Monday, May 19, 2025

शब्द रहेंगे तो साहित्य रहेगा, साहित्य रहेगा तो समाज सचेत रहेगा।


पढ़ने की संस्कृति खत्म हो रही है और इस दौर में एक लेखक के बनने की यात्रा के साथ-साथ वर्तमान समय में लेखकों के सामने खड़ी नई चुनौतियों के बारे में पढ़ना और भी जरूरी हो जाता है।

पढ़ाई और रोज़गार के लिए घर से दूर चले जाने पर बना एक लेखक।

हिंदी साहित्य जगत में परिचित नाम लेखक नवीन जोशी की कहानी भी शेखर जोशी से बहुत हद तक मिलती-जुलती है। दिवंगत शेखर जोशी पलायन कर कई साल पहले उत्तर प्रदेश के पहाड़ों (जो अब उत्तराखंड के पहाड़ हैं) से मैदानी राज्य राजस्थान पहुंचे और लेखक बने थे। वैसे ही नवीन जोशी भी पहाड़ों से लखनऊ पहुंचे थे।
नवीन जोशी में अपने गांव के छूटने का दर्द हमेशा जिंदा रहा और उसी दर्द ने उन्हें लेखक बना दिया।

अखबारों में लिखते हुए साहित्य रचना शुरू करने वाले नवीन जोशी आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान, राजेश्वर प्रसाद सिंह कथा सम्मान, गिर्दा स्मृति सम्मान समेत कई अन्य सम्मानों से सम्मानित हैं।
उत्तराखंड के गणाई-गंगोली क्षेत्र के रैंतोली गांव के मूल निवासी नवीन जोशी से जब उनके अंदर के लेखक की कहानी पूछी जाती है, तो वे अपने बचपन को याद करते हैं। वह कहते हैं उनके गांव से प्राथमिक विद्यालय दूर था, जिस कारण उन्हें विद्यालय नहीं भेजा गया। लखनऊ में काम करने वाले उनके पिता उन्हें छह-सात साल की उम्र में पढ़ाने के लिए अपने साथ ले गए। उनकी मां गांव में ही रहती थीं।
नवीन जोशी बताते हैं कि उस समय ऐसा ही होता था, घर के पुरुष पढ़ाई और रोजगार के लिए घर से दूर चले जाते थे और महिलाएं गांव व घर संभालती थीं।

गांव की याद से लिखना शुरू हुआ।

नवीन जोशी ने कक्षा तीन से लखनऊ में अपनी पढ़ाई शुरू की, जहां उन्हें अपने गांव की बहुत याद आती थी।
पिता दिन में अपनी नौकरी पर चले जाते थे, तो वे घर में अकेले रह जाते थे।
नवीन बताते हैं कि तब मैं रोते हुए अपनी मां और गांव के बिछड़े दोस्तों को चिट्ठी लिखता था।
उन्होंने एक डायरी में पहाड़ की यादों को लिखना शुरू किया और इसी से उनका लेखन का सिलसिला शुरू हुआ।
लखनऊ के जिस इलाके में नवीन रहते थे, वहां पहाड़ी लोग बहुत थे।
उत्तराखंड के गांवों से आए ये लोग अपने बेटों, भाइयों और भतीजों को शिक्षा या नौकरी के लिए गांव से लाकर अपने साथ रखते थे।
लखनऊ के कई लोग वहां अपने घरों के लिए पहाड़ी नौकर, ड्राइवर आदि ढूंढने भी आया करते थे।
नवीन को धीरे-धीरे अखबार पढ़ने का शौक लग गया।
वे कहते हैं कि मैंने आठवीं कक्षा में पहाड़ पर एक लेख लिखकर 'स्वतंत्र भारत' अखबार के लिए भेजा था।
उस लेख में उन्होंने पाठकों को संबोधित करते हुए लिखा था, 'तुम गर्मियों की छुट्टी में पहाड़ जा रहे हो। तुम्हें पहाड़ बुला रहे हैं, लेकिन तुम वहां की सुंदरता के साथ-साथ वहां का दर्द भी देखना। तुम यह देखना कि वहां औरतें कैसे घर का काम करती हैं और खतरनाक पहाड़ियों से घास काटती हैं।
तुम यह भी देखकर आना कि वहां के लड़के शहरों में जाकर होटलों में झाड़ू लगाते हैं और बर्तन मांजते हैं।'

