Thursday, October 1, 2020

देवी है न कि एक उत्पाद : हमारे शोहदों को कब लज्जा आएगी !!

6 दिसंबर 2019 को तमिलनाडु रेप पीड़िता को पुलिस एनकाउंटर से न्याय मिला तो निर्भया को न्यायपालिका के जरिए 20 मार्च 2020 को न्याय मिला। दोनों घटनाओं का देश की मीडिया ने जमकर कवरेज़ किया था और लगा भी था कि बलात्कारियों के इस अंजाम से समाज में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों में कुछ कमी आएगी।

14 सितंबर 2020 को फिर से देश की एक बेटी के साथ उत्तर प्रदेश के हाथरस में दरिंदगी की गई। इतना ही नहीं घटना को अंजाम देने के बाद पीड़िता की जीभ काट दी गई।  पोस्टमार्टम के अनुसार पीड़िता की रीढ़ की हड्डी टूटी हुई थी तथा गला घोटकर मारने की कोशिश करने की भी पुष्टि हुई। उसके बाद घटना को छुपाने, आरोपियों को बचाने और साक्ष्यों को मिटाने का गंदा खेल शुरू हुआ।
 रातों रात परिजनों की अनुपस्थिति में पीड़िता का अंतिम संस्कार कर दिया गया।
 स्थानीय पत्रकारों के प्रयासों का ही प्रतिफल रहा कि राष्ट्रीय मीडिया को भी ये दर्दनाक घटना दिखानी पड़ी। प्रदेश के मुखिया ने अब पीड़िता को जल्द न्याय दिलाने के लिए एसआईटी का गठन कर दिया है।

 निर्भया के साथ हुई घटना के बाद देश में महिलाओं की सुरक्षा के किए बहुत से कदम उठाए गए थे पर वह क्या कारण हैं जो महिलाओं के प्रति अपराधों में कोई कमी नही आ रही है।

रॉयटर्स द्वारा किए गये एक सर्वे के अनुसार भारत महिलाओं के रहने के लिये सबसे खतरनाक देश है।

महिलाओं को देवी की तरह पूजे जाने वाले देश में ऐसा क्या हो गया है जिससे महिलाओं को हवस मिटाने वाले सामान की तरह देखा जाता है। अगर बिना जोर जबरदस्ती के काम हो गया तब तो ठीक है नही तो एक लाश को नोचकर भी बलात्कारियों की हवस शांत नही होती। 

बलात्कार को रोकने और उन्हें सजा दिलाने के लिए दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल लगातार संघर्ष करती रहती हैं व अन्य अनेक संस्थाएं, संगठन भी इसके लिये संघर्षरत हैं।

वर्ष 2019 में राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों पर नज़र डालें तो वर्ष 2019 में 32260 महिलाओं के साथ भारत में बलात्कार किया गया जिनमें 286 महिलाओं की बाद में हत्या कर दी गई।
पूरे भारत में  वर्ष 2019 में 156 महिलाओं पर एसिड अटैक किया गया जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश की 42 महिलाएं शामिल थी।
पूरे देश में सबसे ज्यादा 60.9 प्रतिशत बलात्कार के मामले 18-30 वर्ष की महिलाओं के साथ सामने आए थे और 94.2 प्रतिशत बलात्कारी पीड़िता के जानने वाले थे।

समाज के शक्तिशाली वर्ग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं जिसमें बलात्कार भी शामिल है फिर वह किसी बॉस का अपनी कर्मचारी या किसी जमींदार का गांव की गरीब महिला के साथ किया गया बलात्कार हो।

दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए बलात्कार तथा हत्या के मामले के बाद देश में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 पारित किया गया जिसने बलात्कार की परिभाषा को और अधिक व्यापक बनाया तथा इसके अधीन दंड के प्रावधानों को कठोर किया।

जनवरी 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में एक आठ वर्षीय बच्ची के साथ हुए अपहरण, सामूहिक बलात्कार तथा हत्या के मामले के बाद पूरे देश में इसका विरोध हुआ तथा आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की मांग की गई। इसके बाद आपराधिक कानून ( संशोधन ) अधिनियम, 2018 पारित किया गया जिसमें पहली बार यह प्रावधान किया गया कि 12 वर्ष से कम आयु की किसी बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में न्यूनतम 20 वर्ष के कारावास या मृत्युदंड की सज़ा का प्रावधान होगा।



कड़े कानून बनाने के बाद भी कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो किसी बलात्कार पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए सामने आएंगे। 
अधिकतर बलात्कारी पीड़िता का जानने वाला होगा तो क्या उसे फाँसी पर न लटकाने के लिए दबाव नही बनाया जाएगा?
लंबी कानूनी प्रक्रिया लड़ते लड़ते फिर कोई पीड़िता उन्नाव रेप पीड़िता की तरह जिंदा नही जला दी जाएगी?


