Wednesday, September 27, 2023

साइबर एनकाउंटर

साहित्यिक रूप से यह किताब शायद इतनी सशक्त नही है, कहीं पर पुलिस के भवनों का महिमामंडन ज्यादा किया हुआ लगता है लेकिन फिर भी इसकी साइबर अपराध की कहानियां चौंकाती है। कोरोना के बाद साइबर अपराधों के दौर में इस किताब का पढ़ना जरूरी है

Tuesday, September 26, 2023

शिक्षा की सही दिशा.

इस दुनिया में काफी कुछ घटित हो रहा है, जंगल में आग और बढ़ते प्रदूषण से पूरी पृथ्वी को नुकसान पहुंच रहा है पर फिर भी मनुष्य को बस अपनी ही धुन लगी है. ऐसा इसलिए क्योंकि उसे लगता है कि इन सबसे उसे कोई फर्क नही पड़ना और हमारी शिक्षा व्यवस्था भी ऐसी है कि बच्चों का अपने पर्यावरण, अपने समाज से लगाव नही बन पाता.

हिमालय और उसके ग्लेशियरों से अनजान हैं हम, साथ ही लोगों के मन में सार्वजनिक सम्पत्तियों और स्थान के लिए कोई प्रेम नही है.

हिमालय में जलती आग को समय से बुझा दिया जाए तो पर्यावरण को हो रहे नुकसान को समय से रोका जा सकता है, जिसमें ग्लोबल तापमान का बढ़ना मुख्य है पर इसे समय से रोका नही जाता. पहाड़ों में रहने वाले लोग हिमालय को अपना नही समझते क्योंकि जंगलों में आम जनता के अधिकार लगभग समाप्त कर दिए गए हैं और उन्हें इन जंगलों से अपनत्व महसूस नही होता.

यही हाल हम ग्लेशियरों का होता देख रहे हैं, जिनकी बर्फ तेजी से पिघल रही है. बर्फ की सतह सूर्य की किरणों को अंतरिक्ष में परावर्तित करने में सक्षम है और यह तापमान वृद्धि से पृथ्वी को बचाती है लेकिन मशीनों, वाहनों के बढ़ते प्रयोग से पृथ्वी का तापमान बढ़ता ही जा रहा है. मनुष्य का इन ग्लेशियरों से कोई सीधा सम्बन्ध नही है, इसलिए उन्हें इसकी परवाह नही है. यह मनुष्य की आदत है कि वह सिर्फ उन लोगों की चिंता करता है, जिनसे उसका सीधा सम्बन्ध होता है. मनुष्य सिर्फ उन पेड़ पौधों की रक्षा करता है, जो उसे फल देते हैं या उसके घर का सौंदर्य बढ़ाते हैं.

इसी तरह देश में होने वाले दंगों में हम किसी युवा को सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हुए देखते हैं, लोग सार्वजनिक स्थानों पर तम्बाकू खाकर थूकते हैं तो इसमें दोष हमारी शिक्षा व्यवस्था का है कि हम अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा नही दे पाए कि वह सार्वजनिक सम्पत्ति को अपनी संपत्ति नही समझता और वह सार्वजनिक स्थान पर गंदगी करते, उसे अपना घर नही समझता.

इंसान और जानवर में अंतर बनाए रखेगा शिक्षा में नवाचार.

मनुष्य के व्यवहार को सभ्य बनाने के लिए आवश्यक है कि उसकी प्रारंभिक शिक्षा में ही इस पर काम किया जाए. शिक्षा में नवाचार का प्रयोग करते हुए शुरू से ही यह सिखाया जाए कि पूरी धरती ही उसका घर है और यहां प्रकृति को पहुँचने वाला हर नुकसान उसका अपना है. 

बच्चों में 'वसुधैव कुटुम्बकम' विचार डालने की जरूरत हम शिक्षक महेश पुनेठा की एक फेसबुक पोस्ट से समझ सकते हैं. उन्होंने लिखा "स्कूल में एक बगीचा हो. उसमें तरह-तरह के फूल हों. मैं अपने मन पसन्द के फूलों को तोड़ सकूं." यह बात पिछले दिनों स्कूल में हुई भाषण प्रतियोगिता के दौरान कक्षा छः के बच्चे ने कही. विषय था, मेरे सपनों का स्कूल. बगिया होने और फूल होने की इच्छा तो स्वाभाविक है लेकिन फूलों को तोड़ने की इच्छा.
आखिर फूल तोड़ने की इच्छा बच्चे के मन में क्यों पैदा हुई? अपनी पसंदीदा चीज को तोड़ने की यह इच्छा! कैसा है यह सौंदर्यबोध?
 इस पर विचार होना चाहिए कि कितनी सही है यह इच्छा और कहां हैं इसकी जड़ें?

महेश पुनेठा की बात से यह सामने आता है कि बच्चा यह फूल इसलिए तोड़ना चाहता है क्योंकि उससे उसका कोई लगाव नही है, ठीक वैसे ही जैसे हमारा हिमालय में लगी आग और पिघलते ग्लेशियरों के साथ कोई सीधा सम्बन्ध नही होता. 

शिक्षा में नवाचार की तुरन्त आवश्यकता.

आखिर किसी बच्चे के मन में इस संसार के खूबसूरत पेड़- पौधों, पशु-पक्षियों, पहाड़ों, सार्वजनिक सम्पत्तियों व अन्य मनुष्यों के लिए वह अपनत्व क्यों नही जगता है जो वह अपने से सम्बंधित के लिए दिखाता है.
यहां पर कमी हमें शिक्षा में लगती है, जहां नवाचार की कोई जगह नही है.

