Friday, November 28, 2025

आठ- नई शुरुआत की ओर: फौज से शिक्षा तक का सफर

नई शुरुआत की ओर: फौज से शिक्षा तक का सफर

जब मुंगली जी ने सेना की नौकरी से आगे बढ़ने का फैसला लिया, तब उनकी पत्नी देवयानी मुंगली पूरी तरह से उनके साथ थीं। मुंगली जी के इस निर्णय में देवयानी का सहयोग और अनुभव ही बाद में स्कूल की शुरुआत की मजबूत नींव बना।

देवयानी मुंगली: ज्ञान, संस्कार और जीवन का सामंजस्य

देवयानी मुंगली का मजबूत व्यक्तित्व उन्हें विरासत में मिला है। जब वह अपने बचपन को याद करती हैं तो सबसे पहले उन्हें अपने पिता स्वामी राम की एक आदत याद आती है, वह एक साथ तीन अखबारों पढ़ा करते थे।

स्वामी राम : हिमालय जैसा शांत, गहरा और स्थिर व्यक्तित्व

देवयानी मुंगली के पिता स्वामी राम के जीवन में साधना, सेवा और सादगी स्वाभाविक रूप से एक ही धारा में बहती थी। गढ़वाल की पहाड़ियों में पले-बढ़े स्वामी राम ने प्रारंभिक वर्षों से ही ध्यान, अनुशासन और प्रकृति से साक्षात्कार को जीवन का आधार बनाया। आगे चलकर यही अनुभव उनके कार्य, स्वभाव और सोच का मूल आधार बना।

स्वामी राम के नाम पर स्थापित हिमालयन इंस्टिट्यूट और बाद में विकसित हुआ Swami Rama Himalayan University उनके दूरदर्शी कार्य की जीवंत पहचान है। उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा और योग-विज्ञान को एक साथ जोड़ा। उनका किया हुआ कार्य आज भी उत्तराखंड और भारत के अनेक हिस्सों में लोगों के जीवन को लाभांवित कर रहा है। स्वामी राम द्वारा बनाया गया संस्थान, उनके उस विचार का विस्तार है जो स्वामी राम ने जीवनभर जिया था।

परिवार के साथ स्वामी राम का रूप और भी सहज और आत्मीय था। वे कम बोलते थे, पर उनका हर शब्द गहरा अर्थ लिए होता था। देवयानी कहती हैं कि पिता ने उन्हें किसी उपदेश से नहीं, बल्कि अपने जीवन के व्यवहार से सिखाया। उनका स्वभाव शांत, निर्णय संतुलित और मन हमेशा स्थिर रहता था। वे घर में एक ऐसी उपस्थिति थे जिनके आसपास आत्मविश्वास, अनुशासन और सुरक्षा अपने आप बन जाती थी। स्वामी राम के यही संस्कार देवयानी के विचारों और कार्यशैली में दिखाई देते हैं।

देवयानी मुंगली कहती हैं कि उनके पिता स्वामी राम कहते थे कि भाषा का विस्तार ही मन का विस्तार है। उर्दू उनकी पहली प्रेम भाषा थी, हिंदी उनकी जड़ों की पहचान थी और अंग्रेजी उनके विचारों को उड़ान देने वाला पुल बना।
गुरुमुखी के ज्ञान ने स्वामी राम के लिए पंजाबी साहित्य के द्वार खोले और फिर बंगाली साहित्य ने उनकी बुद्धिमत्ता को विस्तार दिया।

घर में भाषा और संस्कृति की विविधता ने ही देवयानी मुंगली के भीतर ज्ञान, साहित्य और दुनिया की समझ को विकसित किया। 
उनकी माँ लीलू पांडे घर में हर दिन रामायण का पाठ करतीं थी, उनकी शिक्षा केवल धार्मिक उपदेशों तक सीमित नहीं थी। लीलू जी अपनी बेटियों को समझाती थीं कि शिक्षा का असली अर्थ केवल परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना नहीं, बल्कि शिक्षा वह प्रकाश है जो मनुष्य के आंतरिक संसार को आलोकित करता है।

मुंगली जी कहते हैं जब उन्होंने देवयानी मुंगली को पहली बार नैनीताल की हरी-भरी वादियों में देखा तो उसी क्षण उनके मन में एक दैवीय भाव जगा कि यह संबंध पूर्व जन्म के पुण्य का ही प्रतिफल हो सकता है। उन दोनों का विवाह 13 दिसंबर 1980 को हुआ था, सेना की निरंतर बदलती नियुक्तियों और व्यस्तताओं के कारण मिलने का समय बहुत सीमित होता था पर उनके बीच बीते पल इतने गहरे और अर्थपूर्ण थे कि वे जीवन की दिशा तय करने वाले साबित हुए।

देवयानी मुंगली बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी पर उनकी अटूट लगन और अथक मेहनत ने हर बाधा को आसान बना दिया। परिवार में पढ़ाई-लिखाई का ऐसा माहौल था कि उनकी मौसी की बेटी मृणाल पांडे आगे चलकर एक जानी-मानी पत्रकार बनीं और मौसी के बेटों में से पुष्पेश पंत जेएनयू में प्रोफेसर हुए।

परिवार में बच्चों को उत्कृष्ट शिक्षा देने पर विशेष बल दिया जाता था और देवयानी ने दसवीं कक्षा से लेकर आगे तक हर स्तर पर अपनी मेधा का लोहा मनवाया।
देवयानी ने एम.ए. इंग्लिश में टॉप किया और गोल्ड मेडल प्राप्त किया। विश्वविद्यालय ने उन्हें कई बार 'बेस्ट स्टूडेंट अवार्ड' से सम्मानित किया। उनके शिक्षक लीलाधर पांडे, कुमाऊं यूनिवर्सिटी में English Dept. के अन्य वरिष्ठ शिक्षक उनकी प्रतिभा के कायल थे। 

बाद में, उन्होंने स्कूल शिक्षा के व्यापक परिदृश्य, बच्चों के मनोविज्ञान की जटिलताओं और मोबाइल-डिजिटल मीडिया के तेजी से बढ़ते प्रभाव पर भी गंभीर चिंतन किया। उन्होंने कम्बोडिया के 'फ्लोटिंग स्कूल' जैसे विदेशी शिक्षा मॉडलों का गहन अध्ययन कर, भारत में भी ऐसे कई अभिनव शिक्षण-प्रयोग सुझाए। दिल्ली के कुछ स्कूलों में अपनी सेवाएं देते हुए उन्होंने यह अनुभव किया कि एक स्कूल का संचालन केवल इमारतों और स्टाफ के प्रबंधन तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक निरंतर चलने वाला, गहन सामाजिक-शैक्षिक दायित्व है। 
प्रशासनिक चुनौतियों के बीच भी, वे बच्चों के साथ समय बिताने, उन्हें समझने और उनकी सीखने की प्रक्रिया को स्वाभाविक व आनंददायक बनाने पर निरंतर जोर देती रहीं।

देवयानी के जीवन का एक अत्यंत मार्मिक और आध्यात्मिक प्रसंग तिब्बत के निर्वासित आध्यात्मिक गुरु, दलाई लामा से उनकी मुलाकात का है। यह मुलाकात देवयानी के लिए एक सामान्य घटना कभी नहीं रही, यह उनके जीवन की एक बहुत बड़ी घटना साबित हुई। बगीचे में कतार में खड़े लोगों के बीच, मात्र पाँच मिनट के निर्धारित स्लॉट के लिए वे दलाई लामा के सामने पहुंचीं। जब दलाई लामा ने देवयानी को देखा तो उन्होंने अपना चश्मा नीचे किया, सिर हिलाया, जैसे वे उन्हें पहले से ही जानते हों। वह पाँच मिनट की मुलाकात लगभग तीस मिनट तक चली। दलाई लामा ने देवयानी की बातों को अत्यंत धैर्य और ध्यान से सुना। जब देवयानी ने अपने स्कूल के बारे में बताया, तो उन्होंने तुरंत अनुवादक को बुलाया, विद्यालय के लिए एक विशेष संदेश लिखा और देवयानी के साथ फोटो भी खिंचवाई। वह संदेश आज भी तिब्बती और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में विद्यालय के पास सुरक्षित है।

दलाई लामा ने देवयानी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि उन्हें पता है कि देवयानी बहुत काम करेंगी और अपना नाम भी कमाएंगी।

हाल ही में देवयानी मुंगली को उत्तराखंड राज्य साहित्य सम्मान प्राप्त हुआ है। यह पुरस्कार उन्हें उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा प्रदान किया गया। यह सम्मान भारतीय साहित्य में उनके उल्लेखनीय योगदान की आधिकारिक स्वीकृति माना जा रहा है।

संस्कृति स्कूल की संस्थापक और निदेशक के रूप में देवयानी मुंगली लंबे समय से साहित्यिक उत्कृष्टता और पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रही हैं। उनकी पहल, लेखन और निरंतर कार्य ने नई पीढ़ी में पढ़ने, सोचने और लिखने की आदत को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

यह उपलब्धि न केवल उनकी व्यक्तिगत साहित्यिक यात्रा की पहचान है, बल्कि उन मूल्यों की भी पुष्टि करती है जिन्हें वे शिक्षा और साहित्य के माध्यम से आगे बढ़ाती रही हैं। उनके काम से प्रेरित होकर संस्कृति स्कूल के विद्यार्थी आज भी नए विचार, दृष्टिकोण और रचनात्मकता के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

संस्कृति विद्यालय और देवयानी 

'संस्कृति विद्यालय' में देवयानी की भूमिका अत्यंत केंद्रीय और प्रेरक है। संस्कृति स्कूल के चार कैंपस में से एक स्कूल की प्रिंसिपल बताती हैं कि विद्यालय में जो अद्भुत विविधता दिखाई देती है, वह देवयानी मैडम की दूरदर्शी सोच का सीधा परिणाम है। विद्यालय में अलग-अलग राज्यों से आए शिक्षक पढ़ाने के साथ अपनी भाषा, संस्कृति और व्यवहार के माध्यम से बच्चों में भी मूल्यों का संचार करते हैं। अलग अलग त्यौहार मनाने की अनूठी पद्धति की सांस्कृतिक विविधता बच्चों के विचारों को खोलती है और उन्हें व्यापक बनाती है।

