Saturday, March 8, 2025

अस्कोट आराकोट यात्रा के अनुभवों से जाना फिर जरूरी है महिला समाख्या।

अस्कोट आराकोट यात्रा पुरोला से आगे बढ़ते जवाहर नवोदय विद्यालय धुंगिर की तरफ बढ़ रही थी तो रास्ते में चंद्रा भंडारी, प्रीति थपलियाल मिले।
प्रीति थपलियाल और चंद्रा भंडारी लंबे समय तक महिला समाख्या से जुड़े रहे और इसी वजह से उनके साथ महरगांव, त्यूणी, खूनीगाड़, मोरी में महिलाओं से बातचीत करते पहाड़ की महिलाओं की समस्याओं पर मेरी नई समझ बनी। दोनों के महिला समाख्या अनुभवों को हनोल के गेस्ट हाउस में रहते मुझे विस्तार से जानने का मौका मिला।

महिला समाख्या कार्यक्रम के बारे में

महिला समाख्या कार्यक्रम पर जानकारी देते हुए प्रीति थपलियाल ने बताया कि उत्तराखंड में रूढ़िवादी सोच के चलते महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर निकलने की अनुमति नहीं मिलती थी, यह स्थिति आज भी कई क्षेत्रों में बनी हुई है। 

साक्षरता के साथ-साथ महिलाओं को जीवनकौशल, आत्मनिर्भरता एवं समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के शिक्षा विभाग ने 1988 में महिला समाख्या कार्यक्रम प्रारंभ किया। यह महिला सशक्तीकरण का व्यावहारिक पहल था। 1990 में अविभाजित उत्तर प्रदेश के टिहरी को इसके लिए चुना गया, जिसके पश्चात 1995 में पौड़ी और 1996 में नैनीताल को भी शामिल किया गया। वर्ष 2000 में राज्य निर्माण के बाद देखा गया कि पहाड़ों में भारी मेहनत करने वाली महिलाओं को घरेलू निर्णयों में भागीदारी नहीं मिलती। इसी को ध्यान में रखते हुए 2004 में उत्तरकाशी, चंपावत एवं उधमसिंहनगर में भी यह कार्यक्रम विस्तारित किया गया। 

इस पहल से स्थानीय महिलाओं ने समझा कि सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा मुख्य आधार है। ग्राम स्तर पर 'सहयोगिनी' के माध्यम से संरचना बनाई गई, जहाँ प्रत्येक सहयोगिनी दस गाँवों की ज़िम्मेदारी संभालती थी। दस कार्यकर्ताओं के समूह द्वारा सौ गाँवों को कवर किया जाता था। 

महिला समाख्या से जुड़ी साक्षर महिलाएँ आज आंगनवाड़ी एवं आशा कार्यकर्ता के रूप में कार्यरत हैं। प्रीति के अनुसार, इसके तहत जिलों में विशेष साक्षरता शिविर आयोजित किए जाते थे, जिनके लिए विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया गया। कई प्रतिभागियों को ओपन स्कूलिंग से जोड़ा गया। उत्तराखंड में 1000 से अधिक स्कूल छोड़ चुकी लड़कियों को पुनः शिक्षा से जोड़ने के साथ-साथ महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराधों पर अध्ययन भी किया गया। 

प्रीति ने बताया कि 2004 में जड़ी-बूटी विशेषज्ञ महिलाओं की पहचान कर ग्राम, क्लस्टर एवं ब्लॉक स्तर पर 'संजीवनी केंद्र' स्थापित किए गए। इससे पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण हुआ और "ज्ञान बाँटने से उसकी समाप्ति" जैसे भ्रम भी दूर हुए। पौड़ी के एक केंद्र को देहरादून स्थित जड़ी-बूटी शोध संस्थान द्वारा सम्मानित भी किया गया। साथ ही, 'अपनी अदालत' नामक सामुदायिक पहल के माध्यम से महिलाएँ पारिवारिक विवादों का निपटारा करने लगीं। 

एक रोचक उदाहरण देते हुए प्रीति ने बताया कि 1997 में बेतालघाट में राशन कार्ड बनवाने हेतु ली जा रही अवैध राशि और टैक्सियों के मनमाने किराए के खिलाफ महिला समाख्या सदस्यों ने जागरूकता फैलाई। विरोध प्रदर्शनों के बाद यह समस्याएँ समाप्त हुईं। 2016 में कार्यक्रम बंद होने पर 350 कर्मचारी बेरोज़गार हुए। प्रीति के अनुसार, 2024 की अस्कोट-आराकोट यात्रा के अनुभव बताते हैं कि आज भी महिलाओं की स्थिति में बड़ा परिवर्तन नहीं आया। घरेलू हिंसा या स्वरोज़गार जैसे मुद्दों पर चर्चा के लिए समर्पित मंचों की कमी है। उनके विचार में महिला समाख्या जैसे कार्यक्रमों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।  

महिला समाख्या कार्यक्रम का नतीजा हैं 'गंगा'.

