भारत से क्षेत्रफल और आबादी में काफी कम अन्य देश भारत से कहीं ज्यादा पदक जीत मेडल तालिका में भारत से ऊपर रहते हैं। शर्म के मारे हम एक-दो दिन तो भारत की खेल व्यवस्था पर जमकर चर्चा करते हैं लेकिन फिर सब भूल जाते हैं।
इतने विशाल देश में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नही है पर मौका न मिलने की वजह से हम मैरी कॉम और साक्षी मलिक जैसे एक दो नाम ही सुन पाते हैं जो गरीबी में रहकर भी हीरे से चमकते हैं।
मैंने हमेशा से चाहा है कि इस विषय पर ज्यादा बात हो, पिछड़े इलाके में रहने वाली खेल प्रतिभाओं को मौका देने के लिए सरकार ऐसे ज़मीनी कदम उठाए कि हमारा देश खेलों में खूब नाम कमाए।
पिछले दिनों समाचार वेब पोर्टल सबलोग में पत्रकार रूबी सरकार की एक खबर आई थी कि मध्य प्रदेश के हरदा जिले में आजकल आदिवासी लड़कियों का क्रिकेट टूर्नामेंट चल रहा है, जो काफी चर्चा पा रहा है। कुछ ऐसी ही कहानी बॉलीवुड की नई आमद 'झुंड' की भी है।
अभावों के बीच कहीं खो रही खेल प्रतिभाओं पर बात करने के लिए निर्देशक नागराज मंजुले बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ 'झुंड' फ़िल्म दर्शकों के सामने लाए हैं।
निर्देशक नागराज मंजुले की जातिवाद विषय पर आधारित फिल्म 'सैराट' साल 2016 के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में विशेष उल्लेख पुरस्कार जीत चुकी है।
'झुंड' विषय आधारित फिल्म है, निर्देशक फ़िल्म में बाबा अंबेडकर के 'सभी को समानता का अधिकार' विषय को मुख्य रूप से दिखाना चाहते थे।
मौका न मिलने पर खत्म होती खेल प्रतिभाओं के साथ, प्रौढ़ शिक्षा, अकेली मां की समस्याओं के विषय को भी फ़िल्म में दिखाया गया है।
दुरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के सामने अपनी पहचान साबित करने की कितनी परेशानी है इस पर फ़िल्म में काफी समय दिया गया है।
अमिताभ की दमदार आवाज़ के साथ फ़िल्म की शुरुआत होती है , अपने गम्भीर हावभावों से ही दर्शकों के बीच जगह बना लेना ही अमिताभ के अभिनय का
प्लस प्वाइंट है।
प्रोफेसर के पद से रिटायर होते होते झुग्गियों में रहने वाले युवाओं को फुटबॉल सिखाते अमिताभ ने एक कोच के किरदार को पूरी तरह से डूब कर निभाया है।
पहले हाफ में फ़िल्म की स्क्रिप्ट में कमी लगी है, यह विषय के अनुसार गम्भीर प्रभाव डालने में कामयाब नही हुई है। कहीं कहीं पर यह लगा है कि फ़िल्म के बैकग्राउंड स्कोर की टाइमिंग ठीक नही रही।
कहानी के शुरुआती एक घण्टे तक अमिताभ को छोड़ कोई भी कलाकार प्रभाव नही छोड़ता पर उसके बाद अमिताभ ने अपने साथ फ़िल्म की पूरी टीम से भी अच्छा अभिनय करवाया है, जिनमें अंकुश गेदाम विशेष रूप से प्रभावित करते हैं।
दूसरे हाफ में फ़िल्म की स्क्रिप्ट भी कसी हुई है और कहानी भी तेज चलती है।
फ़िल्म में कोई भी गाना ऐसा नही लगा जो लोगों की ज़ुबान पर लंबे समय तक रहेगा।
टिन डब्बा बजा निर्देशक ने दर्शकों को उसी संगीत की याद दिलाई है जो भारत के झुग्गियों में बजता है।
छायांकन की बात की जाए तो तेज़ी से मूव करता कैमरा अच्छा लगता है।
फुटबॉल मैच को बेहतरीन तरीके से दिखा पाना बड़ा मुश्किल काम है पर फ़िल्म में यह काम बड़ी खूबी के साथ किया गया है।
निर्देशक ने फुटबॉल का दूसरा हाफ अच्छा बनाया है और फुटबॉल मैच के बाद अमिताभ बच्चन के घर वाला दृश्य फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण दृश्य है। इस दृश्य को देख आपको रंगीन बाल रंगे सड़क पर कूड़ा उठाने वाले, वाहनों का शीशा साफ करने वाले चेहरे याद आ जाएंगे और शायद आप उनसे मुंह न फेर उनकी कहानी सुनने लगेंगे।
टपोरी भाषा के प्रयोग की वजह से फ़िल्म आपको अपने बीच की ही लगेगी और झुग्गी में रहने वाले लोगों की तरह ही फ़िल्म के कलाकारों का किया गया मेकअप भी कमाल का है।
कुछ संवाद दिल से सुने जाएं तो बड़ा गहरा असर छोड़ते हैं।
जैसे 'अबे ए नशापन्ती हम अपने पैसे की कर रहे हैं' संवाद नशा करने वालों के बीच आम है।
'बाप तेरा खाने तो नही जाते हम कमाने को' गरीब बच्चों की मजबूरी दिखाता है।
निर्देशक फ़िल्म में उठाए गए इतने विषयों में से किसी एक विषय पर केंद्रित रख कर फ़िल्म बनाते तो और बेहतर रहता। फिर भी हमें इस बात का जश्न मनाना होगा कि बॉलीवुड में विषय आधारित फिल्में बन रही हैं और उनमें अमिताभ जैसे बड़े अभिनेता शामिल हो रहे हैं।
फ़िल्म में उठाए गए कई विषयों पर विचार करने के साथ ही फ़िल्म के अंत में अमिताभ का कोर्टरूम वाला दृश्य, वह वज़ह हैं जिनकी वजह से 'झुंड' एक बार देखी जा सकती है।
निर्देशक- नागराज मंजुले
छायांकन- सुधाकर रेड्डी यक्कांति
अभिनय- अमिताभ बच्चन, अंकुश गेदाम
मेकअप- समीर कदम
समीक्षक- हिमांशु जोशी

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