पहाड़ का वह गुमनाम हीरो जो दिल्ली होता तो पत्रकारिता की दुनिया का बड़ा नाम होता.
बद्रीदत्त ने धारचूला और मुनस्यारी में रहने वाली भोटिया जनजाति के द्वारा बनाए जाने वाले ऊनी उत्पाद जैसे थुलमा और दन पर विशेष श्रृंखला लिखी. इसकी वजह से लोगों को यह पता चला कि यह उत्पाद शिमला, पानीपत में बनाए जाने वाले ऊनी उत्पादों से क्वॉलिटी में बेहतर हैं और इनकी बिक्री बढ़ गई.
पूरा जीवन पहाड़ के लोगों के नाम
सुंदर चंद ठाकुर का 'काफल ट्री' में बद्रीदत्त कसनियाल पर लिखा आलेख पढ़ें तो उसमें एक जगह लिखा है 'मैं यहां यह भी स्वीकार करना चाहता हूं कि आज भले ही मैं एक बड़े ब्रैंड के अखबार के एडिशन का संपादक हूं. लेकिन जहां तक पत्रकारिता के बुनियादी हुनर और उसके प्रतिमानों पर खरा उतरने की बात है. तो मैं आज भी कसनियाल जी के चेले से ज्यादा कुछ नहीं हूं.' वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह कहते हैं कि बद्रीदत्त कसनियाल के सिखाए न जाने कितने पत्रकार आगे चलकर बड़े संस्थानों के सम्पादक बने. अगर बद्रीदत्त ने पत्रकारिता के लिए पहाड़ छोड़कर दिल्ली को चुना होता तो दिल्ली की चमक धमक के बीच, आज उनका नाम देश के बड़े पत्रकारों के साथ लिया जाता. पहाड़ के लोगों की सेवा के लिए बद्रीदत्त ने अपना पूरा जीवन लगा दिया.
कविता से बना पत्रकारिता का रास्ता
पिथौरागढ़ के रहने वाले बद्रीदत्त कसनियाल ने साल 1972 में बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण की थी तब हरियाणा की एक सरकारी पत्रिका में बसंत ऋतु पर उनकी एक कविता प्रकाशित हुई, जिसके उन्हें तीस रुपए मिले.
इसके बाद ही उन्हें लिखने का शौक चढ़ा. ग्रेजुएशन करने जब वह पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज गए तो 'उत्तराखंड ज्योति' अखबार के लिए उन्होंने एक आर्टिकल लिखा, जिसकी लोगों ने खूब प्रशंसा की. अखबार के मालिक कैलाश चन्द्र जोशी ने बद्रीदत्त को बोला कि आप अखबार को लिखे लोगों के पत्रों को समाचार का रूप दें. यह पत्र चंपावत, धारचूला से आते थे, जिनमें बिजली, पानी की समस्याओं के साथ बाघ के आतंक की शिकायत होती थी. इसमें पटवारियों की शिकायत भी होती थी. इन अंकों को भी लोगों की प्रशंसा मिली, ढाई सौ रुपए वेतन में बद्रीदत्त वहां काम करने लगे.
साल 1974-75 में वह मान्यता प्राप्त पत्रकार भी बन गए थे, साथ में उस दौर की धर्मयुग, कादम्बिनी जैसी पत्रिकाओं को पढ़ते रहा करते थे.
खबर का असर
अपनी लिखी एक खबर के बारे में बात करते बद्रीदत्त कहते हैं कि साल 1976 में एक दिन पिथौरागढ़ में आग लगी तो एक छोटे टैंकर से वहां आग बुझाने की कोशिश की गई पर तब तक वहां सब जल कर खाक हो गया था. तब मैंने खबर लिखी कि पिथौरागढ़ में आग बुझाने के लिए वाटर टैंक न होने की वजह से नुकसान हुआ. इस खबर के एक हफ्ते के अंदर ही पिथौरागढ़ में 25000 लीटर का एक वाटर टैंक आ गया था.
