हर्ष काफर का नाम अब सिर्फ़ कविताओं और रील्स तक सीमित नहीं. उनकी ताज़ा डॉक्यूमेंट्री Forest Fire in Himalayas ने सोशल मीडिया पर तूफान ला दिया है.
हमने हर्ष से उनके जीवन और इस डॉक्यूमेंट्री पर विस्तार से बातचीत की. उत्तराखंड के जंगलों की आग (forest fire) इन दिनों चरम पर होती है, डॉक्यूमेंट्री में जंगल मे आग के कारणों की पड़ताल की गई है. साथ ही इसमें हम पिछले साल बिनसर वन्यजीव अभ्यारण्य में आग लगने के दौरान हुए घटनाक्रमों पर भी कुछ चौंकाने वाले खुलासे देखते हैं, इस घटना में छह लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी.
कैसे बना इंजीनियर हर्षवर्धन, "काफर" जो जलते जंगलों की आवाज़ बना
अल्मोड़ा जिले के माला गांव में रहने वाले हर्ष काफर ने गांव से स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद पंजाब में एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी से साल 2015 में केमिकल इंजीनियरिंग से बीटेक किया है. इसके बाद कुछ समय दिल्ली में नौकरी करने के बाद हर्ष का मन नौकरी से उचटने लगा, हर्ष कहते हैं कॉलेज के वक्त मैं देखता था कि हिमाचल प्रदेश, असम और पंजाब के लड़के अपनी संस्कृति से कितने जुड़े हैं लेकिन मेरा उत्तराखंड से लगाव बहुत कम था और मेरी कविताएं भी हिंदी में थीं. अपनी जन्मभूमि के लिए कुछ करने की चाह से मैं कुमाउनी में लिखने लगा और वापस घर लौट आया.
पहले प्रयास में जब मैं नौकरी छोड़ कर आया तो मम्मी ने मुझे नौकरी में वापस भेज दिया पर जब मैं दोबारा घर आया तो बिना किसी को बताए ही वापस आ गया था. कॉलेज से पहले मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था तो मुझे लगता था कि घर वापस जाकर कुछ हो ही जाएगा, बाकी घर में खेती तो थी ही. हर्ष ने आगे बताया कि अब उनकी कविताएं युवाओं के बीच लोकप्रिय होने लगी हैं, फेसबुक और इंस्टाग्राम में बीस से तीस हजार फॉलोवर्स हैं. फेसबुक से कुछ कमाई भी हो जाती है. वह अपने परिवार का शुक्रिया अदा करते हैं कि उन लोगों ने एक जमी जमाई नौकरी छोड़ कर घर लौटे युवा का अब तक साथ दिया है.
अपने उपनाम के पीछे की कहानी सुनाते हर्ष कहते हैं उनका असली नाम हर्षवर्द्धन जोशी है, काफर का अर्थ है जो अपनी धुन में चलता है, जो नौकरी छोड़ कर घर रहने आ जाएगा वो काफर ही है.
कविता सिर्फ खिड़की खोलती हैं पर डॉक्यूमेंट्री में सब कुछ विस्तार से
हर्ष काफर ने इस बार अस्कोट आराकोट यात्रा भी की है, वह कहते हैं उस यात्रा में मुझे सबसे रोचक ये लगा कि वहां आपको यात्रा करते खाने पीने का इंतजाम बिना पैसों के करना पड़ता है, वहां जाकर मैंने अपने लोगों को जाना. हमें यात्रा से यह पता चला कि इस बार काफी बर्फ गिरने वाली जगह बर्फ नही गिरी है. हर्ष कहते हैं वहीं उन्हें पद्मश्री और उत्तराखंड के इनसाइक्लोपीडिया कहे जाने वाले शेखर पाठक को भी करीब से जानने का मौका मिला.
इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने पर हर्ष कहते हैं कविता केवल खिड़की खोलने का काम करती है पर डॉक्यूमेंट्री में अगर हम किसी बात को विस्तार से कहना चाहते हैं तो कह सकते हैं.
डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत हर्ष के दमदार नरेशन के साथ 'जंगल की आग का अतीत' से
वनाग्नि की गम्भीरता दिखाती इस डॉक्यूमेंट्री में जंगल की आग की कुछ रीयल फुटेज हैं, साथ में इसमें शेखर पाठक सहित उत्तराखंड के पहाड़ों की गहरी जानकारी रखने वालों की टिप्पणियों को भी जगह दी गई है.
