हवा में घुल गया जाने कौन सा ज़हर है,
शैतान बन गए इंसानों का इंसानों पर कहर है।
ये नोटों की खुशबू और तख़्त का ही असर है,
जो इंसान आज इंसान पर ढहते ज़ुल्मों से बेखबर है।
किसी को बहत्तर हूरों के पास तो किसी को स्वर्ग में जाने की फ़िक्र है,
पर अपनी इस दुनिया को नर्क बनाती चालों से सब बेख़बर हैं।
बंदूक की नोंक पर अब हर फ़ैसले लिए जाने लगे हैं,
शांति के दूत गांधी और मंडेला के देखे सपने भुलाए जाने लगे हैं।
वो दिन दूर नही जब इंसान, इंसान को ही ढूंढता नज़र आएगा।
वो अपनी चिता पर आग खुद ही लगाएगा।
अब शायद इस खश को समेटने का समय आ गया है,
खुदा के ज़मीन पर आने का नही, खुद को जगाने का वक़्त आ गया है।
हिमांशु जोशी।
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