प्रिंसिपल यह भी कहती हैं कि देवयानी मैम स्वयं गणित पढ़ाती हैं और मुंगली जी स्कूल के सामने आने वाली किसी भी समस्या का निस्तारण करते हैं।
इस तरह जब स्कूल के माता और पिता मिलकर शिक्षण में सक्रिय सहयोग करते हैं, तब विद्यालय का पूरा वातावरण और अधिक मजबूत हो जाता है। उनकी उपस्थिति बच्चों के लिए सशक्त संकेत है कि शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सिमटने वाली एक सीमित परीक्षा नहीं है बल्कि जीवन के संस्कारों का एक निरंतर प्रवाह है।

मुंगली जी ने स्कूल से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं को अपनी डायरी में भी दर्ज किया है। उन्होंने बताया कि स्कूल में अमीश जैसे लोकप्रिय लेखक कई बार आए।  इस तरह देवयानी की दृष्टि केवल अकादमिक शिक्षा तक सीमित नहीं है, वह बच्चों को साहित्य से जोड़ने का एक जीवंत वातावरण बनाती हैं। देवयानी मानती हैं कि भाषा मन की खिड़कियाँ खोलती है और साहित्य मन के भीतर अज्ञानता के अंधकार को दूर कर उजाला भरता है।

प्रणीत: किताबों से बनी दुनिया और पिता की छाया

मुंगली जी को समझने के लिए उनके बच्चों के विचार जानने भी जरूरी हैं। उनके पुत्र प्रणीत मुंगली अपने बचपन के वातावरण को सहज सीखने का एक खुला मैदान बताते हैं। उन्होंने बताया कि घर में किसी प्रकार की कठोरता या बंधन नहीं था।
माता-पिता जो करते हैं, उसे देखकर ही बच्चे सीखते हैं।  हमारे घर में शिक्षा एक स्वाभाविक धारा की तरह बहती थी और इसी सहजता ने उनके स्वभाव को भी शांत और संतुलित बनाया। प्रणीत ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई की है।

प्रणीत बताते हैं कि स्कूल के दिनों में उनकी दुनिया किताबों से शुरू होकर किताबों पर ही खत्म होती थी। घर में उनकी माँ देवयानी मुंगली हमेशा कहतीं थी कि वही अर्जित धन है जो किताबों पर खर्च हो।

यही कारण था कि घर की अलमारियाँ हमेशा किताबों से भरी रहती थीं। वे याद करते हैं कि कई बार माँ अपनी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा बच्चों की किताबों पर खर्च कर देती थीं। प्रणीत कहते हैं, "माँ की तनख्वाह मिलते ही हमको पता होता था कि आधा पैसा तो किताबों पर जाने वाला है।" बचपन में उनका घर किसी साधारण घर जैसा नहीं था, वह एक छोटे पुस्तकालय जैसा लगता था, जिसके हर कमरे में किताबें, कॉपियाँ, नोट्स और बच्चों के लिए नया पढ़ने का सामान होता था।

माँ अक्सर स्कूल के बाद भी पढ़ने-बताने में लगी रहतीं। कई बार जब प्रणीत स्कूल की किसी बात पर अटक जाते, तो वही उन्हें रास्ता दिखातीं। वह कहते हैं माँ हमें पढ़ा भी लेती थीं और जीवन जीना भी सिखा देती थीं।

प्रणीत कहते हैं कि उनकी मां, देवयानी मुंगली हमेशा कहती थीं कि शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी में नहीं मिलती, बच्चों की जिज्ञासा ही सबसे बड़ा शिक्षक होती है। माँ जानते हुए भी हम पर किसी विषय को पढ़ने की मजबूरी नहीं थोपती थीं। वे केवल इतना कहतीं "अगर पढ़ना है, तो मन से पढ़ो। जो मन न लगे, उसकी वजह ज़रूर समझो।" प्रणीत यह भी बताते हैं कि जब वे छोटे थे, तब उनके पास कोई रोचक कहानी या कोई कठिन इंग्लिश रीडर आती तो उसे पूरा पढ़ने की जिद कर लेते थे। माँ केवल एक बात कहतीं ‘Seek the concept of your years’ यानी उम्र के हिसाब से सीखने की समझ विकसित करो।
यही सीख उनकी ज़िंदगी में सबसे बड़ी पूँजी बनी। "आज मैं जहाँ भी हूँ, जो भी कर पाया हूँ, वो सब माँ की दी हुई किताबों और उनकी कही छोटी-छोटी बातों की वजह से है।"

अपने पिता के बारे में बात करते प्रणीत स्वीकारते हैं कि उनके जीवन में एक लंबा समय ऐसा आया जब उनके जीवन की दिशा बिल्कुल साफ नहीं थी। पांच से सात वर्षों तक उन्हें लगा कि वे रास्ता खोज रहे हैं पर रास्ता सामने नहीं आता। इस समय में उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनके पिता का वह सहयोग था जो बिना किसी शर्त मिलता था। बीस से अट्ठाईस वर्ष की उम्र के बीच उन्होंने अनेक कार्य किए, जैसे छोटे व्यापार हों या बड़े दायित्व, उन्होंने हर तरह के अनुभव लिए और दुनिया को बहुत करीब से देखा। प्रणीत का मानना है कि कठिन समय में मन का संतुलन बनाए रखना ही सबसे बड़ी सफलता है।

हमेशा दिल्ली लौटने पर पिता ने उनसे कहा कि किसी के आगे झुकने की आवश्यकता नहीं। यदि कार्य ईमानदारी से हो तो राह स्वयं बनती है। प्रणीत बताते हैं कि एक समय वे शराब से जुड़े व्यवसाय में थे और तभी पिता ने स्पष्ट कहा कि यह रास्ता नहीं है। उन्होंने उसी समय वह काम छोड़ दिया। प्रणीत कहते हैं कि परिवार उनके लिए केवल भावनात्मक सहारा नहीं रहा, वह एक शिक्षा की तरह रहा। घर और विद्यालय दोनों का संयुक्त वातावरण बच्चों को आकार देता है और यही वातावरण उनके अपने बच्चों के जीवन में भी कायम है। प्रणीत की यह यात्रा दिखाती है कि जीवन में दिशा कभी देर से भी मिलती है, पर यदि साथ में धैर्य और परिवार की स्थिर छाया हो तो मनुष्य अपनी राह को स्वयं खोज लेता है। उनके भीतर पिता का गहरा प्रभाव है जो उनके निर्णयों में स्पष्टता और व्यवहार में सादगी देता है।

बचपन का एक रोचक किस्सा बताते हुए वह कहते हैं कि उन्होंने कक्षा आठ में बिली अर्जन सिंह के बारे में किताब पढ़ी तो पापा से कहा उनसे मिलने जाना है। दुधवा पहुंचे तो वहां रहने का कोई ठिकाना नही था। हाथी में घूमते हुए महावत ने हमें वहां पहुंचने का रास्ता नक्शा बताया। पापा ने कागज पर नक्शा बनाया और हम स्कूटर लेकर बिली अर्जन के पास चल पड़े, रास्ते में हमें हाथी दिखे लेकिन हम डरे नही। जब हम वहां पहुंचे तो बिली अर्जन सिंह हमसे ज्यादा अचंभित था। तो पापा कहते हैं जो चाहो कर सकते हो, उन्होंने हमसे कभी 'मत करो' नही कहा। आज मैं भी एक पिता हूं और अपने पापा के जैसा पिता ही बनना चाहता हूं।

अनुज: पिता की सीख और निर्भयता की विरासत

मुंगली जी के दूसरे पुत्र अनुज मुंगली से बात करते हुए सबसे पहले जो बात सामने आती है, वह है उनके अंदर की निर्भीकता।

जिसके बारे में अनुज खुले दिल से स्वीकारते हैं कि यह पूरी तरह पिताजी की देन है। अनुज कहते हैं कि पापा ने हमें निडर बनाया है। इसे उन्होंने अपने पूरे बचपन में जिया है।

अनुज को साल 1991 की घटना स्पष्ट रूप से याद है। वह तब कक्षा दो या तीन में थे। उम्र इतनी छोटी कि आमतौर पर बच्चे पानी को दूर से देखकर ही डर जाते हैं और माता-पिता उन्हें किनारे खड़ा रखने में ही सुरक्षित महसूस करते हैं। लेकिन मुंगली जी अपने बच्चों के साथ हमेशा अलग तरह का व्यवहार रखते थे। वे डर को सामने लाकर उसे खत्म करने में विश्वास रखते थे। उसी साल शिवपुरी और ऋषिकेश की बर्फ जितनी ठंडी, तेजधार गंगा में अनुज ने राफ्टिंग की। उनके शब्दों में उस समय का रोमांच आज भी मौजूद है।

अनुज बताते हैं कि पापा के साथ उन्होंने खूब घूमना सीखा। पहाड़, नदियाँ, घाटियाँ, जंगल, जो भी जगह उन्हें मजबूत बनाती, पापा उन्हें वहीं ले जाते थे। पिताजी उन्हें अपने अनुभवों में शामिल करते थे, लेकिन अपनी इच्छाएँ उन पर कभी नहीं थोपते थे। अनुज कहते हैं कि पापा एक खुली किताब हैं, जिसमें कुछ छिपा नहीं है और न ही कुछ उलझा हुआ है।
 जैसे वह बाहर की दुनिया में हैं, वैसे ही घर के भीतर भी हैं, सामाजिक और पारिवारिक रूप में उनमें कोई दोहरा रूप नहीं।

अनुज की बातचीत में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि मुंगली जी का व्यक्तित्व सिर्फ उनके काम में नहीं, उनके घर में भी उतनी ही मजबूती से उपस्थित है।

उनके किस्सों में पिताजी का वह रूप दिखता है, जिसमें अनुशासन और प्रेम एक साथ चलते हैं। वे बताते हैं कि पापा ने उन्हें दुनिया को अपने पैरों पर खड़े होकर देखने की हिम्मत दी। 