उनका यह लेख 'स्वतंत्र भारत' में छप गया, जिससे उन्हें आगे लिखने का हौसला मिला।

शेखर पाठक का प्रभाव।

धीरे-धीरे नवीन जोशी की सामाजिक समझ बढ़ी और हाईस्कूल में प्रथम श्रेणी आने पर मोहल्ले में उनका बड़ा नाम हुआ।
इसी बीच, भविष्य में बड़ा नाम बनने वाले शेखर पाठक भी अल्मोड़ा से बीए करने के बाद नौकरी की तलाश में लखनऊ पहुंचे थे।
शेखर पाठक पीडब्ल्यूडी में नौकरी करने लगे और संयोग से नवीन जोशी के मोहल्ले में ही रहने आ गए।
नवीन जोशी कहते हैं जब मैं शेखर पाठक से मिला, तो वे 'दिनमान' और अन्य पत्रिकाएं पढ़ते थे और कहानियां लिखते थे।
मैं भी उनके साथ सुबह-शाम बैठने लगा, 'दिनमान' पढ़ने लगा और कहानियां लिखकर उन्हें दिखाने लगा।
शेखर पाठक की संगत से नवीन जोशी को समाज के बारे में नई समझ बनी और उनका दायरा बढ़ा।
कुछ समय बाद शेखर पाठक उच्च शिक्षा के लिए वापस अल्मोड़ा चले गए।
लेकिन तब तक शेखर पाठक के माध्यम से नवीन जोशी आकाशवाणी लखनऊ से जुड़ गए थे।
वहां बंसीधर पाठक 'जिज्ञासु' की संगत में रहने से नवीन की कुमाऊंनी बोली की कविताएं और कहानियां आकाशवाणी से प्रसारित होने लगीं।
आकाशवाणी में उन्हें अपने जैसे कई जोशीले पहाड़ी युवा और वरिष्ठ रचनाकार मिले।
अपनी किताब 'ये चिराग जल रहे हैं' में उन्होंने इन्हीं रचनाकारों और कलाकारों के संस्मरण लिखे हैं।
पत्रकारिता से मिला दुनिया का अनुभव।
अब नवीन जोशी का अखबारों में लिखना भी बढ़ता जा रहा था।
उनकी कहानियां अखबारों द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुकी थीं।
ग्रेजुएशन करते समय नवीन को 'स्वतंत्र भारत' अखबार से नौकरी का प्रस्ताव मिला।
पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका पहाड़ वापस लौटने का इरादा था, पर वे पत्रकारिता में रम गए।
उन्हें लगने लगा था कि पत्रकारिता से समाज में बदलाव लाया जा सकता है।
इस कारण उन्होंने पहाड़ लौटने का अपना इरादा त्याग दिया और पूरी तरह पत्रकारिता में डूब गए।
अखबार में नौकरी करते हुए नवीन ने काफी यात्राएं कीं और देश-दुनिया के अखबार पढ़े।
इन सब से उनका सोचने-समझने का दायरा और भी बढ़ता गया।
उत्तराखंड से संपर्क नहीं टूटा।
वे पहाड़ लौट तो नहीं पाए, लेकिन पहाड़ के लोगों से उनका लगातार संपर्क बना रहा।
शेखर पाठक की वजह से वे राजीव लोचन साह, शमशेर सिंह बिष्ट, गिर्दा आदि से जुड़े।
साल 1977 में 'नैनीताल समाचार' की शुरुआत से ही उनका कॉलम 'एक प्रवासी पहाड़ी की डायरी' प्रकाशित होने लगा।
साल 1984 में उन्होंने देवेन मेवाड़ी के साथ करीब पंद्रह दिन 'अस्कोट आराकोट यात्रा' के एक उप मार्ग में हिस्सा लिया।
इसमें वे गढ़वाल व कुमाऊं के कई गांवों तक पैदल गए और पहाड़ को करीब से देखा।
उन दिनों को याद करते हुए नवीन जोशी कहते हैं आंदोलनों में शामिल होने के लिए मैं लखनऊ से पहाड़ों में पहुंच जाता था।

वे 'नशा नहीं, रोजगार दो' आंदोलन में भी शामिल रहे। पहाड़ के हालात पर उनके मन में साल 1990 में पहली बार 'दावानल' उपन्यास लिखने का विचार आया, पर उस विचार को कलम का साथ मिलने का वक्त अभी नहीं आया था।

पत्रकारिता से बढ़ी रचनात्मकता।

वे राजेंद्र माथुर के संपादन वाले 'नवभारत टाइम्स' अखबार में काम करने लगे।
इस दौरान नवीन जोशी का कहानियों और कविताओं को लिखने का सिलसिला बढ़ता गया।
वे कहते हैं कोई ठंड या भूख से मर गया या कोई मजदूर दिन भर की मजदूरी के बाद अपने घर लौटते समय सब्जी ले जाते ट्रक से दबकर मर गया, तो ये खबरें पीड़ा से भरी और यातनादायक होती थीं।

