Wednesday, October 28, 2020

9 नवम्बर विशेष : नाम-उत्तराखंड, उम्र-20 वर्ष, युवा होता उत्तराखंड।

26 अक्टूबर 2020 को पिथौरागढ़ में ऑल वेदर रोड पर कैंटर के ऊपर मलबा गिरा और तीन की मौत। 
सुनने में तो यह एक आम ख़बर है पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से प्रभावित यह रोड उत्तराखंड की अब तक की पूरी कहानी को समेटे हुए है। राजनीति,भ्रष्टाचार और अफ़सरशाही इस प्रदेश पर शुरू से ही हावी रही है। 

वर्ष 1897 से ही उत्तर प्रदेश से अलग एक पहाड़ी राज्य बनाने की मांग शुरू हो गई थी।
1940 में हल्द्वानी सम्मेलन में बद्री दत्त पांडे ने पहाड़ी क्षेत्र की विशेष स्थिति के लिए आवाज़ उठाई। 

वर्ष 1994 में उत्तराखंड की मांग ने एक जनांदोलन का रूप ले लिया। 1994 के सितम्बर और अक्टूबर माह में खटीमा, मसूरी, श्रीनगर, नैनीताल, कोटद्वार, देहरादून और मुज़्ज़फरनगर में उत्तराखंड आंदोलनकारियों का खून बहा।

15 अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने दिल्ली के लाल किले से नए राज्य उत्तरांचल की घोषणा की।

9 नवम्बर वर्ष 2000 को एक नया राज्य उत्तरांचल भारत के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया जिसे अब उत्तराखंड के नाम से जाना जाता है।

भौगोलिक स्थिति की बात करें तो पहाड़, ग्लेशियर, मैदान और झीलों वाला उत्तराखंड विविध स्थलाकृति वाला प्रदेश है। यहां की जलवायु समशीतोष्ण है।  जनवरी का महीना सबसे ठंडा रहता है।
यहां की मिट्टी चावल और गन्ने की खेती के लिए अनुकूल है। पशुपालन, कृषि मुख्य व्यवसाय हैं।

पवित्र गंगा नदी, केदारनाथ, बद्रीनाथ धाम आस्था के मुख्य केंद्र हैं। शिक्षा के क्षेत्र में देहरादून का वर्षों से पूरे देश में एक अलग स्थान है तो विश्व प्रसिद्ध पंतनगर कृषि विश्विद्यालय भी यहीं स्थित है।

हिंदी राज्य की आधिकारिक भाषा है। गढ़वाली, कुमाऊंनी, पंजाबी, नेपाली और उर्दू के साथ थारू, जौनसार जनजातियों की भाषा भी प्रमुखता से बोली जाती हैं।
 देहरादून, हरिद्वार, रुड़की, श्रीनगर, काशीपुर, रुद्रपुर, हल्द्वानी, अल्मोड़ा, नैनीताल और पिथौरागढ़ मुख्य शहर हैं। देहरादून, पंतनगर हवाई सेवा से जुड़े हैं तो देहरादून, हरिद्वार, काठगोदाम मुख्य रेलवे स्टेशन हैं।

प्रदेश की राजनीति की बात करें तो उत्तराखंड में प्रदेश गठन के बाद से ही देश की मुख्य राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस का ही शासन रहा है। 
छोटे से प्रदेश में राजनीतिक अखाड़ा ऐसा है कि वर्ष 2016 में यहां राष्ट्रपति शासन भी लग चुका है। 

राजधानी को लेकर प्रदेश गठन के पहले से ही बवाल था वह अब भी चुनावी मुद्दा बना हुआ है। देहरादून और गैरसैंण को शीतकालीन व ग्रीष्मकालीन राजधानियों में बंटा देख विकास भैया भी इन दोनों के बीच अपनी फाइलें ढोते-ढोते थक गए हैं।

नए जिले बनाने के लिए आंदोलन उत्तर प्रदेश के जमाने से ही चले आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश काल में बागेश्वर और चम्पावत जिला बनाने के लिए किए गए आंदोलन इसके उदाहरण हैं।
अलग राज्य बनने के बाद काशीपुर, खटीमा, डीडीहाट, रानीखेत को अलग बनाने की मांग चल रही है।

उत्तराखंडवासी अपनी भाषा, संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल जैसे पहाड़ी क्षेत्र जो पहाड़ियों के गढ़ हैं वहां के युवाओं के मुँह से पहाड़ी भाषा नदारद है। भाद्रपद में शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष में मनाया जाने वाला सातूं, हिलजात्रा अब बहुत कम देखने को मिलता है। पहाड़ी होली की जगह अब कपड़ाफाड़ होली ने ले ली है।

