ऊंचीहार उत्तर प्रदेश से सुरेश साहू के पिता रामनारायण वर्ष 1955 में रोजगार की तलाश में टनकपुर आए थे. वह टनकपुर में मजदूरी किया करते थे. सुरेश बताते हैं कि 1984 में नेपाल बॉर्डर पर पुल बनना टनकपुर के लिए एक बड़ा मोड़ था. मजदूरों, कर्मचारियों और व्यापारियों की वजह से बाजार चमका. लोगों ने घरों को किराए पर देना शुरू किया. सुरेश साहू ने भी उसी साल वीसीआर किराए पर देने और किराए की दुकान में एक सिलाई मशीन लेकर सिलाई का काम शुरू किया.
1991 में पुल का काम खत्म होते ही बाजार की गति दोबारा धीमी पड़ने लगी. 2005 में अपनी दुकान खरीदी. उनकी बेटियाँ आईआईटी, आईआईएम और एमसीए जैसी उच्च शिक्षा लेकर आगे बढ़ गईं लेकिन शहर का कारोबार वह प्रगति नहीं कर पाया.
*सड़क की वजह से शहर का बदलता स्वरूप*
सुरेश ने टनकपुर के बाजार की बुरी स्थिति के बारे में बात करते हुए आगे बताया कि टनकपुर के पास स्थित पूर्णागिरी धाम की भीड़ से कभी चैत्र नवरात्र की भीड़ से शहर भरा रहता था. बसें और यात्री टनकपुर के भीतर तक आते थे जिससे बाजार में रौनक बनी रहती थी. अब सड़कें सुधरने के बाद लोग सीधे धाम तक चले जाते हैं. शहर के अंदर तक भीड़ नहीं आती. यही स्थिति ऑल वेदर रोड की वजह से भी हुई है, पहाड़ के लिए अब रात भर गाड़ियां चलती हैं तो टनकपुर रुक कर खरीददारी कम ही लोग करते हैं.
*ऑनलाइन बाजार का असर*
सुरेश की सिलाई दुकान में कोरोना से पहले दस कारीगर काम करते थे. अब केवल चार रह गए हैं. इसके साथ ही ऑनलाइन खरीददारी ने स्थानीय बाजार को और कमजोर कर दिया है. सुरेश अपनी दुकान के सामने खड़े होकर आसपास की खाली पड़ी दुकानों की ओर इशारा करते हैं. वह कहते हैं कि पहले इन दुकानों में भीड़ रहती थी. आज ग्राहक ऑनलाइन खरीद लेते हैं और दुकानें खाली पड़ी रहती हैं. उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले तक रेलवे क्षेत्र में हाथ से पत्थर तोड़ने का बड़ा काम था. मजदूरों की आवाजाही रहती थी. बाद में क्रेशर लगने लगे. क्रेशर मशीनें पत्थर को तेज़ी से तोड़ देती हैं जिससे मजदूरों की जरूरत कम हो गई और यह काम लगभग खत्म हो गया.
*टनकपुर से भी पलायन*
सुरेश कहते हैं कि लोग पहाड़ से पलायन की बात करते हैं जबकि टनकपुर स्वयं भी पलायन की मार झेल रहा है. वह कहते हैं कि यहां युवाओं के लिए कोई रोजगार नहीं है. व्यापार करो तो भी मन में हमेशा अनिश्चितता रहती है कि यह कब तक चलेगा. युवाओं की बड़ी संख्या पढ़ाई या काम के लिए बाहर ही चली जाती है. उन्होंने यह भी बताया कि भोटिया समुदाय के दस पंद्रह परिवार कभी बाजार में टॉफी और छोटी मोटी वस्तुएँ बेचते थे. अब सिर्फ एक परिवार इस काम में बचा है.
*टनकपुर का बदलता बाजार और खेती का असर*
गुलशन भी बाजार में मिले. वह अब ई रिक्शा चलाते हैं. उनका परिवार पहले टनकपुर में सब्जी उगाकर बेचता था. वह बताते हैं कि अब सब्जी बाहर से आती है. स्थानीय खेती लगभग खत्म हो गई है क्योंकि लोगों ने सब्जियों की जगह जमीन पर प्लॉटिंग कर दी है. खेती घटने से शहर की सब्जी मंडी की स्थानीय पहचान भी खत्म होती जा रही है.
*पर्यटन और रेल लाइन की उम्मीद*
सुरेश साहू कहते हैं कि चूका गांव तक शारदा नदी के किनारे बनने वाली सड़क को लोग पर्यटन की एक नई संभावना बताते हैं. चूका गांव का प्राकृतिक सौंदर्य और आसपास के जंगल मिलकर इसे एक छोटे पर्यटन केंद्र के रूप में पहचान दिला सकते हैं.
सालों से चर्चा में टनकपुर बागेश्वर रेल लाइन भी यहाँ की सबसे बड़ी उम्मीदों में से एक है. इसका सर्वे अंग्रेजों के समय हुआ था लेकिन योजना आज भी आगे ही बढ़ती जा रही है. रेल लाइन बन जाए तो टनकपुर की रौनक वापस लौट सकती है. यात्रियों की आवाजाही बढ़ेगी और बाजार फिर चल पड़ेगा.
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