बचपन से ही हम बच्चों के कंधे पर किताब का बोझ लाद देते हैं और उससे प्रकृति, समाज से जुड़ा कोई प्रयोगात्मक काम नही सिखाया जाता. जैसे बच्चों को खेती के बारे में कुछ नही पता होता, उसे फसलों के बारे में नही मालूम होता. बच्चों से सफाई नही कराई जाती, उसे यह नही पता होता कि गीले और सूखे कूड़े के अलग अलग क्या नुकसान हैं. बच्चों से कभी कोई नाटक नही लिखवाया जाता जिससे उसे महसूस हो कि इस पृथ्वी को हम मनुष्यों ने कितना नुकसान पहुंचाया है. बच्चों को हम सार्वजनिक स्थलों और सार्वजनिक सम्पत्तियों की साफ सफाई करते कम ही देखते हैं, जिससे उन्हें लगे कि यह सब भी उनका अपना ही है.

शिक्षा में नवाचार का प्रयोग करते यदि उस फूल को लगाने में बच्चे ही मेहनत करेंगे, उसमें पानी डालेंगे. उन्हें उसमें इस्तेमाल होने वाली खाद, दवाइयों के बारे में पता होगा. वो पौधा लगाने से लेकर उसमें फूल आने की शुरुआत से सुंदर फूल होने तक के सफर के साक्षी बनेंगे तो हमें
अगले कदम के लिए इन बच्चों को खुद ही निर्णय लेने के लिए छोड़ना होगा जहां वो खुद के उगाए फूलों को तोड़ें या उजाड़ दें.

किसी भी बच्चे की शिक्षा प्राप्त होने की शुरुआत उसके परिवार से होती है, बच्चों को जो कुछ बचपन में स्कूल या घर में सिखाया जाता है उसमें सबसे ज्यादा प्रभाव घर की शिक्षा से पड़ता है.
माता पिता अपने बच्चों को जो कुछ भी सिखाते हैं, उसका सीधा प्रभाव उनके बच्चों पर कैसे पड़ता है यह हम महेश पुनेठा की पोस्ट पर पत्रकार जगमोहन रौतेला की टिप्पणी से समझ सकते हैं, वह लिखते हैं कि बच्चे की कोई गलती नहीं है. जैसा उसने देखा, वही लिख दिया.  वह सवेरे उठते ही तो अपने घर के लोगों को फूल तोड़ते हुए देखता है. उसे लगता है अच्छे फूल तोड़े जाते हैं.

मतलब साफ है कि शिक्षा को अगर सही दिशा मिल जाए तो बच्चे फूल उजाड़ने की जगह उसे लगाएंगे ही. बच्चे अपने घर के कूड़े के साथ अपने शहर और गांव का कूड़ा साफ करते हुए कभी शर्माएंगे नही. हिमालय में लगती आग और पिघलते ग्लेशियर उन्हें अपनी समस्या लगेंगे क्योंकि उन्हें पता होगा कि इससे उनकी प्यारी धरती को सीधा नुकसान पहुंच रहा है.

हिमांशु जोशी


Wednesday, September 20, 2023

पीछे छूटे गांव को शब्दों से खींचते शिरीष खरे.

एक देश बारह दुनिया किताब से चर्चा में आए लेखक शिरीष खरे की 'नदी सिंदूरी' आपको गांव के रहन सहन से वाकिफ कराती जाएगी. सिंदूरी नदी के किनारे बसे गांव मदनपुर की कहानियों को सामने लाते शिरीष खरे हमें अवधेश, बसंत, खूंटा जैसे किरदारों के पास ले जाते हैं. गांव में जातिवाद के मकड़जाल को शिरीष कुछ इस तरह लिखते हैं कि दलित बसंत एक दिन गांव का हीरो है तो एक दिन ऊंची जाति के लोगों के सामने सर उठाने की वजह से वो अधमरा है. खुद के किशोर जीवन की कहानी शिरीष ने जिस तरह लिखी है उससे एक किशोर मन में चल रही उथल पुथल से भी पाठक परिचित होते जाते हैं.

किताब की शुरुआत ऐसी कि पाठक शब्दों में ही खो जाएं.

शिरीष खरे की लिखी किताब प्रतिष्ठित राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है. किताब का आवरण चित्र बड़ा ही आकर्षक है, नदी में चलती नाव को देख पाठक मानो किसी गहरी सोच में डूब जाते हैं. पिछले आवरण में लेखक के परिचय के साथ सुप्रसिद्ध कथाकार रणेन्द्र की किताब पर टिप्पणी है. जितने विस्तार से किताब की भूमिका लिखी गई है, ऐसी कम ही किताबों में पढ़ने को मिलती है. इनमें लेखक कहानियों के तैयार होने की परिस्थितियों के बारे में बताते हैं,  साथ ही वह अंग्रेजी, उर्दू शब्द प्रयोग किए जाने की वजह भी पाठकों के साथ साझा करते हैं. 

'इतिहास दोहराता है पर नदियां सूख जाए तो जीवन खत्म हो जाता है, कुछ भी दोहराने लायक नहीं बचता है' पंक्ति हमारे समाज में नदियों का महत्व सामने लाती है. किताब की तेरह कहानियों में से पहली कहानी 'हम अवधेश का शुक्रिया अदा करते हैं' गांव के जीवन पर लिखी गई, रामलीला को केंद्र में रखकर लिखी इस कहानी में हम पढ़ते हैं कि कैसे गांव में लोग एक दूसरे के जीवन में दखल देते रहते हैं. किताब की शुरुआत से ही इसके किस्से कहानियों में डूब जाने का मन करता है और यह उन किताबों में है, जिन्हें आप लगातार बैठ कर कुछ घण्टों में पूरी पढ़ सकते है.

