Tuesday, December 9, 2025

सार

प्रकाशक को प्रेषित किताब का परिचय: शून्य से क्षितिज तक एक यात्रा
शीर्षक: शून्य से क्षितिज तक एक यात्रा 

गिरिजा शंकर मुंगली 


परिचय- 

गिरिजा शंकर मुंगली का जीवन उन दुर्लभ यात्राओं में से एक है जो शून्य से शुरू होकर ज्ञान, साहस और सेवा के क्षितिज को छूती है। यह किताब भारतीय सेना के एक उत्कृष्ट अधिकारी से एक दूरदर्शी शिक्षाविद में उनके परिवर्तन की कहानी है। यह उन पाठकों के लिए एक मार्गदर्शक है जो जीवन के उद्देश्य, सफलता और विनम्रता के बीच संतुलन खोजना चाहते हैं।

सैन्य जीवन का दृढ़ संकल्प

मुंगली जी के जीवन में बदलाव की शुरुआत दिल्ली में हुई, जब 26 जनवरी 1978 को गणतंत्र दिवस की परेड ने उन्हें सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। यह एक अप्रत्याशित घटनाक्रम था, क्योंकि उन्होंने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर यह राह चुनी। इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) में कठोर प्रशिक्षण के बाद, उन्होंने सिक्किम जैसे दुर्गम क्षेत्रों में पहली पोस्टिंग से लेकर एक पैराट्रूपर बनने तक का सफ़र तय किया।
पैराट्रूपिंग ने उन्हें सिखाया कि डर पर नियंत्रण ही असली साहस है, और उनके जीवन का सबसे बड़ा प्रमाण साल 2022 में 70 वर्ष की आयु में 16,000 फीट से लगाई गई उनकी छलांग है। सेना में उन्होंने पर्यावरण संरक्षण (Ecology Cell) के लिए काम किया, जिसके लिए उन्हें आर्मी चीफ की प्रशंसा भी मिली। उनका शोध कार्य "हिमालय में पर्वतारोहण के इतिहास" पर केंद्रित था, जिसने हिमालय के प्रति उनके गहरे प्रेम और सैन्य योगदान को एक साथ जोड़ा।

सियांग नदी और शिक्षा का नया अध्याय

मुंगली जी के जीवन में एक और निर्णायक मोड़ अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी के अभियान के दौरान आया। नदी के तेज बहाव में फंसने और फिर सुरक्षित बाहर निकलने के अनुभव ने उन्हें जीवन का उद्देश्य खोजने में मदद की। इस अनुभव ने उनके भीतर सेवा और शिक्षा के प्रति एक गहरा झुकाव पैदा किया।
सेना से सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने अपनी पत्नी देवयानी मुंगली के साथ मिलकर पुणे में 'संस्कृति स्कूल' की नींव रखी। यह संस्थान आज उत्कृष्टता और मानवीय मूल्यों का केंद्र है। श्रीमती देवयानी मुंगली, एक गोल्ड मेडलिस्ट और साहित्यकार ने इस शैक्षिक मिशन को अपनी मेधा और संस्कार दिए।

विनम्रता और विरासत

मुंगली जी का जीवन ईमानदारी, अनुशासन, राष्ट्रभावना और मानवता जैसे मूल्यों को स्थापित करता है। उन्होंने अपने जीवन में जनरल बी.सी. जोशी, सर एडमंड हिलेरी और डॉ. शेखर पाठक जैसे महान लोगों से प्रेरणा ली। उनकी विनम्रता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपनी सेवा को एक स्वभाव मानते हैं, न कि प्रचार का माध्यम।

मुंगली जी भारतीय फुटबॉल प्रशासन में अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) की क्लब लाइसेंसिंग समिति के अध्यक्ष के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह पुस्तक केवल उनकी उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक है, जो उन्हें सिखाती है कि "ऊँचा उड़ो पर जमीन मत छोड़ो"। यह उड़ने के साहस और सत्य के साथ खड़े रहने का एक किस्सा है।
यह आलेख, मुंगली जी के जीवन के सार को प्रस्तुत करता है और मेरा विश्वास है कि यह किताब पाठकों को गहराई से प्रेरित करेगी।

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