Thursday, December 4, 2025

हल्द्वानी में भाषा पर संवाद, बटरोही ने उठाए सवाल

हल्द्वानी में भाषा पर संवाद, बटरोही ने उठाए सवाल


हल्द्वानी में अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन द्वारा आयोजित साहित्यिक बैठक में लेखकों के बीच वातावरण शुरू से गंभीर और विचारोत्तेजक रहा. यह बैठक प्रेमचंद के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर हुई. कार्यक्रम में बोलते हुए हिंदी के रिटायर्ड प्रोफेसर और वरिष्ठ लेखक बटरोही ने कहा कि हिंदी शब्द को लेकर लोगों में आज भी भ्रम है. उन्होंने कहा कि कई लोग अभी भी मानते हैं कि हिंदी प्रदेश का नाम है या भाषा का. उन्होंने बताया कि लंबे समय तक ब्रजभाषा और अवधी को भी हिंदी माना जाता था. पहले इसे हिंदवी कहा जाता था और आज की हिंदी की जड़ें अमीर खुसरो तक जाती हैं. महात्मा गांधी भी मानते थे कि हिंदी वही भाषा है जिसे सभी लोग बोल सकें. बटरोही ने कहा कि अरब इतिहासकारों ने कभी हिंद और सिंध को अलग–अलग देश माना था, इसलिए भाषा का इतिहास सिर्फ साहित्य में नहीं बल्कि भूगोल और संस्कृति में मिलता है.

सोशल मीडिया की भाषा और खतरे में देवनागरी


बटरोही ने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से एक नई भाषा बन रही है और यह संभव है कि अगले दस पंद्रह साल में हिंदी की लिपि बदल जाए. उन्होंने कहा कि आज फिल्मों की स्क्रिप्ट रोमन में लिखी जा रही हैं और नई पीढ़ी देवनागरी पढ़ नहीं पाती. उन्होंने कहा कि देवनागरी दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपि मानी जाती है, लेकिन फिर भी हम हिंग्लिश में पढ़ रहे हैं. उन्होंने टिप्पणी की कि हिंदी के अंक लगभग खत्म हो चुके हैं. उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने पत्रकार रवीश कुमार को हिंदी में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया था, लेकिन अब स्थिति यह है कि भाषा बाज़ार और तकनीक के हिसाब से ढाली जा रही है.

उत्तराखंड की भूमिका और भूली हुई साहित्यिक परंपरा


बटरोही ने कहा कि नई पीढ़ी को यह जानने की ज़रूरत है कि हिंदी के विकास में उत्तराखंड की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है. उन्होंने बताया कि हिंदी के पहले गद्य लेखक पंडित नैनी सिंह रावत उत्तराखंड से थे और पहले पद्य लेखक गुमानी थे, जिन्होंने खड़ी बोली में कविता लिखी और राजनीति पर तीखा व्यंग्य किया. उन्होंने कहा कि भाषा धर्म, जाति और भूगोल की नहीं होती बल्कि वह समाज की होती है. नई हिंदी भी कभी प्रेमचंद की हिंदी नहीं थी, लेकिन अब वह लोकप्रिय हो रही है. उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने हिंदी और उर्दू को जोड़कर साहित्य में लोकप्रियता हासिल की थी. उन्होंने कहा कि हिंदी की विडंबना यह है कि अपने लेखक को कमतर समझा जाता है. हिंदी साहित्य का पहला इतिहास फ्रांसीसी लेखक ने लिखा और कुमाऊनी कथाओं का पहला संग्रह एक रूसी विद्वान एवन पावलोवी मिनोवे ने तैयार किया जो 1885 में अल्मोड़ा आए और उन्होंने कुमाऊनी सीखी. बाद में प्रेमचंद पांडे ने इसका हिंदी में अनुवाद किया.

नाम, परंपरा और नए दौर का लेखन


बटरोही ने कहा कि उत्तराखंड के कई लेखक राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव छोड़ चुके हैं लेकिन आज की पीढ़ी उन्हें नहीं जानती. उन्होंने शिवानी, मोलाराम, गुमानी, नाटककार गोविंद बल्लभ पंत, पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, हेमचंद्र जोशी, इलाचंद्र जोशी, रामप्रसाद घिल्डियाल, चंद्रकुंवर बड़थ्वाल, शैलेश मटियानी, शेखर जोशी, हिमांशु जोशी और मनोहर श्याम जोशी का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि मनोहर श्याम जोशी ने कुमाऊनी और हिंदी को बराबर स्थान दिया और उनके उपन्यास ‘कसाब’ का शीर्षक ही कुमाऊनी में है. आगे चलकर ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ जैसी फिल्मों में पहाड़ी भाषा की उपस्थिति दिखाई दी. उन्होंने नवीन जोशी, जगदीश चंद्र पांडे, देवेंद्र मेवारी, सुनीता उपाध्याय, सुभाष पंत, सुभाष उपाध्याय, शिवप्रसाद जोशी, गीता गैरोला, अरुण कुकसाल, सुभाष तरन और तारा पांडे जैसे लेखकों का उल्लेख किया और कहा कि इन लेखकों ने प्रवासन, सामाजिक संघर्ष, विज्ञान, भाषा और पहाड़ी समाज के जीवन पर महत्वपूर्ण लेखन किया है.

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