचानक आई बाढ़ ने 150 से अधिक घरों, दुकानों और मंदिरों को तहस-नहस कर दिया. कई लोग अभी भी लापता हैं. रुद्रप्रयाग में छेनागाड़ गांव पूरी तरह तबाह हो गया और अब केदारनाथ के पीछे पहाड़ी से टूट रहे ग्लेशियर को सही संकेत नही बताया जा रहा है.
*ऑल वेदर रोड परियोजना पर उठते सवाल*
इन आपदाओं की एक गहन वजह के रूप में ऑल वेदर रोड परियोजना पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं. यह परियोजना उत्तराखंड के चार धामों, केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री तक वर्षभर सड़क सुगम पहुंच बनाने के लिए शुरू की गई थी. हिमालय की संवेदनशील ढलानों पर इस तरह के बड़े निर्माण कार्य से भूस्खलन और ढलान अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है. सड़क में कई जगहों पर लगातार भारी भूस्खलन हो रहा है और लगातार यह मार्ग कहीं न कहीं अवरुद्ध रहा है.
*ऑल वेदर रोड कमेटी और रवि चोपड़ा*
सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में इस परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को मॉनिटर करने के लिए 'ऑल वेदर रोड कमेटी' का गठन किया था. इस कमेटी के अध्यक्ष रवि चोपड़ा बनाए गए, वह एक प्रतिष्ठित पर्यावरणविद और हिमालयी पारिस्थितिकी विशेषज्ञ हैं और साथ में उत्तराखंड स्थित 'पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट' के निदेशक भी हैं.
रवि चोपड़ा की कमेटी ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि सड़क चौड़ीकरण से पहाड़ी ढलानों पर अस्थिरता बढ़ सकती है और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है.
फरवरी 2022 में रवि चोपड़ा ने कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. उनका कहना था कि परियोजना की तीव्र गति के चलते उनकी सिफारिशों को नजरअंदाज किया गया.
*इस साल जो कुछ भी हुआ सो हुआ लेकिन आगे क्या!*
देहरादून की दून लाइब्रेरी में एक रवि चोपड़ा से एक कार्यक्रम के दौरान मुलाकात हुई. जब हॉल में लगभग सभी लोगों ने चाय और नमकीन के डिस्पोजलों को टेबल में ही छोड़ दिया था तो उन्हें डस्टबिन तक एक पर्यावरणविद ही पहुंचा सकता है. यह करते देख मैंने उनसे इस समय उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ा प्रश्न किया.
इस साल जो कुछ भी हुआ सो हुआ लेकिन आगे क्या? ऑल वेदर रोड को 5.5 मीटर करने की आपकी सिफारिश को दरकिनार कर उसे 10 मीटर किया गया, इससे पर्यावरण को रहे इस नुकसान को अब आगे कम कैसे किया जा सकता है!
रवि चोपड़ा कहते हैं देखिए वो हमारी राय नहीं थी कि आप साढ़े पांच मीटर चौड़ी सड़क बनाएं. सड़क परिवहन मंत्रालय की अपनी Planning Division है. उनकी Planning Division ने साल 2018 में पिछले पांच वर्षों का विश्लेषण करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि पहाड़ों में दस मीटर चौड़ी सड़क उपयुक्त नहीं है. इसके कारण बहुत नुकसान हुआ है. जंगल कटे हैं, ढलान कमजोर हुई, कई भूस्खलन हुए और लोगों की जान गई. इसलिए पहाड़ों में कम चौड़ाई वाली सड़कें बनानी चाहिए. मतलब वो तो उनके विशेषज्ञ थे और उन्होंने पांच साल के अध्ययन का विश्लेषण किया तो इसलिए अगर उसको अहमियत नहीं देंगे, तो सवाल उठता है कि क्यों? उन्होंने अपनी पूरी जानकारी और रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया, न कमेटी को बताया, न किसी को, न NGT को. अब हम देख रहे हैं कि लगातार घटनाएं हो रही हैं.
इन्हें रोकना है तो सबसे पहले, हमें अपने जंगलों को सुरक्षित करना है, उन्हें फैलाना और संरक्षित करना हमारी पहली जिम्मेदारी है. दूसरी जिम्मेदारी यह है कि हम प्रकृति के नियमों का उल्लंघन न करें. प्रकृति की सीमाएं बाध्य हैं और हमने उन्हें काफी हद तक समझा है. उदाहरण के तौर पर 'इंडियन रोड कांग्रेस' का मानना है कि तीस डिग्री ढाल से ज्यादा सड़क काटना नहीं चाहिए. अगर हम सत्तर डिग्री ढाल काट रहे हैं, तो इसका पालन करना चाहिए.
इंडिया रोड्स कांग्रेस (Indian Roads Congress, IRC) भारत का मुख्य पेशेवर संस्थान है जो सड़क और हाइवे निर्माण, डिजाइन, रखरखाव और सड़क परिवहन से जुड़ी तकनीकी मानकों और दिशानिर्देशों को निर्धारित करता है. इसे 1934 में स्थापित किया गया था और इसका मुख्य उद्देश्य भारत में सड़क निर्माण की गुणवत्ता, सुरक्षा और दक्षता सुनिश्चित करना है.
रवि चोपड़ा ने आगे कहा कि साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट में hearing हुई थी. जस्टिस नरीमन ने आदेश दिया कि अब सभी सड़कें 5.5 मीटर होंगी और जहां 10 मीटर से ज्यादा हो गई हैं, वहाँ सुरक्षा दीवारें बनानी होंगी.
हाल ही में भूवैज्ञानिक डॉक्टर नवीन जुयाल और डॉक्टर हेमंत ध्यानी ने पूरे भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन का अध्ययन करके हर किलोमीटर की रिपोर्ट तैयार की है और शायद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भेजी भी है. विशेषज्ञों ने रिपोर्ट दी है, उस पर काम करना या नहीं करना, आपका अधिकार है. लेकिन हम कहेंगे कि आपको करना चाहिए.
*जनता भी अब जागरूक होने लगी है*
रवि चोपड़ा कहते हैं अब पहली बार लग रहा है कि लोग अपने हिमालय को लेकर जागरूक हो रहे हैं.
धराली के पीछे देवदार का जंगल है. पहले स्थानीय लोग कहते थे कि सड़क निकल जाए तो ठीक है, लेकिन अब कई लोग चाहते हैं कि जंगल बचा रहे. देवदार के पेड़ यदि लगाए जाते हैं, तो भूस्खलन कम होता है क्योंकि उनकी जड़ें गहरी होती हैं. इससे यह पेड़ बड़ी चट्टानों को रोकते हैं. हमारे पास कई चित्र भी हैं, जहां बड़ी चट्टानें इन पेड़ों के पीछे रुकी हुई हैं.
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