Friday, January 20, 2023

साल 2023 में भी महिलाओं का सिनेमा में पुराना चित्रण जारी है.

कभी कोई फिल्म आपको पसंद ना आए और उसके अंत में  'टू बी कंटिन्यूड' लिखा दिख जाए, तो आप कैसा महसूस करेंगे! यह अहसास आपको गिरीदेव राज की फिल्म 'द वाई' को देखकर महसूस होगा.



होनहार निर्देशक जब भूतहा फिल्मों पर ध्यान लगाएं.

गिरीदेव राज साल 2016 में कन्नड़ फिल्म 'जीरो मेड इन इंडिया' बनाने के लिए जाने जाते हैं, पिता-पुत्र के रिश्तो पर बनाई गई है फिल्म समीक्षकों और दर्शकों को बहुत पसंद आई थी. अब साल 2023 की शुरुआत में गिरीदेव बॉलीवुड के सालों पुराने पिटे हुए भूतहा फॉर्मूले को लेकर अंग्रेजी शीर्षक वाली 'द वाई' फिल्म लेकर हमारे सामने आए हैं.

फिल्म की शुरुआत में एक शादीशुदा जोड़े को हम उनके नए आशियाने में जाते देखते हैं और वहां जाने के बाद उनके साथ असामान्य घटनाएं घटित होनी शुरू होती हैं. इसका हल खोजने के लिए घर में एक मनोचिकित्सक को बुलाया जाता है ,जो इन घटनाओं पर से पर्दा उठाता है.

निर्देशक को एक ठीक- ठाक कहानी तो मिली थी पर वह उसका प्लॉट बेहतर तरीके से तैयार करने में कामयाब नही हो पाए. कलाकारों के पिछले जीवन की घटनाएं हों या वर्तमान में उनके साथ घटित होती घटनाएं, दर्शक इन सब से खुद को जुड़ता महसूस नही करते और फिल्म की कहानी बिखरी हुई सी लगती है।

हावभाव और संवाद अदायगी में पीछे रहते कलाकार.

फिल्म के नायक युवान हरिहरन की बड़ी-बड़ी दाढ़ी मूंछे रखी गई हैं. इसे प्रदर्शित करते निर्देशक शायद यह भूल गए थे कि दक्षिण फिल्मों के कुछ अभिनेता इन बड़ी दाढ़ी मूंछों के साथ अपने अभिनय से भी प्रभावित करते हैं पर युवान के अभिनय से एक डरी हुई पत्नी के पति वाले सारे हावभाव गायब थे.

दीक्षा की बात की जाए तो उनके हिस्से में संवाद बहुत कम आए हैं और बिना संवाद बोले सिर्फ अपनी खूबसूरती से ही कोई भी कलाकार दर्शकों को प्रभावित नही कर सकता.

मनोचिकित्सक बने कमल घिमिरे को हिंदी सिनेमा में बहुत कम देखा गया है और उनके अभिनय में भी अभी बहुत सुधार की आवश्यकता है.

अभिनव किरन ने फिल्म में युवान के दोस्त का किरदार निभाया है और अभिनय के मामले में वह बहुत ही कच्चे साबित हुए हैं.

पटकथा, सम्पादन और छायांकन पर और भी ज्यादा मेहनत की जा सकती थी.

इसकी पटकथा को इतना कमजोर लिख दिया गया है कि ऐसा लगता है कि मानो फिल्म दर्शकों को डराने के लिए सिर्फ एक घड़ी पर निर्भर है. सभी कलाकारों को एक साथ बैठाकर उस घड़ी पर 11:05 बजने का इंतजार किया जाता है. मोबाइल से की हुई बातचीत का बिना स्पीकर ऑन किए दर्शकों को भी सुनाई देना समझ से परे लगता है.

फिल्म के सम्पादन की कमान विनोद बासवराज के हाथों में है और फिल्म की शुरुआत से ही यह लगने लगता है कि आप बहुत से ऐसे दृश्यों को देख रहे हैं, जिन्हें हटाया जा सकता था.

भूतहा फिल्मों में छायांकन बहुत महत्वपूर्ण होता है, अगर यह बेहतरीन हो तो दर्शकों के दिलों की धड़कनों को बढ़ाया जा सकता पर यहां पर फिल्म का छायांकन ज्यादातर समय एक घर को अलग-अलग एंगल से दिखाने तक ही सीमित रहा है और यह प्रयास औसत लगता है. साउंड डिजाइन ही फिल्म की वह हिस्सा है जो इसे देखते हुए थोड़ा बहुत डर सा माहौल बनाने में कामयाबी पाता दिखता है.

फिल्म की असफलता का सबसे बड़ा कारण इसके बेअसर संवाद.

'द वाई' के दर्शकों के दिलों तक न पहुंचने के सबसे बड़े कारणों में इसके संवादों का बेअसर होना है. जैसे इसमें अभिनव किरन कहते हैं 'अरे बाप रे आप बबबभूत देखने के लिए बैठे हैं. भूत क्या कोई गर्लफ्रेंड होती है कि उसे देखने के लिए तड़पे जा रहे हैं. मुझे तो सोचकर भी पैंट गीली हो जाती है'.

साल 2023 में भी महिलाओं का सिनेमा में पुराना चित्रण जारी है.

फिल्म का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि इसमें बिना शादी के माता-पिता बने जोड़ों और उनके बच्चों के बारे में दिखाया गया है. भारतीय समाज में इस तरह के बच्चों को अब भी सही नजरों से नही देखा जाता और द वाई में इस विषय को दिखाया जाना, सिनेमा के वास्तविक उद्देश्यों को पूरा करता है.

 हालांकि महिलाओं के हिंदी सिनेमा में चित्रण पर साल 2023 में भी कोई फर्क नही आया है. यहां नायिका अब भी अपने पति के लिए खाना बनाने भर की भूमिका तक ही सिमटी हुई दिखती है और उसका पति ऑफिस जाता है, घर चलाता है. 
यह सब कुछ कभी बदला भी जा सकता है, जहां पर नायक घर का काम करता दिखे और वह किसी डर का शिकार हो. वहीं फिल्म की नायिका रोजगार करते हुए अपने पुरुष साथी का ध्यान रखे और उसे उसकी परेशानी से बाहर निकाले.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

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