Monday, January 30, 2023

गांधी वध अब भी जारी है, आगे कैसे बढ़ेंगे!

30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी. 
 बाद में महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे को 15 नवंबर 1949 के दिन नारायण आप्टे के साथ फांसी दे दी गई थी. 
महात्मा गांधी के हत्या के कारणों की पड़ताल करें तो पता चलता है कि महात्मा गांधी एक ऐसे भारत की कल्पना करते थे जो समावेशी हो, जहाँ विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग बिना किसी भेदभाव के रहें. अपनी इसी कल्पना की वजह से वह हिन्दू राष्ट्रवादी रथ-यात्रा चलाने वालों के लिए सबसे बड़ी रुकावट बन थे और उनकी हत्या कर दी गई. उनकी हत्या करने वालों को यह उम्मीद थी कि गांधी के चले जाने के बाद उनका हिन्दू राष्ट्र का सपना पूरा हो जाएगा पर गांधी के विचार अब इस राष्ट्र के विचार बन गए थे और गांधी की शवयात्रा में शामिल लाखों लोग इसकी गवाही दे रहे थे.

एक हत्यारे की प्रशंसा अब भी जारी है.

आज सालों बाद भी गांधी वध यानी उनके विचारों को खत्म करने के प्रयास जारी हैं. पिछले साल महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के शारदा रोड स्थित अखिल भारत हिंदू महासभा के कार्यालय में न सिर्फ गांधी के राष्ट्रपिता होने पर सवाल उठाया गया था, बल्कि गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का गुणगान करते हुए 30 जनवरी का दिन शौर्य दिवस के रूप में मनाया गया था.

देश की अखंडता में एकता को तोड़ने के लिए समय-समय पर हिन्दू-मुस्लिमों के बीच टकराव करवाया जाता रहा है और इसके लिए किसी विशेष धर्म का राष्ट्र बनवाए जाने की बात कही जाती है. 
हाल ही में बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर, धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का नारा 'तुम हमारा साथ दो, हम हिंदू राष्ट्र बनाएंगे' खूब चर्चा में रहा था.

हिन्दू मुस्लिम लड़ाई में फंसता आम नागरिक.

आजादी के बाद हिन्दू मुस्लिमों के बीच की दूरी ने देश को कई जख्म दिए हैं. 1989 में हुए भागलपुर दंगों में दो से तीन हजार लोग मारे गए, जिसमें हिन्दू मुस्लिम दोनों शामिल थे. 2002 में हुए गुजरात दंगे, 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे और 2020 में हुए दिल्ली दंगे, आज भी अपने गुनहगारों को तलाश रहे हैं.


इस लड़ाई का कोई अंत नही है, इसका अंकित शिकार है तो वारिस भी इसका शिकार है. बस इन सब की वजह से विकास हमसे कहीं दूर हो गया है.


अपनी गलतियों को छिपाने के लिए किसी एक धर्म को किस प्रकार निशाना बनाया जाता है यह हम कोरोना काल में तब्लीगी जमात के उदाहरण से देख ही चुके हैं.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने तब्लीगी जमात को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते कहा था कि दिल्ली स्थित तब्लीगी जमात मरकज में शामिल होने वाले म्यांमार के नागरिकों का एक समूह कोरोना के प्रसार के लिए जिम्मेदार नही था. महामारी या विपत्ति के दौरान एक राजनीतिक सरकार बलि का बकरा खोजने की कोशिश करती है और हालात बताते हैं कि इस बात की संभावना है कि इन विदेशियों को बलि का बकरा बनाने के लिए चुना गया था.
तब्लीगी जमात पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका पर भी कोर्ट ने सवाल उठाए थे, जिसका नतीजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ा था. हल्द्वानी में फल के ठेले वाले पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा फैलाई गई नफरत का निकलना इसी का परिणाम था. इस घटना के बाद हम कई दुकानों को धर्म के नाम से देखने लगे हैं.


महात्मा गांधी को तो किताबें प्यारी थी और हमें.

आज सोशल मीडिया हम पर हावी हो गई है और हर उम्र के लोग अपना इतिहास, वर्तमान जानने के लिए इसी सोशल मीडिया पर अधिक निर्भर हो गए हैं. सोशल मीडिया का यह संसार गलत सूचनाओं से भरा पड़ा है पर इस सही गलत को छांटने के लिए अभी तक कोई ठोस तरीका हमारे सामने नही आया है. 
सही जानकारी के लिए इन पर निर्भर न रहकर किताबों पर निर्भर रहना ही सबसे सही तरीका जान पड़ता है. महात्मा गांधी के महात्मा बनने के पीछे भी इन्हीं किताबों का अहम योगदान था.  'अंटू दिस लास्ट' किताब का जिक्र करते हुए एक बार उन्होंने कहा था 'इस किताब ने मेरी अंतरात्मा को ही नहीं बदला, लेकिन बाहरी-जीवन में भी मैंने सकारात्मक परिवर्तन अनुभव किया. सच पूछो तो मेरी तमाम सोच को सर्वहारा या आमजन के प्रति स्थापित करने में 'अंटू दिस लास्ट' का ही कमाल है.'

क्या हम अपना आदर्श चुनने में चूक रहे हैं!

आज के युवा अपने आदर्शों को गलत चुन रहे हैं. ऐसे बहुत कम लोग हैं जो महात्मा गांधी, भगत सिंह, स्वामी विवेकानंद को पढ़ते हों. सोशल मीडिया पर भी किसी लेखक, प्रोफेसर, एक्टिविस्ट या वैज्ञानिक को छोड़कर एक्टर, खिलाड़ी, डांसर या किसी गायक के अधिक फॉलोवर्स दिखते हैं.
कोई लेखक या वैज्ञानिक समाज के लिए कितना भी बड़ा काम कर ले पर उसे वह पहचान नही मिलती जो अश्लीलता फैला रही रील्स से मिल जाती है.

सही मार्ग पर चलने के लिए एक गांधीवादी के सुझाव

विनोबा भावे और सुंदरलाल बहुगुणा से जुड़े गांधीवादी अनिरुद्ध जडेजा देश में हिन्दू मुस्लिमों के बीच बनाई जा रही दूरी के प्रयासों को कम करने के किए कुछ उपायों को सुझाते हैं. 
वह कहते हैं 1984 के गुजरात दंगों के बाद गांधीवादी लोगों द्वारा गुजरात में बहुत से लोगों ने शांति केंद्र चलाए गए थे, उन्हीं में से एक संस्था गुजरात बिरादरी बनाई गई. मैं भी उससे जुड़ा, हम अलग-अलग मौकों पर कौमी एकता का प्रयास करते थे. हम लोग कलेक्टर के साथ किसी विशेष त्यौहार से पहले मीटिंग रखते थे, हम किसी जुलूस में सबसे आगे चलते थे. इसमें हर धर्म के लोग शामिल होते थे, इसी तरह की संस्थाएं बनाई जानी चाहिए. इनमें नौजवानों को शामिल करना जरूरी है क्योंकि अधिकतर टकराव नौजवानों के बीच ही होता है.
अपनी बात आगे बढ़ाते उन्होंने कहा कि स्कूली बच्चों को भी सभी धर्मों के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए, उन्हें बताया जाना चाहिए कि सभी धर्मों में क्या अच्छाई है. कबीर जैसे महापुरुषों द्वारा प्रदान की गई मनुष्यता की शिक्षा इन छात्रों को देना बहुत जरूरी है.

सरकार के कला, शिक्षा जैसे विभागों को भी कौमी एकता की बात करने वाले लोगों के साथ मिलकर काम करना चाहिए. बच्चों के कोर्स में भाईचारे वाली घटनाओं को पढ़ाया जाना चाहिए. हिन्दू मुस्लिम समुदायों ने अपनी जान देकर भी एक दुसरे की मदद की थी, ऐसी घटनाओं को सामने लाना होगा. 
वर्तमान में भी हिन्दू मुस्लिम भाईचारे की घटनाओं को किसी सोशल मीडिया पेज के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए.
अनिरुद्ध के अनुसार सभी धर्मों से जुड़ी किताबों का सार भी बच्चों तक पहुंचाया जाना जरूरी है. इसके लिए छोटी छोटी किताबों को स्कूलों की लाइब्रेरी में रखा जा सकता है.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Saturday, January 21, 2023

कुछ कर गुजरने की चाह है तो 'ऊंचाई' छुई जा सकती है।

ऊंचाई की खास बात यह है कि यह फिल्म बुजुर्गों के जीवन पर केंद्रित है और बुजुर्गों पर भारत में बहुत कम फिल्में देखने को मिलती हैं।

साल 1972 में आई फिल्म 'पिया का घर' के लिए आनन्द बख़्शी ने जब 'ये जीवन है' गीत लिखा होगा तब उन्हें इस बात का बिल्कुल अंदाज नही होगा कि सालों बाद उनके लिखे इस गीत पर एक पूरी फिल्म बन जाएगी और फिल्म के नायक दो सदियों के महानायक अमिताभ बच्चन होंगे।

राजश्री प्रॉडक्शन और पारिवारिक फिल्में।

पारिवारिक फिल्मों को बनाने में महारत हासिल प्राप्त राजश्री प्रॉडक्शन एक बार फिर से सूरज बड़जात्या के निर्देशन में हिंदी सिनेमा के दर्शकों के लिए भारतीय परिवारों में रिश्तों के उतार चढ़ाव से भरी कहानी हमारे सामने लाया है।
निर्देशक ने इस फिल्म में अपने दोस्तों के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा दिखाने के लिए एक यात्रा का सहारा लिया है और उसमें दोस्तों के बीच आपस की बातचीत, प्यारी सी हरकतें ही दोस्ती की निशानी बनती है।
फिल्म की खास बात यह है कि जी 5 ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई यह फिल्म बुजुर्गों के जीवन पर केंद्रित है और बुजुर्गों पर भारत में बहुत कम फिल्में देखने को मिलती हैं।

