निशा के पापा अतुल एक इलेक्ट्रिशियन होने के बाद भी उसकी हर जरूरतों का ख्याल रखते थे. पंखे, फ्रिज की रिपेयरिंग करने के साथ लोगों के घर में बिजली फिटिंग कर उनकी ठीक ठाक कमाई हो जाया करती थी.
निशा के पापा और उसकी मम्मी मानसी की लव मैरेज थी. पितृसत्तात्मक समाज में अतुल एक बेटी से ही संतुष्ट था क्योंकि उसे पता था कि बेटियां विषम परिस्थितियों में भी अपने पिता का साथ नही छोड़ती हैं, आजकल के लड़के तो नौकरी और अपने कैरियर के चक्कर में मां बाप को उनके बुढ़ापे में अकेला ही छोड़ देते हैं.
अतुल दिन रात मेहनत कर निशा को शहर के प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल रैनबो में पढ़ा रहा था, जहां बच्चों को पढ़ाना रुद्रपुर के सभी मध्यमवर्गीय परिवारों के मुखियाओं का सपना होता है.
आज निशा स्कूल ही थी और उसके पापा वक्त से पहले घर लौट आए थे, उन्होंने निशा की मम्मी मानसी से कहा ' मानसी आज मेरा मन था कि टीवी खरीद ही लाऊं, निशा बड़ी हो रही है, खामख्वाह ये सरिता के घर टीवी देख कर निराश होते रहती है'.
मानसी ने कहा 'पहले इसके स्कूल की फीस जमा कर लूं, बचे पैसों का आप देख लेना'.
ये बात सुनते सुनते निशा के पापा छत से कपड़े लेने चले गए, छत पर चढ़ने के लिए उन्होंने बांस की सीढ़ी लगाई थी.
आआआआआआआआ,,,, एक चीख और निशा की मम्मी दौड़ते बाहर आई, अतुल का शरीर नीला पड़ चुका था. मानसी एकटक होते घर के ऊपर से गुजरते बिजली के तार को देख रही थी.
निशा स्कूल से आई तो उसके घर भीड़ लगी थी, आज ही वो स्कूल में 'मेरे प्यारे पापा' कविता बोल कर आई थी, घर आकर अपने पापा को भी वही कविता सुनाना चाहती थी.
'पापा मेरे प्यारे पापा,
मेरे पापा मुझे साइकिल में छोड़ने स्कूल आते हैं,
काम पर जाते हैं, फिर देर रात आते हैं
बहुत थक जाते हैं.
बड़े होकर मैं काले कोट वाली वकील बनूंगी, पापा को काम पर न जाने दूंगी,
पापा मेरे सबसे प्यारे पापा'
मानसी ने लोगों के घर में काम करना शुरु कर दिया था, वो निशा का बहुत ख्याल रखती थी. निशा की दो चुटिया बनाना, उसे दुपट्टा पहनना सिखाना, निशा के बड़े होने पर उसे दुनियादारी की समझ देना, सब काम मानसी ने ही तो किया था.
इस वजह से वो खुद को भूल गई थी, एक बार निशा में अपनी मां से कह ही दिया 'मम्मी हम रुद्रपुर घर बेचकर क्यों न पहाड़ में अपने गांव चले जाएं.'
मानसी ने कहा तेरे पापा के साथ यहां तुझे गांव वापस ले जाने नही, तुझे नाम कमाते देखने के लिए आए थे.
निशा अब बड़ी हो गई थी और उसने एक आईटीआई में पढ़ना शुरू कर दिया था. निशा पर्स में अपने पापा की फोटो हमेशा रखती थी, वो चाहती थी कि कोई उसका ख्याल रखे जैसे उसके पापा रखते थे.
बिन पापा की बेटी को समाज कमजोर ही समझता है और उसमें वो लोग ही अधिक होते हैं, जो परिवार को जानते हैं.
निशा पर उसके घर के पास रहने वाले राज मेहता (जिसकी एक पीसीओ थी) ने डोरे डालने शुरु कर दिए थे. निशा न चाहते हुए भी उसकी भोली भाली बातों में आ गई और राज ने एक दिन अपने दोस्त के होटल में बुला कर निशा का रेप किया.
मम्मी के डर से निशा ने उन्हें कुछ नही बताया, कुछ दिन बाद निशा को पता चला कि वो पेट से है।
उसने बच्चा गिराने की गोली खा ली और उसे खाने के बाद निशा को घर में ही ब्लीडिंग होने लगी, तब मानसी को उसने सब कुछ बता दिया.
मानसी ने हिम्मत से काम लेते निशा को अस्पताल पहुंचाया और उसका ध्यान रखा. मानसी ने निशा को एक शब्द न कहा, कहती भी कैसे निशा के लिए जमाने से लड़ सकने वाले उसके पापा तो काफी पहले उन दोनों को अकेला छोड़ गए थे.
निशा अपनी जिंदगी में आगे बढ़ी, वो चाहती थी पीसीओ वाले राज मेहता को उसके किए की सजा मिले. निशा ने अंग्रेज़ी की कोचिंग पढ़ाते एलएलबी के लिए दाखिला लिया और राज के खिलाफ थाने में मुकदमा भी लिखाया.
निशा अब किसी भी लड़के से बात नही करना चाहती थी और अकेले रहने लगी थी।
धीरे धीरे साथ पढ़ने वाले अनिल की मासूमियत न जाने क्यों उसे अच्छी लगने लगी थी. फिर उन दोनों की देर रात तक वाट्सएप पर ऑडियो, वीडियो कॉल में बात होने लगी।
फोन पर एक दूसरे को देखे बिना वो सोते भी नही थे.
एक दिन कॉलेज में बैठकर निशा अपने मोबाइल पर कुछ देख रही थी, उसने मोबाइल पर पापा की पुरानी फोटो का वॉलपेपर लगाया था तो उसके पास बैठा अनिल कह बैठा 'निशा क्या तुम अपने पापा को बहुत याद करती हो, मैं उनकी जगह पूरी करने की कोशिश करूंगा. तुम्हारा हमेशा इतना ख्याल रखूंगा की तुम्हें उनकी याद भी न आए'.
निशा फिर से दोराहे पर खड़ी थी और आज उसे लगने लगा था कि वो अनिल के साथ गलत कर रही है। शायद अनिल के घरवाले निशा का अतीत जान उसे ठुकरा दें, निशा की आंखे भर आईं और वो अनिल से बिना कुछ बोले वापस घर आ गई।
घर जाते निशा की आंखों में आंसू थे। उसे अनिल और अपने पापा का चेहरा साथ याद आ रहा था, काश आज उसके पापा जिंदा होते तो उसकी इतनी छोटी सी जिंदगी में इतना सब कुछ न हुआ होता।
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