नैरेटर हर्ष काफर अपनी दमदार आवाज में डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत बद्रीदत्त पांडे के साल 1921 के एक भाषण के अंश से करते हैं, यह पंक्तियां आज के हालातों पर भी सटीक बैठती हैं. इसके बाद इतिहासकार पद्मश्री शेखर पाठक बताते हैं कि पहले ग्रामीण अपनी जान को कुर्बान कर भी आग बुझाते थे पर अंग्रेजों ने लोगों को जंगलों से दूर कर दिया.
प्रभावित करती पंक्तियों के साथ बिनसर अभ्यारण्य का सच
हर्ष काफर ने डॉक्यूमेंट्री में प्रभावित करने वाले संगीत का प्रयोग किया है. भास्कर भौर्याल का संगीत डॉक्यूमेंट्री में वनाग्नि की गम्भीरता को और भी बढ़ाता रहता है.
हर्ष काफर की पंक्तियां 'हम जल रहे हैं, आग हमें जला रही है, हमारे जंगलों को जला रही है और हमारे संसाधनों को जला रही है' जंगल की आग का मनुष्यों से गहरा संबंध दर्शाती रहती हैं.
जब वह घाटी से 5-6 किलोमीटर ऊपर खड़े होकर कहते हैं 'चढ़ने में वो भी दिन के उजाले में चार से पांच घण्टे लगते हैं. आप चाहते हैं और आप सोचते हैं एक फायर वॉचर और एक फॉरेस्ट गार्ड यहां आए वो भी रात के अंधेरे में और आग बुझा दें' तो पहाड़ की भौगोलिक स्थिति को न समझने वाले भी पहाड़ों के जंगलों में लगने वाली आग की गम्भीरता से परिचित हो जाते हैं. डॉक्यूमेंट्री देख कर लगता है कि हर्ष काफर इसे बनाने का अपना उद्देश्य पूरा कर सके हैं.
बिनसर वन्यजीव अभ्यारण्य पर चौंकाने वाले खुलासे
पिछले साल बिनसर वन्यजीव अभ्यारण्य की आग पर डॉक्यूमेंट्री में विस्तार से चर्चा की गई है. डॉक्यूमेंट्री का यह हिस्सा दर्शकों को चौंकाता है, जब वह सुनते हैं कि आग बुझाने के लिए कैसे नेपालियों को बिना संसाधनों के भेज दिया जाता है.
इसमें कैग की रिपोर्ट का जिक्र भी है, जहां बताया जाता है कि फॉरेस्ट फंड के पैसों से आईफोन, लैपटॉप लिए गए. वीडियो में बैकग्राउंड पर दिखाई जा रही अखबारों की कटिंग लगाते हर्ष ने जो दिखाया है उसकी प्रमाणिकता भी सिद्ध की है.
कुछ महत्वपूर्ण सुझाव जो डॉक्यूमेंट्री का हासिल है
डॉक्यूमेंट्री में जंगल के आसपास रहने वाले लोगों के लिए जंगल की महत्वता दिखाने के लिए कई साक्षात्कार लिए गए हैं. इसमें से एक विनोद पाण्डे का भी है, जिसमें वह कहते हैं आग के लिए जो प्रतिरोधक शक्ति है वो है नमी या पानी. जंगल का सबसे बड़ा वरदान है पानी, मानसून और वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से पानी मिलता है. जंगल उस पानी को रोकता है.
ऐसे ही भरत सिंह, जो वन पंचायत सरपंच भी हैं वह आग के लिए वन विभाग से अनुरोध करते दिखते हैं कि जंगल में चारा पत्ती वाले पेड़ ही न लगाएं, फलदार वृक्ष भी लगाएं. यह लगेंगे तो जो बंदर आज घर में घुस रहे हैं वो जंगल में रहेंगे, क्योंकि उनकी वहां पूर्ति हो जाएगी, वो खेती की तरफ नही आएंगे.
शेखर पाठक भी जंगल की आग रोकने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव देते कहते हैं सरकार, समाज और संस्थाओं का संयुक्त मोर्चा ही आग से टैकल कर सकता है. वन विभाग अकेला कितना ही कर्मठ ईमानदार बन जाए, अकेला आग नही बुझा सकता, समाज अकेला नही बुझा सकता. कितना भी एडवांस हो जाएं अमरीका भी आग नही बुझा पा रहा है, कैलिफोर्निया में दर्जनों की संख्या में लोग मरते हैं.
डॉक्यूमेंट्री में पिरूल नीति पर भी सरकार की घोषणाओं और जमीनी हकीकत का आकलन किया गया है, हर्ष ने यहां भी शेखर पाठक की महत्वपूर्ण राय ली है और यह आग रोकने पर जरूरी है.
हिमांशु जोशी.
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