राजश्री प्रॉडक्शन की फिल्मों में हम बड़े कलाकारों को ही देखते आए हैं और यहां भी अमिताभ बच्चन, अनुपम खेर, बोमन ईरानी, डैनी डेन्जोंगपा, नीना गुप्ता, सारिका जैसे बड़े नाम फिल्म में शामिल हैं।

कैसी है फिल्म की कहानी।

फ़िल्म की कहानी अपने जीवन में व्यस्त चार दोस्तों की है, जो एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचने का प्लान बनाते हैं पर कुछ ऐसा घटित होता है कि उस यात्रा को पूरा करने के लिए सिर्फ तीन दोस्त ही जाते हैं। इस सफर में उनसे नए लोग जुड़ते जाते हैं और आधुनिक रिश्तों की सच्चाई में इन दोस्तों को समझ आती है।

अभिनय सबका शानदार।

अमिताभ बच्चन इस दोस्ती की नींव हैं और उनकी आवाज में पढ़ी कविता 'वो लड़की पहाड़ी' हो या अन्य संवाद सब कुछ शानदार है।
अनुपम खैर ने दोस्तों में उस दोस्त की भूमिका निभाई है जो थोड़ा कम सब्र रखता है और वह अभिनय के मामले में अमिताभ को टक्कर देते रहते हैं।
नीना गुप्ता और बोमन ईरानी फ़िल्म में पति पत्नी हैं और इन दोनों ने पति पत्नी की खटपट, प्यार को स्क्रीन पर पूरी तरह से निभाया है।
सारिका जब फ़िल्म में आती हैं , छा जाती हैं। वह अब भी पहले की तरह ही खूबसूरत हैं।
परिणिति चोपड़ा फ़िल्म में उन लड़कियों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो अपने जीवन को अपने तरीके से आजादी के साथ जीना चाहती हैं। उन्होंने इस किरदार को बखूबी निभाया है।

अमिताभ हों तो दमदार संवाद हैं जरूरी, पढ़ने की खत्म होती संस्कृति पर भी है इशारा।

फ़िल्म में अमिताभ बच्चन हों तो उसका संवादों के मामले में जानदार होना तो बनता ही है और फ़िल्म के संवाद भी उसकी स्टारकास्ट की तरह दमदार ही हैं।
'वैसे आप के लखनऊ के नज़ाकत और नफासत के बारे में तो सुना ही था, आज दीदार हो गए' संवाद, बड़े ही शौक से लिखा जान पड़ता है।
अमिताभ बच्चन के मुंह से हिंदी संवाद निकले तो उन्हें सुनने का आनन्द ही कुछ और होता है, 'शास्त्रों में लिखा है कि हमारे पर्वत हमारे वेदों के प्रतीक हैं' इसका गवाह है।
लेखक बने अमिताभ बच्चन के जरिए फ़िल्म में इन दिनों पढ़ने के संस्कृति पर भी दर्शकों का ध्यान आकृष्ट किया गया है। फिल्म का संवाद 'आजकल के हिंदी किताबें और ज्ञानवर्धक मैगज़ीन कौन पढ़ता है!' इसका उदाहरण है।

सम्पदान पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता थी।

फिल्म के सम्पादन पर ज्यादा ध्यान दिए जाने की आवश्यकता थी क्योंकि फिल्म की लंबाई कभी-कभी बोर करने लगती है। सभी साथियों का नेपाल पहुंचने तक का सफर थोड़ा छोटा किया जा सकता था, एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैकिंग के दौरान नेपाल में मिले ट्रैकिंग के साथियों का फिल्म में कोई काम नही लगता, उनका काम बस मुख्य कलाकारों की तरफ देखना भर है।

फ़िल्म की पटकथा में डैनी के गुजरने वाले पलों को जिस तरह लिखा गया है, वह दर्शकों को भी एक दोस्त के खोने का अहसास याद दिला जाता है। इतने मुश्किल सफर में जाने के बाद भी वहां जरूरी दवाइयों का न लेकर जाना, गले से नीचे नही उतरता।

मिलाजुला रहा गीत संगीत।

फ़िल्म का संगीत अमित त्रिवेदी द्वारा तैयार किया गया है, जो फ़िल्म देखते सकारात्मकता का अहसास कराने में कामयाब हुए है।
'केटी को' गाने के बोल तो प्रभावित नही करते पर उसमें कोरियोग्राफी देखने लायक है।
'अरे ओ अंकल' फ़िल्म की कहानी के हिसाब से ठीक है पर जुबान पर नही चढ़ता।
'सवेरा' गीत सुनने में अच्छा है। 'लड़की पहाड़ी' गाना कहानी पर केंद्रित है और लंबे समय तक याद किए जाने वाला भी बन पड़ा है।

छायांकन फ़िल्म का सबसे शानदार पक्ष।

पहाड़ों पर बनाई जाने वाली फिल्मों के लिए जरुरी है कि उसका छायांकन शानदार हो और फिल्म का पहला दृश्य ही इस मामले में खुद को साबित कर देता है। हुमायूँ का मकबरा की खूबसूरती स्क्रीन पर जस की तस दिखा दी गई है और दोस्तों की यात्रा के दौरान पड़ने वाले हर शहर की रौनक आपको प्रभावित करते जाती है।

महिलाओं के सशक्त चित्रण और बुजुर्गों की बूस्टर डोज के लिए जानी जाएगी यह फिल्म।

फिल्म में ट्रैक की लीडर एक महिला को बनाकर, समाज में सशक्त होती महिलाओं का अक्स दिखाने की कोशिश करी गई है। वहीं फिल्म खुद को बुजुर्ग मान चुके ऐसे लोगों के लिए बूस्टर डोज भी है, जो यह मानते हैं कि उन्हें कुछ भी करने के लिए अब दूसरों पर निर्भर रहना होगा।
 इस फिल्म में बीमारी के बावजूद अमिताभ का अपने दोस्तों के साथ एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचने के लिए रात्रि में बर्फबारी के दौरान चलने के प्रैक्टिस करने वाला दृश्य देखकर ऐसे बुजुर्ग सीख सकते हैं कि अगर उनमें कुछ कर गुजरने की चाह है तो ऊंचाई छुई जा सकती है।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Friday, January 20, 2023

साल 2023 में भी महिलाओं का सिनेमा में पुराना चित्रण जारी है.

कभी कोई फिल्म आपको पसंद ना आए और उसके अंत में  'टू बी कंटिन्यूड' लिखा दिख जाए, तो आप कैसा महसूस करेंगे! यह अहसास आपको गिरीदेव राज की फिल्म 'द वाई' को देखकर महसूस होगा.



होनहार निर्देशक जब भूतहा फिल्मों पर ध्यान लगाएं.

गिरीदेव राज साल 2016 में कन्नड़ फिल्म 'जीरो मेड इन इंडिया' बनाने के लिए जाने जाते हैं, पिता-पुत्र के रिश्तो पर बनाई गई है फिल्म समीक्षकों और दर्शकों को बहुत पसंद आई थी. अब साल 2023 की शुरुआत में गिरीदेव बॉलीवुड के सालों पुराने पिटे हुए भूतहा फॉर्मूले को लेकर अंग्रेजी शीर्षक वाली 'द वाई' फिल्म लेकर हमारे सामने आए हैं.

फिल्म की शुरुआत में एक शादीशुदा जोड़े को हम उनके नए आशियाने में जाते देखते हैं और वहां जाने के बाद उनके साथ असामान्य घटनाएं घटित होनी शुरू होती हैं. इसका हल खोजने के लिए घर में एक मनोचिकित्सक को बुलाया जाता है ,जो इन घटनाओं पर से पर्दा उठाता है.

निर्देशक को एक ठीक- ठाक कहानी तो मिली थी पर वह उसका प्लॉट बेहतर तरीके से तैयार करने में कामयाब नही हो पाए. कलाकारों के पिछले जीवन की घटनाएं हों या वर्तमान में उनके साथ घटित होती घटनाएं, दर्शक इन सब से खुद को जुड़ता महसूस नही करते और फिल्म की कहानी बिखरी हुई सी लगती है।

हावभाव और संवाद अदायगी में पीछे रहते कलाकार.

फिल्म के नायक युवान हरिहरन की बड़ी-बड़ी दाढ़ी मूंछे रखी गई हैं. इसे प्रदर्शित करते निर्देशक शायद यह भूल गए थे कि दक्षिण फिल्मों के कुछ अभिनेता इन बड़ी दाढ़ी मूंछों के साथ अपने अभिनय से भी प्रभावित करते हैं पर युवान के अभिनय से एक डरी हुई पत्नी के पति वाले सारे हावभाव गायब थे.

दीक्षा की बात की जाए तो उनके हिस्से में संवाद बहुत कम आए हैं और बिना संवाद बोले सिर्फ अपनी खूबसूरती से ही कोई भी कलाकार दर्शकों को प्रभावित नही कर सकता.

मनोचिकित्सक बने कमल घिमिरे को हिंदी सिनेमा में बहुत कम देखा गया है और उनके अभिनय में भी अभी बहुत सुधार की आवश्यकता है.

अभिनव किरन ने फिल्म में युवान के दोस्त का किरदार निभाया है और अभिनय के मामले में वह बहुत ही कच्चे साबित हुए हैं.

पटकथा, सम्पादन और छायांकन पर और भी ज्यादा मेहनत की जा सकती थी.

