Sunday, June 5, 2022

आखिर

देश की 'महारत्न कम्पनी' एनटीपीसी लिमिटेड के कहलगाँव सुपर थर्मल पावर स्टेशन के शिलान्यास के चार दशक और उत्पादन शुरू होने के तीन दशक बाद भी वहाँ की जनता को राख फाँकने के अलावा एनटीपीसी से कुछ नहीं मिल रहा है.

प्रबन्धन ने वहाँ  ‘पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास योजना’ (आर एंड आर) और कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत कार्यों को अनदेखा कर दिया है. जिसके खिलाफ वहाँ की जनता ने एक बार फिर से आन्दोलन का रुख अख्तियार कर लिया है. एसएसवी कॉलेज, कहलगांव के सेवानिवृत प्रोफेसर और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. पवन कुमार सिंह की अगुवाई में 'नागरिक संघर्ष मोर्चा' के बैनर तले कई प्रभावित क्षेत्रों में जागरुकता बैठकों का दौर जारी है क्योंकि जोरदार निर्णायक आन्दोलन के बिना प्रबन्धन की नींद खुलने वाली नहीं है.

बिजलीघर स्थापित किए जाने से पहले राजनेताओं, अधिकारियों और प्रबंधन के प्रतिनिधियों के द्वारा वादे किए गए थे कि बिजलीघर लगने के बाद क्षेत्र की तस्वीर बदल जाएगी. सभी विस्थापितों को अच्छे तरीके से पुनर्वासित किया जाएगा और युवाओं को बड़ी तादाद में रोजगार मिलेगा. उपभोक्ताओं को आश्वासन मिला था कि 24 घंटे निर्बाध बिजली-पानी दी जाएगी.
बच्चों की पढ़ाई के लिए फ्री स्कूल होंगे, क्षेत्रवासियों के लिए फ्री में इलाज की सुविधा होगी. रोजगार के तरह-तरह के अवसर उपलब्ध होंगे. नये उद्योगों की स्थापना की जाएगी. सड़क मार्ग और रेलमार्ग का विकास होगा आदि-आदि. कई तरह के वादे किए गए लेकिन वादों का क्या? अंतत: आफत तो जनता पर ही आई.

बिजली संयंत्र की स्थापना का प्रस्ताव 1980 में लाया गया. मई 1983 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने कहलगाँव ताप विद्युत परियोजना का शिलान्यास किया. इस बीच कई दुर्घटनाएं भी हुई, एक बार तो फरनेस्ट ब्लास्ट हुआ जिसमें तकरीबन 50 लोगों की जानें भी गयीं. अंतत: 1992 में बिजली उत्पादन की शुरुआत हुई, पहले चरण में तत्कालीन सोवियत संघ के सहयोग से 840 मेगावाट के बिजलीघर की स्थापना का जिम्मा एनटीपीसी लिमिटेड को दिया गया. पहले चरण के सफल परिचालन के बाद पुनः दूसरे चरण में 1500 मेगावाट बिजली का उत्पादन 2007 में आरम्भ हुआ. 7907.35 करोड़ की लागत से बने इस बिजलीघर के लिए कुल 3353 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया था.

 बिजली संयंत्र की स्थापना के समय जो प्रमुख वादा था, वह ये था कि जिनकी जमीनें संयंत्र में ली जा रही है, उन भू-मालिकों के परिवार में एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी. लेकिन ये वादा झुनझुना हो गया. 10 फीसदी से भी कम परिवारों को नौकरी मिली।₹, 90 फीसदी धूल फांकते रह गए. अब इन 10 फीसदी परिवारों में भी सभी वहाँ के ग्रामीण नहीं थे. जैसे ही जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई तो यहाँ एक प्रकार का गोरखधंधा शुरू हो गया. बहुत सारे बाहरी लोग इस इलाके में जमीन खरीद कर अपने नाम से म्यूटेशन करवा कर नकली भू-विस्थापित बन गए. बिहार सरकार के इंप्लॉयमेंट एक्सचेंज के अधिकारी, बीडीओ, सीओ और एनटीपीसी के लोग मिलजुल कर यहाँ घोटाला कर गए. जो वास्तव में नौकरी के हकदार थे, उन्हें नौकरी न देकर, बाहरी लोगों (जो आकर भू-विस्थापित बने थे) को नौकरी दे दी गयी. जिन्हें रोजगार मिलना चाहिए था, वे वंचित रह गए, कई गाँव लाभ से वंचित रह गए.
अधिकांश कामगार और कुछ पर्यवेक्षक मिलाकर लगभग ढाई सौ लोगों को ही यहाँ नियोजन मिल पाया. इसके बाद भी जिन डेढ़ सौ असली भू-विस्थापितों को कम्पनी में नौकरी मिली, उनके परिवार को साहस तो मिला लेकिन उनमें से बहुत कम ही अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ नाता रख पाये. भू-विस्थापित तो पूरा परिवार हुआ लेकिन नौकरी किसी एक सदस्य को मिली. अब नौकरी पाने वाले का दायित्व पूरे परिवार के लिए बनता था लेकिन अधिकांश ने अपने अन्य परिवारों को भगवान भरोसे छोड़ कर कॉलोनी में बस गए.