टिहरी बचाने के लिए आंदोलन किए गए पर डैम बनने से कोई नही रोक पाया, आने वाले समय में पंचेश्वर डैम का निर्माण भी होना ही है। टिहरी विस्थापित देहरादून से लेकर पथरी तक फैले हुए हैं अब उनमें मैदान की सुख सुविधा लेने की खुशी है। 
पंचेश्वर वाले भी शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क से वर्षों से महरूम हैं। कुछ वर्षों बाद वह भी अपनी नई जगह दिवाली पर दीये जलाएंगे। यह व्यवस्था ठीक है एक दिन विकास से कोसों दूर पूरा पहाड़ ही खाली कर मैदान में बसा दिया जाए। चाँद पर जमीन लेने का रास्ता भी खुल ही गया है।

पिछली पूरी शताब्दी जनांदोलनों की जननी रही थी फिर चाहे वह आज़ादी को लेकर किए गए आंदोलन रहे हों या उसके बाद सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए किए गए आंदोलन। इस शताब्दी जनता में क्रांति की आग बुझी नज़र आती है। 'चलता है' मनोस्थिति आम हो चुकी है। जब तक खुद पर कोई बात नही आती तब तक हर कोई शांत रहना ही उचित समझता है। 
'शराब नही रोज़गार दो' जैसे आन्दोलनों के बाद और निर्मल पंडित के बलिदान के बाद भी उत्तराखंड आज शराब की गिरफ्त में है। कोरोना काल में लॉकडाउन खुलते ही नैनीताल में भारी बारिश के बीच भी शराब के ठेके के बाहर लगी भीड़ की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। लाइब्रेरी खुलने के प्रति नीरस जनता का शराब के प्रति यह उत्साह राज्य का भविष्य दिखाता है।


पिछले कुछ वर्षों से रुद्रपुर, काशीपुर, हल्द्वानी , हरिद्वार, रुड़की और देहरादून में बन रही नई सोसाइटीज़ ही उत्तराखंड में विकास का एकमात्र परिचायक रही हैं। पहाड़ों में खंडहर में तब्दील हो चुके मकान कोरोना के बाद कुछ दिन के लिए तो गुलज़ार हुए हैं पर यह खुशी कुछ समय की ही है। 

उत्तराखंड के बहुत से गांवों के लिए पानी की पाइपलाइन , बिजली अब भी एक सपना ही है। पहाड़ी अब भी बाघ के आतंक से अंधेरा होने से पहले घरों में छुप जाते हैं।

पहाड़ से लोग अच्छी सुख सुविधाओं की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं। शहरों में अच्छे विद्यालय, अस्पताल, मनोरंजन के लिए मॉल, पार्क उपलब्ध हैं। देर रात तक यातायात व अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। 

पहाड़ी लोग रहना तो मैदानी क्षेत्रों में पसन्द करते हैं पर उन्हें घी, दूध, फल पहाड़ के ही चाहिए होते हैं। पहाड़ों से आने वाली टैक्सी मालगाड़ी का काम करती हैं।

उत्तराखंड के पिछड़ेपन का यह अर्थ बिल्कुल भी नही है कि यहां की जनता संसाधनों के अभाव में गरीब है बल्कि राज्य के कर्ताधर्ताओं द्वारा यहां के संसाधनों का उपयोग सही तरीके से और सबके लिए नही किया गया है। 

खड़िया के लिए पहाड़ों का खनन हो या रेता बजरी के लिए नदियों का खनन। राजनेताओं, नौकरशाहों व माफियाओं का यह गठजोड़ राज्य की अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह खा रहा है।

सिडकुल की स्थापना स्थानीय लोगों को रोज़गार देने के लिए की गई थी पर रोज़गार मिला बाहरी लोगों को। स्थानीय लोग रोज़गार की तलाश में दिल्ली, बंगलौर और गुजरात चले गए।

पहाड़ों की स्वास्थ्य सेवा बदहाल है क्योंकि अधिकतर डॉक्टर पहाड़ में पोस्टिंग नही चाहते। पहाड़ों में ईलाज के अभाव में मरीज़ों की मौत की खबरें आम हैं। जनता इसका विरोध तो करती है पर वह ज्यादा दिन तक नही रहता।

पर्यटन आधारित उद्योगों को कभी बढ़ावा नही मिला है। नैनीताल और मसूरी ही मुख्य पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित हो पाए जबकि उत्तराखंड में अन्य ऐसे रमणीक स्थल भी हैं जिन्हें देख हर कोई बार-बार उत्तराखंड की ओर आकर्षित हो सकता है।


