Monday, March 14, 2022

पश्तून ऐ ख्वाब है..

पश्तून ऐ ख्वाब है..

पश्तून ऐ ख्वाब है, गर्द में कहीं खो जाता है.
आंखों में इक रोशनी का असर है, ज़रा-ज़रा मज़लूम सा नज़र आता है।

भीड़ में अब तो हर कोई महरूम सा नज़र आता है,
जिंदा गोश्त को टटोलते इब्लीस बैचैन हो जाता है।

अब्तर हो चुके इस ढेर में अख्ज़ भी कम न थे,
ख़त्म होती इस आदमियत में खुद को अकबर साबित करने वाले भी कम न थे।

ख़ैर होगा सवेरा, फ़िर तोपों को अंधड़ बुलबुल के शोर से कहीं दूर छूट जाएगा।

हिमांशु..


पश्तून- मुख्य रूप में अफगानिस्तान में हिन्दु कुश पर्वतों और पाकिस्तान में सिन्धु नदी के मध्य क्षेत्र में रहते हैं 
ज़रा-ज़रा- थोड़ा सा
मज़लूम- अत्याचार से पीड़ित
महरूम-अभागा
इब्लीस- शैतान
अब्तर- अस्त व्यस्त
अख्ज़- लालची
अकबर- महान

No comments:

Post a Comment

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...