ऐसे ही साल 1977 में हुए तवाघाट लैंडस्लाइड पर बद्रीदत्त ने एक्टिविस्ट शमशेर सिंह बिष्ट और एक सरकारी भूवैज्ञानिक के साथ मौके पर जाकर 'दिन प्रतिदिन' अखबार के लिए रिपोर्टिंग की थी. इससे बाहरी दुनिया का ध्यान पहली बार उत्तराखंड के लैंडस्लाइड पर गया और उस पूरे इलाके को संवेदनशील क्षेत्र भी घोषित किया गया. उन दिनों नैनीताल समाचार, लघु भारत के लिए भी वह लगातार लिख रहे थे.
साल 1982 में अमर उजाला के लिए बद्रीदत्त ने धारचूला और मुनस्यारी में रहने वाली भोटिया जनजाति के द्वारा बनाए जाने वाले ऊनी उत्पाद जैसे थुलमा और दन पर विशेष श्रृंखला लिखी. इसकी वजह से लोगों को यह पता चला कि यह उत्पाद शिमला, पानीपत में बनाए जाने वाले ऊनी उत्पादों से गुणवत्ता में बेहतर हैं और इनकी बिक्री बढ़ गई. उत्साहित भोटिया जनजाति के लोगों ने बढ़ी बिक्री को देखते नए तरह के ऊनी उत्पाद बनाने भी शुरू किए.
लोगों के बीच जाकर ही होती है असली पत्रकारिता
एडमंड हिलेरी के पुत्र पीटर हिलेरी भारत में आए तो बद्रीदत्त की उनसे मुलाकात हुई. 27-28 साल के पीटर उन दिनों अपने साथियों के साथ नेपाल से भारत तक हिमालय पैदल चल रहे थे. पीटर का साक्षात्कार करते बद्रीदत्त को महसूस हुआ कि पैदल चलकर हम भी उत्तराखंड के समाज के बारे में गहराई से जान सकते हैं. साल 1977 में 'उत्तर उजाला' अख़बार की शुरुआत भी हुई और बद्रीदत्त इस अखबार से सात सौ रुपए तनख्वाह में जुड़ गए.
इसी बाद वह साल 1980 में अमर उजाला से भी जुड़े. बद्रीदत्त कसनियाल छोटा सा बैग टांगकर कस्बों, गांवों में घूमते हुए चिपको आन्दोलन कर रहे सुंदर लाल बहुगुणा का पिथौरागढ़ आने पर लगातार साक्षात्कार लेते रहे. यह साक्षात्कार अमर उजाला में प्रकाशित होते थे.
एक ऐसा पत्रकार जिसने एक्टिविस्ट न होकर भी एक्टिविज़्म किया
साल 1985 में बद्रीदत्त ने अपना अखबार 'आज का पहाड़' निकाला. वह कहते हैं अमर उजाला में मेरा तबादला मेरठ हुआ पर तब घर के हालात ऐसे बन गए कि मुझे अमर उजाला छोड़ना पड़ा. आज का पहाड़ नाम उन्होंने इंडिया टुडे से लिया.
बद्रीदत्त कहते हैं कि वह शमशेर सिंह बिष्ट, पी सी तिवारी, प्रदीप टम्टा जैसे एक्टिविस्टों की खबरें लगातार छापते रहे. वह कभी एक्टिविस्ट नही बने पर उन्होंने इन एक्टिविस्टों की खबरें प्रायिकता के साथ छापी. किसी आंदोलन को कवर करने पर गांव वाले यह कहते बड़े खुश होते थे कि उनकी आवाज भी कोई उठा रहा है. उन दिनों पत्रकारिता वाकई जनता की आवाज होती थी.
उन्होंने आगे बताया कि उन दिनों एक डीएम ने नगर पालिका की जमीन पर घर बनाने को लेकर एक व्यक्ति को नोटिस दिया. हमने इस विषय पर लिखा तो डीएम को वह नोटिस वापस लेना पड़ा और इसके बाद उस डीएम ने हमारे अखबार का रजिस्ट्रेशन कैंसल करवा दिया. अखबार सस्पेंड हो गया तो वह प्रेस काउंसिल गए तो उसके हस्तक्षेप से अखबार फिर शुरू हुआ.
