तना हुआ,
खुद में हज़ारों की कानाफूसी लिए
पूरे शहर को ताड़ता
दिन भर
दौड़ते भागते, जूझते और खुद को झकझोरते
खड़ा हूं, निशब्द
कटते पेड़, बढ़ते घर
छांव की तलाश में
घूमते बूढ़े
उजड़ते घोसलें
तड़पती गौरेया,
एक रेशमी गद्दे के लिए
देखता हूं
इंसान को खुद को मारते
खड़ा हूं निशब्द
रेत ही रेत
एक पिरामिड की तरह
सालों से इंसान को खोजते.
हिमांशु जोशी.
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