मुझे लगता था कि ये खबरें यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए।
अखबारों में ऐसी घटनाएं छोटी-सी खबर बनकर खत्म हो जाती थीं, लेकिन वहीं से उनकी कोई कहानी या लेख शुरू होता था।
इस तरह उनकी रचनात्मकता को पत्रकारिता ने बढ़ावा ही दिया।
नवीन जोशी का कहानी संग्रह 'अपने मोर्चे पर' साल 1992 में प्रकाशित हो गया था।
साल 2002 में वे 'हिन्दुस्तान' अखबार में संपादक बनकर पटना पहुंचे।
उस समय बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे।
नवीन जोशी कहते हैं बिहार के हालात बहुत खराब थे। वहां ये पता नहीं चलता था कि सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क। साठ किलोमीटर की दूरी चार घंटे में पूरी होती थी।
एक बार मैंने किसी से कहा था कि जहां गरीब मुसहर लोग रहते हैं, जो चूहे पकड़कर खाते हैं, मुझे उनके गांव ले चलो। मुझे जवाब मिला कि वहां सड़क नहीं है। जब बाढ़ आएगी, तब वहां नाव चलेगी, तभी उस गांव तक पहुंच पाएंगे।

इन अनुभवों से नवीन जोशी के अंदर का लेखक और पैना होने लगा।
नवीन जोशी के अनुसार, पहाड़ और बिहार का दर्द एक-सा है, बस भूगोल का फर्क है।
दोनों प्रदेशों में गरीबी एक जैसी है और दोनों जगह के लोग बड़े शहरों में जाकर छोटी-मोटी नौकरियां करने को मजबूर हैं।
प्रतिभाएं भी इन दोनों जगहों पर भरपूर हैं।
उपन्यासों की शुरुआत।
पटना में रहते हुए ही उन्हें अपना पहला उपन्यास 'दावानल' पूरा करने का विचार आया।
उन्होंने साल 2002 में 'दावानल' लिखना शुरू किया, दिन में वे नौकरी करते थे और रात में उपन्यास लिखते थे।
दो साल बाद उनका लखनऊ तबादला हो गया और फिर उन्होंने इस उपन्यास को संपादित किया।
प्रकाशक को यह अच्छा लगा और इसे छपने में कोई दिक्कत नहीं हुई।
'दावानल' उपन्यास साल 1972-73 से 1984 तक चले चिपको आंदोलन के भटकाव पर आधारित है।
यह बताता है कि कैसे यह आंदोलन पर्यावरणविदों की वजह से सिर्फ पेड़ बचाने तक सिमट गया, जबकि यह मुख्य रूप से जंगलों पर स्थानीय लोगों के अधिकारों के लिए था।
पहाड़ के प्रवासियों की पीड़ा भी इसका प्रमुख हिस्सा है।
उनका दूसरा उपन्यास 'टिकटशुदा रुक्का' है। नवीन कहते हैं बचपन में मैंने अपने गांव में शिल्पकारों के साथ छुआछूत और भेदभाव देखा था। उनका शोषण किया जाता था। साल 1980 में कफल्टा कांड हुआ, तो मैंने इसी विषय पर लिखने की ठान ली थी।

इस उपन्यास का भी साहित्य जगत में स्वागत हुआ।
नवीन जोशी का तीसरा उपन्यास 'देवभूमि डेवलपर्स' है, इसमें 'दावानल' के आगे की कहानी है।
नवीन जोशी कहते हैं जब चिपको आंदोलन ठंडा पड़ने लगा था, तब 'नशा नहीं, रोजगार दो' आंदोलन शुरू हुआ था। इस उपन्यास में तब से आज तक के उत्तराखंड की कहानी है।
'देवभूमि डेवलपर्स' में उत्तराखंड के जन आंदोलनकारी संगठनों में टूट, राजनीतिक दलों की चालबाजियां और संसाधनों की लूट पर लिखा गया है।
इसे पढ़ने से पता चलता है कि उत्तराखंड के गांवों से पलायन क्यों होता है और कैसे ठेकेदारों, दलालों और नेताओं ने उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन पर कब्जा जमा लिया है।