लेखक के बचपन के किस्से, पीछे छूटी पर्यावरण से नज़दीकी.

'कल्लो तुम बिक गई' कहानी दिल छूने वाली है. 'जब कोई दुख में डूब जाता है तो अंधेरा बेमानी हो जाता है' जैसी पंक्ति से लेखक जीवन के अनुभवों को पाठकों के लिए छोड़ जाते हैं. मशीनों और यंत्रों की वजह से हम पर्यावरण से कितने दूर हो गए हैं, यह दिखाने के लिए लेखक टीवी का सहारा लेते हैं और कहानी में यह लिखते हैं कि कैसे टीवी आने के बाद वह अपनी गाय से दूर हो जाते हैं.
'कल्लो जब बछड़ा जनती थी तब हमें हमारे साथ खेलने के लिए नया भाई मिल जाता' पंक्ति से हम इंसानों और जानवरों का वह रिश्ता महसूस करते हैं, जो अब कहीं खो सा गया है. 'हां, इस भूसे में हम कच्चे सीताफल, आम केले दबाकर रखा करते थे पकने के लिए' लेखक का अपने गांव की यादों से जुड़ा एक किस्सा है, जो अपना गांव छोड़ चुके लोगों को अपनी अपनी यादों में खोने पर मजबूर कर देगा.

'डरियो तो डरियो, मनो अब मत डरियो' किस्सा लिखते लेखक ने जिस तरह अपने बचपन को याद किया है, उसे पढ़ते बहुत से पाठकों को भी अपना बचपन याद आ जाएगा. मदनपुर और तेंदूखेड़ा के बीच की कहानी लेखक ने जिस तरह से अपनी यादों में सजा कर रखी है, ठीक वैसे ही मदनपुर और तेंदूखेड़ा न जाने कितने पाठकों की यादों में बसे होते हैं, किताब पढ़ते पाठकों को वह सब याद आते रहेंगे.

किताब में हमें पालतू जानवरों की आवश्यकता के बारे में भी बताया गया है और अब कम हो चुके इस चलन के बीच इसे पढ़ना जरूरी है.

बचपन की याद के साथ, सामाजिक तानेबाने की चिंता.

'रामदई हमने टीबी नही देखी' कहानी से लेखक गांव की दिल के करीब यादों से बाहर आते दिखे हैं, जब उन्होंने अपनी कहानी में मुग्धा पात्र को जगह दी है. मुग्धा पात्र के जरिए लेखक तब गांव में व्याप्त जातिवाद को पाठकों के सामने लेकर आते हैं जब वह लिखते हैं कि मुग्धा स्कुल में बाकी बच्चों के साथ खाना नही खाता था.

'समाज प्रदूषित होता तो नदी भी प्रदूषित होगी' पंक्ति का अर्थ बहुत गहरा है और देश की लगभग सभी नदियों की दुर्दशा का कारण हमारे सामने रखती है. 

'खूंटा की लुगाई भी बह गई' कहानी में लेखक ने गांव में विधवाओं की सामाजिक स्थिति पर लिखा है.

याद बिल्कुल साफ, लोगों के पहनावे का वर्णन ऐसा की वो सामने नज़र आए.

लेखक ने अपने बचपन में जिन लोगों को सामने देखा, उनमें कुछ उनकी यादों में बसे रहे. उनके डील डौल का वर्णन लेखक कुछ ऐसे करते हैं कि पाठकों के मन में भी उनकी छवि बिल्कुल साफ बन जाए, यह किताब के सबसे मजेदार किस्से लगते हैं.

'बिलथारी वाला ऐसा दुबला था जैसे शरीर पर नहीं बल्कि हैंगर पर कपड़े टांगे कोई कंकाल गांजे की चिलम की तर्ज पर बीड़ी खींचे जा रहा हो' इसका पहला उदाहरण है.

'धन्ना का रंग और उसका पहनावा इस सीमा तक काला था कि धन्ना उसका लाभ उठाते हुए देखते ही देखते अंधेरे में विलीन हो सकता था' में धन्ना का रंग पाठकों के मन में खुद ही बनते जाता है.

बसन्त के बारे में लिखा है, नीचे पुलिसिया बूट और ख़ाकी रंग का पैंट. 
किताब में बुंदेली का प्रयोग बहुत सी जगह किया गया है और इसे पढ़ते हुए अलग ही आनन्द आता है. 

कहानियों में अंत तक रुचि बने रहती है, पात्रों से पाठक भी बना लेंगे पहचान.

किताब की लगभग हर कहानी में आखिर तक क्या होने वाला है, इसका रोमांच लेखक ने बड़ी खूबी के साथ बनाए रखा है. गांव में व्याप्त जातिवाद, दहेज प्रथा और राजनीति को इसकी कहानियों में जगह दी गई है.

'जब कछु नही तो चोरी ही सई' यह एक ऐसी कहानी है जहां आपको लगता है की किताब की एक कहानी दूसरी से जुड़ी है क्योंकि अवधेश जैसे पात्र के बारे में आप आगे पढ़ते रहते हैं. किताब में शामिल कुछ पात्रों के किस्सों को ऐसे रचा गया है कि उनके नाम आपको सालों तक याद रहेंगे जैसे कि अवधेश, अवधेश की ढोलक की थाप आप कभी नहीं भूलेंगे.