इसकी पटकथा को इतना कमजोर लिख दिया गया है कि ऐसा लगता है कि मानो फिल्म दर्शकों को डराने के लिए सिर्फ एक घड़ी पर निर्भर है. सभी कलाकारों को एक साथ बैठाकर उस घड़ी पर 11:05 बजने का इंतजार किया जाता है. मोबाइल से की हुई बातचीत का बिना स्पीकर ऑन किए दर्शकों को भी सुनाई देना समझ से परे लगता है.

फिल्म के सम्पादन की कमान विनोद बासवराज के हाथों में है और फिल्म की शुरुआत से ही यह लगने लगता है कि आप बहुत से ऐसे दृश्यों को देख रहे हैं, जिन्हें हटाया जा सकता था.

भूतहा फिल्मों में छायांकन बहुत महत्वपूर्ण होता है, अगर यह बेहतरीन हो तो दर्शकों के दिलों की धड़कनों को बढ़ाया जा सकता पर यहां पर फिल्म का छायांकन ज्यादातर समय एक घर को अलग-अलग एंगल से दिखाने तक ही सीमित रहा है और यह प्रयास औसत लगता है. साउंड डिजाइन ही फिल्म की वह हिस्सा है जो इसे देखते हुए थोड़ा बहुत डर सा माहौल बनाने में कामयाबी पाता दिखता है.

फिल्म की असफलता का सबसे बड़ा कारण इसके बेअसर संवाद.

'द वाई' के दर्शकों के दिलों तक न पहुंचने के सबसे बड़े कारणों में इसके संवादों का बेअसर होना है. जैसे इसमें अभिनव किरन कहते हैं 'अरे बाप रे आप बबबभूत देखने के लिए बैठे हैं. भूत क्या कोई गर्लफ्रेंड होती है कि उसे देखने के लिए तड़पे जा रहे हैं. मुझे तो सोचकर भी पैंट गीली हो जाती है'.

साल 2023 में भी महिलाओं का सिनेमा में पुराना चित्रण जारी है.

फिल्म का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि इसमें बिना शादी के माता-पिता बने जोड़ों और उनके बच्चों के बारे में दिखाया गया है. भारतीय समाज में इस तरह के बच्चों को अब भी सही नजरों से नही देखा जाता और द वाई में इस विषय को दिखाया जाना, सिनेमा के वास्तविक उद्देश्यों को पूरा करता है.

 हालांकि महिलाओं के हिंदी सिनेमा में चित्रण पर साल 2023 में भी कोई फर्क नही आया है. यहां नायिका अब भी अपने पति के लिए खाना बनाने भर की भूमिका तक ही सिमटी हुई दिखती है और उसका पति ऑफिस जाता है, घर चलाता है. 
यह सब कुछ कभी बदला भी जा सकता है, जहां पर नायक घर का काम करता दिखे और वह किसी डर का शिकार हो. वहीं फिल्म की नायिका रोजगार करते हुए अपने पुरुष साथी का ध्यान रखे और उसे उसकी परेशानी से बाहर निकाले.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Wednesday, January 18, 2023

हिंसा पर अहिंसा और प्रेम की जीत दिलवाता ये लकड़बग्घा.

शुक्र है बायकॉट बॉलीवुड के महाट्रेंड वाले दिनों में भी हिंदी फिल्मों ने आना बंद नही किया है और साल 2023 की शुरुआत में ही बॉयकॉट को खाने बॉलीवुड ने लकड़बग्घा छोड़ दिया है.
जानवरों के प्रति अत्याचार न करने का संदेश देती फिल्म 'लकड़बग्घा' तलाक जैसे गम्भीर विषय पर भी अपना पक्ष रखती है. फिल्म के कलाकारों ने इस फिल्म के जरिए दर्शकों के दिलों में जगह बनाने में कामयाबी पाई है. संवादों और तकनीकी  पक्ष को देखें तो फिल्म को औसत कहा जा सकता है.

सुलझी हुई कहानी.

'बब्बर का तब्बर' के निर्देशक विक्टर मुखर्जी अपनी पुरानी टीम के कुछ सदस्यों के साथ अब 'लकड़बग्घा' को हमारे सामने लाए हैं. लकड़बग्घा की कहानी 'बब्बर का तब्बर' के लेखक आलोक शर्मा द्वारा लिखी गई है, जिसमें अर्जुन बख्शी नाम का युवा जानवरों से प्रेम करता है. जानवरों पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ लड़ते हुए वह भी उनके जाल में फंसते चला जाता है, इन सब के बीच उसे अपना प्यार भी मिलता है.

बोर नही करती लकड़बग्घा.

फिल्म शुरुआत से ही दर्शकों को एक्शन दृश्यों से प्रभावित करती है और इसकी कहानी तेजी से आगे बढ़ते दर्शकों को बिल्कुल बोर नही करती है.
फिल्म का साउंड डिजाइन भी दर्शकों को रोमांचित रखने में अहम भूमिका निभाता है.

निर्देशक विक्टर मुखर्जी ने मांसाहार पर अपनी बात रखते हुए शांति, अहिंसा और प्रेम की प्रतीक इस कहानी को दर्शकों के दिल पर उतारने में कोई कसर नही छोड़ी है. उनका एक्शन हीरो सीधे आम दर्शकों से जुड़ते हुए तीन सौ रुपए के 'यूनीस्टार' ब्रांड के जूते पहनता है. वह बड़े ही शालीन तरीके से अपनी 'डेट' के साथ डिनर करता है.

अंशुमन झा और रिद्धि डोगरा एक साथ अच्छे लगते हैं.

फिल्म की कास्टिंग पर ज्यादा मेहनत की जरूरत नही थी. मुख्य रूप से तीन किरदारों के इर्द गिर्द सिमटी इस कहानी के लिए तीनों चेहरे सही चुने गए हैं.

रंगमंच से निकले हुए अंशुमन झा साल 2010 में आई फिल्म 'लव सेक्स और धोखा' से हिंदी सिनेमा के दर्शकों की नजरों में आए थे. लकड़बग्घा से पहले वह विक्टर मुखर्जी के साथ 'बब्बर का तब्बर' में भी काम कर चुके हैं. लकड़बग्घा में अंशुमन को खुद में सिमटा हुआ और पशु प्रेमी लगना था और उन्होंने अपने किरदार को पूरी शिद्दत से निभाया है. रिद्धि डोगरा के साथ उनकी कैमिस्ट्री कमाल की लगी है.

रिद्धि डोगरा 'पिचर्स' के लिए युवाओं के दिलों में जगह रखती हैं, लकड़बग्घा में एक पुलिस अफसर के रूप में वह जमती हैं. रिद्धि इस फिल्म में खूबसूरत तो लगी ही हैं साथ में उनके एक्शन सीन भी देखने लायक है.

परेश पाहुजा ने नकारात्मक किरदार में अपनी तरफ से पूरी जान लगाई है पर संवाद अदाएगी में उन्हें अभी काफी मेहनत करनी होगी.
मिलिंद सोमन का फिल्म में छोटा सा किरदार है पर वह अभी भी स्क्रीन पर तरोताजा दिखते हैं.

अंग्रेजी संवादों ने मजा किरकिरा किया पर तलाक पर जबरदस्त संवाद.

फिल्म की पटकथा में कोलकाता बैकग्राउंड का ध्यान तो विशेष रूप से रखा गया है पर कहीं कहीं अंग्रेजी संवादों की अधिकता अखरती है.

 'ये सब हॉलीवुड पिक्चर देखके कोलकाता का बच्चा लोग खराब हो रहा है, अपने आप को सुपरहीरो समझ रहा है' सुनकर युवाओं को अपनी याद आती है तो 'एक बार तो ट्राई करूँगा, ट्राई नही करूँगा तो ऐसे गलत रूल्स चेंज कैसे होंगे' संवाद कुछ हटकर करने की हिम्मत देता है.

तलाक को लेकर रिद्धि डोगरा का बोला संवाद अपने शादीशुदा रिश्तों को लेकर अवसाद में जी रही लाखों महिलाओं को एक नई राह दिखता है. वह कहती हैं 'डिवोर्स होना कोई बड़ी बात थोड़ी है. एक शादी में पूरी जिंदगी रहना जिसमें तुम्हारा सांस घुटता हो वो ट्रैजिक होता है.
 उसके लिए सॉरी बोलना चाहिए. लोगों को हार्ट अटैक होता है, उसके लिए सॉरी बोलना चाहिए.
दिस इज नॉट समथिंग टू बी सॉरी अबाउट'.

फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर के जरिए दर्शकों के अंदर जानवरों के प्रति दयाभाव भी उमड़ता है.
फिल्म के छायांकन और वीएफएक्स को औसत कहा जा सकता है. अंधेरी गलियों के दृश्य शानदार थे तो लकड़बग्घा वाले दृश्यों को और भी ज्यादा खतरनाक बनाया जा सकता था.

हिंदी फिल्मों में कब तक महिलाएं पुरुषों की सेवा करती दिखेंगी!

लकड़बग्घा में परेश पाहुजा की पार्टनर उसकी शेविंग करती है. सवाल यह है कि अधिकतर हिंदी फिल्मों में क्यों पुरूष किरदारों की पार्टनर ही उनकी शेव करती और उनके लिए खाना बनाती दिखती हैं. आशिकी 2 में भी शेविंग से जुड़ा ही कुछ इस तरीके का दृश्य हमारे सामने आता है.
प्यार और अधिकार की ये पतली लकीर है पर अधिकार का ये तराजू पुरुषों की तरफ ज्यादा झुका दिखता है.
क्या कभी हिंदी फिल्म मेकर और हिंदी फिल्मों के दर्शक, किसी पुरुष किरदार द्वारा महिलाओं की सर मालिश या पैर दबाना जैसे दृश्यों को स्वीकार करेंगे!

