Wednesday, June 15, 2022

मेरे पापा

दिल्ली के करावल नगर में रहने वाला रवि एक हफ्ते पहले ही मेरठ के सोफीपुर से लौटा था. कोरोना काल के मुश्किल दौर में उसे मनोज को कंधे में बैठा दिल्ली से सोफीपुर पैदल ही जाना पड़ा था. जाता भी कैसे न, अपने इकलौते बेटे को भूख से तड़पते देख कौन बाप शांत बैठ सकता है.

रवि की पत्नी सुनीता मनोज को जनते ही चल बसी थी. अधिक रक्तस्राव होने की वजह से सरकारी अस्पताल ने सुनीता की जान बचाने को लेकर हाथ खड़े कर दिए थे और प्राइवेट अस्पताल के लिए रवि के पास पैसे नही थे.

कोरोना काल के दौरान झोपड़ पट्टी में ही छूट गई साइकिल को दुरस्त कर, अब रवि धीरे-धीरे अपनी जिंदगी के पुराने ढर्रे पर लौट रहा था.

 मनोज आज अपने पापा रवि के साथ साइकल में आगे बैठा गाना गाता जा रहा था ' उड़े जेथे हवाएं पबन पबन उड़े जेथे परिंदे हो हो हो हो'. स्कूल पहुंचने पर रवि ने उसे गोद में उठा लिया और क्लास तक छोड़ आए. 

धूप चढ़ने लगी थी और रवि 'खजूरी खास' चौक पर कहीं मजूरी मिलने का इंतज़ार करते थक गया था, हमेशा की तरह जेब में रखे कल रात के भिगाए चने और पास ही हनुमान मंदिर में लगा नलका उसके साथी थे.

स्कूल में इंटरवल हो गया था, मनोज क्लास की खिड़की से बाहर एकटक नज़रों से खेलते बच्चों को देख रहा था. वो भी कुछ दिन पहले उन बच्चों के साथ खेलता था पर किसी वायरस की वजह से वो अब ठीक से चल नही सकता था.
गरीबी की वजह से रवि उसका इलाज ठीक से नही करा पाया.

स्कूल की छुट्टी होते होते रवि स्कूल के बाहर खड़ा था, 
'अले पापा आद मतन थल ने तबको तेलने का थामान दिया' घर लौटते साइकिल की आगे की डंडी में बैठा मनोज अपने पापा को स्कूल की सारी कहानी सुनाता जा रहा था.

मदन जी आज शाम भी अपनी पत्नी रूपा से झिड़काई खा रहे थे, ' क्यों मदन मास्साब दुनिया बदलने का ठेका तो आप ही लिए हो, आज अपने पैसों से स्कूल के बच्चों को फुटबॉल, बैडमिंटन रैकेट, क्रिकेट बैट, सब बांट आए, अरे अपनी औलाद न हुई तो गैरों पर तो न लुटाओ. मेरे लिए गहने तो बनवाए नही जाते'.

अगले दिन स्कूल की व्हीलचेयर में मनोज बैडमिंटन का रैकेट पकड़ अकेले ही खेल रहा था, मदन जी उसके पास आए और खिलाने लगे. मनोज में गजब की फुर्ती थी, वो एक शॉट मार अगले के लिए बिजली की तरह तैयार रहता.
शाम रवि करावल नगर में लगे बृहस्पति बाजार से मनोज के लिए जूते,एक पाव बादाम और उसकी मनपसंद सब्जी भिंडी खरीद लाए थे. रवि के खाना बनाते मनोज उनसे बोला, पापा मैं बड़ा होकल आपके लिए थुद ताना बनाऊंगा. आज मदन थल ने मुदे बैडमिन्तन तेलना तिताया. रवि मन ही मन अपने बेटे पर प्यार लुटा रहा था और अपने प्यारे बेटे के लिए उसकी आँखों में खुशी के आंसू थे.


मनोज आज मदन जी के सहयोग से जूनियर लेवल पैरा बैडमिंटन खेलने द्वारका जा रहा था. रवि दिल्ली की सड़कों को आज साइकिल से नाप रहा था, साइकिल में पीछे बैठे मनोज में उसे एक उम्मीद नज़र आने लगी थी, यही तो उसकी दुनिया थी. करावल नगर से द्वारका की लंबी दूरी भी आज रवि के लिए कुछ नही थी, वो बिना थके द्वारका पहुंच गया.

एक के बाद एक ताकतवर शॉट , मनोज आज पैरा बैडमिंटन का नेशनल चैंपियन था, जीत कर मिले पैसों को वो सीधे पापा को देता, रवि भी खुश था. 

कुछ ही सालों में मनोज ने खेल के पैसों से एक ऑटोमेटिक कार ले ली और अपने पिता के लिए करावल नगर में ही एक पक्का मकान बनवा लिया.
मनोज अपने खेल में कोई भी खामी आने पर सीधे मदन जी के घर का रुख करता.

कुछ दिनों बाद मनोज का पैरालम्पिक के लिए जाने वाली भारतीय पैरा बैडमिंटन टीम के लिए ट्रायल होना था. रवि के कदमों में बैठा मनोज कहता है 'पापा देखना, अब आपको पूरा देश जानेगा, आप मेरे साथ विदेशों में भी साथ रहोगे. हम मिलकर पूरी दुनिया घूमेंगे. रवि कहता है ' वो सब तो ठीक है, तू ये बता बहू लाकर मुझे कब अपनी चिंता से मुक्त करेगा' 
अरे पापा पहले खेल पर तो ध्यान देने दो , ऐसा कहते रवि बात घुमा देता है.

मदन जी मनोज को लेने उसके घर ही आए थे, कोर्ट में मनोज के शाट्स का कोई जवाब नही था. वहां बैठी भारतीय बैडमिंटन कोच साइना ग्रेवाल भी मनोज से बहुत प्रभावित हुई, मनोज को भारतीय बैडमिंटन पैरालम्पिक टीम में शामिल होने के साथ उसके अगले विदेशी दौरे के लिए भी तैयार रहने के लिए कह दिया गया.
मनोज खुश था, घर जाते ही पापा को गले लगा लेगा..

दो महीने बाद नीली जर्सी में मनोज एक के बाद एक शाट्स से चीन में ही हो रहे मैच में चीनी खिलाड़ी को पस्त कर रहा था,मदन जी की आंखों में आंसू थे.
मनोज भारत का पहला पैरालम्पिक बैडमिंटन चैंपियन था, भारत पहुंच कर वो और मदन जी सीधे हरिद्वार पहुंचे. रवि आज एक छोटे से अस्थि कलश में बंद था और उसे एक अनन्त यात्रा में निकलना था.

जिस दिन मनोज का चयन इस पैरालम्पिक टीम के लिए हुआ था, उसी दिन मनोज के घर लौटने से पहले रवि का दिल उनका साथ छोड़ चुका था.

हिमांशु जोशी


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