स्थापना काल में ‘पुनर्वास एवं पुनःस्थापन’ योजना के तहत प्रभावित क्षेत्रों में सड़कों और सामुदायिक भवनों का निर्माण किया गया। उत्पादन शुरू होने के बाद कल्याण कार्यों के लिए ‘नैगम सामाजिक दायित्व योजना’ की शुरुआत की गई। एनटीपीसी कर्मियों के बच्चों की शिक्षा के लिए आवासीय परिसर में केन्द्रीय विद्यालय सहित चार पब्लिक स्कूल की स्थापना की गई, जिसका लाभ स्थानीय बच्चों को भी मिला। परियोजना के आसपास कुछ नये बाजार विकसित किए गए और घरेलू जरूरतों की पूर्ति के लिए कुछ छोटे रोजगार भी पैदा हुए।
बिजलीघर बनने से कुल 62 गाँव प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए और परोक्ष रूप से तो पूरा क्षेत्र राख फाँक रहा है। संयंत्र में किसानों की अत्यंत उर्वर भूमि चली गयी, जिससे सैकड़ों किसान प्रभावित हुए। जमीन के मुआवजे की दर भी बहुत कम थी। मुआवजे की राशि व्यावसायिक प्रबन्धन के बिना कुछ ही दिनों में ख़त्म हो गयी और भूविस्थापित परिवारों के समक्ष भुखमरी का संकट उत्पन्न हो गया। कुछ युवक बिजलीघर के ठेका कार्यों के संवेदक बन गये। मेंटेनेस कार्यों में निविदा डालने में युवकों की भीड़ आने लगी इसलिए कम-से-कम दर पर निविदा डालने का काम शुरू हो गया। प्राक्कलित दर से बहुत कम दर पर संविदा कार्य करके इन नये अनुभवहीन संवेदकों ने घर से घाटा उठाया और कंगाल होते चले गये। 
बिजलीघर के साथ फरक्का सुपर थर्मल पावर स्टेशन के लिए कोयला का मुख्य लिंकेज राजमहल कोयला परियोजना के ललमटिया कोयला खदान से दिया गया था। वहीं आम जनमानस का मानना था कि ललमटिया खदान का कोयला गुणवत्ता में अत्यंत निम्न कोटि का है। इससे ताप का उत्सर्जन कम होता है और राख भी अधिक उत्सर्जित होती है। इसके साथ ही ताप की निर्धारित मात्रा हासिल करने के लिए कम्पनी को आयातित कोयले का मिश्रण करना पड़ता था। अधिक मात्रा में राख के उत्सर्जन से ऐश डाइक की भण्डारण क्षमता भी प्रभावित होने वाली थी। वहीं ऐश डाइक का पहला छोटा लैगून ट्रायल के समय ही भर गया था। अन्य लैगूनों का निर्माण कार्य चल रहा था। ऐश डाइक के लिये 1400 एकड़ जलजमाव वाली जमीन का अधिग्रहण किया गया। लेकिन इस भूमि का चुनाव सही नहीं था क्योंकि इस निर्माण से पहाड़ी नदियों के गंगा में उतरने का मार्ग ही अवरुद्ध हो गया, जिस कारण प्रभावित क्षेत्र में भयंकर पारिस्थितिक असंतुलन उत्पन्न होने की स्थिति बन गयी। 1995 और 1999 में प्रलयंकारी बाढ़ इस असंतुलन और विध्वंस के कारण ही आयी थी, जिसमें सैकड़ों लोग प्रभावित हुए थे। दर्जनों लोगों और हजारों मवेशियों की जानें गई थी। करोड़ों की फसल और सम्पत्ति का नुकसान हुआ था।
कालांतर में राख के प्रदूषण से परेशान किसानों ने एक माँग उठाई कि कम्पनी ऐश डाइक के चारों तरफ की 500 मीटर जमीन और अधिगृहीत कर ले। जबकि 100 मीटर जमीन का अधिग्रहण वृक्षारोपण के लिए था, जिससे डाइक से उड़ती राख को गाँवों तक पहुंचने से रोका जा सके। शुरुआती दिनों में कुछ पौधे लगाये गये जिसकी देख-रेख नहीं की गई। बाद में वृक्षारोपण का दुबारा कोई प्रयास नहीं किया गया। लैगूनों में रखी गई राख को हमेशा भींगा रखना चाहिए इस पर भी काम नहीं हुए और लैगून भरने के बाद इसके ऊपर मिट्टी की कोटिंग कर खर-पतवार वाली वनस्पतियों का पौधारोपण करना चाहिए, इसपर भी काम नहीं किया गया। जिससे राख के प्रदूषण की समस्या पैदा हो गई।