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Saturday, January 14, 2023

पढ़ने की संस्कृति के खत्म होते इस दौर में एक लेखक की जीवन यात्रा।

लेखक नवीन जोशी के जीवन की कहानी शेखर जोशी के जीवन से मिलती जुलती है।
दिवंगत शेखर जोशी पलायन कर सालों पहले उत्तर प्रदेश के पहाड़ों (अब उत्तराखंड के पहाड़ों) से मैदानी राज्य राजस्थान पहुंच कर लेखक बने थे तो वैसे ही नवीन जोशी भी पहाड़ों से लखनऊ पहुंचे थे। नवीन जोशी में अपने गांव छूटने का दर्द हमेशा जिंदा रहा और उसी दर्द ने उन्हें लेखक बना दिया।
पढ़ने की संस्कृति खत्म हो रही है और इस दौर में एक लेखक के बनने की यात्रा के साथ वर्तमान समय में लेखकों के सामने खड़ी नई चुनौतियों के बारे में पढ़ना और भी जरूरी बन जाता है।

लेखक नवीन जोशी हिंदी साहित्य जगत का परिचित नाम हैं। अखबारों में लिखते हुए साहित्य रचना शुरू करने वाले नवीन जोशी आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान, राजेश्वर प्रसाद सिंह कथा सम्मान, गिर्दा स्मृति सम्मान समेत कुछ अन्य सम्मानों से समादृत हैं।

 उत्तराखंड में गणाई-गंगोली के रैंतोली गांव के मूल निवासी नवीन जोशी से उनके अंदर के लेखक की कहानी पूछने पर वे अपने बचपन को याद करते हैं- गांव से प्राथमिक विद्यालय दूर था जिस कारण वह विद्यालय नहीं भेजे गए।

लखनऊ में काम करने वाले उनके पिताजी पढ़ाने के लिए छह-सात साल की उम्र में उन्हें अपने साथ ले गए।

उनकी मां गांव में ही थी। नवीन जोशी कहते हैं कि तब ऐसा ही होता था, घर के पुरूष पढ़ाई और रोज़गार के लिए घर से दूर चले जाते थे और महिलाएं गांव-घर सम्भालती घर पर ही रहती थीं।

 गांव की याद से लिखना शुरू हुआ।

 नवीन जोशी ने कक्षा तीन से लखनऊ में अपनी पढ़ाई की शुरुआत करी, जहां उन्हें अपने गांव की बहुत याद आती थी। पिता दिन में अपनी नौकरी पर निकल जाते थे तो वह घर में अकेले रह जाते। नवीन बताते हैं- तब मैं रोते हुए मां को और अपने गांव के बिछड़े दोस्तों को चिट्ठी लिखता था। उन्होंने एक डायरी में भी पहाड़ की यादों को लिखना शुरू कर दिया था, इसी से उनका लिखने का सिलसिला शुरू हुआ।


 लखनऊ के जिस इलाके में नवीन रहते थे वहां पहाड़ी लोग बहुत थे। उत्तराखंड के गांवों से आए यह लोग अपने बेटे, भाई, भतीजों को भी शिक्षा अथवा नौकरी के लिए गांव से लाकर अपने साथ रखते थे, लखनऊ के कई लोग वहां अपने घरों के लिए पहाड़ी नौकर, ड्राइवर, वगैरह भी ढूंढने आया करते थे।

 नवीन को धीरे धीरे अखबार पढ़ने का शौक लग गया था। वह कहते हैं कि मैंने आठवीं कक्षा में पहाड़ पर एक लेख लिखकर 'स्वतंत्र भारत' अखबार के लिए भेजा था। उस लेख में उन्होंने पाठकों को सम्बोधित करते हुए लिखा था कि तुम गर्मियों की छुट्टी में पहाड़ जा रहे हो। तुम्हें पहाड़ बुला रहे हैं, लेकिन तुम वहां की सुंदरता के साथ वहां का दर्द भी देखना, तुम यह देखना कि कैसे वहां औरतें घर का काम करती हैं, खतरनाक पहाड़ियों से घास काटती हैं।

तुम यह भी देखकर आना कि वहां के लड़के शहरों में जाकर होटलों में झाड़ू लगाते हैं और बर्तन मलते हैं।

 उनका यह लेख ‘स्वतन्त्र भारत’ में छप गया, जिससे उन्हें आगे लिखने का हौंसला मिला।

 शेखर पाठक का प्रभाव।

धीरे-धीरे नवीन जोशी की सामाजिक समझ बढ़ी और हाईस्कूल में पहली डिवीज़न आने पर मोहल्ले में उनका बड़ा नाम हुआ। इस बीच भविष्य में बड़ा नाम बनने जा रहे शेखर पाठक भी अल्मोड़ा से बीए करने के बाद नौकरी की तलाश में लखनऊ पहुंचे थे।

शेखर पाठक पीडब्ल्यूडी में नौकरी करने लगे और संयोग से नवीन जोशी के मुहल्ले में ही रहने के लिए आ गए।

 नवीन जोशी कहते हैं कि जब मैं शेखर पाठक से मिला तो वह ‘दिनमान’ व अन्य पत्रिकाएं पढ़ते थे, कहानी लिखते थे।

मैं भी उनके साथ सुबह शाम बैठने लगा, दिनमान पढ़ने लगा और कहानियां लिख कर उन्हें दिखाने लगा।

शेखर पाठक की संगत से नवीन जोशी को समाज के बारे में नई समझ बनी, उनका दायरा बढ़ा। कुछ समय बाद शेखर पाठक उच्च शिक्षा के लिए वापस अल्मोड़ा चले गए।

लेकिन तब तक शेखर पाठक के माध्यम से नवीन जोशी आकाशवाणी लखनऊ से जुड़ गए थे। वहां बंसीधर पाठक 'जिज्ञासु' की संगत में रहने से नवीन की कुमाऊंनी बोली की कविताएं और कहानी, आकाशवाणी से प्रसारित होने लगे।


आकाशवाणी में उन्हें अपने जैसे कई जोशीले पहाड़ी युवा और वरिष्ठ रचनाकार मिले। अपनी किताब 'ये चिराग जल रहे हैं' में उन्होंने इन्हीं रचनाकारों-कलाकारों के संस्मरण लिखे हैं।

 पत्रकारिता से मिला दुनिया का अनुभव।

अब नवीन जोशी का अखबारों में लिखना भी बढ़ता जा रहा था। उनकी कहानियां अखबारों द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुकी थी।

ग्रेजुएशन करते नवीन को 'स्वतन्त्र भारत' अखबार से नौकरी करने का प्रस्ताव मिला। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका पहाड़ वापस लौटने का इरादा था पर वह पत्रकारिता में रम गए।

उन्हें लगने लगा था कि पत्रकारिता से समाज में बदलाव लाया जा सकता है। इस कारण उन्होंने पहाड़ लौटने का अपना इरादा त्याग दिया था और पूरी तरह पत्रकारिता में रम गए।

अखबार में नौकरी करते हुए नवीन ने काफी यात्राएं कीं, देश-दुनिया के अखबार पढ़े। इन सब से उनका सोचने-समझने का दायरा और भी बढ़ता गया।

 उत्तराखंड से सम्पर्क नहीं टूटा।

 वह पहाड़ लौट तो नहीं पाए लेकिन पहाड़ के लोगों से उनका लगातार संपर्क बना रहा। शेखर पाठक की वजह से वह राजीव लोचन साह, शमशेर सिंह बिष्ट, गिर्दा, आदि से जुड़े।

साल 1977  में 'नैनीताल समाचार' की बिल्कुल शुरुआत से ही उनका कॉलम 'एक प्रवासी पहाड़ी की डायरी' भी प्रकाशित होने लगा।

साल 1984 में उन्होंने देवेन मेवाड़ी के साथ करीब पंद्रह दिन ‘अस्कोट आराकोट यात्रा’ के एक उप-मार्ग में हिस्सेदारी की, जिसमें वह गढ़वाल व कुमाऊं के कई गांवों तक पैदल गए और उन्होंने पहाड़ को करीब से देखा। उन दिनों को याद करते हुए नवीन जोशी कहते हैं कि आन्दोलनों में शामिल होने के लिए मैं लखनऊ से पहाड़ों में पहुंच जाता था।

वह 'नशा नही रोज़गार दो' आंदोलन में शामिल भी रहे।


पहाड़ के हालात पर उनके मन में साल 1990 में पहली बार 'दावानल' उपन्यास लिखने का विचार आया पर अभी उस विचार को कलम का साथ मिलने का वक्त नही आया था।

 पत्रकारिता से बढ़ी रचनात्मकता।

वह राजेंद्र माथुर के सम्पादन वाले नवभारत टाइम्स अखबार में काम करने लगे। इस दौरान नवीन जोशी का कहानियों और कविताओं को लिखने का सिलसिला बढ़ते गया।

वह कहते हैं कोई ठंड या भूख से मर गया या कोई मज़दूर दिन भर की मजदूरी के बाद अपने घर वापसी पर सब्जी ले जाते ट्रक से दब कर मर गया, तो यह खबरें पीड़ा से भरी और यातनादायक होती थीं।

मुझे लगता था ये खबर यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए। अखबारों में ऐसी घटनाएं छोटी-सी खबर बनकर खत्म हो जाती थी लेकिन वहीं से मेरी कोई कहानी या लेख शुरू होते थे। इस तरह मेरी रचनात्मकता को पत्रकारिता ने बढ़ावा ही दिया।

 नवीन जोशी का कहानी संग्रह 'अपने मोर्चे पर' 1992 में आ गया था।

साल 2002 में वह हिन्दुतान अखबार में सम्पादक बनकर पटना पहुंचे। उस समय बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे।

नवीन जोशी कहते हैं कि बिहार के हालात बहुत खराब थे। वहां ये पता नही चलता था कि सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढे में सड़क हैं। साठ किलोमीटर की दूरी चार घण्टे में पूरी होती थी।