कृषि विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय जर्नल की एक रिपोर्ट 'ग्रीन फार्मिंग' के अनुसार वर्ष 1824 में बिशप हेबर ने उत्तराखंड में चाय बागानों पर चर्चा शुरू की थी। जिसके बाद लॉर्ड वेंटिंग ने इस पर विचार करने के लिए वर्ष 1834 में एक कमेटी बनाई परिणामस्वरूप वर्ष 1835 में कोलकाता से लगभग 2000 चाय के पौधे उत्तराखंड पहुंचे थे।
वर्ष 1880 तक उत्तराखण्ड में 63 चाय बागान थे जो 10937 एकड़ भूमि पर फैले हुए थे।
मज़दूरों की कमी, परिवहन के उचित साधन न होने, लोकल बाज़ारों की अरुचि व चाय की लोकप्रियता न होने के कारण इसकी लोकप्रियता कम होते गई और वर्ष 1949 तक यह काम लुप्त होते गया। वर्तमान में उत्तराखंड में गिने-चुने चाय बागान हैं पर यहां की चाय को विदेशों में भी पसंद किया जाता है।
अब अंग्रेज़ी शासन की तरह मज़दूरों और परिवहन के साधनों की कमी नही है और चाय की लोकप्रियता के कारण इसका बाज़ार भी बहुत बड़ा है।


उत्तराखण्ड सरकार को नवीकरणीय ऊर्जा के विकास पर भी कार्य करना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा वह है जिसे प्रकृति में नियमित रूप से बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है और यह प्रकृति में बहुतायत मात्रा में उपलब्ध है।
पवन ऊर्जा से चलने वाली हवा टरबाइन अपने खेतों में लगवाकर किसान उससे अच्छा किराया कमा सकते हैं और इससे फसलों में भी कोई व्यवधान नही आता है।
हवा टरबाइन के टेक्नीशियनों की भी बहुत आवश्यकता है। इस क्षेत्र में युवाओं के लिये रोज़गार के बहुत से अवसर हैं।

सौर ऊर्जा का उपयोग चीन ने बहुतायत मात्रा में किया है और भारत का चीन से पिछड़ने का मुख्य कारण यह भी है कि चीन ने नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग सुनियोजित तरीके से किया है। 
उत्तराखण्ड में इसका इस्तेमाल कर रोज़गार के बहुत से अवसर पैदा किए जा सकते हैं।


उत्तराखंड के किसानों के लिए सिंचाई की समस्या आम है और सिंचाई की यह समस्या वर्षा जल सरंक्षण कर हल की जा सकती है। बग्वालीपोखर स्थित 'नौला फाउंडेशन' के अध्यक्ष बिशन सिंह बनेशी पिछले तीन साल से इस पर कार्य कर रहे हैं। नौला फाउंडेशन के मीडिया इंचार्ज संदीप मनराल बताते हैं कि थामण गांव से इसकी शुरुआत हुई। वहाँ नौलों के चारों ओर गड्ढे बनाए गए और पौधरोपण किया गया। परिणामस्वरूप अब वहां सूखे नौलों में पानी आ गया है। पानी की समस्या से जूझ रहे अन्य गांवों के लिए यह सर्वोत्तम उदाहरण है।
 
विपणन की सही सुविधा उपलब्ध न होने पर पहाड़ों में बहुत से फल सड़ जाते हैं और शहद, लीसा, च्यूरा, नासपाती, माल्टा, सेब, काफल, बेर, बिरोज़ा, बुरांस, दालचीनी, बिछुघास, हरड़, जंबो, गन्दरैण, शिलाजीत उत्तराखंड से बाहर नही बिक पाते।
महाराष्ट्र में ट्रेन दिन भर मछलियों को ढोती है यदि वहां ट्रेनों का यह जाल नही होता तो क्या मछलियों का व्यापार इतना सफल होता?
उत्तराखंड में मत्स्य पालन पर अब तक इतना अधिक ध्यान नही दिया गया है जबकि यह उत्तराखंड वासियों के लिए फ़ायदे का सौदा साबित हो सकता है।

वर्ष 1920-21 में टनकपुर-बागेश्वर रेल लाईन का सर्वेक्षण किया गया था। 155 किलोमीटर लंबी यह रेल लाईन शायद उत्तराखंड वासियों के लिए वरदान हो पर अब तक की सभी सरकारों के लिए यह मात्र घोषणापत्र में शामिल किए जाने वाला आश्वासन है। ब्रिटिश सरकार तो इस रेलवे लाईन का महत्व समझती थी पर भारत सरकार दशकों बाद भी इससे अंजान है। 

 अपनी जन्मभूमि ,अपने राज्य से हमें प्यार तो है पर वर्षों के आंदोलन और संघर्षों के बाद बने इस उत्तराखंड में सुविधाओं, रोज़गार की सीमितता होने के कारण इससे दूर रहना हमारी मज़बूरी बन गई है। 
सिर्फ तंत्र के भरोसे रह कर ही उत्तराखंड का विकास सम्भव नही है बल्कि इसमें समुदाय की भागीदारी की आवश्यकता है। एकजुट होकर ही तंत्र से हम अपनी मांगों को मनवाने में सफल हो सकते हैं।

