Sunday, August 28, 2022

रूठे हो तुम

बचपन के दिन थे, बड़े खूब थे।
गर्मियों की छुट्टियों में पांचवीं में पढ़ने वाली प्रीति बड़ी खुश रहती कि उसके हमउम्र चचेरे भाई बहन अमित, अंकेश, बिन्नी उसके घर आएंगे फिर सब खूब धमाल मचाएंगें।

गर्मियों में रामनगर का मौसम गर्म तो रहता है पर आम लीची के पेड़ों की छांव तले कैरम, चेस, लूडो खेलते बच्चों का वक्त कब बीत जाता था, उन्हें पता ही नही चलता था ।

प्रीति के पापा खड़क सिंह फौज में थे तो अक्सर ड्यूटी में ही बाहर रहते, बच्चों के साथ उनका रहना कम ही होता था। पति के सीमित वेतन में उनकी पत्नी अनामिका को बड़े हिसाब किताब से घर चलाना होता था। 
दो महीनों से पति की चिट्ठी नही आई तो अनामिका ने खुद ही चिट्ठी लिखते लिखा
 'रूठे हो तुम, 
मुझे समय नही मिल पाता इसलिए मैं भी चिट्ठी नही लिख पाई । आपके ही भाइयों के बच्चे आए थे, खातिरदारी नही करती तो बच्चे अपने घर कहते कि चाची ने ख्याल नही रखा। फिर भाईसाहब लोग रूठ जाते। किस किस को खुश रखूं, समझा करो। पिछले महीने खर्चा ज्यादा हो गया था, प्रीति की नई ड्रेस सिलानी है। रोज़ मुझसे कहती है कि मम्मी स्कूल की ड्रेस पुरानी हो गई नई सिलानी है। अब रूठने ज्यादा लगी है। हो सके तो इस बार मनीऑर्डर में थोड़ा बड़ा कर पैसे भेज देना।' 

पैसे आ गए और प्रीति की ड्रेस भी सिल गई। अनामिका प्लास्टिक वाले गुल्लक में पैसे भी जमा करती ताकी एक महीने पूरा होने पर उसे खोल घर में राशन जमा कर सके।

दीवाली नज़दीक थी, हर बार की तरह खड़क सिंह घर पर छुट्टी आए हुए थे और खड़क के पीछे पीछे उनके भाई भी परिवार सहित बरेली से अपने गांव आ गए थे। घर में फिर बच्चों की धमाचौकड़ी थी। कोई रूठे न इसलिए अनामिका भी दिन पर काम में लगी रहती, 34 की उम्र में ही इन जिम्मेदारियों से अनामिका पचास की लगने लगी थी।

इस बार खड़क सिंह से स्कूटर खरीद लाने की जिद करते अनामिका को बहुत बहुत दिन हो गए थे। प्रीति भी पापा से कहती स्कूटर ले आओ। मेरे सब दोस्तों के घर स्कूटर है। पीछे पीछे खड़क के भाई भी "हां भाईसाहब, कब तक साइकिल में घिसोगे। स्कूटर से हमारे बच्चे भी आराम से गर्जिया मंदिर तक घूम आएंगे।

रूठे को मनाना ही तो जिंदगी है, खड़क ले आए एक सेकेंडहैंड बजाज चेतक स्कूटर को घर लेकर। 
छुट्टी खत्म होने से पहले ही अनामिका ने खड़क से जिद करी कि "हल्द्वानी मेरे मम्मी लोग कब से रूठे हुए हैं , हमेशा कहते हैं इतने नज़दीक होकर भी बेटी मायके नही आती।'

खड़क पत्नी को बैठा हल्द्वानी निकले और बैलपड़ाव के नजदीक ही एक ट्रक ने स्कूटर को पीछे से टक्कर मार दी।
खड़क तो बच गए पर अनामिका अब इस दुनिया में नही रही।

तेरहवीं के दिन प्रीति के घर में सभी रिश्तेदारों का जमावड़ा था, खड़क ने अपनी छुट्टी बढ़वा ली थी और प्रीति भी माँ की असमय मौत से उबर रही थी।

तेरहवीं के लिए खड़क राशन देख रहे थे, उन्हें ये चिंता थी कि खाने में किसी कमी से कोई घर आया रूठ न जाए। प्रीति भी घर पर आए मेहमानों को चाय पिलाने में व्यस्त थी।

अनामिका भी कहीं दूर से अपने घर में आए मेहमानों को देख ,अपने पति से कहना चाहती थी कि एक बार सबसे पूछ जरूर लेना कि सब ठीक है! ये तो नही कि किसी बात से 'रूठे हो तुम!'

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