 एक बार मैंने किसी से कहा था कि जहां गरीब मुसहर लोग होते हैं, जो चूहे पकड़ कर खाते हैं, मुझे उनके गांव ले चलो। मुझे जवाब मिला कि वहां पर सड़क नहीं है, जब बाढ़ आएगी तब वहां नाव चलेगी, उसके बाद ही उस गांव तक पहुंच पाएंगे।

 इन अनुभवों से नवीन जोशी के अंदर का लेखक पैना होने लगा।

नवीन जोशी के अनुसार पहाड़ और बिहार का दर्द एक सा है, बस भूगोल का ही फर्क है। दोनों प्रदेशों में गरीबी एक जैसी है और दोनों जगह के लोग बड़े शहरों में जाकर छोटी-मोटी नौकरियां करने को मजबूर हैं। प्रतिभाएं भी इन दोनों जगह भरपूर हैं।

 उपन्यासों की शुरुआत।

पटना में रहते हुए ही उन्हें अपना पहला उपन्यास 'दावानल' पूरा करने का विचार आया।

उन्होंने साल 2002 में दावानल लिखना शुरू किया। दिन में वह नौकरी किया करते थे और रात में उपन्यास लिखते थे।

दो साल बाद उनका लखनऊ तबादला हो गया और फिर उन्होंने इस उपन्यास को सम्पादित किया। प्रकाशक को यह अच्छा लगा और छपने में कोई दिक्कत नही आई।

‘दावानल’ उपन्यास साल 1972-73 से साल 1984 तक चले चिपको आंदोलन के भटकाव पर है कि कैसे यह आंदोलन पर्यावरणविदों की वजह से सिर्फ पेड़ बचाने तक सिमट गया जबकि यह आंदोलन मुख्य रूप से जंगलों पर स्थानीय लोगों के अधिकारों के लिए था। पहाड़ के प्रवासियों की पीड़ा भी इसका प्रमुख हिस्सा है।

उनका दूसरा उपन्यास 'टिकटशुदा रुक्का' है। नवीन कहते हैं कि बचपन में मैंने अपने गांव में शिल्पकारों के साथ छुआछूत और भेदभाव देखा था। उनका शोषण किया जाता था। साल 1980 में कफल्टा कांड हुआ, तो मैंने इसी विषय पर लिखने की ठान ली थी।

इस उपन्यास का भी सहित्य जगत में स्वागत हुआ। नवीन जोशी का तीसरा उपन्यास 'देवभूमि डेवलपर्स' है। इस उपन्यास में ‘दावानल’ के आगे की कहानी है।

नवीन जोशी कहते हैं कि जब चिपको आंदोलन ठंडा पड़ने लगा था, तब नशा नही रोज़गार दो आन्दोलन शुरू हुआ था। इस उपन्यास में तब से आज तक के उत्तराखंड की कहानी है।


'देवभूमि डेवलपर्स' में उत्तराखंड के जन आंदोलनकारी संगठनों में टूट, राजनैतिक दलों की चालबाजियां और संसाधनों की लूट पर लिखा गया है। इसे पढ़ने से पता चलता है कि क्यों उत्तराखंड के गांवों से पलायन होता है और कैसे ठेकेदार, दलालों और नेताओं ने उत्तराखंड के जल, जंगल, जमीन पर अपना कब्जा जमा दिया है।

 पहाड़ पर केंद्रित लेखन।

नवीन जोशी कहते हैं कि पहाड़ मेरे लेखन के केंद्र में है, तीनों उपन्यासों का विषय उत्तराखंड पर केंद्रित है।

मेरी कई कहानियां भी पहाड़ पर केंद्रित रहती हैं। मैं सामाजिक स्थितियों के बारे में लिखता हूं। जैसे मैंने एक कहानी में लिखा है कि कैसे समाज में साम्प्रदायिकता बढ़ रही है।

कुछ कहानियों का विषय पर्यावरण भी है, उनमें लिखा है कि कैसे शहर से गौरैया गायब हो रहीं हैं या आकाश से तारे खो गए। एक कहानी का मुख्य पात्र तारे देखने के लिए पहाड़ की याद करता है।

हाल ही में सम्भावना प्रकाशन से उनकी नई किताब 'बाघैन' आई है, यह कहानियों का संग्रह है। इसकी मुख्य कहानी पलायन के कारण भुतहा होते गांवों की मार्मिक दास्तान है। बाघ यहां खूंखार जंगली जानवर से अधिक मानव विरोधी विकास का सर्वभक्षी प्रतीक है, यह किताब आज बुरे दौर से गुजर रहे उत्तराखंड की तस्वीर-तकदीर दिखाती है।


 ‘अपने मोर्चे पर’, ‘राजधानी की शिकार कथा’, ‘मीडिया और मुद्दे’, ‘लखनऊ का उत्तराखंड’ नवीन जोशी की अन्य रचनाएं हैं।

 लेखन से आजीविका बड़ी मुश्किल फिर भी लिखना तो है ही।

 हिंदी में लेखन से आजीविका पर नवीन जोशी कहते हैं कि हिंदी में स्वतन्त्र लेखक अपनी आजीविका नहीं चला सकते। पारिश्रमिक की स्थितियां बेहद खराब हैं। मैं भी अगर पत्रकारिता नहीं करता तो परिवार नही पाल सकता था। मेरी पत्नी भी नौकरी करती थी, इसलिए कभी घर चलाने में कोई दिक्कत नही आई।

इसका कारण पूछने पर वह कहते हैं कि हिंदी किताबें अधिक नहीं बिकती। पांच सौ से एक हज़ार प्रतियों के संस्करण बिकने पर हिंदी लेखक खुश हो जाते हैं। प्रकाशक लेखकों से सच छुपाते, उन्हें किताबों की बिक्री और आवृत्तियों के बारे में सही विवरण नहीं देते। लेखक को समय से रॉयल्टी भी नही मिलती। इसके लिए लेखकों को प्रकाशक के लिए बार-बार चिट्ठी लिखनी पड़ती है।

पिछले दिनों साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल जैसे वरिष्ठ लेखक ने इस बारे में अपनी दुखद कथा बताई तो कुछ चर्चा हुई थी।

नवीन जोशी इस विषय पर आगे कहते हैं कि कुछ नए प्रकाशक पारदर्शिता बरत रहे हैं। अंग्रेज़ी किताबों में ऐसी स्थिति नही है। वहां लेखक को प्रकाशन से अनुबन्ध के भी पैसे मिलते हैं, रॉयल्टी के अलग।

लेखन में पैसा न होने पर भी लिखते रहना चाहिए या नही इस विषय पर नवीन जोशी ने कहा कि लिखना जरूरी है। यदि हम सामाजिक और राजनीतिक रूप से सचेत हैं तो हमें लिखना चाहिए।

प्रेमचन्द ने कहा था साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। आजीविका नही चलती तो लिखना बन्द नही किया जा सकता, लोगों को पढ़ना चाहिए. समाज की सामूहिक राय साहित्य और पत्रकारिता से बनती है।

पत्रकारिता की प्रतिक्रिया तत्काल होती है लेकिन साहित्य का दीर्घकालीन असर होता है। सहित्य समाज का आईना होता है और धैर्य मांगता है। कहानी लिखकर समाज रातों रात नही बदलता लेकिन छपे हुए का असर आने वाले दशकों, शताब्दियों तक रहता है। जैसे भारतेंदु को पढ़कर हम तब के भारतीय समाज को समझ सकते हैं, ठीक वैसे ही ओ हेनरी को पढ़कर हम अमरीकी समाज को समझ सकते हैं।

 माध्यम बदलेंगे पर शब्द तो वही रहेंगे।

ई बुक के बढ़ते चलन पर नवीन जोशी कहते हैं कि पहले टेलीफ़ोन डायरी होती थी अब उसे कोई नही रखता, फोन में ही सबके नम्बर मिल जाते हैं। वैसे ही माध्यम बदलते रहेंगे पर शब्द वैसे ही रहेंगे।

शब्द रहेंगे तो सहित्य रहेगा और साहित्य रहेगा तो समाज सचेत रहेगा।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Thursday, January 12, 2023

हिमालय, तुम्हें आराम चाहिए।

मैं हमेशा कहता हूं,
हिमालय तुम बड़े प्यारे हो।
हरे भरे, तुम बड़े न्यारे हो।

गोदी में तुम अपनी मुझे खिलाते थे,
मैं कहता था, हे हिमालय इतना न घुमाओ।
 थक रहा हूं, तुम्हारे प्रेम में झूम रहा हूं।

वक्त बढ़ते अब तुम बूढ़े दिखने लगे हो,
अपनी चमक खोने लगे हो।
कहीं कहीं मटमैला रंग है, अब आपकी हरियाली कहीं गुम है।

अब मुझे कुछ समझ में आने लगा है, 
तुम्हारी दशा देख मन में उबाल आने लगा है।
हर कोई तुम्हें अपने अनुसार सजाने लगा है, 
दूल्हा समझ तुम्हारा खुद श्रृंगार करने लगा है।

कहीं तुम अग्नि से झुलसे हुए हो तो कहीं रेगिस्तान से सूखे हुए हो।
तैयारी तुम्हें मंडी में बेचने की है, ये बोली अब ऊंची होने लगी है।

आजकल मेरी नज़रों में कुछ धुंधलापन है।
धूल और धुंए के गुबार में मेरा प्रिय हिमालय कहीं गुम है।
सुना है अब तुम्हारे कदम थकने लगे हैं, सबकी सेवा करते अब तुम्हारे कंधे झुकने लगे हैं।

चीर कर तुम्हारा सीना रक्त पूरा पिया जा चुका है, 
अपने हाल में तुम्हें अकेला छोड़ा जाने लगा है।
 तुम्हारा साया हटने की कल्पना मात्र से मेरा ह्रदय व्याकुल हो उठा है।

तुम्हें चमकते वस्त्र पहनाने लगे हैं,
बूढ़े बना दिए हिमालय को नुमाइश पर खड़ा करने लगे हैं।
ओह! ये नही जानते तुम अंदर से खोखले हो, फिर भी कभी कुछ न बोलते हो।

जानता हूं, तुम्हें अब एकांत चाहिए।
इस अंधी दौड़ से दूर हिमालय, तुम्हें आराम चाहिए।
अब तुम्हें दूर से निहारूँगा, सालों बाद तुम्हारी गोदी में फिर पधारूँगा।

मैं हमेशा से कहता हूं,
हिमालय तुम बड़े प्यारे हो।
हरे भरे, तुम बड़े न्यारे हो।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Saturday, January 7, 2023

तब और अब, उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन की पड़ताल करती एक किताब.