चुनावी मौसम है अच्छे बुरे को समझ कर ही हमें अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करना होगा क्योंकि अभी उत्तराखंड युवा है, सही राह में चल गया तो इसमें हम सभी का फ़ायदा है।

Monday, October 5, 2020

' चाय वाले की कहानी तो ख़्याली पुलाव है, सच्ची कहानी से प्रेरित होईए। '

कोरोना से कई छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया तो लाखों लोग बेरोज़गार गए। 
कितनों ने भविष्य की चिंता करते-करते आत्महत्या कर ली। हमने अपनी पुरानी गलतियों से न अब सीख ली और न ही पहले ली थी। 

कई वर्षों पहले अपने गांव घरों से पलायन कर शहर गए लोग सरकार के अदूरदर्शी निर्णयों से कोरोना काल में वापस तो आ गए पर अब वह छोटे मोटे स्वरोज़गार अपना कर अपने घर की रोज़ी रोटी चला रहे हैं।

कोई काम छोटा बड़ा नही होता पर भारत का वह युवा जो बड़े-बड़े सपने ले कर घर से बाहर निकला था या निकलने वाला था वह अपना मन मसोसकर यह कार्य कर रहा है। 

डेढ़ करोड़ से दो करोड़ का टर्नओवर और चौदह से पंद्रह लाख की सालाना आय।
सुनने में यह रकम शायद कम लगे क्योंकि हमें तो एंटिला वाले अरबपति और ड्रीम 11 वाले करोड़पति ही दिखते हैं। 

 मन में कुछ करने की सच्ची लगन हो और बचपन से अच्छा मार्गदर्शन मिले तो सफलता कदम चूमती है। कुछ यही कहानी है मूल रूप से उत्तराखंड के गांव फरसौली, भवाली में 15 जून 1969 को नन्द किशोर भगत (भगतदा) के घर जन्में संजीव भगत की।

संजीव भगत का परिवार एक मध्यमवर्गीय परिवार था जिसमें उनके पिता फॉरेस्ट में क्लर्क, माता गृहणी और दादा जी की भवाली में छोटी सी दुकान थी।

संजीव ने अपने बचपन के दिन बड़े ही मुफ़लिसी में काटे उनकी विद्यालयी शिक्षा नैनीताल से हुई। कभी-कभी तो यह स्थिति आ जाती थी कि उनके पास विद्यालय आने-जाने तक के लिए पैसे नही होते थे।

संजीव के पिता उन्हें बचपन से ही स्वरोज़गार करने के लिए प्रेरित करते थे। वह स्वयं भी अपने समय से कहीं आगे की सोच लेकर चल रहे थे, नन्द किशोर भगत (भगतदा) एक बार अपनी सरकारी नौकरी छोड़ इलाहाबाद स्थित समाचार पत्र 'अमृत प्रभात' में नौकरी करने चले गए थे पर उन्हें अपने परिवार की वजह से वहां से वापस आना पड़ा। 
भगतदा ने वर्ष 1977 में पदमश्री सुखदेव पांडे की मदद से पूरी तरह से वानिकी पर आधारित एक शानदार मैगज़ीन 'बनरखा' निकाली थी पर आर्थिक कारणों से यह सिर्फ एक साल बाद ही बन्द हो गई। उसके बाद वह 'उत्तराखण्ड भारती' और 'नैनीताल समाचार' से भी जुड़े रहे।

आर्थिक स्थिति मज़बूत न होने के बाद भी शिक्षा के माहौल में पल-बढ़ रहे संजीव जब ग्यारवीं कक्षा में आए तभी उन्होंने 'उत्तर प्रदेश खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड' के कार्यपालक अधिकारी कमल टावरी को कोई उद्योग स्थापित करने के लिए पत्र लिखा। 

खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड का उद्देश्य छोटे-छोटे उद्योगों तथा कम पूँजी निवेश के उद्योगो को स्थापित कराकर अधिक से अधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है।

अपने समय के बेहतरीन आईएएस रहे कमल टावरी का ज़ोर ग्राम स्वराज पर अधिक रहा है। उन्होंने इस पत्र को गम्भीरता से लिया और पत्र के जवाब में कुछ दिन बाद हल्द्वानी से कुछ लोग उद्योग का मॉडल देखने आए तो वह एक किशोर को देख चौंक गए। 

संजीव को एसबीआई बैंक से लोन लेने में बहुत परेशानी हो रही थी। जिसकी शिकायत उन्होंने 'उद्योग बन्धु' में भी की थी। 
'उद्योग बंधु' उत्तर प्रदेश राज्य सरकार द्वारा औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों में निवेश की सुविधा प्रदान करने के लिए विकसित किया गया एक संगठन है, इसके अलावा यह उद्योगों की समस्याओं को हल करने के लिए है जो विभिन्न सरकारी विभागों के सहयोग से है। जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में जिला स्तरीय उद्योग बंधु कार्य करता है। तत्कालीन डीएम दीपक सिंघल ने उनकी शिकायत पर कार्रवाई की पर फिर भी उनका लोन स्वीकृत नही हुआ।