शौर्य: दादा जी की पुस्तकों से सीखती नई पीढ़ी

शौर्य मुंगली, अनुज मुंगली के पुत्र है और उसके लिए मुंगली जी केवल दादा नहीं बल्कि एक ऐसे गुरु हैं जिनकी पुस्तकों और कहानियों से उसका दृष्टिकोण बनना शुरू हुआ है। शौर्य दादा जी की दी हुई कई किताबें पढ़ चुका है और यही उसके व्यक्तित्व का सबसे सुंदर पक्ष है। उसने पुस्तकों के माध्यम से उस संसार को देखना शुरू किया है, जिसे सामान्यतः बच्चे देर से समझते हैं। 
शौर्य उस विरासत को पढ़ रहा है जिसे मुंगली जी ने अपने जीवन में जिया है।

मुंगली परिवार का माहौल शौर्य को स्वाभाविक रूप से अध्ययनशील बनाता है। मुंगली जी कहते हैं, "उनके घर से पचास मीटर दाएँ बड़े बेटे का घर है और पचास मीटर बाएँ छोटे बेटे का। रात का भोजन हम सब साथ करते हैं।" रोज का भोजन, बातचीत, घर का अनुशासन और दादा जी के स्नेह ने शौर्य के भीतर वह जिज्ञासा पैदा की है, जिससे वह अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने योग्य हो रहा है।

भानु मुंगली: बचपन की स्मृतियाँ, दिल्ली–नैनीताल का संसार और दद्दा की परछाईं

मुंगली जी को ज्यादा जानने के लिए उनके छोटे भाई भानु मुंगली से हुई बातचीत बहुत महत्त्वपूर्ण रही। उनकी स्मृतियों में बचपन, घर का वातावरण और दद्दा से मिली आदतें आज भी उतनी ही स्पष्ट हैं जैसे कल की बातें हों।

भानु बताते हैं कि उनके घर में किताब, विचार, दर्शन और समाचार पर चर्चा बहुत स्वाभाविक थी। यही माहौल बच्चों को दुनिया को समझने की एक अलग दृष्टि देता था। जब दद्दा दिल्ली से आते तो घर में एक अलग रौनक आ जाती। वे बताते हैं कि उनकी उम्र तब छह–सात साल रही होगी पर दद्दा का आना आज भी यादों में वैसे ही ताज़ा है।

एक पहली याद वह साझा करते हैं जब दद्दा लिवाइस की दो जीन्स लेकर आए। उस समय ऐसे कपड़े दुर्लभ थे और उन जीन्स को पहनना अपने आप में गर्व जैसा लगता था।

फिर भानु अपनी पहली अकेली दिल्ली यात्रा का ज़िक्र करते हैं। साल 1977 की सर्दियाँ थीं। पंजाबी बाग के पास उनका ठिकाना था और यहीं अख़बार पढ़ने की आदत पड़ी। दद्दा रोज़ उन्हें अख़बार पर बिठाकर देश–विदेश, गणतंत्र दिवस की तैयारियाँ, आने वाले राष्ट्राध्यक्षों से जुड़ी खबरों का मतलब समझाते। वे कहते कि परेड केवल प्रदर्शन नहीं होती, अनुशासन की धुन होती है।

उन्हीं दिनों दद्दा ने उन्हें बताया कि हरियाणा के एक गाँव का नाम अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा के बाद कार्टरपुरी रखा गया।

भानु ने दद्दा के साथ ही जीवन में पहली बार चाइनीज़ फूड चखते हुए चाउमीन खाया। मद्रास होटल में डोसा खाते हुए लौटते समय दद्दा ने उन्हें दो अंग्रेज़ी किताबें पकड़ाईं। एक दिन बड़ा एटलस लाकर देशों की राजधानी और नक्शे याद कराए। यही अभ्यास बाद में उनकी सीडीएस परीक्षा में काम आया। आज भी वे यही आदत अपने बेटे को दे रहे हैं।

पहली बार लिफ्ट का अनुभव उन्हें बैंक ऑफ बड़ौदा की ऊँची इमारत में हुआ। ऐसे छोटे–छोटे अनुभव ही दद्दा ने उन्हें दिए, जो आगे चलकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाते गए।

समय आगे बढ़ा। दद्दा फौज में चले गए और भानु स्कूल में थे। छुट्टियों में दद्दा आते तो झील के किनारे वॉक, तैराकी और पहाड़ों की ट्रेकिंग शुरू हो जाती। दद्दा के दोनों बच्चे बचपन से तैरते थे और यही उन्होंने भी अपने बच्चों को भी सिखाया।

भानु मानते हैं कि दद्दा हमेशा अनुशासित रहे। लंबी वॉक, पहाड़ पहुँच कर कुलदेवी मंदिर, चितई, जागेश्वर जाना, दद्दा की दिनचर्या थी और इसी का अनुसरण उन्होंने भी किया। एक किस्सा वे मुस्कुराते हुए बताते हैं, कोसी नदी के पास बच्चे पत्थरों से पानी में कूद रहे थे। दद्दा ने कहा चलो, हम भी कूदते हैं। जीवन को पूरे उत्साह से जीना ही मुंगली जी का स्वभाव रहा है।

कॉलेज के दिनों में भानु मुंगली अपने दद्दा की छुट्टियों का इंतज़ार करते। कॉलेज बंद होते ही आगरा का टिकट ले लेते। यहीं उन्हें पैराट्रूपिंग स्कूल जाने का मौका मिला। दद्दा अपने साथियों से कहते मेरे भाई को साथ ले जाओ। वहाँ पहली बार उन्होंने पैराशूट से उतरते जवान देखे और विमान को इतना पास से देखा।

पहली उड़ान भी उसी दौर में हुई। इंडियन एयरलाइंस फ्लाइट 408, आगरा से दिल्ली। भानु के लिए सत्रह–अठारह की उम्र के दौरान विमान में बैठना किसी सपने जैसा था। 

भानु मुंगली कहते हैं जब उन्होंने दद्दा से पूछा कि आगे क्या करूँ तो उन्होंने कहा परीक्षा दे दो। 

इसके बाद एक दोस्त ने उन्हें सीडीएस की किताब दिखाई तो उसका कोर्स देखकर भानु को लगा कि उन्हें सब आता है। उन्होंने परीक्षा दी और निकाल भी ली, इंटरव्यू और मेडिकल भी क्लियर हो गए। फिर उनका एयरफोर्स में चयन हो गया।

भानु बताते हैं कि घर से निकलते समय वे आज भी बैग में किताब रखना नहीं भूलते। यह आदत भी दद्दा की ही दी हुई है। गोल्फ उन्होंने दद्दा की वजह से सीखी। आगरा गोल्फ क्लब और राजभवन के मैदानों की सीख ने उन्हें आगरा ओपन कप और सेंट्रल कमांड ट्रॉफी दिलाई।

17 दिसंबर 1988 वह दिन था जब भानु मुंगली को अपना सर्विस नंबर मिला। ‘पायलट कोर्स 142’ और 15 फ़रवरी 2003 को उनका रिटायरमेंट दर्ज हुआ। इन वर्षों में उड़ान, प्रशिक्षण और अनुशासन ही जीवन का मूल आधार रहे।

हैदराबाद–सिकंदराबाद की अकादमी में ट्रेनिंग कठिन थी। सुबह पाँच बजे से फिजिकल, फिर ग्राउंड स्कूल, फिर सिम और सॉर्टीज़। जेट स्टेज में 20 घंटों में नियंत्रण न साध पाने पर ग्राउंडिंग का खतरा था। कई साथी इसी मोड़ पर रास्ता बदलते गए। भानु हर हफ्ते दद्दा को चिट्ठियाँ लिखते और हर हफ्ते जवाब आता था कि ध्यान रखो, शांत रहो, मेहनत करो।

एयरफोर्स ने उन्हें मजबूत संबंध दिए। इंस्ट्रक्टर वी.पी. लाल, पैराजम्प इंस्ट्रक्टर्स और दद्दा के साथी अफसर उनके परिवार जैसे हो गए। पहली ऑपरेशनल पोस्टिंग आगरा में मिली, जहाँ भानु उन अफसरों के साथ काम करने लगे, जिनको वह अपने कॉलेज के दिनों में दूर से देखते थे। 

भानु बताते हैं कि दद्दा ने उनकी जीवन–रुचियाँ भी तय कीं। गोल्फ के अलावा बर्ड वॉचिंग की शुरुआत कोटा के जंगलों से हुई। दद्दा ने टेंट लगवाकर घर के बच्चों के साथ Birds of India जैसी किताबों के सहारे पक्षियों की पहचान कराई। यह शौक आज भी चला आ रहा है।

विदेश यात्राओं ने भानु की दृष्टि और विस्तृत करी। लंदन में संग्रहालयों को उन्होंने अकेले ही देखा, उसके बाद वह अमेरिका में तीन महीने तक रहे। बाद में एयरफोर्स की फ्लाइट्स पर क़तर, रूस और यूक्रेन तक गए। उनसे दद्दा कहते रहते थे कि भानु दुनिया देखो, दृष्टि खुलेगी।

करियर के हर मोड़ पर दद्दा साथ रहे। जब भानु ने कहा कि वह एयरफोर्स छोड़ना चाहते हैं, तो दद्दा ने उनसे बस ये कहा कि निर्णय लो पर किसी योजना के साथ। मुंगली जी ने अपने भाई को पुणे में काम और सीखने के अवसर दिलाए।

बचपन में किताबों के साथ पुरानी दोस्ती और एटलस वाली आदत की वजह से पुणे में रहते भानु की किताबों के साथ और भी गहरी दोस्ती हो गई। भानु कहते हैं कि उनका परिवार बड़ा है। वह छह भाई और एक बहन हैं। उनमें कुछ हल्द्वानी हैं तो कुछ विदेश में भी रहते हैं।

साल 1997 में माता–पिता के जाने का दुख गहरा था, पर भाई एक–दूसरे के सहारे बने। दद्दा घर में पिता, मित्र और शिक्षक जैसे रहे।

अपने भाई की विशेषता बताते हुए भानु कहते हैं कि आज भी गिरिजा शंकर मुंगली जी इतिहास पढ़ते हैं। वे कहते हैं कि चीज़ों को वैसा ही देखना चाहिए जैसी वे हैं। एक ही आईने से देखने पर समझ सीमित हो जाती है। 