यायावरी के अनुभवी अरुण कुकसाल के साथ 'उत्तराखण्ड का पर्वतीय समाज और बदलता आर्थिक परिदृश्य' किताब को लिखने में शोध कार्यों में अनुभवी चन्द्रशेखर तिवारी भी शामिल हैं. यायावरी के साथ शोध के अनुभवों का मिश्रण इस किताब को बेमिसाल बना देता है. लेखकों और उनके साथियों द्वारा तीस साल पहले उत्तराखंड के गांवों में की गई अपनी यात्रा को एक बार फिर से करने की इस कोशिश में बहुत से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. बदहाल सड़कें, फसल को जंगली जानवरों से नुकसान, सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति, पीने के पानी की कमी वह कारण है, जिनकी वजह से तीस साल पहले उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों से पलायन होता था. आज तीस साल बाद सड़कों की स्थिति में सुधार तो आया है पर बाकी स्थितियां और भी बदतर होने के साथ ही सड़कें पलायन करने को आसान बनाने का काम ही कर पाई हैं.

किसी विदेशी खोजी यात्री से कम नही हैं इस किताब के लेखक.

दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र, समय साक्ष्य से छपकर आई इस किताब को पढ़ते आपको कभी-कभी ऐसा लगेगा कि आप उत्तराखंड के इन दूरस्थ गांवों की कहानी किसी विदेशी खोजकर्ता की किताब में पढ़ रहे हैं. लेखकों ने इन गांवों की वास्तविक दशा बता कर वह कार्य किया है, जो कभी सम्भव नही था.
इस किताब में स्थानों का विवरण ऐसे दिया गया है कि उन्हें पढ़ते पाठकों को लगता है वह उसी स्थान पर मौजूद हैं और वहां के इंसानों के साथ पशुओं की जनसंख्या के आंकड़े इतनी सटीकता से दिए गए हैं कि वह पाठकों को अचंभित करने के लिए काफी हैं.



पहाड़ का आईना आवरण चित्र.

किताब का आवरण चित्र पहाड़ के कठिन जीवन को दर्शाता है. पिछले आवरण में किताब के लेखकों का जीवन परिचय पढ़ने के लिए मिलता है, यह पैटर्न आजकल अधिकतर किताबों में दिखता है और यह जरूरी भी है.
बी.के जोशी के लिखे 'आमुख' और लेखकों द्वारा लिखे 'कहो! कैसे हो पहाड़' को पढ़ने के बाद किताब के प्रति रुचि जाग जाती है और पहाड़ के कष्टों को समझने के लिए इस किताब का पढ़ा जाना जरूरी लगता है. 'अनुक्रम' से यह जानकारी मिलती है कि किताब साल 2016 और 1986 के दो दौरों में बंटी हुई है.

ये रेखाचित्र भी कुछ कहते हैं.

किताब के रेखाचित्र डॉ नन्द किशोर हटवाल और निधि तिवारी द्वारा खींचे गए हैं. साल 2016 और 1986 के दौरों की शुरुआत में इनका प्रयोग हुआ है, यह रेखाचित्र इन दोनों समय में पहाड़ का चेहरा हमारे सामने हूबहू रख देते हैं. किताब के सभी शीर्षकों के साथ भी छोटे से बने रेखाचित्र किताब का आकर्षण बढ़ाते हैं.

शुरुआत में लेखक की नजरों से सालों का परिवर्तन.

किताब की शुरुआत में लेखक देहरादून के आसपास के क्षेत्रों में 30 साल के दौरान आए परिवर्तन पर लिखते हैं.
'ब्लॉक ऑफिस की और तब कुछ खेतों से गुजरना पड़ता है अब यह चमचमाती दुकानें दिखती हैं.'
लेखक ने गांवों की स्थिति बताने के लिए उनकी समुद्रतल से ऊंचाई को बताया है, इसके साथ ही वह गांवों के आसपास के दृश्यों को बताते हैं.
इस तरह पाठक भी उनके सहयात्री बन जाते हैं. इसका उदाहरण यह पंक्तियां हैं 'पुरानी पहाड़ की धार पर बांज, बुरांश और देवदार के जंगलों से घिरी सुरम्य जगह है. समुद्रतल से 8500 फीट की ऊंचाई पर स्थित चुरानी स्थल नागनाथ से 10 किमी चकराता से 20 किमी और मसूरी से 55 किमी की दूरी पर स्थित है.'

आंकड़ों के साथ बताई गई समस्या है इस किताब की खासियत.

लेखक जितने भी गांवों में गए ,वहां पर पशुपालन में कमी सबसे प्रमुख समस्या के रूप में सामने आई और इसके लिए उन्होंने आंकड़े भी जुटाए हैं. जैसे एक गांव के लिए वह लिखते हैं 'पहले प्रत्येक परिवार में औसतन 1 जोड़ी बैल होते थे. आज 50 परिवारों में मात्र 10 परिवारों के पास 1-1 बैलों की जोड़ी है'.
पहाड़ में बिना जांचे परखे योजना लागू करने से उसका लाभ नहीं मिलता, इसके लिए लेखक ने मौके पर लोगों से बातचीत कर उदाहरण दिए हैं. जिनमें हैंडपंप और बिना किसी उपयोग का पानी का चैंबर प्रमुख हैं.
पहाड़ों की स्वास्थ्य व्यवस्था 30 साल पहले और अभी समान दिखती है। इस स्थिति पर एक व्यक्ति का यह कथन कि  'हमारे गांव में आसान है मौत! बीमारी से', विचलित कर देता है.

समस्याओं को सामने रखने के साथ उनका समाधान भी खोजती है किताब.

लेखक के अंदर मानवीय संवेदना कूट-कूट कर भरी है. वह एक जगह लिखते हैं 'क्वाला गांव आते समय मिली गाय अभी भी एक पेड़ के नीचे खड़ी है. असहाय नजरों से वह हमें आंखों से ओझल होने तक ताकती रहती है'. शायद अपनी इसी मानवीय संवेदना की वजह से लेखक पहाड़ की समस्याओं का समाधान भी ढूंढ पाए हैं.
महिपाल सिंह जैसे जागरूक किसान से मिलकर पहाड़ों से खत्म हो रही खेती में तकनीक के लाभ लिखे गए हैं.
पृष्ठ संख्या 75 की पंक्ति ' ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों को जो शिक्षा दी जा रही है, वह किसी भी तरह से हमारे ग्रामीण परिवेश के अनुकूल नहीं है. पढ़ लिखकर तो रोजगार बाहर करना है यह मनोवृति सब की है ' के जरिए लेखक हमारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश रखते हैं.

किताब पढ़ते पहाड़ के गांवों की समस्याओं पर आपकी समझ का विस्तार होता जाएगा. अब तक पहाड़ों को लेकर पानी, स्वास्थ्य ,शिक्षा की समस्याओं से ऊपर भी आपको बड़ी समस्याएं स्पष्ट रूप से समझ आने लगेंगी.

लेखक द्वारा एक मंझे हुए ग्राउंड रिपोर्टर की तरह भी खबर की गई है.

लेखक किताब में 'मानिला का डांडा' जैसे रोचक शीर्षक देते हैं तो उनके अंदर शराब के चलन, सरकारी कार्य में लापरवाही को भी किसी मंझे हुए ग्राउंड रिपोर्टर की तरह पाठकों के सामने रखते हैं.
मुश्किल परिस्थितियों में की गई इस यात्रा में लेखकों और उनके साथियों को कहीं बारिश मिली तो कहीं बाघ, पर वह अपनी इस यात्रा को बड़ी हिम्मत से पूरी करने के बाद, हमें यह ऐतिहासिक दस्तावेज प्रदान कर गए.

दूसरे दौर में बहुत सी घटनाएं ऐसी लिखी गई हैं जो पहले दौर में लिखी जा चुकी थी, वह दोहराई हुई लगती हैं पर तब तक किताब उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन की पड़ताल करने का अपना कार्य पूरा कर गई है.

आवरण चित्रों के पीछे छिपा है साथियों का संदेश.

किताब के अंत में अध्ययन में शामिल गांवों का विवरण दिखता है और इसी के साथ लेखकों के साथियों की किताब पर टिप्पणी भी है. यही टिप्पणी आपको किताब के आवरण चित्र के पीछे भी मिलती है, टिप्पणी करने वालों में लेखक नवीन जोशी, राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा, लेखक देवेंद्र मेवाड़ी और एक्टिविस्ट गीता गैरोला शामिल हैं.