इसके बाद संजीव ने अपने पिताजी के पचास हज़ार रुपए से 1989 में फूड प्रोसेसिंग के लिए बिल्डिंग बनाई। 1989-1995 तक नैनीताल में रह प्राइवेट माध्यम से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसके साथ ही वह दैनिक समाचार पत्र 'उत्तर उजाला' से जुड़ गए और इससे ही उनका जेबख़र्च भी चलता था।
पत्रकारिता की ओर मुड़ रहे संजीव 'दैनिक जागरण' के ब्यूरो चीफ भी बन गए। 

वर्ष 1993 में उद्योग लगाने के लिए संजीव भगत का 2,63,000 का लोन पास हुआ जिससे उन्होंने 'फूड प्रोसेसिंग' की फैक्टरी स्थापित की।

 'फूड प्रोसेसिंग' उद्योग का मतलब खाने की वस्तुओं की प्रोसेसिंग कर उसे नए रूप में पेश करने के कारोबार से है। भारत में लोगों की तेजी से बदलती लाइफ स्टाइल ने खाद्य प्रसंस्कृत उत्पादों की मांग में लगातार बढ़ोतरी की है । 

पत्रकारिता में रम चुके संजीव के लिए पत्रकार होने का रौब छोड़ना और खुद का अख़बार शुरू करने का सपना छोड़ना मुश्किल काम हो रहा था पर उन्होंने फूड प्रोसेसिंग को ही अपना कैरियर बनाने की ठान ली थी। उन्होंने कभी किसी सरकारी नौकरी के लिए फॉर्म नही भरा ।

संजीव की तीनों बहने उच्च शिक्षा प्राप्त थी जिनमें से उनकी बड़ी बहन ने इग्नू से फूड प्रोसेसिंग से सम्बंधित कोर्स किया था। उन्होंने संजीव की उद्योग स्थापित करने के शुरुआती दिनों में बहुत मदद की। 

वर्ष 1993 में जब यह काम शुरू हुआ तो संजीव ने इसको लेकर तीन साल का लक्ष्य रखा था। वर्ष 1994 में उन्होंने जब बाज़ार में सामान डाला तो उनका सारा पैसा बाज़ार में फंस गया। वर्ष 1995 में संजीव के पिताजी ने फिर अपनी जमापूंजी से उनकी मदद करी। वर्ष 1996 में उनका थोड़ा पैसा बाज़ार से वापस आने लगा। वर्ष 1996-97 में नुकसान में रहकर भी उन्होंने उद्योग चलाया।

वर्ष 1998 फरसौली में फूड प्रॉडक्ट्स का 'नैनीताल फूड प्रॉडक्ट्स' नाम से अपना पहला शोरुम खोलने के बाद उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नही देखा। 

भवाली के पास  ज्योलीकोट में वर्ष 2004 में उन्होंने अपना दूसरा शोरूम बनाया पर वह आपदा में बह गया। इसके बाद उन्होंने भवाली में ही शोरूम बनाने के लिए जमीन ली पर काम अच्छा चल जाने पर बाद में वर्ष 2011 में उन्होंने उस जगह एक होटल बनाया। इस समय संजीव भगत के 'नैनीताल फूड प्रॉडक्ट्स' नाम से पांच शो रूम चल रहे हैं। जिसमें दो का स्वामित्व उनके और तीन अन्य के पास है।

 अपनी शुरुआत के 27 वर्ष बीत जाने के बाद उनका उत्पाद 'फ्रुटेज़' उत्तराखण्ड में अब एक ब्रांड बन गया है जिसका डेढ़ से लेकर दो करोड़ का टर्नओवर है और इससे संजीव की सालाना कमाई पन्द्रह से बीस लाख की है। वह तीस से चालीस लोगों को प्रत्यक्ष और इतने ही लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार भी प्रदान कर रहे हैं। प्रत्यक्ष रूप से रोज़गार प्राप्त करने वालों में उनकी फैक्ट्री, शोरूम और होटल में काम करने वाले लोग शामिल हैं तो अप्रत्यक्ष रूप से उनके उत्पादों के लिए फल लगाने, तोड़ने, पैकिंग तैयार करने वाले लोग शामिल हैं।


उनकी संस्था क्षेत्रीय स्तर पर फलोत्पादन को बढ़ावा दे रही है जिसके अंतर्गत उनकी संस्था द्वारा गोविंद बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखण्ड के विद्यार्थियों को प्रतिवर्ष व्यवसायिक प्रशिक्षण भी देती है।