अंत में वे उसी आरंभिक सीख को दोहराते हैं।

किताब, अख़बार और एटलस।
चलना, तैरना और यात्रा।
योजना और साहस।
और सबसे महत्वपूर्ण, खुले मन की बहस। यही वह विरासत है जो उन्हें दद्दा ने दी हैं।

सम्मान, स्नेह और मानवीय जुड़ाव की कहानी

प्रो. गणेश हिंग्मिरे भारत में बौद्धिक संपदा अधिकारों और खासकर भौगोलिक संकेतकों के क्षेत्र में एक प्रमुख विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्हें भारत सरकार ने वर्ष 2015 और 2016 में लगातार दो बार राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा पुरस्कार दिया। वे पुणे के ILS लॉ कॉलेज के पूर्व छात्र हैं और कार्डिफ यूनिवर्सिटी, यूनाइटेड किंगडम से एलएलएम की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। अर्थशास्त्र में एमफिल कर उन्होंने बौद्धिक संपदा के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों को समझने के लिए मजबूत आधार तैयार किया। उनकी सेवाएँ दो दशकों से भी अधिक समय से उद्योगों, किसानों और छोटे उत्पादक समूहों को पहचान दिलाने में लगी हैं। आज वे भारत में GI के सबसे विश्वसनीय नामों में से एक हैं।

इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद प्रो. गणेश हिंग्मिरे का व्यक्तित्व सरल है और मुंगली जी का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव है।

मुंगली जी की पुणे पोस्टिंग के दौरान दोनों की पहली मुलाकात एनडीए में हुई थी।

गणेश हिंग्मिरे बताते हैं कि उस समय ही मुंगली जी के साथ उन्हें एक अलग तरह का अपनापन महसूस हुआ।
मुंगली जी के साथ उनका पहला परिचय औपचारिकता भर नहीं रहा, गणेश को ऐसा लगा जैसे कई वर्षों पुराना संबंध दोबारा सामने आ गया हो।


मुंगली जी का व्यक्तित्व, उनका स्वभाव और उनका व्यवहार इतना सहज था कि जुड़ाव अपने आप बन गया।

लगभग 2003 या 2004 के आसपास गणेश हिंग्मिरे की मां समान चाची की मृत्यु हो गई, उस वक्त उनका परिवार वहाँ मौजूद नहीं था। चाची की मृत्यु का समाचार मिलते ही मुंगली जी अपनी सैन्य वर्दी में ही अंतिम संस्कार स्थल पर पहुँच गए।

यह गणेश हिंग्मिरे के लिए बहुत बड़ी थी। उनकी आवाज़ आज भी भर जाती है जब वे बताते हैं कि उस कठिन घड़ी में मुंगली जी ने जैसे उन्हें सहारा दिया, वैसा सहारा उन्हें कभी किसी और से नहीं मिला।

उन दिनों गणेश हिंग्मिरे एक छोटे से कमरे में किराए पर रहते थे और उनको पढ़ाई पूरी करने के लिए अक्सर सड़क किनारे लगे खंभे की रोशनी का सहारा लेना पड़ता था।

मुंगली जी कई बार वहाँ पहुँचे, उनके संघर्ष को अपनी आँखों से देखा और उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी।
गणेश हिंग्मिरे आज भी कहते हैं कि मुंगली जी उनके जीवन में पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने उनके संघर्ष को समझा और सम्मान दिया।

GI प्रदर्शनी और पुणे में बैठक की व्यवस्था

भौगोलिक संकेतकों की दिशा में गणेश हिंग्मिरे की यात्रा की शुरुआत भी कहीं न कहीं मुंगली जी की सहायता से ही हुई।

पुणे में जब उन्हें अपनी पहली GI प्रदर्शनी आयोजित करनी थी, तब अचानक कार्यक्रम स्थल की व्यवस्था करना उनके लिए मुश्किल था।

उन्होंने मुंगली जी को जब अपनी समस्या बताई तो मुंगली जी ने तुरंत मीटिंग के लिए उपयुक्त जगह का इंतजाम कर दिया। मुंगली जी की तत्परता ने वह कार्यक्रम सफल बनाया। उस शानदार शुरुआत से आगे बढ़ते हुए आज गणेश भारत में सर्वाधिक GI पंजीकरण कराने वालों में शामिल है। 

गणेश कहते हैं कि मुंगली जी के साथ उनका संबंध इतना आत्मीय है कि जब उनके बच्चे हुए तब मुंगली जी ने ही उनके नाम रखे थे।

गणेश ने कहा कि मेरा मानना था कि बच्चे का नाम ऐसे व्यक्ति से प्रेरित होना चाहिए जिसने उनके जीवन में दिशा, समर्थन और प्रेरणा दी हो।

जब गणेश हिंग्मिरे राष्ट्रीय मंचों पर जाने लगे तब उनकी पहचान भी बढ़ने लगी और उनके कार्यक्रमों में वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित होने लगे, ऐसे समय में मुंगली जी ने ही उन्हें अधिकारियों के साथ सही तरीके से पेश होना सिखाया।

गणेश याद करते हैं कि एक सामाजिक कार्यक्रम में कई आईएएस, आईपीएस अधिकारी और डॉक्टर मौजूद थे। वातावरण गरिमामय था और हर तरफ सम्मान और आदर की भावना दिख रही थी। उसी मंच पर मुंगली जी ने सबके सामने गर्व से कहा कि गणेश उनके लिए बेटे समान हैं।

गणेश उस पल को आज भी नहीं भूल पाते, मुंगली जी के ये शब्द उन्हें भीतर तक छू गए थे। उन्हें ऐसा लगा जैसे एक पिता अपने पुत्र को पूरे समाज के सामने सम्मान दे रहा हो। उस क्षण गणेश की आँखें नम हो गई थीं। यह केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि वह अपनापन था जिसने उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया।

दिव्यांशी: परिवार की आँखों से मुंगली जी

मुंगली जी की बहु दिव्यांशी मुंगली से जब इस किताब के सिलसिले में बात हुई तो उन्होंने बताया कि उनके पिता और मुंगली जी पुराने मित्र रहे हैं इसलिए दिव्यांशी उन्हें बचपन से ही 'गुट्टू अंकल' कहती आई थीं।
अनुज से शादी के बाद भी उन्हें कभी यह अहसास नहीं हुआ कि वे किसी नई जगह आई हैं। उन्हें हमेशा लगा कि वे अपने ही घर आई हैं। दिव्यांशी कहती हैं कि मुंगली जी ठीक उनके अपने पापा की तरह हैं। वही सादगी, वही अपनापन और हर छोटी से छोटी बात का ध्यान रखना।

दिव्यांशी याद करती हैं कि 2015 में शौर्य के जन्म के बाद मुंगली जी का उसके प्रति बेहद आत्मीय रिश्ता है। दादाजी और पौते के बीच बहुत शानदार बॉन्डिंग है, जिसे उन्होंने हर दिन और मजबूत होते देखा। शौर्य के बड़े होने के साथ-साथ मुंगली जी ने उसके लिए एक विशेष डायरी भी लिखनी शुरू की, उस डायरी में मोरल वैल्यूज़ और मैनर्स के बारे में लिखा हुआ है।

दिव्यांशी बताती हैं कि शौर्य को समझाने का उनका तरीका बेहद सरल, सहज और प्रभावी होता है। वे किसी बात को उपदेश की तरह नहीं कहते, बल्कि रोज़मर्रा की छोटी घटनाओं में सीख ढूंढकर बच्चे को देते हैं।

दिव्यांशी कहती हैं कि मुंगली जी का बेहद अनुशासित दैनिक जीवन है। वह सुबह जल्दी उठकर पूजा, ध्यान और फिर हल्का, परहेज़ वाला भोजन करते हैं।
बारिश, ठंड, गर्मी, मौसम कैसा भी हो उनका रूटीन कभी नहीं बदलता। दिव्यांशी इसे देखकर अक्सर हैरान होती हैं कि अनुशासन को बिना दबाव के ऐसे कैसे जिया जा सकता है। उनके अनुसार मुंगली जी का यह अनुशासन उनके अंदर की शांति से आता है।

दिव्यांशी, मुंगली जी के बारे में एक दिलचस्प राज साझा करती हैं। उन्होंने बताया कि मुंगली जी लिखते बहुत अच्छा हैं। उनके शब्दों में एक विशेष तरह की संवेदनशीलता होती है, जैसे हर वाक्य दिल से निकलकर सीधे कागज पर उतर आया हो।

घर का कोई भी कोना ऐसा नहीं जहाँ मुंगली जी की लिखावट न मिल जाए। कहीं किसी नोटबुक में उनका नोट, कहीं किसी किताब के पन्नों के बीच छुपा एक छोटा-सा संदेश और कहीं किसी डायरी में दर्ज कोई विचार उन्हें दिखता रहता है। ये छोटी-छोटी लिखी हुई बातें घर में एक हल्का-सा अनुशासन और आत्मीयता बनाए रखती हैं।

उनका स्वभाव ही ऐसा है कि जो भी उनके करीब आता है, वह लिखने को प्रेरित हुए बिना नहीं रहता। मुंगली जी के लिए लिखना केवल आदत नहीं, बल्कि जीवन को समझने और संभालने का तरीका है।

वह मुंगली जी की एक बहुत सुंदर आदत का जिक्र करती हैं, दिव्यांशी कहती हैं कि यदि किसी को कोई उपहार देना हो या किसी से उपहार लेना हो तो मुंगली जी उसे बड़ी इज्जत और आदर से दोनों हाथों से ग्रहण करते हैं। यह छोटी सी बात घर के बच्चों को भी यह सिखाती है कि सम्मान शब्दों से नहीं, व्यवहार से आता है।

वे कहती हैं कि मुंगली जी प्रकृति के बेहद करीब हैं। पौधों, पेड़ों और मौसम के बदलावों से उनका भावनात्मक जुड़ाव है। परिवार के कार्यक्रम हों, त्यौहार हों या छोटी-छोटी सामाजिक मुलाकातें, वे कर्मचारियों से लेकर घर के सभी सदस्यों तक, सबके बीच समान सहजता से खड़े रहते हैं।