कहानियों के पात्रों की दोस्ती पाठकों के साथ बड़ी खूबी के साथ कराने की कला शिरीष खरे से सीखी जा सकती है. दीक्षित सर जैसे पात्र हर पाठक को अपनी पहचान के लगेंगे, यादव मास्साब के खड़े होने का तरीका जिस तरह से लिखा गया है वह उस दृश्य को आंखों के सामने लेकर आ जाता है. यादव मास्साब द्वारा बच्चों को सामूहिक भागीदारी और बराबरी का पाठ सिखाना ही वह वजह लगती है, जिससे लेखक ने यह शानदार किताब पाठकों के लिए लिखी.

'हमने उनकी सई में फाड़ दई' किस्से को पढ़ना किसी बॉलीवुड एक्शन फिल्म को देखना जैसा है. चबूतरे पर चढ़ कर बोला गया बसंत का डॉयलॉग शानदार है, बसंत के जरिए लेखक ने फिर से गांव में होते जातिभेद को लिखा है.

एक नदी के किनारे कैसे कोई सभ्यता खुद को आगे बढ़ाती है, उससे जुड़े लोगों की उस नदी के आसपास हुई घटनाओं, क्षेत्रों से इतनी यादें जुड़ी होती हैं कि वे चाहकर भी कभी उस नदी से जुड़ी यादों को भुला नही पाते. शिरीष खरे ने इन सब को बहुत ही नाटकीय अंदाज़ में लिख डाला है, जिसे अपने बचपन, जवानी या यूं कहें कि अपने जीवन को एक बार याद करने के लिए सभी को जरूर पढ़ना चाहिए.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may




Sunday, September 17, 2023

स्विंग के भारतीय किंग सिराज के आगे ढेर श्रीलंका.

सिराज ने बल्लेबाजी के लिए माकूल दिख रही पिच पर अपनी स्विंग गेंदबाजी का जो प्रदर्शन दिखाया है, उससे विश्व कप से पहले भारतीय तेज गेंदबाजों को लेकर विश्व की अन्य टीमों की तन्द्रा टूटेगी. गेंदबाजों की मदद से भारत ने श्रीलंका को एशिया कप के फाइनल मुकाबले में दस विकेट से हरा दिया है. भारत ने 263 गेंदें शेष रहते हुए ही श्रीलंका को हरा दिया और यह गेंदों के अंतर के हिसाब से भारत की सबसे जल्दी हासिल की हुई जीत है.

एशिया कप के सुपर4 मुकाबले बांग्लादेश से हारकर आई  भारत, श्रीलंका के साथ फाइनल मुकाबले में उम्मीद के मुताबिक अपनी पूरी क्षमता के साथ खेलने उतरी. चोटिल अक्षर पटेल की जगह इस मैच में भारतीय टीम ने वाशिंगटन सुंदर को प्लेइंग इलेवन में जगह दी. 
श्रीलंका के कप्तान दासुन शनाका ने कोलंबो के आर प्रेमादासा मैदान में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला लिया. बुमराह ने उनके इस फैसले को गलत साबित करते हुए पहले ही ओवर में कुसल परेरा को शून्य पर विकेट के पीछे खड़े के एल राहुल के हाथों कैच आउट करवा वापस पेवेलियन भेज दिया. 

श्रीलंकाई बल्लेबाजों पर कहर बनकर टूट पड़े सिराज.

पहला विकेट जल्दी गंवाने के बाद अब अपनी पारी के चौथे ओवर में ही श्रीलंका की आधी टीम पेवेलियन लौटने वाली थी. मोहम्मद सिराज ने इस ओवर में पाथुम निसांका, सदीरा समराविक्रमा, चरिथ असलंका और धनन्जय डीसिल्वा का विकेट लेकर श्रीलंकाई खेमे में खलबली मचा दी. श्रीलंकाई बल्लेबाजों के पास सिराज की स्विंग कर रही गेंदों का कोई जवाब नही था. सिराज यहीं नही रुके, छठें ओवर में उन्होंने श्रीलंकाई कप्तान दसुन शनाका को बोल्ड कर दिया और तब श्रीलंका का स्कोर मात्र बारह रन पर छह विकेट था. इसके बाद मेंडिस और वेल्लालागे ने विकेटों के इस पतझड़ को कुछ देर रोकने की कोशिश करी पर फिर बारहवें ओवर में सिराज ने वापसी करते हुए मेंडिस की गिल्लियां बिखेर दी.

हार्दिक ने ताबूत पर आखिरी कील ठोकी.

सिराज, बुमराह की बेहतरीन गेंदबाजी के बाद अब बारी हार्दिक की थी. तेरहवें ओवर में उन्होंने आजकल शानदार फॉर्म में चल रहे दुनिथ वेल्लालागे को एक शॉट पिच गेंद फेंकी, जिस पर वह राहुल को कैच थमा बैठे. इसके बाद सोलहवें ओवर में हार्दिक ने श्रीलंकाई पारी को समेटने में देर नही लगाई, उन्होंने पहले शानदार आउट स्विंग पर प्रमोद मदुशन को स्लिप पर खड़े विराट के हाथों कैच आउट करवाया और फिर पथिराना को ईशान किशन के हाथों कैच आउट करवा मात्र पचास रन पर ही श्रीलंकाई पारी का अंत किया. यह एकदिवसीय क्रिकेट में श्रीलंका का दूसरा सबसे न्यूनतम स्कोर था, इससे पहले साल 2012 में वह साउथ अफ्रीका के खिलाफ 43 रन पर ऑल आउट हुए थे.

किशन को देख चौंके श्रीलंकाई.