पहाड़ पर केंद्रित लेखन।

नवीन जोशी बताते हैं कि पहाड़ मेरे लेखन के केंद्र में है। मेरे तीनों उपन्यासों का विषय उत्तराखंड पर केंद्रित है।
मेरी कई कहानियां भी पहाड़ पर आधारित हैं। मैं सामाजिक स्थितियों के बारे में लिखता हूं। जैसे, मैंने एक कहानी में लिखा है कि समाज में सांप्रदायिकता कैसे बढ़ रही है।

कुछ कहानियों का विषय पर्यावरण भी है। उनमें लिखा है कि शहरों से गौरैया कैसे गायब हो रही हैं या आकाश से तारे कैसे खो गए। एक कहानी का मुख्य पात्र तारे देखने के लिए पहाड़ की याद करता है।
हाल ही में उनकी किताबें 'बाघैन' और 'भूतगांव', संभावना और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं।
ये दोनों किताबें आज बुरे दौर से गुजर रहे उत्तराखंड की तस्वीर और तकदीर दिखाती हैं।

'अपने मोर्चे पर', 'राजधानी की शिकार कथा', 'मीडिया और मुद्दे', और 'लखनऊ का उत्तराखंड' नवीन जोशी की अन्य रचनाएं हैं।

लेखन से आजीविका बड़ी मुश्किल, फिर भी लिखना तो है ही।

साल 2014 में 'हिंदुस्तान' से रिटायर होकर करीब एक साल 'दैनिक भास्कर' में काम करने के बाद नवीन जोशी सक्रिय पत्रकार नही रहे और स्वतंत्र पत्रकारिता के साथ रचनात्मक लेखन में लग गए।
लेखन से आजीविका पर नवीन जोशी कहते हैं हिंदी में स्वतंत्र लेखक अपनी आजीविका नहीं चला सकते। पारिश्रमिक की स्थितियां बेहद खराब हैं। मैं भी अगर पत्रकारिता नहीं करता, तो परिवार नहीं पाल सकता था। मेरी पत्नी भी नौकरी करती थी, इसलिए घर चलाने में कभी दिक्कत नहीं हुई।
इसका कारण पूछने पर वे कहते हैं, हिंदी किताबें अधिक नहीं बिकतीं। पांच सौ से एक हजार प्रतियों के संस्करण बिकने पर हिंदी लेखक खुश हो जाते हैं। प्रकाशक लेखकों से सच छुपाते हैं और उन्हें किताबों की बिक्री व आवृत्तियों के बारे में सही विवरण नहीं देते। लेखकों को समय पर रॉयल्टी भी नहीं मिलती। इसके लिए लेखकों को प्रकाशकों को बार-बार चिट्ठी लिखनी पड़ती है।
पिछले दिनों साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल ने इस बारे में अपनी दुखद कहानी बताई, तो कुछ चर्चा हुई थी।

नवीन जोशी आगे कहते हैं, कुछ नए प्रकाशक पारदर्शिता बरत रहे हैं। अंग्रेजी किताबों में ऐसी स्थिति नहीं है। वहां लेखकों को प्रकाशन के अनुबंध के पैसे मिलते हैं, रॉयल्टी से अलग।
लेखन में पैसा न होने पर भी लिखते रहना चाहिए या नहीं, इस पर नवीन जोशी कहते हैं कि लिखना जरूरी है। यदि हम सामाजिक और राजनीतिक रूप से सचेत हैं, तो हमें लिखना चाहिए।

प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। आजीविका नहीं चलती, तो भी लिखना बंद नहीं किया जा सकता। लोगों को पढ़ना चाहिए। समाज की सामूहिक राय साहित्य और पत्रकारिता से बनती है।
पत्रकारिता की प्रतिक्रिया तत्काल होती है, लेकिन साहित्य का असर दीर्घकालिक होता है। साहित्य समाज का आईना होता है और धैर्य मांगता है। कहानी लिखकर समाज रातोंरात नहीं बदलता, लेकिन छपे हुए का असर दशकों और शताब्दियों तक रहता है। जैसे भारतेंदु को पढ़कर हम तत्कालीन भारतीय समाज को समझ सकते हैं, वैसे ही ओ हेनरी को पढ़कर हम अमेरिकी समाज को समझ सकते हैं।
माध्यम बदलेंगे, पर शब्द तो वही रहेंगे।
ई-बुक के बढ़ते चलन पर नवीन जोशी कहते हैं, पहले टेलीफोन डायरी होती थी, अब उसे कोई नहीं रखता। फोन में ही सबके नंबर मिल जाते हैं। वैसे ही माध्यम बदलते रहेंगे, पर शब्द वही रहेंगे।

शब्द रहेंगे तो साहित्य रहेगा और साहित्य रहेगा तो समाज सचेत रहेगा।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may


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