दिव्यांशी ने कहा कि मुंगली जी हमेशा कहते हैं कि यदि आप किसी का नकारात्मक पक्ष देखने लगोगे तो वही देखते रहोगे। लेकिन यदि आप उसे उसके स्वभाव के अनुसार, जैसे वह है, वैसे देखोगे तो उसमें अच्छाई दिखना तय है। दिव्यांशी मानती हैं कि यह बात उन्होंने अपने जीवन में भी अपनाई है।

दिव्यांश एक दिलचस्प बात और बताती हैं कि मुंगली जी अस्पतालों से डरते हैं। यह डर कभी कभी साफ़ दिख भी जाता है, पर मज़े की बात यह है कि जब परिवार में कोई मुश्किल आती है, वे सबसे शांत खड़े रहते हैं। घबराहट उन्हें छू भी नहीं पाती। उनका शांत रहना ही घर को संभाल लेता है।

दिव्यांशी के शब्दों में, मुंगली जी घर के लिए सिर्फ एक वरिष्ठ सदस्य नहीं, बल्कि एक संतुलन हैं। उनमें आदेश देने की प्रवृत्ति नहीं, बल्कि दिशा दिखाने की सहज क्षमता है। वे किसी पर अपनी किसी आदत को नहीं थोपते, फिर भी सब उनकी आदतों से सीख लेते हैं।

दिव्यांशी ने अंत में कहा कि मुंगली जी को देख कर लगता है कि एक इंसान एक साथ कितनी भूमिकाएं निभा सकता है, पिता, दादा, शिक्षक, मार्गदर्शक और सबसे बढ़कर एक ऐसा व्यक्ति जो प्रेम, अनुशासन और सरलता को बिना किसी दिखावे के जीता है।

प्रेरणा के असीम स्रोत : मुंगली जी के जीवन का आधार स्तंभ

मानव जीवन कोई सीधी रेखा नहीं है, जहां सिर्फ घटनाएं एक के बाद एक जुड़ती जाएं। यह एक जटिल जाल है, जो अनगिनत अनुभवों, स्मृतियों और सबसे ज्यादा उन अनमोल मानवीय रिश्तों से बुना जाता है। ये रिश्ते ही जीवन को अर्थ देते हैं, दिशा दिखाते हैं और उसे पूरा करते हैं। मुंगली जी का सैन्य जीवन वीरता, अनुशासन और अद्भुत साहस की कहानी था, उसकी जड़ उन अदृश्य डोरों में छिपी थी जो मानवीय संबंधों से बने थे। इन्होंने मुंगली जी के व्यक्तित्व को निखारा और विचारों को साफ किया। मुंगली जी के जीवन से जुड़े ऐसे ही महत्वपूर्ण लोगों के बारे में बात करते हुए अब हम आगे बढ़ते हैं।

जनरल बी.सी. जोशी: अनुशासन और संवेदनशीलता  दुर्लभ मेल से मुंगली जी को मिली सीख

मुंगली जी अपने सैन्य जीवन के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि उनके फौजी जीवन में जनरल जोशी उन विरले सैन्य अफसरों में से थे, जिनके व्यक्तित्व में अनुशासन की अटल कठोरता और मानवीय संवेदनशीलता का सुंदर संतुलन रहता है।

जनरल जोशी का शुरुआती जीवन और सैन्य सफर उन अनुभवों से भरा था जिन्होंने उनके नेतृत्व को गहराई दी। उन्होंने खुद कठिनाइयों का सामना किया, युद्ध की भयानकता को करीब से देखा। उन्होंने समझा कि सेना सिर्फ हथियारों या रणनीतियों का समूह नहीं है। यह उन लोगों का समुदाय है जो साझा मकसद के लिए एक दूसरे पर भरोसा करके लड़ते हैं। उनके अनुभव ने सिखाया कि लीडर का काम सिर्फ आदेश देना न होकर सैनिकों को प्रेरित करना, उनकी रक्षा करना और युद्ध जीतने के बाद भी उन्हें इंसान बनाए रखना होता है।

मुंगली जी ने कहा कि जनरल जोशी की नेतृत्व शैली पर गौर करें तो कई बातें सामने आती हैं।
जनरल जोशी ने मुंगली जी को नेतृत्व का बुनियादी सच सिखाया कि सबसे ताकतवर हथियार भय न होकर भरोसा होता है। जब लीडर अपने सैनिकों पर भरोसा करता है, उनकी काबिलियत पर यकीन रखता है और उनकी भलाई की फिक्र करता है, तो सैनिक भी एक दूसरे पर भरोसा करते हुए सबका साथ देते हैं। भरोसा ऐसी ताकत है जो किसी ग्रुप को नामुमकिन ऊंचाइयों तक ले जाती है। लेकिन अगर नेतृत्व सिर्फ भय पर टिका हो, जहां आदेश डर से माने जाते हों तो वह अस्थायी होता है। 
जनरल जोशी ने खुद के व्यवहार से साबित किया कि दृढ़ता और अनुशासन रखते हुए भी सैनिकों के मन में सम्मान और विश्वास जगाया जा सकता है।

 मुंगली जी ने बताया कि जनरल जोशी सिर्फ रणनीतिक या राजनीतिक फायदे नहीं देखते थे। सैनिकों के भले, उनकी जिंदगी की कीमत और फैसलों के लंबे असर पर भी गौर करते थे। उन्होंने मुंगली जी को सिखाया कि अच्छा लीडर कठिन फैसले लेने से नहीं डरता। वह ऐसा फैसला लेता है जो सबसे न्यायपूर्ण और कम नुकसान वाला हो। 

जनरल जोशी के साथ बिताए वक्त ने मुंगली जी के नेतृत्व के नजरिए को पूरी तरह बदल दिया। जनरल जोशी के उदाहरण से मुंगली जी ने इस नियम को अपना लिया कि वे खुद भी ऐसे लीडर बनेंगे जो अधीनस्थों की फिक्र करेगा, उनकी मुश्किलें समझेगा और उनकी काबिलियत पर भरोसा करेगा। उन्होंने जाना कि ताकत का असली स्रोत पद या बल नहीं, बल्कि लोगों का विश्वास है। 

सर एडमंड हिलेरी का जीवन और मुंगली जी पर प्रभाव

मुंगली जी को अपने जीवन में जिनसे प्रेरणा मिली, उन लोगों में सर एडमंड हिलेरी का नाम भी शामिल है।
हिलेरी दुनिया के सबसे ऊंचे शिखर एवरेस्ट फतह करने वाले पहले व्यक्ति के तौर पर मशहूर थे, लेकिन उनका जीवन सादगी भरा था। मुंगली जी को प्रकृति और पहाड़ों से गहरा लगाव था। वे बचपन से ही हिलेरी के जीवन और हिमालय के प्रति समर्पण से प्रभावित थे। सेना में रहते हुए उन्हें अपने बचपन के हीरो से मिलने का मौका मिला।

एडमंड हिलेरी का जन्म न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में हुआ। उनका शुरुआती जीवन एक साधारण मधुमक्खी पालक के रूप में बीता। बचपन से ही उन्होंने प्रकृति के करीब रहकर खूब शारीरिक मेहनत की और खुद पर निर्भर रहना सीखा। इस पृष्ठभूमि ने उन्हें आगे चलकर जमीन से जोड़े रखा। हिलेरी का पर्वतारोहण से जुड़ा शौक उन्हें हिमालय तक ले आया और 29 मई 1953 को उन्होंने अपने साथी टेंजिंग नोर्गे के साथ एवरेस्ट के शिखर पर पहला कदम रखा। इस रिकॉर्ड ने एडमंड हिलेरी को राष्ट्रीय गर्व बना दिया।

हिलेरी से मुलाकात के वक्त उनके बोले हर शब्द मुंगली जी के दिल में घर कर गए।
मुंगली जी कहते हैं हिलेरी के लिए एवरेस्ट पर जीत सिर्फ शारीरिक कामयाबी नहीं थी, उनके लिए यह एक दार्शनिक यात्रा थी। पर्वत ऊंचाई और जटिलता से इंसान को उसकी असली जगह का एहसास दिलाते हैं। वे याद दिलाते हैं कि हम प्रकृति का छोटा सा हिस्सा हैं। हमारी बड़ी से बड़ी उपलब्धियां अनंत ब्रह्मांड के सामने क्षणिक हैं। यह एहसास अहंकार मिटाता है और इंसान को संवेदनशील, सोचने वाला और सम्मानजनक बनाता है। हिलेरी की विनम्रता इसी समझ का सबूत थी।

उनका प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान अनोखा था। हिलेरी के लिए पहाड़ चढ़ाई की चुनौतियां नहीं, बल्कि जीवंत चीजें थीं जिनका आदर करना चाहिए। वे मानते थे कि प्रकृति को बचाना, संरक्षित करना और उसके साथ तालमेल बैठाकर जीना जरूरी है। एवरेस्ट फतह के बाद उन्होंने शोहरत का जीवन नहीं चुना। उन्होंने अपना बाकी जीवन हिमालय के लोगों की सेवा और संस्कृति के संरक्षण में लगा दिया।

हिलेरी ने नेपाल में स्कूल, अस्पताल और हवाई पट्टी बनवाई। शेरपा समुदाय के उत्थान के लिए काम किया, उन्हें अच्छी शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा का मौका दिया। साल 1964 में हिलेरी की पहल पर लुकला हवाई पट्टी (आज का Tenzing–Hillary Airport) का निर्माण कराया गया, ताकि दवाइयों, निर्माण सामग्री और राहत सामग्री की आपूर्ति आसानी से पहुँच सके। इसके अलावा उन्होंने शेरपा गाँवों में सस्पेंशन ब्रिज, पेयजल योजनाएँ और पर्यावरण संरक्षण परियोजनाएँ भी शुरू की।
हिलेरी ने नेपाल के सोलुखुम्बु क्षेत्र में स्कूलों के लिए मूलभूत ढाँचा तैयार कराया। उनके प्रयासों से कुमजुंग, खुंडे, फपलू तथा आसपास के गाँवों में शिक्षा प्रणाली मजबूत हुई। 
मुंगली जी उनके शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों की वजह से खासतौर पर प्रभावित रहे और अपना शिक्षण संस्थान को खोलते समय भी उनके मन में हिलेरी हमेशा मौजूद रहे।