मात्र 51 रन का पीछा करने उतरी टीम इंडिया ने अपनी ओपनिंग जोड़ी में बदलाव करते हुए श्रीलंकाई टीम को चौंका दिया, कप्तान रोहित शर्मा ने अपनी जगह बाएं हाथ के बल्लेबाज ईशान किशन को शुभमन गिल के साथ ओपनिंग के लिए भेजा. पहले ओवर में प्रमोद मदुशन की स्विंग होती गेंद को जिस तरह से ईशान किशन ने सीधे बल्ले के साथ खेला, उससे यह तो तय हो गया था कि भारतीय ओपनर श्रीलंकाई गेंदबाजों को किसी तरह का चमत्कार नही करने देंगे. पथिराना के अगले ओवर में किशन ने स्लिप के ऊपर से चौका और फिर अगली ही गेंद पर कट शॉट लगाकर चार रन जुटाए, इससे भारत का स्कोर दो ओवर में 17 रन पहुंच गया. अगले ओवर में बारी शुभमन की थी, उन्होंने प्रमोद की गेंदों पर दर्शनीय शॉट लगाते हुए लगातार तीन चौके मारे. 

बस सात ओवर और भारत के पास आठवीं बार एशिया कप.

तीन ओवर में 32 रन लुटा चुके अपने गेंदबाजों से किसी चमत्कार की उम्मीद में श्रीलंकाई कप्तान ने श्रीलंका क्रिकेट की नई सनसनी वेल्लालागे को गेंद थमाई. श्रीलंका के साथ पिछले मुकाबले में वेल्लालागे के सामने बिखरने वाले भारतीय बल्लेबाजों ने इस मैच में सम्भल कर उनका सामना किया. पांचवें ओवर में दिशा से भटके हुए पथिराना के ओवर में पहली गेंद पर ऑफ साइड की तरफ किशन तो आखिरी गेंद पर लेग साइड की तरफ शुभमन ने चौका मारा. वेल्लालागे के अगले ओवर की अंतिम गेंद को कवर साइड में बाउंड्री पार पहुंचा कर शुभमन ने भारतीय स्कोर को श्रीलंका के स्कोर के बराबरी पर पहुंचा दिया और असलंका के द्वारा फेंके गए सातवें ओवर की पहली ही गेंद को विजयी सिंगल के लिए खेलते हुए ईशान किशन ने भारत को आठवीं बार एशिया का चैंपियन बना दिया.

एशिया कप के पांच मुकाबलों में नौ विकेट लेने वाले कुलदीप यादव को प्लेयर ऑफ द सीरीज और इस मुकाबले में छह विकेट लेने वाले सिराज को प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया.

हिमांशु जोशी.

Tuesday, September 12, 2023

फिर चमके कुलदीप ने भारत को जीत दिलाई।

बैटिंग में भारतीय टीम भले ही लड़खड़ाई पर गेंदबाजों ने संघर्ष कर रही श्रीलंकाई टीम को ऑल आउट कर भारत को एशिया कप के फाइनल में पहुंचा दिया। दुनिथ वेल्लालागे को उनके बेहतरीन ऑलराउंड प्रदर्शन के लिए प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया।

केएल राहुल, विराट के सैंकड़े और कुलदीप के पंजे के अगले ही दिन भारत कोलंबो में एशिया कप के एक और सुपर4 मुकाबले में श्रीलंका से भिड़ने उतरा।
टॉस जीत कर रोहित शर्मा ने पहले बल्लेबाजी का फैसला लिया, पाकिस्तान के साथ कल खेलने उतरे शार्दुल ठाकुर की जगह भारतीय टीम ने इस मैच में अक्षर पटेल को उतारा।
रोहित और शुभमन गिल ने पिछले मैच की तरह ही इस मैच में भी भारत को सम्भली हुई शुरुआत दी। पिछले मैच में पाकिस्तानी और भारतीय गेंदबाजों की तुलना में श्रीलंकाई गेंदबाजों से इस मैच में गेंद कम स्विंग होती दिखी, शुरुआत में लंकाई गेंदबाज लाइन से भटके हुए थे तो फील्डर भी गेंद लपक नही रहे थे।

सातवें ओवर में रोहित ने कसुन रजिथा की गेंद पर सामने छक्का मार कर 248 मैचों में अपने वनडे कैरियर में दस हजार रन पूरे किए। विकेट की तलाश में श्रीलंकाई कप्तान दासुन शनाका ने पहले दस ओवर में ही खुद को मिलाकर अपने चार गेंदबाज आजमा लिए पर उन्हें कोई सफलता नही मिली। उनके दसवें ओवर में रोहित ने चार चौके जड़े, जिसमें एक शानदार स्क्वायर ड्राइव कर मारा चौका भी शामिल था।

जब लग रहा था कि भारत आसानी से इस मैच में बड़ा स्कोर बनाएगा तभी बारहवें ओवर में गेंदबाजी के लिए आए बाएं हाथ के स्पिनर ने अपनी उंगलियों का जादू दिखाना शुरू किया। दुनिथ वेल्लालागे ने अपने तीन ओवरों में भारतीय टीम के मुख्य बल्लेबाजों शुभमन, विराट और रोहित को आउट कर दिया। शुभमन और रोहित के पास वेल्लालागे की ड्रिफ्ट लेती गेंदों का कोई जवाब नही था और दोनों ही बोल्ड हुए। इसके बाद श्रीलंकाई कप्तान ने के एल राहुल और ईशान किशन के सामने दोनों छोरों से स्पिन आक्रमण लगा दिया। धनन्जय डी सिल्वा ने भी दूसरे छोर से भारतीय बल्लेबाजों पर दबाव बनाए रखा और अपने पहले तीन ओवरों में सिर्फ नौ रन दिए थे।