इस बीच संजीव भगत ने व्यापार की कई अनुभव भी प्राप्त किए जिसमें उनकी विफलता भी शामिल है। व्यापार बढ़ाने के उद्देश्य से संजीव अपने उत्पादों को बेचने अहमदाबाद, राजकोट, सूरत, बड़ौदा, दिल्ली और लखनऊ भी ले गए पर वहां उन्हें कोई लाभ नही मिला।  संजीव कहते हैं कि "हर उत्पाद के बिकने का अपना एक क्षेत्र होता है। 'बुरांश' उत्तराखण्ड का राजकीय वृक्ष है तो नेपाल का राष्ट्रीय। हिमालयी क्षेत्र के लोग तो इसे पहचानते हैं पर मैदान आते-आते लोग इससे अनभिज्ञ हो जाते हैं। 
वहां तक उत्पाद पहुँचाने पर परिवहन, रखरखाव की लागत भी बढ़ जाती है।
फूड प्रोसेसिंग के कार्य में लोगों के स्वाद की जानकारी होना बहुत आवश्यक है। दक्षिण भारतीयों और उत्तर भारतीयों के खाद्य पदार्थों और खानपान में अंतर तो होता ही है।

"फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाएं हैं। कोरोना की वजह से अभी काम कम है पर स्थिति सामान्य होने के बाद वह काम बढ़ाएंगे जिसमें वह इम्युनिटी बढ़ाने वाले प्रोडक्ट्स भी शामिल करेंगे। 

"स्वरोज़गार और व्यापार के क्षेत्र में कोरोना के बाद से ही कुछ बढ़ोतरी देखने में आई है। सब जगह से हार के आने के बाद स्वरोज़गार ढूंढना और किसी उद्योग बसाने के बारे में सोचना एक हारी हुई लड़ाई को जीतना जैसा है। 

"अगर किसी के घर में कोई बीमार है या किसी को अपनी बेटी का विवाह करवाना है तो लोग मदद कर लेंगे पर यदि आप व्यापार शुरू करने के लिए किसी से मदद मांगेंगे तो कोई साथ देने के लिए तैयार नही होता। लोग प्रोत्साहित करने की जगह हतोत्साहित ज्यादा करते हैं। कुछ ताने देते हैं कि यह क्या व्यापार करेगा। लोन खाने के लिए उद्योग लगाया होगा।

 "व्यापार के प्रति हमारी जो सोच है उसके लिए हमारा सामाजिक ढांचा जिम्मेदार है। हम अपने बच्चों को बचपन से ही सिर्फ इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक या कोई सरकारी अधिकारी बनाने के लिए ही तैयार करते हैं। हम यह कभी नही सोचते कि हमारा बच्चा व्यापारी, खिलाड़ी, गीतकार, नृतक, पत्रकार या किसान बने। 

"हमें अपनी सोच में रचनात्मकता लानी होगी। अभिवावकों से पहले शिक्षकों को अपने बच्चों से यह शुरुआत करनी होगी। इन दोनों को अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा। 
मैं इसलिए सफल हूं क्योंकि मुझे एक दूरदर्शी सोच वाले पिता मिले।

" कौशल के जरिए कम पूंजी वाले काम करना आसान है पर वह कभी हमारे सपने पूरे नही कर सकता। 
बड़े उद्योग लगाने के लिए डीपीआर बनानी होगी। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) एक परियोजना की योजना और डिजाइन चरण के आउटपुट हैं। डीपीआर परियोजना के लिए एक बहुत ही विस्तृत और विस्तृत योजना है, जो परियोजना के लिए आवश्यक समग्र कार्यक्रम, विभिन्न भूमिकाओं और जिम्मेदारियों, गतिविधियों और संसाधनों को दर्शाती है। 

"हमें विपणन सीखना होगा। बैंक से लोन लेने के लिए वहां के चक्कर काटने होंगे, मशीनें लेनी होंगी, जमीन ख़रीदनी होगी, ढांचा बनाना होगा , बिजली- पानी की व्यवस्था करनी होगी और प्रतिस्पर्धा के बारे में जानना होगा। उद्योग स्थापित करने में सालों लग जाते हैं।"

आज हम असफ़ल, बेरोज़गार होने पर सरकार को कोसते तो हैं पर संजीव भगत की कहानी देखकर वास्तव में यह अहसास तो होता है कि कहीं न कहीं हम स्वयं भी इसके लिए दोषी हैं। अगर एक सत्रह साल का बच्चा उद्योग लगाने की ठान पूरे तंत्र से लड़ सफलता प्राप्त कर एक आम आदमी के लिए उदाहरण बन सकता है तो हम भी क्यों किसी काम की शुरूआत करने से पहले सैंकड़ों बार सोचते हैं और जब निर्णय लेते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

Thursday, October 1, 2020

देवी है न कि एक उत्पाद : हमारे शोहदों को कब लज्जा आएगी !!