महिला समाख्या के बारे में बातचीत आगे बढ़ाते प्रीति थपलियाल ने आगे कहा कि इस कार्यक्रम ने कई महिलाओं का जीवन बदला, जिस पर 'ना मैं बिरवा, ना मैं चिरिया' नाम से किताबें भी प्रकाशित हुई थी। गंगा देवी भी इन महिलाओं में से एक हैं, नाती पोतों के साथ खेलना तो हर कोई चाहता है पर महिला समाख्या की वजह से उनके साथ पढ़ाई करने का निर्णय लेकर गंगा देवी ने दिखाया कि महिला समाख्या कार्यक्रम ने पहाड़ की महिलाओं को क्या कुछ दिया था।

गंगा देवी से सीधी बातचीत कर कार्यक्रम की सफलता को ज्यादा समझा जा सकता था इसलिए मैंने प्रीति से उनका मोबाइल नंबर लिया। महिला समाख्या का नाम सुनते ही गंगा देवी भावुक हो गईं और अपनत्व के साथ अपने अनुभव साझा करने लगीं। 

जीवन संघर्ष और शिक्षा की ललक।

1947 में यमकेश्वर के जामल गांव में जन्मी गंगा देवी ने पिता की असामयिक मृत्यु के बाद मां के संघर्षों को करीब से देखा। वह बताती हैं, "उस दौर में लोग कहते थे—'लड़की को पढ़ाकर क्या करोगी? उसे तो घास ही काटनी है!' मगर मेरा मन पढ़ाई में लगता था। मैं कैसे भी कोई न कोई बहाने बनाकर स्कूल चले जाती, वापस आते ही मम्मी और दीदी से मार पड़ती थी।" शिक्षकों के सहयोग से उन्होंने पाँचवी तक शिक्षा प्राप्त की। बाद में उन्हें प्रौढ़ शिक्षा केंद्र में पढ़ाने का अवसर मिला, जिसे सार गांव में विवाह के बाद छोड़ना पड़ा। वह कहती हैं कि गांव में प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र के अधिकारी किसी पांचवी पास की तलाश में घूम रहे थे, मैं उनसे घरवालों की डर से दूसरे गांव में जाकर मिली।

महिला समाख्या का प्रभाव

साल 1997 में जब महिला समाख्या की टीम उनके गांव सार पहुँची, तो ग्रामीणों ने इन्हें 'घर छोड़कर भटकती औरतें', 'रंडी' पता नही और भी क्या क्या कहा। गंगा देवी याद करती हैं, "मासिक बैठकों में जब उन्होंने स्त्री शिक्षा और अधिकारों पर चर्चा शुरू की, तो हमारी सोच धीरे-धीरे बदलने लगी।" इस प्रक्रिया में उन्होंने न केवल स्वयं को बदला, बल्कि अपनी बेटियों और बहुओं को भी शिक्षित किया। 

सामाजिक बदलाव के प्रतीक

महिला समाख्या के कहने पर गंगा देवी ग्राम प्रधान बनीं। जलागम परियोजना में ठेका लेने पर पुरुषों के विरोध के जवाब में उन्होंने कहा, "हमने तुम्हें जन्म दिया है! यदि तुमने अपना काम ठीक से किया होता, तो हमें ग्राम प्रधान बनकर गांव के विकास के लिए काम न करना पड़ता।" उनके नेतृत्व में बने हौज आज भी गांव की पहचान हैं। एक अन्य घटना में एसडीएम को गांव बुलाने के उनके प्रयास को गांव के लोगों असंभव बताया गया, लोग कहते थे कि कैसे कैसे प्रधान बने लेकिन एसडीएम को गांव कौन बुला पाया पर गंगा देवी ने इसे इसे साकार किया। 

महिला समाख्या बंद होना पहाड़ की महिलाओं के लिए ऐतिहासिक क्षति

2005 में आठवीं पास करने वाली गंगा आज भी सक्रिय हैं। पति के ग्राम प्रधान कार्यकाल में उन्होंने मीडिया के लोगों से व्यंग्य किया, "पुरुष प्रधानों के काम करने पर आप लोग 'पति प्रधान' कहते हो, पर महिला प्रधानों के लिए 'मिसेज' क्यों नहीं?" वर्तमान में बहू के प्रधान पद पर रहते हुए भी वह मनरेगा परियोजनाओं का संचालन करती हैं। अपने एक पुत्र को खो चुकी गंगा कहती हैं, "महिला समाख्या बंद होना पहाड़ की महिलाओं के लिए ऐतिहासिक क्षति है। यदि यह चल रहा होता, तो हम नए आयाम छू रहे होते। हमने कैसे कैसे काम कर लिए होते।"

हिमांशु जोशी।

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