टिक गए के एल और किशन, फिर लगी विकेटों की झड़ी।

जब लग रहा था कि वेल्लालागे साल 2008 में अजंता मेंडिस का भारतीय टीम के खिलाफ किया कारनामा दोहराएंगे तब के एल और किशन ने टिकते हुए खेला और भारत का स्कोर बीस ओवर की समाप्ति पर तीन विकेट के नुकसान पर 109 रन पहुंचाया।

तीसवें ओवर में राहुल और फिर ईशान किशन के आउट होने के बाद भारत के विकेटों की झड़ी लग गई। जडेजा और हार्दिक दोनों ने इस मैच में भारतीय दर्शकों को निराश किया, हार्दिक 5 रन पर वेल्लालागे का पांचवा शिकार बने। असालंका ने जडेजा के बाद बुमराह और कुलदीप को भी लगातार दो गेंदों पर आउट किया। अक्षर पटेल ने ही अंत में कुछ संघर्ष किया, उन्होंने तीक्षणा के 48वें ओवर की अंतिम गेंद पर शानदार छक्का जड़ा। भारतीय पारी का आखिरी ओवर तिक्षणा ने किया, जिसकी पहली ही गेंद पर अक्षर 26 रन बनाकर बाउंड्री पर कैच आउट हो गए।

स्पिनरों से पहले तेज़ गेंदबाजों की चुनौती।

सवाल यह था कि भारतीय स्पिनरों से पहले 214  रन का पीछा कर रहे श्रीलंका के बल्लेबाज भारतीय पेस बैटरी को झेल पाएंगे। बुमराह ने श्रीलंका की पारी के तीसरे ओवर की पहली गेंद बाहर विकेट के बाहर की तरफ स्विंग कराई, जिसे पाथुम निसांका विकेटकीपर के एल राहुल के हाथों में थमा बैठे, उन्होंने 6 रन बनाए। इसके बाद आए कुसल मेंडिस ने ओपनर दिमुथ करुणारत्ने के साथ सम्भल कर खेलना शुरू किया और मेंडिस ने सातवें ओवर में बुमराह की बॉल पर एक दर्शनीय चौका भी लगाया पर इसी ओवर में बुमराह ने लगभग यॉर्कर गेंद पर उन्हें सूर्यकुमार यादव के हाथों लपकवाकर 15 रन पर आउट कर दिया। 
इसके अगले ओवर में ही बाएं हाथ के बल्लेबाज करुणारत्ने भी सिराज की गेंद में स्लिप पर शुभमन गिल को कैच थमा बैठे, तब श्रीलंका का स्कोर 25 रन पर तीन विकेट था।

जब दोनों छोरों पर लगा स्पिन अटैक।

इसके बाद कप्तान रोहित ने हार्दिक को एक ओवर देकर दोनों छोरों से कुलदीप, जडेजा को स्पिन गेंदबाजी पर लगा दिया।
 चरिथ असालंका और सदीरा समाराविक्रमा की मजबूत होती जोड़ी टूट ही जाती पर सत्रहवें ओवर में जडेजा की गेंद पर असालंका का बल्ले का ऊपरी किनारा लग कर लेग साइड में गया कैच ईशान किशन ने छोड़ दिया। भारतीय टीम इससे निराश थी पर फिर कुलदीप ने कमाल किया और सदीरा को 17 रन पर स्टम्प और असालंका को 22 रन पर विकेट के पीछे कैच आउट करवा दिया। शनाका और धनन्जय के क्रीज पर रहते श्रीलंका का स्कोर 20 ओवर की समाप्ति पर 5 विकेट के नुकसान पर 79 रन था।

इस लो स्कोरिंग मैच में धनन्जय के अच्छे शॉट्स की वजह से भारत दबाव में दिख ही रही थी कि जडेजा के 26वें ओवर की पहली गेंद पर ही श्रीलंका के कप्तान शनाका स्लिप में खड़े रोहित को कैच थमा बैठे। शनाका ने 9 रन बनाए और इस ओवर के बाद श्रीलंका का स्कोर 6 विकेट के नुकसान पर 104 रन था।

धनन्जय और वेल्लालागे से परेशान टीम इंडिया।

तीस ओवर खत्म होने पर 6 विकेट पर 125 रन बना चुकी श्रीलंका की टीम की उम्मीद 47 गेंदों पर 31 रन बना चुके धनन्जय पर टिकी हुई थी, वह खास तौर पर अक्षर पटेल को निशाना बना रहे थे। विकेट की तलाश में कप्तान रोहित फिर से कुलदीप को गेंदबाजी पर लाए पर अब धनन्जय के साथ गेंदबाजी में कमाल दिखा चुके वेल्लालागे भी अपना हाथ खोलने लगे, उन्होंने कुलदीप की गेंद पर चौका, छक्का जमा दिया।
श्रीलंका को 102 गेंदों पर मात्र 66 रन की जरूरत थी तो भारत श्रीलंका के चार विकेट तलाश कर रही थी।

फिर काम आई फिरकी।

हार्दिक, बुमराह को गेंदबाजी पर वापस लाने पर रनों की रफ्तार तो धीमी हुई पर विकेट नही मिल रहा था, श्रीलंका को अब 78 गेंदों पर 57 रन की तलाश थी। धनन्जय 41 और वेल्लालागे 30 पर खेल रहे थे, तभी अगले ही ओवर में जडेजा ने वेल्लालागे से चौका और सिंगल खाने के बाद धनन्जय को फिरकी में फंसाते हुए गिल के हाथों कैच आउट करा दिया। 

