हिमालय तुम बड़े प्यारे हो।
हरे भरे, तुम बड़े न्यारे हो।
गोदी में तुम अपनी मुझे खिलाते थे,
मैं कहता था, हे हिमालय इतना न घुमाओ।
थक रहा हूं, तुम्हारे प्रेम में झूम रहा हूं।
वक्त बढ़ते अब तुम बूढ़े दिखने लगे हो,
अपनी चमक खोने लगे हो।
कहीं कहीं मटमैला रंग है, अब आपकी हरियाली कहीं गुम है।
अब मुझे कुछ समझ में आने लगा है,
तुम्हारी दशा देख मन में उबाल आने लगा है।
हर कोई तुम्हें अपने अनुसार सजाने लगा है,
दूल्हा समझ तुम्हारा खुद श्रृंगार करने लगा है।
कहीं तुम अग्नि से झुलसे हुए हो तो कहीं रेगिस्तान से सूखे हुए हो।
तैयारी तुम्हें मंडी में बेचने की है, ये बोली अब ऊंची होने लगी है।
आजकल मेरी नज़रों में कुछ धुंधलापन है।
धूल और धुंए के गुबार में मेरा प्रिय हिमालय कहीं गुम है।
सुना है अब तुम्हारे कदम थकने लगे हैं, सबकी सेवा करते अब तुम्हारे कंधे झुकने लगे हैं।
चीर कर तुम्हारा सीना रक्त पूरा पिया जा चुका है,
अपने हाल में तुम्हें अकेला छोड़ा जाने लगा है।
तुम्हारा साया हटने की कल्पना मात्र से मेरा ह्रदय व्याकुल हो उठा है।
तुम्हें चमकते वस्त्र पहनाने लगे हैं,
बूढ़े बना दिए हिमालय को नुमाइश पर खड़ा करने लगे हैं।
ओह! ये नही जानते तुम अंदर से खोखले हो, फिर भी कभी कुछ न बोलते हो।
जानता हूं, तुम्हें अब एकांत चाहिए।
इस अंधी दौड़ से दूर हिमालय, तुम्हें आराम चाहिए।
अब तुम्हें दूर से निहारूँगा, सालों बाद तुम्हारी गोदी में फिर पधारूँगा।
मैं हमेशा से कहता हूं,
हिमालय तुम बड़े प्यारे हो।
हरे भरे, तुम बड़े न्यारे हो।
हिमांशु जोशी
@himanshu28may
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