"अरे भैया आपने बस आगे रोक दी" रिया ने ऑफिस बस के ड्राइवर पर लगभग चींखते हुए कहा। बस से बाहर निकल कर अब रिया की नजरें अल्का को ढूंढ रही थी, "मैं बस अड्डे के बाहर ही हूँ, तू कहां रह गई" रिया ये बोल ही रही थी कि अल्का को सामने खड़ी देख उसने फोन काट दिया।
"जल्दी चल वैसे ही देर हो रही है, तुझे पक्का पता है न कि वहां लहंगा सही दाम में मिला जाएगा! मेरी शादी का कुछ सामान तो पापा मम्मी ले ही आएंगे, अपने कपड़े मैं खुद ही लूंगी"
अपनी बहन अल्का को हाथ पकड़ बस अड्डे की पीछे कपड़ों के बाजार की तरफ ले जाते रिया ने कहा।
रिया की शादी उसके मम्मी पापा ने बड़ी जल्दबाजी में तय कर दी थी। लड़की की उम्र बड़ रही थी, 32 की हो चली रिया के चक्कर में 28 की हो चली अल्का भी कुंवारी थी। कई लड़के रिया के वजन को देख, उसे शादी के लिए न कह देते।
एमबीए पढ़ी और चालीस हजार महीना कमा रही रिया के लिए ये रिश्ता बड़ी मुश्किल से रिया की मौसी ने तय कराया था।
लड़का थोड़ा लंगड़ाता था पर 32 की रिया अब सबको बूढ़ी लगने लगी थी, इसलिए 10 दिन के अंदर ही शादी के डेट निकाल ,एक महीने के अंदर ही रिया का बैंड बाजा बजाने की तैयारी कर ली गई थी।
नए जमाने की लड़की रिया ने पहले तो इसका विरोध किया पर घर वालों के 'अच्छा कमाता है' वाले डायलॉग के आगे उसकी एक न चली। रिया ने भी सोचा मेरा कुछ सामान इस घर में है उसे समेट लूंगी बाकी अब नए घर में एक नए आदमी के साथ ही एडजस्ट होगा।
"भैया ये नही वो नीला वाला" नीले लहंगे की तरफ इशारा करती रिया बोली। अल्का ने भी उस लहंगे को देख अपनी आंखें चमका दी थी।
बारात घर के बाहर थी, बाराती नाच रहे थे। शादी के लिए नौकरी छोड़ चुकी रिया आज सुबह ऑफिस के ब्लैक सूट की जगह नीले लहंगे में तैयार होकर बड़ी खूबसूरत लग रही थी।
रिया को आज लग रहा था, जिस घर में वो बचपन से पली बढ़ी क्या वो उसका कभी था भी या नही। वो बस यहां मेहमान थी, कितने समय से उसे इस घर से भेजे जाने के प्रयास चल रहे थे।
फिर खुद को समझाते उसने सोचा, यही तो एक लड़की की किस्मत है। मेरा कुछ सामान ही तो इस घर में है, ले चलती हूं। नए सिरे से जिंदगी शुरु करूंगी।
शादी को दो साल हो चुके थे, कुशल के ऑफिस जाने के बाद रिया कमरे को चारों तरफ देख रही थी। पापा की दी अलमारी, श्रृंगार दान, पलंग, रिया का बचपन से कॉलेज तक इनामों से भरा बक्सा और उसके ऑफिस टाइम का एलबम यही कुछ एक कमरे में रिया का सामान था।
शादी के शुरुआती दिनों में ही सास के तानों से तंग आकर रिया कुशल को किसी तरह मना कर अलग से किराए के कमरे में रहने ले आई थी।
उसके कुछ महीने बाद से ही कुशल के साथ कोई भी विचार न मिलने के कारण रिया की उससे बातचीत अब लगभग न के बराबर ही होती थी।
रिया ने कुशल से रिश्ता सुधारने की बहुत कोशिश की, वो दोनों मनोचिकित्सक के पास भी गए पर दिल न जुड़ने की भी क्या वजह हो सकती है!! इस थोपी गई शादी में रिया कुशल के साथ कभी प्रेम में पड़ी ही नही।
उसने रिश्ता निभाने की खूब कोशिश करी पर नाकामयाब रही।
तलाक की सारी कारवाई पूरी होने के बाद रिया फिर से अपने कुछ सामान के साथ बेघर हो गई थी। एक बार छूट चुके पापा के घर वह दोबारा नही जाना चाहती थी। समाज के सामने अपने पापा को उसकी वजह से सर झुकाते चलते देखने की रिया में अब हिम्मत नही थी।
रिया ने अब दिल्ली बसने का निर्णय ले लिया था, ट्रेन में रुद्रपुर से दिल्ली आते रिया सोच रही थी "पुरानी नौकरी के आधार पर नई मिल ही जाएगी, मेरा कुछ सामान ही तो है। फिर जिंदगी शुरु करूंगी।"
No comments:
Post a Comment