डॉ. शेखर पाठक: मुंगली जी में हिमालय के प्रति चेतना जगाने वाले

मुंगली जी के जीवन को दिशा देने वाले एक और बड़ी शख्शियत डॉ. शेखर पाठक रहे हैं। शेखर पाठक हिमालय के इतिहास, समाज, संस्कृति और पर्यावरण के गहरे जानकार है। उन्होंने अपना पूरा जीवन इस क्षेत्र के अध्ययन, संरक्षण और विकास में लगा दिया। साल 1974 में उनके द्वारा शुरू की गई अस्कोट आराकोट यात्रा आज हिमालय का वास्तविक चेहरा सामने लाने के लिए विश्व विख्यात है। डॉ. पाठक के साथ वक्त ने मुंगली जी के हिमालय से जुड़े ज्ञान को और भी वृहद किया।

डॉ. पाठक का के अंदर जितना किताबी ज्ञान है उससे कहीं अधिक उनमें सामाजिक और जमीनी समझ है। उन्होंने हिमालयी लोगों के साथ काम करते हुए उनकी परेशानियां समझी हैं। वह पहाड़ी लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिशें लगातार जारी रखे हुए हैं। डॉ पाठक के निर्देशन में मुंगली जी ने अपना शोध कार्य पूरा किया। यह शोध कार्य सिर्फ 'पीएचडी' पूरी करने की जिज्ञासा का नतीजा नहीं था बल्कि यह मुंगली जी के अंदर हिमालय के प्रति प्रेम और हिमालय संरक्षण की चिंता का नतीजा था।

डॉ. पाठक ने मुंगली जी को सिखाया कि सच्चा ज्ञान सिर्फ किताबों में सिमटा नहीं रहता। ज्ञान जीवन के अनुभवों से प्राप्त होता है, इसके लिए लोगों से जुड़ना होता है और इतिहास की परतों को समझना पड़ता है। डॉक्टर पाठक ने मुंगली जी को समझाया कि गांव के किसी बुजुर्ग, वहां के लोकगीत या पहाड़ों के पत्थरों में भी ज्ञान का स्रोत हो सकता है। यह नजरिया मुंगली जी के लिए बहुत जरूरी था, इसके बाद वह सैन्य जीवन से जुड़े अनुभवों को भी किताबी ज्ञान से कम नहीं मानने लगे।

डॉ. पाठक से उन्होंने यह भी सीखा कि जीवन में अच्छी बुरी, हर प्रकार की घटना अपना मूल्य रखती है। जरूरी है कि हम उससे क्या सीखें, उसे कैसे अपनाएं और जीवन बेहतर बनाने में कैसे इस्तेमाल करें। मुंगली जी की पीएचडी ने उनके सैन्य अनुभवों और सामाजिक नजरिए को जोड़ा, यह डॉक्टर शेखर पाठक की ही देन है।

फौज के सहकर्मी: मुश्किलों में जन्मा भाईचारा

सेना में जीवन जोखिम और शारीरिक-मानसिक चुनौतियों से भरा होता है। यहां मुंगली जी को ऐसे दोस्त मिले जिनके साथ उनका रिश्ता सिर्फ काम तक सीमित न होकर घनिष्ठ मित्रता का था। हर्षिल जैसी कठिन पोस्टिंग में कुछ साथियों के साथ उनका यह बंधन और मजबूत हो गया।

हर्षिल जैसी जगहों पर मुश्किल मौसम, खराब संचार और दुश्मन का खतरा हमेशा होता था। यहां हर छोटी चीज के लिए संघर्ष पड़ता था। ऐसे माहौल में इंसान अपना सच्चा रूप दिखाता है और दिखावे की कोई गुंजाइश नहीं रहती।

मुंगली जी कहते हैं कि फौज में हुई दोस्ती जीवन भर साथ रहती है। उन्होंने अपने साथियों के साथ सुख-दुख बांटे, एक दूसरे को आगे बढ़ाया और किसी को अकेला नहीं पड़ने दिया।

उनके साथी रिटायर्ड कर्नल हरबिंदर सिंह की यादों से यह रिश्ता और साफ दिखाई देता है। मुंगली जी की जीवनी लिखे जाने के बात मालूम पड़ते ही सिंह जी बहुत खुश हुए। मुंगली जी के बारे में बात करते वह बताते हैं कि मुंगली जी और मैं वर्ष 1980 के साथी हैं। भर्ती एक साथ हुए और कमीशन भी एक ही समय मिला। फौजी जीवन के पहले कदम हमने साथ में रखे। यह वह दौर था जब दोनों युवा अफसर थे। आगरा में पोस्टिंग, पैराशूट जंप, रात की ट्रेनिंग और वह सब अनुभव जो एक फौजी का चरित्र बनाते हैं, दोनों ने साथ में जिए।

मुंगली जी शिक्षा कोर में थे, लेकिन उनका मन हमेशा जवानों के साथ रहने में लगता था। हरबिंदर सिंह ने बताया कि उनमें शुरू से ही अपनापन था। वह कहा करते थे कि मेरे जवान मेरा परिवार हैं। कोई भी अभ्यास हो और कोई भी ट्रेनिंग हो, वह पूरे उत्साह के साथ शामिल होते थे। कई बार जवानों से भी आगे निकल जाते थे। यदि सब बीस किलोमीटर चलते तो वह इक्कीस चलने के लिए तैयार रहते। विभाग अलग था, लेकिन दिल हमेशा एक फाइटर का था।

उनकी पोस्टिंग लगातार बदलती रही। आगरा, कोलकाता, बंगलौर और मद्रास जैसे स्थानों पर दोनों साथ रहे। पैराशूट जंप से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक और एक ही कमरे में रहने तक के हर अनुभव ने उनके रिश्ते को परिवार जैसा बना दिया। पहाड़ों में तैनाती के समय की एक स्मृति उन्होंने विशेष रूप से साझा की। उस समय उनकी बेटी का जन्म हुआ था। नाम रखने की जिम्मेदारी मुंगली जी ने संभाली। उन्होंने बेटी का नाम हर्षिल रखा और पहाड़ की बर्फ में बैठकर अपने हाथ से एक कार्ड बनाया। यह रिश्ता फौज के दो साथियों वाले रिश्ते से कहीं आगे बढ़कर था।

गंगोत्री और गोमुख की यात्रा याद करते हुए हरबिंदर सिंह थोड़े भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि वहां हम दोनों पैदल गए, बर्फीले पानी में स्नान किया और उधर मुंगली जी ने पूजा भी की। उन्होंने आगे कहा कि मुंगली जी ने कभी इंसानियत को नहीं छोड़ा। धर्म उनके लिए दीवार नहीं, बल्कि एक विशाल आकाश था जिसमें हर विश्वास को सम्मान मिलता था।

कारगिल का उल्लेख आते ही उनकी आवाज गंभीर हो गई। उन्होंने कहा कि जब वह कारगिल में तैनात थे और आठ सौ जवान उनके अधीन थे, तब मुंगली जी की चिट्ठियाँ उन्हें शक्ति देती थीं। चिट्ठियों में लिखा होता था कि तुम वहाँ लड़ रहे हो और हम सब तुम्हारे साथ खड़े हैं। जब वह वापस लौटे तो मुंगली जी सबसे पहले उनके घर पहुँचने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने बच्चों को आशीर्वाद दिया और परिवार का हाल पूछा। यह संबंध कर्तव्य से आगे बढ़कर आत्मीयता का हिस्सा बन चुका था।

सेना से बाहर आने के बाद भी दोनों का रिश्ता उतना ही मजबूत रहा। जब हरबिंदर सिंह नागपुर में भर्ती निदेशक बने और कुछ दिनों के लिए पुणे भेजे गए, तो उन्होंने होटल के बजाय मुंगली जी के घर में रहना पसंद किया। मुंगली जी ने उन्हें कमरा दिया, साथ बैठकर भोजन किया और दोनों साथ घूमने भी गए। उन्हें प्रशिक्षण के लिए कहीं जाना होता था तो मुंगली जी अपना वाहन भी भेज देते थे। यह घर उनके लिए अपना ही था।

मुंगली जी ने जब शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखा और पहला स्कूल शुरू किया, तब भी हरबिंदर सिंह उनके साथ रहे। उन्होंने उद्घाटन में भाग लिया। फिर दूसरा स्कूल बना और उसके बाद तीसरा। उन्होंने कहा कि मुंगली जी ने सचमुच पहाड़ काटकर मैदान बनाया और उस पर शिक्षा का दीप जलाया। जब राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम स्कूल में आए, तो उन्हें अपार गर्व हुआ। मुंगली जी के घर के समारोहों में भी वह सम्मिलित होते हैं।

हरबिंदर सिंह ने बताया कि यदि मुंगली जी सेना में रहते तो आज मेजर जनरल के पद से रिटायर होते। उनमें नेतृत्व क्षमता, ऊर्जा और निर्णय शक्ति की कोई कमी नहीं थी। लेकिन परिवार और बच्चों की शिक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक अलग मार्ग चुना। यह निर्णय भी उतना ही साहसिक था, जितना फौज में लिया जाने वाला कोई निर्णय होता है। आज भी जब सेना की बात होती है तो उनकी आंखों में वही पुरानी चमक दिखाई देती है।

बातचीत के अंत में हरबिंदर सिंह ने कहा कि हम भारतीय सैनिक हैं और हमारी मातृभाषा हिंदी है। हिंदी में लिखी मुंगली जी की यह कहानी नई पीढ़ी को अवश्य प्रेरित करेगी।

पारिवारिक मुंगली जी

मां की यादें मुंगली जी के लिए हमेशा किसी भी नए कार्य की स्रोत रहीं। सेना की कठिन ड्यूटी और देश सेवा के बीच जब उन्हें घर लौटने का मौका मिलता, तो मां का चेहरा देखना उनके लिए किसी दवा से कम न था। मां का निस्वार्थ प्यार और गहरी समझ उनकी सारी थकान और तनाव को पल में मिटा देती थी। मां का स्नेह, उनकी गैरमौजूदगी में भी, उनके अंदर एक लगातार रोशनी पैदा करता था। 