राख का निपटान नहीं होने के कारण एनटीपीसी को ऐश डाइक के विस्तार की जरूरत पड़ी तो 3डी लैगून बनाना तय हुआ। अपने भयानक भविष्य को आँककर ग्रामीणों ने इसका निर्माण रोक दिया। एकजुटता और आन्दोलनों के बलपर क्षेत्रवासियों ने 28 साल तक लैगून नहीं बनने दिया। कम्पनी भी यहाँ ग्रामीणों के विरोध के कारण 3डी लैगून को बना पाने में सफल नहीं हो पाई। अंततः जब सभी लैगून राख से भर गये तो प्लांट बंद करने तक की नौबत आ गई। दिल्ली से लेकर कहलगाँव तक हाहाकार मच गया और दमनचक्र चलाकर ग्रामीणों के विरोध को कुचल दिया गया। बल प्रयोग किए गए, मुकद्दमे और गिरफ्तारियों का दौर चला और अंतत: वह जानलेवा लैगून 2019 में बन गया। विडम्बना यह कि 3डी लैगून बनाने के क्रम में 70-80 टन वजनी ट्रकों से रौंदकर सरकार द्वारा बनाई गई कटोरिया व मसदाहा गाँव की सड़क को तहस-नहस कर दिया गया। वहीं नवम्बर 2020 में 3डी ऐश डाइक के टूटने से एनटीपीसी को 7 में से 4 युनिट में बिजली उत्पादन को तत्काल बंद करना पड़ा था। जिससे राख मिश्रित पानी किसानों के खेतों में चला गया और फसलों को बर्बाद दिया। किसानों का कहना है कि 3डी ऐश डाईक के निर्माण में घोर अनियमितता बरती गई है। पूरा तटबन्ध सिर्फ राख से बना दिया गया है। बालू, मिट्टी दिया ही नही गया। 
वर्तमान में क्षेत्रवासियों में कम्पनी के प्रति बहुत गुस्सा और नफरत है। ज्यादातर गाँवों में सीएसआर के तहत रत्ती भर भी पैसा खर्च नहीं किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें एनटीपीसी से राख की बारिश के सिवा कुछ नहीं मिला है। चिमनी की राख की बारिश तो होती ही है। साथ ही मानसून के अलावा पूरे साल ऐश डाइक की राख उड़कर घर-आँगन में भरी रहती है। मानव और मवेशी श्वास संबंधी बीमारियों से अस्वस्थ हो रहे हैं। विषाक्त पानी पीकर मवेशी बीमार पड़ जाते हैं। खेती-किसानी चौपट हो गयी है। साथ ही प्रत्येक घर के बरामदे और खिड़कियों में राख से बचने के लिए पॉलीथिन या त्रिपोलिन का पर्दा लगाना मजबूरी है। प्लांट के संयंत्रों की तेज आवाज से ग्रामीणों की शान्ति भंग होती है। 
ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व में मेंटेनेंस के कार्यों में स्थानीय लोगों को नियोजन मिल जाता था, किन्तु अब बाहरी एजेंसियां अपने साथ मजदूर लेकर आती हैं या अधिकारी अपने लोगों को काम दिलाते हैं। बेरोजगार बैठे युवकों में एनटीपीसी के प्रति आक्रोश है। वे सीएसआर में ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ अपना हिस्सा चाहते हैं।
इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि इस धीमे जहर के कारण आसपास के क्षेत्र में कुछ परिवार मर गए होंगे। और ऐसी संभावना भी नहीं है कि एनटीपीसी टाउनशिप इससे बिल्कुल भी प्रभावित नहीं है। लेकिन यूनिट के सदस्य होने के कारण वे शिकायत दर्ज नहीं करा सकते। वे अच्छी तरह से भुगतान और चिकित्सकीय रूप से सुसज्जित हैं और उपचारात्मक उपाय कर रहे हैं। एनटीपीसी को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए और सिस्टम की जांच करवानी चाहिए और हानिकारक कणों को अधिकतम सीमा तक खत्म करना चाहिए। इसे एनटीपीसी, राज्य और केंद्र सरकार के ऊर्जा विभाग और वैधानिक प्राधिकरण से बेहतर कौन समझ सकता है लेकिन सभी अपने कान और आंखें बंद करके सो रहे हैं।

लेखक पत्रकारिता के छात्र हैं और एक न्यूज चैनल में सहायक निर्माता हैं।
सम्पर्क- +91 8507734722, gulshanchoudhary97@gmail.com

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