पुरस्कारों से दूर रहते हुए पब्लिक की रीयल सेवा पत्रकारिता
साल 1998 में बद्रीदत्त 'पीटीआई' से जुड़ गए और अमर उजाला के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता करते रहे. साल 2006 से 2009 तक 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से जुड़े रहे. वहां उन्होंने सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अभियान चलाया. बद्रीदत्त बताते हैं कि कबूतरी देवी जैसे कलाकारों को हम दुनिया के सामने लाए, पहाड़ के इन लाजवाब गुमनाम कलाकारों की हमने पूरी सीरीज चलाई. पद्मश्री शेखर पाठक ने भी इस काम की तारीफ की और यही तारीफ उनको पूरे जीवन में मिला एकमात्र पुरस्कार है.
बद्रीदत्त कसनियाल के इस काम पर 'बारामासा' की वेबसाइट में कबूतरी देवी पर बने एक एपिसोड में लिखा भी है "साल 1995. सीमांत क्षेत्र पिथौरागढ़ में ‘आज का पहाड़’ अख़बार के संपादक बद्रीदत्त कसनियाल, स्थानीय लोक कलाकारों पर आधारित लेखों की एक सीरीज़ प्रकाशित कर रहे थे. इस दौरान वो ऐसे कलाकारों की भी खोज कर रहे थे जिन्होंने एक दौर में प्रसिद्धि तो खूब पाई, मगर अब गुमनामी की ज़िंदगी जीने को मजबूर थे. उनके साथी नरेश जोशी ने तब उन्हें एक ऐसा नाम सुझाया जिन्हें उत्तराखंड की पहली लोक गायिका भी कहा जाता था. बद्रीदत्त कसनियाल और नरेश जोशी इस गायिका की खोज में निकल पड़े. वे जब क्वीतड़ गांव पहुंचे तो देखा कि उस गायिका की आर्थिक स्थिति दयनीय थी और वो दिहाड़ी-मज़दूरी करने को मजबूर हो गई थीं. कसनियाल ने उनसे लम्बी बातचीत की और ‘आज का पहाड़’ में उनके बारे में एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया. इस लेख ने गुमनामी के अंधेरों में खो चुकी लोक गायिका को जैसे एक नया जीवन दे दिया और पहाड़ की जनता के बीच उन्हें पुनर्स्थापित कर दिया."
साल 2006 में बद्रीदत्त कसनियाल ने कम्प्यूटर सीखा और 2009 में वह 'ट्रिब्यून' से जुड़ गए. ट्रिब्यून से वह 'हिंदुस्तान टाइम्स' में आने से पहले साल 2017 तक जुड़े रहे. अभी वह पीटीआई, हिंदुस्तान टाइम्स, नॉर्थन गजेट के लिए अंग्रेज़ी में लिखते हैं और 'आज का पहाड़' हिंदी में लिख रहे हैं.
वह कहते हैं पत्रकार ही जनता का प्रतिनिधि होता है, पब्लिक की रीयल सेवा पत्रकारिता से ही की जा सकती है और इसलिए ही वह अब तक लिख रहे हैं.
पत्रकारिता का अपना ‘कॉफी हाउस’
वरिष्ठ पत्रकार भास्कर उप्रेती बताते हैं कि बद्रीदत्त कसनियाल न केवल एक तेज-तर्रार पत्रकार हैं बल्कि वनराजियों के संरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर लगातार काम भी करते रहे. पढ़ाई में भी वे बेहद शार्प थे और याद पड़ता है कि दिल्ली जाकर उन्होंने UPSC की मुख्य परीक्षा तक का सफर तय किया. आज भी वे पिथौरागढ़ एयरपोर्ट के नजदीक अपने गाँव कासनी से रोज पैदल शहर आते हैं.