शायद बलात्कार की सजा और भी कठोर हो जाए, इसे रोकने के लिये कड़े से कड़े कानून भी बन जाये पर क्या उससे ऐसे लोग खत्म हो जायेंगे जिनके मन में एक बलात्कारी पल रहा है? लोग राह चलती महिला को ऊपर से नीचे घूरना बन्द कर देंगे?
माता-पिता अपनी बेटियों को रात में अकेले सफर पर भेजने से पहले डरेंगे नही?

एक बलात्कारी को समाज से मिटाने के लिए सबसे पहले उस सोच को समाप्त करना जरुरी है जिससे एक बलात्कारी जन्म लेता है।
एक भाई, बेटा, पति कैसे बलात्कारी बन जाता है और उसकी सोच इतनी विकृत कैसे हो जाती है यह जानना जरूरी है।



बलात्कार की घटनाओं की संख्या क्यों कम नही ही रही है इसका कारण जानने के लिये हमें समय में थोड़ा पीछे जाना होगा जब सस्ती मैगज़ीनें बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण अभिनेत्रियों के अश्लील चित्र छापने लगे। फिल्मों में महिलाओं को सिर्फ मनोरंजन के साधन के रूप में पेश किया जाने लगा और विज्ञापनों में महिला एक उत्पाद बन गई।

 जनसंचार के लगभग सभी साधनों में कामुकता परोसी जाने लगी। ऐसे पुरूष जो किसी प्रकार की शिक्षा ग्रहण नही करते उनके लिये यही साहित्य सब कुछ है। मानव जो देखता, सोचता, पढ़ता है वह वही करना चाहता है , मानव मन कुछ इस प्रकार का ही होता है।

नाटकों, डिस्को, बार में अश्लीलता शामिल हो गयी।
जो दिखता है वही बिकता है के सिद्धांत पर शरीर के प्रदर्शन को पैसे कमाने का जरिया बना दिया गया।
भारतीय अपनी संस्कृति, संस्कार भूल कर पश्चिमी संस्कृति को अपनाने लगे।

इंटरनेट की क्रांति या यूँ कहे सस्ते डाटा की शुरुआत से सब कुछ बदल गया। शिक्षण सम्बन्धी साइटों, समाचारों से जुड़ी साइटों की जगह पोर्न साइटों ने ले ली।
सस्ता मिलता डाटा सिर्फ पोर्न से जुड़ी सामग्रियों में खर्च होने लगा।
मोबाइल के बहुत से एप्लिकेशनस अश्लीलता को परोसने के लिये जिम्मेदार हैं। इन एप्स की पहुंच हर उम्र के उपयोगकर्ता तक है चाहे वह उसे प्रयोग करने लायक है भी या नही।

हमारे शिक्षा तंत्र में यौन शिक्षा की कमी ने युवाओं को रास्ते से भटका दिया है।
व्यसनी भोजन, मदिरा प्रेम अपराध और बलात्कार को जन्म देने के लिये उत्तरदायी है।

कई शोधों से यह सिद्ध हुआ है पुरुषों में मन में जन्म ले रही कामोत्तेजना ही उसके द्वारा बलात्कार करने का कारण बनती है। 

भारत में पुरुषवादी समाज है जहाँ महिला नाम के आगे पति का नाम लगाती है और पूरी ज़िंदगी खुद के नाम को भूल जाती है, ऐसे समाज में कुछ पुरुष खुद को महिलाओं से श्रेष्ठ समझने लगते हैं उनके लिये महिला सिर्फ यौन इच्छा तृप्त करने का साधन होती हैं। 

यह वहीं पुरुष होते हैं जिन्हें बचपन से कभी महिलाओं का सम्मान करना नही सिखाया जाता। घर की महिलाओं को उनकी सेवा में लगाया जाता है ताकि वह खुद को पुरुष समझ सके ।

अमरीका में भी बलात्कार पर किए गए एक शोध से पता चला कि महिलाओं को मर्दाना ताकत से दबने वाला ही समझा जाता है, परिचित पुरुष यह मान लेता है कि शारीरिक सम्बन्ध के लिए कहने पर महिला मान ही जाएगी पर उसकी अस्वीकृति उसे हिंसक और एक अपराधी बना देती है।

महिलाएं भी समाज में अपनी और अपने परिवार की बदनामी के डर से अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को चुपचाप सहती रहती है जिससे उन पर अत्याचार करने वालों का मनोबल बढ़ता जाता है।

महिला द्वारा की जाने वाली शिकायतों की प्रकिया सरल बनाना आवश्यक है और महिलाओं को स्कूली जीवन से ही खुद की सुरक्षा करना सिखाना होगा।

स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं। आपसी सहयोग के बिना दोनों का अस्तित्व असंभव है। - महात्मा गांधी

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