6 दिसंबर 2019 को तमिलनाडु रेप पीड़िता को पुलिस एनकाउंटर से न्याय मिला तो निर्भया को न्यायपालिका के जरिए 20 मार्च 2020 को न्याय मिला। दोनों घटनाओं का देश की मीडिया ने जमकर कवरेज़ किया था और लगा भी था कि बलात्कारियों के इस अंजाम से समाज में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों में कुछ कमी आएगी।

14 सितंबर 2020 को फिर से देश की एक बेटी के साथ उत्तर प्रदेश के हाथरस में दरिंदगी की गई। इतना ही नहीं घटना को अंजाम देने के बाद पीड़िता की जीभ काट दी गई।  पोस्टमार्टम के अनुसार पीड़िता की रीढ़ की हड्डी टूटी हुई थी तथा गला घोटकर मारने की कोशिश करने की भी पुष्टि हुई। उसके बाद घटना को छुपाने, आरोपियों को बचाने और साक्ष्यों को मिटाने का गंदा खेल शुरू हुआ।
 रातों रात परिजनों की अनुपस्थिति में पीड़िता का अंतिम संस्कार कर दिया गया।
 स्थानीय पत्रकारों के प्रयासों का ही प्रतिफल रहा कि राष्ट्रीय मीडिया को भी ये दर्दनाक घटना दिखानी पड़ी। प्रदेश के मुखिया ने अब पीड़िता को जल्द न्याय दिलाने के लिए एसआईटी का गठन कर दिया है।

 निर्भया के साथ हुई घटना के बाद देश में महिलाओं की सुरक्षा के किए बहुत से कदम उठाए गए थे पर वह क्या कारण हैं जो महिलाओं के प्रति अपराधों में कोई कमी नही आ रही है।

रॉयटर्स द्वारा किए गये एक सर्वे के अनुसार भारत महिलाओं के रहने के लिये सबसे खतरनाक देश है।

महिलाओं को देवी की तरह पूजे जाने वाले देश में ऐसा क्या हो गया है जिससे महिलाओं को हवस मिटाने वाले सामान की तरह देखा जाता है। अगर बिना जोर जबरदस्ती के काम हो गया तब तो ठीक है नही तो एक लाश को नोचकर भी बलात्कारियों की हवस शांत नही होती। 

बलात्कार को रोकने और उन्हें सजा दिलाने के लिए दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल लगातार संघर्ष करती रहती हैं व अन्य अनेक संस्थाएं, संगठन भी इसके लिये संघर्षरत हैं।

वर्ष 2019 में राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों पर नज़र डालें तो वर्ष 2019 में 32260 महिलाओं के साथ भारत में बलात्कार किया गया जिनमें 286 महिलाओं की बाद में हत्या कर दी गई।
पूरे भारत में  वर्ष 2019 में 156 महिलाओं पर एसिड अटैक किया गया जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश की 42 महिलाएं शामिल थी।
पूरे देश में सबसे ज्यादा 60.9 प्रतिशत बलात्कार के मामले 18-30 वर्ष की महिलाओं के साथ सामने आए थे और 94.2 प्रतिशत बलात्कारी पीड़िता के जानने वाले थे।

समाज के शक्तिशाली वर्ग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं जिसमें बलात्कार भी शामिल है फिर वह किसी बॉस का अपनी कर्मचारी या किसी जमींदार का गांव की गरीब महिला के साथ किया गया बलात्कार हो।

दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए बलात्कार तथा हत्या के मामले के बाद देश में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 पारित किया गया जिसने बलात्कार की परिभाषा को और अधिक व्यापक बनाया तथा इसके अधीन दंड के प्रावधानों को कठोर किया।

जनवरी 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में एक आठ वर्षीय बच्ची के साथ हुए अपहरण, सामूहिक बलात्कार तथा हत्या के मामले के बाद पूरे देश में इसका विरोध हुआ तथा आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की मांग की गई। इसके बाद आपराधिक कानून ( संशोधन ) अधिनियम, 2018 पारित किया गया जिसमें पहली बार यह प्रावधान किया गया कि 12 वर्ष से कम आयु की किसी बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में न्यूनतम 20 वर्ष के कारावास या मृत्युदंड की सज़ा का प्रावधान होगा।



कड़े कानून बनाने के बाद भी कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो किसी बलात्कार पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए सामने आएंगे। 
अधिकतर बलात्कारी पीड़िता का जानने वाला होगा तो क्या उसे फाँसी पर न लटकाने के लिए दबाव नही बनाया जाएगा?
लंबी कानूनी प्रक्रिया लड़ते लड़ते फिर कोई पीड़िता उन्नाव रेप पीड़िता की तरह जिंदा नही जला दी जाएगी?