सांस थामे श्रीलंकाई दर्शकों को तब झटका लगा जब 41वां ओवर फेंक रहे हार्दिक के ओवर की पांचवीं गेंद पर सूर्यकुमार यादव ने 2 रन पर खेल रहे तीक्षणा का लाजवाब कैच पकड़ा। इसके अगले ही ओवर में कुलदीप ने रजिथा और पथिराना को बोल्ड कर भारत को इस मैच में 41 रन से जीत दिला दी। कुलदीप ने इस मैच में चार विकेट लेते हुए भारत को एशिया कप के फाइनल में पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है।

हिमांशु जोशी।




Saturday, September 9, 2023

रूढ़िवादिता, पलायन और बेरोजगारी, पहाड़ की यही कहानी।

वह गांव जहां बारहवीं के बाद लड़कियां ब्याह दी जाती हैं। चांद पर पहुंचे भारत के इस गांव में महावारी होने पर आज भी शादीशुदा महिलाओं को घर, खेत से दूर कहीं दूर खड्डे में स्नान के लिए भेजा जाता है।
   
      सड़क मार्ग से भिंगराड़ा  फोटो- हिमांशु जोशी

उत्तराखंड के पहाड़ों में घूमते हुए आपको मुख्य सड़क से लगे कई रास्ते ढलान में जाते दिखते हैं, यह रास्ते उन गांवों तक जाते हैं जो देश में इस समय नाम की राजनीति से दूर विकास के लिए तरस रहे हैं। दिल्ली, देहरादून से चुनाव प्रचार के लिए आने वाले इन गांवों के नीति निर्माता शायद ही कभी इन रास्तों पर उतरते हैं। आजादी के सालों बाद भी इन गांवों का जीवन आज भी कठिन है और शायद यही कारण है कि उत्तराखंड के पहाड़ खाली हो रहे हैं। उत्तराखंड के जिला मुख्यालय चम्पावत से लगभग 55 किलोमीटर दूर स्थित 'भिंगराड़ा' तक पहुंचने के लिए आपको टैक्सी मिल जाएगी।

गांव में पहुंचने पर आपको एक वहां जाने के लिए सड़क से ढलान मिलेगी, यह रास्ता कुछ मीटर ही पक्का है। जहां यह रास्ता खत्म होता है, लगभग वहीं आपको उद्यान विभाग का यह बोर्ड लगा मिलेगा। 

                       फोटो- हिमांशु जोशी

उद्यान विभाग का यह बोर्ड आपको गांव की पहचान भी लग सकता है।
इसके बारे में जानने की उत्सुकता में हमें इस गांव के कमल भट्ट मिलते हैं। अपनी स्कूली शिक्षा सबसे नजदीकी मैदानी क्षेत्र टनकपुर से प्राप्त कर चुके कमल अब सहकारी समिति भिंगराड़ा में नौकरी करते हैं, वह कहते हैं कि बोर्ड में लिखी परम्परागत कृषि विकास योजना से ग्रामवासियों को फायदा ही हुआ है। इससे उन्हें खेती के लिए मशीन व बीज उपलब्ध हो जाते हैं, मधुमक्खी पालन के लिए भी सहायता मिलती है। 
सौ से पचास हुए भिंगराड़ा के परिवार।

कमल बताते हैं कि गांव में पहले लगभग सौ परिवार थे, अब यह संख्या पचास तक सीमित हो गई है। गांव के लोग रोजगार की तलाश में नजदीकी मैदानी शहर हल्द्वानी, खटीमा, टनकपुर पलायन कर जाते हैं। इस समय गांव की आबादी लगभग चार सौ होगी।

कृषि में मदद हेतु अच्छी सरकारी योजना के बावजूद पलायन के सवाल पर कमल कहते हैं कि गांव में हल्दी, अदरक, अरबी, मिर्च, लहसुन, मंडुआ होता है पर जंगली जानवर सब खराब कर देते हैं। पशुपालन गांव के लोगों का मुख्य व्यवसाय है पर उससे बस घर ही चल पाता है। पलायन रोकने के लिए जो भी सरकारी योजनाएं बनती होंगी, गांव में उसका कोई असर नही दिखता।

एक जांच के लिए पैंतालीस किलोमीटर नापने की मजबूरी, मरीज को सड़क तक लाने के लिए दो किलोमीटर डोली पर ढोते ग्रामवासी।

सरकारी कार्यालयों की बात करें तो गांव में सरकारी अस्पताल, बैंक, पोस्ट ऑफिस और उद्यान विभाग का कार्यालय है। कमल कहते हैं कि अस्पताल में पहले कोई डॉक्टर नही थे लेकिन अभी कुछ समय पहले से हैं, अस्पताल में सुविधा के नाम पर कुछ नही है। कोई जांच कराने के लिए भी यहां से पैंतालीस किलोमीटर दूर लोहाघाट जाना पड़ता है। गांव में अगर किसी की तबीयत खराब हो जाती है तो उसे सड़क तक लाने के लिए दो किलोमीटर डोली पर उठाकर लाना पड़ता है।

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कमल कहते हैं कि हमारे गांव में जितने लोग भी बचे हैं वह मुख्य रूप से पशुपालन की वजह से ही रुके हुए हैं। गांव में लगभग डेढ़ सौ गाय और चार भैंस होंगी, जिसमें पचास गाय दूध देने वाली होंगी।
महीने में मिलने वाले वृद्धावस्था पेंशन के पन्द्रह सौ रुपए और किसान सम्मान निधि के पांच सौ रुपए भी जीने का सहारा बने हुए हैं। हां, इन पैसों की वजह से गांव वाले अब मेहनत भी कम करने लगे हैं। उन्हें अब बस अपना पेट भरते रहना ही पसंद आने लगा है।