अरुण कुकसाल को अपनी पिछली किताब 'चलें साथ पहाड़' के लिए हाल ही में पर्यटन मंत्रालय द्वारा पर्यटन से संबंधित विषयों पर मूल रूप से हिंदी में लिखी पुस्तकों को मिलने वाला प्रतिष्ठित 'राहुल सांकृत्यायन पर्यटन पुरस्कार 2020-21' मिला है. इसमें पहाड़ की मुश्किलों को सामने लाती 'चलें साथ पहाड़' को प्रथम स्थान पर चुना गया है.
अब उम्मीद है चन्द्रशेखर तिवारी के साथ लिखी उनकी इस किताब से भी उत्तराखंड की समस्याओं का समाधान खोजने के सार्थक प्रयास किए जाएंगे.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may

Friday, January 6, 2023

How is 'Chalein Saath Pahad' a book, awarded with 'Rahul Sankrityayan Tourism Award Scheme'

The 'Rahul Sankrityayan Paryatan Puraskar Yojana' running by the Ministry of Tourism to reward books originally written in Hindi on tourism-related topics, for the year 2020-21, the book 'Chalein Saath pahad' by Dr. Arun Kuksal has been selected for the first prize under this prestigious award.



This book was published by 'Sambhavna Prakashan', nowadays famous for the book 'Tareekh Mein Aurat' by writer Ashok Pandey.


'Preface' is the reflection of book.

Arun Kuksal has chosen senior author Devendra Mewari to write the 'Preface' of his book and Devendra Mewari has been successful in making it completely clear in the introduction of the book that the book takes us to the beauty of the hills as well as introduce us with the problems of the hills.

In 'Apni Baat' the author tells the importance of travelling in a individuals life.

 This book is a compilation of the author's ten tours to the hilly regions of Uttarakhand. According to the author, the purpose of the book is to bring out the social, economic, educational and cultural picture of Uttarakhand and he has been completely successful in bringing these pictures in front of the readers.

                       
Arun Kuksal

The author has started 'Chalein Saath Pahad' with the journey of Shiva's paradise-Madhyamaheshwar, with reading this the readers feel that they are also with the writer during his journey in hills.

The author has written the words of the people who were in contact with him during the journey exactly as they have said, for example the author writes that a person named Jagat held his hand and said "One to three, tum Bhi free hum bhi free to baitho".

While reading the book, along with seeing the black and white photographs, you will also get information about different books, which the author remembers after seeing some places.
Diring his journey The author sometimes remembers the work of Rahul Sankrityayan and sometimes he remembers the poems of Chandrakunwar Bartwal.

Along with some local words, this book questions on the system too.

Pahari words like 'Danman' of rain were also used in the book, but the readers do not have any problem in understanding their meaning and they imbibe them easily.

In this book the author has also hit out at the system.

Book teaches a lot on the history and present of Uttarakhand.

While reading the book, it is also felt that if you keep this book with you during the Uttarakhand journey, then you will not need to ask anyone for the way forward for your journey.

 The author talking about his college which has become a godown in Ranikhet reminds us how much we have taken care of our archaeological buildings.

The history of Uttarakhand has also been exposed in the book, like the Tiladisera incident was probably bigger than the Jallianwala Bagh incident, but due to being done by 'own' people, this dark chapter of history is not talked about much.

Reading further in the book, we come to know about the village 'Ponti', where people are engrossed in themselves even in the absence of basic needs like road, electricity, but the story of people dying due to lack of treatment in such villages and the plight of schools. Distracts the mind.
This book easily explains the main reason why there is such a difference in 'development' between Himachal and Uttarakhand.

It is important to read about the damage caused by tourists to hills in Sunderdhunga region.
During the visit of Devadhidev Kedarnath in 2019, the author also conveys the effects of 2013 disaster to the readers.
Even after reading the book continuously for ten hours, I did not feel boring reading it.

This book should be declared as the state book of Uttarakhand.
 
The author has not put his different journies in their chronological order, but still you like the way he write this book.
The conversation between the dog and the chicken sounds awkward.

After reading this book, you may be think that
this book should be declared as the state book of Uttarakhand and it should be handed over to the people who are in the political power of uttarakhand. 

Himanshu Joshi
@himanshu28may

Thursday, January 5, 2023

कैसी है ' 'राहुल सांकृत्यायन पर्यटन पुरस्कार योजना' से पुरस्कृत 'चलें साथ पहाड़'

पर्यटन मंत्रालय द्वारा पर्यटन से संबंधित विषयों पर मूल रूप से हिंदी में लिखी पुस्तकों को पुरस्कृत करने के लिए 'राहुल सांकृत्यायन पर्यटन पुरस्कार योजना' चलाई जा रही है, साल 2020-21 के लिए उत्तराखंड के यायावरी लेखक डॉ अरुण कुकसाल की किताब 'चलें साथ पहाड़' को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के अंतर्गत प्रथम पुरस्कार के लिए चुना गया है.



यह पुस्तक आजकल लेखक अशोक पाण्डे की किताब 'तारीख में औरत' के लिए चर्चित 'सम्भावना प्रकाशन' से प्रकाशित होकर आई थी.


भूमिका ही असरदार.

अरुण कुकसाल ने अपनी इस किताब की 'भूमिका' लिखने के लिए वरिष्ठ लेखक देवेंद्र मेवाड़ी को चुना है और देवेंद्र किताब की भूमिका में ही यह पूरी तरह स्पष्ट करने में सफल रहे हैं कि किताब हमें पहाड़ की विशेषताओं के साथ-साथ पहाड़ की समस्याओं से भी परिचित कराएगी.
भूमिका में उन्होंने पहाड़ में रहने वाले दिनेश दानू की यह बात लिखी है "आप लोग पहाड़ों को देखते हैं और हम इनमें रहते हैं. मूलभूत सुविधाओं से अनछुए ये पहाड़ आपको दिखने में सुंदर लगेंगे ही पर जब आपको इनमें ही रहना हो तब आपका यह विचार, विचार ही रह सकता है.

'अपनी बात' में लेखक किसी व्यक्ति के जीवन में यात्राओं के महत्व पर प्रकाश डालते हैं.

 यह किताब लेखक द्वारा उत्तराखंड में की गई उनकी दस यात्राओं का संकलन है. लेखक के शब्दों में किताब का उद्देश्य उत्तराखंड की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक तस्वीर को सामने लाना है और वह इस तस्वीर को पाठकों के सामने लाने में पूरी तरह सफल भी रहे हैं.

                       
अरुण कुकसाल

लेखक ने 'चलें साथ पहाड़' की शुरुआत शिव की परण्यस्थली-मध्यमहेश्वर यात्रा से की है, इसे पढ़ते पाठकों को लगता है कि वह भी लेखक के साथ पहाड़ यात्रा पर हैं.

जैसा देखा वैसा लिखा.

लेखक ने यात्रा के दौरान उनके सम्पर्क में रहे लोगों की बातों को ठीक वैसे ही लिख डाला है जैसा उन लोगों ने बोला है, उदाहरण के लिए लेखक लिखते हैं कि जगत नाम के खच्चर वाले ने उनका हाथ पकड़ कर बोला "वन टू थ्री, तुम भी फ्री हम भी फ्री इसलिए बैठो".
किताब पढ़ते आपको ब्लैक एंड वाइट तस्वीरों को देखने के साथ बहुत से साहित्यों के बारे में भी जानकारी मिलती रहेगी जो लेखक को किसी जगह को देख याद आते रहते हैं.
इस किताब में वह कभी राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं को याद करते हैं तो वह कभी चंद्रकुंवर बर्त्वाल की कविताओं को याद करते जाते हैं.

पहाड़ी शब्दों के साथ व्यवस्थाओं पर भी प्रहार करती यह किताब.

किताब में बारिश की 'दणमण' जैसे पहाड़ी शब्दों का प्रयोग भी किया गया पर इनका मतलब समझने में पाठकों को कोई परेशानी नही होती और वह इन्हें प्रकृति की तरह ही आत्मसात कर लेते हैं.

'प्रकृति ने जितनी सुंदर जगह यहां दी है उतना ही कुरूप व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदार यहां का शासन-प्रशासन है' जैसी पंक्तियां लिखते हुए लेखक ने सरकारी व्यवस्थाओं पर भी चोट मारी है.

किताब उत्तराखंड के इतिहास और वर्तमान पर बहुत कुछ सिखाती है.

किताब पढ़ते यह भी महसूस होता है कि अगर उत्तराखंड यात्रा के दौरान आप इस किताब को अपने साथ रखेंगे तो आपको किसी से अपनी यात्रा के आगे का रास्ता पूछने की जरूरत नही पड़ेगी.

 लेखक द्वारा रानीखेत में गोदाम बन चुके अपने कॉलेज के बारे में बात करना यह याद दिलाता है कि हमने अपने पुरातत्व भवनों का कितना ध्यान रखा है.

किताब में उत्तराखंड के इतिहास से भी पर्दा उठाया है जैसे तिलाड़ीसेरा कांड शायद जलियांवाला बाग कांड से भी बड़ा था पर 'अपने' ही लोगों द्वारा किए जाने की वजह से इतिहास के इस काले अध्याय के बारे में ज्यादा बात नही की जाती.

किताब को आगे पढ़ते हम 'पौंटी' गांव के बारे में जानते हैं, जहां के लोग सड़क, बिजली, जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के अभाव में भी अपने में मग्न हैं पर ऐसे गांवों में इलाज के अभाव में दम तोड़ते लोगों की कहानी और स्कूलों की दुर्दशा मन विचलित करती हैं.
हिमाचल और उत्तराखंड में 'विकास' का इतना अंतर क्यों है, इसकी मुख्य वजह भी यह किताब आसानी से समझाती है.

