Thursday, October 9, 2025

उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा का भविष्य: शिक्षक, परंपरा और अनिश्चितता

उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा का भविष्य: शिक्षक, परंपरा और अनिश्चितता

मदरसा बोर्ड का अंत और नई व्यवस्था

6 अक्टूबर 2025 को उत्तराखंड सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025 को मंजूरी देकर मदरसा शिक्षा बोर्ड को भंग करने का निर्णय लिया, जिसे राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (रिटायर्ड) ने अनुमोदित किया। यह नियम 1 जुलाई 2026 से लागू होगा, और तब तक सभी मदरसों को उत्तराखंड विद्यालय शिक्षा बोर्ड के तहत लाया जाएगा। नई व्यवस्था में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचा (एनसीएफ) और नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 लागू होगी, जिसमें विज्ञान, गणित और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसे विषय अनिवार्य होंगे। सरकार का दावा है कि यह कदम शिक्षा में एकरूपता और आधुनिकीकरण लाएगा, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि कुरान, हदीस, अरबी और उर्दू जैसी धार्मिक शिक्षा का क्या होगा और इसे पढ़ाने की जिम्मेदारी कौन लेगा?

शिक्षकों की योग्यता पर संकट

मदरसों में पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षक, मौलवी, हाफिज़ और आलिम धार्मिक शिक्षा में विशेषज्ञ हैं, लेकिन उनके पास टीईटी या बीएड जैसी औपचारिक डिग्रियाँ अक्सर नहीं होतीं।
नए नियमों के तहत ये शिक्षक अयोग्य घोषित हो सकते हैं, जिससे हजारों शिक्षकों का रोजगार खतरे में है। दूसरी ओर मुख्यधारा के शिक्षक, जो औपचारिक योग्यताएँ रखते हैं, कुरान, हदीस, अरबी या उर्दू जैसे विषयों में पारंगत नहीं हैं।

यह अनिश्चितता न केवल शिक्षकों, बल्कि उन छात्रों के भविष्य को भी प्रभावित कर सकती है जो अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को बनाए रखने के लिए मदरसों पर निर्भर हैं।

धार्मिक शिक्षा का अनिश्चित भविष्य

मदरसों का मूल उद्देश्य धार्मिक और सामान्य शिक्षा का संतुलन रहा है. जिसमें कुरान, हदीस, अरबी और उर्दू जैसे विषयों को प्राथमिकता दी जाती थी। सरकार ने आश्वासन दिया है कि धार्मिक शिक्षा को नए पाठ्यक्रम मेंबशामिल किया जाएगा, लेकिन इसका स्वरूप और समय अभी स्पष्ट नहीं है। यदि धार्मिक शिक्षा को वैकल्पिक या सीमित घंटों तक सिमटाया गया, तो मदरसों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान कमजोर हो सकती है।

समुदाय की चिंताएँ और भावनात्मक प्रभाव

इस निर्णय ने मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा और अलगाव की भावना को जन्म दिया है। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इसे संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 30) का उल्लंघन बताया, जो अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षिक संस्थाएँ चलाने का हक देता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह कदम धार्मिक शिक्षा को कमजोर करेगा और सामाजिक विभाजन को बढ़ाएगा। madrasas न केवल शिक्षा, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के केंद्र भी हैं। यदि ये अपनी विशिष्टता खो देंगे, तो छात्रों और उनके परिवारों में यह भावना गहरी हो सकती है कि उनकी परंपराएँ खतरे में हैं। यह भावनात्मक प्रभाव समुदाय और सरकार के बीच विश्वास की कमी को और गहरा सकता है।

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