शायद बलात्कार की सजा और भी कठोर हो जाए, इसे रोकने के लिये कड़े से कड़े कानून भी बन जाये पर क्या उससे ऐसे लोग खत्म हो जायेंगे जिनके मन में एक बलात्कारी पल रहा है? लोग राह चलती महिला को ऊपर से नीचे घूरना बन्द कर देंगे?
माता-पिता अपनी बेटियों को रात में अकेले सफर पर भेजने से पहले डरेंगे नही?

एक बलात्कारी को समाज से मिटाने के लिए सबसे पहले उस सोच को समाप्त करना जरुरी है जिससे एक बलात्कारी जन्म लेता है।
एक भाई, बेटा, पति कैसे बलात्कारी बन जाता है और उसकी सोच इतनी विकृत कैसे हो जाती है यह जानना जरूरी है।



बलात्कार की घटनाओं की संख्या क्यों कम नही ही रही है इसका कारण जानने के लिये हमें समय में थोड़ा पीछे जाना होगा जब सस्ती मैगज़ीनें बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण अभिनेत्रियों के अश्लील चित्र छापने लगे। फिल्मों में महिलाओं को सिर्फ मनोरंजन के साधन के रूप में पेश किया जाने लगा और विज्ञापनों में महिला एक उत्पाद बन गई।

 जनसंचार के लगभग सभी साधनों में कामुकता परोसी जाने लगी। ऐसे पुरूष जो किसी प्रकार की शिक्षा ग्रहण नही करते उनके लिये यही साहित्य सब कुछ है। मानव जो देखता, सोचता, पढ़ता है वह वही करना चाहता है , मानव मन कुछ इस प्रकार का ही होता है।

नाटकों, डिस्को, बार में अश्लीलता शामिल हो गयी।
जो दिखता है वही बिकता है के सिद्धांत पर शरीर के प्रदर्शन को पैसे कमाने का जरिया बना दिया गया।
भारतीय अपनी संस्कृति, संस्कार भूल कर पश्चिमी संस्कृति को अपनाने लगे।

इंटरनेट की क्रांति या यूँ कहे सस्ते डाटा की शुरुआत से सब कुछ बदल गया। शिक्षण सम्बन्धी साइटों, समाचारों से जुड़ी साइटों की जगह पोर्न साइटों ने ले ली।
सस्ता मिलता डाटा सिर्फ पोर्न से जुड़ी सामग्रियों में खर्च होने लगा।
मोबाइल के बहुत से एप्लिकेशनस अश्लीलता को परोसने के लिये जिम्मेदार हैं। इन एप्स की पहुंच हर उम्र के उपयोगकर्ता तक है चाहे वह उसे प्रयोग करने लायक है भी या नही।

हमारे शिक्षा तंत्र में यौन शिक्षा की कमी ने युवाओं को रास्ते से भटका दिया है।
व्यसनी भोजन, मदिरा प्रेम अपराध और बलात्कार को जन्म देने के लिये उत्तरदायी है।

कई शोधों से यह सिद्ध हुआ है पुरुषों में मन में जन्म ले रही कामोत्तेजना ही उसके द्वारा बलात्कार करने का कारण बनती है। 

भारत में पुरुषवादी समाज है जहाँ महिला नाम के आगे पति का नाम लगाती है और पूरी ज़िंदगी खुद के नाम को भूल जाती है, ऐसे समाज में कुछ पुरुष खुद को महिलाओं से श्रेष्ठ समझने लगते हैं उनके लिये महिला सिर्फ यौन इच्छा तृप्त करने का साधन होती हैं। 

यह वहीं पुरुष होते हैं जिन्हें बचपन से कभी महिलाओं का सम्मान करना नही सिखाया जाता। घर की महिलाओं को उनकी सेवा में लगाया जाता है ताकि वह खुद को पुरुष समझ सके ।

अमरीका में भी बलात्कार पर किए गए एक शोध से पता चला कि महिलाओं को मर्दाना ताकत से दबने वाला ही समझा जाता है, परिचित पुरुष यह मान लेता है कि शारीरिक सम्बन्ध के लिए कहने पर महिला मान ही जाएगी पर उसकी अस्वीकृति उसे हिंसक और एक अपराधी बना देती है।

महिलाएं भी समाज में अपनी और अपने परिवार की बदनामी के डर से अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को चुपचाप सहती रहती है जिससे उन पर अत्याचार करने वालों का मनोबल बढ़ता जाता है।

महिला द्वारा की जाने वाली शिकायतों की प्रकिया सरल बनाना आवश्यक है और महिलाओं को स्कूली जीवन से ही खुद की सुरक्षा करना सिखाना होगा।

स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं। आपसी सहयोग के बिना दोनों का अस्तित्व असंभव है। - महात्मा गांधी

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