मुंगली जी का शादीशुदा जीवन बहुत संतुलित, सम्मानपूर्ण और बौद्धिक रूप से भरपूर है। बौद्धिक बराबरी, विचारों की साझेदारी और जीवन के प्रति एक जैसी सोच ने उन्हें अपनी पत्नी देवयानी मुंगली के करीब ला दिया। 

मुंगली जी का कहना है कि पत्नी अगर विचारों में मजबूत हो तो पति का मन स्वाभाविक रूप से संतुलित रहता है। वे मानते हैं कि पत्नी ही घर संभालती है और अगर वह अपने विचारों में परिपक्व, स्पष्ट हो तो वह अपने पति को भी स्थायी संतुलन देती है। यह संतुलन भावनात्मक ही नहीं, बौद्धिक और व्यावहारिक भी होता है। पत्नी के विचार पति को अपने जीवन की उलझनों को समझने और सही फैसले लेने में मदद करते हैं। 

मुंगली जी का कहना है कि माता-पिता का साथ जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद है। जो उनके प्यार और आशीर्वाद को संभालता और रक्षा करता है, उसके जीवन में कभी गहरा अंधेरा नहीं आता। इंसान कितनी भी ऊंचाई पा ले या उपलब्धियां हासिल कर ले, उसकी जड़ें परिवार में ही गहरी जमती हैं। अगर ये जड़ें स्वस्थ, मजबूत और गहरी हों, तो पेड़ किसी तूफान का सामना कर सकता है और खड़ा रह सकता है। लेकिन अगर जड़ें कमजोर या खोखली हों, तो हल्की हवा से भी डगमगा जाता है और गिर जाता है।

बचपन के साथी की नजरों में मुंगली जी

नैनीताल में मेरी मुलाकात मुंगली जी के बचपन में साथी रहे विजय मोहन खाती से हुई। मुंगली जी की जीवनी के लिए जब मैंने उनसे बात की तो उन्होंने वर्षों पुराने अनुभवों को सहजता से मेरे सामने रख दिया। विजय मोहन खाती ने बताया कि मुंगली जी उनके बचपन के मित्र हैं। मुंगली जी का परिवार नैनीताल कैंटोनमेंट क्षेत्र में रहता था। समय के साथ उन दोनों के जीवन की राहें अलग हुईं पर अब भी उनके बीच निकटता बनी हुई है।

मुंगली परिवार उस दौर में नैनीताल और हल्द्वानी में प्रतिष्ठित परिवार था। उनके पास इलाके में खूब जमीन जायदाद थी और अब भी है पर मुंगली जी में उन्होंने कभी किसी प्रकार का दिखावा नहीं देखा है।

उनके परिवार में शुरूआत से ही धार्मिक और सामाजिक चेतना थी। मुंगली जी के परिवार द्वारा हनुमान गढ़ी में मंदिर का निर्माण करवाया गया।

विजय मोहन ने कॉलेज के दिनों का जिक्र करते हुए कहा कि मुंगली जी पढ़ाई में ठीक थे, उन्हें हम औसत छात्र कह सकते हैं। ऐसा छात्र जो पढ़ाई के लिए बहुत गंभीर नहीं होता पर हम उसे लापरवाह भी नहीं कह सकते। मुंगली जी अंग्रेज़ी संगीत और बीटल्स सुनने का शौक था और वह गिटार भी बजाते थे, उन्होंने कॉलेज के फंक्शन में प्रस्तुतियाँ दी थी।

मुंगली जी की एक आदत को याद करते हुए विजय मोहन कहते हैं कि उन्हें फिल्मों का शौक इतना था कि पैसे कम होने पर भी वह फिल्में देखने चले जाते थे।

मुंगली जी हमेशा से ‘दोस्ती करेगा तो निभाएगा’ वाले दोस्त रहे हैं और वह बिना कहे काम कर देते हैं। उनकी मित्र मंडली समय के साथ बदलती रहती थी। कई दोस्त होते थे, फिर कुछ और हो जाते। लेकिन जिनसे पक्की दोस्ती होती थी, वह मुंगली जी से आज तक दूर नहीं होंगे।

उन्होंने बताया कि पुणे में स्कूल का काम शुरू करने के बाद मुंगली जी में एक परिवर्तन यह आया कि उन्होंने अपनी जीवनशैली बदल दी। वह अधिक धार्मिक, अनुशासित और अपने कार्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो गए। मुंगली जी की जो ऊर्जा पहले घूमने-फिरने में थी, वह अब समाज और शिक्षा की दिशा में मुड़ चुकी थी।

मुंगली जी के पारिवारिक जीवन का जिक्र करते हुए खाती जी ने उनकी पत्नी का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देवयानी पढ़ी-लिखी, सुदृढ़ स्वभाव वाली हैं। 

मेजर जनरल ए. एस. कार्की के लिए मुंगली जी

मेजर जनरल ए. एस. कार्की बताते हैं कि उनकी मुंगली जी से जुड़ी सबसे पहली यादें 1960 के आसपास की हैं, तब मुंगली जी नैनीताल के तल्लीताल में रहते थे। संयुक्त परिवार में बीते उस बचपन के दिनों में मुंगली जी शांत स्वभाव वाले बच्चों के बीच समय बिताते थे।

घर के बगीचे में टिन शेड के नीचे बना ‘जिप्पी क्लब’ उनका पसंदीदा ठिकाना था। यह एक पुस्तकालय था और वहीं से आसपास के बच्चों के साथ मुंगली जी की आत्मीयता शुरू होती है। मुंगली जी वहां सभी बच्चों को नैनीताल की झील और आसपास की जगहों के किस्से सुनाते थे।

उन्हें आज भी याद है कि कैसे हर बातचीत के अंत वह बच्चों को टॉफी दिया करते थे। इसके सालों बाद, जब ए. एस. कार्की देहरादून स्थित IMA में प्रशिक्षण ले रहे थे तब युवा कैप्टन मंगली जी देहरादून में पोस्टेड थे।

जीवन के इस नए अध्याय ने दोनों को फिर करीब ला दिया। कार्की बताते हैं कि उनके रविवार मुंगली जी के घर पर बीतते थे। वहां मुंगली जी अपने हाथों से बना भोजन उन्हें अपने सैन्य जीवन के किस्से सुनाते हुए खिलाया करते थे।

मेजर जनरल कार्की एक प्रसंग आज याद करते हुए कहते हैं कि एक बार उनकी IMA वाली साइकिल का टायर पंचर हो गया और मंगली जी ने मुझसे अपनी वेस्पा में साथ चलने की ज़िद कर दी। साइकिल का फ्लैट टायर मेरे कंधों पर टांगकर, हम दोनों अँधेरी सड़क पर IMA पहुँचे।

उन्होंने बताया कि उसी दौर में मुंगली जी को एक पैराट्रूपर और एडवेंचर-उत्साही के रूप में देखकर उन्हें भी IMA Golden Jubilee में पैराशूट डेमो टीम में शामिल होने की प्रेरणा मिली और उनकी ‘पैरा विंग्स’ आज भी उनके पास सुरक्षित है।

अपनी लंबी सैन्य सेवा के दौरान भी मेजर जनरल कार्की कई बार पर मुंगली जी से मिलते रहे और उनसे मिलने पर हमेशा ऊर्जा का संचार हो जाता था।

उन्होंने देखा कि किस सहजता और गरिमा के साथ मुंगली जी ने फौजी जीवन से नागरिक जीवन में प्रवेश किया। कभी उन्हें पुणे जाना हो तो मुंगली जी का घर उनके लिए पड़ाव होता था।

बाद के वर्षों में साल 2018 की पोस्टिंग उन्हें फिर पुणे ले आई और इस बार उनका परिवार भी मुंगली जी के स्नेह को महसूस कर सका। कार्की बताते हैं कि जब भी उनके वृद्ध माता-पिता अस्पताल में भर्ती रहे, मुंगली जी बिना बताए वहां पहुँच जाते और हाथ थामकर चुपचाप अपनी ऊर्जा उनके माता–पिता में भरते रहते। इससे हर बार उनकी रिकवरी उम्मीद से तेज़ हुई, ऐसा लगता था मानो मुंगली जी का स्नेह दवा का काम करता हो।

उन्होंने बताया कि मुंगली जी के घर में आज भी कुमाऊँनी बोली जाती है।  उनके साथ बातचीत करते-करते वह और उनकी पत्नी भी कुमाऊँनी में सहज हो गए। मुंगली जी का घर, स्टाफ सबमें पहाड़ शामिल है।

मुंगली जी: आध्यात्मिक निकटता और उत्तराखंड से आत्मीय संबंध

उत्तराखंड में मेरी पुस्तक के सिलसिले में आईपीएस अनन्त शंकर ताकवाले से बातचीत हुई। उन्होंने क्रमवार बताया कि मुंगेर से बने आध्यात्मिक संपर्कों और स्वामी राम जी की परंपरा के माध्यम से उनका संबंध मुंगली जी से जुड़ा। गणेश हिंगमिरे उन्हें स्वयं देहरादून ले गए और कहा कि यह परिवार उत्तराखंड से है और स्वामी राम जी के बहुत निकट रहा है। ताकवाले उस समय चम्पावत जिले में स्थित ताड़केश्वर महादेव मंदिर जाते रहते थे जहाँ से स्वामी राम जी का भी संबंध रहा है। इसके बाद उनकी मुंगली से पहली मुलाकात संस्कृति स्कूल में हुई।

संस्कृति स्कूल में प्रवेश करते ही उन्हें भारतीय संस्कृति और साधना का स्पष्ट वातावरण मिला। परिसर में अनुशासन था, शांति थी और शिक्षकों के व्यवहार में विनम्रता थी। वहीं पहली बार मुंगली जी के परिवार से उनका विस्तृत परिचय हुआ। पत्नी देवयानी मुंगली और पुत्र प्रणीत से मुलाकात हुई।

