उत्तराखंड में फिर से सत्ता पाने को लेकर भाजपा और कांग्रेस ने जो भी रणनीति अपनाई, अब चुनाव के बाद यह साबित हो गया है कि उनमें से भाजपा ने बेहतरीन चुनावी रणनीति अपनाई और वह उत्तराखंड की जनता के मूड को भांपने में कामयाब हुई।
भुकानून, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य व्यवस्था और पर्यावरण से जुड़े जिन मुद्दों को उत्तराखंड के चुनावी दंगल में महत्वपूर्ण माना जा रहा था। उन्हें बिना साधे भाजपा कैसे जनता का विश्वास पाने में कामयाब रही, यह बहुत से चुनावी विश्लेषकों को हैरान कर गया।
केंद्र सरकार के मोदी मैजिक ने उत्तराखंड के चुनावी परिणाम में सबसे ज्यादा असर डाला, उत्तराखंड की टोपी पहनने भर से ही प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तराखंड में वोट पड़ने से पहले ही आधा किला फ़तह कर लिया था।
भाजपा ने ऑल वेदर रोड को अपनी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर पेश किया और जनता भी पर्यावरण के नुकसान की बड़ी कीमत पर हुए इस विकास से खुश रही।
चारधाम परियोजना के लिए हाई पॉवर कमेटी के अध्यक्ष रवि चोपड़ा की रिपोर्ट में इस रोड की चौड़ाई से होने वाले नुकसान के बारे में बताया गया था पर कांग्रेस इस मुद्दे को पकड़ने और जनता को इसका महत्व समझाने में नाकामयाब रही।
यहां पर उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा का बयान महत्वपूर्ण हो जाता है कि 'कांग्रेस अब सड़क पर आने वाली पार्टी नही रही।'
उत्तराखंड की राजनीति पर क़रीबी से नज़र रहने वाले प्रोफेसर एस पी सती के अनुसार कांग्रेस आधा चुनाव सीटों के बंटवारे के वक्त ही हार गई थी।
पिछले पांच सालों से कांग्रेस संगठन का एक दूसरे से जुड़ाव नही रहा, वरिष्ठ नेता हरीश रावत जहां अपनी ही पार्टी के राजनीतिक प्रतिद्वंदियों में उलझे रहे तो कांग्रेस आला कमान की तरफ से भेजे गए चुनाव प्रभारी दिल्ली के रहने वाले देवेंद्र यादव की एंट्री ने कांग्रेस की नैया पार लगने से पहले ही डुबा दी। उन पर प्रचार अभियान और टिकट बंटवारे में दखलंदाजी का आरोप लगता रहा।
चुनाव नतीज़ों के बाद उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोक गायिका सोनिया आनन्द रावत ने भी देवेंद्र यादव पर उत्तराखंड में कांग्रेस का बेड़ा ग़र्क करने का आरोप लगाया है।
कांग्रेस प्रदेश में अपना नारा 'चार धाम चार काम' जनता को ठीक से समझाने में नाकामयाब रही। पांच सीटों में टिकट बंटवारे में परिवारवाद की झलक भी देखने को मिली। ज़मीन पर काम करने वाले बहुत से नेताओ को टिकट नही दिया गया जैसे कोरोना काल में लोगों की मदद करने वाले देहरादून के अभिनव थापर को दरकिनार कर दिया गया। यमुनोत्री के संजय डोभाल ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज कर कांग्रेस को उनकी ऐसी ही गलती का अहसास कराया।
देहरादून में अपनी चुनावी रैली के दौरान भाजपा के मुख्य चुनावी रणनीतिकार अमित शाह ने कांग्रेस को मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जुम्मे की छुट्टी की वज़ह से घेरा था। उन्होंने कांग्रेस के टिकट बंटवारे पर भी तीर चलाते हुए कहा था कि कांग्रेस ने राज्य आंदोलन के समय आरोपी रहे व्यक्ति को भी टिकट दिया।
प्रियंका गांधी की बात करें तो उनका खटीमा में दिया गया भाषण देखने में उसमें होमवर्क की कमी साफ झलक रही थी, उच्चारण गलत तो थे ही साथ-साथ वो उत्तराखंड की जनता के मूड को भांपने में भी नाकामयाब रही। उनका भाषण किसानों और रोज़गार पर केंद्रित था पर उत्तराखंड की जनता के मन में तो कुछ अलग ही चल रहा था।
हरिद्वार में हुई धर्म संसद और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा उठाया गया जनसांख्यिकीय बदलाव वाला मुद्दा अपना काम कर चुका था।
राहुल गांधी के भाषणों का भी जनता पर कुछ खास असर नही हुआ, उनके भाषण ज्यादातर कृषि कानून तक ही सिमटे रहे जिसका असर सिर्फ़ उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों तक ही देखा गया था।
कई बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि उत्तराखंड में यूपी की तरह हिंदू-मुस्लिम वाला कार्ड नही चलता तो इसका जवाब उन्हें कांग्रेसी वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद के नैनीताल जिले स्थित घर पर उनकी किताब को लेकर किए गए हमले के बाद मिल गया होगा।
भाजपा की आईटी सेल भी चुनाव में जबरदस्त तरीके से काम कर रही थी, भाजपा ने कोरोना काल से ही चुनावों के लिए कमर कस ली थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उधम सिंह नगर में अपनी चुनावी रैली के दौरान कहा था कि 'कोरोना महामारी के दौरान देश के नागरिक को भूखा नही सोने दिया'।
गरीबों को राशन पहले भी बांटे जाते थे पर उसमें प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ मुख्यमंत्री की तस्वीर कभी नही देखी गई थी।
उत्तराखंड के नानकमत्ता, बाजपुर और खटीमा में सिख समुदाय की आबादी अपने खेतों पर आ धमके गोवंश से परेशान हैं क्योंकि यूपी में योगी सरकार द्वारा गोकशी पर प्रतिबंध तो लगाया गया लेकिन गोवंश के रहने का उचित इंतज़ाम नही किया गया। चुनाव से पहले खटीमा के गुरमीत सिंह इसी वज़ह से भाजपा से नाराज़ दिखे थे, इन सीटों पर कांग्रेस ने कब्ज़ा तो जमाया पर वह काफ़ी नही था। पहाड़ी जिलों में कांग्रेस बंदर और सुअरों से खेती को हो रहे नुकसान के मुद्दे को उठाना भूल गई।
हिमांशु जोशी।
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