हिमालय की गोद में कला और साहित्य को एक अनमोल तोहफे के रूप में महावीर रवांल्टा का नाम उभरता है। उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों से निकलकर, जहाँ हिंदी साहित्य के दिग्गज जैसे सुमित्रानंदन पंत, शिवानी, मंगलेश डबराल, हिमांशु जोशी और शेखर जोशी ने अपनी छाप छोड़ी, महावीर रवांल्टा उसी परंपरा को नई ऊँचाइयों तक ले जा रहे हैं। रवांल्टी भाषा के लिए उनके समर्पण ने न केवल उनके निजी दुखों को पीछे छोड़ने में मदद की, बल्कि उनकी जन्मभूमि हिमालय की शान को भी बढ़ाया। इस महीने पौड़ी के सिरोली गांव में उन्हें 'उमेश डोभाल स्मृति सम्मान' से नवाजा जाएगा।
यात्रा में खुला युवाओं के बीच महावीर का प्रभाव
अस्कोट-आराकोट यात्रा के दौरान जब हम स्वील गांव से आगे बढ़ रहे थे, कुछ युवाओं ने हमसे हमारी अगली मंजिल के बारे में पूछा। जैसे ही हमने महरगांव का नाम लिया, एक युवा ने उत्साह से कहा कि वहाँ रवांल्टी भाषा के लिए कार्य करने वाले महावीर रवांल्टा रहते हैं। यह जानकर कि एक भाषा को जीवित रखने वाले व्यक्ति की नई पीढ़ी में इतनी पहचान है, मेरे मन में उनसे मिलने की उत्सुकता जाग उठी।
शाम ढलते ही जब हम महरगांव पहुँचे, महावीर रवांल्टा ने अपने घर पर हम यात्रियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने अपने आंगन में बच्चों के नाटक की योजना बनाई थी, लेकिन बारिश ने उस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया। फिर भी, उन्होंने मौके का फायदा उठाते हुए अस्कोट- आराकोट यात्रियों की मौजूदगी में अपनी पुस्तक 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुमक' का लोकार्पण करवाया।
यात्रा के अंतिम पड़ाव आराकोट में उनकी फिर से मुलाकात हुई, जहाँ मैं उनके साथ रात रुककर गहन बातचीत का सौभाग्य प्राप्त कर सका।
पढ़ाई का शौक जो बन गया जुनून
महावीर रवांल्टा का जन्म 10 मई, 1966 को उत्तरकाशी जिले के सरनौल गाँव में हुआ था। उनके पिता टीका सिंह राणा राजस्व विभाग में कानूनगो थे, जबकि माँ रूपदेई घर संभालती थीं। तीन भाइयों और दो बहनों के बीच दूसरे स्थान पर रहे महावीर छोटी उम्र में ही महरगांव आ गए। गाँव के स्कूल में हर शनिवार को आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कविताएँ सुनने का मौका मिला, जिसने उनके मन में साहित्य के प्रति रुचि जगा दी। नौवीं कक्षा में पुस्तकालय की किताबों और 'पराग', 'नन्दन', 'धर्मयुग' जैसी पत्रिकाओं ने उन्हें आकर्षित किया। जहाँ उनके दोस्त जेबखर्च से नाश्ता खरीदते, वहीं महावीर उन पैसों से पत्रिकाएँ ले आते। बाद में पिता के साथ उत्तरकाशी जाने पर उन्होंने गांधी वाचनालय में अपनी पढ़ाई जारी रखी। बारहवीं में विज्ञान का छात्र होने के बावजूद, उनका झुकाव प्रेमचंद, शिवानी, अभिमन्यु अनत और हिमांशु जोशी जैसे हिंदी साहित्यकारों की ओर था।
लिखने की शुरुआत और दिग्गजों से मिला प्रोत्साहन
बीएससी में दाखिला लेने के बाद पहले ही साल में महावीर असफल हो गए, क्योंकि उनका मन लिखने में अधिक रम गया था। उन्होंने टिहरी से छपने वाले साप्ताहिक 'हिमालय और हम' में अपना पहला पत्र भेजा, जिसके संपादक गोविंद प्रसाद गैरोला थे। फिर 1983 में देहरादून के साप्ताहिक 'उत्तरांचल' के 'साहित्य कला और संस्कृति' स्तंभ में उनकी कविता 'बेरोजगार' छपी। इसके संपादक सोमवारी लाल उनियाल 'प्रदीप', जो अब देहरादून में रहते हैं, खुद एक कुशल कवि हैं। इन रचनाओं के प्रकाशन ने महावीर में यह विश्वास जगाया कि मेहनत से लिखा गया कुछ न कुछ छप ही जाएगा।
उत्तरकाशी के माघ मेले में कुंवर बैचेन, कन्हैया लाल नन्दन, केशव अनुरागी,मनोहर लाल उनियाल 'श्रीमन' और रमानाथ अवस्थी जैसे नामी कवियों को रातभर सुनते हुए महावीर सपने देखते थे कि क्या वह भी कभी ऐसे मंच पर अपनी कविताएँ सुना पाएँगे। संयोग से आयोजक घनश्याम रतूड़ी 'सैलानी', जो पर्यावरण और विकास पर कविताएँ लिखते थे, ने उन्हें कविता पाठ का मौका दिया। वहाँ उनकी कविता को सराहना मिली और बीस रुपये का इनाम भी। महावीर कहते हैं कि वह इनाम उनके लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसा था, जिसने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया।