पिथौरागढ़ नगर में चिलकोटी भवन, बैंक रोड स्थित उनका छोटा सा दफ़्तर कई दशकों तक बौद्धिक केंद्र बना रहा. अपना और परिवार का खर्च निकालने के लिए वह ट्यूशन पढ़ाते थे और साथ ही पत्रकारिता में भी ऊँचे दर्जे की पेशेवराना ईमानदारी निभाते रहे. उनके मार्गदर्शन में न केवल कई पत्रकार बल्कि उच्च शिक्षा और प्रशासनिक सेवाओं की ओर जाने वाले युवाओं को भी दिशा मिली.
भास्कर ने आगे बताया कि नगर के आयोजनों में वे हमेशा केंद्र में रहते. उमेश डोभाल पत्रकारिता सम्मान जैसे कार्यक्रमों से लेकर कॉलेज की गोष्ठियों तक, हर जगह उन्हें बुलाया जाता. वह पत्रकारिता और साहित्य में बने सवर्ण वर्चस्व पर भी लगातार बोलते और उसका विश्लेषण करते.
उप्रेती याद करते हैं कि कसनियाल जी की संगति ने उनकी टोली को दृष्टि और आत्मविश्वास दिया. उनके दफ़्तर में बैठकर प्रेम पुनेठा, पूरन बिष्ट, सुंदर चंद ठाकुर, भरत ठाकुर, जहाँगीर राजू, चंद्र बहादुर जैसे पत्रकार और लेखक-शिक्षक तैयार हुए. उनका यह दफ़्तर किसी कॉफी हाउस की तरह था, जहाँ डॉ. राम सिंह, पी.डी. पंत, पूर्व विधायक बोरा, जिला कृषि अधिकारी डॉ. खान जैसे लोग भी रोज जमा होते. कॉलेज के बाद युवाओं की टोली आकर उन्हें रिप्लेस कर देती और बहसों का सिलसिला नेपाल, कोसोवो, फिलिस्तीन से लेकर लिट्टे तक के मुद्दों पर चलता.
दफ़्तर बंद होने के बाद वे छात्रों के साथ निकल पड़ते. पुनेठा न्यूज़ एजेंसी, फिर लाइब्रेरी के नीचे हवलदार की चाय की दुकान, वहां युवाओं का यह दल बद्रीदत्त कसनियाल को घेरे गरमागरम बहस करता. यही वह माहौल था जहाँ से आने वाली पीढ़ी ने पत्रकारिता और जनसरोकार दोनों का पाठ सीखा.
उन्होंने आगे कहा बद्रीदत्त कसनियाल राष्ट्रीय मीडिया के लिए सीमा, सेना और उत्तराखंड से जुड़े विषयों पर विश्वसनीय आवाज़ थे. कभी-कभी विद्यार्थी मज़ाक में उन्हें चुनौती देते 'अगर दम है तो फोन पर डीएम को हड़काओ' और वे किसी मुद्दे पर डीएम को सचमुच फटकार भी देते. मान्यता प्राप्त पत्रकार होने का असर इतना था कि कभी मज़ाक-मज़ाक में कहने पर सरकारी गाड़ी भी उनके लिए पहुँच जाया करती थी.
'आज का पहाड़' अखबार निकालने के दिनों में विज्ञापन जुटाने में 'हिमालयन ग्राम्य विकास संस्थान' के संस्थापक राजेंद्र बिष्ट, जहाँगीर राजू और राजीव पांडे जैसे साथी मदद करते. बाद में कसनियाल जी उन्हें पत्रकारिता और समाजसेवा, दोनों रास्तों पर लगा देते.
बद्रीदत्त कसनियाल के बारे में एक खास बात को याद करते भास्कर उप्रेती ने कहा कि उनकी एक आँख बचपन से ही कमजोर रही है, इसलिए वे हमेशा लेंस लेकर ही चलते और महीन अक्षर उसी से पढ़ते. निजी जीवन में वे लेनिन के प्रशंसक थे खासकर उनके पहनावे के. लेकिन पत्रकार के रूप में उन्होंने कभी वामपंथी होने की कोशिश नही की. वे मज़ाक भी खूब करते, प्रेम पुनेठा उम्र में उनसे बड़े थे, मगर कसनियाल जी अपनी उम्र का मज़ाक उड़ाते हुए कहते कि वह उनसे छोटे हैं और साथियों को हंसा देते.
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