सुंदरढुंगा इलाके में पर्यटकों ने प्रकृति को जो नुकसान पहुंचाया उसे पढ़ना जरूरी है.
देवाधिदेव केदारनाथ की 2019 में की गई यात्रा के दौरान लेखक 2013 आपदा के प्रभावों को भी पाठकों तक पहुंचाते हैं.
3 अक्टूबर 2020 को लिखा 'तुंगनाथ के उतुंग शिखर पर' वृत्तांत किताब का आखिरी हिस्सा है, लगातार दस घण्टे किताब पढ़ते रहने के बाद भी मैंने इसे पढ़ते उबाऊ महसूस नही किया.

उत्तराखंड की राजकीय किताब घोषित हो यह किताब.
 
लेखक ने यात्राओं को उनके समयानुसार क्रम से नही लगाया है पर फिर भी आपको यह अखरेगा नही.
कुत्ते और मुर्गे की बातचीत जबरदस्ती ठूसी हुई लगती है.

किताब पूरी पढ़ने के बाद आप यह चाहेंगे कि इसे उत्तराखंड की राजकीय किताब घोषित करने के बाद, उत्तराखंड में सत्ता चलाने वाले लोगों के हाथों में पकड़ा देना चाहिए और कहना चाहिए कि असली पहाड़ देखना है तो 'चले साथ पहाड़'!

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Wednesday, January 4, 2023

स्वास्थ्य, सुरक्षा के लिए जूझते भारत में रहने वाले नेपाली श्रमिक।

साल 2001 में नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता के दौरान भारत की तरफ पलायन में तेज़ी आई और पलायन करने वालों में ज्यादातर अकुशल श्रमिक थे। इस समय भारत में लाखों नेपाली मजदूर काम करते हैं, जो स्वास्थ्य, बैंक जैसी सुविधाओं से महरूम हैं।

भारत में आठ मिलियन के आसपास नेपाली नागरिक रहते हैं।

भारत और नेपाल के बीच साल 1950 में भारत नेपाल शांति तथा मैत्री सन्धि हुई थी। जिसके अन्तर्गत दोनों देशों की सीमा एक-दूसरे के नागरिकों के लिए खुली रहेगी और उन्हें एक-दूसरे के देशों में बिना रोकटोक रहने और काम करने की अनुमति होगी। इसके बाद से भारत में नेपाली श्रमिक भवन निर्माण, सिक्योरिटी गार्ड, कम्पनियों में मजदूरी, मुंबई-दिल्ली जैसे बड़े शहरों में चौकीदारी, खेती, होटलों में काम करने भारत आने लगे।
इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज में राजू भट्टराई के रिसर्च पेपर के अनुसार साल 2001 में नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता के दौरान भारत की तरफ पलायन में तेज़ी आई और पलायन करने वालों में ज्यादातर अकुशल श्रमिक थे।
भारतीय राजदूतावास काठमांडू, नेपाल की वेबसाइट के अनुसार करीब आठ मिलियन नेपाली नागरिक भारत में रहते और काम करते हैं।

भारत में नेपाली श्रमिकों का जीवन।

नेपाल के बाजुरा जिले के रहने वाले जनक और प्रकाश उन लाखों अकुशल श्रमिकों में से एक हैं जो अपने घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर भारत काम की तलाश में पहुंचे हैं।

यह दोनों अन्य नेपाली श्रमिकों के साथ सुबह छह बजे ही खाना खाकर उत्तराखंड राज्य के नैनीताल के फ्लैट्स ग्राउंड में काम की तलाश में बैठ जाते हैं। आज उन्हें काम मिलेगा या नही, इसका उन्हें पता नही रहता। 22 वर्षीय जनक बताता है कि उसे पिछले पांच दिन से कोई काम नही मिला है और उससे पहले मिली दिहाड़ी से उसका खाना चल रहा है।
नैनीताल में नए निर्माण कार्य न होने की वजह से इन मजदूरों के पास पेट पालने के लिए सामान ढोने का ही एकमात्र विकल्प बचता है और कोरोना काल के बाद से इन्हें यह काम भी कम मिल रहा है।

जनक जब सत्रह साल का था तब ही उसकी शादी हो गई थी, उसके पत्नी और दो बच्चे नेपाल में रहते हैं। जनक का भाई यहीं भारत में उनके साथ रहता था पर ब्रेन हेमरेज की वजह से उसकी मृत्यु हो गई थी, पैसों के अभाव में वह उसका इलाज नही करा पाया था।


प्रकाश भी जनक के साथ ही अन्य दो नेपाली श्रमिकों के साथ एक कमरे में रहता है। उसके पिता भी यहीं रहते थे, प्रकाश साल 2000 में भारत आ गया था। प्रकाश कहता है कि तब 30 रुपए दिहाड़ी थी और अब वह 500 रुपए दिन भर दिहाड़ी के कमा लेता है।
वह लोग हर छह महीने में घर जाते हैं और 30-35 हजार रुपए घर ले जाते हैं। कोई वैध कागज़ न होने की वजह से भारत में बैंक की सुविधा नही ले पाते, जिस वजह से उनको अपना सारा पैसा नकद ही ले जाना पड़ता है और घर जाते वक्त उनके सामने लूटपाट करने वाले गिरोह का खतरा बना रहता है।

प्रकाश ने बताया कि कोरोना काल में इनको कहीं से मदद नही मिली थी और उन्होंने अपनी बचत से ही खाना खाया था। उनका कोई साथी नेपाली श्रमिक बीमार पड़ जाता है तो वह लोग मिल कर उसके इलाज के लिए रुपए जमा करते हैं।

आजकल सभी श्रमिकों के पास घर पर बात करने के लिए मोबाइल है, जिसमें वह अपने देश के क्रिकेट, वॉलीबॉल मैच भी देखते हैं और दक्षिण भारतीय फिल्में उन्हें बेहद पसंद हैं।

नैनीताल के रहने वाले उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी सदस्य दिनेश उपाध्याय बताते हैं कि पिछले कुछ सालों से नेपाली श्रमिकों के लिए काम में इसलिए कमी आई है क्योंकि अब सामान ढोने के कार्य गाड़ियों से ज्यादा होते हैं, वैसे ही निर्माण कार्यों में मशीनों द्वारा ज्यादा कार्य किया जाता है। नैनीताल समाचार के वरिष्ठ पत्रकार विनोद पाण्डे बताते हैं कि उन्होंने नैनीताल, हल्द्वानी में ऐसे बहुत से लोग देखें हैं जो इन नेपाली श्रमिकों से कार्य तो करवाते हैं पर उसका पेमेंट नही करते।

गांधीवादी इस्लाम हुसैन नैनीताल में नेपाली श्रमिकों की स्थिति पर बात करते अपनी एक कविता के कुछ अंश कहते हैं।
देवता के धामी की अचानक मौत से,
शहर पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा।
न कोई चर्चा चली, न हंगामा हुआ,
और ना ही अख़बार में कुछ छपा।
न झूठे आंसू बहे न दिखावा हुआ,
और न हुई कोई शोक सभा।
बस कुछ रिक्शे नहीं दौड़े,
और सड़क बनते बनते रुक गई ज़रा।

अन्य देशों में काम करने पर सुविधाएं पाते हैं नेपाली श्रमिक पर भारत में आने के बाद कोई सुविधा नही।

नेपाल की अग्रणी समाचार वेब पोर्टल 'इकान्तिपुर' से जुड़े पत्रकार उपेंद्र राज पाण्डे भारत में रहने वाले नेपाली श्रमिकों की समस्याओं पर बताते हैं कि भारत में कितने नेपाली श्रमिक हैं, इसकी सही संख्या हमारी नेपाल सरकार के पास उपलब्ध नही है। अन्य देशों में जाने के लिए नेपाली श्रमिकों के लिए एक निश्चित प्रक्रिया होती है और उन्हें बीमा की सुविधा भी मिलती है पर भारत के मामले में ऐसी कोई प्रक्रिया नही है इसलिए भारत में आकर काम करने वाले श्रमिकों की समस्याओं को पहचानने में भी कठिनाई होती है।
फिर भी असुरक्षित श्रम, उपचार और रोजगार बने रहने की सुनिश्चितता, इन श्रमिकों की मुख्य समस्या है।

साल 2020 में नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने नेपाल सरकार को नोटिस जारी करते पूछा था कि भारत में काम कर रहे नेपाली कामगारों को वो तमाम सुविधाएं और सुरक्षा क्यों नहीं दी जाए, जो दूसरे देशों में काम कर रहे नेपाली कामगारों को मिलती हैं। इन सब के बावजूद भारत में नेपाली श्रमिकों की स्थिति में कोई खास बदलाव होता नही दिखता।

काम करने की पेमेंट न मिले तो पुलिस के पास शिकायत दर्ज नही करवा सकते नेपाली श्रमिक।

देहरादून में मजदूरों के अधिकारों के लिए काम कर रहे चेतना आंदोलन संगठन से जुड़े शंकर गोपाल बताते हैं कि देहरादून में रहने वाले नेपाली श्रमिकों की अधिकतर वही समस्या हैं जो अन्य प्रवासी श्रमिकों की रहती हैं।
उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सुविधा नही मिल पाती हैं, उनके लिए सरकारी अस्पतालों में अलग से कोई योजना नही हैं। उनके वेतन और सुरक्षा पर कोई ध्यान नही दिया जाता, यदि काम करते कोई श्रमिक मारा जाता है तो उसे मुआवजा कानून के हिसाब से नही मिलता बल्कि उसके परिवार को मालिक अपनी तरफ से ही थोड़ी बहुत मदद दे देता है।
अगर किसी श्रमिक को काम करने पर पेमेंट नही मिलती है तो वह सीधा पुलिस के पास शिकायत नही दर्ज करवा सकता है। इसके लिए मजदूरों को श्रम विभाग के पास अपनी शिकायत लेकर जाना पड़ता है और वहां भी उन्हें शिकायत दर्ज कराने में मुश्किल होती है।

हिमांशु जोशी।


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