परिवार से बातचीत में उन्हें वही आध्यात्मिकता अनुभव हुई, जिसका संकेत उन्हें पहले से मिलता रहा था। आईपीएस अनन्त शंकर ताकवाले ने आगे कहा कि ऐसे अवसरों पर उन्हें मुंगली परिवार के साथ एक अदृश्य जुड़ाव महसूस होता है। जैसे नियति तय कर देती है कि किससे और कब मिलना है। ठीक वैसे ही यहाँ भी उन्हें सहज निकटता का अनुभव हुआ।

पहली भेंट के बाद मुंगली जी के स्कूल में उनका आना जाना बना रहा। स्कूल के कार्यक्रमों में भागीदारी हुई। नदियों की स्वच्छता पर आयोजित एक पहल में वे विशेष रूप से स्कूल पहुँचे। उस दिन भी उन्हें वही संवेदनशील वातावरण मिला और विषय पर गंभीर चर्चा हुई। बच्चों के समूह ने स्थानीय जलधाराओं के संदर्भ और जिम्मेदार नागरिकता पर प्रस्तुति दी। शिक्षकों ने अनुशासन को व्यवहार में उतारा हुआ था। उन्हें लगा कि शिक्षा यहाँ केवल पाठ्यपुस्तक नहीं है बल्कि जीवन पद्धति है। मुंगली जी ने जिस कार्य को अपने हाथ में लिया है, वह संस्थान चलाने भर का काम नहीं बल्कि मूल्य आधारित शिक्षा का सतत अभ्यास है।

आईपीएस ताकवाले ने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड में उनकी सेवा के वर्षों में जहाँ भी मुंगली जी और उनके परिवार से मुलाकात हुई वहाँ हिमालय की आध्यात्मिकता जैसे आसपास घिर आती है। यह अनुभव उन्हें बार बार हुआ। इसलिए उत्तराखंड से दूर रहते हुए भी जब वे इस परिवार के सान्निध्य में आए तो उन्हें लगा कि वे अपने ही प्रदेश की सांस्कृतिक धारा में हैं। मुंगली जी के विचारों में और संवादों में वही सरलता रहती है जो पहाड़ की हवा में मिलती है।

जनरल एम एल दर की नजरों में मुंगली जी

जनरल एम एल दर से मुलाकात के दौरान वह मुंगली जी को उन अधिकारियों की श्रेणी में रखते हैं जो सेना में सिर्फ अपने पद से नहीं, बल्कि अपने आचरण, दृष्टि और ज़मीनी काम से पहचान बनाते हैं। जनरल दर कहते हैं कि मुंगली जी को याद करते ही सबसे पहले एक ऐसा चेहरा सामने आता है जो दृढ़ता, सादगी और ईमानदार नेतृत्व के गुण लिए हुए है।

जनरल दर बताते हैं कि सेना में मुंगली जी की कार्यशैली अत्यंत व्यावहारिक थी। वे लंबे भाषण नहीं देते थे। वे सीधे काम की बात करते थे। उन्हें बेकार की बातचीत पसंद नहीं थी। जिस काम का जिम्मा लिया, उसे समय से और पूरी गंभीरता से पूरा करवाते थे। अधीनस्थों से भी यही अपेक्षा रखते थे। जनरल दर के अनुसार मुंगली जी को जो भी जानता है, यही कहेगा कि वे कम बोलने वाले और बहुत काम करने वाले अधिकारी थे। जिस काम को करते, उसमें कोई लापरवाही नहीं होती।

मुंगली जी का प्रशासनिक कौशल इतना मजबूत था कि वे कठिन से कठिन काम भी स्थानीय प्रशासन से निकलवा लेते थे। जनरल दर कहते हैं कि जहाँ किसी सामान्य अधिकारी को महीनों लगते, वहाँ मुंगली जी एसएसपी और डीएम से तुरन्त काम करवा लेते थे। यह उनकी व्यक्तिगत छवि, भरोसे और वर्षों के विकसित संबंधों का परिणाम था। हर अधिकारी उन्हें सम्मान से देखता और उनके कार्यों में सहयोग देता।

उन्होंने सिर्फ सैन्य क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि समाज और पर्यावरण में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। जनरल दर एक महत्वपूर्ण घटना बताते हैं कि सन 1983 में एक रेतीले फायरिंग रेंज में वृक्षारोपण का काम असंभव माना जाता था। उस इलाके में पेड़ लगाना किसी चुनौती से कम नहीं था क्योंकि मिट्टी रेतीली थी और पानी दूर-दूर तक नहीं मिलता था। लेकिन मुंगली जी ने वहाँ सैकड़ों पेड़ लगवाए। स्थानीय प्रशासन, सैनिकों और युवाओं को जोड़कर उन्होंने एक ऐसा प्रयास शुरू किया, जो वहाँ की प्रकृति के लिए नई शुरुआत जैसा था। जनरल दर कहते हैं कि जहाँ लोग पेड़ लगाना भी नहीं सोचते थे, वहाँ मुंगली जी ने पूरा हरा क्षेत्र तैयार कर दिया। यह उनके साहस और लगन का उदाहरण है।

कोटा में उनके काम के दौरान उन्होंने कई ऐतिहासिक मंदिरों और स्थलों का विस्तृत अध्ययन किया। वे सिर्फ काग़ज़ी निरीक्षण करने वाले अधिकारी नहीं थे। वे खुद उन स्थानों पर जाते, इतिहास समझते और स्थानीय लोगों से बात करते। कई मंदिरों के पुरातात्विक और सांस्कृतिक महत्व को उन्होंने अपनी रिपोर्टों में दर्ज किया, जो आगे चलकर प्रशासनिक निर्णयों में उपयोगी साबित हुईं। जनरल दर कहते हैं कि मुंगली जी में ज्ञान की भूख थी। किसी भी क्षेत्र में जाएँ, वह क्षेत्र उनका जीवन अनुभव बन जाता था।

वे सैनिकों के परिवारों और बच्चों के विषय में हमेशा सजग रहते। सेना में कई ऐसे अवसर आते हैं जब एक सैनिक का परिवार मुश्किल में पड़ जाता है। मुंगली जी ऐसी परिस्थितियों को व्यक्तिगत जिम्मेदारी की तरह लेते थे। जनरल दर बताते हैं कि एक बार एक सैनिक की बेटी के स्कूल में समस्या आई। मुंगली जी स्वयं स्कूल गए, प्रिंसिपल से बात की और उसी समय व्यवस्था ठीक करवाई। उनका मानना था कि सैनिक के परिवार की चिंता दूर करना भी नेतृत्व का हिस्सा है।

आर्मी पब्लिक स्कूलों में सुधार और निगरानी के काम में भी उन्होंने गहरी रुचि ली। वे चाहते थे कि सैनिकों के बच्चों की शिक्षा किसी भी तरह से पीछे न रहे। चाहे संसाधन कम हों या इलाका दूरदराज का हो, वे स्कूल का निरीक्षण करते, शिक्षकों से बात करते और बच्चों की पढ़ाई का मानक ऊँचा रखने का प्रयास करते।

जनरल दर की दृष्टि में मुंगली जी का सबसे महत्वपूर्ण गुण यह था कि वे अपने काम का श्रेय कभी नहीं लेते थे। वे चुपचाप काम करके आगे बढ़ जाते थे। जनरल दर के शब्दों में मुंगली जी जैसा अधिकारी सेना की परंपरा को मजबूत करता है। उनके जैसे लोग अपनी संस्था को अपनी उपस्थिति से समृद्ध कर देते हैं।

रश्मि शुक्ला का कथन

महाराष्ट्र पुलिस की पहली महिला डीजीपी IPS रश्मि शुक्ला आज देश की सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित महिला अधिकारियों में गिनी जाती हैं। तेजतर्रार छवि, सख्त प्रशासनिक निर्णय और निर्भीक कार्यशैली ने उन्हें लेडी सिंघम की उपाधि दिलाई है। 1988 बैच की इस अधिकारी ने सशस्त्र सीमा बल की महानिदेशक के रूप में भी कार्य किया। केवल 22 वर्ष की आयु में आईपीएस बनने का उनका रिकॉर्ड उनकी प्रतिभा और परिश्रम को रेखांकित करता है।

इन्हीं घटनाओं और उपलब्धियों के बीच मुंगली जी के साथ उनका रिश्ता एक विशेष अध्याय की तरह उभरता है। मुंगली जी से मेरी बातचीत के दौरान जब उनका नाम आया तो स्वाभाविक था कि मैं उनसे भी इस संबंध पर बात करूँ। रश्मि शुक्ला ने बेहद स्नेह और स्वाभाविकता से उन दिनों को याद किया जब वह पहली बार मुंगली जी से मिली थीं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 के आसपास दोनों का परिचय हुआ और यह परिचय धीरे-धीरे एक ऐसी आत्मीयता में बदल गया जिसे वह भाई-बहन का अनमोल बंधन कहती हैं।

उन्होंने एक घटना साझा की जिसे वह आज भी अपनी स्मृतियों का सबसे विश्वासपूर्ण पल मानती हैं। जब उनका तबादला सीआरपीएफ में हुआ था तब उन्हें तत्काल मुंबई पहुँचना था। फ्लाइट उपलब्ध नहीं थी और समय बेहद कम था। उस कठिन क्षण में मुंगली जी ही थे जिन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी कार लेकर उन्हें मुंबई पहुँचाया। 

उन्होंने बताया कि कई बार ऐसा हुआ जब वे किसी गंभीर निर्णय, उलझन या प्रशासनिक दबाव से गुजर रही होती हैं। उन्हें जब भी स्पष्ट मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है तब मुंगली जी एक ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं, जिनकी बातों में केवल सलाह नहीं, बल्कि विश्वास और समाधान की वास्तविक तस्वीर छिपी होती है। वे बिना किसी दिखावे के स्पष्ट, संतुलित और विचारशील दृष्टिकोण रखते हैं, जिससे सबसे कठिन परिस्थितियाँ भी सहज लगने लगती हैं।

रश्मि शुक्ला के शब्दों में मुंगली जी मेरे लिए ऐसे भाई हैं जिन पर मैं हर परिस्थिति में भरोसा कर सकती हूँ। उनकी शांत आवाज और संतुलित सोच किसी भी चुनौती को हल्का कर देती है।

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