पहाड़ों में फैलाया नाटक का जादू
'पराग' पत्रिका पढ़ते हुए महावीर कहानियों की ओर खिंचे चले गए। उत्तरकाशी पॉलिटेक्निक में फार्मेसी में चयन होने के बाद, गाँव में देखी रामलीला ने उन्हें नाटकों का शौकीन बना दिया। उन्होंने सन् 1930 के तिलाड़ी कांड पर आधारित नाटक 'मुनारबन्दी' लिखा और उसका निर्देशन भी किया। 1984-85 में उन्होंने 'रवांई-जौनपुर विकास युवा मंच' बनाया और पॉलिटेक्निक के वार्षिकोत्सव में दो नाटकों का मंचन किया। सुवर्ण रावत के एनएसडी दिल्ली से उत्तरकाशी आने पर महावीर ने उनके साथ जुड़कर उत्तरकाशी में डा गोविन्द चातक के 'काला मुंह' नाटक प्रस्तुत किया। इसके बाद 'कला दर्पण' की स्थापना हुई, जिसके तहत 'बांसुरी बजती रही' और 'हेमलेट' जैसे नाटक खेले गए। 'हेमलेट' देखकर पंजाब के एक प्रोफेसर ने कहा कि इतने सुदूरवर्ती क्षेत्र में इतना शानदार मंचन देखकर वह हैरान हैं, क्योंकि उन्होंने कभी इसकी कल्पना भी नहीं की थी।
1987-88 में महावीर ने महरगांव में तीन-चार दिन का नाट्य शिविर आयोजित किया, जिसमें चालीस बच्चों ने पौराणिक, लोककथाओं व समस्याओं पर नाटक तैयार किए। उन्होंने परंपरा तोड़ते हुए लड़कियों को महिला किरदार दिए। उसी समय उनका विवाह भी हुआ। सन् 1988 में चुनावी समर्थन के चलते कुछ लोगों ने मेले में उनके नाटक का विरोध किया, तो महावीर ने अपने आंगन में ही मंचन शुरू कर दिया।
नौकरी के साथ उपन्यासों से बनी पहचान
नौकरी मिलने पर महावीर मुरादाबाद और फिर अस्कोट गए। रंगमंच से दूर होने के कारण उन्होंने फिर से लेखन शुरू किया। सन् 1992 में उनका पहला उपन्यास 'पगडण्डियों के सहारे' तक्षशिला प्रकाशन से छपा, जो बेरोजगारी के दिनों का चिंतन था। यह खूब बिका और आज भी लोग इसे याद करते हैं। डॉ हरिमोहन ने 8 अगस्त 1992 को 'अमर उजाला' में इसकी समीक्षा लिखी। दूसरा उपन्यास 'एक और लड़ाई लड़' भी इसी प्रकाशन से आया। बाद में उनकी कहानियाँ 'अमर उजाला', 'वागर्थ', 'उत्तरार्द्ध' में छपीं।'समय नहीं ठहरता' उनका पहला कहानी संग्रह था। बुलंदशहर तबादले के बाद 2003 में 'अपना अपना आकाश' उपन्यास और 'टुकड़ा टुकड़ा यथार्थ' कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। वह अभी एक नए उपन्यास पर काम कर रहे हैं।
दुःख को अपने लेखन से हराते रवांल्टी को दी नई पहचान
सन् 2004 ई में अपनी इकलौती बेटी को खोने का दुःख महावीर के लिए असहनीय था, लेकिन लेखन ने उन्हें संभाला। इसके बाद 'त्रिशंकु' लघुकथा संग्रह छपा। दुःख में लिखा कविता संग्रह 'सपनों के साथ चेहरे' को भारत भारद्वाज ने निराला की सरोज स्मृति से जोड़ा।
'सीमा प्रहरी' के संपादन के लिए उन्हें पहला पुरस्कार मिला। 'अक्षर भारत' में सैनिकों पर लिखी कहानी 'अवरोहण' के लिए कानपुर में पद्मश्री जसदेव सिंह और परमवीर चक्र विजेता ले कर्नल धन सिंह थापा की मौजूदगी में दूसरा पुरस्कार मिला। महावीर कहते हैं कि सही समय पर सम्मान लेखकों को प्रेरित करता है।
कई दशक पहले रवांई में लोग रवांल्टी बोलने से हिचकते थे, लेकिन हिंदी में नाम कमाने के बाद महावीर ने इसे बचाने का बीड़ा उठाया। 1995 में उनकी पहली रवांल्टी कविता 'दरवालु' 'जन लहर' में छपी।
सन् 2003-05 में बी. मोहन नेगी ने उनकी कविताओं के कविता पोस्टर बनाए। सन् 2010 में 'भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण' के लिए शेखर पाठक ने उन्हें रवांल्टी पर काम सौंपा। उत्तराखंड भाषा संस्थान की सवेक्षण परियोजना में भी उन्होंने योगदान दिया। 'पहाड़' संस्था के बहुभाषी शब्दकोश में रवांल्टी पर उन्होंने काम किया।
हाल ही में रवांई क्षेत्र की लोककथाएं 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुमक' हिंदी में छपी, जिसे वह रवांल्टी में भी लिख रहे हैं। चार उपन्यास, पंद्रह कहानी संग्रह, पाँच कविता संग्रह के साथ उनका लेखन जारी है। उनकी प्रेरणा से रवांई के दो दर्जन युवा रवांल्टी में लिख रहे हैं, जिनमें से कुछ की कविताएँ 'हिमांतर' पत्रिका के रवांल्टी कविता विशेषांक में छपीं।
हिमांशु जोशी
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