मनरेगा महीने में पांच दिन रोजगार तो पच्चीस दिन बेरोजगार।

गांव के कच्चे रास्ते में आगे बढ़ने पर तीन स्कूली छात्र नीलम भट्ट, खिलानन्द भट्ट और गौरव भट्ट भी मिल गए। नीलम भट्ट गांव के ही सरकारी इंटर कॉलेज में पढ़ते हैं, वह कहते हैं कि सरकारी प्राइमरी स्कूल और इंटर कॉलेज के अलावा गांव में आठवीं कक्षा तक एक प्राइवेट स्कूल भी है।
प्राइमरी में बारह बच्चे, इंटर कॉलेज में साढ़े तीन सौ और प्राइवेट में लगभग डेढ़ सौ बच्चे पढ़ते हैं। नीलम अपने भविष्य को लेकर अभी अनिश्चित हैं, वह कहते हैं कि गांव के अन्य बच्चों की तरह ही वह भी होटल मैनेजमेंट कोर्स, कला से ग्रेजुएशन या फिर पुलिस, फौज में नौकरी तलाशेंगे। नीलम के पिता माधवा नन्द भट्ट घर में ही रहते हैं और उनके पास दो गाय, दो बछड़े हैं। नीलम कहते हैं कि उनके पिता पहले मनरेगा में मजदूरी कर घर का खर्चा चलाते थे पर अब उसमें भी महीने के पांच दिन ही काम मिलता है बाकी पच्चीस दिन पिता को खाली बैठना पड़ता है। बाहर जाकर प्राइवेट नौकरी कर रहे दो भाइयों की वजह से घर का चूल्हा जल रहा है।

               माधवा नन्द भट्ट, फोटो-नीलम भट्ट

खिलानन्द भट्ट की कहानी भी नीलम की तरह ही है। उनके पिता भी मजदूरी करते हैं, मनरेगा में काम न मिलने की वजह से अब ज्यादा समय घर पर ही रहते हैं। उनका एक भाई होटल मैनेजमेंट करने के बाद दिल्ली के एक होटल में काम करता है और दुसरा अक्षरधाम मंदिर में। खिलानन्द पढ़ाई के बाद फौज में भर्ती होना चाहते हैं, उनके घर में आठ गाय और एक बैल हैं, जिसमें दो गाय दूध देती हैं।

गौरव भट्ट के घर की आर्थिक स्थिति खिलानन्द और नीलम के घर से अलग है क्योंकि उनका कोई भाई नही है जो बाहर से पैसे कमा कर घर भेजे। उनके पिता भी मजदूरी करते हैं, उनके परिवार में दस गाय हैं। दस में से पांच गाय दूध देती हैं और गौरव का परिवार इसी दूध को डेयरी में बेच कर चलता है। वह कहते हैं इस दूध से महीने के लगभग आठ हजार रुपए मिलते हैं, जिसमें चार तो गाय के चारे में लग जाते हैं और बचे चार हजार से घर का खर्चा चलता है।

नीलम भट्ट कहते हैं कि गांव में कोई लाइब्रेरी नही है वह लोग स्कूल की लाइब्रेरी में ही पढ़ते हैं, जहां प्रतियोगी परीक्षाओं को तैयारी से जुड़ी किताब ज्यादा पढ़ी जाती हैं। 


कुछ महीने पहले इस घर में रहने वाले भी शहर पलायन कर गए, फोटो- नीलम भट्ट

तीनों बच्चे और कमल भट्ट गांव में जातिवाद जैसी बात नकारते हुए कहते हैं कि इस गांव में सभी लोग एक ही जाति के हैं तो गांव में जातिवाद जैसी कोई बात नही है।

पढ़ाई लिखाई तो दूर अब भी 'खोला' में जाने को मजबूर महिलाएं।

 गांव की लड़कियों का विवाह बारहवीं कक्षा पास करते ही कर दिया जाता, लड़कियां अगर फेल भी हो जाएं तब भी उनकी शादी कर दी जाती है।
गांव में महिलाओं की स्थिति पर कमल भट्ट कहते हैं कि यहां की लगभग सभी महिलाएं घर के काम में ही लगी रहती हैं, उन्हें कोई ऐसी लड़की याद नही आती जो पढ़ लिख कर कहीं अच्छे पद पर पहुंची हो। शादीशुदा महिलाओं को महावारी आने पर परिवार से बिल्कुल अलग थलग कर दिया जाता है। उन्हें घर के बाथरूम तो क्या खेतों से भी दूर कहीं गड्ढे में जिसे गांव के लोग खोला कहते हैं, स्न्नान करने के लिए भेजा जाता है।

हिमांशु जोशी।


Thursday, September 7, 2023

अप्सरा।

अप्सरा वो है जो सुंदर है,
शीतल है शांत है।

सुंदर वो है,
जो शांत रखता है।

सुंदर वह है, जो प्रिया है।
जीवन का उद्देश्य है, रास्ता दिखाने वाला।

सुंदर लोग अक्सर नही मिलते,
वह सपनों में होते हैं।

सपना खुली आँखों से देखें वो लोग खुशनसीब होते हैं।

मेरे पास तुम हो, सुप्रिया
मैं खुद को सम्पूर्ण समझता हूं क्योंकि तुमसे मैं पूर्ण होता हूं।

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...