Monday, September 29, 2025

स्वास्थ्य पखवाड़ा और मरीजों की जमीनी हकीकत

स्वास्थ्य पखवाड़ा और मरीजों की जमीनी हकीकत

स्वास्थ्य पखवाड़ा हर साल बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. अस्पतालों और समाज में शिविर लगते हैं, लोग रक्तदान करते हैं और सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें साझा होती हैं. लेकिन इस धूमधाम के पीछे की हकीकत अक्सर है, प्लेटलेट्स की कमी और व्यवस्थागत कमियां मरीजों और उनके परिजनों की रातों की नींद उड़ा रही हैं. 

पखवाड़े का उत्सव और मरीजों की चुनौतियां

इन दिनों देश के कई हिस्सों में स्वास्थ्य पखवाड़ा बड़े पैमाने पर मनाया जा रहा है. देशभर में कई जगह रक्तदान शिविर लग रहे हैं, लेकिन इस उत्सव के बीच मरीजों की मुश्किलें कम नही हुई हैं. डेंगू, मलेरिया और कैंसर जैसे रोगों से जूझ रहे लोगों को प्लेटलेट्स की कमी का सामना करना पड़ रहा है. अस्पतालों में भर्ती मरीज और उनके परिजन ब्लड बैंकों के चक्कर काटते हुए परेशान हैं.

देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज में भर्ती 45 वर्षीय कैंसर पीड़ित राधा (बदला हुआ नाम) के परिजनों को कल आधी रात में मरीज के लिए प्लेटलेट्स जुटाने के लिए 120 किलोमीटर दूर हरिद्वार जाना पड़ा. अस्पताल ने 'अर्जेंट' लिखे आवेदन फॉर्म के बावजूद सिर्फ उसी ब्लड ग्रुप की प्लेटलेट्स लेने की शर्त रखी. यह घटना स्पष्ट करती है कि पखवाड़े का उत्सव असली समस्या को ढक नहीं सकता.

प्लेटलेट्स की कमी के असली कारण

प्लेटलेट्स का जीवनकाल केवल 5-7 दिन होता है, इसलिए उनकी आपूर्ति हमेशा चुनौतीपूर्ण रहती है. समस्या तब और बढ़ जाती है, जब प्रशासनिक नियम और लचर व्यवस्था इस कमी को और गहरा देते हैं.

जबकि 2025 की AABB (American Association of Blood Banks) और ICTMG (International Collaboration for Transfusion Medicine Guidelines) गाइडलाइंस कहती हैं कि आपात स्थिति में मिलती-जुलती प्लेटलेट्स का उपयोग सुरक्षित और प्रभावी हो सकता है. इसके बावजूद मरीज के परिजनों को अनावश्यक दौड़भाग करनी पड़ती है. AABB और ICTMG दोनों ने मिलकर यह दिशानिर्देश तैयार किए हैं ताकि प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन में एकरूपता, सुरक्षा और मरीज की वास्तविक जरूरत के आधार पर निर्णय सुनिश्चित किया जा सके. 

यह स्थिति सिर्फ देहरादून में नहीं है, छोटे शहरों और कस्बों में स्थिति और भी गंभीर है. ब्लड बैंकों में स्टॉक की कमी, डिजिटल नेटवर्क का अभाव और जागरूकता की कमी इस समस्या को और जटिल बनाती हैं.

देहरादून के मोहित सेठी का अनुभव

ऐसे संकट के समय मोहित सेठी जैसे वॉलंटियर्स उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं. कोविड काल में उन्होंने रक्त और प्लेटलेट्स की व्यवस्था कर सैकड़ों लोगों की जान बचाई. देहरादून के अंदर उनका नेटवर्क इतना मजबूत है कि एक फोन कॉल पर डोनर तैयार हो जाते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या एक व्यक्ति या कुछ वॉलंटियर्स पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी छोड़ना उचित है. सिस्टम की खामियों का बोझ इन निस्वार्थ वॉलंटियर्स पर पड़ रहा है.

मोहित कहते हैं लोग रक्तदान से कतराते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर इन्हीं वॉलंटियर्स से तुरंत मदद की उम्मीद करते हैं. कई बार इन निस्वार्थ रक्तदाताओं को स्वार्थी कहकर तंज किया जाता है और उनके सामने रुपयों का प्रस्ताव रखा जाता है.

मोहित सेठी का सुझाव है कि प्लेटलेट्स संकट को कम करने के लिए भारत में गाइडलाइंस पारदर्शी हों और आपात स्थिति में मिलती-जुलती प्लेटलेट्स का इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाए. उन्होंने इस विषय पर स्वास्थ्य अधिकारियों और उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर धन सिंह रावत के साथ पत्राचार भी किया है.

उन्होंने आगे कहा कि डिजिटल ब्लड बैंक नेटवर्क से सभी ब्लड बैंकों को जोड़ा जाए ताकि स्टॉक की वास्तविक जानकारी तुरंत उपलब्ध हो. रक्तदान को केवल पखवाड़े तक सीमित न रखकर सालभर की आदत बनानी होगी और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी, ताकि मरीजों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े.

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